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Official Transcriptसंख्या-]7/2026/64/सैंतीस-2-2026-(8)/ 2025 प्रेषक, देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश शासन। सेवा में, 4- समस्त जिलाधिकारी, उत्तर प्रदेश। 2- निदेशक, प्रशासन एवं विकास, पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ। पशुधन अनुभाग-2 लखनऊ :: दिनांक-04 फरवरी, 2026 विषयः- "acter रोग नियंत्रण एवं निदान योजना (रा.यो.)" की गाइडलाईन्स। महोदय, अवगत हैं कि दुधारू पशुओं में होने वाले रोगों में प्रमुख थनैला...
संख्या-]7/2026/64/सैंतीस-2-2026-(8)/ 2025 प्रेषक, देवेन्द्र कुमार पाण्डेय, विशेष सचिव, उत्तर प्रदेश शासन। सेवा में, 4- समस्त जिलाधिकारी, उत्तर प्रदेश। 2- निदेशक, प्रशासन एवं विकास, पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश, लखनऊ। पशुधन अनुभाग-2 लखनऊ :: दिनांक-04 फरवरी, 2026 विषयः- "acter रोग नियंत्रण एवं निदान योजना (रा.यो.)" की गाइडलाईन्स। महोदय, अवगत हैं कि दुधारू पशुओं में होने वाले रोगों में प्रमुख थनैला रोग (Mastitis) है। थनैला रोग से प्रभावित पशुओं के थनों में दर्द, सूजन हो जाती है, शारीरिक तापमान भी बढ़ जाता है। लक्षण प्रकट होते ही दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। पशु खाना-पीना छोड़ देता है एवं अरूचि से ग्रसित हो जाता है। यह बीमारी सामान्यतः गाय, भैंस एवं बकरी समेत लगभग सभी मादा पशुओं में पायी जाती है, जो अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं। थनैला बीमारी पशुओं में कई प्रकार के जीवाणुओं के संक्रमण से होती है। इसके अतिरिक्त चोट तथा मौसमी प्रतिकूलताओं के कारण भी थनैला हो जाता है। इस रोग का मुख्य कारण स्ट्रेप्टो कॉकस बैक्टीरिया होता है। शुरूआती दौर में एक थन में संक्रमण होता है, जो कि धीरे-धीरे अन्य Yat में फैल जाता है, जिससे que पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता कम या समाप्त हो जाती है। यह बीमारी दूध देने वाले पशुओं में होने के कारण पशुपालकों के लिए गम्भीर चिंता का विषय है। इस बीमारी से पूरे देश में प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये की आर्थिक क्षति होती है, जो अंततः पशुपात्रकों की आर्थिक स्थिति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। दुधारू पशुओं के थनों में होने वाले संक्रमणों को कम करके अथवा समाप्त/उन्मूलन कर पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाकर आर्थिक रूप से उन्नत किया जा सकता है तथा पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता को समाप्त होने से बचाया जा सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु थनैला रोग नियंत्रण एवं निदान योजना (रा.यो.) का प्रारम्भ किये जाने का निर्णय लिया गया है, जिसकी गाइडलाइन्स निम्नवत् है:- थनैला रोग नियंत्रण एवं निदान योजना (रा.यो.)
4. योजना की पृष्ठभूमि :- प्रदेश की विशाल पशुधन सम्पदा को सुरक्षित संवर्धित तथा रोगमुक्त रखने में पशुपालन विभाग सतत रूप से प्रत्यनशील है। उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि एवं कृषि आधारित व्यवसाय जैसे पशुपालन/मत्स्य पालन इत्यादि पर आधारित है। कृषि अर्थ-व्यवस्था मेँ पशुपालन एवं पशुधन उत्पादों 4- यह शासनादेश इलेक्ट्रानिकली जारी किया गया है, अत: इस पर हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं है | 2- इस शासनादेश की प्रमाणिकता वेब साइट http://shasanadesh.up.nic.in से सत्यापित की जा सकती है |का महत्वपूर्ण योगदान है। पशुधन व्यवसाय में पशुओं का स्वास्थ्य पशुपालन का आधार है। प्रदेश में गोवंशीय पशुओं के संरक्षण एवं संवर्धन के कार्यों को तीव गति से किया जा रहा है। प्रदेश सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों में कृषकों की आय को दुगुभी किये जाने के साथ-साथ प्रवेश को वन ट्रिलियन डालर की आर्थिकी के रूप में विकसित किये जाने की संकल्पना भी समाहित है। प्रदेश में दुग्ध उत्पादन मेँ वृद्धि कर पशुपालकों को आत्मनिर्भर बनाना आवश्यक है ताकि प्रदेश में जनशक्ति के पल्रायन को रोक कर प्रदेश के भीतर ही रोजगार का सृजन कराया जा सके। उत्तर प्रदेश में ।90.20 लाख गोवंश एवं 330.27 लाख महिषवंशीय कुल 520.37 लाख पशुधन संख्या के साथ प्रदेश दुग्ध उत्पादन A प्रथम स्थान पर है। दुग्ध उत्पादन प्रदेश के पशुपालकों की आय का एक प्रमुख स्रोत है। que पशुओं में होने वाले रोगों में प्रमुख थनैला रोग (Mastitis) है। थनैला रोग से प्रभावित पशुओं के थनों में दर्द, सूजन हो जाती है, शारीरिक तापमान भी बढ़ जाता है। लक्षण प्रकट होते ही दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है। पशु खाना-पीना छोड़ देता है एवं अरूचि से ग्रसित हो जाता है। यह बीमारी सामान्यतः गाय, भैंस एवं बकरी समेत लगभग सभी मादा पशुओं A पायी जाती है, जो अपने बच्चों को दूध fend हैं। थनैल्रा बीमारी पशुओं में कई प्रकार के जीवाणुओं के संक्रमण से होती है। इसके अतिरिक्त चोट तथा मौसमी प्रतिकूलताओं के कारण भी थनैला हो जाता है। इस रोग का मुख्य कारण स्ट्रेप्टो कॉकस बैक्टीरिया होता है। शुरूआती दौर में एक Yat A संक्रमण होता है, जो कि धीरे-धीरे अन्य Yat में फैल जाता है, जिससे दुधारू पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता कम या समाप्त हो जाती है। यह बीमारी दूध देने वाले पशुओं में होने के कारण पशुपालको के लिए गम्भीर चिंता का विषय है। पशुधन विकास के साथ श्वेत क्रान्ति की पूर्ण सफलता में अकेले यह बीमारी सबसे बड़ी बाधक बनी हुई है। इस बीमारी से पूरे देश में प्रतिवर्ष करोड़ों रूपये की आर्थिक क्षति होती है, जो अंततः पशुपालकों की आर्थिक स्थिति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। दुधारू पशुओं के थनों में होने वाले संक्रमणों को कम करके अथवा समाप्त/उन्मूलन कर पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता बढ़ाकर आर्थिक रूप से उन्नत किया जा सकता है तथा पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता को समाप्त होने से बचाया जा सकता है। 2- योजना का उठदेश्य :- योजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नवत् हैं :- « प्रदेश में पशुपालरकों के पशुओं को उन्नत स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना। « थनैला रोग पर नियंत्रण स्थापित करना। © पशुधन के उत्पादन एवं उत्पादकता A वृद्धि करना। «ग्राम स्तर पर पशुपात्रन के माध्यम से स्थिर रोजगार का सृजन करना। « दुग्ध उत्पादन को बढ़ाया जाना। « पशुओं की दुग्ध उत्पादन क्षमता को प्रभावित होने से बचाया जाना, जिससे प्रदेश में दुग्ध उत्पादन बढ़ेगा। « अच्छी नस्ल की गायों, भेसों, बकरियों आदि पशुओं की उत्पादकता को बनाये रखा जा सकेगा। « पशुपालकों में पशुपालन की भावना को विकसित किये जाने में सहायक होगी। «प्रदेश सरकार पशुधन सुरक्षा की नीति को प्रतिपादित करने में यह योजना सहायक होगी। 4- यह शासनादेश इलेक्ट्रानिकली जारी किया गया है, अत: इस पर हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं है | 2- इस शासनादेश की प्रमाणिकता वेब साइट http://shasanadesh.up.nic.in से सत्यापित की जा सकती है |«योजना के कियान्ययन के सापेक्ष पशु उत्पाद हेतु ल्रागत में कमी होने एवं पशु उत्पाद की गुणवत्ता में वृद्धि होने केकारण योजना पशुपालकों के आर्थिक उन्नयन A अभिवृद्धि करने के साथ-साथ पशुपालकों की आय दुगुनी करने में सहायक सिद्ध होगी। «पशुओं में होने वाले इस रोग का मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़ सके। «रोग से पशु नस्ल हानि को रोका जाना। « दूध को सम्पूर्ण आहार माना जाता है, Rif दूध में प्रोटीन, वसा. कार्बोहाइड्रेट, खनिज (कैल्शियम, पोटेशियम एवं फास्फोरस) पाया जाता है। दूध की प्रदेश में पर्याप्त उपलब्धता होने से मानव स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। 3- योजना का क्रियान्वयन/अनुश्रवण :- 3(4) प्रशासनिक (अ) निदेशालय स्तर :- निदेशालय स्तर पर संयुक्त निदेशक (रोग नियंत्रण) कार्यक्रम के नोडल अधिकारी एवं उप निदेशक, धनैला-2 को उप नोडल अधिकारी नामित किये जायेंगे। निदेशक, रोग नियन्त्रण एवं प्रक्षेत्र पशुपालन विभाग, उ0प्र0 द्वारा प्रत्येक माह मांग के सापेक्ष कार्यक्रम की अद्यावधिक प्रगति प्रशासनिक विभाग एवं समन्वय विभाग, उ0प्र0 शासन को अनिवार्य रूप से प्रेषित की जायेगी। कार्यकम के कियानवयन सम्बन्धी प्रगति (भौतिक एवं वित्तीय) की सभी सूचनायें विभागीय वेब-साईट पर समय- समय पर अद्यतन करते हुये उपलब्ध करायी जायेंगी।
(J) मण्डल स्तर :- पशुपालन विभाग के अन्तर्गत AUST ER पर पदस्थ अपर निदेशक, ग्रेड-त कार्यक्रम के कियान्वयन हेतु मण्डल स्तर पर नियंत्रक अधिकारी होगें। अपर निदेशक, ग्रेड-] ASA के मण्डलीय जनपदों में कार्यक्रम के क्रियान्वयन के समक्ष प्रगति की पाक्षिक समीक्षा करेगें। अपर निदेशक, ग्रेड- ! प्रत्येक 45 दिन A पाक्षिक रिपोर्ट के रूप A प्रगति मण्डलायुक्त एवं मासिक प्रगति निदेशालय को उपलब्ध करायेगें। (स) जनपद स्तर :- मुख्य पशुचिकित्सा अधिकारी जनपद स्तर पर कार्यक्रम के क्रियान्वयन हेतु नोडल अधिकारी नामित किये जायेंगे। कार्यकम के कियान्वयन हेतु विकास खण्ड (विकास खण्ड मुख्यालय) एवं विकास भवन (जनपद मुख्यालय) पर कार्यक्रम की रूपरेखा, योजना के प्रारम्भ की तिथि एवं आवश्यक जानकारियों अंकित करते हुये डिसप्ले बोर्ड त्रगाया जायेगा। 3(2) कार्यकम कियान्वयन हेतु अनुदेश :- योजना का संचालन पशु चिकित्सालय, पशु सेवा केन्द्रों, पशु चिकित्सा पाल्रीक्लीनिक, सचल वाहन एवं मोबाइल वेटनरी यूनिट के माध्यम से कराया जायेगा। इन संस्थाओं पर कार्यरत कार्मिकों से कार्यों का सम्पादन कराया जायेगा। 4- यह शासनादेश इलेक्ट्रानिकली जारी किया गया है, अत: इस पर हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं है | 2- इस शासनादेश की प्रमाणिकता वेब साइट http://shasanadesh.up.nic.in से सत्यापित की जा सकती है |(अ) प्रचार प्रसार व्यवस्था :- पशुपालकों में थनैला रोग की जानकारी देकर रोग की रोकथाम की जा सकती है। इसके लिए पैम्फलेट एवं बैनर के माध्यम से बीमारी की जानकारी दी जायेगी। प्रति पशु चिकित्सालय पर 500 पैम्फलेट, प्रति पशु चिकित्सा पालीक्लीनिक पर 500 पैम्फलेट एवं प्रति पशु सेवा केन्द्र पर 200 पैम्फलेट दिये जायेगें। इसके अतिरिक्त प्रति पशु चिकित्सालय 04 बैनर, प्रति पशु चिकित्सा पालीक्लीनिक पर 02 dat एवं प्रति पशु सेवा केन्द्र पर Ol बैनर तथा प्रति मोबाइल वेटनरी यूनिट पर 0i बैनर दिये जायेंगे। पैम्फलेट का वितरण पशु चिकित्सालय, पशु चिकित्सा पालीक्लीनिक एवं पशु सेवा deg के माध्यम से किया जायेगा। साथ ही प्रचार-प्रसार सामग्री सचल वाहनों एवं मोबाइल वेटनरी यूनिट के माध्यम से भी वितरित की जायेगी। पैम्फलेट में रोग की जानकारी, रोग के लक्षण, रोग से बचाव के उपाय आदि के बारे में जानकारी दी जायेगी तथा साफ-सफाई के बारे में जानकारी दी जायेगी। रोग सम्बन्धी जानकारी यथा रोग के लक्षण, रोग से बचाव के उपाय आदि की जानकारी विभाग अन्तर्गत Uo दीन cule उपाध्याय पशु आरोग्य मेल्रा/शिविर (न्याय पंचायत स्तर»मण्डल्र स्तर) के माध्यम से दी जायेगी। रोग की पुष्टि करने के लिए कैलिफोर्निया मेस्टाइटिस किट के प्रयोग की जानकारी दी जायेगी। (ब) पशुओं में रोग के प्रसारित होने के उपरान्त चिकित्सा हेतु औषधियों/उपकरण सामग्री आदि की व्यवस्था :-
(i) योजना में que पशुओं की चिकित्सा एवं उपचार हेतु 39 औषधि तथा रसायन मद में औषधियों आदि के सम्बन्ध में निम्न वर्गीकरण के आधार पर औषधियों का चयन किया जायेगा- cr Class of Medicines Total Budget class Expenditure of the wise Antibiotics for intrmammary infusion use (Dry Cowj35% of the total budget herapy & intra mammary antibiotics) for the scheme under Manak Mad -39 Anti-Allergic/Anti-Histaminics/Corticosteroids/ 25% of the total budget 2 |Haemostatics/Anti-Inflammatory/Analgesic/ for the scheme under Antipyretic Manak Mad-39 5% of the total budget Antibiotics for prevention of infection for the scheme under Manak Mad-39 Metabolic Restoratives & Mineral Supplements (Oralji5% of the total budget 4 |Liquids/Powders/Tablets/bolus/injections/Infusions jfor the scheme _ under and multi-vitamin (inj, oral, powder, tablet & oral) |Manak Mad-39 0% of the total budget Disinfectants/Local Antiseptics (lotion, cream, for the scheme under spray), Anti Spasmodic Manak Mad-39
(ii) उपकरण/»सामग्री आदि की व्यवस्था :- 4- यह शासनादेश इलेक्ट्रानिकली जारी किया गया है, अत: इस पर हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं है | 2- इस शासनादेश की प्रमाणिकता वेब साइट http://shasanadesh.up.nic.in से सत्यापित की जा सकती है |योजना अन्तर्गत संक्रमित que पशुओं की चिकित्सा एवं उपचार में उपयोगी सामग्रियों जैसे CUS Tae (एक्जामिनेशन»लैटेक्स), निडिल्र/सिंरिज, de किट, आई०्वी० सेट, Hea, बैण्डेज, एप्रन/डाक्टर कोट, हैण्डवाश एवं अल्कोहल स्वैब आदि का प्रयोग किया जायेगा। संक्रमित पशुओं की चिकित्सा राजकीय पशु चिकित्सालय, पशु सेवा केन्द्र, पशु चिकित्सा पालीक्लीनिक, सचल वाहनों, मोबाइल वेटनरी यूनिट एवं विकास खण्ड स्तर तथा मण्डल स्तर पर आयोजित होने वाले मेलों»शिविरों के माध्यम से की जायेगी।
(iii) कार्यालय उपयोगार्थ कम्प्यूटर एवं तत्सम्बन्धी Teel आदि की व्यवस्था :- कार्यक्रम अन्तर्गत योजना के अनुश्रवण, योजना की समीक्षा, सूचनाओं के आदान-प्रदान आदि के लिए प्रति जनपद कम्प्यूटर की व्यवस्था की जायेगी तथा कम्प्यूटर के संचालन अन्तर्गत तत्सम्बन्धी FEIT आदि की उपलब्धता भी सुनिश्चित की जायेगी। 2- इस सम्बन्ध मेँ मुझे यह कहने का निदेश हुआ है कि कृपया उपर्युक्तानुसार योजना का प्राथमिकता पर क्रियान्वयन सुनिश्चित कराने का कष्ट करें। भवदीय, (देवेन्द्र कुमार पाण्डेय) विशेष सचिव। YOHO-7/2026/64()/Adia-2-2026-(8)/2025, तद्दिनांक | Wate निम्नलिखित को सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित:- on प्रमुख स्टाफ आफिसर, मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश शासन। निजी सचिव, कृषि उत्पादन आयुक्त, उत्तर प्रदेश शासन। अपर मुख्य सचिव»प्रमुख सचिव, उत्तर प्रदेश शासन, वित्त/नियोजन/कृषि विभाग। समस्त मण्डलायुक्त, उत्तर प्रदेश। निदेशक, रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र पशुपालन विभाग, उ0प्र0, लखनऊ। मुख्य कार्यकारी अधिकारी, उ0प्र0 पशुधन विकास परिषद, लखनऊ। समस्त मण्डलीय अपर निदेशक ग्रेड-2, पशुपालन विभाग, उत्तर प्रदेश। समस्त मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, उत्तर प्रदेश/गार्ड फाईत। ou Fw NY bP आज्ञा से, (रवीन्द्र प्रताप सिंह) उप सचिव। 4- यह शासनादेश इलेक्ट्रानिकली जारी किया गया है, अत: इस पर हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं है | 2- इस शासनादेश की प्रमाणिकता वेब साइट http://shasanadesh.up.nic.in से सत्यापित की जा सकती है |