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Date: 18-Mar-2024 Category: Extra Ordinary State: Union Government Country: India

The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 The Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023

Issued by Ministry of Law and Justice · Legislative Department

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Executive Summary & Key Takeaways

Here's a summary of the provided policy text, following your specified structure: **Executive Summary:** This document publishes Hindi translations of The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023; The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023; and The Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 under the authority of the President. These translations are deemed the authoritative Hindi texts under the Official Languages Act, 1963. It was published on Monday, March 18, 2024. **Key Points / Main Content:** * **Authoritative Hindi Translations Published:** * Hindi translations of The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 (Act No. 45 of 2023), The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (Act No. 46 of 2023), and The Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 (Act No. 47 of 2023) are officially published. * These Hindi translations are considered the authoritative legal texts in Hindi. * **Authority and Legal Basis:** * Published under the authority of the President. * This action is in accordance with Section 5, sub-section 1, clause a of the Official Languages Act, 1963 (19 of 1963). **Impact Analysis:** * **Courts and Legal Professionals:** * *Impact:* Must now consider the Hindi translations as authoritative legal texts. * *Action Required:* Incorporate and refer to these Hindi translations in legal proceedings and interpretations. * **Legislative Bodies and Government Departments:** * *Impact:* Required to use these authoritative Hindi texts for official purposes. * *Action Required:* Update official records and references to reflect the authoritative Hindi translations of the specified acts. * **Citizens:** * *Impact:* The availability of authoritative Hindi translations increases accessibility and understanding of the laws. * *Action Required:* Be aware of the availability of these translations for better comprehension of the legal framework.

Key Entities Referenced

New Delhi: The location where the Ministry of Law and Justice, Legislative Department is situated, also the place of publication. Ministry of Law and Justice: The ministry responsible for publishing the Hindi translations of the new criminal codes. Legislative Department: A department within the Ministry of Law and Justice. The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023: One of the new criminal codes, translated into Hindi and published under the authority of the President. The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023: One of the new criminal codes, translated into Hindi and published under the authority of the President. The Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023: One of the new criminal codes, translated into Hindi and published under the authority of the President. Official Languages Act, 1963: The Act under which the Hindi translations of the new criminal codes are deemed authoritative. President of India: The highest authority whose authorization is required for the publication of the Hindi translations of the new criminal codes.
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jftLVªh lañ Mhñ—221 REGISTERED NO. D.—221 सी.जी.-डी.xएxलx.G-अI.D-2H70xx32x024-253386 CG-DxxLx-EG-I2D70E32x0x2x4-253386 vlk/kkj.k EXTRAORDINARY Hkkx 2 — vuqHkkx 1d PART II—Section 1A izkf/kdkj ls izdkf'kr PUBLISHED BY AUTHORITY lañ 2] ubZ fnYyh] lkseokj] 18 ekpZ] 2024@28 QkYxqu] 1945&46 ¼'kd½ [ [kMa LX No. 2 NEW DELHI, MONDAY, MARCH 18, 2024/PHALGUNA 28, 1945-46 (SAKA) VOL. LX bl Hkkx esa fHkUu i`"B la[;k nh tkrh gS ftlls fd ;g vyx ladyu ds :i esa j[kk tk ldsA Separate paging is given to this Part in order that it may be filed as a separate compilation. fof/k vkSj U;k; ea=ky; ¼fo/kk;h foHkkx½ ubZ fnYyh] 18 ekpZ] 2024@28 QkYxqu] 1945&46 ¼'kd½ fn Hkkjrh; U;k; lafgrk] 2023( ¼2½ fn Hkkjrh; ukxfjd lqj{kk lafgrk] 2023 vkSj ¼3½ fn Hkkjrh; lk{; vf/kfu;e] 2023 ds fuEufyf[kr fgUnh vuqokn jk"Vªifr ds izkf/kdkj ls izdkf'kr fd, tkrs g® vkSj ;s jktHkk"kk vf/kfu;e] 1963 ¼1963 dk 19½ dh /kkjk 5 dh mi/kkjk ¼1½ ds [kaM ¼d½ ds v/khu muds fgUnh esa izkf/kd`r ikB le> s tk,axs%— MINISTRY OF LAW AND JUSTICE (Legislative Department) New Delhi, March 18, 2024/Phalguna 28, 1945-46 (Saka) The translation in Hindi of the following, namely:—The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023; (2) The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 and (3) The Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023 are hereby published under the authority of the President and shall be deemed to be the authoritative texts thereof in Hindi under clause (a) of sub-section (1) of section 5 of the Official Languages Act, 1963 (19 of 1963):—8 [ — i`"B Hkkjrh; U;k; lafgrk] 2023 ¼2023 dk vf/kfu;e la[;kad 45½ - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 09 The Bharatiya Nyaya Sanhita, 2023 Hkkjrh; ukxfjd lqj{kk lafgrk] 2023 ¼2023 dk vf/kfu;e la[;kad 46½ - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 155 The Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 Hkkjrh; lk{; vf/kfu;e] 2023 ¼2023 dk vf/kfu;e la[;kad 47½ - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - - 475 The Bharatiya Sakshya Adhiniyam, 2023अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 9 भारतीय न्याय संहिता, 2023 (2023 का अधिनियम संखयांक 45) [25 हिसम्बर, 2023] अपरािों से संबंधित उपबंिों का समेकि और संशोिि करिे तथा उससे संबद्ि या उसके आिुषंधिक विषयों के लिए अधिनियम भारत गणराज्य के चौहत्तरवें वर् ष में संसद् द्वारा ननम्नलिखित रूप में यह अधधननयलमत हो :— अध्याय 1 प्रारंलभक 1. (1) इस अधधननयम का संक्षिप्त नाम भारतीय न्याय संहहता, 2023 है । संक्षिप्त नाम, प्रारम्भ और (2) यह उस तारीि को प्रवत्तृ होगा, जो केन्रीय सरकार, राजपत्र में अधधसूचना द्वारा, िागू होना । ननयत करे और इस संहहता के लभन्न-लभन्न उपबंधों के लिए लभन्न-लभन्न तारीिें ननयत की जा सकेंगी । (3) प्रत्येक व्यक्‍ त इस संहहता के उपबन्धों के प्रनतकूि प्रत्येक काय ष या िोप के लिए,10 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— क्जसका वह भारत के भीतर दोर्ी होगा, इसी संहहता के अधीन दण्डनीय होगा, अन्यथा नहीं। (4) भारत स े परे ककए गए ककसी अपराध के लिए जो कोई व्यक्‍ त भारत में तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा ववचारण के लिए दायी है, भारत से परे ककए गए ककसी काय ष के लिए उस े इस संहहता के उपबन्धों के अनुसार ऐसा बरता जाएगा, मानो वह काय ष भारत के भीतर ककया गया था । (5) इस संहहता के उपबंध— (क) भारत से बाहर और परे ककसी स्थान में भारत के ककसी नागररक द्वारा ; (ि) भारत में रक्जस्रीकृत ककसी पोत या वायुयान पर, चाहे वह कहीं भी हो ककसी व्यक्‍ त द्वारा, (ग) भारत में अवक्स् थत ककसी कंप् यूटर संसाधन को िक्ष् य बनाकर भारत से बाहर और परे ककसी स् थान पर ककसी व् यक्‍ त द्वारा, ककए गए ककसी अपराध को भी िागू हैं । स्पष्टीकरण—इस धारा में “अपराध” शब्द के अन्तगतष भारत से बाहर ककया गया ऐसा प्रत्येक काय ष आता है, जो यहद भारत में ककया गया होता तो इस संहहता के अधीन दंडनीय होता । दृष्टांत क, जो भारत का नागररक है, भारत से बाहर और परे ककसी स्थान पर हत्या करता है, वह भारत के ककसी स्थान में, जहां वह पाया जाए, हत्या के लिए ववचाररत और दोर्लसद्ध ककया जा सकता है । (6) इस संहहता में की कोई बात, भारत सरकार की सवे ा के अधधकाररयों, सैननकों, नौसैननकों या वायुसैननकों द्वारा ववरोह और अलभत्यजन के लिए दक्ण्डत करने वािे ककसी अधधननयम के उपबन्धों, या ककसी ववशेर् या स्थानीय ववधध के उपबन्धों पर प्रभाव नहीं डािेगी । पररभार्ाएं । 2. इस संहहता में, जब तक कक संदभ ष से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (1) “काय”ष कायों की आवली का उसी प्रकार द्योतक है, क्जस प्रकार एक काय ष का ; (2) “जीवजंतु” से मानव से लभन्न कोई जीववत प्राणी अलभप्रेत है ; (3) “शििु” से अठारह वर् ष से कम आयु का कोई व्यक्‍त अलभप्रेत है ; (4) “कूटकरण”—कोई व्यक्‍त, जो एक चीज को दसू री चीज के सदृश इस आशय से करता है कक वह उस सदृश से प्रवंचना करे, या यह संभाव्य जानते हुए करता है कक उसके द्वारा प्रवंचना की जाएगी, वह “कूटकरण” करता है, यह कहा जाता है ; स्पष् टीकरण 1—कूटकरण के लिए यह आवश्यक नहीं है कक नकि ठीक वैसी ही हो । स्पष् टीकरण 2—जब कोई व्यक्‍ त एक चीज को दसू री चीज के सदृश कर दे और सादृश्य ऐसा है कक उसके द्वारा ककसी व्यक्‍ त को प्रवंचना हो सकती है, तो जब तक कक प्रनतकूि साबबत न ककया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कक जो व्यक्‍ त एक चीज को दसू री चीज के इस प्रकार सदृश बनाता है उसका आशय उस सदृश द्वारा प्रवंचना करने का था याअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 11 वह यह सम्भाव्य जानता था कक उसके द्वारा प्रवंचना की जाएगी ; (5) “न्यायािय” से वह न्यायाधीश, क्जसे न्यानयकत: कायष करने के लिए ववधध द्वारा अकेिे ही सश‍ त ककया गया है, या कोई न्यायाधीश-ननकाय, क्जसे एक ननकाय के रूप में न्यानयकत: काय ष करने के लिए ववधध द्वारा सश‍ त ककया गया है, जबकक ऐसा न्यायाधीश या न्यायाधीश-ननकाय न्यानयकत: काय ष कर रहा है, अलभप्रेत है; (6) “मत्ृ यु” से जब तक कक संदभ ष स े प्रनतकूि प्रतीत न हो, मानव की मत्ृ यु अलभप्रेत है; (7) “बेईमानी” से इस आशय से कोई काय ष करना अलभप्रेत है जो एक व्यक्‍ त को सदोर् अलभिाभ काररत करे या अन्य व्यक्‍ त को सदोर् हानन काररत करे ; (8) “दस्तावेज” से कोई ऐसा ववर्य अलभप्रेत है, क्जसको ककसी पदाथ ष पर अिरों, अंकों या धचह्नों के साधनों द्वारा, या उनसे एक स े अधधक साधनों द्वारा अलभव्य‍ त या वखणतष ककया गया है, और इसके अंतगतष ऐसे इिै‍रॉननक और डडक्जटि अलभिेि भी हैं, जो उस ववर्य के साक्ष्य के रूप में उपयोग ककए जाने के लिए आशनयत हैं या क्जनका उपयोग ककया जा सकेगा ; स्पष् टीकरण 1—यह तत्वहीन है कक ककस साधन द्वारा या ककस पदाथ ष पर अिर, अंक या धचह्न बनाए गए हैं, या यह कक साक्ष्य ककसी न्यायािय के लिए आशनयत है या नहीं, या उसमें उपयोग ककया जा सकेगा या नहीं । दृष् टांत (क) ककसी संववदा के ननबंधनों को अलभव्य‍ त करने वािा कोई िेि, क्जसे उस संववदा के साक्ष्य के रूप में उपयोग ककया जा सकेगा, दस्तावेज है । (ि) बकैं कार पर हदया गया चेक, दस्तावेज है । (ग) मुख्तारनामा, दस्तावेज है । (घ) मानधचत्र या रेिांक, क्जसको साक्ष्य के रूप में उपयोग में िाने का आशय हो या जो उपयोग में िाया जा सकेगा, दस्तावेज है; (ङ) क्जस िेि में ननदेश या अनुदेश अन्तववष्ष ट हों, दस्तावेज है । स्पष् टीकरण 2—अिरों, अंकों या धचह्नों के द्वारा, जो कुछ भी वाखणक्ज्यक या अन्य प्रथा के अनुसार व्याख्या करने पर अलभव्य‍ त होता है, वह इस धारा के अथ ष के अन्तगतष ऐसे अिरों, अंकों या धचह्नों से अलभव्य‍ त हुआ समझा जाएगा, चाहे वह वास्तव में अलभव्य‍ त न भी ककया गया हो । दृष् टांत क एक ववननमयपत्र की पीठ पर, अपना नाम लिि देता है, जो उसके आदेश के अनुसार देय है । वाखणक्ज्यक प्रथा के अनुसार व्याख्या करने पर इस पष्ृ ठांकन का अथ ष यह है कक धारक को ववननमयपत्र का भुगतान कर हदया जाए । पष्ृ ठांकन एक दस्तावेज है और इसका अथष उसी प्रकार से िगाया जाएगा मानो हस्तािर के ऊपर “धारक को भुगतान करें” शब्द या उस प्रभाव वािे शब्द लिि हदए गए हों । (9) “कपटपूवकष ” से कपट करने के आशय से कोई काय ष करना अलभप्रेत है, अन्यथा नहीं ।12 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (10) “लिगं ”—पुक्् िंग वाचक शब्द “वह” और उसके व्युत्पन्नों का प्रयोग ककसी भी व्यक्‍त के लिए ककया जाता है, चाहे वह पुरूर् या महहिा या उभयलिगं ी हो । स्पष्टीकरण—“उभयलिगं ी” का वही अथ ष होगा, जो उभयलिगं ी व्यक्‍त (अधधकारों का संरिण) अधधननयम, 2019 की धारा 2 के िंड (ट) में है; 2019 का 40 (11) “सद्भ ावपूवकष ”—कोई बात “सद् भावपूवकष ” की गई या ववश् वास की गई नहीं कही जाती है, जो सम्यक् सतकषता और ध्यान के बबना की गई है या ववश् वास की गई है ; (12) “सरकार” से केन्रीय सरकार या कोई राज्य सरकार अलभप्रेत है; (13) “संश्रय” के अन्तगतष ककसी व्यक्‍ त को आश्रय, भोजन, पेय, धन, वस् त्र, आयुध, गोिा-बारूद या वाहन के साधन देना, या ककन्हीं साधनों से चाहे वे उसी प्रकार के हों या नहीं, क्जस प्रकार से इस िंड में प्रगखणत हैं, पकडे जाने से बचने के लिए ककसी व्यक्‍ त की सहायता करना, सक्म्मलित है ; (14) “िनत” से कोई अपहानन अलभप्रेत है, जो ककसी व्यक्‍ त के शरीर, मन, ख्यानत या सम्पवत्त को अवैध रूप से काररत हुई है ; (15) “अवैध” और “करने के लिए वैध रूप से आबद्ध”—“अवैध” शब्द प्रत्येक उस बात को िागू है, जो अपराध है, या जो ववधध द्वारा प्रनतवर्द्ध है, या जो लसववि कायवष ाही के लिए आधार उत्पन्न करती है ; और कोई व्यक्‍ त उस बात को “करने के लिए वैध रूप से आबद्ध” कहा जाता है क्जसका िोप करना उसके लिए अवैध है ; (16) “न्यायाधीश” स े ऐसा व्यक्‍ त अलभप्रेत है, जो शासकीय रूप स े न्यायाधीश के रूप में अलभहहत ककया गया है, इसके अंतगतष ऐसा कोई व्यक्‍त भी आता है,— (i) जो ककसी ववधधक कायवष ाही में, चाहे वह लसववि हो या दाक्ण्डक, अक्न्तम ननणषय या ऐसा ननणषय, जो उसके ववरुद्ध अपीि न होने पर अक्न्तम हो जाए या ऐसा ननणयष , जो ककसी अन्य प्राधधकारी द्वारा पुष् ट ककए जाने पर अक्न्तम हो जाए, देने के लिए, ववधध द्वारा सश‍ त ककया गया हो ; या (ii) जो उस ननकाय या व्यक्‍तयों में से एक हो, क्जस व्यक्‍ त-ननकाय को ऐसा ननणयष देने के लिए ववधध द्वारा सश‍ त ककया गया है । दृष् टांत ककसी आरोप के संबंध में अधधकाररता का प्रयोग करने वािा कोई मक्जस्रेट, क्जसके लिए उस े जुमाषना या कारावास का दण्ड देने की शक्‍ त प्राप्त है, चाहे उसकी अपीि होती हो या न होती हो, न्यायाधीश है ; (17) “जीवन” से जब तक संदभ ष से प्रनतकूि प्रतीत न हो, ककसी मानव का जीवन अलभप्रेत है ; (18) “स्थानीय ववधध” से ऐसी ववधध अलभप्रेत है जो भारत के ककसी ववलशष्ट भाग को ही िागू है ; (19) “पुरुर्” से ककसी भी आयु का मानव नर अलभप्रेत है ; (20) “मास” और “वर्”ष — जहां-कहीं “मास” शब्द या “वर्”ष शब्द का प्रयोग ककया गया है, वहां यह समझा जाना है कक मास या वर् ष की गणना धिगोररयन किडैं र केअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 13 अनुसार की जानी है ; (21) “चि सम्पवत्त” के अंतगतष भूलम और वे चीजें, जो भूबद्ध हैं या भूबद्ध ककसी चीज से स्थायी रूप से जकडी हुई हैं, के लसवाय, प्रत्येक प्रकार की सम्पवत्त आती है ; (22) “वचन”—जब तक कक संदभ ष से प्रनतकूि प्रतीत न हो, एकवचन के घोतक शब्दों के अंतगतष बहुवचन भी है, और बहुवचन के घोतक शब्दों के अंतगतष एकवचन भी है ; (23) “शपथ” के अंतगतष ककसी शपथ के लिए ववधध द्वारा प्रनतस्थावपत सत्यननष् ठ प्रनतज्ञान और ऐसी कोई घोर्णा, क्जसका ककसी िोक सेवक के समि ककया जाना या न्यायािय में या अन्यथा सबूत के प्रयोजन के लिए उपयोग ककया जाना ववधध द्वारा अपेक्षित या प्राधधकृत है, आती है ; (24) “अपराध”—उपिंड (क) और उपिंड (ि) में उक््िखित अध्यायों और धाराओं के लसवाय, “अपराध” शब्द स े इस संहहता द्वारा दण्डनीय की गई कोई बात अलभप्रेत है, ककंतु— (क) अध्याय 3 और ननम् नलिखित धाराओं, अथाषत ् धारा 8 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5), धारा 9, धारा 49, धारा 50, धारा 52, धारा 54, धारा 55, धारा 56, धारा 57, धारा 58, धारा 59, धारा 60, धारा 61, धारा 119, धारा 120, धारा 123, धारा 127 की उपधारा (7) और उपधारा (8), धारा 222, धारा 230, धारा 231, धारा 240, धारा 248, धारा 250, धारा 251, धारा 259, धारा 260, धारा 261, धारा 262, धारा 263, धारा 308 की उपधारा (6) और उपधारा (7) तथा धारा 330 की उपधारा (2) में “अपराध” शब्द से इस संहहता के अधीन, या ककसी ववशेर् ववधध या स्थानीय ववधध के अधीन दण्डनीय कोई बात अलभप्रेत है ; और (ि) धारा 189 की उपधारा (1), धारा 211, धारा 212, धारा 238, धारा 239, धारा 249, धारा 253 और धारा 329 की उपधारा (1) में “अपराध” शब्द का वही अथ ष होगा, जो ववशेर् ववधध या स्थानीय ववधध के अधीन दण्डनीय काय,ष ऐसी ववधध के अधीन छह मास या उससे अधधक अवधध के कारावास से, चाहे वह जुमाषने सहहत हो या रहहत, दण्डनीय है ; (25) “िोप” िोपों की ककसी आविी का उसी प्रकार द्योतक है, क्जस प्रकार एकि िोप का ; (26) “व्यक्‍ त” के अन्तगतष कोई भी कंपनी या संगम या व्यक्‍ त ननकाय, चाहे वह ननगलमत हो या नहीं, आता है ; (27) “िोक” के अन्तगतष कोई भी वग ष या कोई भी समुदाय आता है ; (28) “िोक सेवक” से ऐसा कोई व्यक्‍ त अलभप्रेत हैं, जो ननम्नलिखित वणनष ों में से ककसी के अधीन आता है, अथाषत ् :— (क) सेना, नौसेना या वायु सने ा का प्रत्येक आयु‍ त अधधकारी; (ि) प्रत्येक न्यायाधीश, क्जसके अन्तगतष ऐसा कोई भी व्यक्‍ त आता है जो ककन्हीं न्यायननणाषयक कृत्यों का, चाहे स्वयं या व्यक्‍ तयों के ककसी ननकाय के14 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सदस्य के रूप में ननवहष न करने के लिए ववधध द्वारा सश‍त ककया गया है ; (ग) न्यायािय का प्रत्येक अधधकारी, क्जसके अन्तगतष समापक, ररसीवर या कलमश् नर आता है, क्जसका ऐसे अधधकारी के नाते यह कतव्ष य है कक वह ववधध या तथ्य के ककसी मामिे में अन्वेर्ण या ररपोटष करे, या कोई दस्तावेज बनाए, अधधप्रमाणीकृत करे, या रिे, या ककसी सम्पवत्त का भार सम्भािे या उस सम्पवत्त का व्ययन करे, या ककसी न्यानयक आदेलशका का ननष्पादन करे, या कोई शपथ िहण कराए या ननवचष न करे, या न्यायािय में व्यवस्था बनाए रिे और प्रत्येक व्यक्‍ त, क्जसे ऐसे कतव्ष यों में से ककन्हीं का पािन करने के लिए न्यायािय द्वारा ववशेर् रूप से प्राधधकृत ककया गया है ; (घ) ककसी न्यायािय या िोक सेवक की सहायता करने वािा प्रत्येक असेसर या पंचायत का सदस्य ; (ङ) प्रत्येक मध्यस्थ या अन्य व्यक्‍ त, क्जसको ककसी न्यायािय द्वारा या ककसी अन्य सिम िोक प्राधधकारी द्वारा कोई मामिा या ववर्य, ववननश् चय या ररपोटष के लिए ननहदषष्ट ककया गया है ; (च) प्रत्येक व्यक्‍ त जो ककसी ऐसे पद को धारण करता है, क्जसके आधार पर वह ककसी व्यक्‍ त को परररोध में करने या रिने के लिए सश‍ त है ; (छ) सरकार का प्रत्येक अधधकारी, क्जसका ऐसे अधधकारी के नाते यह कतव्ष य है कक वह अपराधों का ननवारण करे, अपराधों की सूचना दे, अपराधधयों को न्याय के लिए उपक्स्थत करे, या िोक स्वास्थ्य, सुरिा या सुववधा का संरिण करे ; (ज) प्रत्येक अधधकारी, क्जसका ऐसे अधधकारी के नाते यह कतव्ष य है कक वह सरकार की ओर स े ककसी सम्पवत्त को िहण करे, प्राप् त करे, रिे या व्यय करे, या सरकार की ओर स े कोई सवेिण, ननधाषरण या संववदा करे, या ककसी राजस्व आदेलशका का ननष्पादन करे, या सरकार के धन-संबंधी हहतों पर प्रभाव डािने वािे ककसी मामि े में अन्वेर्ण या ररपोटष करे या सरकार के धन-संबंधी हहतों से संबंधधत ककसी दस्तावेज को बनाए, अधधप्रमाणीकृत करे या रिे, या सरकार के धन-संबंधी हहतों के संरिण के लिए ककसी ववधध के व्यनतक्रम को रोके ; (झ) प्रत्येक अधधकारी, क्जसका ऐस े अधधकारी के नाते यह कतव्ष य है कक वह ककसी िाम, नगर या क्जिे के ककसी पंथ ननरपेि सामान्य प्रयोजन के लिए ककसी सम्पवत्त को िहण करे, प्राप् त करे, रिे या व्यय करे, कोई सवेिण या ननधाषरण करे, या कोई रेट या कर उद्गहृ ीत करे, या ककसी िाम, नगर या क्जि े के िोगों के अधधकारों का अलभननश् चयन करने के लिए कोई दस्तावेज बनाए, अधधप्रमाखणत करे या रिे ; (ञ) प्रत्येक व्यक्‍ त, जो कोई ऐसा पद धारण करता है क्जसके आधार पर वह ननवाषचक नामाविी तैयार करने, प्रकालशत करने, बनाए रिने, या पुनरीक्षित करने के लिए या ननवाषचन या ननवाषचन के ककसी भाग को संचालित करने के लिए सश‍ त है ;अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 15 (ट) प्रत्येक व्यक्‍ त, जो— (i) सरकार की सेवा या वेतन में है या ककसी िोक कतव्ष य के पािन के लिए सरकार से फीस या कमीशन के रूप में पाररश्रलमक पाता है ; 1897 का 10 (ii) साधारण िंड अधधननयम, 1897 की धारा 3 के िंड (31) में यथा पररभावर्त ककसी स्थानीय प्राधधकारी की, ककसी केन्रीय या राज्य अधधननयम के द्वारा या उसके अधीन स्थावपत ककसी ननगम की या 2013 का 18 कम्पनी अधधननयम, 2013 की धारा 2 के िंड (45) में यथा पररभावर्त ककसी सरकारी कम्पनी की सवे ा या वेतन में है । स्पष् टीकरण— (क) इस िंड में ककए गए वणनष ों में से ककसी के अधीन आने वािे व्यक्‍ त िोक सेवक हैं, चाहे वे सरकार द्वारा ननयु‍ त ककए गए हों या नहीं ; (ि) प्रत्येक ऐसा व्यक्‍ त, जो िोक सेवक के ओहदे को वास्तव में धारण ककया हुआ है, चाहे उस ओहदे को धारण करने के उसके अधधकार में कैसी ही ववधधक त्रुहट हो, िोक सेवक है ; (ग) “ननवाषचन” से ककसी ववधायी, नगरपालिका या अन्य िोक प्राधधकारी के सदस्यों का चयन करने के प्रयोजन से कोई ननवाषचन अलभप्रेत है, चाहे वह कैसे ही स्वरूप का हो, क्जसके लिए चयन करने की पद्धनत तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा या उसके अधीन है । दृष् टांत नगरपालिका आयु‍ त, िोक सेवक है ; (29) “ववश् वास करने का कारण” —कोई व्यक्‍ त ककसी बात का “ववश् वास करने का कारण” रिता है, यह तब कहा जाता है जब वह उस बात के ववश् वास करने का पयाषप् त कारण रिता है, अन्यथा नहीं ; (30) “ववशेर् ववधध” से वह ववधध अलभप्रेत है, जो ककसी ववलशष् ट ववर्य को िाग ू है ; (31) “मू्यवान प्रनतभूनत” स े ऐसा कोई दस्तावेज अलभप्रेत है, जो ऐसा दस्तावेज है, या होना तात्पनयतष है, क्जसके द्वारा कोई ववधधक अधधकार सक्ृजत, ववस्ततृ , अन्तररत, ननबक्षन्धत, ननवाषवपत ककया जाए या छोडा जाए या क्जसके द्वारा कोई व्यक्‍ त यह अलभस्वीकृत करता है कक वह ववधधक दानयत्व के अधीन है, या अमुक ववधधक अधधकार नहीं रिता है । दृष् टांत क एक ववननमयपत्र की पीठ पर अपना नाम लिि देता है । इस पष्ृ ठांकन का प्रभाव ककसी व्यक्‍ त को, जो उसका ववधधपूण ष धारक हो जाए, उस ववननमयपत्र पर का अधधकार अन्तररत ककया जाना है, इसलिए यह पष्ृ ठांकन “मू्यवान प्रनतभूनत” है ; (32) “जियान” से कोई चीज अलभप्रेत है, जो मानव के या सम्पवत्त के जि द्वारा प्रवहण के लिए बनाई गई है ; (33) “स्वेच्छया” —कोई व्यक्‍ त ककसी पररणाम को “स्वेच्छया” काररत करता है,16 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— यह तब कहा जाता है, जब वह उसे उन साधनों द्वारा काररत करता है, क्जनके द्वारा उसे काररत करना उसका आशय था या उन साधनों द्वारा काररत करता है क्जन साधनों को काम में िाते समय यह जानता था, या यह ववश् वास करने का कारण रिता था कक उनसे उसका काररत होना संभाव्य है ; दृष् टांत क िूट को सुकर बनाने के प्रयोजन से एक बडे नगर के एक बसे हुए घर में रात को आग िगाता है और इस प्रकार एक व्यक्‍ त की मत्ृ यु काररत कर देता है । यहां क का आशय भिे ही मत्ृ यु काररत करने का न रहा हो और वह दखुित भी हो कक उसके काय ष से मत्ृ यु काररत हुई है तो भी यहद वह यह जानता था कक संभाव्य है कक वह मत्ृ यु काररत कर दे तो उसने स्वेच्छया मत्ृ यु काररत की है ; (34) “वसीयत” से कोई वसीयती दस्तावेज अलभप्रेत है ; (35) “महहिा” से ककसी भी आयु की मानव नारी अलभप्रेत है ; (36) “सदोर् अलभिाभ” से ववधधववरुद्ध साधनों द्वारा ऐसी सम्पवत्त का अलभिाभ अलभप्रेत है, क्जसका अलभिाभ प्राप् त करने वािा व्यक्‍ त वैध रूप से हकदार न हो ; (37) “सदोर् हानन” से ववधधववरुद्ध साधनों द्वारा ऐसी सम्पवत्त की हानन अलभप्रेत है, क्जसकी हानन उठाने वािा व्यक्‍ त वैध रूप से हकदार हो ; (38) “सदोर् अलभिाभ प्राप् त करना” और “सदोर् हानन उठाना”— कोई व्यक्‍ त सदोर् अलभिाभ प्राप् त करता है, यह तब कहा जाता है जब वह व्यक्‍ त सदोर् रिे रिता है और तब भी जब वह सदोर् अजनष करता है । कोई व्यक्‍ त सदोर् हानन उठाता है, यह तब कहा जाता है, जब उसे ककसी सम्पवत्त से सदोर् अिग रिा जाता है और तब भी जब उसे ककसी सम्पवत्त से सदोर् वंधचत ककया जाता है ; और (39) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयु‍त हैं और इस संहहता में पररभावर्त नहीं हैं, ककन्तु सूचना प्रौद्योधगकी अधधननयम, 2000 और भारतीय नागररक सुरिा 2000 का 21 संहहता, 2023 में पररभावर्त हैं, वहीं अथ ष होंगे, जो क्रमशः उस अधधननयम और संहहता 2023 का 46 में उनके हैं । साधारण 3. (1) इस संहहता में सवत्रष , अपराध की प्रत्येक पररभार्ा, प्रत्येक दाडं डक उपबंध और स्पष्टीकरण । प्रत्येक ऐसी पररभार्ा या दांडडक उपबंध का प्रत्येक दृष् टांत, “साधारण अपवाद” शीर्कष वाि े अध्याय में अन्तववष्ष ट अपवादों के अध्यधीन समझा जाएगा, चाहे उन अपवादों को ऐसी पररभार्ा, दांडडक उपबंध या दृष् टांत में दहु राया न गया हो । दृष् टांत (क) इस संहहता की वे धाराएं, क्जनमें अपराधों की पररभार्ाएं अन्तववष्ष ट हैं, यह अलभव्य‍ त नहीं करती कक सात वर् ष से कम आयु का लशशु ऐसे अपराध नहीं कर सकता, ककन्तु पररभार्ाएं उस साधारण अपवाद के अध्यधीन समझी जानी हैं क्जसमें यह उपबक्न्धत है कक कोई बात, जो सात वर् ष से कम आयु के लशशु द्वारा की जाती है, अपराध नहीं है । (ि) क, एक पुलिस अधधकारी, वारण्ट के बबना, य को, क्जसने हत्या की है, धगरफ्तार कर िेता है । यहााँ क सदोर् परररोध के अपराध का दोर्ी नहीं है, ‍योंकक वह य को धगरफ्तार करने के लिए ववधध द्वारा आबद्ध था, और इसलिए यह मामिा उस साधारणअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 17 अपवाद के अन्तगतष आ जाता है, क्जसमें यह उपबक्न्धत है कक “कोई बात अपराध नहीं है जो ककसी ऐसे व्यक्‍ त द्वारा की जाए जो उस े करने के लिए ववधध द्वारा आबद्ध हो”। (2) प्रत्येक पद, क्जसे इस संहहता के ककसी भाग में स्पष्ट ककया गया है, इस संहहता के प्रत्येक भाग में उस स्पष् टीकरण के अनुरूप ही प्रयोग ककया गया है । (3) जब कोई सम्पवत्त, ककसी व्यक्‍ त के कारण उस व्यक्‍ त के पनत या पत् नी, लिवपक या सेवक के कब्जे में है, तब वह इस संहहता के अथ ष के अन्तगषत उस व्यक्‍ त के कब्जे में है । स्पष् टीकरण—लिवपक या सेवक की हैलसयत से अस्थायी रूप स े या ककसी ववलशष् ट अवसर पर ननयोक्जत कोई व्यक्‍ त इस उपधारा के अथ ष के अन्तगषत लिवपक या सेवक है । (4) जब तक कक संदभ ष से प्रनतकूि आशय प्रतीत न हो, इस संहहता के प्रत्येक भाग में ककए गए कायों का ननदेश करने वािे शब्दों का ववस्तार अवधै िोपों पर भी है । (5) जब कोई आपराधधक काय ष कई व्यक्‍ तयों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अिसर करने में ककया जाता है, तब ऐसे व्यक्‍ तयों में से प्रत्येक व्यक्‍ त उस काय ष के लिए उसी प्रकार दानयत्व के अधीन है, मानो वह काय ष अकेिे उसी ने ककया हो । (6) जब कभी कोई काय,ष जो आपराधधक ज्ञान या आशय से ककए जाने के कारण ही आपराधधक है, कई व्यक्‍ तयों द्वारा ककया जाता है, तब ऐस े व्यक्‍ तयों में से प्रत्येक व्यक्‍ त, जो ऐस े ज्ञान या आशय स े उस काय ष में सक्म्मलित होता है, उस काय ष के लिए उसी प्रकार दानयत्व के अधीन है, मानो वह काय ष उस ज्ञान या आशय से अकेिे उसी द्वारा ककया गया हो । (7) जहां कहीं ककसी काय ष द्वारा या ककसी िोप द्वारा ककसी पररणाम का काररत ककया जाना या उस पररणाम को काररत करने का प्रयत् न करना अपराध है, वहां यह समझा जाता है कक उस पररणाम का अंशत: काय ष द्वारा और अंशत: िोप द्वारा काररत ककया जाना वही अपराध है । दृष् टांत क अंशत: य को भोजन देने का अवैध रूप से िोप करके और अंशत: य को पीटकर साशय य की मत्ृ यु काररत करता है । क ने हत्या की है । (8) जब कोई अपराध कई कायों द्वारा ककया जाता है, तब जो कोई या तो अकेिे या ककसी अन्य व्यक्‍ त के साथ सक्म्मलित होकर उन कायों में से कोई एक काय ष करके उस अपराध के ककए जाने में साशय सहयोग करता है, वह उस अपराध को करता है । दृष् टांत (क) क और ख पथृ क्-पथृ क् रूप से और ववलभन् न समयों पर य को ववर् की छोटी- छोटी मात्राएं देकर उसकी हत्या करने को सहमत होते हैं । क और ख, य की हत्या करने के आशय से सहमनत के अनुसार ववर् देते हैं । य इस प्रकार दी गई ववर् की कई मात्राओं के प्रभाव स े मर जाता है । यहां क और ख हत्या करने में साशय सहयोग करते हैं और उनमें से प्रत्येक ऐसा काय ष करता है, क्जससे मत्ृ यु काररत होती है, वे दोनों इस अपराध के दोर्ी हैं, यद्यवप उनके काय ष पथृ क् हैं ।18 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) क और ख संयु‍ त जेिर हैं और अपनी उस हैलसयत में व े एक कैदी य का बारी- बारी स े एक समय में छह घंटे के लिए संरिण-भार रिते हैं । क और ख, य की मत्ृ यु काररत करने के आशय से, य को उस प्रयोजन स े भोजन देने का अवैध रूप स े िोप करते हुए इस आशय स े कक य की मत्ृ यु काररत कर दी जाए, प्रत्येक अपने हाक्जरी काि के दौरान य को भोजन देने का िोप करके वह पररणाम अवैध रूप से काररत करने में जानबूझकर सहयोग करते हैं । य भूि से मर जाता है । क और ख दोनों य की हत्या के दोर्ी हैं । (ग) एक जेिर क, एक कैदी य का संरिण-भार रिता है । क, य की मत्ृ यु काररत करने के आशय से, य को भोजन देने का अवैध रूप से िोप करता है, क्जसके पररणामस्वरूप य की शक्‍ त बहुत िीण हो जाती है, ककन्तु यह भुिमरी उसकी मत्ृ यु काररत करने के लिए पयाषप् त नहीं होती है । क को पदच्युत कर हदया जाता है और ख उसका उत्तरवती होता है । क से दस्ु संधध या सहयोग ककए बबना ख यह जानते हुए कक ऐसा करने से सभं ाव्य है कक वह य की मत्ृ यु काररत कर दे, य को भोजन देने का अवैध रूप से िोप करता है । य भूि स े मर जाता है । ख हत्या का दोर्ी है ककन्तु क ने ख को सहयोग नहीं ककया । इसलिए क केवि हत्या के प्रयत् न का ही दोर्ी है । (9) जहां कई व्यक्‍ त ककसी आपराधधक काय ष को करने में िग े हुए हैं या सम्बद्ध हैं, वहां वे उस काय ष के आधार पर ववलभन्न अपराधों के दोर्ी हो सकेंगे । दृष् टांत क गम्भीर प्रकोपन की ऐसी पररक्स्थनतयों के अधीन य पर आक्रमण करता है कक य का उसके द्वारा वध ककया जाना केवि ऐसा आपराधधक मानव वध है, जो हत्या की कोहट में नहीं आता है । ख जो य से वैमनस्य रिता है, उसका वध करने के आशय स े और प्रकोपन के अधीन न होते हुए य का वध करने में क की सहायता करता है । यहां, यद्यवप क और ख दोनों य की मत्ृ यु काररत करने में िग े हुए हैं, ख हत्या का दोर्ी है और क केवि आपराधधक मानव वध का दोर्ी है । अध्याय 2 िण्डों के विषय में दण्ड । 4. अपराधी, इस संहहता के उपबंधों के अधीन क्जन दण्डों से दायी हैं, वे हैं— (क) मत्ृ यु ; (ि) आजीवन कारावास ; (ग) कारावास, जो दो प्रकार का है, अथाषत ् :— (1) कहठन, अथाषत ् कठोर श्रम के साथ ; (2) सादा ; (घ) सम्पवत्त की जब्ती ; (ङ) जुमाषना ; (च) सामुदानयक सेवा । दण्डादेश का 5. समुधचत सरकार, अपराधी की सम्मनत के बबना, इस संहहता के अधीन ककसी दंड िघुकरण । का, भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 की धारा 474 के अनुसार, ककसी अन्य दंड में 2023 का 46अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 19 िघुकरण कर सकेगी । स्पष् टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “समुधचत सरकार” पद से,— (क) उन मामिों में केन्रीय सरकार अलभप्रेत है, क्जनमें दंडादेश मत्ृ यु का दण्डादेश है, या ऐस े ववर्य से संबंधधत ककसी ववधध के ववरुद्ध अपराध के लिए है, क्जस पर संघ की कायपष ालिका शक्‍ त का ववस्तार है ; और (ि) उन मामिों में उस राज्य की सरकार अलभप्रेत है, क्जसके भीतर अपराधी दण्डाहदष् ट हुआ है, जहां दंडादेश (चाहे मत्ृ यु का हो या नहीं) ऐसे ववर्य से संबंधधत ककसी ववधध के ववरुद्ध अपराध के लिए है, क्जस पर राज्य की कायपष ालिका शक्‍ त का ववस्तार है । 6. दण्डावधधयों की लभन्न ों की गणना करने में, अन्यथा उपबंधधत के लसवाय, आजीवन दण्डावधधयों की कारावास को बीस वर् ष के कारावास के समतु्य धगना जाएगा । लभन् नें । 7. प्रत्येक ऐसे मामिे में, क्जसमें कोई अपराधी दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास स े दंडादेश (कारावास के दण्डनीय है, वह न्यायािय, जो ऐसे अपराधी को दण्डादेश देगा, सिम होगा कक दण्डादेश में कनतपय मामिों यह ननहदषष् ट करे कक ऐसा सम्पूण ष कारावास कहठन होगा, या यह कक ऐसा सम्पूण ष कारावास में) सम्पूण ष सादा होगा, या यह कक ऐसे कारावास का कुछ भाग कहठन और शेर् सादा होगा । कारावास या उसका कोई भाग कहठन या सादा हो सकेगा । 8. (1) जहां वह रालश अलभव्य‍ त नहीं की गई है कक ककतना जुमाषना हो सकेगा, वहा ं जुमाषने की रकम, जुमाषना, जुमाषने की रकम का क्जसके लिए अपराधी दायी है, वह असीलमत है, ककन्तु अत्यधधक नहीं आहद देने में होगी । व्यनतक्रम होने पर दानयत्व । (2) ककसी अपराध के प्रत्येक मामिे में,— (क) जो कारावास के साथ जमु ाषने से भी दण्डनीय है, क्जसमें अपराधी कारावास सहहत या रहहत, जुमाषने से दण्डाहदष् ट हुआ है ; (ि) जो कारावास या जुमाषने या केवि जुमाषने से दण्डनीय है, क्जसमें अपराधी जुमाषने से दण्डाहदष् ट हुआ है, वह न्यायािय, जो ऐस े अपराधी को दण्डाहदष् ट करेगा, सिम होगा कक दण्डादेश द्वारा यह ननदेश दे कक जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने की दशा में, अपराधी ककसी अमुक अवधध के लिए कारावास भोगेगा, जो कारावास उस अन्य कारावास के अनतरर‍ त होगा क्जसके लिए वह दण्डाहदष् ट हुआ है या क्जसके लिए वह ककसी दण्डादेश के िघुकरण के अधीन दायी हो सकेगा । (3) यहद अपराध कारावास के साथ जुमाषने से भी दण्डनीय है, तो वह अवधध, क्जसके लिए जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने की दशा में न्यायािय अपराधी को कारावालसत करने का ननदेश दे, कारावास की उस अवधध की एक चौथाई से अधधक नहीं होगी, जो उस अपराध के लिए अधधकतम ननयत है । (4) वह कारावास, क्जस े न्यायािय जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने के लिए या20 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सामुदानयक सेवा में व्यनतक्रम के लिए अधधरोवपत करे, ऐसा ककसी भांनत का हो सकेगा, क्जससे अपराधी को उस अपराध के लिए दण्डाहदष्ट ककया जा सकता था । (5) यहद अपराध जुमाषने से या सामदु ानयक सेवा से दण्डनीय है, तो वह कारावास, क्जस े न्यायािय जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने की दशा में या सामुदानयक सेवा में व्यनतक्रम होने की दशा में अधधरोवपत करे, सादा होगा और वह अवधध, क्जसके लिए जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने की दशा में या सामुदानयक सेवा में व्यनतक्रम होने की दशा में न्यायािय अपराधी को कारावालसत करने का ननदेश दे, ननम् नलिखित अवधध होगी,— (क) जब जुमाषने की रकम पाचं हजार रुपए से अधधक की न हो, तब दो मास स े अनधधक कोई अवधध ; (ि) जब जुमाषने की रकम दस हजार रुपए से अधधक की न हो, तब चार मास से अनधधक कोई अवधध ; और (ग) ककसी अन्य दशा में, एक वर् ष से अनधधक कोई अवधध । (6)(क) जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने की दशा में अधधरोवपत कारावास तब समाप्त हो जाएगा, जब वह जुमाषना या तो चुका हदया जाए या ववधध की प्रकक्रया द्वारा उद्गहृ ीत कर लिया जाए ; (ि) यहद जुमाषना देने में व्यनतक्रम होने की दशा में ननयत की गई कारावास की अवधध का अवसान होने से पूव ष जुमाषने का ऐसा अनुपात चुका हदया जाए या उद्गहृ ीत कर लिया जाए कक देने में व्यनतक्रम होने पर कारावास की अवधध जो भोगी जा चुकी है, वह जुमाषने के तब तक न चुकाए गए भाग के आनुपानतक से कम न हो तो कारावास समाप्त हो जाएगा । दृष् टांत क एक हजार रुपए के जुमाषन े और उसके देने में व्यनतक्रम होने की दशा में चार मास के कारावास से दण्डाहदष् ट ककया गया है । यहां, यहद कारावास के एक मास के अवसान स े पूव ष जुमाषने के सात सौ पचास रुपए चुका हदए जाएं या उद्गहृ ीत कर लिए जाएं तो प्रथम मास का अवसान होते ही क उन्मु‍ त कर हदया जाएगा । यहद सात सौ पचास रुपए प्रथम मास के अवसान पर या ककसी भी पश् चातव ् ती समय पर, जबकक क कारावास में है, चुका हदए जाएं या उद्गहृ ीत कर लिए जाएं, तो क तुरन्त उन्मु‍ त कर हदया जाएगा । यहद कारावास के दो मास के अवसान से पूव ष जुमाषने के पांच सौ रुपए चुका हदए जाएं या उद्गहृ ीत कर लिए जाएं, तो क दो मास के पूरे होते ही उन्मु‍ त कर हदया जाएगा । यहद पांच सौ रुपए उन दो मास के अवसान पर या ककसी भी पश् चात व् ती समय पर, जब कक क कारावास में है, चुका हदए जाएं या उद्गहृ ीत कर लिए जाएं, तो क तुरन्त उन्मु‍ त कर हदया जाएगा । (7) जुमाषना या उसका कोई भाग, जो चुकाया न गया हो, दण्डादेश हदए जाने के पश् चात ् छह वर् ष के भीतर ककसी भी समय, और यहद अपराधी दण्डादेश के अधीन छह वर् ष से अधधक के कारावास से दण्डनीय है तो उस कािावधध के अवसान से पूव ष ककसी भी समय, उद्गहृ ीत ककया जा सकेगा ; और अपराधी की मत्ृ यु होना, ककसी भी सम्पवत्त को इस दानयत्व से उन्मु‍ त नहीं करती, जो उसकी मत्ृ यु के पश् चात ् उसके ऋणों के लिए वैध रूप से दायी है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 21 9. (1) जहां कोई बात, जो अपराध है, ऐसे भागों से लमिकर बनी है, क्जनमें का कोई कई अपराधों स े लमिकर बन े भाग स्वयं अपराध है, वहां अपराधी अपने ऐसे अपराधों में से एक स े अधधक के दण्ड से तब अपराध के लिए तक दक्ण्डत नहीं ककया जाएगा, जब तक कक ऐसा अलभव्य‍ त रूप से उपबक्न्धत न हो । दण्ड की अवधध । (2) जहां— (क) कोई बात, अपराधों को पररभावर्त या दक्ण्डत करने वािी ककसी तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध की दो या अधधक पथृ क् पररभार्ाओं में आने वािा अपराध है; या (ि) कई काय,ष क्जनमें स े स्वयं एक से या स्वयं एकाधधक से अपराध गहठत होता है, लमिकर लभन्न अपराध गहठत करते हैं, वहां अपराधी को उससे गुरुतर दण्ड से दक्ण्डत नहीं ककया जाएगा, जो ऐसे अपराधों में से ककसी भी एक के लिए वह न्यायािय, जो उसका ववचारण करता है, उसे दे सकता है । दृष् टांत (क) क, य पर िाठी से पचास प्रहार करता है । यहां, यह हो सकता है कक क ने सम्पूण ष मारपीट द्वारा और उन प्रहारों में स े प्रत्येक प्रहार द्वारा भी, क्जनस े वह सम्पूणष मारपीट गहठत होता है, य की स्वेच्छया उपहनत काररत करने का अपराध ककया है । यहद क प्रत्येक प्रहार के लिए दण्डनीय होता तो वह प्रत्येक प्रहार के लिए एक वर् ष के हहसाब से पचास वर् ष के लिए कारावालसत ककया जा सकता था । ककन्तु वह सम्पूण ष मारपीट के लिए केवि एक ही दण्ड से दण्डनीय है । (ि) ककन्तु, यहद उस समय जब क, य को पीट रहा है, म हस्तिेप करता है और क, म पर साशय प्रहार करता है, तो यहां म पर ककया गया प्रहार उस काय ष का भाग नहीं है, क्जसके द्वारा क, य को स्वेच्छया उपहनत काररत करता है, इसलिए क, य को स्वेच्छया काररत की गई उपहनत के लिए एक दण्ड से और म पर ककए गए प्रहार के लिए दसू रे दण्ड से दण्डनीय है । 10. उन सब मामिों में, क्जनमें यह ननणयष हदया जाता है कक कोई व्यक्‍ त उस ननणषय कई अपराधों में से एक के दोर्ी में ववननहदषष् ट कई अपराधों में से एक अपराध का दोर्ी है, ककन्तु यह संदेहपूण ष है कक वह उन व्यक्‍ त के लिए अपराधों में स े ककस अपराध का दोर्ी है, यहद वही दण्ड सब अपराधों के लिए उपबक्न्धत दण्ड, जबकक नहीं है तो वह अपराधी उस अपराध के लिए दक्ण्डत ककया जाएगा, क्जसके लिए कम स े कम ननणयष में यह दण्ड उपबक्न्धत ककया गया है । कधथत है कक यह संदेह है कक वह ककस अपराध का दोर्ी है । 11. जब कभी कोई व्यक्‍ त, ऐसे अपराध के लिए दोर्लसद्ध ठहराया जाता है क्जसके एकांत परररोध । लिए इस संहहता के अधीन न्यायािय को उसे कहठन कारावास से दंडाहदष् ट करने की शक्‍ त है, तो न्यायािय अपने दंडादेश द्वारा आदेश दे सकेगा कक अपराधी को उस कारावास के, क्जसके लिए वह दंडाहदष् ट ककया गया है, ककसी भाग या भागों के लिए, जो कुि लमिाकर तीन मास स े अधधक नहीं होंगे, ननम् नलिखित मापमान के अनुसार एकांत परररोध में रिा जाएगा, अथाषत ् :— (क) यहद कारावास की अवधध छह मास से अधधक नहीं है, तो एक मास स े22 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अनधधक समय ; (ि) यहद कारावास की अवधध छह मास से अधधक है और एक वर् ष से अधधक नहीं है, तो दो मास से अनधधक समय ; (ग) यहद कारावास की अवधध एक वर् ष से अधधक है, तो तीन मास से अनधधक समय । एकांत परररोध 12. एकांत परररोध के दण्डादेश के ननष्पादन में, ऐसा परररोध ककसी भी दशा में एक की अवधध । बार में चौदह हदन से अधधक नहीं होगा, साथ ही ऐसे एकांत परररोध की कािावधधयों के बीच में उन कािावधधयों से अन्यून अंतराि होंगे ; और जब हदया गया कारावास तीन मास स े अधधक हो, तब हदए गए सम्पूण ष कारावास के ककसी एक मास में एकांत परररोध सात हदन से अधधक नहीं होगा, साथ ही एकांत परररोध की कािावधधयों के बीच में उन्हीं कािावधधयों से अन्यून अंतराि होंगे । पूव ष दोर्लसद्धध 13. जो कोई व्यक्‍ त, भारत में ककसी न्यायािय द्वारा इस संहहता के अध्याय 10 या के पश् चात ् अध्याय 17 के अधीन तीन वर् ष या उससे अधधक की अवधध के लिए दोनों में से ककसी भांनत कनतपय अपराधों के कारावास से दण्डनीय अपराध के लिए दोर्लसद्ध ठहराए जाने के पश् चात,् उन दोनों के लिए वधधतष दण्ड । अध्यायों में से ककसी अध्याय के अधीन उतनी ही अवधध के लिए वैसे ही कारावास से दण्डनीय ककसी अपराध का दोर्ी है, तो वह प्रत्येक ऐसे पश्च ात व् ती अपराध के लिए आजीवन कारावास से या दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा । अध्याय 3 सािारण अपिाि ववधध द्वारा 14. कोई बात अपराध नहीं है, जो ककसी ऐसे व्यक्‍ त द्वारा ककया जाए, जो उसे करने आबद्ध या तथ्य के लिए ववधध द्वारा आबद्ध है या जो तथ्य की भूि के कारण, न कक ववधध की भिू के की भूि के कारण, सद्भ ावपूवकष ववश् वास करता है कक वह उसे करने के लिए ववधध द्वारा आबद्ध है । कारण अपने आप को ववधध दृष् टांत द्वारा आबद्ध होने का ववश् वास (क) ववधध के समादेशों के अनुरूप अपने वररष् ठ अधधकारी के आदेश स े एक सैननक क करने वािे भीड पर गोिी चिाता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया । व्यक्‍ त द्वारा ककया गया (ि) न्यायािय का अधधकारी क, म को धगरफ्तार करने के लिए उस न्यायािय द्वारा काय ष । आदेलशत ककए जाने पर और सम्यक् जांच करने के पश् चात,् यह ववश् वास करके कक य ही म है, य को धगरफ्तार कर िेता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया । न्यानयक रूप स े 15. कोई बात अपराध नहीं है, जो न्यानयक रूप स े काय ष करते हुए ककसी न्यायाधीश काय ष करते हुए द्वारा ककसी ऐसी शक्‍ त के प्रयोग में की जाती है, क्जसके बारे में उस े सद् भावपूवकष ववश्व ास न्यायाधीश का है कक उसके पास वह है या उसे ववधध द्वारा दी गई है । काय ष । न्यायािय के 16. कोई बात, जो ककसी न्यायािय के ननणयष या आदेश के अनुसरण में की जाए या ननणयष या आदेश उसके द्वारा समधथतष हो, यहद वह उस ननणयष या आदेश के प्रवत्तृ रहते की जाए, अपराध के अनुसरण में नहीं है, चाहे उस न्यायािय को ऐसा ननणयष या आदेश देने की अधधकाररता न रही हो, परन्तु ककया गया काय ष । यह तब जब कक वह काय ष करने वािा व्यक्‍ त सद् भावपवू कष ववश् वास करता हो कक उस न्यायािय को वैसी अधधकाररता थी ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 23 17. कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्‍ त द्वारा ककया जाए, जो उसे करने के ववधध द्वारा न्यायानुमत या लिए ववधध द्वारा न्यायानुमत है, या तथ्य की भूि के कारण, न कक ववधध की भूि के कारण तथ्य की भूि स े सद्भ ावपूवकष ववश् वास करता है कक वह उसे करने के लिए ववधध द्वारा न्यायानुमत है । अपन े को ववधध द्वारा दृष् टांत न्यायानुमत होन े का ववश् वास क, य को ऐसा काय ष करते हुए देिता है, जो क को हत्या प्रतीत होता है । क करन े वाि े सद्भ ावपूवकष काम में िाए गए अपने श्रेष् ठ ननणषय के अनुसार उस शक्‍ त को प्रयोग में िाते व्यक्‍त द्वारा हुए, जो ववधध ने हत्या करने वािों को उस काय ष में पकडने के लिए समस्त व्यक्‍ तयों को दे ककया गया कायष। रिी है, य को उधचत प्राधधकाररयों के समि िे जाने के लिए य को अलभगहृ ीत करता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया है, चाहे तत्पश् चात ् असि बात यह ननकिे कक य आत्म-रिा में काय ष कर रहा था । 18. कोई बात अपराध नहीं है, जो दघु टष ना या दभु ाषग्य से और ककसी आपराधधक आशय ववधधपूण ष काय ष या ज्ञान के बबना ववधधपूण ष रीनत स े ववधधपूण ष साधनों द्वारा तथा उधचत सतकषता और करने में दघु टष ना । सावधानी के साथ ववधधपूण ष काय ष करने में हो जाती है । दृष् टांत क कु्हाडी से काम कर रहा है, कु्हाडी का फि उसमें स े ननकि कर उछट जाता है, और ननकट िडा हुआ व्यक्‍ त उससे मारा जाता है । यहां यहद क की ओर से उधचत सावधानी का कोई अभाव नहीं था, तो उसका काय ष माफी योग्य है और अपराध नहीं है । 19. कोई बात केवि इस कारण अपराध नहीं है कक वह यह जानते हुए की गई है कक काय,ष क्जससे अपहानन काररत उससे अपहानन काररत होना संभाव्य है, यहद वह अपहानन काररत करने के ककसी आपराधधक होना संभाव्य आशय के बबना और व्यक्‍ त या संपवत्त को अन्य अपहानन का ननवारण या पररवजनष करने के है, ककंत ु जो प्रयोजन से सद् भावपूवकष की गई है । आपराधधक आशय के बबना स्पष् टीकरण—ऐसे मामिे में यह तथ्य का प्रश् न है कक क्जस अपहानन का ननवारण या और अन्य पररवजनष ककया जाना है, ‍या वह ऐसी प्रकृनत की थी और इतनी आसन् न थी कक वह काय,ष अपहानन के क्जससे यह जानते हुए कक उससे अपहानन काररत होना संभाव्य है, करने की जोखिम उठाना ननवारण के लिए ककया गया न्यायानुमत या माफी योग्य था । है । दृष् टांत (क) क, जो एक जियान का कप्तान है, अचानक और अपने ककसी त्रुहट या उपेिा के बबना अपने आपको ऐसी क्स्थनत में पाता है कक यहद उसने जियान का माग ष नहीं बदिा, तो इससे पूव ष कक वह अपने जियान को रोक सके वह बीस या तीस याबत्रयों से भरी नाव ख को अननवायतष : टकराकर डुबा देगा, और अपना माग ष बदिने स े उसे केवि दो याबत्रयों वािी नाव ि को डुबाने की जोखिम उठानी पडती है, क्जसको वह संभवत: बचाकर ननकि जाए । यहां, यहद क नाव ि को डुबाने के ककसी आशय के बबना और नाव ख के याबत्रयों को संकट से बचान े के प्रयोजन से सद् भावपूवकष अपना माग ष बदि देता है, यद्यवप वह नाव ि को ऐसे काय ष द्वारा टकराकर डुबा सकती है, क्जससे ऐसे पररणाम का उत्पन्न होना वह संभाव्य जानता था, तथावप तथ्यत: यह पाया जाता है कक वह संकट, क्जसे बचान े का उसका आशय था, क्जससे नाव ि को डुबाने की जोखिम उठाना माफी योग्य है, तो वह ककसी अपराध का दोर्ी नहीं है । (ि) क, एक बडे अक्ग् नकांड के समय आग को फैिने से रोकने के लिए घरों को धगरा देता24 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— है । वह इस काय ष को मानव जीवन या संपवत्त को बचाने के आशय से सद् भावपूवषक करता है । यहां, यहद यह पाया जाता है कक ननवारण की जाने वािी अपहानन इस प्रकृनत की थी और इतनी आसन् न थी कक क का काय ष माफी योग्य है, तो क उस अपराध का दोर्ी नहीं है । सात वर् ष स े कम 20. कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर् ष से कम आयु के लशशु द्वारा की जाती आयु के लशश ु का है । काय ष । सात वर् ष स े 21. कोई बात अपराध नहीं है, जो सात वर् ष से ऊपर और बारह वर् ष से कम आयु के ऊपर, ककंतु बारह ऐसे लशशु द्वारा की जाती है क्जसकी समझ इतनी पररप‍ व नहीं हुई है कक वह उस अवसर वर् ष से कम आय ु पर अपने आचरण की प्रकृनत और पररणामों का ननणयष कर सके । के अपररप‍व समझ के लशश ु का काय ष । ववकृत्तधचत्त 22. कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐस े व्यक्‍ त द्वारा की जाती है, जो उस े करते व्यक्‍ त का समय, धचत्त-ववकृवत्त के कारण, उस काय ष की प्रकृनत, या यह कक जो कुछ वह कर रहा है वह काय ष । दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि है, जानने में असमथ ष है । ऐसे व्यक्‍त का 23. कोई बात अपराध नहीं है, जो ऐस े व्यक्‍ त द्वारा की जाती है, जो उस े करते काय ष जो अपनी समय मत्तता के कारण, उस काय ष की प्रकृनत, या यह कक जो कुछ वह कर रहा है, वह इच्छा के ववरुद्ध दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि है, जानने में असमथ ष है, परंतु वह चीज, क्जससे उसकी मत्तता मत्तता में होने के कारण ननणयष हुई थी, उसको अपने ज्ञान के बबना या इच्छा के ववरुद्ध दी गई थी । पर पहुंचन े में असमथ ष है । ककसी व्यक्‍त 24. उन दशाओं में, जहां कक कोई ककया गया काय ष अपराध नहीं होता, जब तक कक द्वारा, जो मत्तता वह ककसी ववलशष् ट ज्ञान या आशय से न ककया गया हो, कोई व्यक्‍ त, जो वह काय ष मत्तता में है, ककया गया की क्स्थनत में करता है, इस प्रकार बरते जाने के दानयत्व के अधीन होगा मानो उसे वही अपराध, क्जसमें ववलशष्ट आशय ज्ञान था जो उसे होता यहद वह मत्तता में न होता जब तक कक वह चीज, क्जससे उस े मत्तता या ज्ञान का हुई थी, उसे उसके ज्ञान के बबना या उसकी इच्छा के ववरुद्ध न दी गई हो । होना अपेक्षित है । सम्मनत स े ककया 25. कोई बात, जो मत्ृ यु या घोर उपहनत काररत करने के आशय से न की गई हो और गया काय ष क्जसके बारे में कता ष को यह ज्ञात न हो कक उसस े मत्ृ यु या घोर उपहनत काररत होना सभं ाव्य क्जससे मत्ृ य ु या है, ककसी ऐसी अपहानन के कारण अपराध नहीं है जो उस बात से अठारह वर् ष से अधधक घोर उपहनत काररत करने का आयु के ककसी व्यक्‍ त को, क्जसने वह अपहानन सहन करने की चाहे अलभव्य‍ त या आशय न हो वववक्षित सम्मनत दे दी हो, काररत हो या काररत होना कताष द्वारा आशनयत हो या क्जसके और न उसकी बारे में कताष को ज्ञात हो कक वह ऐसे ककसी व्यक्‍ त को, क्जसने उस अपहानन की जोखिम संभाव्यता का उठाने की सम्मनत दे दी है, उस बात द्वारा काररत होना संभाव्य है । ज्ञान हो । दृष् टांत क और य अमोद-प्रमोद हेतु आपस में पट्टेबाजी करने को सहमत होते हैं । इस सहमनत में ककसी अपहानन को, जो ऐसी पट्टेबाजी के दौरान िेि के ननयम के ववरुद्ध न होते हुए काररत हो, सहन करने की प्रत्येक की सम्मनत वववक्षित है, और यहद क, ननयमानुसार पट्टेबाजी करते हुए य को उपहनत काररत कर देता है, तो क कोई अपराध नहीं करता है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 25 26. कोई बात, जो मत्ृ यु काररत करने के आशय से न की गई हो, ककसी ऐसी अपहानन ककसी व्यक्‍ त के फायदे के के कारण अपराध नहीं है जो उस बात स े ककसी ऐस े व्यक्‍ त को, क्जसके फायदे के लिए वह लिए सम्मनत स े सद्भ ावपूवकष की जाए और क्जसने उस अपहानन को सहने, या उस अपहानन की जोखिम सद्भ ावपूवकष उठाने के लिए चाहे अलभव्य‍ त या वववक्षित सम्मनत दे दी हो, काररत हो या काररत करने ककया गया का कताष का आशय हो या काररत होने की संभाव्यता कताष को ज्ञात हो । काय,ष क्जससे मत्ृ यु काररत दृष् टांत करने का आशय नहीं क, एक श्यधचककत्सक, यह जानते हुए कक एक ववलशष्ट श्यकक्रया से य को, जो है । वेदनापूण ष व्याधध से िस्त है, मत्ृ यु काररत होने की संभाव्यता है, ककंतु य की मत्ृ यु काररत करने का आशय न रिते हुए और सद् भावपूवकष य के फायदे के आशय से य की सम्मनत से य पर वह श्य कक्रया करता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया है । 27. कोई बात, जो बारह वर् ष से कम आयु के व्यक्‍त या ववकृत्तधचत्त व्यक्‍ त के फायदे संरिक द्वारा या उसकी के लिए सद् भावपूवकष उसके संरिक की या ववधधपूण ष भारसाधक ककसी अन्य व्यक्‍ त द्वारा सम्मनत स े या तो अलभव्य‍ त या वववक्षित सम्मनत से की जाए, ककसी ऐसी अपहानन के कारण, अपराध लशश ु या नहीं है जो उस बात स े उस व्यक्‍ त को काररत हो, या काररत करने का कताष का आशय हो ववकृत्तधचत्त या काररत होने की संभाव्यता कताष को ज्ञात हो : व्यक्‍ त के फायदे के लिए परन्तु इस अपवाद का ववस्तार,— सद्भ ावपूवकष ककया गया (क) साशय मत्ृ यु काररत करने या मत्ृ यु काररत करने का प्रयत् न करने पर नहीं काय ष । होगा ; (ि) मत्ृ यु या घोर उपहनत के ननवारण के या ककसी गंभीर रोग या अंगशैधथ्य से मु‍ त करने से लभन्न ककसी प्रयोजन के लिए ककसी ऐसी बात के करने पर नहीं होगा क्जसे करने वािा व्यक्‍ त जानता हो कक उससे मत्ृ यु काररत होना संभाव्य है ; (ग) स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करने या घोर उपहनत काररत करने का प्रयत् न करने पर नहीं होगा, जब तक कक वह मत्ृ यु या घोर उपहनत के ननवारण के, या ककसी गंभीर रोग या अंगशैधथ्य से मु‍ त करने के प्रयोजन से न की गई हो ; (घ) ककसी ऐसे अपराध के दष्ु प्रेरण पर नहीं होगा, क्जस अपराध के ककए जाने पर इसका ववस्तार नहीं है । दृष् टांत क सद्भ ावपूवकष , अपने लशश ु के फायदे के लिए अपने लशशु की सम्मनत के बबना, यह संभाव्य जानते हुए कक श्य कक्रया से उस लशशु की मत्ृ यु काररत होगी, न कक इस आशय से कक उस लशश ु को मत्ृ यु काररत कर दे, श्यधचककत्सक द्वारा पथरी ननकिवाने के लिए अपने लशशु की श्यकक्रया करवाता है । क का उद्देश्य लशशु को रोगमु‍ त कराना था, इसलिए वह इस अपवाद के अंतगतष आता है । 28. कोई सम्मनत ऐसी सम्मनत नहीं है, जैसी इस संहहता की ककसी धारा स े आशनयत सम्मनत, है,— क्जसके संबंध में यह ज्ञात हो कक (क) यहद वह सम्मनत ककसी व्यक्‍ त ने िनत के भय के अधीन, या तथ्य के वह भय या भ्रम के अधीन ककसी भ्रम के अधीन दी है, और यहद काय ष करने वािा व्यक्‍ त यह जानता है, या दी गई है । उसके पास ववश्व ास करने का कारण है कक ऐसे भय या भ्रम के पररणामस्वरूप वह सम्मनत दी गई थी ; या26 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) यहद वह सम्मनत ऐस े व्यक्‍ त ने दी है, जो धचत्त-ववकृनत या मत्तता के कारण, उस बात की, क्जसके लिए वह अपनी सम्मनत देता है, प्रकृनत और पररणाम को समझने में असमथ ष है ; या (ग) जब तक कक संदभ ष से प्रनतकूि प्रतीत न हो, यहद वह सम्मनत ऐसे व्यक्‍ त ने दी है, जो बारह वर् ष से कम आयु का है । ऐसे कायों का 29. धारा 25, धारा 26 और धारा 27 के अपवादों का ववस्तार उन कायों पर नहीं है, अपवजनष जो जो ककसी अपहानन के बबना भी स्वत: अपराध हैं जो उस व्यक्‍ त को, जो सम्मनत देता है या काररत अपहानन क्जसकी ओर से सम्मनत दी जाती है, उन कायों से काररत हो, या काररत ककए जाने का के बबना भी स्वत: अपराध आशय हो, या काररत होने की संभाव्यता ज्ञात हो । ह ैं । दृष् टांत गभपष ात कराना (जब तक कक वह उस महहिा का जीवन बचाने के प्रयोजन से सद्भ ावपूवकष काररत न ककया गया हो) ककसी अपहानन के बबना भी, जो उससे उस महहिा को काररत हो या काररत करने का आशय हो, स्वत: अपराध है । इसलिए वह “ऐसी अपहानन के कारण” अपराध नहीं है ; और ऐसा गभपष ात कराने की उस महहिा की या उसके संरिक की सम्मनत उस काय ष को न्यायानुमत नहीं बनाती । सम्मनत के बबना 30. कोई बात, जो ककसी व्यक्‍ त के फायदे के लिए सद् भावपूवकष , यद्यवप उसकी ककसी व्यक्‍ त के सम्मनत के बबना की गई है, ऐसी ककसी अपहानन के कारण अपराध नहीं है, जो उस बात से फायदे के लिए उस व्यक्‍ त को काररत हो जाए, यहद पररक्स्थनतयां ऐसी हैं कक उस व्यक्‍ त के लिए यह सद् भावपूवकष ककया गया असंभव हो कक वह अपनी सम्मनत प्रकट करे या वह व्यक्‍ त सम्मनत देने के लिए असमथष काय ष । हो और उसका कोई संरिक या उसका ववधधपूण ष भारसाधक कोई दसू रा व्यक्‍ त न हो क्जससे ऐसे समय पर सम्मनत अलभप्राप् त करना संभव हो कक वह बात फायदे के साथ की जा सके : परन्तु इस अपवाद का ववस्तार,— (क) साशय मत्ृ यु काररत करने या मत्ृ यु काररत करने का प्रयत् न करने पर नहीं होगा ; (ि) मत्ृ यु या घोर उपहनत के ननवारण के या ककसी घोर रोग या अंगशैधथ्य से मु‍ त करने के प्रयोजन से लभन्न ककसी प्रयोजन के लिए ककसी ऐसी बात के करन े पर नहीं होगा, क्जसे करने वािा व्यक्‍ त जानता है कक उससे मत्ृ यु काररत होना संभाव्य है ; (ग) मत्ृ यु या उपहनत के ननवारण के प्रयोजन से लभन् न ककसी प्रयोजन के लिए स्वेच्छया उपहनत काररत करने या उपहनत काररत करने का प्रयत् न करने पर नहीं होगा ; (घ) ककसी ऐसे अपराध के दष्ु प्र ेरण पर नहीं होगा क्जस अपराध के ककए जान े पर इसका ववस्तार नहीं है । दृष् टांत (1) य अपने घोडे से धगर गया और मूनछषत हो गया । क, एक श्यधचककत्सक का यह ववचार है कक य के कपाि पर श्यकक्रया आवश्यक है । क, य की मत्ृ यु काररत करने का आशय न रिते हुए, ककंतु सद् भावपूवकष य के फायदे के लिए, य के स्वयं ककसी ननणषय परअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 27 पहुंचने की शक्‍ त प्राप् त करने से पूव ष ही कपाि पर श्यकक्रया करता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया । (2) य को एक बाघ उठा िे जाता है । यह जानते हुए कक संभाव्य है कक गोिी िगने से य मर जाए, ककंतु य का वध करने का आशय न रिते हुए और सद् भावपूवकष य के फायदे के आशय से क उस बाघ पर गोिी चिाता है । क की गोिी से य को मत्ृ युकारक घाव हो जाता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया । (3) क, एक श्यधचककत्सक, यह देिता है कक एक लशशु की ऐसी दघु टष ना हो गई है क्जसका घातक साबबत होना संभाव्य है, यहद श्यकक्रया तुरंत न कर दी जाए । इतना समय नहीं है कक उस लशशु के संरिक से आवेदन ककया जा सके । क, सद्भ ावपूवकष लशशु के फायदे का आशय रिते हुए लशशु के अनुनय-ववनय करने के बावजूद भी श्यकक्रया करता है । क ने कोई अपराध नहीं ककया । (4) एक लशशु य के साथ क एक जिते हुए घर में है । घर के नीचे िोग एक कंबि तान िेते हैं । क उस लशशु को यह जानते हुए कक संभाव्य है कक धगरने से वह लशशु मर जाए, ककंतु उस लशशु को मार डािने का आशय न रिते हुए और सद् भावपूवकष उस लशश ु के फायदे के आशय से छत पर से नीचे धगरा देता है । यहां, यहद धगरने से वह लशशु मर भी जाता है, तो भी क ने कोई अपराध नहीं ककया । स्पष् टीकरण—धारा 26, धारा 27 और इस धारा के अथ ष के अंतगतष केवि धन संबंधी फायदा वह फायदा नहीं है । 31. सद्भ ावपूवकष दी गई ससं चू ना ककसी अपहानन के कारण अपराध नहीं है, जो उस सद्भ ावपूवकष दी व्यक्‍ त को हुई है, क्जसे वह दी गई है, यहद वह उस व्यक्‍ त के फायदे के लिए दी गई है । गई संसूचना । दृष् टांत क, एक श्यधचककत्सक, एक रोगी को सद् भावपूवकष यह संसूधचत करता है कक उसकी राय में वह जीववत नहीं रह सकता । इस आघात के पररणामस्वरूप उस रोगी की मत्ृ यु हो जाती है । क ने कोई अपराध नहीं ककया है, यद्यवप वह जानता था कक उस संसूचना से उस रोगी की मत्ृ यु काररत होना संभाव्य है । 32. हत्या और मत्ृ यु से दंडनीय राज्य के ववरुद्ध अपराधों के लसवाय, कोई बात वह काय ष क्जसको करने अपराध नहीं है, जो ऐसे व्यक्‍ त द्वारा की जाए, जो उस े करने के लिए ऐसी धमककयों से के लिए कोई वववश ककया गया हो, क्जनसे उस बात को करते समय उसको युक्‍ तयु‍ त रूप से यह आशंका व्यक्‍ त काररत हो गई हो कक अन्यथा पररणाम यह होगा कक उस व्यक्‍ त की तत्काि मत्ृ यु हो धमककयों द्वारा जाए : वववश ककया गया है । परन्तु यह तब जबकक उस काय ष को करने वािे व्यक्‍ त ने अपनी ही इच्छा से या तत्काि मत्ृ यु से कम अपनी अपहानन की युक्‍ तयु‍ त आशंका से अपने को उस क्स्थनत में न डािा हो, क्जसमें कक वह ऐसी मजबूरी में पड गया है । स्पष् टीकरण 1—कोई व्यक्‍ त, जो स्वयं अपनी इच्छा से, या पीटे जाने की धमकी के कारण, डाकुओं की टोिी में उनके शीि को जानते हुए सक्म्मलित हो जाता है, इस आधार पर ही इस अपवाद का फायदा उठाने का हकदार नहीं है कक वह अपने साधथयों द्वारा ऐसी बात करने के लिए वववश ककया गया था, जो ववधध द्वारा अपराध है । स्पष् टीकरण 2— कोई व्यक्‍त, क्जसे डाकुओं की एक टोिी द्वारा पकडा गया और28 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तत्काि मत्ृ यु की धमकी द्वारा ककसी बात को करने के लिए वववश ककया गया, जो ववधध द्वारा अपराध है, उदाहरण के लिए, एक िोहार, जो अपने औजार िेकर ककसी घर का द्वार तोडने को वववश ककया जाता है, क्जससे डाकू उसमें प्रवेश कर सकें और उसे िूट सकें, इस अपवाद का फायदा उठाने का हकदार है । तुच्छ अपहानन 33. कोई बात, इस कारण स े अपराध नहीं है कक उसस े कोई अपहानन काररत होती है काररत करने या काररत की जानी आशनयत है या काररत होने की संभाव्यता ज्ञात है, यहद वह अपहानन वािा काय ष । इतनी तुच्छ है कक मामूिी समझ और स्वभाव वािा कोई व्यक्‍ त उसकी लशकायत नहीं करेगा । प्राइिेट प्रनतरक्षा के अधिकार के विषय में प्राइवेट प्रनतरिा 34. कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार के प्रयोग में की जाती में की गई है । बातें । शरीर और संपवत्त 35. धारा 37 में अंतववष्ष ट ननबन्ष धनों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक व्यक्‍ त को अधधकार की प्राइवेट है कक वह— प्रनतरिा का अधधकार । (क) मानव शरीर पर प्रभाव डािने वािे ककसी अपराध के ववरुद्ध अपने शरीर और ककसी अन्य व्यक्‍ त के शरीर की प्रनतरिा करे ; (ि) ककसी ऐसे काय ष के ववरुद्ध, जो चोरी, िूट, ररक्ष् ट या आपराधधक अनतचार की पररभार्ा में आने वािा अपराध है, या जो चोरी, िूट, ररक्ष् ट या आपराधधक अनतचार करने का प्रयत् न है, अपनी या ककसी अन्य व्यक्‍ त की संपवत्त, चाहे चि हो या अचि, उसकी प्रनतरिा करे । ऐसे व्यक्‍ त के 36. जब कोई काय,ष जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस काय ष को करने वािे व्यक्‍ त काय ष के ववरुद्ध के बािकपन, समझ की पररप‍ वता के अभाव, धचत्त-ववकृवत्त या मत्तता के कारण, या उस प्राइवेट प्रनतरिा व्यक्‍ त के ककसी भ्रम के कारण, अपराध नहीं है, तब प्रत्येक व्यक्‍ त उस काय ष के ववरुद्ध का अधधकार जो ववकृत्तधचत्त, आहद प्राइवेट प्रनतरिा का वही अधधकार रिता है, जो वह उस काय ष के वैसा अपराध होने की दशा हो । में रिता । दृष् टांत (क) य, एक ववकृत्तधचत्त व्यक्‍त, क को जान से मारने का प्रयत् न करता है । य ककसी अपराध का दोर्ी नहीं है । ककन्तु क को प्राइवेट प्रनतरिा का वही अधधकार है, जो वह य के स्वस्थधचत्त होने की दशा में रिता । (ि) क राबत्र में एक ऐस े घर में प्रवेश करता है, क्जसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है । य, सद्भ ावपूवकष क को गहृ भेदक समझकर, क पर आक्रमण करता है । यहां य इस भ्रम के अधीन क पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं करता है । ककंतु क, य के ववरुद्ध प्राइवेट प्रनतरिा का वही अधधकार रिता है, जो वह तब रिता, जब य उस भ्रम के अधीन काय ष न करता । काय,ष क्जनके 37. (1) प्राइवेट प्रनतरिा का कोई अधधकार नहीं है,— ववरुद्ध प्राइवेट प्रनतरिा का कोई (क) यहद कोई काय,ष क्जसस े मत्ृ यु या घोर उपहनत की आशकं ा युक्‍ तयु‍ त रूप से अधधकार नहीं काररत नहीं होती, सद्भ ावपूवकष अपने पदाभास में काय ष करते हुए ककसी िोक सेवक है । द्वारा ककया जाता है या ककए जाने का प्रयत् न ककया जाता है, चाहे वह काय ष ववधधअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 29 द्वारा सवथष ा न्यायानुमत न भी हो ; (ि) यहद कोई काय,ष क्जससे मत्ृ यु या घोर उपहनत की आशंका युक्‍ तयु‍ त रूप से काररत नहीं होती, सद्भ ावपूवकष अपने पदाभास में काय ष करते हुए ककसी िोक सेवक के ननदेश से ककया जाता है, या ककए जाने का प्रयत् न ककया जाता है, चाहे वह ननदेश ववधध द्वारा सवथष ा न्यायानुमत न भी हो ; (ग) उन मामिों में, क्जनमें सरं िण के लिए िोक प्राधधकाररयों की सहायता प्राप् त करने के लिए समय है । (2) ककसी भी मामि े में, प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का ववस्तार उतनी अपहानन से अधधक अपहानन करने पर नहीं है, क्जतनी प्रनतरिा के प्रयोजन से करना आवश्यक है । स्पष् टीकरण 1—कोई व्यक्‍ त ककसी िोक सेवक द्वारा ऐस े िोक सेवक के नाते ककए गए, या ककए जाने के लिए प्रयत्न ककए गए ककसी काय ष के ववरुद्ध प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार से तब तक वंधचत नहीं होता, जब तक कक वह यह न जानता हो, या ववश् वास करने का कारण न रिता हो कक उस काय ष को करने वािा व्यक्‍ त ऐसा िोक सेवक है । स्पष् टीकरण 2—कोई व्यक्‍ त ककसी िोक सेवक के ननदेश से ककए गए, या ककए जान े के लिए प्रयत्न ककए गए ककसी काय ष के ववरुद्ध प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार से तब तक वंधचत नहीं होता, जब तक कक वह यह न जानता हो, या ववश् वास करने का कारण न रिता हो कक उस काय ष को करने वािा व्यक्‍ त ऐसे ननदेश स े काय ष कर रहा है, या जब तक कक वह व्यक्‍ त उस प्राधधकार का कथन न कर दे, क्जसके अधीन वह काय ष कर रहा है, या यहद उसके पास लिखित प्राधधकार है, जो जब तक कक वह ऐसे प्राधधकार को मांगे जान े पर प्रस्तुत न कर दे । 38. शरीर की प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का ववस्तार, धारा 37 में ववननहदषष्ट शरीर की प्राइवेट प्रनतरिा ननबन्ष धनों के अधीन रहते हुए, हमिावर की स्वेच्छया मत्ृ यु काररत करने या कोई अन्य के अधधकार का अपहानन काररत करने तक है, यहद वह अपराध, क्जसके कारण ऐसे अधधकार के प्रयोग का ववस्तार मत्ृ यु अवसर आता है, इसमें इसके पश्चात ् प्रगखणत भांनतयों में से ककसी भी भांनत का है, काररत करने अथाषत ् :— पर कब होता है । (क) ऐसा हमिा, क्जसस े युक्‍ तयु‍ त रूप से यह आशंका काररत हो कक अन्यथा ऐसे हमिे का पररणाम मत्ृ यु होगा ; (ि) ऐसा हमिा, क्जससे युक्‍ तयु‍ त रूप से यह आशंका काररत हो कक अन्यथा ऐसे हमिे का पररणाम घोर उपहनत होगा ; (ग) बिात्संग करने के आशय से ककया गया कोई हमिा ; (घ) प्रकृनत-ववरुद्ध काम-तष्ृ णा की तक्ृप्त के आशय से ककया गया कोई हमिा ; (ङ) व्यपहरण या अपहरण करने के आशय से ककया गया कोई हमिा ; (च) इस आशय स े ककया गया कोई हमिा कक ककसी व्यक्‍ त का ऐसी पररक्स्थनतयों में सदोर् परररोध ककया जाए, क्जनसे उस े युक्‍ तयु‍ त रूप से यह आशंका काररत हो कक वह अपने को छुडवाने के लिए िोक प्राधधकाररयों की सहायता प्राप् त नहीं कर सकेगा ;30 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (छ) अम् ि फेंकने या देने का कृत् य, या अम् ि फेंकने या देने का प्रयत्न करना क्जससे युक्‍ तयु‍ त रूप से यह आंशका काररत हो कक ऐसे कृत् य के पररणामस् वरूप अन्य था घोर उपहनत काररत होगी । कब ऐस े 39. यहद अपराध धारा 38 में ववननहदषष्ट वववरणों में से ककसी प्रकार का नहीं है, तो अधधकार का शरीर की प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का ववस्तार हमिावर की मत्ृ यु स्वेच्छया काररत करने ववस्तार मत्ृ यु स े तक का नहीं होता, ककंतु इस अधधकार का ववस्तार धारा 37 में ववननहदषष्ट ननबन्ष धनों के लभन् न कोई अपहानन काररत अधीन रहते हुए, हमिावर की मत्ृ यु से लभन् न कोई अपहानन स्वेच्छया काररत करने तक का करने तक का होता है । होता है । शरीर की प्राइवेट 40. शरीर की प्राइवेट प्रनतरिा का अधधकार उसी िण प्रारंभ हो जाता है, जब अपराध प्रनतरिा के करने के प्रयत् न या धमकी से शरीर के संकट की युक्‍ तयु‍ त आशंका पैदा होती है, चाहे वह अधधकार का अपराध ककया न गया हो, और वह तब तक बना रहता है जब तक शरीर के संकट की ऐसी प्रारंभ होना और बना रहना । आशंका बनी रहती है । कब संपवत्त की 41. संपवत्त की प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का ववस्तार, धारा 37 में ववननहदषष्ट प्राइवेट प्रनतरिा ननबन्ष धनों के अधीन रहते हुए दोर्कताष की मत्ृ यु या अन्य अपहानन स्वेच्छया काररत करने के अधधकार का तक का है, यहद वह अपराध क्जसके ककए जाने के, या ककए जाने के प्रयत् न के कारण उस ववस्तार मत्ृ यु काररत करने अधधकार के प्रयोग का अवसर आता है, इसमें इसके पश् चात ् प्रगखणत भांनतयों में से ककसी भी तक का होता भांनत का है, अथाषत:्— है । (क) िूट ; (ि) सूयाषस्त के पश्चात और सूय् ोदय के पूव ष गहृ भेदन ; (ग) अक्ग् न या ककसी ववस्फोटक पदाथ ष द्वारा ररक्ष् ट, जो ककसी ऐस े भवन, तंबू या जियान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में या संपवत्त की अलभरिा के स्थान के रूप में उपयोग में िाया जाता है ; (घ) चोरी, ररक्ष् ट या गहृ -अनतचार, जो ऐसी पररक्स्थनतयों में ककया गया है, क्जनसे युक्‍ तयुक्‍ त रूप से यह आशंका काररत है कक यहद प्राइवेट प्रनतरिा के ऐसे अधधकार का प्रयोग न ककया गया तो पररणाम मत्ृ यु या घोर उपहनत होगा । ऐसे अधधकार का 42. यहद वह अपराध, क्जसके ककए जाने या ककए जाने के प्रयत् न से प्राइवेट प्रनतरिा ववस्तार मत्ृ यु स े के अधधकार के प्रयोग का अवसर आता है, ऐसी चोरी, ररक्ष्ट या आपराधधक अनतचार है, जो लभन् न कोई धारा 41 में ववननहदषष्ट वववरणों में से ककसी प्रकार का नहीं है, तो उस अधधकार का ववस्तार अपहानन काररत करने तक का स्वेच्छया मत्ृ यु काररत करने तक का नहीं होता, ककन्तु उसका ववस्तार धारा 37 में कब होता है । ववननहदषष्ट ननबधं नों के अधीन रहते हुए, दोर्कताष की मत्ृ यु से लभन् न कोई अपहानन स्वेच्छया काररत करने तक का होता है । सम्पवत्त की 43. सम्पवत्त की प्राइवेट प्रनतरिा का अधधकार,— प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का (क) तब प्रारंभ होता है, जब सम्पवत्त के संकट की युक्‍ तयु‍ त आशंका प्रारंभ प्रारंभ होना और होती है ; बना रहना । (ि) चोरी के ववरुद्ध अपराधी के संपवत्त सहहत पहुंच से बाहर हो जाने तक अथवा, या तो िोक प्राधधकाररयों की सहायता अलभप्राप् त कर िेने तक या संपवत्त बरामद हो जाने तक बना रहता है ;अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 31 (ग) िूट के ववरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी ककसी व्यक्‍ त की मत्ृ यु या उपहनत, या सदोर् अवरोध काररत करता रहता है या काररत करने का प्रयत् न करता रहता है, अथवा जब तक तत्काि मत्ृ यु का, या तत्काि उपहनत का, या तत्काि वैयक्‍ तक अवरोध का, भय बना रहता है ; (घ) आपराधधक अनतचार या ररक्ष् ट के ववरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक अपराधी आपराधधक अनतचार या ररक्ष् ट करता रहता है ; (ङ) सूयाषस्त के पश्चात और सूयोदय के पूव ष गहृ भेदन के ववरुद्ध तब तक बना रहता है, जब तक ऐसे गहृ भेदन से आरंभ हुआ गहृ -अनतचार होता रहता है । 44. क्जस हमिे से मत्ृ यु की आशंका युक्‍ तयु‍ त रूप से काररत होती है, उसके ववरुद्ध घातक हमिे के ववरुद्ध प्राइवेट प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का प्रयोग करने में यहद प्रनतरिक ऐसी क्स्थनत में है कक ननदोर् प्रनतरिा का व्यक्‍ त की अपहानन की जोखिम के बबना वह उस अधधकार का प्रयोग कायसष ाधक रूप से अधधकार, जबकक नहीं कर सकता है, तो उसके प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार का ववस्तार वह जोखिम उठाने ननदोर् व्यक्‍ त को अपहानन होन े तक का है । का जोखिम है । दृष् टांत क पर एक भीड द्वारा आक्रमण ककया जाता है, जो उसकी हत्या करने का प्रयत् न करती है । वह उस भीड पर गोिी चिाए बबना प्राइवेट प्रनतरिा के अपने अधधकार का प्रयोग कायसष ाधक रूप से नहीं कर सकता, और वह भीड में लमिे हुए छोटे-छोटे लशशुओं की अपहानन करने की जोखिम उठाए बबना गोिी नहीं चिा सकता । यहद वह इस प्रकार गोिी चिाने से उन लशशुओं में से ककसी लशशु को अपहानन करे तो क कोई अपराध नहीं करता । अध्याय 4 िष्ु प्रेरण, आपराधिक षडय ंत्र और प्रयत्ि के विषय में िष्ु प्रेरण के विषय में 45. वह व्यक्‍ त, ककसी बात को ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है, जो— ककसी बात का दष्ु प्रेरण । (क) उस बात को करने के लिए ककसी व्यक्‍ त को उकसाता है ; या (ि) उस बात को करने के लिए ककसी र्ड यंत्र में एक या अधधक अन्य व्यक्‍ त या व्यक्‍ तयों के साथ सक्म्मलित होता है, यहद उस र्ड यंत्र के अनुसरण में, और उस बात को करने के उद्देश्य से, कोई काय ष या अवैध िोप घहटत हो जाए ; या (ग) उस बात को ककए जाने में ककसी काय ष या अवैध िोप द्वारा जानबूझकर सहायता करता है । स्पष् टीकरण 1—कोई व्यक्‍ त, जो जानबूझकर लमथ्या ननरूपण द्वारा, या ककसी ताक्ववक तथ्य, क्जसे प्रकट करने के लिए वह आबद्ध है, जानबूझकर नछपाने द्वारा, स्वेच्छया ककसी बात का ककया जाना काररत या उपाप् त करता है, या काररत या उपाप् त करने का प्रयत् न करता है, यह कहा जाता है कक वह उस कृत्य का ककया जाना उकसाता है । दृष् टांत क, एक िोक अधधकारी, न्यायािय के वारन्ट द्वारा य को पकडने के लिए प्राधधकृत है । ख उस तथ्य को जानते हुए और यह भी जानते हुए कक ि, य, नहीं है, क को जानबूझकर यह ननरूवपत करता है कक ि, य है, और उसके द्वारा जानबूझकर क से ि को32 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पकडवाता है । यहां ख, ि के पकडे जाने का उकसाने द्वारा दष्ु प्रेरण करता है । स्पष् टीकरण 2—जो कोई या तो ककसी काय ष को ककए जाने से पूव ष या ककए जाने के समय, उस काय ष के ककए जान े को सुकर बनाने के लिए कोई बात करता है और उसके द्वारा उसके ककए जाने को सुकर बनाता है, वह उस काय ष को करने में सहायता करता है, यह कहा जाता है । दष्ु प्रेरक । 46. वह व्यक्‍त अपराध का दष्ु प्रेरण करता है, जो अपराध के ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है या ऐसे काय ष के ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है, जो अपराध होता, यहद वह काय ष अपराध करने के लिए ववधध अनुसार समथ ष व्यक्‍त द्वारा उसी आशय या ज्ञान से, जो दष्ु प्रेरक का है, ककया जाता । स्पष् टीकरण 1—ककसी काय ष के अवैध िोप का दष्ु प्रेरण अपराध की कोहट में आ सकेगा, चाहे दष्ु प्रेरक उस काय ष को करने के लिए स्वयं आबद्ध न हो । स्पष् टीकरण 2—दष्ु प्रेरण का अपराध गहठत होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कक दष्ु प्रेररत काय ष ककया जाए या अपराध गहठत करने के लिए अपेक्षित प्रभाव काररत हो । दृष् टांत (क) ि की हत्या करने के लिए ख को क उकसाता है । ख वैसा करने से इन्कार कर देता है । क हत्या करने के लिए ख के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है । (ि) घ की हत्या करने के लिए ख को क उकसाता है । ख ऐसी उकसाहट के अनुसरण में घ को घायि करता है । घ का घाव अच्छा हो जाता है । क हत्या करने के लिए ख को उकसाने का दोर्ी है । स्पष् टीकरण 3—यह आवश्यक नहीं है कक दष्ु प्रेररत व्यक्‍ त अपराध करने के लिए ववधध द्वारा समथ ष हो, या उसका वही दवूर्त आशय या ज्ञान हो, जो दष्ु प्रेरक का है, या कोई भी दवूर्त आशय या ज्ञान हो । दृष् टांत (क) क दवूर्त आशय स े एक लशशु या ववकृत्तधचत्त व्यक्‍त को वह काय ष करने के लिए दष्ु प्रेररत करता है, जो अपराध होगा, यहद वह ऐसे व्यक्‍ त द्वारा ककया जाए जो कोई अपराध करने के लिए ववधध द्वारा समथ ष है और वही आशय रिता है जो कक क का है । यहााँ, चाहे वह काय ष ककया जाए या न ककया जाए, क अपराध के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है । (ि) य की हत्या करने के आशय से ख को, जो सात वर् ष स े कम आयु का लशश ु है, वह काय ष करने के लिए क उकसाता है क्जससे य की मत्ृ यु काररत हो जाती है । ख दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप वह काय ष क की अनुपक्स्थनत में करता है और उससे य की मत्ृ यु काररत करता है । यहां यद्यवप ख वह अपराध करने के लिए ववधध द्वारा समथ ष नहीं था, तथावप क उसी प्रकार से दण्डनीय है, मानो ख वह अपराध करने के लिए ववधध द्वारा समथ ष हो और उसने हत्या की हो, और इसलिए क मत्ृ यु-दण्ड से दण्डनीय है । (ग) ख को एक ननवासगहृ में आग िगाने के लिए क उकसाता है । ख अपनी धचत्त- ववकृनत के पररणामस्वरूप उस काय ष की प्रकृनत या यह कक वह जो कुछ कर रहा है वह दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि है जानने में असमथ ष होने के कारण क के उकसान े के पररणामस्वरूप उस घर में आग िगा देता है । ख ने कोई अपराध नहीं ककया है, ककन्तु क एक ननवासगहृ में आग िगाने के अपराध के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है, और उस अपराध के लिएअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 33 उपबक्न्धत दण्ड से दण्डनीय है । (घ) क चोरी कराने के आशय से य के कब् जे में से य की सम्पवत्त िेने के लिए ख को उकसाता है । ख को यह ववश् वास करने के लिए क उत् प्रेररत करता है कक वह सम्पवत्त क की है । ख उस सम्पवत्त का इस ववश् वास से कक वह क की सम्पवत्त है, य के कब्जे में स े सद्भ ावपूवकष िे िेता है । ख इस भ्रम के अधीन काय ष करते हुए, उसे बेईमानी से नहीं िेता, और इसलिए चोरी नहीं करता ; ककन्तु क चोरी के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है, और उसी दण्ड स े दण्डनीय है, मानो ख ने चोरी की हो । स्पष् टीकरण 4—अपराध का दष्ु प्रेरण अपराध होने के कारण, ऐसे दष्ु प्रेरण का दष्ु प्रेरण भी अपराध है । दृष् टांत ि को य की हत्या करने को उकसाने के लिए ख को क उकसाता है । ख तद्नुसार य की हत्या करने के लिए ि को उकसाता है और ख के उकसाने के पररणामस्वरूप ि उस अपराध को करता है । ख अपने अपराध के लिए हत्या के दण्ड से दण्डनीय है, और क ने उस अपराध को करने के लिए ख को उकसाया, इसलिए क भी उसी दण्ड से दण्डनीय है । स्पष् टीकरण 5—र्ड यंत्र द्वारा दष्ु प्रेरण का अपराध करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कक दष्ु प्ररे क उस अपराध को करने वािे व्यक्‍ त के साथ लमिकर उस अपराध की योजना बनाए । यह पयाषप् त है कक उस र्ड यंत्र में सक्म्मलित हो, क्जसके अनुसरण में वह अपराध ककया जाता है । दृष् टांत य को ववर् देने के लिए क एक योजना ख से लमिकर बनाता है । यह सहमनत हो जाती है कक क ववर् देगा । ख तब यह वखणतष करते हुए ि को वह योजना समझा देता है कक कोई तीसरा व्यक्‍ त ववर् देगा, ककन्तु क का नाम नहीं िेता । ि ववर् उपाप् त करन े के लिए सहमत हो जाता है, और उसे उपाप् त करके समझाए गए प्रकार से प्रयोग में िाने के लिए ख को पररदत्त करता है । क ववर् देता है, पररणामस्वरूप य की मत्ृ यु हो जाती है । यहां, यद्यवप क और ि ने लमिकर र्ड यंत्र नहीं रचा है, तो भी ि उस र्ड यंत्र में सक्म्मलित रहा है, क्जसके अनुसरण में य की हत्या की गई है । इसलिए ि ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है और हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है । 47. कोई व्यक्‍ त, जो इस संहहता के अथ ष के अन्तगतष ककसी अपराध का दष्ु प्रेरण भारत से बाहर करता है, जो भारत स े बाहर और उसस े परे रहकर ककसी ऐसे काय ष के ककए जाने का भारत के अपराधों का भारत में में दष्ु प्रेरण करता है जो अपराध होगा, यहद भारत में ककया जाए । दष्ु प्रेरण । दृष् टांत क भारत में ख को, जो भ देश में ववदेशीय है, उस देश में हत्या करने के लिए उकसाता है । क हत्या के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है । 48. कोई व्यक्‍ त, जो इस संहहता के अथ ष के अन्तगतष ककसी अपराध का दष्ु प्रेरण भारत में अपराध के लिए करता है, जो भारत से बाहर और उससे परे ककसी ऐसे काय ष के ककए जाने का भारत में भारत से बाहर रहकर दष्ु प्रेरण करता है, जो अपराध होगा, यहद भारत में ककया जाए । दष्ु प्रेरण । दृष् टांत क, भ देश में ख को, भारत में हत्या करने के लिए उकसाता है । क हत्या के दष्ु प्रेरण का34 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दोर्ी है । दष्ु प्रेरण का 49. जो कोई, ककसी अपराध का दष्ु प्रेरण करता है, यहद दष्ु प्रेररत काय ष दष्ु प्रेरण के दण्ड, यहद पररणामस्वरूप ककया जाता है, और ऐसे दष्ु प्रेरण के दण्ड के लिए इस संहहता द्वारा कोई दष्ु प्रेररत काय ष अलभव्य‍ त उपबन्ध नहीं ककया गया है, तो वह उस दण्ड से दक्ण्डत ककया जाएगा, जो उस उसके पररणामस्वरूप अपराध के लिए उपबक्न्धत है । ककया जाए और स्पष् टीकरण—कोई काय ष या अपराध, दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप ककया गया तब कहा जहां कक उसके दण्ड के लिए जाता है, जब वह उस उकसाहट के पररणामस्वरूप या उस र्ड यंत्र के अनुसरण में या उस कोई अलभव्य‍त सहायता से ककया जाता है, क्जससे दष्ु प्रेरण गहठत होता है । उपबन्ध नही ं है । दृष् टांत (क) ख को लमथ्या साक्ष्य देने के लिए क उकसाता है । ख उस उकसाहट के पररणामस्वरूप, वह अपराध करता है । क उस अपराध के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है, और उसी दण्ड से दण्डनीय है, क्जससे ख है । (ि) य को ववर् देने का र्ड यंत्र क और ख रचते हैं । क उस र्ड यंत्र के अनुसरण में ववर् उपाप् त करता है और उसे ख को इसलिए पररदत्त करता है कक वह उस े य को दे । ख उस र्ड यंत्र के अनुसरण में वह ववर् क की अनुपक्स्थनत में य को देता है और उसके द्वारा य की मत्ृ यु काररत कर देता है । यहां, ख हत्या का दोर्ी है । क र्डय ंत्र द्वारा उस अपराध के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है, और वह हत्या के लिए दण्ड से दण्डनीय है । दष्ु प्रेरण का 50. जो कोई, ककसी अपराध के ककए जान े का दष्ु प्रेरण करता है, यहद दष्ु प्रेररत व्यक्‍ त दण्ड, यहद ने दष्ु प्रेरक के आशय या ज्ञान स े लभन्न आशय या ज्ञान स े वह काय ष ककया हो, तो वह उसी दष्ु प्रेररत व्यक्‍त दण्ड से दक्ण्डत ककया जाएगा, जो उस अपराध के लिए उपबक्न्धत है, जो ककया जाता, यहद दष्ु प्रेरक के आशय से लभन् न वह काय ष दष्ु प्रेरक के ही आशय या ज्ञान से, न कक ककसी अन्य आशय या ज्ञान से, ककया आशय स े काय ष जाता । करता है । दष्ु प्रेरक का 51. जब ककसी एक काय ष का दष्ु प्रेरण ककया जाता है, और कोई लभन्न काय ष ककया दानयत्व जब एक जाता है, तब दष्ु प्रेरक उस ककए गए काय ष के लिए उसी प्रकार से और उसी ववस्तार तक काय ष का दष्ु प्रेरण दानयत्व के अधीन है, मानो उसने सीधे उसी काय ष का दष्ु प्र ेरण ककया हो : ककया गया है और उससे लभन् न परन्तु यह तब जबकक ककया गया काय ष दष्ु प्रेरण का अधधसम्भाव्य पररणाम था और काय ष ककया गया उस उकसाहट के असर के अधीन या उस सहायता से या उस र्ड यंत्र के अनुसरण में ककया है । गया था क्जससे वह दष्ु प्रेरण गहठत होता है । दृष् टांत (क) एक लशश ु को य के भोजन में ववर् डािने के लिए क उकसाता है, और उस प्रयोजन से उस े ववर् पररदत्त करता है । वह लशशु उस उकसाहट के पररणामस्वरूप भूि से म के भोजन में, जो य के भोजन के पास रिा हुआ है, ववर् डाि देता है । यहां, यहद वह लशश ु क के उकसाने के असर के अधीन उस काय ष को कर रहा था, और ककया गया काय ष उन पररक्स्थनतयों में उस दष्ु प्रेरण का अधधसम्भाव्य पररणाम है, तो क उसी प्रकार और उसी ववस्तार तक दानयत्व के अधीन है, मानो उसने उस लशश ु को म के भोजन में ववर् डािने के लिए उकसाया हो । (ि) ख को य का घर जिाने के लिए क उकसाता है । ख उस घर को आग िगा देताअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 35 है और उसी समय वहां सम्पवत्त की चोरी करता है । क यद्यवप घर को जिाने के दष्ु प्रेरण का दोर्ी है, ककन्तु चोरी के दष्ु प्रेरण का दोर्ी नहीं है ; ‍योंकक वह चोरी एक अिग कायष थी और उस घर के जिाने का अधधसम्भाव्य पररणाम नहीं थी । (ग) ख और ि को बसे हुए घर में अधरष ाबत्र में िटू के प्रयोजन से भेदन करने के लिए क उकसाता है, और उनको उस प्रयोजन के लिए आयुध देता है । ख और ि वह गहृ भदे न करते हैं, और य द्वारा जो ननवालसयों में से एक है, प्रनतरोध ककए जाने पर, य की हत्या कर देते हैं । यहां, यहद वह हत्या उस दष्ु प्रेरण का अधधसम्भाव्य पररणाम थी, तो क हत्या के लिए उपबक्न्धत दण्ड से दण्डनीय है । 52. यहद वह काय,ष क्जसके लिए दष्ु प्रेरक धारा 51 के अधीन है, दष्ु प्रेररत काय ष के दष्ु प्रेरक कब दष्ु प्रेररत काय ष अनतरर‍ त ककया जाता है और वह कोई सुलभन् न अपराध गहठत करता है, तो दष्ु प्रेरक उन के लिए और अपराधों में से प्रत्येक के लिए दण्डनीय है । ककए गए काय ष के लिए दृष् टांत आकलित दण्ड ख को एक िोक सेवक द्वारा ककए गए करस्थम ् का बिपूवकष प्रनतरोध करने के लिए से दण्डनीय है । क उकसाता है । ख पररणामस्वरूप उस करस्थम ् का प्रनतरोध करता है । प्रनतरोध करने में ख करस्थम ् का ननष्पादन करने वािे अधधकारी को स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करता है । ख ने करस्थम ् का प्रनतरोध करने और स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करने के दो अपराध ककए हैं । इसलिए ख दोनों अपराधों के लिए दण्डनीय है, और यहद क यह सम्भाव्य जानता था कक उस करस्थम ् का प्रनतरोध करने में ख स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करेगा, तो क भी उनमें से प्रत्येक एक अपराध के लिए दण्डनीय होगा । 53. जब ककसी काय ष का दष्ु प्ररे ण, दष्ु प्रेरक द्वारा ककसी ववलशष् ट प्रभाव को काररत करने दष्ु प्रेररत काय ष से काररत उस के आशय से ककया जाता है और दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप, क्जस काय ष के लिए दष्ु प्र ेरक प्रभाव के लिए दानयत्व के अधीन है, वह काय ष दष्ु प्रेरक द्वारा आशनयत प्रभाव से लभन्न प्रभाव काररत करता दष्ु प्रेरक का है, तब दष्ु प्रेरक काररत प्रभाव के लिए उसी प्रकार और उसी ववस्तार तक दानयत्व के अधीन दानयत्व जो है, मानो उसने उस काय ष का दष्ु प्रेरण उसी प्रभाव को काररत करने के आशय स े ककया है, दष्ु प्रेरक द्वारा आशनयत स े परन्तु यह तब जब कक वह यह जानता था कक दष्ु प्रेररत काय ष से यह प्रभाव काररत होना लभन् न हो । सम्भाव्य है । दृष् टांत य को घोर उपहनत करने के लिए ख को क उकसाता है । ख उस उकसाहट के पररणामस्वरूप य को घोर उपहनत काररत करता है । पररणामत: य की मत्ृ यु हो जाती है । यहां, यहद क यह जानता था कक दष्ु प्रेररत घोर उपहनत से मत्ृ यु काररत होना सम्भाव्य है, तो क हत्या के लिए उपबक्न्धत दण्ड से दण्डनीय है । 54. जब कभी कोई व्यक्‍ त, जो अनुपक्स्थत होने पर दष्ु प्रेरक के नाते दण्डनीय होता, उस अपराध ककए जाते समय समय उपक्स्थत हो, जब वह काय ष या अपराध ककया जाए क्जसके लिए वह दष्ु प्रेरण के दष्ु प्रेरक की पररणामस्वरूप दण्डनीय होता, तब यह समझा जाएगा कक उसने ऐसा काय ष या अपराध ककया है । उपक्स्थनत । 55. जो कोई, मत्ृ यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध ककए जाने का दष्ु प्रेरण मत्ृ यु या आजीवन करेगा, यहद वह अपराध उस दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप न ककया जाए, और ऐसे दष्ु प्रेरण के कारावास से दण्ड के लिए कोई अलभव्य‍ त उपबन्ध इस संहहता में नहीं ककया गया है, तो वह दोनों में स े दण्डनीय अपराध ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया का दष्ु प्रेरण ।36 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; और यहद ऐसा कोई काय ष कर हदया जाए, क्जसके लिए दष्ु प्रेरक उस दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप दानयत्व के अधीन हो और क्जसस े ककसी व्यक्‍ त को उपहनत काररत हो, तो दष्ु प्र ेरक दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध चौदह वर् ष की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । दृष् टांत ख को य की हत्या करने के लिए क उकसाता है । वह अपराध नहीं ककया जाता है । यहद य की हत्या ख कर देता है, तो वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास के दण्ड से दण्डनीय होता । इसलिए, क कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय है और जुमाषने से भी दण्डनीय है ; और यहद दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप य को कोई उपहनत हो जाती है, तो वह कारावास से, क्जसकी अवधध चौदह वर् ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा और जुमाषने से भी दण्डनीय होगा । कारावास स े 56. जो कोई, कारावास स े दण्डनीय ककसी अपराध का दष्ु प्ररे ण करेगा, यहद वह अपराध दण्डनीय अपराध उस दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप न ककया जाए और ऐसे दष्ु प्रेरण के दण्ड के लिए इस संहहता का दष्ु प्रेरण । के अधीन कोई अलभव्य‍ त उपबन्ध नहीं ककया गया है, तो वह उस अपराध के लिए उपबक्न्धत ककसी भांनत के कारावास से ऐसी अवधध के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबक्न्धत दीघषतम अवधध के एक चौथाई भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुमाषने से, जो उस अपराध के लिए उपबक्न्धत है, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा ; और यहद दष्ु प्ररे क या दष्ु प्रेररत व्यक्‍ त ऐसा िोक सेवक है, क्जसका कतव्ष य ऐसे अपराध के लिए ककए जाने को ननवाररत करना है, तो वह दष्ु प्रेरक उस अपराध के लिए उपबंधधत ककसी भांनत के कारावास से ऐसी अवधध के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत दीघतष म अवधध के आधे भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुमाषने से, जो अपराध के लिए उपबंधधत है, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) लमथ्या साक्ष्य देन े के लिए ख को क उकसाता है । यहां, यहद ख लमथ्या साक्ष्य नहीं देता है, तो भी क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है, और वह तद्नुसार दण्डनीय है । (ि) क, एक पुलिस अधधकारी, क्जसका कतव्ष य िूट को ननवाररत करना है, िूट ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है । यहां, यद्यवप वह िूट नहीं की जाती, क उस अपराध के लिए उपबक्न्धत कारावास की दीघतष म अवधध के आधे से, और जुमाषने से भी, दण्डनीय है । (ग) क द्वारा, जो एक पुलिस अधधकारी है, क्जसका कतव्ष य िूट को ननवाररत करना है, उस अपराध के ककए जाने का दष्ु प्रेरण ख करता है, यहां, यद्यवप वह िूट नहीं की जाती है, ख िूट के अपराध के लिए उपबक्न्धत कारावास की दीघतष म अवधध के आधे से, और जुमाषने से भी, दण्डनीय है । जनसाधारण 57. जो कोई, जनसाधारण द्वारा, या दस से अधधक व्यक्‍ तयों की ककसी भी संख्या या द्वारा या दस से वग ष द्वारा ककसी अपराध के ककए जाने का दष्ु प्रेरण करेगा, वह दोनों में से ककसी भांनत के अधधक व्यक्‍त यों कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, और जुमाषन े स े भी दक्ण्डत ककया द्वारा अपराध ककए जान े का जाएगा । दष्ु प्रेरण ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 37 दृष् टांत क, एक िोक स्थान में एक प्िेकाड ष धचपकाता है, क्जसमें ककसी पंथ को, क्जसमें दस से अधधक सदस्य हैं, ककसी ववरोधी पंथ के सदस्यों पर, जब वे जुिूस ननकािने में िगे हुए हों, आक्रमण करने के प्रयोजन से, ककसी ननक्श् चत समय और स्थान पर लमिने के लिए उकसाया गया है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । 58. जो कोई, मत्ृ यु या आजीवन कारावास स े दंडनीय ककसी अपराध का ककया जाना मत्ृ यु या आजीवन सुकर बनाने के आशय से या यह जानते हुए संभाव्यत: उसके द्वारा सुकर बनाएगा, ऐसे कारावास से अपराध के ककए जाने की पररक्पना के अक्स्तत्व को ककसी काय ष या िोप द्वारा या ववगूढ़न दंडनीय अपराध या ककसी अन्य सूचना प्रच् छन्न साधन के उपयोग द्वारा स्वेच्छया नछपाता है या ऐसी करने की पररक्पना के बारे में ऐसा ननरूपण करता है, क्जसका लमथ्या होना वह जानता है,— पररक्पना को नछपाना । (क) यहद ऐसा अपराध कर हदया जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी ; या (ि) यहद अपराध न ककया जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । दृष् टांत क, यह जानते हुए कक ख स्थान पर डकैती पडने वािी है, मक्जस्रेट को यह लमथ्या सूचना देता है कक डकैती ि स्थान पर पडने वािी है, जो ववपरीत हदशा में है और इस आशय से कक उसके द्वारा उस अपराध का ककया जाना सुकर बनाए, मक्जस्रेट को भिु ावा देता है । डकैती पररक्पना के अनुसरण में ख स्थान पर पडती है । क इस धारा के अधीन दंडनीय है । 59. जो कोई, िोक सेवक होते हुए ककसी अपराध का ककया जाना, क्जसका ननवारण ककसी ऐस े अपराध के ककए करना ऐसे िोक सेवक के नाते उसका कतव्ष य है, सुकर बनाने के आशय से या यह जानते जाने की हुए संभाव्यत: उसके द्वारा सुकर बनाएगा, ऐसे अपराध के ककए जाने की पररक्पना के पररक्पना का अक्स्तत्व को ककसी काय ष या िोप द्वारा या ववगूढ़न या ककसी अन्य सूचना प्रच् छन्न साधन िोक सेवक के उपयोग द्वारा स्वेच्छया नछपाता है या ऐसी पररक्पना के बारे में ऐसा ननरूपण करता है, द्वारा नछपाया जाना, क्जसका क्जसका लमथ्या होना वह जानता है, ननवारण करना (क) यहद ऐसा अपराध कर हदया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत ककसी उसका कतव्ष य है । भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध ऐसे कारावास की दीघतष म अवधध के आध े तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत है, या दोनों से; या (ि) यहद वह अपराध मत्ृ यु या आजीवन कारावास स े दंडनीय है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी ; या (ग) यहद वह अपराध नहीं ककया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध ऐसे कारावास की दीघतष म अवधध की एक चौथाई तक की हो सकेगी, या ऐसे जुमाषने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत है, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत क, एक पुलिस अधधकारी, िूट ककए जाने से संबंधधत सभी पररक्पनाओं की, जो38 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उसको ज्ञात हो जाए, सूचना देने के लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए और यह जानते हुए कक ख िूट करने की पररक्पना बना रहा है, उस अपराध के ककए जाने को इस प्रकार सुकर बनाने के आशय से ऐसी सूचना देने का िोप करता है । यहां क ने ख की पररक्पना के अक्स्तत्व को ककसी अवैध िोप द्वारा नछपाया है, और वह इस धारा के उपबंध के अनसु ार दंड के लिए दायी है । कारावास स े 60. जो कोई, ककसी अपराध का ककया जाना, जो कारावास से दंडनीय है, सुकर बनाने दंडनीय अपराध के आशय से या यह जानते हुए संभाव्यत: उसके द्वारा सुकर बनाएगा, ऐसे अपराध के ककए करने की जाने की ककसी पररक्पना के अक्स्तत्व को ककसी कायष या अवैध िोप द्वारा स्वेच्छया पररक्पना को नछपाना । नछपाएगा या ऐसी पररक्पना के बारे में ऐसा ननरूपण करेगा, क्जसका लमथ्या होना वह जानता है,— (क) यहद ऐसा अपराध कर हदया जाए, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध ऐसे कारावास की दीघतष म अवधध की एक चौथाई तक की हो सकेगी ; और (ि) यहद वह अपराध नहीं ककया जाए, तो वह ऐसे कारावास से, क्जसकी अवधध ऐसे कारावास की दीघतष म अवधध के आठवें भाग तक की हो सकेगी, या ऐसे जुमाषने से, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत है, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । आपराधिक षड यंत्र के विषय में आपराधधक 61. (1) जब दो या अधधक व्यक्‍ त— र्ड यंत्र । (क) कोई अवैध काय ष ; या (ि) कोई ऐसा काय,ष जो अवधै नहीं है, अवैध साधनों द्वारा, करने या करवाने के लिए सामान्य उद्देश्य से सहमत होते हैं, तब ऐसी सहमनत आपराधधक र्ड यंत्र कहिाती है : परंतु ककसी अपराध को करने की सहमनत के लसवाय कोई सहमनत आपराधधक र्ड यंत्र तब तक न होगी, जब तक कक सहमनत के अनतरर‍त कोई काय ष उसके अनुसरण में उस सहमनत के एक या अधधक पिकारों द्वारा नहीं कर हदया जाता । स्पष् टीकरण—यह तत्वहीन है कक अवैध काय ष ऐसी सहमनत का चरम उद्देश्य है या उस उद्देश्य का आनुर्ंधगक मात्र है । (2) जो कोई,— (क) मत्ृ यु, आजीवन कारावास या दो वर् ष या उससे अधधक अवधध के कहठन कारावास स े दंडनीय कोई अपराध करने के आपराधधक र्ड यंत्र में शालमि होगा, यहद ऐसे र्ड यंत्र के दंड के लिए इस संहहता में कोई अलभव्य‍ त उपबंध नहीं है, तो वह उसी प्रकार दंडडत ककया जाएगा, मानो उसने ऐसे अपराध का दष्ु प्ररे ण ककया था ; (ि) पूवो‍ त रूप से दंडनीय ककसी अपराध को करने के आपराधधक र्ड यंत्र से लभन्न ककसी आपराधधक र्ड यंत्र में शालमि होगा, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास से अधधक की नहीं होगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 39 प्रयत्ि के विषय में 62. जो कोई, इस संहहता द्वारा आजीवन कारावास स े या कारावास स े दण्डनीय कोई आजीवन कारावास या अपराध करन े का, या ऐसा अपराध काररत ककए जाने का प्रयत् न करता है, और ऐसे प्रयत् न अन्य कारावास में अपराध करने की हदशा में कोई काय ष करता है, जहां कक ऐसे प्रयत् न के दण्ड के लिए इस से दण्डनीय संहहता द्वारा कोई अलभव्य‍ त उपबन्ध नहीं ककया गया है, वहां वह उस अपराध के लिए अपराधों को उपबक्न्धत ककसी भांनत के कारावास से उस अवधध के लिए जो, यथाक्स्थनत, आजीवन करन े का प्रयत् न करन े के लिए कारावास के आधे तक की या उस अपराध के लिए उपबक्न्धत दीघषतम अवधध के आध े तक दण्ड । की हो सकेगी या ऐसे जुमाषने से, जो उस अपराध के लिए उपबक्न्धत है, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) क, एक सन्दकू तोडकर िोिता है और उसमें से कुछ आभूर्ण चुराने का प्रयत् न करता है । सन्दकू इस प्रकार िोिने के पश् चात,् उस े ज्ञात होता है कक उसमें कोई आभूर्ण नहीं है । उसने चोरी करने की हदशा में काय ष ककया है और इसलिए, वह इस धारा के अधीन दोर्ी है । (ि) क, य की जेब में अपना हाथ डािकर य की जेब स े चुराने का प्रयत् न करता है । य की जेब में कुछ न होने के पररणामस्वरूप क अपने प्रयत् न में असफि रहता है । क इस धारा के अधीन दोर्ी है । अध्याय 5 महििा और लशशु के विरुद्ि अपरािों के विषय में िधैंिक अपरािों के विषय में 63. कोई पुरुर्,— बिात् संग । (क) ककसी महहिा की योनन, उसके मुंह, मूत्रमाग ष या गुदा में अपने लिगं का ककसी भी सीमा तक प्रवेशन करता है या उससे अपने साथ या ककसी अन्य व्यक्‍ त के साथ ऐसा कराता है ; या (ि) ककसी महहिा की योनन, मूत्रमाग ष या गुदा में ऐसी कोई वस्तु या शरीर का कोई भाग, जो लिगं न हो, ककसी भी सीमा तक अनुप्रववष् ट करता है या उससे अपने साथ या ककसी अन्य व्यक्‍ त के साथ ऐसा कराता है ; या (ग) ककसी महहिा के शरीर के ककसी भाग का इस प्रकार हस्तसाधन करता है क्जससे कक उस महहिा की योनन, मूत्रमाग,ष गुदा या शरीर के ककसी भाग में प्रवेशन काररत ककया जा सके या उससे अपने साथ या ककसी अन्य व्यक्‍ त के साथ ऐसा कराता है ; या (घ) ककसी महहिा की योनन, गुदा, मूत्रमाग ष पर अपना महुं िगाता है या उसस े अपने साथ या ककसी अन्य व्यक्‍ त के साथ ऐसा कराता है, तो उसके बारे में यह कहा जाएगा कक उसने बिात्संग ककया है, जहां ऐसा ननम् नलिखित सात भांनत की पररक्स्थनतयों में से ककसी पररक्स्थनत में ककया जाता है :— (i) उस महहिा की इच्छा के ववरुद्ध ;40 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ii) उस महहिा की सम्मनत के बबना ; (iii) उस महहिा की सम्मनत से, जबकक उसकी सम्मनत उसे या ऐसे ककसी व्यक्‍ त को, क्जससे वह हहतबद्ध है, मत्ृ यु या उपहनत के भय में डािकर अलभप्राप् त की गई है ; (iv) उस महहिा की सम्मनत से, जबकक वह पुरुर् यह जानता है कक वह उस महहिा का पनत नहीं है और उस महहिा ने सम्मनत इस कारण दी है कक वह यह ववश् वास करती है कक वह ऐसा अन्य पुरुर् है क्जससे वह ववधधपूवकष वववाहहत है या वववाहहत होने का ववश् वास करती है ; (v) उस महहिा की सम्मनत से, जब ऐसी सम्मनत देने के समय, वह धचत्त- ववकृवत्त या मत्तता के कारण या उस पुरुर् द्वारा व्यक्‍ तगत रूप से या ककसी अन्य व् यक्‍ त के माध्यम से कोई संवेदनशून्य करने वािा या अस्वास्थ्यकर पदाथ ष हदए जाने के कारण, उस बात की प्रकृनत और पररणामों को समझने में असमथ ष है, क्जसके बारे में वह सम्मनत देती है ; (vi) उस महहिा की सम्मनत से या उसके बबना, जब वह अठारह वर् ष से कम आयु की है ; (vii) जब वह महहिा सम्मनत देने में असमथ ष है । स्पष् टीकरण 1—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “योनन” के अंतगषत वहृ त्त ् भगोष्ठ भी है । स्पष् टीकरण 2—“सम्मनत” से कोई स्पष् ट स्वैक्च्छक सहमनत अलभप्रेत है, जब महहिा शब्दों, संकेतों अथवा मौखिक या अमौखिक ककसी प्रकार की संसूचना द्वारा ववननहदषष् ट िधैंगक कृत्य में भाग िेने की इच्छा व्य‍ त करती है : परंतु ऐसी महहिा के बारे में, जो प्रवेशन के कृत्य का भौनतक रूप से ववरोध नहीं करती है, मात्र इस तथ्य के कारण यह नहीं समझा जाएगा कक उसने िधैंगक कक्रयाकिाप के प्रनत सम् मनत प्रदान की है । अपिाि 1—ककसी धचककत्सीय प्रकक्रया या अंत:प्रवेशन से बिात्संग गहठत नहीं होगा । अपिाि 2—ककसी पुरुर् द्वारा अपनी पत्न ी के साथ मैथुन या िधैंगक कृत् य बिात्संग नहीं है, यहद पत् नी अठारह वर्ष से कम आयु की नहीं है । बिात् संग के 64. (1) जो कोई, उपधारा (2) में उपबंधधत मामिों के लसवाय, बिात्संग करता है, वह लिए दंड । दोनों में से ककसी भांनत के कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (2) जो कोई— (क) पुलिस अधधकारी होते हुए— (i) उस पुलिस थाने की सीमाओं के भीतर, क्जसमें ऐसा पुलिस अधधकारी ननयु‍ त है, बिात्संग करता है ; या (ii) ककसी थाने के पररसर में बिात्संग करता है ; या (iii) ऐसे पुलिस अधधकारी की अलभरिा में या ऐसे पुलिस अधधकारी के अधीनस्थ ककसी पुलिस अधधकारी की अलभरिा में, ककसी महहिा से बिात्संगअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 41 करता है ; या (ि) िोक सेवक होते हुए, ऐसे िोक सेवक की अलभरिा में या ऐस े िोक सेवक के अधीनस्थ ककसी िोक सेवक की अलभरिा में की ककसी महहिा से बिात्संग करता है ; या (ग) केंरीय या ककसी राज्य सरकार द्वारा ककसी ित्रे में अलभननयोक्जत सशस् त्र बिों का सदस्य होते हुए, उस िेत्र में बिात्संग करता है ; या (घ) तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा या उसके अधीन स्थावपत ककसी कारागार, प्रनतप्रेर्ण गहृ या अलभरिा के अन्य स्थान के या महहिाओं या लशशुओं की ककसी संस्था के प्रबंधतंत्र या कमषचाररवंदृ में होते हुए, ऐसे कारागार, प्रनतप्रेर्ण गहृ , स्थान या संस्था के ककसी अंतःवासी स े बिात्संग करता है ; या (ङ) ककसी अस्पताि के प्रबंधतंत्र या कमचष ाररवंदृ में होते हुए, उस अस्पताि में ककसी महहिा से बिात्संग करता है ; या (च) ककसी महहिा का नातेदार, संरिक या उसका अध्यापक या उसके प्रनत ववश्वास या प्राधधकार की हैलसयत में का कोई व्यक्‍ त होते हुए, उस महहिा से बिात्संग करता है ; या (छ) सांप्रदानयक या पंथीय हहसं ा के दौरान बिात्संग करता है ; या (ज) ककसी महहिा से यह जानते हुए कक वह गभवष ती है, बिात्संग करता है ; या (झ) उस महहिा स,े जो सम्मनत देने में असमथ ष है, बिात्संग करता है ; या (ञ) ककसी महहिा पर ननयंत्रण या प्रभाव रिने की क्स्थनत में होते हुए, उस महहिा से बिात्संग करता है ; या (ट) मानलसक या शारीररक असमथतष ा से िलसत ककसी महहिा स े बिात्संग करता है ; या (ठ) बिात्संग करते समय ककसी महहिा को गंभीर शारीररक अपहानन काररत करता है या अपंग बनाता है या ववरवूपत करता है या उसके जीवन को संकटापन्न करता है ; या (ड) उसी महहिा स े बार-बार बिात्संग करता है, तो वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन्तु जो आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍ त का शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,— (क) “सशस् त्र बि” स े नौसेना, सेना और वायु सेना अलभप्रेत है और इसके अंतगषत तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन गहठत सशस् त्र बिों का कोई सदस्य भी है, क्जसमें ऐसे अधसष ैननक बि और कोई सहायक बि भी सक्म्मलित हैं, जो केंरीय सरकार या राज्य सरकार के ननयंत्रणाधीन हैं ; (ि) “अस्पताि” स े अस्पताि का अहाता अलभप्रेत है और इसके अंतगतष ककसी ऐसी संस्था का अहाता भी है, जो स्वास्थ्य िाभ कर रहे व्यक्‍ तयों को या धचककत्सीय42 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— देिरेि या पुनवाषस की अपेिा रिने वािे व्यक्‍ तयों के प्रवेश और उपचार करने के लिए है ; (ग) “पुलिस अधधकारी” का वही अथ ष होगा जो पुलिस अधधननयम, 1861 के 1861 का 5 अधीन “पुलिस” पद में उसका है ; (घ) “महहिाओं या लशशुओं की संस्था” से ऐसी सस्ं था अलभप्रेत है चाहे वह अनाथािय या उपेक्षित महहिाओं या लशशुओं के लिए घर या ववधवा आश्रम या ककसी अन्य नाम से ज्ञात कोई संस्था हो, जो महहिाओं और लशशुओं को िहण करने और उनकी देिभाि करने के लिए स्थावपत और अनुरक्षित है । कनतपय मामिों 65. (1) जो कोई, सोिह वर्ष से कम आयु की ककसी महहिा से बिात्संग करता है, तो में बिात्संग के वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध बीस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन लिए दंड । कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि का कारावास अलभप्रेत होगा, तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा : परंतु ऐसा जुमाषना, पीडडता के धचककत्सीय व्ययों को पूरा करन े के लिए और उसके पुनवाषस के लिए न्यायोधचत और युक्‍तयु‍त होगा : परंतु यह और कक इस उपधारा के अधीन अधधरोवपत ककसी भी जुमाषने का संदाय पीडडता को ककया जाएगा । (2) जो कोई, बारह वर् ष से कम आयु की ककसी महहिा से बिात्संग करता है, तो वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध बीस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि का कारावास अलभप्रेत है, तक की हो सकेगी और जुमाषने से, या मत्ृ युदंड से, दंडडत ककया जाएगा : परंतु ऐसा जुमाषना, पीडडता के धचककत्सीय व्ययों को पूरा करन े के लिए और उसके पुनवाषस के लिए न्यायोधचत और युक्‍तयु‍त होगा : परंतु यह और कक इस उपधारा के अधीन अधधरोवपत ककसी भी जुमाषने का संदाय पीडडता को ककया जाएगा । पीडडता की मत्ृ य ु 66. जो कोई, धारा 64 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन दंडनीय कोई या सतत ् अपराध करता है और ऐसे अपराध के दौरान ऐसी कोई िनत पहुंचाता है, क्जससे उस महहिा ववकृतशीि दशा की मत्ृ यु काररत हो जाती है या क्जसके कारण उस महहिा की दशा सतत ् ववकृतशीि हो काररत करने के लिए दंड । जाती है, तो वह ऐसी अवधध के कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध बीस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, तक की हो सकेगी, या मत्ृ युदंड से, दंडडत ककया जाएगा । पथृ ‍ करण के 67. जो कोई, अपनी पत् नी के साथ, उसकी सम्मनत के बबना, मैथुन करेगा, जो दौरान पनत पथृ ‍ करण की ककसी डडक्री के अधीन या अन्यथा, उसस े पथृ क् रह रही है, वह दोनों में से द्वारा अपनी ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो सात वर् ष पत् नी के साथ मैथुन । तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में, “मैथुन” से धारा 63 के िंड (क) से िंड (घ) में वखणतष कोई भी कृत्य अलभप्रेत है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 43 68. जो कोई,— प्राधधकार में ककसी व् यक्‍ त (क) प्राधधकार की ककसी क्स्थनत में या ककसी वैश् वालसक संबधं में रिते हुए ; या द्वारा मैथुन । (ि) िोक सेवक होते हुए ; या (ग) तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा या उसके अधीन स्थावपत ककसी कारागार, प्रनतप्रेर्णगहृ या अलभरिा के अन्य स्थान का या महहिाओं या लशशुओं की ककसी संस्था का अधीिक या प्रबंधक होते हुए ; या (घ) अस्पताि के प्रबंधतंत्र या ककसी अस्पताि का कमचष ाररवंदृ होते हुए, ऐसी ककसी महहिा को, जो या तो उसकी अलभरिा में है या उसके भारसाधन के अधीन है या पररसर में उपक्स्थत है, अपने साथ मैथुन करने हेतु, जो बिात्संग के अपराध की कोहट में नहीं आता है, उत् प्रेररत या वविुब्ध करने के लिए ऐसी क्स्थनत या वैश् वालसक संबंध का दरुु पयोग करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन्तु जो दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण 1—इस धारा में, “मैथुन” स े धारा 63 के िंड (क) स े िंड (घ) में वखणतष कोई भी कृत्य अलभप्रेत होगा । स्पष् टीकरण 2—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, धारा 63 का स्पष् टीकरण 1 भी िाग ू होगा । स्पष् टीकरण 3—ककसी कारागार, प्रनतप्रेर्णगहृ या अलभरिा के अन्य स्थान या महहिाओं या लशशुओं की ककसी संस्था के संबंध में, “अधीिक” के अंतगतष कोई ऐसा व्यक्‍ त आता है, जो ऐसे कारागार, प्रनतप्रेर्णगहृ , स्थान या संस्था में ऐसा कोई पद धारण करता है, क्जसके आधार पर वह उसके अंतःवालसयों पर ककसी प्राधधकार या ननयंत्रण का प्रयोग कर सकता है । स्पष् टीकरण 4—“अस्पताि” और “महहिाओं या लशशुओं की संस्था” पदों का क्रमशः वही अथ ष होगा, जो धारा 64 की उपधारा (2) के स्पष् टीकरण के िंड (ि) और िंड (घ) में उनका है । 69. जो कोई, प्रवंचनापूण ष साधनों द्वारा या ककसी महहिा को वववाह करने का वचन प्रवंचनापूण ष साधनों, आहद देकर, उसे पूरा करने के ककसी आशय के बबना, उसके साथ मैथुन करता है, ऐसा मैथुन का प्रयोग करके बिात्संग के अपराध की कोहट में नहीं आता है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के ऐसी मैथुन । अवधध के कारावास से जो दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष्टीकरण—“प्रवंचनापूण ष साधनों” में, ननयोजन या प्रोन्ननत, या पहचान नछपाकर वववाह करने के लिए उत्प्रेरणा या उनका लमथ्या वचन सक्म्मलित है । 70. (1) जहां ककसी महहिा से, एक या अधधक व्यक्‍ तयों द्वारा, एक समूह गहठत सामूहहक करके या सामान्य आशय को अिसर करने में काय ष करते हुए बिात्संग ककया जाता है, वहां बिात् संग । उन व्यक्‍ तयों में से प्रत्येक के बारे में यह समझा जाएगा कक उसने बिात्संग का अपराध ककया है और वह ऐसी अवधध के कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध बीस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने स े भी44 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दंडनीय होगा : परंतु ऐसा जुमाषना पीडडता के धचककत्सीय व्ययों को पूरा करने के लिए और पुनवाषस के लिए न्यायोधचत और युक्‍ तयु‍ त होगा : परंतु यह और कक इस उपधारा के अधीन अधधरोवपत ककसी भी जुमाषने का संदाय पीडडता को ककया जाएगा । (2) जहां अठारह वर् ष स े कम आयु की ककसी महहिा स े एक या अधधक व्यक्‍तयों द्वारा, एक समूह गहठत करके या सामान्य आशय को अिसर करने में काय ष करते हुए, बिात्संग ककया जाता है, वहां उन व्यक्‍तयों में से प्रत्येक के बारे में यह समझा जाएगा कक उसने बिात्संग का अपराध ककया है और वह आजीवन कारावास से, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत है, और जुमाषने से, या मत्ृ युदंड से, दंडनीय होगा : परन्तु ऐसा जुमाषना पीडडता के धचककत्सीय व्ययों को पूरा करने के लिए और पुनवाषस के लिए न्यायोधचत और युक्‍तयु‍त होगा : परन्तु यह और कक इस उपधारा के अधीन अधधरोवपत ककसी भी जुमाषने का सदं ाय पीडडता को ककया जाएगा । पुनराववृत्तकताष 71. जो कोई, धारा 64 या धारा 65 या धारा 66 या धारा 70 के अधीन दंडनीय ककसी अपराधधयों के अपराध के लिए पूव ष में दोर्लसद्ध ककया गया है और तत्पश् चात ् उ‍ त धाराओं में से ककसी के लिए दंड । अधीन दंडनीय ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध ठहराया जाता है, तो वह आजीवन कारावास से, क्जससे उस व्यक्‍ त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, या मत्ृ युदंड से, दंडडत ककया जाएगा । कनतपय 72. (1) जो कोई, ककसी नाम या अन्य बात को, क्जससे ककसी ऐसे व्यक्‍ त की (क्जसे अपराधों, आहद इस धारा में इसके पश् चात ् पीडडत व्यक्‍ त कहा गया है) पहचान हो सकती है, क्जसके ववरुद्ध स े पीडडत धारा 64 या धारा 65 या धारा 66 या धारा 67 या धारा 68 या धारा 69 या धारा 70 या व्यक्‍ त की पहचान का धारा 71 के अधीन ककसी अपराध का ककया जाना अलभकधथत है या ककया गया पाया गया प्रकटीकरण । है, मुहरत या प्रकालशत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से दंडडत ककया जाएगा, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, और जुमाषने का भी दायी होगा । (2) उपधारा (1) की ककसी भी बात का ववस्तार, ककसी नाम या अन्य बात के मुरण या प्रकाशन पर, यहद उसस े पीडडत व्यक्‍ त की पहचान हो सकती है, तब नहीं होता है जब ऐसा मुरण या प्रकाशन— (क) पुलिस थाने के भारसाधक अधधकारी के या ऐसे अपराध का अन्वेर्ण करने वािे पुलिस अधधकारी के, जो ऐस े अन्वेर्ण के प्रयोजन के लिए सद् भावपूवकष काय ष करता है, द्वारा या उसके लिखित आदेश के अधीन ककया जाता है ; या (ि) पीडडत व्यक्‍ त द्वारा या उसके लिखित प्राधधकार से ककया जाता है ; या (ग) जहां पीडडत व्यक्‍ त की मत्ृ यु हो चुकी है या वह लशशु या ववकृत धचत्त है, वहां, पीडडत व्यक्‍ त के ननकट संबंधी द्वारा या उसके लिखित प्राधधकार से ककया जाता है : परन्तु ननकट संबंधी द्वारा कोई भी ऐसा प्राधधकार, ककसी मान्यताप्राप् त क्याण संस्था या संगठन के अध्यि या सधचव, चाहे उसका जो भी नाम हो, से लभन्न ककसी अन्य व्यक्‍ तअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 45 को नहीं हदया जाएगा । स्पष् टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, “मान्यताप्राप् त क्याण संस्था या संगठन” से केन्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में मान्यताप्राप् त कोई समाज क्याण संस्था या संगठन अलभप्रेत है । 73. जो कोई, धारा 72 में ननहदषष् ट ककसी अपराध की बाबत ककसी न्यायािय के समि अनुमनत के बबना न्यायािय ककसी कायवष ाही के संबंध में, कोई बात उस न्यायािय की पूव ष अनुमनत के बबना मुहरत या की कायवष ाहहयों प्रकालशत करता है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास स े दंडडत ककया जाएगा, से संबधंधत क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, और जुमाषने का भी दायी होगा । ककसी मामि े का मुरण या स्पष् टीकरण—ककसी उच् च न्यायािय या उच् चतम न्यायािय के ननणयष का मुरण या प्रकाशन प्रकाशन, इस धारा के अथ ष के अंतगतष अपराध की कोहट में नहीं आता है । करना । महििा के विरूद्ि आपराधिक बि और िमिे के विषय में 74. जो कोई, ककसी महहिा की िज् जा भंग करने के आशय से या यह सम् भाव् य महहिा की िज् जा भंग जानते हुए कक उसके द्वारा वह उसकी िज् जा भंग करेगा, उस महहिा पर हमिा करता है करने के आशय या आपराधधक बि का प्रयोग करता है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से दंडडत से उस पर ककया जाएगा, क्जसकी अवधध एक वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन् त ु जो पांच वर् ष तक की हो हमिा या सकेगी, और जुमाषने का भी दायी होगा । आपराधधक बि का प्रयोग । 75. (1) कोई पुरूर्, ननम्नलिखित कृत्यों में से कोई कृत्य, अथाषत ् :— िधैंगक उत् पीडन । (i) शारीररक स् पश ष और अिकक्रयाएं करता है, क्जनमें अवांछनीय और स्पष्ट िधैंगक संबंध बनाने का प्रस्ताव अंतवलषित है ; या (ii) िधैंगक स्वीकृनत के लिए कोई मांग या अनुरोध करता है ; या (iii) ककसी महहिा की इच्छा के ववरुद्ध अश् िीि साहहत्य हदिाता है ; या (iv) िधैंगक आभासी हटप्पखणयां करता है, तो वह िधैंगक उत्पीडन के अपराध का दोर्ी होगा । (2) कोई पुरुर्, जो उपधारा (1) के िंड (i) या िंड (ii) या िंड (iii) में ववननहदषष् ट अपराध करता है, तो वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (3) कोई पुरुर्, जो उपधारा (1) के िंड (iv) में ववननहदषष् ट अपराध करता है, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 76. जो कोई, ककसी महहिा को वववस् त्र करने या ननवस्ष त्र होने के लिए बाध्य करने के वववस् त्र करने के आशय स े आशय से उस पर हमिा करता है या उसके प्रनत आपराधधक बि का प्रयोग करता है या ऐस े महहिा पर कृत्य का दष्ु प्रेरण करता है, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध हमिा या तीन वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा आपराधधक बि और जुमाषने का भी दायी होगा । का प्रयोग । 77. जो कोई, ककसी ननजी काय ष में िगी हुई ककसी महहिा को, उन पररक्स्थनतयों में, दृश् यरनतकता । क्जनमें वह प्रायः यह प्रत्याशा करती है कक उस े देिा नहीं जा रहा है, एकटक देिता है या46 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उस कृत् य में लिप् त व् यक्‍ त या उस कृत् य में लिप् त व् यक्‍ त के कहने पर कोई अन्य व् यक्‍ त उसका धचत्र िींचता है या उस धचत्र को प्रसाररत करता है, तो प्रथम दोर्लसद्धध पर, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष स े कम की नहीं होगी, ककंत ु जो तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा और द्ववतीय या पश् चात व् ती ककसी दोर्लसद्धध पर, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंत ु जो सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण 1—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “ननजी काय”ष के अंतगतष ताकने का कोई ऐसा कृत् य आता है जो ऐसे ककसी स्थ ान में ककया जाता है, क्जसके संबंध में, पररक्स्थनतयों के अधीन, युक्‍ तयु‍ त रूप से यह प्रत्याशा की जाती है कक वहां एकांतता होगी और जहां कक पीडडता के जननांगों, ननतंबों या विस्थिों को अलभदलशतष ककया जाता है या केवि अधोवस् त्र स े ढका जाता है या जहा ं पीडडता ककसी शौचघर का प्रयोग कर रही है ; या जहां पीडडता ऐसा कोई िधैंगक कृत्य कर रही है जो ऐसे प्रकार का नहीं है जो साधारणतया सावजष ननक तौर पर ककया जाता है । स्पष् टीकरण 2—जहां पीडडता, धचत्रों या ककसी अलभनय के धचत्र को िींचने के लिए सहमनत देती है, ककन्तु अन्य व्यक्‍ तयों को उन्हें प्रसाररत करने की सहमनत नहीं देती है और जहां उस धचत्र या अलभनय का प्रसारण ककया जाता है वहां ऐसे प्रसारण को इस धारा के अधीन अपराध माना जाएगा । पीछा करना । 78. (1) ऐसा कोई पुरुर्, जो— (i) ककसी महहिा का, उससे व्यक्‍ तगत अन्योन्यकक्रया को आगे बढ़ाने के लिए, उस महहिा द्वारा स्पष् ट रूप से अननच्छा उपदलशतष ककए जाने के बावजूद, बारंबार पीछा करता है और स् पश ष करता है या स् पश ष करने का प्रयत् न करता है ; या (ii) ककसी महहिा द्वारा इंटरनेट, ई-मेि या ककसी अन्य प्ररूप की इिै‍राननक संसूचना का प्रयोग ककए जाने को मानीटर करता है, पीछा करने का अपराध करता है : परंतु ऐसा आचरण पीछा करने की कोहट में नहीं आएगा, यहद वह पुरुर्, जो ऐसा करता है, यह साबबत कर देता है कक— (i) ऐसा काय ष अपराध के ननवारण या पता िगाने के प्रयोजन के लिए ककया गया था और पीछा करने वािे अलभयु‍ त पुरुर् को राज्य द्वारा उस अपराध के ननवारण और पता िगाने का उत्तरदानयत्व सौंपा गया था ; या (ii) ऐसा काय ष ककसी ववधध के अधीन ककया गया था या ककसी ववधध के अधीन ककसी व्यक्‍ त द्वारा अधधरोवपत ककसी शत ष या अपेिा का पािन करने के लिए ककया गया था ; या (iii) ववलशष् ट पररक्स्थनतयों में ऐसा आचरण युक्‍ तयु‍ त और न्यायोधचत था । (2) जो कोई, पीछा करने का अपराध काररत करता है, तो प्रथम दोर्लसद्धध पर, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; और द्ववतीय या पश् चात व् ती ककसी दोर्लसद्धध पर, दोनों में से ककसी भी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी,अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 47 दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 79. जो कोई, ककसी महहिा की िज् जा का अनादर करन े के आशय से कोई शब्द शब्द, अगं वविेप कहता है, कोई ध्वनन या अंगवविेप करता है, या कोई वस्त ु ककसी रूप में प्रदलशतष करता है, या काय,ष जो ककसी महहिा इस आशय से कक ऐसी महहिा द्वारा ऐसा शब्द या ध्वनन सुनी जाए, या ऐसा अंगवविेप या की िज् जा का वस्तु देिी जाए, या ऐसी महहिा की एकान्तता का अनतक्रमण करता है, वह साधारण अनादर करने कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, और जुमाषने से भी दक्ण्डत ककया के लिए जाएगा । आशनयत है। वििाि से संबंधित अपरािों के विषय में 80. (1) जहां ककसी महहिा की मत्ृ यु ककसी दाह या शारीररक िनत द्वारा काररत की दहेज मत्ृ यु । जाती है या उसके वववाह के सात वर् ष के भीतर सामान्य पररक्स् थनतयों से अन्य था हो जाती है और यह दलशतष ककया जाता है कक उसकी मत्ृ यु के कुछ पूव ष उसके पनत द्वारा या उसके पनत के ककसी नातेदार द्वारा, दहेज की ककसी मांग के लिए, या उसके संबंध में, उसके साथ क्रूरता की थी या उसे तंग ककया था, वहां ऐसी मत्ृ यु को “दहेज मत्ृ य”ु कहा जाएगा, और ऐसा पनत या नातेदार उसकी मत्ृ यु काररत करने वािा समझा जाएगा । स् पष् टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, “दहेज” का वही अथ ष है, जो दहेज 1961 का 28 प्रनतर्ेध अधधननयम, 1961 की धारा 2 में है । (2) जो कोई दहेज मत्ृ यु काररत करेगा वह कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष स े कम की नहीं होगी, ककन् तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा । 81. प्रत्येक पुरुर्, ककसी ऐसी महहिा को, जो ववधधपूवकष उससे वववाहहत न हो, प्रवंचना ववधधपूण ष वववाह से यह ववश् वास काररत कराता है कक वह ववधधपूवषक उससे वववाहहत है और इस ववश् वास में की प्रवंचना से ववश् वास उस महहिा से, अपने साथ सहवास या मैथुन काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भानंत उत् प्ररेरत करने के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और वािे पुरुर् जुमाषने का भी दायी होगा । द्वारा काररत सहवास । 82. (1) जो कोई, पनत या पत्न ी के जीववत रहत े हुए ऐसी दशा में वववाह करता है पनत या पत् नी के जीवनकाि क्जसमें ऐसा वववाह इस कारण से शून्य है कक वह ऐसे पनत या पत् नी के जीवनकाि में होता में पुनः वववाह है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, करना । दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । अपिाि—इस उपधारा का ववस्तार ककसी ऐस े व्यक्‍ त पर नहीं है, क्जसका ऐसे पनत या पत्न ी के साथ वववाह सिम अधधकाररता के न्यायािय द्वारा शून्य घोवर्त कर हदया गया है, और न ही ककसी ऐसे व्यक्‍ त पर है, जो पूव ष पनत या पत् नी के जीवनकाि में वववाह कर िेता है, यहद ऐसा पनत या पत्न ी उस पश् चात व् ती वववाह के समय ऐसे व्यक्‍ त से सात वर्ष तक ननरन्तर दरू रहा है, और उस समय के भीतर ऐसे व्यक्‍ त द्वारा यह नहीं सुना गया है कक वह जीववत है, परन्तु यह तब जब कक ऐसा पश् चात व् ती वववाह करने वािा व्यक्‍ त उस वववाह के होने से पूव ष उस व्यक्‍ त को, क्जसके साथ ऐसा वववाह होता है, तथ्यों की वास्तववक क्स्थनत की जानकारी, जहां तक कक उनका ज्ञान उसको हो, से अवगत करा दे । (2) जो कोई, अपने पूव ष वववाह के तथ्य को उस व्यक्‍ त से नछपाकर, उससे पश् चातव ् ती48 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— वववाह करता है, वह उपधारा (1) के अधीन अपराध करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जमु ाषने का भी दायी होगा । ववधधपूण ष वववाह 83. जो कोई, बेईमानी से या कपटपूण ष आशय से वववाहहत होने का कम ष यह जानते के बबना हुए पूरा करता है कक उसके द्वारा वह ववधधपूवकष वववाहहत नहीं हुआ है, वह दोनों में से कपटपूवकष वववाह ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया कम ष पूरा कर िेना । जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । वववाहहत महहिा 84. जो कोई, ककसी महहिा को, जो ककसी अन्य पुरुर् की पत् नी है, और क्जसका अन्य को आपराधधक पुरुर् की पत् नी होना वह जानता है, या ववश् वास करने का कारण रिता है, इस आशय से ि े आशय स े जाता है, या फुसिाकर िे जाता है कक वह ककसी व्यक्‍ त के साथ अनुधचत संभोग करे या फुसिाकर ि े जाना, या इस आशय से ऐसी ककसी महहिा को नछपाता है या ननरुद्ध करता है, वह दोनों में से ककसी ननरुद्ध रिना । भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । ककसी महहिा के 85. जो कोई, ककसी महहिा का पनत या पनत का नातेदार होते हुए, ऐसी महहिा के पनत या पनत के प्रनत क्रूरता करेगा, वह कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत नातेदार द्वारा ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । उसके प्रनत क्रूरता करना । क्रूरता की 86. धारा 85 के प्रयोजनों के लिए, “क्रूरता” से अलभप्रेत है— पररभार्ा । (क) जानबूझकर ककया गया कोई आचरण, जो ऐसी प्रकृनत का है, क्जससे महहिा को आत्महत्या करने के लिए प्रेररत करने की या उस महहिा के जीवन, अंग या स्वास्थ्य की (चाहे मानलसक हो या शारीररक) गंभीर िनत या ितरा काररत करने की सम्भावना है ; या (ि) ककसी महहिा को तंग करना, जहां उसे या उससे सम्बक्न्धत ककसी व्यक्‍ त को ककसी सम्पवत्त या मू्यवान प्रनतभूनत के लिए ककसी ववधधववरुद्ध मांग को पूरा करने के लिए प्रपीडडत करने की दृक्ष्ट स े या उसके द्वारा या उससे संबंधधत ककसी व्यक्‍ त द्वारा ऐसी मांग को पूरा करने में असफि रहने के कारण, इस प्रकार तंग ककया जा रहा है । वववाह, आहद के 87. जो कोई, ककसी महहिा का व्यपहरण या अपहरण उसकी इच् छा के ववरुद्ध ककसी करने को वववश व् यक्‍ त से वववाह करने के लिए उस महहिा को वववश करने के आशय स े या वह वववश की करने के लिए जाएगी, यह सम् भाव् य जानते हुए या अनुधचत संभोग करने के लिए उस महहिा को वववश या ककसी महहिा का व्यपहरण करना, वविुब्ध करने के लिए या वह महहिा अनुधचत संभोग करने के लिए वववश या वविुब् ध की अपहरण करना जाएगी यह संभाव् य जानते हुए करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, या उत् प्रेररत क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी करना । होगा ; और जो कोई, ककसी महहिा को ककसी अन्य व् यक्‍ त से अनुधचत संभोग करने के लिए वववश या वविब्ु ध करने के आशय स े या वह वववश या वविुब्ध की जाएगी यह संभाव् य जानते हुए इस संहहता में यथापररभावर्त आपराधधक अलभत्रास द्वारा या प्राधधकार के दरुु पयोग या वववश करने के अन् य साधन द्वारा उस महहिा को ककसी स् थान स े जाने को उत् प्रेररत करता है, वह भी पूवो‍ त प्रकार से दक्ण्ड त ककया जाएगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 49 िभपभ ात, आहि काररत करिे के विषय में 88. जो कोई, गभवष ती महहिा का स् वेच् छया गभपष ात काररत करता है, यहद ऐसा गभपष ात काररत करना । गभपष ात उस महहिा का जीवन बचाने के प्रयोजन से सद् भावपूवकष काररत न ककया जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा, और यहद वह महहिा स् पन्द नगभाष हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स् पष् टीकरण—जो महहिा स् वयं अपना गभपष ात काररत करती है, वह इस धारा के अथष के अन्त गतष आती है । 89. जो कोई, महहिा की सम्म नत के बबना, चाहे वह महहिा स् पन्द नगभाष हो या नहीं, महहिा की सम् मनत के धारा 88 के अधीन अपराध काररत करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी बबना गभपष ात भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा, और काररत करना । जुमाषने का भी दायी होगा । 90. (1) जो कोई, गभवष ती महहिा का गभपष ात काररत करने के आशय स े कोई ऐसा गभपष ात काररत करने के आशय काय ष करता है, क्जससे उस महहिा की मत्ृ यु काररत हो जाती है, वह दोनों में से ककसी भांनत से ककए गए के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और काय ष द्वारा जुमाषने का भी दायी होगा । काररत मत्ृ यु । (2) जहां उपधारा (1) में ननहदषष्ट कायष उस महहिा की सम् मनत के बबना ककया जाता है, वह आजीवन कारावास से, या उ‍त उपधारा में ववननहदषष्ट दण्ड से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । स् पष् टीकरण—इस अपराध के लिए यह आवश् यक नहीं है कक अपराधी जानता हो कक उस काय ष से मत्ृ यु काररत करना संभाव् य है । 91. जो कोई, ककसी लशशु के जन्म से पूव ष कोई काय ष इस आशय से करता है कक उस लशश ु का जीववत पैदा लशशु का जीववत पैदा होना उसके द्वारा रोका जाए या जन्म के पश् चात ् उसके द्वारा उसकी होना रोकने या मत्ृ यु काररत हो जाए, और ऐसे काय ष से उस लशशु का जीववत पैदा होना रोकता है, या उसके जन् म के जन्म के पश् चात ् उसकी मत्ृ यु काररत कर देता है, यहद वह काय ष माता के जीवन को बचाने पश् चात ् उसकी के प्रयोजन से सद्भ ावपूवकष नहीं ककया गया है, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास मत्ृ यु काररत करने के आशय से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने स,े या दोनों से, दक्ण्ड त ककया से ककया गया जाएगा । काय ष । 92. जो कोई, ऐसा कोई कायष ऐसी पररक्स् थनतयों में करता है कक यहद वह उसके द्वारा ऐसे काय ष द्वारा जो आपराधधक मत्ृ यु काररत कर देता, तो वह आपराधधक मानव वध का दोर्ी होता और ऐसे काय ष द्वारा मानव वध की ककसी सजीव अजात लशशु की मत्ृ यु काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कोहट में आता कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा, और जुमाषने है, ककसी सजीव का भी दायी होगा । अजात लशश ु की मत्ृ यु काररत करना । दृष् टांत क, यह सम् भाव् य जानते हुए कक वह गभवष ती महहिा की मत्ृ य ु काररत कर दे, ऐसा काय ष करता है, जो यहद उससे उस महहिा की मत्ृ यु काररत हो जाती, तो वह आपराधधक50 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— मानव वध की कोहट में आता । उस महहिा को िनत होती है, ककन् त ु उसकी मत्ृ यु नहीं होती, ककन् तु उसके द्वारा उस अजात सजीव लशशु की मत्ृ यु हो जाती है, जो उसके गभ ष में है । क इस धारा में पररभावर्त अपराध का दोर्ी है । लशशु के विरुद्ि अपरािों के विषय में लशश ु के वपता 93. जो कोई, बारह वर् ष से कम आयु के लशशु का वपता या माता होते हुए, या ऐस े या माता या लशशु की देिरेि का भार रिते हुए, ऐसे लशशु का पूणतष : पररत् याग करने के आशय से उस उसकी देिरेि लशशु को ककसी स् थान में अरक्षित डाि देगा या छोड देगा, वह दोनों में स े ककसी भांनत के करने वािे व् यक्‍ त द्वारा कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से या दोनों से, दक्ण्ड त बारह वर् ष स े कम ककया जाएगा । आयु के लशश ु को अरक्षित डाि स् पष् टीकरण—यहद लशशु अरक्षित डाि हदए जाने के पररणामस् वरूप मर जाए, तो, देना और यथाक्स् थनत, हत् या या आपराधधक मानव वध के लिए अपराधी का ववचारण ननवाररत करना पररत्य ाग इस धारा से आशनयत नहीं है । करना । मतृ शरीर के 94. जो कोई, ककसी लशशु के मतृ शरीर को गुप् त रूप से गाडकर या अन् यथा उसका गुप्त व्ययन व् ययन करके, चाहे ऐसे लशशु की मत्ृ यु उसके जन्म से पूव ष या पश् चात ् या जन् म के दौरान द्वारा जन् म को नछपाना । हुई हो, ऐसे लशशु के जन्म को साशय नछपाता है या नछपाने का प्रयास करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । अपराध काररत 95. जो कोई, ककसी अपराध को काररत करने के लिए ककसी लशशु को भाडे पर िेता है, करने के लिए ननयोक्जत करता है या ननयु‍त करता है, तो वह ककसी भी भांनत के कारावास से, जो तीन लशश ु को भाड े पर िेना, वर् ष से कम का नहीं होगा, ककंतु जो दस वर् ष तक का हो सकेगा और जुमाषने से भी दंडनीय ननयोक्जत करना होगा ; और यहद अपराध काररत ककया जाता है तो, वह उस अपराध के लिए उपबंधधत दंड या ननयु‍त से भी दंडडत ककया जाएगा, मानो ऐसा अपराध ऐसे व्यक्‍त ने स्वयं ककया हो । करना । स्पष्टीकरण—िधैंगक शोर्ण या अश्िीि साहहत्य के लिए लशशु को भाडे पर िेना, ननयोजन करना, ननयु‍त करना या उपयोग करना, इस धारा के अथ ष के अंतगतष आता है । लशश ु का 96. जो कोई, ककसी लशश ु को अन्य व् यक्‍ त से अनुधचत संभोग करने के लिए वववश उपापन । या वविुब् ध करने के आशय से या उसके द्वारा वववश या वविुब् ध ककया जाएगा, यह सम् भाव् य जानते हुए ऐसे लशशु को ककसी स् थान से जाने को या कोई काय ष करने को ककसी भी साधन द्वारा उत् प्रेररत करेगा, वह कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने के लिए भी दायी होगा । दस वर् ष स े कम 97. जो कोई, दस वर् ष से कम आयु के ककसी लशशु का इस आशय से व्यपहरण या आयु के लशश ु के अपहरण करता है कक ऐसे लशशु के शरीर पर स े कोई चि संपवत्त बेईमानी से ि े िे, वह दोनों शरीर पर स े में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण् डत ककया चोरी करने के आशय स े उसका जाएगा और जुमाषने के लिए भी दायी होगा । व्यपहरण या अपहरण । वेश् याववृत्त, आहद 98. जो कोई, ककसी लशश ु को इस आशय से कक ऐसा लशशु ककसी भी आयु में के प्रयोजन के वेश् याववृत्त या ककसी व् यक्‍ त से अनुधचत संभोग करने के लिए या ककसी ववधधववरुद्ध और लिए लशश ु को दरु ाचाररक प्रयोजन के लिए काम में िाया जाए या उपयोग ककया जाए या यह सभं ाव्य बेचना ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 51 जानते हुए कक ऐसा लशशु ककसी भी आयु में ऐसे प्रयोजन के लिए काम में िाया जाएगा या उपयोग ककया जाएगा, बेचता है, भाडे पर देता है या अन्यथा व्ययननत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने के लिए भी दायी होगा । स् पष् टीकरण 1—जब अठारह वर् ष से कम आयु की ककसी महहिा को, ककसी वेश् या या ककसी अन्य ऐसे व्यक्‍ त को, जो वेश् याघर चिाता है या उसका प्रबंध करता है, बेचा जाए, भाडे पर हदया जाए या अन्य था व् ययननत ककया जाए, तब इस प्रकार ऐसी महहिा को व् ययननत करने वािे व् यक्‍ त के बारे में, जब तक कक प्रनतकूि साबबत न कर हदया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कक उसने उसको इस आशय स े व्ययननत ककया है कक वह वेश् याववृत्त के प्रयोजन के लिए उपयोग में िाई जाएगी । स् पष् टीकरण 2—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “अनुधचत संभोग” से ऐसे व् यक्‍ तयों के बीच मैथुन अलभप्रेत है, जो वववाह द्वारा संयु‍ त नहीं हैं, या ऐसे ककसी संयोग या बन्ध न स े संयु‍ त नहीं हैं जो यद्यवप वववाह की कोहट में तो नहीं आता तथावप उस समुदाय की, क्जसके वे हैं या यहद वे लभन् न समुदायों के हैं तो ऐसे दोनों समुदायों की, वैयक्‍तक ववधध या रूहढ द्वारा उनके बीच में वववाह-सदृश सम् बन्ध को मान्य ककया जाता है । 99. जो कोई, ककसी लशशु को इस आशय से कक ऐसा लशशु ककसी भी आयु में वेश् याववृत्त, आहद के प्रयोजनों के वेश् याववृत्त या ककसी व् यक्‍ त से अनुधचत संभोग करने के लिए या ककसी ववधधववरुद्ध और लिए लशशु को अनैनतक प्रयोजन के लिए काम में िाया जाए या उपयोग ककया जाए या यह सम् भाव् य िरीदना । जानते हुए कक ऐसा व् यक्‍ त, ककसी भी आयु में ऐस े ककसी प्रयोजन के लिए काम में िाया जाएगा या उपयोग ककया जाएगा, िरीदता है, भाडे पर िेता है, या अन्य था उसका कब् जा अलभप्राप् त करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष से कम नहीं होगी, ककंतु चौदह वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स् पष् टीकरण 1—अठारह वर् ष से कम आयु की ककसी महहिा को िरीदने वािी, भाडे पर िेने वािी या अन्य था उसका कब् जा अलभप्राप् त करने वािी ककसी वेश् या के या वेश् याघर चिाने या उसका प्रबन् ध करने वािे ककसी व् यक्‍ त के बारे में, जब तक कक प्रनतकूि साबबत न कर हदया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कक ऐसी महहिा का कब् जा उसने इस आशय से अलभप्राप् त ककया है कक वह वेश् याववृत्त के प्रयोजन के लिए उपयोग में िाई जाएगी । स् पष् टीकरण 2—“अनुधचत संभोग” का वही अथ ष है, जो धारा 98 में है । अध् याय 6 मािि शरीर पर प्रभाि डाििे िािे अपरािों के विषयों में जीिि पर प्रभाि डाििे िािे अपरािों के विषय में 100. जो कोई, मत्ृ यु काररत करने के आशय से, या ऐसी शारीररक िनत काररत करने आपराधधक मानव वध । के आशय से, क्जसस े मत्ृ यु काररत हो जाना सम् भाव् य है, या यह ज्ञान रिते हुए कक यह सम् भाव् य है कक वह उस काय ष से मत्ृ यु काररत कर दे, कोई काय ष करके, मत्ृ यु काररत कर देता है, वह आपराधधक मानव वध का अपराध करता है । दृष् टांत (क) क एक गडढे पर िकडडयां और घास इस आशय से बबछाता है कक उसके द्वारा52 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— मत्ृ यु काररत करे या यह ज्ञान रिते हुए बबछाता है कक सम् भाव् य है कक उसके द्वारा मत्ृ यु काररत हो । य यह ववश् वास करते हुए कक वह भूलम सुदृढ़ है उस पर चिता है, उसमें धगर पडता है और मारा जाता है । क ने आपराधधक मानव वध का अपराध ककया है । (ि) क यह जानता है कक य एक झाडी के पीछे है । ख यह नहीं जानता । य की मत्ृ यु करने के आशय से या यह जानते हुए कक उससे य की मत्ृ यु काररत होना सम् भाव् य है, ख को उस झाडी पर गोिी चिाने के लिए क उत् प्रेररत करता है । ख गोिी चिाता है और य को मार डािता है । यहां यह हो सकता है कक ख ककसी भी अपराध का दोर्ी न हो, ककन् तु क ने आपराधधक मानव वध का अपराध ककया है । (ग) क एक मुगे को मार डािने और उसे चुरा िेने के आशय से उस पर गोिी चिाकर ख को, जो एक झाडी के पीछे है, मार डािता है, ककन् त ु क यह नहीं जानता था कक ख वहां है । यहां, यद्यवप क ववधधववरुद्ध काय ष कर रहा था, तथावप, वह आपराधधक मानव वध का दोर्ी नहीं है ‍ योंकक उसका आशय ख को मार डािने का, या कोई ऐसा काय ष करके, क्जससे मत्ृ यु काररत करना वह सम् भाव् य जानता हो, मत्ृ यु काररत करने का नहीं था । स् पष् टीकरण 1—कोई व् यक्‍ त, जो ककसी दसू रे व् यक्‍ त को, जो ककसी ववकार, रोग या अंगशैधथ्य से िस् त है, शारीररक िनत काररत करता है और उसके द्वारा उस दसू रे व् यक्‍ त की मत्ृ यु त् वररत कर देता है, उसकी मत्ृ यु काररत करता है, यह समझा जाएगा । स् पष् टीकरण 2—जहां शारीररक िनत स े मत्ृ यु काररत की गई हो, वहां क्जस व् यक्‍ त ने, ऐसी शारीररक िनत काररत की हो, उसन े वह मत्ृ यु काररत की है, यह समझा जाएगा, यद्यवप उधचत उपचार और कौशिपूण ष धचककत् सा करने से वह मत्ृ य ु रोकी जा सकती थी । स् पष् टीकरण 3—मां के गभ ष में क्स् थत ककसी लशशु की मत्ृ य ु काररत करना मानव वध नहीं है । ककन् तु ककसी जीववत लशशु की मत्ृ यु काररत करना आपराधधक मानव वध की कोहट में आ सकेगा, यहद उस लशशु का कोई भाग बाहर ननकि आया हो, यद्यवप उस लशशु ने श् वास नहीं िी हो या उसने पणू तष : जन्म न लिया हो । हत् या । 101. इसमें इसके पश् चात,् अपवाहदत दशाओं को छोडकर, आपराधधक मानव वध हत् या है,— (क) यहद वह काय,ष क्जसके द्वारा मत्ृ यु काररत की गई है, मत्ृ यु काररत करने के आशय से ककया गया है ; या (ि) यहद वह काय,ष क्जसके द्वारा मत्ृ यु काररत की गई है, वह ऐसी शारीररक िनत काररत करने के आशय से ककया गया है, क्जसे अपराधी जानता है कक उस व् यक्‍ त को मत्ृ यु काररत करना सम् भाव् य है, क्जसको वह अपहानन काररत की गई है ; या (ग) यहद वह काय,ष क्जसके द्वारा मत्ृ यु काररत की गई है, वह ककसी व् यक्‍ त को शारीररक िनत काररत करने के आशय से ककया गया है और वह शारीररक िनत, क्जसे काररत करने का आशय हो, प्रकृनत के साधारण अनुक्रम में मत्ृ य ु काररत करने के लिए पयाषप् त है ; या (घ) यहद वह काय,ष क्जसके द्वारा मत्ृ यु काररत की गई है, करने वािा व् यक्‍ त यह जानता है कक वह काय ष इतना आसन् नसंकट है कक पूरी अधधसंभाव् यता है कक वह मत्ृ यु काररत कर ही देगा या ऐसी शारीररक िनत काररत कर ही देगा क्जससे मत्ृ युअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 53 काररत होना संभाव् य है और वह मत्ृ य ु काररत करने या पूवो‍ त रूप की िनत काररत करने की जोखिम उठाने के लिए ककसी प्रनतहेतु के बबना ऐसा काय ष करे । दृष् टांत (क) य को मार डािने के आशय से क उस पर गोिी चिाता है, पररणामस् वरूप य की मत्ृ यु हो जाती है । क हत् या करता है । (ि) क यह जानते हुए कक य ऐसे रोग से िस् त है कक सम् भाव् य है कक एक प्रहार उसकी मत्ृ यु काररत कर दे, शारीररक िनत काररत करने के आशय से उस पर आघात करता है । उस प्रहार के पररणामस् वरूप य की मत्ृ यु हो जाती है । क हत् या का दोर्ी है, यद्यवप वह प्रहार ककसी अच् छे स् वस् थ व् यक्‍ त की मत्ृ यु करने के लिए प्रकृनत के साधारण अनुक्रम में पयाषप् त नहीं होता । ककन् तु यहद क, यह न जानते हुए कक य ककसी रोग से िस् त है, उस पर ऐसा प्रहार करता है, क्जससे कोई अच् छा स् वस् थ व् यक्‍ त प्रकृनत के साधारण अनुक्रम में नहीं मरता, तो यहां, क, यद्यवप शारीररक िनत काररत करने का उसका आशय हो, हत् या का दोर्ी नहीं है, यहद उसका आशय मत्ृ यु काररत करने का या ऐसी शारीररक िनत काररत करने का नहीं था, क्जससे प्रकृनत के साधारण अनुक्रम में मत्ृ यु काररत हो जाए । (ग) य को तिवार या िाठी से ऐसा घाव क साशय करता है, जो प्रकृनत के साधारण अनुक्रम में ककसी मनुष् य की मत्ृ यु काररत करने के लिए पयाषप् त है । पररणामस्व रूप य की मत्ृ यु काररत हो जाती है, यहां क हत् या का दोर्ी है, यद्यवप उसका आशय य की मत्ृ यु काररत करने का न रहा हो । (घ) क ककसी प्रनतहेतु के बबना व् यक्‍ तयों के एक समूह पर भरी हुई तोप चिाता है और उनमें से एक का वध कर देता है । क हत् या का दोर्ी है, यद्यवप ककसी ववलशष् ट व् यक्‍ त की मत्ृ यु काररत करने की उसकी पूवधषचक्न् तत पररक् पना न रही हो । अपिाि 1—आपराधधक मानव वध हत् या नहीं है, यहद अपराधी उस समय जब वह गम् भीर और अचानक प्रकोपन से आत् मसंयम की शक्‍ त से वंधचत हो, उस व् यक्‍ त की, क्जसने कक वह प्रकोपन हदया था, मत्ृ यु काररत करे या ककसी अन्य व् यक्‍ त की मत्ृ यु भूि या दघु टष नावश काररत करे : परन्तु प्रकोपन,— (क) ककसी व् यक्‍ त का वध करने या अपहानन करने के लिए अपराधी द्वारा प्रनतहेतु के रूप में वांछनीय न हो या स् वेच् छया प्रकोवपत न हो ; (ि) ककसी ऐसी बात द्वारा न हदया गया हो, जो ववधध के पािन में या िोक सेवक द्वारा ऐस े िोक सेवक की शक्‍ तयों के ववधधपूण ष प्रयोग में की गई हो ; (ग) ककसी ऐसी बात द्वारा न हदया गया हो, जो प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार के ववधधपूण ष प्रयोग में की गई हो । स् पष् टीकरण—प्रकोपन इतना गम् भीर और अचानक था या नहीं कक अपराध को हत् या की कोहट में जाने स े बचा दे, यह तथ् य का प्रश् न है । दृष् टांत (क) य द्वारा हदए गए प्रकोपन के कारण प्रदीप् त आवेश के असर में म का, जो य का लशशु है, क साशय वध करता है । यह हत् या है, ‍ योंकक प्रकोपन उस लशश ु द्वारा नहीं हदया54 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— गया था और उस लशशु की मत्ृ य ु उस प्रकोपन से ककए गए काय ष को करने में दघु टष ना या दभु ाषग् य से नहीं हुई है । (ि) क को म गम् भीर और अचानक प्रकोपन देता है । क इस प्रकोपन से म पर वपस् तौि चिाता है, क्जसमें न तो उसका आशय य का, जो समीप ही है ककन् तु दृक्ष् ट से बाहर है, वध करने का है, और न वह यह जानता है कक सम् भाव् य है कक वह य का वध कर दे । क, य का वध करता है । यहां क ने हत् या नहीं की है, ककन् त ु केवि आपराधधक मानव वध ककया है । (ग) य द्वारा, जो एक बेलिफ है, क को ववधधपूवकष धगरफ्तार ककया जाता है । उस धगरफ्तारी के कारण क को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है । यह हत् या है, ‍ योंकक प्रकोपन ऐसी बात द्वारा हदया गया था, जो एक िोक सेवक द्वारा उसकी शक्‍ त के प्रयोग में की गई थी । (घ) य के समि, जो एक मक्जस् रेट है, सािी के रूप में क उपक्स्थत होता है । य यह कहता है कक वह क के अलभसाक्ष् य के एक शब् द पर भी ववश् वास नहीं करता और यह कक क ने शपथ-भंग ककया है । क को इन शब् दों से अचानक आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है । यह हत् या है । (ङ) य की नाक िींचने का प्रयत् न क करता है । य प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार के प्रयोग में ऐसा करने से रोकने के लिए क को पकड िेता है । पररणामस् वरूप क को अचानक और तीव्र आवेश आ जाता है और वह य का वध कर देता है । यह हत् या है, ‍ योंकक प्रकोपन ऐसी बात द्वारा हदया गया था, जो प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार के प्रयोग में की गई थी । (च) ख पर य आघात करता है । ख को इस प्रकोपन से तीव्र क्रोध आ जाता है । क, जो ननकट ही िडा हुआ है, ख के क्रोध का िाभ उठाने और उसस े य का वध कराने के आशय से उसके हाथ में एक चाकू उस प्रयोजन के लिए दे देता है । ख उस चाकू से य का वध कर देता है, यहां ख ने चाहे केवि आपराधधक मानव वध ही ककया हो, ककन् त ु क हत् या का दोर्ी है । अपिाि 2—आपराधधक मानव वध हत् या नहीं है, यहद अपराधी, शरीर या सम् पवत्त की प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार को सद् भावपूवकष प्रयोग में िाते हुए ववधध द्वारा उसे दी गई शक्‍ त का अनतक्रमण कर दे, और पूवधषचन् तन के बबना और ऐसी प्रनतरिा के प्रयोजन से क्जतनी अपहानन करना आवश् यक है उससे अधधक अपहानन करने के ककसी आशय के बबना उस व् यक्‍ त की मत्ृ यु काररत कर दे, क्जसके ववरुद्ध वह प्रनतरिा का ऐसा अधधकार प्रयोग में िा रहा है । दृष् टांत क को चाबुक मारने का प्रयत् न य करता है, ककन् त ु इस प्रकार नहीं कक क को घोर उपहनत काररत हो । क एक वपस् तौि ननकाि िेता है । य हमिे को चाि ू रिता है । क सद्भ ावपूवकष यह ववश् वास करते हुए कक वह अपने को चाबुक िगाए जाने स े ककसी अन् य साधन द्वारा नहीं बचा सकता है गोिी से य का वध कर देता है । क ने हत् या नहीं की है, ककन् तु केवि आपराधधक मानव वध ककया है । अपिाि 3—आपराधधक मानव वध हत् या नहीं है, यहद अपराधी ऐसा िोक सेवक होते हुए, या ऐसे िोक सेवक को मदद देते हुए, जो िोक न् याय की अिसरता में काय ष कर रहाअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 55 है, उसे ववधध द्वारा दी गई शक्‍ त से आगे बढ़ जाए, और कोई ऐसा काय ष करके क्जसे वह ववधधपूण ष और ऐसे िोक सेवक के नाते उसके कतव्ष य के सम् यक् ननवहष न के लिए आवश् यक होने का सद् भावपूवकष ववश् वास करता है, और उस व् यक्‍ त के प्रनत, क्जसकी मत्ृ यु काररत की गई है, वैमनस् य के बबना मत्ृ यु काररत करे । अपिाि 4—आपराधधक मानव वध हत् या नहीं है, यहद वह मानव वध अचानक झगडा जननत आवेश की तीव्रता में हुई अचानक िडाई में पूवधषचन् तन के बबना और अपराधी द्वारा अनुधचत िाभ उठाए बबना या क्रूरतापूण ष या अप्रानयक रीनत से काय ष ककए बबना ककया गया है । स् पष् टीकरण—ऐसी दशाओं में यह तत् वहीन है कक कौन पि प्रकोपन देता है या पहिा हमिा करता है । अपिाि 5—आपराधधक मानव वध हत् या नहीं है, यहद वह व् यक्‍ त क्जसकी मत्ृ यु काररत की जाती है, अठारह वर् ष से अधधक आयु का होते हुए, अपनी सम् मनत से मत्ृ यु होना सहन करे, या मत्ृ यु की जोखिम उठाए । दृष् टांत य को, जो एक लशशु है, उकसाकर क उससे स्व ेच् छया आत् महत् या करवाता है । यहां, कम उम्र होने के कारण य अपनी मत्ृ यु के लिए सम् मनत देने में असमथ ष था, इसलिए, क ने हत् या का दष्ु प्रेरण ककया है । 102. यहद कोई व् यक्‍ त, ककसी ऐस े कृत्य के द्वारा, क्जसस े उसका आशय मत्ृ यु काररत क्जस व् यक्‍ त की मत्ृ यु काररत करना हो, या क्जससे वह जानता हो कक मत्ृ यु काररत होना सम् भाव् य है, ककसी व् यक्‍ त की करने का मत्ृ यु काररत करके, क्जसकी मत्ृ यु काररत करने का न तो उसका आशय है और न वह यह आशय था संभाव् य जानता है कक वह उसकी मत्ृ य ु काररत करेगा, आपराधधक मानव वध करे, तो उससे लभन् न अपराधी द्वारा ककया गया आपराधधक मानव वध उस भांनत का होगा, क्जस भांनत का वह व् यक्‍ त की मत्ृ यु करके होता, यहद वह उस व् यक्‍ त की मत्ृ यु काररत करता क्जसकी मत्ृ यु काररत करना उसके द्वारा आपराधधक आशनयत था या वह जानता था कक उसके द्वारा उसकी मत्ृ यु काररत होना सम् भाव् य है । मानव वध । 103. (1) जो कोई हत् या करेगा, वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास स े दक्ण्ड त ककया हत् या के लिए दण् ड । जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (2) जब पांच या पांच से अधधक व्यक्‍तयों का कोई समूह लमिकर मूिवंश, जानत या समुदाय, लिगं , जन्म स्थान, भार्ा, वैयक्‍तक ववश्वास या ककसी अन्य समरूप आधार पर हत्या काररत करते हैं तो ऐसे समूह का प्रत्येक सदस्य मत्ृ यु या आजीवन कारावास के दंड से दंडनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 104. जो कोई, आजीवन कारावास के दण्ड ादेश के अधीन होते हुए हत् या करेगा, वह आजीवन लसद्धदोर् मत्ृ यु या आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त का शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास द्वारा हत् या के अलभप्रेत होगा, से दक्ण्ड त ककया जाएगा । लिए दण्ड । 105. जो कोई, ऐसा आपराधधक मानव वध करता है, जो हत् या की कोहट में नहीं आता हत् या की कोहट में न आने वाि े है, यहद वह काय ष क्जसके द्वारा मत्ृ यु काररत की गई है, मत्ृ यु या ऐसी शारीररक िनत, आपराधधक क्जससे मत्ृ यु होना संभाव् य है, काररत करने के आशय से ककया जाता है, तो वह आजीवन मानव वध के कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष से कम लिए दण्ड । नहीं होगी, ककन्तु जो दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी56 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दायी होगा, या यहद वह कायष इस आशय के साथ कक उससे मत्ृ यु काररत करना सम् भाव् य है, ककन् तु मत्ृ यु या ऐसी शारीररक िनत, क्जससे मत्ृ यु काररत करना सम् भाव् य है, काररत करने के ककसी आशय के बबना ककया जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी और जुमाषने से दक्ण्डत ककया जाएगा । उपेिा द्वारा 106. (1) जो कोई, उताविेपन से या उपेिापूण ष ककसी ऐस े काय ष से ककसी व् यक्‍ त की मत्ृ यु काररत मत्ृ यु काररत करता है, जो आपराधधक मानव वध की कोहट में नहीं आता है, वह दोनों में स े करना । ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा और यहद ऐसा कृत्य ककसी रक्जस्रीकृत धचककत्सा व्यवसायी द्वारा, जब वह धचककत्सीय प्रकक्रया संपाहदत कर रहा है, काररत ककया जाता है तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास स े क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष्टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, ‘‘रक्जस्रीकृत धचककत्सा व्यवसायी’’ से ऐसा धचककत्सा व्यवसायी अलभप्रेत है क्जसके पास राष्र ीय आयुववज्ञष ान आयोग अधधननयम, 2019 का 30 2019 के अधीन मान्यताप्राप्त कोई धचककत्सा अहषता है और क्जसका नाम उस अधधननयम के अधीन राष्रीय धचककत्सा रक्जस्टर या ककसी राज्य धचककत्सा रक्जस्टर में प्रववष्ट ककया गया है । (2) जो कोई, वाहन के उताविेपन या उपेिापूण ष चिाने से, ककसी व्यक्‍त की मत्ृ यु काररत करता है, जो आपराधधक मानव वध की कोहट में नहीं आता है और घटना के तत्काि पश्चात,् इसे पुलिस अधधकारी या मक्जस्रेट को ररपोटष ककए बबना, भाग जाता है, तो वह दोनों में से ककसी भी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । लशशु या ववकृत्त 107. यहद कोई लशशु, ववकृत्त धचत्त व्यक्‍त, कोई उन्मत्त व्यक्‍त या मत्तता की अवस्था धचत्त व्यक्‍त की में कोई व्यक्‍त आत् महत् या करता है जो कोई, ऐसी आत् महत् या करने के लिए दष्ु प्रेरण करता आत् महत् या का दष्ु प्रेरण । है, तो वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास या ऐसी अवधध के कारावास से, जो दस वर् ष स े अधधक की नहीं होगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । आत् महत् या का 108. यहद कोई व् यक्‍ त आत् महत् या करता है, तो जो कोई ऐसी आत् महत् या का दष्ु प्रेरण दष्ु प्रेरण । करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । हत् या करने का 109. (1) जो कोई, ककसी कृत्य को ऐसे आशय या ज्ञान स े और ऐसी पररक्स् थनतयों में प्रयत् न । करता है कक यहद वह उस कृत्य द्वारा मत्ृ यु काररत कर देता तो वह हत् या का दोर्ी होता, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा, और यहद ऐस े काय ष द्वारा ककसी व् यक्‍ त को उपहनत काररत हो जाए, तो वह अपराधी या तो आजीवन कारावास से या ऐसे दण्ड से दण्ड नीय होगा, जैसा इसमें इसके पूव ष वखणतष है । (2) जब उपधारा (1) के अधीन अपराध करने वािा कोई व्य क्‍ त आजीवन कारावास के दण्ड ादेश के अधीन है, तब यहद उपहनत काररत करता है, तो वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, से दक्ण्ड त ककया जाएगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 57 दृष् टांत (क) य का वध करने के आशय से क उस पर ऐसी पररक्स् थनतयों में गोिी चिाता है कक यहद मत्ृ यु हो जाती, तो क हत् या का दोर्ी होता । क इस धारा के अधीन दण्ड नीय है । (ि) क सुकुमार अवस्था के ककसी लशशु की मत्ृ यु करने के आशय से उसे एक ननजनष स् थान में अरक्षित छोड देता है । क न े इस धारा द्वारा पररभावर्त अपराध ककया है, यद्यवप पररणामस् वरूप उस लशशु की मत्ृ यु नहीं होती । (ग) य की हत् या का आशय रिते हुए क एक बन् दकू िरीदता है और उसको भरता है । क ने अभी तक अपराध नहीं ककया है । य पर क बन् दकू चिाता है । उसने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है, और यहद इस प्रकार गोिी मार कर वह य को घायि कर देता है, तो वह उपधारा (1) के पश्चातवती भाग द्वारा उपबक्न् धत दण्ड से दण्ड नीय है । (घ) ववर् द्वारा य की हत् या करने का आशय रिते हुए क ववर् िरीदता है, और उस े उस भोजन में लमिा देता है, जो क के अपन े पास रहता है क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध अभी तक नहीं ककया है । क उस भोजन को य की मेज पर रिता है, या उसको य की मेज पर रिने के लिए य के सेवकों को पररदत्त करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । 110. जो कोई, ककसी काय ष को ऐसे आशय या ज्ञान स े और ऐसी पररक्स् थनतयों में आपराधधक मानव वध करता है कक यहद उस काय ष से वह मत्ृ यु काररत कर देता, तो वह हत् या की कोहट में न आने करने का वािे आपराधधक मानव वध का दोर्ी होता, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, प्रयत् न । क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; और यहद ऐसे काय ष द्वारा ककसी व् यक्‍ त को उपहनत हो जाए तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । दृष् टांत क गम् भीर और अचानक प्रकोपन पर, ऐसी पररक्स् थनतयों में, य पर वपस् तौि चिाता है कक यहद इसके द्वारा वह मत्ृ यु काररत कर देता तो वह हत् या की कोहट में न आने वािे आपराधधक मानव वध का दोर्ी होता । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । 111. (1) ककसी संगहठत अपराध लसडंडकेट के सदस्य के रूप में या ऐसे लसडंडकेट की संगहठत अपराध । ओर से अकेिे या संयु‍त रूप से सामान्य मनत स े काय ष करते हुए ककसी व्यक्‍त द्वारा या व्यक्‍तयों के ककसी समूह द्वारा कोई सतत ् ववधधववरूद्ध कक्रयाकिाप ककया जाता है, क्जसमें व्यपहरण, डकैती, यान चोरी, उद्दापन, भूलम हधथयाना, संववदा पर हत्या करना, आधथकष अपराध, साइबर अपराध, व्यक्‍तयों, और्धधयों, हधथयारों या अवैध माि या सेवाओं का दव्ु याषपार, वेश्याववृत्त या कफरौती के लिए मानव दव्ु याषपार शालमि है, प्रत्यि या अप्रत्यि रूप से ताक्त्वक फायदा, क्जसके अंतगतष ववत्तीय फायदा भी है, प्राप्त करने के लिए हहसं ा का प्रयोग, हहसं ा की धमकी, अलभत्रास, प्रपीडन या अन्य ववधधववरूद्ध साधनों द्वारा काररत करता है, वह संगहठत अपराध गहठत करेगा । स्पष्टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,— (i) “संगहठत अपराध लसडंडकेट” से दो या अधधक व्यक्‍तयों का कोई समूह अलभप्रेत है जो एक लसडंडकेट या टोिी के रूप में या तो अकेिे या सामूहहक रूप स े58 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— काय ष करते हुए ककसी सतत ् ववधध ववरूद्ध कक्रयाकिाप में लिप्त है । (ii) “सतत ् ववधधववरुद्ध कक्रयाकिाप” स े ववधध द्वारा प्रनतवर्द्ध ऐसा कक्रयाकिाप अलभप्रेत है जो तीन या अधधक वर् ष के कारावास स े दण्डनीय संज्ञेय अपराध है, जो ककसी व्यक्‍त द्वारा या तो अकेिे या संयु‍त रूप से, ककसी संगहठत अपराध लसडंडकेट के सदस्य के रूप में या ऐसे लसडंडकेट की ओर से क्जसके संबंध में एक से अधधक आरोप पत्र दस वर् ष की पूववष ती अवधध के भीतर सिम न्यायािय के समि दाखिि ककए गए हैं, द्वारा ककया गया है और उस न्यायािय ने ऐसे अपराध का संज्ञान कर लिया है और इसमें आधथषक अपराध भी शालमि हैं; (iii) “आधथकष अपराध” में आपराधधक न्यासभंग, कूटरचना, करेंसी नोट, बकैं नोट और सरकारी स्टापों का कूटकरण, हवािा संव्यवहार, बड े पैमाने पर ववपणन कपट या ककसी प्ररूप में धनीय फायदा प्राप्त करने के लिए ववलभन्न व्यक्‍तयों के साथ कपट करने के लिए कोई स्कीम चिाना या ककसी बकैं या ववत्तीय संस्था या ककसी अन्य संस्था या संगठन को कपट करने की दृक्ष्ट स े ककसी रीनत में, कोई कृत्य करना शालमि है । (2) जो कोई, संगहठत अपराध काररत करेगा, — (क) यहद ऐसे अपराध के पररणामस्वरूप ककसी व्यक्‍त की मत्ृ यु हो जाती है, तो वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास स े दंडनीय होगा और ऐस े जुमाषने का भी दायी होगा, जो दस िाि रुपए से कम का नहीं होगा; (ि) ककसी अन्य मामि े में, वह ऐसी अवधध के कारावास से दंडनीय होगा, जो पांच वर् ष से कम का नहीं होगा, ककंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुमाषने का भी दायी होगा, जो पांच िाि रुपए से कम का नहीं होगा । (3) जो कोई, संगहठत अपराध का दष्ु प्रेरण, प्रयत्न, र्डयंत्र करता है या यह जानते हुए काररत ककया जाना सुकर बनाता है या संगहठत अपराध के ककसी प्रारंलभक काय ष में अन्यथा ननयोक्जत होता है, वह ऐसी अवधध के कारावास से दंडनीय होगा, जो पांच वर् ष स े कम का नहीं होगा, ककंतु जो आजीवन कारावास तक का हो सकेगा और ऐसे जुमाषने का भी दायी होगा, जो पांच िाि रुपए से कम का नहीं होगा । (4) कोई व्यक्‍त, जो संगहठत अपराध लसडंडकेट का सदस्य है, वह ऐसी अवधध के कारावास से दंडनीय होगा, जो पांच वर् ष से कम का नहीं होगा, ककंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुमाषने के लिए भी दायी होगा जो पांच िाि रुपए स े कम का नहीं होगा । (5) जो कोई, ककसी व्यक्‍त को, क्जसने संगहठत अपराध काररत ककया है, साशयपूवकष संश्रय देता है या नछपाता है, वह ऐसी अवधध के कारावास से दंडनीय होगा, जो तीन वर्ष स े कम का नहीं होगा, ककंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगा, और ऐस े जुमाषने का भी दायी होगा, जो पांच िाि रुपए स े कम का नहीं होगा : परंतु यह उपधारा उस दशा में िागू नहीं होगी, क्जसमें सश्रं य या नछपाना अपराधी के पनत या पत्नी द्वारा ककया जाता है । (6) जो कोई, संगहठत अपराध काररत ककए जाने से या ककसी संगहठत अपराध के आगमों से, व्यत्पुन्न या अलभप्राप्त या संगहठत अपराध के माध्यम से अक्जतष की गई ककसी संपवत्त पर कब्जा रिता है, वह ऐसी अवधध के कारावास से दण्डनीय होगा, जो तीन वर्ष सेअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 59 कम का नहीं होगा, ककन्तु आजीवन कारावास तक हो सकेगा और ऐसे जुमाषने का भी दायी होगा, जो दो िाि रुपए से कम का नहीं होगा । (7) यहद संगहठत अपराध लसडंडकेट के सदस्य की ओर स े कोई व्यक्‍त या ककसी भी समय ऐसी ककसी चि या अचि सम्पवत्त को कब्ज े में रिता है, क्जसका वह समाधानप्रद िेिा नहीं दे सकता है, वह ऐसी अवधध के कारावास स े दंडनीय होगा, जो तीन वर् ष से कम का नहीं होगा, ककंतु जो दस वर् ष तक हो सकेगा और ऐसे जुमाषने का भी दायी होगा, जो एक िाि रुपए से कम का नहीं होगा । 112. (1) जो कोई, समूह या टोिी का सदस्य होते हुए, या तो अकेिे या संयु‍त रूप छोटे संगहठत अपराध । से चोरी, झपटमारी, छि, हटकटों का अप्राधधकृत रूप से ववक्रय, अप्राधधकृत शत ष िगाने या जुआ िेिने, िोक परीिा प्रश्नपत्रों का ववक्रय या कोई अन्य समरूप अपराधधक कृत्य काररत करता है, तो वह छोटा संगहठत अपराध काररत करता है । स्पष्टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, “चोरी” में चािाकी स े चोरी, वाहन, ननवास-घर या कारबार पररसर स े चोरी, कागो से चोरी, पाकेट मारना, काड ष क्स्कलमगं , शॉपलिक्फ्टंग के माध्यम से चोरी और स्वचालित टेिर मशीन की चोरी शालमि है । (2) जो कोई, छोटा संगहठत अपराध काररत करता है वह ऐसी अवधध के कारावास से दंडनीय होगा, जो एक वर् ष स े कम का नहीं होगा, ककंतु सात वर् ष तक हो सकेगा और जमु ाषने का भी दायी होगा । 113. (1) जो कोई, भारत की एकता, अिंडता, संप्रभूता, सुरिा या आधथकष सुरिा या आतंकवादी कृत्य । भारत में या ककसी ववदेश में जनता या जनता के ककसी वग ष में आतंक फैिाने या आतंक फैिाने की संभावना के आशय से,— (क) बम, डाइनामाइट या अन्य ववस्फोटक पदाथ ष या ज्विनशीि पदाथ ष या अग्न्यायुधों या अन्य प्राणहर आयुधों या ववर्ों या अपायकर गैसों या अन्य रसायनों या पररसंकटमय प्रकृनत के ककसी अन्य पदाथ ष का (चाहे वह जैववक रेडडयोधमी, नालभकीय या अन्यथा हो) या ककसी भी प्रकृनत के ककन्हीं अन्य साधनों का उपयोग करके ऐसा कोई काय ष करता है, क्जससे,— (i) ककसी व्यक्‍त या व्यक्‍तयों की मत्ृ यु होती है या उन्हें िनत होती है या होने की संभावना है ; या (ii) संपवत्त की हानन या उसका नुकसान या ववनाश होता है या होने की संभावना है ; या (iii) भारत में या ककसी ववदेश में समुदाय के जीवन के लिए अननवायष ककन्हीं प्रदायों या सेवाओं में ववघ्न पैदा करता है या होने की संभावना है ; या (iv) लस‍के या ककसी अन्य सामिी की कूटकृत भारतीय कागज करेंसी के ननमाषण या उसकी तस्करी या पररचािन के माध्यम से भारत की आधथकष क्स्थरता को नुकसान होता है या होने की संभावना है ; या (v) भारत की प्रनतरिा या भारत सरकार, ककसी राज्य सरकार या उनके ककन्हीं अलभकरणों के ककन्हीं अन्य प्रयोजनों के संबंध में उपयोग की गई या उपयोग ककए जान े के लिए आशनयत भारत में या ववदेश में ककसी सम्पवत्त का नुकसान या ववनाश होता है या होने की संभावना है ; या60 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) ककसी िोक कृत्यकारी को आपराधधक बि के द्वारा या आपराधधक बि का प्रदशनष करके आतंककत करता है या ऐसा करने का प्रयत्न करता है या ककसी िोक कृत्यकारी की मत्ृ यु काररत करता है या ककसी िोक कृत्यकारी की मत्ृ यु काररत करने का प्रयत्न करता है ; या (ग) ककसी व्यक्‍त को ननरूद्ध करता है, उसका व्यपहरण या अपहरण करता है या ऐसे व्यक्‍त को मारने या िनत पहुंचाने की धमकी देता है या भारत सरकार, ककसी राज्य की सरकार या ककसी ववदेश की सरकार या ककसी अतं रराष्रीय या अंतर-सरकारी संगठन या ककसी अन्य व्यक्‍त को कोई काय ष करने या उसे न करने के लिए बाध्य करने हेतु कोई अन्य काय ष करता है, तो वह आतंकवादी कृत्य करता है । स्पष्टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजन के लिए,— (क) “िोक कृत्यकारी” से संवैधाननक प्राधधकारी या केन्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में िोक कृत्यकारी के रूप में अधधसूधचत कोई अन्य कृत्यकारी अलभप्रेत है ; (ि) “कूटकृत भारतीय करेंसी” से ऐसी कूटकृत करेंसी अलभप्रेत है, जो ककसी प्राधधकृत या अधधसूधचत न्याय संबंधी प्राधधकारी द्वारा यह परीिा करने के पश्चात ् कक ऐसी करेंसी भारतीय करेंसी के मुख्य सुरिा ववशेर्ताओं की अनुकृनत है या उसके अनुरूप है, उस रूप में घोवर्त की जाए । (2) जो कोई, आतंकवादी कृत्य काररत करता है,— (क) यहद ऐसे अपराध के पररणामस्वरूप ककसी व्यक्‍त की मत्ृ यु हो जाती है, तो वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास स े दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ि) ककसी अन्य मामिे में, वह कारावास से, क्जसकी अवधध, पांच वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी और जुमाषने का भी दायी होगा । (3) जो कोई, आतंकवादी कृत्य करने या आंतकवादी कृत्य करने की तैयारी करने का र्डयंत्र करता है या प्रयत्न करता है या दष्ु प्रेरण करता है, पिपोर्ण करता है, सिाह देता है या उत्तेक्जत करता है या ऐसे काय ष का ककया जाना प्रत्यितः या जानबूझकर सुकर बनाता है वह कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जो कोई, आतंकवादी कृत्य का प्रलशिण देने के लिए ककसी लशववर या ककन्हीं लशववरों का आयोजन करता है या आयोजन करवाता है या आतंकवादी कृत्य को काररत करने के लिए ककसी व्यक्‍त या ककन्हीं व्यक्‍तयों को भती करता है या भती करवाता है, तो वह कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष स े कम की नहीं होगी, ककंतु आजीवन कारावास तक हो सकेगी और जुमाषने का भी दायी होगा । (5) कोई व्यक्‍त, जो आतंकवादी संगठन का सदस्य है, और आतंकवादी कृत्य में शालमि है, वह ऐसी अवधध के कारावास से, जो आजीवन कारावास तक हो सकेगा और जुमाषने का भी दायी होगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 61 (6) जो कोई, ऐस े ककसी व्यक्‍त को यह जानते हुए कक ऐसे व्यक्‍त ने ककसी आतंकवादी कृत्य का अपराध ककया है, स्वेच्छया संश्रय देता है या नछपाता है या संश्रय देने या नछपाने का प्रयत्न करता है, वह कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन्तु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी और जमु ाषने का भी दायी होगा : परंतु यह उपधारा ऐसे मामिों को िाग ू नहीं होगी, क्जसमें संश्रय देने या नछपाने का काय ष अपराधी के पनत या पत्नी द्वारा ककया गया है । (7) जो कोई, ककसी आतंकवादी कृत्य करने से प्राप्त या अलभप्राप्त या आतंकवादी कृत् य करने के माध्यम से अक्जतष ककसी संपवत्त को जानते हुए कब्जे में रिता है, वह ऐसी अवधध के कारावास से, जो आजीवन कारावास तक हो सकेगी और जुमाषने का भी दायी होगा। स्पष्टीकरण—शंकाओं को दरू करने के लिए, यह घोवर्त ककया जाता है कक पुलिस अधीिक की पंक्‍त से अन्यून पंक्‍त का अधधकारी यह ववननश्चय करेगा कक ‍या इस धारा 1967 का 37 के अधीन या ववधधववरुद्ध कक्रयाकिाप (ननवारण) अधधननयम, 1967 के अधीन मामिा रक्जस्रीकृत ककया जाए । उपिनत के विषय में 114. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त को शारीररक पीडा, रोग या अंग-शैधथ् य काररत करता उपहनत । है, वह उपहनत करता है, यह कहा जाता है । 115. (1) जो कोई, ककसी काय ष को इस आशय से करता है कक उसके द्वारा ककसी स् वच्े छया उपहनत काररत व् यक्‍ त को उपहनत काररत की जाए या इस ज्ञान के साथ करता है कक यह संभाव् य है कक करना । वह उसके द्वारा ककसी व् यक्‍त को उपहनत काररत करे और उसके द्वारा ककसी व् यक्‍ त की उपहनत काररत करता है, वह “स् वेच् छया उपहनत करता है”, यह कहा जाता है । (2) जो कोई, धारा 122 की उपधारा (1) के अधीन उपबंधधत मामिे के लसवाय, स्वेच्छया उपहनत काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रूपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा । 116. केवि ननम्नलिखित उपहनत को “घोर उपहनत” के रूप मे ननहदषष्ट ककया गया है, घोर उपहनत । अथाषत ् :— (क) पुंस् त् वहरण ; (ि) दोनों में स े ककसी भी नेत्र की दृक्ष् ट का स् थायी ववच्छेद ; (ग) दोनों में से ककसी भी कान की श्रवणशक्‍ त का स् थायी ववच्छेद ; (घ) ककसी भी अंग या जोड का ववच् छेद ; (ङ) ककसी भी अंग या जोड की शक्‍ तयों का नाश या स् थायी ह्रास ; (च) लसर या चेहरे का स् थायी ववरपू ीकरण ; (छ) अक्स् थ या दांत का भंग या ववसंधान ; (ज) कोई उपहनत जो जीवन को संकट में डािती है या क्जसके कारण उपहत व् यक्‍ त पंरह हदन तक तीव्र शारीररक पीडा में रहता है या अपने सामान्य कामकाज को करने में असमथ ष रहता है ।62 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— स् वच्े छया घोर 117. (1) जो कोई, स् वेच् छया उपहनत काररत करता है, यहद वह उपहनत, क्जसे काररत उपहनत काररत करने का उसका आशय है या क्जसे वह जानता है कक उसके द्वारा उसका ककया जाना करना । सम् भाव् य है घोर उपहनत है, और यहद वह उपहनत, जो वह काररत करता है, घोर उपहनत है, तो वह “स् वेच् छया घोर उपहनत करता है”, यह कहा जाता है । स् पष् टीकरण—कोई व् यक्‍ त, स् वेच् छया घोर उपहनत काररत करता है, यह नहीं कहा जाता है, लसवाय जबकक वह घोर उपहनत काररत करता है और घोर उपहनत काररत करने का उसका आशय हो या घोर उपहनत काररत होना वह सम् भाव् य जानता हो । ककन् तु यहद वह यह आशय रिते हुए या यह संभाव् य जानते हुए कक वह ककसी एक ककस् म की घोर उपहनत काररत कर दे वास् तव में दसू री ही ककस् म की घोर उपहनत काररत करता है, तो वह स् वेच् छया घोर उपहनत काररत करता है, यह कहा जाता है । दृष् टांत क, यह आशय रिते हुए या यह सम् भाव् य जानते हुए कक वह य के चेहरे को स् थायी रूप से ववरवूपत कर देगा, य के चेहरे पर प्रहार करता है क्जससे य का चेहरा स् थायी रूप से ववरवूपत तो नहीं होता, ककन् तु य को पंरह हदन तक तीव्र शारीररक पीडा काररत होती है । क ने स् वेच् छया घोर उपहनत काररत की है । (2) जो कोई, धारा 122 की उपधारा (2) में उपबंधधत मामिे के लसवाय, स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करता है, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । (3) जो कोई, उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध काररत करता है और ऐसे काररत करने के क्रम में ककसी व्यक्‍त को उपहनत काररत करता है, क्जससे उस व्यक्‍त को स्थायी हदव्यांगता काररत हो जाती है या िगातार ववकृतशीि दशा में डाि देता है वह ऐसी अवधध के कहठन कारावास से, जो दस वर् ष से कम का नहीं होगा, ककंतु आजीवन कारावास, क्जसस े उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, से दंडनीय होगा । (4) जब पांच या अधधक व्यक्‍तयों के समूह द्वारा, सामान्य मनत से काय ष करते हुए, ककसी व्यक्‍त को उसके मूिवंश, जानत या समुदाय, लिगं , जन्म स्थान, भार्ा, व्यक्‍तगत ववश्वास या ककसी अन्य समरूप आधार पर, घोर उपहनत काररत की जाती है, वहां ऐसे समूह का प्रत्येक सदस्य घोर उपहनत काररत करने के अपराध का दोर्ी होगा और वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक हो सकेगी दंडनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । ितरनाक 118. (1) जो कोई, धारा 122 की उपधारा (1) में उपबंधधत दशा के लसवाय, गोिी आयुधों या मारन,े वेधन े या काटने के ककसी उपकरण द्वारा या ककसी ऐसे उपकरण द्वारा जो यहद साधनों द्वारा आक्रामक हधथयार के तौर पर उपयोग में िाया जाए, क्जससे मत्ृ यु काररत होना सम् भाव्य है, स् वच्े छया उपहनत या घोर उपहनत या अक्ग् न या ककसी तप् त पदाथ ष द्वारा, या ककसी ववर् या ककसी संिारक पदाथ ष द्वारा या काररत करना । ककसी ववस् फोटक पदाथ ष द्वारा या ककसी ऐस े पदाथ ष द्वारा, क्जसका श् वास में जाना या ननगिना या र‍ त में पहुंचना मानव शरीर के लिए हाननकारक है, या ककसी जीव-जन्तु द्वारा स् वेच् छया उपहनत काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से जो बीस हजार रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । (2) जो कोई, धारा 122 की उपधारा (2) में उपबंधधत दशा के लसवाय, उपधारा (1) मेंअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 63 ननहदषष्ट ककसी साधन से स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष से कम की नहीं होगी ककंतु दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 119. (1) जो कोई, इस प्रयोजन से स् वेच् छया उपहनत काररत करता है कक उपहत संपवत्त उद्दावपत करने के लिए व् यक्‍ त से, या उससे हहतबद्ध ककसी व् यक्‍ त से, कोई सम् पवत्त या मू् यवान प्रनतभूनत या अवैध काय ष उद्दावपत की जाए या उपहत व् यक्‍ त को या उससे हहतबद्ध ककसी व् यक्‍ त को कोई ऐसी कराने को बात, जो अवैध है, या क्जसस े ककसी अपराध का ककया जाना सुकर होता है, करने के लिए मजबूर करने के मजबूर ककया जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक लिए स् वच्े छया उपहनत या घोर की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । उपहनत काररत (2) जो कोई, उपधारा (1) में ननहदषष्ट ककसी प्रयोजन के लिए स्वेच्छया घोर उपहनत करना । काररत करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 120. (1) जो कोई, इस प्रयोजन से स् वेच् छया उपहनत काररत करता है कक उपहत संस्व ीकृनत उद्दावपत करन े व् यक्‍ त से या उसस े हहतबद्ध ककसी व्यक्‍ त स े कोई संस्व ीकृनत या कोई जानकारी, क्जससे या वववश करके ककसी अपराध या कदाचार का पता चि सके, उद्दावपत की जाए या उपहत व् यक्‍ त या उससे संपवत्त को वापस हहतबद्ध व् यक्‍ त को मजबूर ककया जाए कक वह कोई सम्प वत्त या मू् यवान प्रनतभूनत वापस करान े के लिए स्व ेच् छया उपहनत करे, या करवाए, या ककसी दावे या मांग की पुक्ष् ट, या ऐसी जानकारी दे, क्जससे ककसी या घोर उपहनत सम् पवत्त या मू् यवान प्रनतभूनत को वापस कराया जा सके, वह दोनों में स े ककसी भांनत के काररत करना । कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जमु ाषने का भी दायी होगा । दृष् टांत (क) क, जो एक पुलिस अधधकारी है, य स े यह संस् वीकृनत कराने के लिए, कक उसने अपराध ककया है उसे उत् प्रेररत करने के लिए यातना देता है । क इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । हुई (ि) क, जो एक पुलिस अधधकारी है, ख से यह पता िगाने के लिए कक अमुक चुराई सम् पवत्त कहां रिी है, उत् प्रेररत करने के लिए उसे यातना देता है । क इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (ग) क, जो एक राजस्व अधधकारी है, राजस् व का वह बकाया, जो य द्वारा देय है, देन े के लिए य को वववश करने के लिए उस े यातना देता है । क इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (2) जो कोई, उपधारा (1) में ननहदषष्ट ककसी प्रयोजन के लिए स्वेच्छया घोर उपहनत काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक हो सकेगी दंडनीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 121. (1) जो कोई, ककसी ऐस े व् यक्‍ त को, जो िोक सेवक है, उस समय जब वह वैसे िोक सेवक को अपन े कतव्ष य स े िोक सेवक के नात े अपने कतव्ष य का ननवहष न कर रहा है या इस आशय स े कक उस व् यक्‍ त भयोपरत करने को या ककसी अन्य िोक सेवक को, वसै े िोक सेवक के नाते उसके अपने कतव्ष य के के लिए ववधधपूण ष ननवषहन से ननवाररत या भयोपरत करे या वैसे िोक सेवक के नाते उस व् यक्‍ त स् वच्े छया द्वारा अपन े कतव्ष य के ववधधपूण ष ननवहष न में की गई या ककए जाने के लिए प्रयत् न ककए गए उपहनत या घोर उपहनत काररत ककसी बात के पररणामस् वरूप स् वेच् छया उपहनत काररत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत करना । के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा ।64 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) जो कोई, ककसी ऐस े व् यक्‍ त को, जो िोक सेवक है, उस समय जब वह वैस े िोक सेवक के नाते अपने कतव्ष य का ननवहष न कर रहा है या इस आशय से कक उस व् यक्‍ त को, या ककसी अन्य िोक सेवक को वैसे िोक सेवक के नाते उसके अपने कतव्ष य के ननवहष न से ननवाररत या भयोपरत करे या वैसे िोक सेवक के नाते उस व् यक्‍ त द्वारा अपने कतव्ष य के ववधधपूण ष ननवषहन में की गई या ककए जाने के लिए प्रयनतत ककसी बात के पररणामस् वरूप स् वेच् छया घोर उपहनत काररत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन्तु दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । प्रकोपन पर 122. (1) जो कोई, गम् भीर और अचानक प्रकोपन पर स् वेच् छया उपहनत काररत करता है, यहद स् वच्े छया उपहनत न तो उसका आशय उस व् यक्‍ त से लभन्न , क्जसने प्रकोपन हदया था, ककसी व् यक्‍ त को उपहनत या घोर उपहनत काररत करने का है और न तो अपने द्वारा ऐसी उपहनत काररत ककया जाना सम् भाव् य जानता है, वह काररत करना । दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमानष े स,े जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (2) जो कोई, गम् भीर और अचानक प्रकोपन पर स्व ेच् छया घोर उपहनत काररत करता है, यहद न तो उसका आशय उस व् यक्‍ त से लभन्न , क्जसने प्रकोपन हदया था, ककसी व् यक्‍ त को घोर उपहनत काररत करने का है और न तो अपने द्वारा ऐसी घोर उपहनत काररत ककया जाना सम्भ ाव् य जानता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । स् पष् टीकरण—यह धारा उसी परंतुक के अध् यधीन हैं, क्जनके अध् यधीन धारा 101 का अपवाद 1 है । अपराध करने के 123. जो कोई, इस आशय से कक ककसी व् यक्‍ त की उपहनत काररत की जाए या आशय स े ववर् अपराध करने के, या ककए जाने को सुकर बनाने के आशय से, या यह सम् भाव् य जानते हुए इत् याहद द्वारा कक वह उसके द्वारा उपहनत काररत करेगा, कोई ववर् या संवेदनशून्य करने वािी, नशा करने उपहनत काररत वािी या अस् वास् थ् यकर ओर्धध या अन् य चीज उस व् यक्‍ त को देता है या उसके द्वारा लिया करना । जाना काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । अम् ि, आहद का 124. (1) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त के शरीर के ककसी भाग या ककन्हीं भागों को, उस प्रयोग करके व्यक्‍ त पर अम्ि फेंककर या उस े अम्ि देकर या ककन्हीं अन्य साधनों का प्रयोग करके, ऐसा स् वच्े छया घोर काररत करन े के आशय या ज्ञान से कक संभाव्य है उससे ऐसी िनत या उपहनत काररत हो, उपहनत काररत करना । स्थायी या आंलशक नुकसान काररत करता है या अंगववकार करता है या जिाता है या ववकिांग बनाता है या ववरवूपत करता है या नन:श‍ त बनाता है या घोर उपहनत काररत करता है, या ककसी व्यक्‍त को स्थायी ववकृतशीि दशा में डािता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास स,े क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने से भी दंडनीय होगा : परंतु ऐसा जुमाषना पीडडत के उपचार के धचककत्सीय व्ययों को पूरा करन े के लिए न्यायोधचत और युक्‍ तयु‍ त होगा : परंतु यह और कक इस उपधारा के अधीन अधधरोवपत ककसी भी जुमाषने का सदं ायअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 65 पीडडत को ककया जाएगा । (2) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को स्थायी या आंलशक नुकसान काररत करन े या उसका अंगववकार करने या जिाने या ववकिांग बनाने या ववरवूपत करन े या नन:श‍ त करन े या घोर उपहनत काररत करन े के आशय से उस व्यक्‍ त पर अम्ि फेंकता है या फेंकने का प्रयत् न करता है या ककसी व्यक्‍ त को अम्ि देता है या अम्ि देने का प्रयत् न करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष से कम की नहीं होगी, ककन्त ु जो सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण 1—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “अम्ि” में कोई ऐसा पदाथ ष सक्म्मलित है जो ऐसे अम्िीय या संिारक स्वरूप या ज्विन प्रकृनत का है, जो ऐसी शारीररक िनत करन े योग्य है, क्जससे ितधचह्न बन जात े हैं या ववरपू ता या अस्थायी या स्थायी ननःश‍तता हो जाती है । स्पष् टीकरण 2—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, स्थायी या आंलशक नुकसान या अंगववकार या स्थायी ववकृतशीि दशा का अपररवतनष ीय होना आवश्यक नहीं होगा । 125. जो कोई, इतने उताविेपन या उपेिा से कोई ऐसा काय ष करता है कक उससे काय,ष क्जससे दसू रों का जीवन मानव जीवन या दसू रों का वैयक्‍ तक सुरिा संकटापन्न होती है, वह दोनों में से ककसी भांनत या वैयक्‍ तक के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो ढ़ाई हजार सुरिा रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा, ककंतु— संकटापन्न हो । (क) जहां उपहनत काररत की जाती है, वहां दोनों में से ककसी भांनत के कारावास, क्जसकी अवधध छह मास तक हो सकेगी या जुमाषने से, जो पांच हजार रूपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा ; (ि) जहां घोर उपहनत काररत की जाती है, वहां दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक हो सकेगी या जुमाषने स,े जो दस हजार रुपए तक हो सकेगा या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । सिोष अिरोि और सिोष परररोि के विषय में 126. (1) जो कोई, ककसी व्य क्‍ त को स् वेच् छया ऐसी बाधा डािता है कक उस व् यक्‍ त सदोर् अवरोध । को उस हदशा में, क्जसमें उस व् यक्‍ त को जाने का अधधकार है, जाने से रोक दे, वह उस व् यक्‍ त का सदोर् अवरोध करता है, यह कहा जाता है । अपिाि—भूलम के या जि के ऐसे प्राइवेट माग ष में बाधा डािना, क्जसके सम्ब न्ध में ककसी व् यक्‍ त को सद् भावपूवकष ववश् वास है कक वहां बाधा डािने का उसे ववधधपूण ष अधधकार है, इस धारा के अथ ष के अन् तगतष अपराध नहीं है । दृष् टांत क एक माग ष में, क्जससे होकर जाने का य का अधधकार है, सद्भ ावपूवकष यह ववश् वास न रिते हुए कक उसको माग ष रोकने का अधधकार प्राप् त है, बाधा डािता है । य जान े से उसके द्वारा रोक हदया जाता है । क, य का सदोर् अवरोध करता है । (2) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् अवरोध करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने स,े जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों स,े दक्ण्ड त ककया जाएगा ।66 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सदोर् परररोध । 127. (1) जो कोई, ककसी व्य क्‍ त का इस प्रकार सदोर् अवरोध करता है कक उस व् यक्‍ त को ननक्श् चत पररसीमा से परे जाने से रोक दे, वह उस व् यक्‍ त का “सदोर् परररोध” करता है, यह कहा जाता है । दृष् टांत (क) य को दीवार से नघरे हुए स् थान में प्रवेश कराकर क उसमें तािा िगा देता है । इस प्रकार य दीवार की पररसीमा से परे ककसी भी हदशा में नहीं जा सकता । क ने य का सदोर् परररोध ककया है । (ि) क एक भवन के बाहर जान े के द्वारों पर बन् दकू धारी मनुष् यों को बैठा देता है और य स े कह देता है कक यहद य भवन के बाहर जाने का प्रयत् न करेगा तो वे य को गोिी मार देंगे । क ने य का सदोर् परररोध ककया है । (2) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् परररोध करता है, वह दोनों में से, ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । (3) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् परररोध तीन या अधधक हदनों के लिए करता है, वह दोनों में से, ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । (4) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् परररोध दस या अधधक हदनों के लिए करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने से भी, जो दस हजार रुपए से कम का नहीं होगा, का भी दायी होगा । (5) जो कोई, यह जानते हुए ककसी व् यक्‍ त को सदोर् परररोध में रिता है कक उस व् यक्‍ त को छोडने के लिए ररट सम् यक् रूप स े ननकि चुकी है, वह ककसी अवधध के उस कारावास के अनतरर‍ त, क्जससे कक वह इस अध् याय की ककसी अन्य धारा के अधीन दण् डनीय हो, दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (6) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् परररोध इस प्रकार करता है क्जससे यह आशय प्रतीत होता है कक ऐसे परररुद्ध व् यक्‍ त से हहतबद्ध ककसी व् यक्‍ त को या ककसी िोक सवे क को ऐसे व् यक्‍ त के परररोध की जानकारी न होने पाए या इसमें इसके पूव ष वखणतष ककसी ऐसे व् यक्‍ त या िोक सेवक को, ऐसे परररोध के स् थान की जानकारी न होने पाए या उसका पता वह न चिा पाए, वह उस दण् ड के अनतरर‍ त, क्जसके लिए वह ऐसे सदोर् परररोध के लिए दण्ड नीय हो, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । (7) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् परररोध इस प्रयोजन से करता है कक उस परररुद्ध व् यक्‍ त से, या उससे हहतबद्ध ककसी व् यक्‍ त से, कोई सम् पवत्त या मू् यवान प्रनतभूनत उद्दावपत की जाए, या उस परररुद्ध व् यक्‍ त को या उससे हहतबद्ध ककसी व् यक्‍ त को, कोई ऐसी अवैध बात करने के लिए, या कोई ऐसी जानकारी देने के लिए क्जससे अपराध का ककया जाना सुकर हो जाए, मजबूर ककया जाए, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण् डत ककया जाएगा और जुमाषने का भीअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 67 दायी होगा । (8) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का सदोर् परररोध इस प्रयोजन से करता है कक उस परररुद्ध व् यक्‍ त से, या उससे हहतबद्ध ककसी व् यक्‍ त से, कोई संस् वीकृनत या कोई जानकारी, क्जससे ककसी अपराध या कदाचार का पता चि सके, उद्दावपत की जाए, या वह परररुद्ध व् यक्‍ त या उससे हहतबद्ध कोई व् यक्‍ त मजबूर ककया जाए कक वह ककसी सम् पवत्त या मू् यवान प्रनतभूनत को वापस करे या वापस करवाए या ककसी दाव े या मांग की तुक्ष् ट करे या कोई ऐसी जानकारी दे क्जससे ककसी सम् पवत्त या ककसी मू् यवान प्रनतभूनत को वापस कराया जा सके, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । आपराधिक बि और िमिा के विषय में 128. कोई व् यक्‍ त, ककसी अन्य व् यक्‍ त पर बि का प्रयोग करता है, यह कहा जाता बि । है, यहद वह उस अन्य व् यक्‍ त में गनत, गनत-पररवतनष या गनतहीनता काररत कर देता है या यहद वह ककसी पदाथ ष में ऐसी गनत, गनत-पररवतनष या गनतहीनता काररत कर देता है, क्जसस े उस पदाथ ष का स् पश ष उस अन्य व् यक्‍ त के शरीर के ककसी भाग से या ककसी ऐसी चीज से, हुए क्जसे वह अन्य व् यक्‍ त पहने है या िे जा रहा है, या ककसी ऐसी चीज से, जो इस प्रकार क्स् थत है कक ऐसे स्प श ष से उस अन्य व् यक्‍ त की संवेदन शक्‍ त पर प्रभाव पडता है : परंतु यह तब जबकक गनतमान, गनत-पररवतनष या गनतहीनता काररत करने वािा व् यक्‍ त उस गनत, गनत-पररवतनष या गनतहीनता को इसमें इसके पश्चात वखणतष तीन तरीकों में से ककसी एक द्वारा काररत करता है, अथाषत ् :— (क) अपनी ननजी शारीररक शक्‍ त द्वारा ; (ि) ककसी पदाथ ष के इस प्रकार व् ययन द्वारा कक उसके अपने या ककसी अन्य व् यक्‍ त द्वारा कोई अन्य काय ष के ककए जाने के बबना ही गनत या गनत-पररवतनष या गनतहीनता घहटत होती है ; (ग) ककसी जीव-जन्तु को गनतमान होने, गनत-पररवतनष करने या गनतहीन होने के लिए उत् प्रेरण द्वारा । 129. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त पर उस व् यक्‍ त की सम् मनत के बबना बि का प्रयोग आपराधधक बि । ककसी अपराध को करने के लिए, या ऐस े बि के प्रयोग से काररत करने के आशय से, या ऐसे बि के प्रयोग से सम् भाव् यत: उस व् यक्‍ त को, क्जस पर बि का प्रयोग ककया गया है, िनत, भय या िोभ, काररत करेगा यह जानते हुए साशय करता है, वह उस अन्य व् यक्‍ त पर आपराधधक बि का प्रयोग करता है, यह कहा जाता है । दृष् टांत (क) य नदी के ककनारे रस्स ी से बंधी हुई नाव पर बैठा है । क रक्स् सयों को िोि देता है और इस प्रकार नाव को धार में साशय बहा देता है । यहां क, य को साशय गनतमान करता है, और वह ऐसा उन पदाथों को ऐसी रीनत से व् ययननत करके करता है कक ककसी व् यक्‍ त की ओर से कोई अन्य काय ष ककए बबना ही गनत उत् पन्न हो जाती है । अतएव, क ने य पर बि का प्रयोग साशय ककया है, और यहद उसने य की सम् मनत के बबना ऐसा काय ष हुए हुए कोई अपराध करने के लिए या यह आशय रिते , या यह सम् भाव् य जानते ककया है68 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कक ऐसे बि के प्रयोग से वह य को िनत, भय या िोभ काररत करे, तो क ने य पर आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (ि) य एक रथ में सवार होकर चि रहा है । क, य के घोडों को चाबुक मारता है, और उसके द्वारा उनकी चाि को तेज कर देता है । यहां क ने जीव-जन्तुओं को उनकी अपनी गनत पररवनततष करने के लिए उत् प्रेररत करके य का गनत-पररवतनष कर हदया है । अतएव, क ने य पर बि का प्रयोग ककया है ; और यहद क ने य की सम् मनत के बबना यह काय ष यह आशय रिते हुए या यह सम् भाव् य जानते हुए ककया है कक वह उससे य को िनत, भय या िोभ उत् पन्न करे तो क ने य पर आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (ग) य एक पािकी में सवार होकर चि रहा है । य को िूटने का आशय रिते हुए क पािकी का डंडा पकड िेता है, और पािकी को रोक देता है । यहां, क ने य को गनतहीन ककया है, और यह उसने अपनी शारीररक शक्‍ त द्वारा ककया है, अतएव, क ने य पर बि का प्रयोग ककया है, और क ने य की सम् मनत के बबना यह काय ष अपराध करने के लिए साशय ककया है, इसलिए क ने य पर आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (घ) क सडक पर साशय य को ध‍ का देता है, यहां क ने अपनी ननजी शारीररक शक्‍ त द्वारा अपन े शरीर को इस प्रकार गनत दी है कक वह य के स् पश ष में आए । अतएव, उसने साशय य पर बि का प्रयोग ककया है, और यहद उसने य की सम् मनत के बबना यह काय ष यह आशय रिते हुए या यह सम् भाव् य जानते हुए ककया है कक वह उससे य को िनत, भय या िोभ उत् पन्न करे, तो उसने य पर आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (ङ) क यह आशय रिते हुए या यह बात सम् भाव् य जानते हुए एक पत्थ र फेंकता है कक वह पत् थर इस प्रकार य, या य के वस् त्र के या य द्वारा िे जाई जाने वािी ककसी वस् तु के स् पश ष में आएगा या यह कक वह पानी में धगरेगा और उछिकर पानी य के कपडों पर या य द्वारा िे जाई जाने वािी ककसी वस् तु पर जा पडेगा । यहां, यहद पत् थर के फेंके जाने से यह पररणाम उत् पन्न हो जाए कक कोई पदाथ ष य, या य के वस् त्रों के स् पश ष में आ जाए, तो क ने य पर बि का प्रयोग ककया है ; और यहद उसने य की सम् मनत के बबना यह काय ष उसके द्वारा य को िनत, भय या िोभ उत् पन्न करने का आशय रिते हुए ककया है, तो उसने य पर आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (च) क ककसी महहिा का घूंघट साशय हटा देता है । यहां, क ने उस पर साशय बि का प्रयोग ककया है, और यहद उसने उस महहिा की सम् मनत के बबना यह काय ष यह आशय हुए रिते यह सम् भाव् य जानते हुए ककया है कक उससे उसको िनत, भय या िोभ उत् पन्न हो, तो उसने उस आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (छ) य स् नान कर रहा है । क स् नान करने के टब में ऐसा जि डाि देता है क्जसे वह जानता है कक वह उबि रहा है । यहां, उबिते हुए जि में ऐसी गनत को अपनी शारीररक शक्‍ त द्वारा साशय उत् पन्न करता है कक उस जि का स् पश ष य से होता है या अन्य जि स े होता है, जो इस प्रकार क्स् थत है कक ऐस े स् पश ष स े य की संवेदन शक्‍ त प्रभाववत होती है ; इसलिए क ने य पर साशय बि का प्रयोग ककया है, और यहद उसने य की सम्म नत के बबना यह काय ष यह आशय रिते हुए या यह सम् भाव् य जानते हुए ककया है कक वह उससे य को िनत, भय या िोभ उत् पन्न करे, तो क ने आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । (ज) क, य की सम् मनत के बबना, एक कुत्ते को य पर झपटने के लिए भडकाता है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 69 यहां यहद क का आशय य को िनत, भय या िोभ काररत करने का है तो उसने य पर आपराधधक बि का प्रयोग ककया है । 130. जो कोई, कोई अंगवविेप या कोई तैयारी इस आशय से करता है, या यह हमिा । सम् भाव् य जानते हुए करता है कक ऐसे अंगवविेप या ऐसी तैयारी करने से ककसी उपक्स्थ त व् यक्‍ त को यह आशंका हो जाए कक जो वसै ा अंगवविेप या तैयारी करता है, वह उस व् यक्‍ त पर आपराधधक बि का प्रयोग करने ही वािा है, वह हमिा करता है, यह कहा जाता है । स्पष् टीकरण—केवि शब् द हमिे की कोहट में नहीं आते हैं । ककन् त ु जो शब् द कोई व् यक्‍ त प्रयोग करता है, वे उसके अंगवविेप या तैयाररयों को ऐसा अथ ष दे सकते हैं क्जससे वे अंगवविेप या तैयाररयां हमिे की कोहट में आ जाए ं । दृष् टांत (क) य पर अपना मु‍ का क इस आशय से या यह सम् भाव् य जानते हुए हहिाता है कक उसके द्वारा य को यह ववश् वास हो जाए कक क, य को मारने वािा ही है । क ने हमिा ककया है । (ि) क एक उि कुत्ते की मुिबन्धनी इस आशय से या यह सम् भाव् य जानते हुए िोिना आरंभ करता है कक उसके द्वारा य को यह ववश् वास हो जाए कक वह य पर कुत्ते से आक्रमण कराने ही वािा है । क ने य पर हमिा ककया है । (ग) य स े यह कहते हुए कक “म ैं तुम् हें पीटूंगा” क एक छडी उठा िेता है । यहां यद्यवप क द्वारा प्रयोग में िाए गए शब् द ककसी अवस् था में हमिे की कोहट में नहीं आते और यद्यवप केवि अंगवविेप बनाना क्जसके साथ ककन्हीं अन्य पररक्स् थनतयों का अभाव है, हमिे की कोहट में न भी आए, तथावप शब् दों द्वारा स्प ष् टीकृत वह अंगवविेप हमिे की कोहट में आ सकता है । 131. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त पर हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग उस व् यक्‍ त गम् भीर प्रकोपन होने स े अन् यथा द्वारा गम्भ ीर और अचानक प्रकोपन हदए जान े पर करने से अन्य था करता है, वह दोनों में हमिा करने या से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमानष े से, आपराधधक बि जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । का प्रयोग करने के लिए दण् ड । स् पष् टीकरण 1—गम् भीर और अचानक प्रकोपन से, इस धारा के अधीन ककसी अपराध के दण्ड में कमी नहीं होगी,— (क) यहद वह प्रकोपन अपराध करने के लिए प्रनतहेतु के रूप में अपराधी द्वारा वांनछत या स् वेच् छया प्रकोवपत ककया गया है ; या (ि) यहद वह प्रकोपन ककसी ऐसी बात द्वारा हदया गया है जो ववधध के पािन में, या ककसी िोक सेवक द्वारा ऐसे िोक सेवक की शक्‍ त के ववधधपूण ष प्रयोग में की गई है ; या (ग) यहद वह प्रकोपन ककसी ऐसी बात द्वारा हदया गया है जो प्राइवेट प्रनतरिा के अधधकार के ववधधपूण ष प्रयोग में की गई है । स् पष् टीकरण 2—प्रकोपन, अपराध को कम करने के लिए पयाषप् त गम् भीर और अचानक था या नहीं, यह तथ् य का प्रश् न है ।70 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— िोक सेवक को 132. जो कोई, ककसी ऐसे व्य क्‍ त पर, जो िोक सेवक है, उस समय जब वैस े िोक अपने कतव्ष य के सेवक के नाते वह उसके अपने कतव्ष य का ननष् पादन कर रहा है, या इस आशय से कक उस ननवहष न स े व् यक्‍ त को वैसे िोक सेवक के नाते अपने कतव्ष य के ननवषहन से ननवाररत करे या भयोपरत भयोपरत करने के लिए हमिा करे या ऐसे िोक सेवक के नाते उसके अपने कतव्ष य के ववधधपूण ष ननवहष न में की गई या की या आपराधधक जाने के लिए प्रयत् न ककए गए ककसी बात के पररणामस् वरूप हमिा करता है या आपराधधक बि का प्रयोग । बि का प्रयोग करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । गम् भीर प्रकोपन 133. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त पर हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग उस व् यक्‍ त होने से अन् यथा द्वारा गम्भ ीर और अचानक प्रकोपन हदए जाने पर करने से अन्य था, इस आशय से करता है ककसी व् यक्‍त कक उसके द्वारा उसका अनादर ककया जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, का अनादर करने के आशय स े उस क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े स,े या दोनों से, दक्ण्ड त ककया पर हमिा या जाएगा । आपराधधक बि का प्रयोग । ककसी व् यक्‍त 134. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त पर ककसी ऐसी सम् पवत्त की चोरी करन े के प्रयत् न में द्वारा िे जाई हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग करता है क्जसे वह व् यक्‍ त उस समय पहने हुए है, या जाने वािी िे जा रहा है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की संपवत्त की चोरी के प्रयत् नों में हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग । ककसी व् यक्‍त 135. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त पर हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग उस व् यक्‍ त का का सदोर् सदोर् परररोध करने का प्रयत् न करने में करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास परररोध करने के से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का प्रयत् न में हमिा या आपराधधक हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । बि का प्रयोग । गम् भीर प्रकोपन 136. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त पर हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग उस व् यक्‍ त पर हमिा या द्वारा हदए गए गम् भीर और अचानक प्रकोपन पर करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी आपराधधक बि अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा का प्रयोग । या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । स् पष् टीकरण—यह धारा उसी स् पष् टीकरण के अध् यधीन है, क्जसके अध् यधीन धारा 131 है । व्यपिरण, अपिरण, िासत् ि और बिात ् श्रम के विषय में व्यपहरण । 137. (1) व्यपहरण दो ककस् म का होता है ; भारत में से व्यपहरण और ववधधपूणष संरिकता में से व्यपहरण— (क) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का, उस व् यक्‍ त की, या उस व् यक्‍ त की ओर स े सम् मनत देने के लिए वैध रूप से प्राधधकृत ककसी व् यक्‍ त की सम् मनत के बबना, भारत की सीमाओं स े परे पहुाँचा देता है, वह भारत में से उस व् यक्‍ त का व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 71 (ि) जो कोई, ककसी लशश ु को या ककसी ववकृतधचत्त व् यक्‍ त को, ऐस े लशशु या ववकृतधचत्त व् यक्‍ त के ववधधपूण ष संरिकता में से ऐसे संरिक की सम् मनत के बबना िे जाता है या बहका िे जाता है, वह ऐसे लशश ु या ऐस े व् यक्‍ त का ववधधपूण ष संरिकता में से व्यपहरण करता है, यह कहा जाता है । स् पष् टीकरण—इस िंड में “ववधधपूण ष सरंिक” शब् दों के अन्त गतष ऐसा व् यक्‍ त आता है, क्जस पर ऐसे लशशु या अन्य व् यक्‍ त की देि-रेि या अलभरिा का भार ववधधपूवकष न् यस् त ककया गया है । अपिाि—इस िंड का ववस् तार ककसी ऐसे व् यक्‍ त के काय ष पर नहीं है, क्जसे सद्भ ावपूवकष यह ववश् वास है कक वह ककसी अधमजष लशशु का वपता है, या क्जसे सद् भावपवू कष यह ववश् वास है कक वह ऐसे लशशु की ववधधपूण ष अलभरिा का हकदार है, जब तक कक ऐसा काय ष अनैनतक या ववधधववरुद्ध प्रयोजन के लिए न ककया जाए । (2) जो कोई, भारत में से या ववधधपूण ष संरिकता में से ककसी व् यक्‍ त का व्यपहरण करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 138. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त को ककसी स् थान से जान े के लिए बि द्वारा वववश अपहरण । करता है, या ककन् हीं छियु‍त उपायों द्वारा उत् प्रेररत करता है, वह उस व् यक्‍ त का अपहरण करता है, यह कहा जाता है । 139. (1) जो कोई, ककसी लशशु का इसलिए व्यपहरण करता है या लशश ु का ववधधपूण ष भीि मांगन े के प्रयोजनों के लिए संरिक स् वयं न होते हुए लशशु की अलभरिा इसलिए अलभप्राप् त करता है कक ऐसा लशश ु भीि लशश ु का मांगने के प्रयोजनों के लिए ननयोक्जत या प्रयु‍ त ककया जाए, वह कहठन कारावास से, व्यपहरण या ववकिागं ीकरण । क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दण्ड नीय होगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (2) जो कोई, ककसी लशश ु को ववकिांग इसलिए करता है कक ऐसा लशश ु भीि मांगने के प्रयोजनों के लिए ननयोक्जत या प्रयु‍ त ककया जाए, वह कारावास से, क्जसकी अवधध बीस वर् ष से कम नहीं होगी, ककन्तु जो आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, तक की हो सकेगी, और जुमाषने से भी, दक्ण् डत ककया जाएगा । (3) जहां कोई व् यक्‍ त, जो लशशु का ववधधपूण ष संरिक नहीं है, उस लशश ु को भीि मांगने के प्रयोजनों के लिए ननयोक्जत या प्रयु‍ त करता है, वहां जब तक कक इसके प्रनतकूि साबबत न कर हदया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कक उसने इस उद्देश् य स े उस लशश ु का व्यपहरण ककया था या अन्य था उसकी अलभरिा अलभप्राप् त की थी कक वह लशश ु भीि मांगने के प्रयोजनों के लिए ननयोक्जत या प्रयु‍ त ककया जाए । (4) इस धारा में “भीि मांगन”े से ननम्नलिखित अलभप्रेत है— (i) िोक स् थान में भीि की याचना या प्राक्प् त, चाहे गाने, नाचने, भाग् य बताने, करतब हदिाने या चीजें बेचने के बहाने या अन्य था करना ; (ii) भीि की याचना करने या प्राक्प् त के प्रयोजन से ककसी ननजी पररसर में प्रवेश करना ;72 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (iii) भीि अलभप्राप् त या उद्दावपत करने के उद्देश् य से अपना या ककसी अन् य व् यक्‍ त का या जीव-जन्तु का कोई जख्म, घाव, िनत, ववरूपता या रोग अलभदलशतष या प्रदलशतष करना ; (iv) भीि की याचना करने या प्राक्प् त के प्रयोजन से लशश ु का प्रदशनष के रूप में प्रयोग करना । हत् या करने के 140. (1) जो कोई, इसलिए ककसी व् यक्‍ त का व्यपहरण या अपहरण करता है कक ऐसे लिए या कफरौती, व् यक्‍ त की हत् या की जाए या उसको ऐस े व् ययननत ककया जाए कक वह अपनी हत् या होने के आहद के लिए ितरे में पड जाए, वह आजीवन कारावास से या कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष व्यपहरण या अपहरण । तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । दृष् टांत (क) क इस आशय से या यह सम् भाव् य जानते हुए कक ककसी देव मूनत ष पर य की बलि चढ़ाई जाए, भारत में से य का व्यपहरण करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (ि) ख को उसके घर से क इसलिए बिपूवकष या बहकाकर िे जाता है कक ख की हत् या की जाए । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (2) जो कोई, इसलिए ककसी व् यक्‍ त का व्यपहरण या अपहरण करता है या ऐस े व्यपहरण या अपहरण के पश् चात ् ऐसे व् यक्‍ त को अवरोध में रिता है और ऐसे व् यक्‍ त की मत्ृ यु या उसकी उपहनत काररत करने की धमकी देता है या अपने आचरण से ऐसी युक्‍ तयु‍ त आशंका पैदा करता है कक ऐसे व् यक्‍ त की हत्या या उपहनत काररत की जा सकती है या ऐसे व् यक्‍ त को उपहनत या उसकी मत्ृ यु काररत करता है क्जससे कक सरकार या ककसी ववदेशी राज् य या अंतरराष् रीय अंतर-शासनात्मक संगठन या ककसी अन्य व् यक्‍ त को ककसी काय ष को करने या करने से ववरत रहने के लिए या कफरौती देने के लिए वववश ककया जाए, वह मत्ृ यु या आजीवन कारावास से दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (3) जो कोई, इस आशय से ककसी व् यक्‍ त का व्यपहरण या अपहरण करता है कक उसका गुप् त रूप से और सदोर् परररोध ककया जाए, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जो कोई, ककसी व् यक्‍ त का व् यपहरण या अपहरण इसलिए करता है कक उसे घोर उपहनत या दासत् व का या ककसी व् यक्‍ त की प्रकृनत ववरुद्ध काम वासना का ववर्य बनाया जाए या बनाए जाने के ितरे में पड सकता है वैसे उसे व् ययननत ककया जाए या सम् भाव् य जानते हुए करता है कक ऐसे व्य क्‍ त को उपयु‍ष त बातों का ववर्य बनाया जाएगा या उपयु‍ष त रूप से व् ययननत ककया जाएगा, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । ववदेश स े 141. जो कोई, इ‍ कीस वर् ष से कम आयु की ककसी बालिका को, या अठारह वर् ष से बालिका या कम आयु के ककसी बािक को, भारत के बाहर के ककसी देश से, उस बालिका या बािक को, बािक का ककसी अन्य व् यक्‍ त से अनुधचत संभोग करने के लिए वववश या वविुब् ध करने के आशय से, आयात करना । या यह सम्भ ाव् य जानते हुए कक इसके द्वारा बालिका या बािक को वववश या वविुब्ध ककया जा सकेगा, भारत में आयात करता है, वह कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्ड त ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 73 142. जो कोई, यह जानते हुए कक कोई व् यक्‍ त व् यपहृत या अपहृत ककया गया है, ऐसे व् यपहृत या अपहृत व् यक्‍ त व् यक्‍ त को सदोर् नछपाता है या परररोध में रिता है, वह उसी प्रकार दक्ण्ड त ककया जाएगा, को सदोर् मानो उसने उसी आशय या ज्ञान या प्रयोजन से ऐसे व् यक्‍ त का व् यपहरण या अपहरण नछपाना या ककया है, क्जससे उसने ऐसे व्य क्‍ त को नछपाया या परररोध में ननरुद्ध रिा है । परररोध में रिना । 143. (1) जो कोई, शोर्ण के प्रयोजन से,— व् यक्‍ त का दव्ु याषपार । (क) धमककयों का प्रयोग करके ; या (ि) बि, या ककसी भी अन्य प्रकार के प्रपीडन का प्रयोग करके ; या (ग) अपहरण द्वारा ; या (घ) कपट का प्रयोग करके या प्रवंचना द्वारा ; या (ङ) शक्‍ त का दरुु पयोग करके ; या (च) उत् प्रेरणा द्वारा, क्जसके अंतगतष ऐसे ककसी व्यक्‍ त की, जो भती ककए गए, पररवहननत, संधश्रत, स्थानांतररत या गहृ ीत व्यक्‍ त पर ननयंत्रण रिता है, सम्मनत प्राप् त करने के लिए भुगतान करना या फायदे देना या प्राप्त करना भी आता है, ककसी व्यक्‍ त या ककन्हीं व्यक्‍ तयों को भती करता है, पररवहननत करता है, संश्रय देता है, स्थानांतररत करता है, या गहृ ीत करता है, वह दव्ु याषपार का अपराध करता है । स्पष् टीकरण 1—“शोर्ण” पद के अंतगतष शारीररक शोर्ण का कोई कृत्य या ककसी प्रकार का िधैंगक शोर्ण, दासता, या दासता के समान व्यवहार, अधधसेववता, लभिाववृत्त या अंगों का बिात ् अपसारण भी है । स्पष् टीकरण 2—दव्ु याषपार के अपराध के अवधारण में, पीडडत की सम्मनत महत्वहीन है । (2) जो कोई, दव्ु याषपार का अपराध करता है वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंत ु जो दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (3) जहां अपराध में एक से अधधक व्यक्‍ तयों का दव्ु याषपार अंतवलषित है, वहां वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जहां अपराध में ककसी लशशु का दव्ु याषपार अंतवलषित है, वहां वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंत ु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (5) जहां अपराध में एक से अधधक लशशु का दव्ु याषपार अंतवलषित है, वहां वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध चौदह वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंत ु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । (6) यहद ककसी व्यक्‍ त को ककसी लशशु का एक से अधधक अवसरों पर दव्ु याषपार ककए जाने के अपराध के लिए लसद्धदोर् ठहराया जाता है तो ऐसा व्यक्‍ त आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍ त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, से दंडडत74 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (7) जहां कोई िोक सेवक या कोई पुलिस अधधकारी, ककसी व्यक्‍ त के दव्ु याषपार में अंतवलषित है, वहां ऐसा िोक सेवक या पुलिस अधधकारी आजीवन कारावास, क्जससे उस व्यक्‍ त के शेर् प्राकृत जीवनकाि के लिए कारावास अलभप्रेत होगा, से दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । दव्ु याषपार ककए 144. (1) जो कोई, यह जानत े हुए या इस बात का ववश् वास करन े का कारण रिते हुए गए ककसी कक ककसी लशशु का दव्ु याषपार ककया गया है, ऐसे लशशु को ककसी भी रीनत में िधैंगक शोर्ण व्यक्‍त का के लिए रिता है, वह कठोर कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष से कम की नहीं होगी, शोर्ण । ककंतु जो दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (2) जो कोई, यह जानत े हुए या इस बात का ववश् वास करन े का कारण रित े हुए कक ककसी व्यक्‍ त का दव्ु याषपार ककया गया है, ऐसे व्यक्‍ त को ककसी भी रीनत में िधैंगक शोर्ण के लिए रिता है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष से कम की नहीं होगी, ककंतु जो सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । दासों का 145. जो कोई, अभ् यासत: दासों को आयात करता है, ननयाषत करता है, अपसाररत आभ् यालसक करता है, िरीदता है, बेचता है या उनका दव्ु याषपार करता है या व् यौहार करता है, वह व् यौहार करना । आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर्ष से अधधक की नहीं होगी, दक्ण् डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । ववधधववरुद्ध 146. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त को उस व् यक्‍ त की इच् छा के ववरुद्ध श्रम करने के लिए अननवाय ष श्रम । ववधधववरुद्ध तौर पर वववश करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । अध्याय 7 राज्य के विरुद्ि अपरािों के विषय में भारत सरकार के 147. जो कोई, भारत सरकार के ववरुद्ध युद्ध करता है, या ऐसा युद्ध करन े का ववरुद्ध युद्ध प्रयत् न करता है या ऐसा युद्ध करन े का दष्ु प्रेरण करता है, वह मत्ृ य ु या आजीवन कारावास करना या युद्ध से दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । करने का प्रयत् न करना या युद्ध दृष् टांत करने का दष्ु प्रेरण करना । क भारत सरकार के ववरुद्ध ववरोह में सक्म्मलित होता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । धारा 147 द्वारा 148. जो कोई, धारा 147 द्वारा दंडनीय अपराधों में स े कोई अपराध करन े के लिए दंडनीय अपराधों भारत के भीतर या बाहर र्ड यंत्र करता है या केंरीय सरकार को या ककसी राज्य की सरकार को करन े का को आपराधधक बि द्वारा या आपराधधक बि के प्रदशनष द्वारा आतंककत करने का र्ड यंत्र र्ड यंत्र । करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण—इस धारा के अधीन र्डय ंत्र गहठत होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कक उसके अनुसरण में कोई काय ष या अवैध िोप गहठत हुआ हो ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 75 149. जो कोई, भारत सरकार के ववरुद्ध या तो युद्ध करने, या युद्ध करन े की तैयारी भारत सरकार के ववरुद्ध करन े के आशय से पुरुर्, आयुध या गोिाबारूद संिह करता है, या अन्यथा युद्ध करन े की युद्ध करन े के तैयारी करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से क्जसकी आशय स े अवधध दस वर् ष से अधधक की नहीं होगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । आयुध, आहद का संिह करना । 150. जो कोई, भारत सरकार के ववरुद्ध युद्ध करने की पररक्पना के अक्स्तत्व को युद्ध करन े की पररक्पना को ककसी काय ष द्वारा, या ककसी अवैध िोप द्वारा, इस आशय से कक इस प्रकार नछपाने के सुकर बनाने के द्वारा ऐस े युद्ध करन े को सकु र बनाए, या यह सम्भाव्य जानत े हुए कक इस प्रकार नछपाने आशय स े के द्वारा ऐसे युद्ध करन े को सुकर बनाएगा, नछपाएगा, वह दोनों में स े ककसी भांनत के नछपाना । कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । 151. जो कोई, भारत के राष् रपनत या ककसी राज्य के राज्यपाि को ऐसे राष् रपनत या ककसी ववधधपूण ष शक्‍ त का प्रयोग राज्यपाि की ववधधपूण ष शक्‍ तयों में से ककसी शक्‍ त का ककसी प्रकार प्रयोग करने के लिए या करन े के लिए प्रयोग करन े से ववरत रहन े के लिए उत् प्रेररत करन े या वववश करन े के आशय से, ऐसे वववश करने या राष् रपनत या राज्यपाि पर हमिा करता है या उसका सदोर् अवरोध करता है, या सदोर् उसका प्रयोग अवरोधधत करन े अवरोध करन े का प्रयत् न करता है या उस े आपराधधक बि द्वारा या आपराधधक बि के के आशय स े प्रदशनष द्वारा आतंककत करता है या ऐस े आतंककत करन े का प्रयत् न करता है, वह दोनों में से राष् रपनत, ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया राज्यपाि, आहद पर हमिा जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । करना । 152. जो कोई, प्रयोजनपूवषक या जानबूझकर, बोिे गए या लििे गए शब्दों द्वारा या भारत की संप्रभुता, एकता संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण या इिै‍राननक संसूचना द्वारा या ववत्तीय साधन के प्रयोग द्वारा और अिंडता या अन्यथा अिगाव या सशस्त्र ववरोह या ववध्वंसक कक्रयाकिापों को प्रदीप्त करता है या को ितरे में प्रदीप्त करने का प्रयत्न करता है या अिगाववादी कक्रयाकिापों की भावना को बढ़ावा देता है या डािने वाि े भारत की संप्रभुता या एकता और अिंडता को ितरे में डािता है या ऐसे कृत्य में सक्म्मलित काय ष । होता है या उसे काररत करता है, वह आजीवन कारावास से, या ऐसे कारावास से जो सात वर्ष तक हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष्टीकरण—इस धारा में ननहदषष्ट कक्रयाकिाप प्रदीप्त ककए बबना या प्रदीप्त करने का प्रयत्न के बबना ववधधपूण ष साधनों द्वारा उनको पररवनततष कराने की दृक्ष्ट से सरकार के उपायों या प्रशासननक या अन्य कक्रया के प्रनत अननुमोदन प्रकट करन े वािी टीका-हटप्पखणयां, इस धारा के अधीन अपराध का गठन नहीं करती है । 153. जो कोई, भारत सरकार से शांनत का संबंध रिने वािे ककसी ववदेशी राज्य की भारत सरकार से शांनत का सरकार के ववरुद्ध युद्ध करता है या ऐसा युद्ध करन े का प्रयत् न करता है, या ऐसा युद्ध संबंध रिन े करन े के लिए दष्ु प्रेरण करता है, वह आजीवन कारावास से, क्जसमें जुमाषना जोडा जा सकेगा वािे ककसी या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, ववदेशी राज्य के क्जसमें जुमाषना जोडा जा सकेगा या जुमाषन े से दंडडत ककया जाएगा । ववरुद्ध युद्ध करना ।76 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— भारत सरकार के 154. जो कोई, भारत सरकार से शांनत का संबंध रिन े वािे ककसी ववदेशी राज्य के साथ शांनत का राज्यिेत्र में िूटपाट करता है, या िूटपाट करन े की तैयारी करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत संबंध रिने वाि े के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और वह ववदेशी राज्य के राज्यिेत्र में जुमाषने का और ऐसी िूटपाट करन े के लिए उपयोग में िाई गई या उपयोग में िाई जाने के िूटपाट करना । लिए आशनयत, या ऐसी िूटपाट द्वारा अक्जषत संपवत्त की जब्ती का भी दायी होगा । धारा 153 और 155. जो कोई, ककसी सम्पवत्त को यह जानत े हुए प्राप्त करता है कक वह धारा 153 धारा 154 में और धारा 154 में वखणतष अपराधों में स े ककसी के ककए जान े में िी गई है वह दोनों में स े वखणतष युद्ध या ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया िूटपाट द्वारा िी गई सम्पवत्त जाएगा और वह जुमाषने से और इस प्रकार प्राप् त की गई संपवत्त की जब्ती का भी दायी प्राप् त करना । होगा । िोक सेवक का 156. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए और ककसी राजकैदी या युद्धकैदी को अलभरिा में स्वेच्छया रित े हुए, स्वेच्छया ऐसे कैदी को ककसी ऐसे स्थान से, क्जसमें ऐसा कैदी परररुद्ध है, ननकि राजकैदी या भागने देता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी युद्धकैदी को ननकि भागन े अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । देना । उपेिा स े िोक 157. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए और ककसी राजकैदी या युद्धकैदी को अलभरिा में सेवक का ऐस े रित े हुए उपेिा से ऐसे कैदी का ककसी ऐसे परररोध स्थान से, क्जसमें ऐसा कैदी परररुद्ध है, कैदी का ननकि ननकि भागना सहन करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो भागना सहन करना । सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । ऐसे कैदी के 158. जो कोई, यह जानत े हुए ककसी राजकैदी या युद्धकैदी को ववधधपूण ष अलभरिा से ननकि भागन े में ननकि भागने में मदद करता है या सहायता देता है, या ककसी ऐस े कैदी को छुडाता है, या मदद करना, उस े छुडाने का प्रयत् न करता है, या ककसी ऐसे कैदी को, जो ववधधपूणष अलभरिा से ननकि भागा छुडाना या संश्रय देना । है, संश्रय देता है या नछपाता है या ऐसे कैदी के कफर स े पकडे जाने का प्रनतरोध करता है या करन े का प्रयत् न करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण—कोई राजकैदी या युद्धकैदी, क्जसे अपने परै ोि पर भारत में कनतपय सीमाओं के भीतर, समि रूप स े ववचरण की अनुमनत है, ववधधपूण ष अलभरिा से ननकि भागा है, यह तब कहा जाता है, जब वह उन सीमाओ ं से, क्जनके भीतर उस े समि रूप स े ववचरण की अनुमनत है, परे चिा जाता है। अध्याय 8 सेिा, िौसेिा और िायुसिे ा से संबंधित अपरािों के विषय में ववरोह का 159. जो कोई, भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के ककसी अधधकारी, दष्ु प्रेरण या ककसी सैननक, नौसैननक या वायुसैननक द्वारा ववरोह ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है, या ककसी ऐस े सैननक, नौसैननक अधधकारी, सैननक, नौसैननक या वायुसैननक को उसकी ननष् ठा या उसके कतव्ष य से ववचलित या वायुसैननक को कतव्ष य स े करन े का प्रयत् न करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास ववचलित करने से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी का प्रयत् न होगा । करना ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 77 160. जो कोई, भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के ककसी अधधकारी, ववरोह का सैननक, नौसैननक या वायुसैननक द्वारा ववरोह ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है, यहद उस दष्ु प्रेरण, यहद उसके दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप ववरोह हो जाए, तो वह मत्ृ यु से या आजीवन कारावास से, या पररणामस्वरूप दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ववरोह ककया ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । जाए । 161. जो कोई, भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के ककसी अधधकारी, सैननक, नौसनैनक या वायुसनैनक सैननक, नौसैननक या वायुसैननक द्वारा ककसी वररष् ठ अधधकारी पर, जब वह अधधकारी अपने द्वारा अपन े पद-ननष्पादन में हो, हमिे का दष्ु प्रेरण करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, वररष् ठ अधधकारी क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और वह जुमाषन े का भी पर, जब वह अधधकारी अपन े दायी होगा । पद-ननष्पादन में हो, हमिे का दष्ु प्ररे ण । 162. जो कोई, भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के अधधकारी, सैननक, ऐस े हमि े का दष्ु प्रेरण, यहद नौसैननक या वायुसैननक द्वारा ककसी वररष् ठ अधधकारी पर, जब वह अधधकारी अपने पद- हमिा ककया ननष्पादन में हो, हमिे का दष्ु प्र ेरण करता है, यहद ऐसा हमिा उस दष्ु प्र ेरण के पररणामस्वरूप जाए । ककया जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 163. जो कोई, भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना के ककसी अधधकारी, सैननक, नौसैननक या सैननक, नौसैननक या वायुसैननक द्वारा अलभत्यजन ककए जाने का दष्ु प्रेरण करता है, वह दोनों वायुसैननक में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, द्वारा या दोनों से दंडडत ककया जाएगा । अलभत्यजन का दष्ु प्रेरण । 164. जो कोई, इसमें इसके पश्चात यथा अपवाहदत के लसवाय, यह जानते हुए या यह अलभत्याजक को संश्रय देना । ववश् वास करन े का कारण रित े हुए कक भारत सरकार की सने ा, नौसेना या वायुसेना के ककसी अधधकारी, सैननक, नौसैननक या वायुसैननक ने अलभत्यजन ककया है, ऐसे अधधकारी, सैननक, नौसैननक या वायुसैननक को संश्रय देता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से दंडडत ककया जाएगा । अपिाि—इस उपबंध का ववस्तार उस मामिे पर नहीं है, क्जसमें अलभत्याजक के पनत या पत्न ी द्वारा संश्रय हदया जाता है । 165. ककसी ऐस े वाखणक्ज्यक जियान का, क्जस पर भारत सरकार की सेना, नौसेना या मास्टर की उपेिा से ककसी वायुसेना का कोई अलभत्याजक नछपा हुआ है, मास्टर या भारसाधक व्यक्‍ त, यद्यवप वह ऐसे वाखणक्ज्यक नछपने के संबंध में अनलभज्ञ हो, ऐसी शाक्स्त से दंडडत ककया जाएगा, जो तीन हजार रुपए स े जियान पर अधधक नहीं होगी, यहद उस े ऐसे नछपने का ज्ञान हो सकता था ककंतु केवि इस कारण नहीं नछपा हुआ हुआ कक ऐसे मास्टर या भारसाधक व्यक्‍ त के नात े उसके कतव्ष य में कुछ उपेिा हुई, या उस अलभत्याजक । जियान पर अनुशासन का कुछ अभाव था ।78 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सैननक, नौसैननक 166. जो कोई, ऐसी बात का दष्ु प्रेरण करता है क्जसे वह भारत सरकार की सेना, या वायुसैननक नौसेना या वायुसेना के ककसी अधधकारी, सैननक, नौसैननक या वायुसैननक द्वारा अनधीनता द्वारा अनधीनता का काय ष जानता हो, यहद अनधीनता का ऐसा काय ष उस दष्ु प्रेरण के पररणामस्वरूप ककया के काय ष का दष्ु प्रेरण । जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । कनतपय 167. वायुसेना अधधननयम, 1950, सेना अधधननयम, 1950 या नौसेना अधधननयम, 1950 का 45 अधधननयमों के 1957 के अध्यधीन कोई व्यक्‍ त, इस अध्याय में पररभावर्त अपराधों में से ककसी के लिए, 1950 का 46 अध्यधीन इस संहहता के अधीन दंडनीय नहीं होगा । व्यक्‍ त । 1957 का 62 सैननक, नौसैननक 168. जो कोई, भारत सरकार की सेना, नौसेना या वायुसेना का सैननक, नौसैननक या या वायुसैननक वायुसैननक न होत े हुए, इस आशय से कक यह ववश् वास ककया जाए कक वह ऐसा सैननक, द्वारा उपयोग में नौसैननक या वायुसैननक है, ऐसी कोई पोशाक पहनता है या ऐसा टोकन धारण करता है जो ऐसे िाई जान े वािी पोशाक पहनना सैननक, नौसैननक या वायुसैननक द्वारा उपयोग में िाई जाने वािी पोशाक या टोकन के सदृश या टोकन धारण है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या करना । जुमाषने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । अध्याय 9 नििाभचि संबंिी अपरािों के विषय में अभ्यथी, 169. इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए— ननवाषचन अधधकार (क) “अभ्यथी” स े वह व्यक्‍ त अलभप्रेत है, जो ककसी ननवाषचन में अभ्यथी के पररभावर्त । रूप में नामननहदषष् ट ककया गया है ; (ि) “ननवाषचन अधधकार” स े ककसी ननवाषचन में अभ्यथी के रूप में िडे होने या िडे न होने या अभ्यथी होने से अपना नाम वापस िेने या मत देने या मत देने से ववरत रहने का ककसी व्यक्‍ त का अधधकार अलभप्रेत है । ररश् वत । 170. (1) जो कोई— (i) ककसी व्यक्‍ त को इस उद्देश्य से पररतोर्ण देता है कक वह उस व्यक्‍ त को या ककसी अन्य व्यक्‍ त को ककसी ननवाषचन अधधकार का प्रयोग करन े के लिए उत् प्रेररत करे या ककसी व्यक्‍ त को इसलिए इनाम दे कक उसने ऐसे अधधकार का प्रयोग ककया है; या (ii) स्वयं अपने लिए या ककसी अन्य व्यक्‍ त के लिए कोई पररतोर्ण ऐसे ककसी अधधकार को प्रयोग में िाने के लिए या ककसी अन्य व्यक्‍ त को ऐस े ककसी अधधकार को प्रयोग में िाने के लिए उत् प्रेररत करने या उत् प्रेररत करन े का प्रयत् न करन े के लिए इनाम के रूप में प्रनतगहृ ीत करता है, वह ररश् वत का अपराध करता है : परंतु िोक नीनत की घोर्णा या िोक कायवष ाही का वचन, इस धारा के अधीन अपराध नहीं होगा । (2) जो व्यक्‍ त पररतोर्ण देने की प्रस्थापना करता है या देने को सहमत होता है या उपाप् त करन े की प्रस्थापना या प्रयत् न करता है, यह समझा जाएगा कक वह पररतोर्ण देता है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 79 (3) जो व्यक्‍त पररतोर्ण अलभप्राप् त करता है या प्रनतगहृ ीत करन े को सहमत होता है या अलभप्राप् त करन े का प्रयत्न करता है, यह समझा जाएगा कक वह पररतोर्ण प्रनतगहृ ीत करता है और जो व्यक्‍त वह बात करन े के लिए, क्जसे करन े का उसका आशय नहीं है, हेतु स्वरूप, या जो बात उसने नहीं की है उस े करन े के लिए इनाम के रूप में पररतोर्ण प्रनतगहृ ीत करता है, यह समझा जाएगा कक उसने पररतोर्ण को इनाम के रूप में प्रनतगहृ ीत ककया है । 171. (1) जो कोई, ककसी ननवाषचन अधधकार के ननबाषध प्रयोग में स्वेच्छया हस्तिेप ननवाषचनों में असम्यक् असर करता है या हस्तिेप करन े का प्रयत् न करता है, वह ककसी ननवाषचन में असम्यक् असर डािना । डािने का अपराध करता है । (2) उपधारा (1) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रनतकूि प्रभाव डािे बबना, जो कोई— (क) ककसी अभ्यथी या मतदाता को, या ककसी ऐस े व्यक्‍ त को, क्जसस े अभ्यथी या मतदाता हहतबद्ध है, ककसी प्रकार की िनत करन े की धमकी देता है ; या (ि) ककसी अभ्यथी या मतदाता को यह ववश् वास करन े के लिए उत् प्रेररत करता है या उत् प्रेररत करन े का प्रयत् न करता है कक वह या कोई ऐसा व्यक्‍ त, क्जससे वह हहतबद्ध है, दैवी अप्रसाद या आध्याक्त्मक पररननन्दा का भाजन हो जाएगा या बना हदया जाएगा, यह समझा जाएगा कक वह उपधारा (1) के अथ ष के अंतगतष ऐसे अभ्यथी या मतदाता के ननवाषचन अधधकार के ननबाषध प्रयोग में हस्तिेप करता है । (3) िोक नीनत की घोर्णा या िोक कायवष ाही का वचन या ककसी वैध अधधकार का प्रयोग मात्र, जो ककसी ननवाषचन अधधकार में हस्तिेप करने के आशय के बबना है, इस धारा के अथ ष के अंतगतष हस्तिेप करना नहीं समझा जाएगा । 172. जो कोई, ककसी ननवाषचन में ककसी अन्य व्यक्‍ त के नाम से, चाहे वह जीववत हो ननवाषचनों में प्रनतरूपण । या मतृ , या ककसी कक््पत नाम से, मतपत्र के लिए आवेदन करता है या मत देता है, या ऐसे ननवाषचन में एक बार मत दे देने के पश् चात ् उसी ननवाचष न में अपने नाम से मतपत्र के लिए आवेदन करता है, और जो कोई ककसी व्यक्‍ त द्वारा ककसी ऐसे प्रकार स े मतदान को दष्ु प्रेररत करता है, उपाप् त करता है या उपाप् त करन े का प्रयत् न करता है, वह ननवाषचन में प्रनतरूपण का अपराध करता है : परंतु इस धारा की कोई भी बात ककसी ऐस े व्यक्‍ त को िागू नहीं होगी क्जसे तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन ककसी ननवाषचन के लिए परोिी के रूप में मत देने के लिए प्राधधकृत ककया गया है जहां तक वह ऐसे ननवाषचक के लिए परोिी के रूप में मतदान करता है । 173. जो कोई, ररश् वत का अपराध करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास ररश् वत के लिए से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमानष े से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया दण्ड । जाएगा : परंतु सत्कार के रूप में ररश् वत को, केवि जुमाषने स े ही दक्ण्डत ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—“सत्कार” से ररश् वत का वह रूप अलभप्रेत है जो पररतोर्ण, िाद्य, पेय, मनोरंजन या रसद के रूप में है ।80 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ननवाषचनों में 174. जो कोई, ककसी ननवाषचन में असम्यक् असर डािने का या प्रनतरूपण का अपराध असम्यक् असर करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो डािने या सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । प्रनतरूपण के लिए दण्ड । ननवाषचन के 175. जो कोई, ननवाषचन के पररणाम पर प्रभाव डािने के आशय से ककसी अभ्यथी के लसिलसि े में वैयक्‍ तक शीि या आचरण के संबंध में तथ्य का कथन तात्पनयतष होने वािा कोई ऐसा लमथ्या कथन । कथन करता है या प्रकालशत करता है, जो लमथ्या है, और क्जसका लमथ्या होना वह जानता है या ववश् वास करता है या क्जसके सत्य होने का वह ववश् वास नहीं करता है वह जुमाषने से दक्ण्डत ककया जाएगा । ननवाषचन के 176. जो कोई, ककसी अभ्यथी के साधारण या ववशेर् लिखित प्राधधकार के बबना ऐसे लसिलसि े में अभ्यथी का ननवाषचन अिसर करन े या ननवाषचन करा देने के लिए कोई सावजष ननक सभा अवैध संदाय । करन े में या ककसी ववज्ञापन, पररपत्र या प्रकाशन पर या ककसी भी अन्य ढंग से व्यय करता है या करना प्राधधकृत करता है, वह जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दक्ण्डत ककया जाएगा : परन्तु यहद कोई व्यक्‍ त, क्जसने प्राधधकार के बबना कोई ऐसा व्यय ककया है, जो कुि लमिाकर दस रुपए स े अधधक न हो, उस तारीि से क्जस तारीि को ऐस े व्यय ककए गए हों, दस हदन के भीतर उस अभ्यथी का लिखित अनुमोदन अलभप्राप् त कर िेता है, तो यह समझा जाएगा कक उसने ऐसे व्यय उस अभ्यथी के प्राधधकार से ककए हैं । ननवाषचन िेिा 177. जो कोई, ककसी तत्समय प्रवत्तृ ववधध द्वारा या ववधध का बि रिने वाि े ककसी रिने में ननयम द्वारा इसके लिए अपक्षेित होत े हुए कक वह ननवाषचन में या ननवाषचन के संबंध में असफिता । ककए गए व्ययों का िेिा रि,े ऐसा िेिा रिने में असफि रहता है, वह जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा । अध्याय 10 लसक् कों, करेंसी िोटों, बकैं िोटों और सरकारी स्टाम्पों से संबंधित अपरािों के विषय में लस‍कों, सरकारी 178. जो कोई, ककसी लस‍के, राजस्व के प्रयोजन के लिए सरकार द्वारा जारी ककए स्टांपों, करेंसी गये स्टाम्प, करेंसी नोट या बकैं नोट का कूटकरण करता है या यह जानते हुए कूटकरण की नोटों या बकैं नोटों का प्रकक्रया के ककसी भाग का संपादन करता है, वह आजीवन कारावास से या दोनों में स े ककसी कूटकरण । भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण—इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए,— (1) “बकैं -नोट” पद से उसके धारक की मांग पर धन के संदाय हेतु ऐसा वचन- पत्र या वचनबंध अलभप्रेत है जो ववश्व के ककसी भी भाग में बकैं कारी कारबार करने वािे ककसी व्यक्‍त द्वारा जारी या ककसी राज्य या प्रभुत्वसंपन्न शक्‍त के प्राधधकार द्वारा जारी और प्राधधकार के अधीन प्रचालित धन के समतु्य या उसके स्थान परअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 81 प्रयोग ककए जाने हेतु आशनयत है ; 2011 का 11 (2) “लस‍का” पद का वही अथ ष होगा, जो लस‍का-ननमाषण अधधननयम, 2011 की धारा 2 में इसका है और इसके अंतगतष तत्समय धन के रूप में उपयोग की गई धातु भी है और क्जसे इस प्रकार उपयोग में िाए जाने के लिए ककसी राज्य या प्रभुत्वसंपन्न शक्‍त के प्राधधकार द्वारा और उसके अधीन स्टांम्प ककया गया है तथा जारी ककया गया है ; (3) कोई व्यक्‍त “सरकारी स्टाम्प कूटकरण” का अपराध करता है, जो एक अंककत मू्य के असिी स्टाम्प को ककसी लभन्न अंककत मू्य के असिी स्टाम्प जैसा हदिाई देने का कूटकरण करता है ; (4) जो व्यक्‍त असिी लस‍के को ककसी लभन्न लस‍के के जैसा हदिाई देने वािा इस आशय से बनाता है कक प्रवंचना की जाए या यह संभाव्य जानते हुए बनाता है कक उसके द्वारा प्रवंचना की जाएगी, वह उस लस‍के के कूटकरण का अपराध करता है ; और (5) “लस‍का कूटकरण” अपराध में, लस‍के के वजन को कम करना या लमश्रण में पररवतनष करना या रूप में पररवतनष करना भी सक्म्मलित है । 179. जो कोई, ककसी कूटरधचत या कूटकृत लस‍के, ककसी स्टाम्प, करेंसी नोट या बकैं नोट कूटरधचत या कूटकृत लस‍के, को यह जानत े हुए या यह ववश्वास का कारण रित े हुए कक वह कूटरधचत या कूटकृत है, उस े सरकारी स्टाम्प, आयात करता है या ननयाषत करता है या ककसी अन्य व्यक्‍त को बेचता है या पररदत्त करता है या करेंसी नोटों या क्रय करता है या प्राप्त करता है या अन्यथा उसका दव्ु याषपार करता है या असिी के रूप में बकैं नोटों को उपयोग करता है, वह आजीवन कारावास स े या दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी असिी के रूप में उपयोग म े अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । िाना । 180. जो कोई, ककसी कूटरधचत या कूटकृत लस‍के, स्टांप, करेंसी नोट या बकैं नोट को कूटरधचत या कूटकृत लस‍के, यह जानते हुए या ववश्वास करने का कारण रिते हुए कक वह कूटरधचत या कूटकृत है उसे सरकारी स्टाम्प, असिी के रूप में उपयोग में िाने के आशय से या उसे असिी के रूप में उपयोग में िाया करेंसी नोट या जा सके, अपने कब्जे में रिता है तो वह ककसी भी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध बकैं नोट को कब्जे में सात वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषने से या दोनों स े दंडडत ककया जाएगा । रिना । स्पष्टीकरण—यहद कोई व्यक्‍त कूटरधचत या कूटकृत लस‍के, स्टांप, करेंसी-नोट या बकैं नोट के कब्जे को ववधधपूण ष स्रोत से होना स्थावपत कर देता है, तो यह इस धारा के अधीन अपराध गहठत नहीं करेगा । 181. जो कोई, ककसी मशीनरी, डाई या उपकरण या सामिी का उपयोग में िाए जाने के लस‍के, सरकारी स्टाम्प, करेंसी प्रयोजन से, या यह जानते हुए या ववश्वास करने का कारण रिते हुए कक वह ककसी लस‍के, नोटों या बकैं राजस्व के प्रयोजन के लिए सरकार द्वारा जारी स्टांप, करेंसी नोट या बकैं नोट की कूटरचना या नोटों की कूटकरण के लिए उपयोग में िाए जान े के लिए आशनयत है, बनाता है, या ढ़ािता है, या बनाने कूटरचना या कूटकरण के या ढािने की प्रकक्रया के ककसी भाग का संपादन करता है, या क्रय करता है या ववक्रय करता है, लिए उपकरण या या व्यननत करता है या उसके कब्जे में है तो वह आजीवन कारावास स े या दोनों में स े ककसी सामिी बनाना भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और या कब्ज े में रिना । जुमाषने का भी दायी होगा ।82 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— करेंसी नोटों या 182. (1) जो कोई, ककसी दस्तावेज को, जो करेंसी नोट या बकैं नोट होना तात्पनयषत है बकैं नोटों के या उसके ककसी भी प्रकार सदृश है या इतने ननकटत: सदृश है कक प्रवंचना हो जाना सदृश रिने वाि े प्रकक््पत है, रचता है या रचवाता है या ककसी भी प्रयोजन के लिए उपयोग में िाता है या दस्तावेजों की रचना या ककसी व्यक्‍त को पररदत्त करता है, वह जुमाषने से, जो तीन सौ रुपए तक का हो सकेगा, उपयोग । दंडडत ककया जाएगा । (2) यहद कोई व्यक्‍त, क्जसका नाम ऐस े दस्तावेज पर है, क्जसकी रचना उपधारा (1) अधीन अपराध है, ककसी पुलिस अधधकारी को उस व्यक्‍त का नाम और पता, क्जसके द्वारा वह मुहरत की गई थी या अन्यथा रची गई थी, बताने के लिए अपेक्षित ककए जाने पर उसे ववधधपूणष प्रनतहेतु के बबना बताने से इंकार करता है, वह जुमाषने से, जो छह सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा । (3) जहां ककसी ऐस े दस्तावेज पर, क्जसके बारे में ककसी व्यक्‍त पर उपधारा (1) के अधीन अपराध का आरोप िगाया गया है या ककसी अन्य दस्तावेज पर, जो उस दस्तावेज के संबंध में उपयोग में िाया गया है, या ववतररत ककया गया है, ककसी व्यक्‍त का नाम है, वहां जब तक प्रनतकूि साबबत नहीं कर हदया जाए, यह उपधारणा की जा सकेगी कक उस व्यक्‍त ने दस्तावेज रचवाया है । सरकार को हानन 183. जो कोई, कपटपूवकष या इस आशय स े कक सरकार को हानन काररत की जाए, काररत करन े के ककसी पदाथ ष पर से, क्जस पर सरकार द्वारा राजस्व के प्रयोजन के लिए जारी कोई स्टाम्प आशय से, उस पदाथष पर स,े िगा हुआ है, ककसी िेि या दस्तावेज को, क्जसके लिए ऐसा स्टाम्प उपयोग में िाया गया क्जस पर सरकारी है, हटाता है या लमटाता है या ककसी िेि या दस्तावेज पर से उस िेि या दस्तावेज के लिए स्टाम्प िगा हुआ उपयोग में िाया गया स्टाम्प इसलिए हटाता है कक ऐसा स्टाम्प ककसी लभन्न िेि या है, िेि लमटाना या दस्तावेज स े दस्तावेज के लिए उपयोग में िाया जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, वह स्टाम्प क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया हटाना, जो उसके जाएगा । लिए उपयोग में िाया गया है । ऐसे सरकारी 184. जो कोई, कपटपूवकष या इस आशय से कक सरकार को हानन काररत की जाए, स्टाम्प का सरकार द्वारा राजस्व के प्रयोजन के लिए जारी ककसी स्टाम्प को, क्जसके बारे में वह जानता उपयोग, क्जसके है कक वह स्टाम्प उससे पहि े उपयोग में िाया जा चुका है, ककसी प्रयोजन के लिए उपयोग बारे में ज्ञात है कक उसका पहि े में िाता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो उपयोग हो चुका सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । है । स्टाम्प के 185. जो कोई, कपटपूवकष या इस आशय से कक सरकार को हानन काररत की जाए, उपयोग ककए जा सरकार द्वारा राजस्व के प्रयोजन के लिए जारी स्टाम्प पर से उस धचह्न को छीिकर चुकने के लमटाता है या हटाता है, जो ऐसे स्टाम्प पर यह द्योतन करने के प्रयोजन से कक वह उपयोग द्योतक धचह्न का छीिकर में िाया जा चुका है, िगा हुआ या छवपत है या ऐसे ककसी स्टाम्प को, क्जस पर स े ऐसा लमटाना। धचह्न लमटाया या हटाया गया हो, जानत े हुए अपने कब्जे में रिता है या बेचता है या व्ययननत करता है, या ऐसे ककसी स्टाम्प को, जो वह जानता है कक उपयोग में िाया जा चुका है, बेचता है या व्ययननत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 83 186. (1) जो कोई, ककसी बनावटी स्टाम्प को— बनावटी स्टाम्पों का प्रनतर्ेध । (क) बनाता है, जानत े हुए चिाता है, उसका व्यौहार करता है या उसका ववक्रय करता है या उस े डाक संबंधी ककसी प्रयोजन के लिए जानते हुए उपयोग में िाता है ; या (ि) ककसी ववधधपूण ष प्रनतहेत ु के बबना, अपने कब्जे में रिता है ; या (ग) बनाने की ककसी डाई, पट्टी, उपकरण या सामधियों को बनाता है, या ककसी ववधधपूण ष प्रनतहेतु के बबना, अपने कब्जे में रिता है, वह जुमाषने से, जो दो सौ रुपए तक हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा । (2) कोई ऐसा स्टाम्प, कोई बनावटी स्टाम्प बनाने की डाई, पट्टी, उपकरण या सामधियां, जो ककसी व्यक्‍ त के कब्जे में है, अलभगहृ ीत की जा सकेगी और अलभगहृ ीत की जाएं तो जब्त कर िी जाएगी । (3) इस धारा में “बनावटी स्टाम्प” से ऐसा कोई स्टाम्प अलभप्रेत है, क्जससे यह लमथ्या रूप से तात्पनयतष हो कक सरकार ने डाक महसूि की दर के द्योतन के प्रयोजन से उस े जारी ककया है या जो सरकार द्वारा उस प्रयोजन से जारी ककसी स्टाम्प की, कागज पर या अन्यथा, अनुलिवप या अनुकृनत या समरूपण है । (4) इस धारा में और धारा 178 से धारा 181 (दोनों सहहत) तथा धारा 183 स े धारा 185 तक में भी, (दोनों सहहत) “सरकार” शब्द के अंतगतष , जब भी वह डाक महसूि की दर के द्योतन के प्रयोजन से जारी ककए गए ककसी स्टाम्प के ससंग ष या ननदेशन में उपयोग ककया गया है, धारा 2 के िंड (12) में ककसी बात के होत े हुए भी, वह या व े व्यक्‍ त समझे जाएंगे जो भारत के ककसी भाग में या ककसी ववदेश में, कायपष ालिका सरकार का प्रशासन चिाने के लिए ववधध द्वारा प्राधधकृत है । 187. जो कोई, भारत में ववधधपूवकष स्थावपत ककसी टकसाि में ननयोक्जत होत े हुए इस टकसाि में ननयोक्जत आशय से कोई काय ष करता है, या उस काय ष का िोप करता है, क्जसे करन े के लिए वह वैध व्यक्‍ त द्वारा रूप से आबद्ध है कक उस टकसाि से जारी कोई लस‍क ा ववधध द्वारा ननयत वजन या लस‍ के का उस लमश्रण से लभन्न वजन या लमश्रण का काररत हो, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास वजन या से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी लमश्रण स े लभन् न काररत दायी होगा । ककया जाना जो ववधध द्वारा ननयत है । 188. जो कोई, भारत में ववधधपूवकष स्थावपत ककसी टकसाि में स े लस‍ का बनाने के टकसाि से लस‍ का बनाने ककसी औजार या उपकरण को ववधधपूण ष प्राधधकार के बबना बाहर ननकाि िाता है, वह दोनों का उपकरण में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया ववधधववरुद्ध जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । रूप स े िेना । अध्याय 11 िोक प्रशांनत के विरुद्ि अपरािों के विषय में 189. (1) पांच या अधधक व्यक्‍ तयों का जमाव “ववधधववरुद्ध जमाव” कहा जाता है, ववधधववरुद्ध यहद उन व्यक्‍ तयों का, क्जनसे वह जमाव गहठत हुआ है, सामान्य उद्देश्य है,— जमाव ।84 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (क) केंरीय सरकार को, या ककसी राज्य सरकार को, या संसद् को, या ककसी राज्य के ववधान-मंडि को, या ककसी िोक सेवक को, जब वह ऐसे िोक सेवक की ववधधपूण ष शक्‍ त का प्रयोग कर रहा है, आपराधधक बि द्वारा, या आपराधधक बि के प्रदशनष द्वारा, आतंककत करना ; या (ि) ककसी ववधध के, या ककसी वैध आदेलशका के, ननष्पादन का प्रनतरोध करना ; या (ग) ककसी ररक्ष् ट या आपराधधक अनतचार या अन्य अपराध का करना ; या (घ) ककसी व्यक्‍ त पर आपराधधक बि द्वारा या आपराधधक बि के प्रदशषन द्वारा, ककसी संपवत्त का कब्जा िेना या अलभप्राप् त करना या ककसी व्यक्‍ त को ककसी माग ष के अधधकार के उपभोग से, या जि का उपयोग करन े के अधधकार या अन्य अमूत ष अधधकार से, क्जसका वह कब्जा रिता है, या उपभोग करता है, वंधचत करना या ककसी अधधकार या अनुमाननत अधधकार को प्रवनततष कराना ; या (ङ) आपराधधक बि द्वारा या आपराधधक बि के प्रदशनष द्वारा, ककसी व्यक्‍ त को वह करने के लिए, क्जसे करन े के लिए वह वैध रूप स े आबद्ध नहीं है या उसका िोप करने के लिए, क्जसे करन े का वह वैध रूप से हकदार है, वववश करना । स्पष् टीकरण—कोई जमाव, जो इकठ्ठा होत े समय ववधधववरुद्ध नहीं था, तत्पश्चात ् ववधधववरुद्ध जमाव हो सकेगा । (2) जो कोई, उन तथ्यों से पररधचत होते हुए, जो ककसी जमाव को ववधधववरुद्ध जमाव बनात े हैं, उस जमाव में साशय सक्म्मलित होता है या उसमें बना रहता है, यह कहा जाता है कक वह ववधधववरुद्ध जमाव का सदस्य है, और ऐसा सदस्य, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (3) जो कोई, ककसी ववधधववरुद्ध जमाव में, यह जानत े हुए कक ऐसे ववधधववरुद्ध जमाव को बबिर जाने का समादेश ववधध द्वारा ववहहत रीनत से हदया गया है, सक्म्मलित होता है, या बना रहता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (4) जो कोई, ककसी घातक आयुध से, या ककसी ऐसी चीज से, क्जसस े आक्रामक आयुध के रूप में उपयोग ककए जान े पर मत्ृ यु काररत होना सभं ाव्य है, सक्ज् जत होत े हुए ककसी ववधधववरुद्ध जमाव का सदस्य है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों स,े दंडडत ककया जाएगा । (5) जो कोई, पांच या अधधक व्यक्‍ तयों के ककसी जमाव में, क्जसस े िोक शांनत में ववघ् न काररत होना सम्भाव्य है, ऐसे जमाव को बबिर जाने का समादेश ववधधपूवकष दे हदए जाने पर जानते हुए सक्म्मलित होता है या बना रहता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—यहद वह जमाव उपधारा (1) के अथ ष के अतं गतष ववधधववरुद्ध जमाव है, तो अपराधी उपधारा (3) के अधीन दंडनीय होगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 85 (6) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को ककसी ववधधववरुद्ध जमाव में सक्म्मलित होने या उसका सदस्य बनाने के लिए भाडे पर िेता है या वचनबद्ध या ननयोक्जत करता है या भाडे पर लिए जाने का, वचनबद्ध या ननयोक्जत करन े का संप्रवतनष करता है या उसके प्रनत मौनानुकूि बना रहता है, वह ऐसे ववधधववरुद्ध जमाव के सदस्य के रूप में, और ककसी ऐस े व्यक्‍ त द्वारा ऐसे ववधधववरुद्ध जमाव के सदस्य के नात े ऐसे भाडे पर िेने, वचनबद्ध या ननयोजन के अनुसरण में ककए गए ककसी भी अपराध के लिए उसी प्रकार दंडनीय होगा, मानो वह ऐसे ववधधववरुद्ध जमाव का सदस्य रहा था या ऐसा अपराध उसने स्वयं ककया था । (7) जो कोई, अपने अधधभोग या भारसाधन, या ननयंत्रण के अधीन ककसी घर या पररसर में ककन्हीं व्यक्‍तयों को, यह जानते हुए कक वे व्यक्‍त ववधधववरूद्ध जमाव में सक्म्मलित होने या सदस्य बनने के लिए भाडे पर िाए गए, वचनबद्ध या ननयोक्जत ककए गए हैं या भाडे पर िाए जाने, वचनबद्ध या ननयोक्जत ककए जाने वािे है, संश्रय देता है, आने देता है या सम्मेलित करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (8) जो कोई, उपधारा (1) में ववननहदषष्ट कायों में से ककसी को करने के लिए या करने में सहायता देने के लिए वचनबद्ध ककया जाता है या भाडे पर लिया जाता है या भाडे पर लिए जाने या वचनबद्ध ककए जाने के लिए अपनी प्रस्थापना करता है या प्रयत्न करता है वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (9) जो कोई, उपधारा (8) में ननहदषष्ट प्रकार से वचनबद्ध होने या भाडे पर लिए जाने पर, ककसी घातक आयुध से या ककसी ऐसी चीज से, क्जससे आक्रामक आयुध के रूप में उपयोग ककए जान े पर मत्ृ यु काररत होनी सभं ाव्य है, सक्ज्जत होकर चिेगा, या सक्ज्जत होकर चिने के लिए वचनबद्ध होगा या अपनी प्रस्थापना करेगा, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 190. यहद ववधधववरुद्ध जमाव के ककसी सदस्य द्वारा उस जमाव के सामान्य ववधधववरुद्ध जमाव का उद्देश्य को अिसर करने में अपराध ककया जाता है, या कोई ऐसा अपराध ककया जाता प्रत्येक सदस्य, है, क्जसका ककया जाना उस जमाव के सदस्य उस उद्देश्य को अिसर करने में सामान्य सम्भाव्य जानते थे, तो प्रत्येक व्यक्‍ त, जो उस अपराध के ककए जाने के समय उस उद्देश्य को जमाव का सदस्य है, उस अपराध का दोर्ी होगा । अिसर करने के लिए ककए गए अपराध का दोर्ी । 191. (1) जब कभी ववधधववरुद्ध जमाव द्वारा या उसके ककसी सदस्य द्वारा ऐस े बिवा करना । जमाव के सामान्य उद्देश्य को अिसर करन े में बि या हहसं ा का प्रयोग ककया जाता है, तब ऐसे जमाव का प्रत्येक सदस्य बिवा करन े के अपराध का दोर्ी होगा । (2) जो कोई, बिवा करन े का दोर्ी होगा, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (3) जो कोई, घातक आयुध से, या ककसी ऐसी चीज से, क्जससे आक्रामक आयुध के रूप में उपयोग ककए जाने पर मत्ृ यु काररत होनी संभाव्य है, सक्ज् जत होत े हुए बिवा करने का दोर्ी है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो86 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । बिवा करान े के 192. जो कोई, अवैध बात करन े द्वारा, ककसी व्यक्‍ त को पररद्वेर् स े या स्वैररता स े आशय स े प्रकोवपत, इस आशय से या यह सम्भाव्य जानत े हुए करता है कक ऐसे प्रकोपन के स्वैररता स े पररणामस्वरूप बिवे का अपराध ककया जाएगा ; यहद ऐस े प्रकोपन के पररणामस्वरूप बिवे प्रकोपन देना- यहद बिवा ककया का अपराध ककया जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक जाए; यहद बिवा वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, और यहद बिवे का अपराध न ककया न ककया जाए । जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । उस भूलम के 193. (1) जब कभी, कोई ववधधववरुद्ध जमाव या बिवा ककया गया है, तब भूलम, क्जस पर स्वामी, अधधभोगी, ऐसा ववधधववरुद्ध जमाव हुआ है या ऐसा बिवा ककया जाए, उसका स्वामी या अधधभोगी और आहद, का दानयत्व ऐसी भूलम में हहत रिन े वािा या हहत रिन े का दावा करने वािा व्यक्‍ त, एक हजार रुपए से क्जस पर ववधधववरुद्ध अनधधक के जुमाषने से दंडनीय होगा, यहद वह या उसका अलभकताष या प्रबंधक यह जानते हुए जमाव या बिवा कक ऐसा अपराध ककया जा रहा है या ककया जा चुका है या इस बात का ववश् वास करन े का ककया गया है । कारण रित े हुए कक ऐसे अपराध का ककया जाना सम्भाव्य है, उस बात की अपनी शक्‍ त-भर शीघ्रतम सूचना ननकटतम पुलिस थाने के प्रधान अधधकारी को नहीं देता है और उस दशा में, क्जसमें उसे या उन्हें यह ववश् वास करन े का कारण हो कक यह िगभग ककया ही जान े वािा है, अपनी शक्‍ त-भर सब ववधधपूणष साधनों का उपयोग उसका ननवारण करन े के लिए नहीं करता है या करत े हैं और उसके हो जाने पर अपनी शक्‍ त-भर सब ववधधपूण ष साधनों का उस ववधधववरुद्ध जमाव को बबिरने या बिवे को दबाने के लिए उपयोग नहीं करता है या करत े हैं । (2) जब कभी, ककसी ऐस े व्यक्‍ त के फायदे के लिए या उसकी ओर स े बिवा ककया जाए, जो ककसी भूलम का, क्जसके ववर्य में ऐसा बिवा हो, स्वामी या अधधभोगी है या जो ऐसी भूलम में या बिवे को पदै ा करन े वािे ककसी वववादिस्त ववर्य में कोई हहत रिने का दावा करता है या जो उसस े कोई फायदा प्रनतगहृ ीत कर लिया है या पा चुका है, तब ऐसा व्यक्‍ त, जुमाषने से दंडनीय होगा, यहद वह या उसका अलभकताष या प्रबंधक इस बात का ववश् वास करन े का कारण रिते हुए कक ऐसा बिवा ककया जाना संभाव्य था या क्जस ववधधववरुद्ध जमाव द्वारा ऐसा बिवा ककया गया था, वह जमाव ककया जाना सम्भाव्य था, अपनी शक्‍ त-भर सब ववधधपूण ष साधनों का ऐस े जमाव या बिव े का ककया जाना रोकन े के लिए और उस े दबाने और बबिरन े के लिए उपयोग नहीं करेगा या करेंगे । (3) जब कभी, ऐस े व्यक्‍ त के फायदे के लिए या ऐसे व्यक्‍ त की ओर से बिवा ककया जाए, जो ककसी भूलम का, क्जसके ववर्य में ऐसा बिवा हो, स्वामी हो या अधधभोगी है या जो ऐसी भूलम में या बिव े के पदै ा करन े वािे ककसी वववादिस्त ववर्य में कोई हहत रिने का दावा करता है या जो उसस े कोई फायदा प्रनतगहृ ीत कर लिया है या पा चुका है, तब उस व्यक्‍ त का अलभकताष या प्रबंधक जुमाषने से दंडनीय होगा, यहद ऐसा अलभकताष या प्रबंधक यह ववश् वास करने का कारण रित े हुए कक ऐसे बिवे का ककया जाना सम्भाव्य था या क्जस ववधधववरुद्ध जमाव द्वारा ऐसा बिवा ककया गया था, उसका ककया जाना सम्भाव्य था, अपनी शक्‍ त-भर सब ववधधपूण ष साधनों का ऐसे बिवे या जमाव का ककया जाना रोकने के लिए और उसको दबाने और बबिरन े के लिए उपयोग नहीं करेगा या करेंगे । 194. (1) जब दो या अधधक व्यक्‍ त, िोकस्थान में िडकर िोक शाक्न्त में ववघ् न दंगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 87 डाित े हैं, तब यह कहा जाता है कक वे दंगा करते हैं । (2) जो कोई, दंगा करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 195. (1) जो कोई, ककसी िोक सेवक पर, जो ककसी ववधधववरुद्ध जमाव के बबिरने िोक सेवक जब बिव,े आहद को का, या बिव े या दंगे को दबाने का प्रयास ऐस े िोक सेवक के नात े अपने कतव्ष य के ननवहष न दबा रहा हो, तब में कर रहा है, हमिा करता है या उसके काम में बाधा डािता है या ककसी िोक सेवक पर उस पर हमिा आपराधधक बि का प्रयोग करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी करना या उसे अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पच्चीस हजार रुपए स े कम का नहीं बाधधत करना । होगा या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (2) जो कोई, ऐसे ककसी िोक सेवक पर, जो ववधधववरुद्ध जमाव के बबिरन े का, या बिवे या दंगे को दबाने का प्रयास, ऐसे िोक सेवक के नात े अपने कतव्ष य के ननवहष न में कर रहा है, हमिे की धमकी देता है या उसके काम में बाधा डािने का प्रयत्न करता है या ककसी िोक सेवक पर आपराधधक बि का प्रयोग करने की धमकी देता है, या उसका प्रयोग करने का प्रयत् न करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 196. (1) जो कोई— धम,ष मूिवंश, जन्म-स्थान, ननवास-स्थान, (क) बोिे गए या लिि े गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश्यरूपणों द्वारा भार्ा, आहद के या इिै‍राननक संसूचना के माध्यम से या अन्यथा ववलभन्न धालमकष , मूिवंशीय, आधारों पर भार्ायी या प्रादेलशक समूहों या जानतयों या समुदायों के बीच असौहादष या शत्रुता, घणृ ा ववलभन् न समहू ों या वैमनस्य की भावनाएं, धम,ष मूिवंश, जन्म-स्थान, ननवास-स्थान, भार्ा, जानत या के बीच शत्रुता का संप्रवतनष समुदाय के आधारों पर या अन्य ककसी भी आधार पर संप्रवनततष करता है या संप्रवनततष और सौहादष बन े करन े का प्रयत् न करता है ; या रहने पर प्रनतकूि प्रभाव (ि) कोई ऐसा काय ष करता है, जो ववलभन् न धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या डािने वाि े प्रादेलशक समूहों या जानतयों या समुदायों के बीच सौहादष बन े रहन े पर प्रनतकूि प्रभाव काय ष करना । डािने वािा है और जो िोक-प्रशाक्न्त में ववघ् न डािता है या क्जससे उसमें ववघ् न पडना सम्भाव्य है ; या (ग) कोई ऐसा अभ्यास, आन्दोिन, कवायद या अन्य वैसा ही कक्रयाकिाप इस आशय से संचालित करता है कक ऐस े कक्रयाकिाप में भाग िेने वाि े व्यक्‍ त ककसी धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या प्रादेलशक समूह या जानत या समुदाय के ववरुद्ध आपराधधक बि या हहसं ा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रलशक्षित ककए जाएंगे या यह सम्भाव्य जानत े हुए संचालित करता है कक ऐसे कक्रयाकिाप में भाग िेने वािे व्यक्‍ त ककसी धालमकष , मूिवंशीय, भार्ाई या प्रादेलशक समूह या जानत या समूदाय के ववरूद्ध आपराधधक बि या हहसं ा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करन े के लिए प्रलशक्षित ककए जाएंगे या ऐसे कक्रयाकिाप में इस आशय से भाग िेता है कक आपराधधक बि या हहसं ा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करने के लिए प्रलशक्षित ककया जाए या यह सम्भाव्य जानत े हुए भाग िेता है कक ऐसे कक्रयाकिाप में भाग िेने वािे88 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— व्यक्‍ त आपराधधक बि या हहसं ा का प्रयोग करेंगे या प्रयोग करन े के लिए प्रलशक्षित ककए जाएंगे और ऐसे कक्रयाकिाप से ऐसी धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या प्रादेलशक समूह या जानत या समुदाय के सदस्यों के बीच, चाहे ककसी भी कारण से, भय या संत्रास या असुरिा की भावना उत्पन्न होती है या उत्पन्न होनी सम्भाव्य है ; वह कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से दंडडत ककया जाएगा । (2) जो कोई, उपधारा (1) में ववननहदषष् ट कोई अपराध, ककसी पूजा के स्थान में या ककसी जमाव में, जो धालमकष पूजा या धालमकष कम ष करने में िगा हुआ हो, काररत करता है, वह कारावास से, जो पांच वर् ष तक का हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । राष्रीय अिंडता 197. (1) जो कोई, बोिे गए या लििे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या पर प्रनतकूि दृश्यरूपणों द्वारा या इिै‍राननक संसूचना के माध्यम से या अन्यथा,— प्रभाव डािन े वािे िांछन, (क) ऐसा कोई िांछन िगाता है या प्रकालशत करता है कक ककसी वग ष के दृढ़कथन । व्यक्‍ तयों को इस कारण से कक वे ककसी धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या प्रादेलशक समूह या जानत या समुदाय के सदस्य हैं, ववधध द्वारा स्थावपत भारत के संववधान के प्रनत सच् ची श्रद्धा और ननष् ठा नहीं रि सकत े या भारत की प्रभुता और अिंडता की मयाषदा नहीं बनाए रि सकत े ; या (ि) यह दृढ़कथन करता है, परामश ष देता है, सिाह देता है, प्रचार करता है या प्रकालशत करता है कक ककसी वग ष के व्यक्‍ तयों को इस कारण से कक व े ककसी धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या प्रादेलशक समूह या जानत या समुदाय के सदस्य हैं, भारत के नागररक के रूप में उनके अधधकार न हदए जाएं या उन्हें उनसे वंधचत ककया जाए ; या (ग) ककसी वग ष के व्यक्‍ तयों की बाध्यता के संबंध में इस कारण कक वे ककसी धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या प्रादेलशक समूह या जानत या समुदाय के सदस्य हैं, कोई दृढ़कथन करता है, परामश ष देता है, अलभवाक् करता है या अपीि करता है या प्रकालशत करता है, और ऐसे दृढ़कथन, परामश,ष अलभवाक् या अपीि से ऐसे सदस्यों तथा अन्य व्यक्‍ तयों के बीच असौहादष, या शत्रुता या घणृ ा या वैमनस्य की भावनाए ं उत्पन्न होती हैं या उत्पन् न होनी संभाव्य हैं ; या (घ) भारत की संप्रभुता, एकता और अिंडता या सुरिा को ितरे में डािने वािी लमथ्या या भ्रामक जानकारी देता है या प्रकालशत करता है, वह कारावास से, जो तीन वर् ष तक का हो सकेगा, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (2) जो कोई, उपधारा (1) में ववननहदषष् ट कोई अपराध, ककसी उपासना स्थि में या धालमकष उपासना या धालमकष कम ष करन े में िगे हुए ककसी जमाव में करता है, वह कारावास से, जो पांच वर् ष तक का हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 89 अध्याय 12 िोक सेिकों द्िारा या उिसे संबंधित अपरािों के विषय में 198. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए ववधध के ककसी ऐस े ननदेश की, जो उस ढंग के बारे में िोक सेवक, जो हो, क्जस ढंग स े िोक सेवक के नात े उस े आचरण करना है, जानत े हुए इस आशय स े या यह ककसी व्यक्‍ त को िनत काररत सम्भाव्य जानते हुए अवज्ञा करता है कक ऐसी अवज्ञा स े वह ककसी व्यक्‍ त को िनत काररत करेगा, करन े के आशय वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, से ववधध की दंडडत ककया जाएगा । अवज्ञा करता है । दृष् टांत क, जो एक अधधकारी है, और न्यायािय द्वारा य के पि में दी गई डडक्री की तुक्ष् ट के लिए ननष्पादन में सम्पवत्त िेने के लिए ववधध द्वारा ननदेलशत है, यह ज्ञान रित े हुए कक यह सम्भाव्य है कक उसके द्वारा वह य को िनत काररत करेगा, जानत े हुए ववधध के उस ननदेश की अवज्ञा करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । 199. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए,— िोक सेवक, जो ववधध के अधीन (क) ववधध के ककसी ऐसे ननदेश की, जो उसको ककसी अपराध या ककसी अन्य ननदेश की मामि े में अन्वेर्ण के प्रयोजन के लिए, ककसी व्यक्‍ त को ककसी स्थान पर उपक्स्थनत अवज्ञा करता है । की अपेिा ककए जाने स े प्रनतवर्द्ध करता है, जानत े हुए अवज्ञा करता है ; या (ि) ककसी ऐसी रीनत को, क्जसमें वह ऐसा अन्वेर्ण करेगा, ववननयलमत करने वािी ववधध के ककसी अन्य ननदेश की, ककसी व्यक्‍ त पर प्रनतकूि प्रभाव डािने के लिए, जानते हुए अवज्ञा करता है ; या (ग) धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 76, धारा 77, धारा 79, धारा 124, धारा 143 या धारा 144 के अधीन दंडनीय संज्ञेय अपराध के संबंध में उसे भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 की धारा 2023 का 46 173 की उपधारा (1) के अधीन दी गई ककसी सूचना को िेिबद्ध करने में असफि रहता है, तो वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास से कम की नहीं होगी, ककंत ु जो दो वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 200. जो कोई, ऐसे ककसी िोक या प्राइवेट अस्पताि का, चाहे वह केंरीय सरकार, पीडडत का राज्य सरकार, स्थानीय ननकाय या ककसी अन्य व्यक्‍ त द्वारा चिाया जा रहा हो, भारसाधक उपचार न करने के लिए दंड । 2023 का 46 होत े हुए भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 की धारा 397 के उपबंधों का उ्िंघन करता है, वह कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषने से या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 201. जो कोई, िोक सवे क होत े हुए और ऐसे िोक सेवक के नात,े ककसी दस्तावेज या िोक सेवक, जो इिै‍राननक अलभिेि की रचना या अनुवाद करने का भार-वहन करत े हुए उस दस्तावेज या िनत काररत करन े के आशय इिै‍राननक अलभिेि की रचना, तैयार या अनुवाद, ऐस े प्रकार स े क्जसे वह जानता है या से अशुद्ध ववश् वास करता है कक अशुद्ध है, इस आशय से, या सम्भाव्य जानत े हुए, करता है कक उसके दस्तावेज रचता द्वारा वह ककसी व्यक्‍ त को िनत काररत करे, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, है । क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी या जुमानष े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ।90 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— िोक सेवक, जो 202. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए और ऐसे िोक सेवक के नात े इस बात के लिए ववधधववरुद्ध रूप वैध रूप से आबद्ध होत े हुए कक वह व्यापार में न िगे, व्यापार में िगता है, वह सादा स े व्यापार में कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषन े से, या दोनों से, या िगा है । सामुदानयक सेवा से, दंडडत ककया जाएगा । िोक सेवक, जो 203. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए और ऐसे िोक सेवक के नात े इस बात के लिए ववधधववरुद्ध रूप वैध रूप से आबद्ध होत े हुए कक वह कनतपय संपवत्त को न तो क्रय करे और न उसके लिए स े संपवत्त क्रय बोिी िगाए, या तो अपने नाम में, या ककसी दसू रे के नाम में, या दसू रों के साथ संयु‍ त करता है या उसके लिए बोिी रूप से, या अंशों में उस संपवत्त को क्रय करता है, या उसके लिए बोिी िगाता है, वह सादा िगाता है । कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा, और यहद वह संपवत्त क्रय कर िी गई है, तो वह जब्त कर िी जाएगी । िोक सेवक का 204. जो कोई, ककसी ववलशष्ट पद को िोक सेवक के नात े धारण करने का बहाना, यह प्रनतरूपण । जानत े हुए करता है कक वह ऐसा पद धारण नहीं करता है या ऐसा पद धारण करने वाि े ककसी अन्य व्यक्‍ त का छद्म प्रनतरूपण करता है और ऐसे बनावटी रूप में ऐसे पदाभास से कोई काय ष करता है या करन े का प्रयत् न करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास से कम की नहीं होगी, ककन्तु तीन वर् ष तक की हो सकेगी और जुमाषने से, दंडडत ककया जाएगा । कपटपूण ष आशय 205. जो कोई, िोक सेवकों के ककसी कनतपय वग ष का न होत े हुए, इस आशय से कक स े िोक सेवक यह ववश् वास ककया जाए, या इस ज्ञान से कक सम्भाव्य है कक यह ववश् वास ककया जाए, कक के उपयोग की वह िोक सेवकों के उस वग ष का है, िोक सेवकों के उस वग ष द्वारा उपयोग में िाई जाने पोशाक पहनना या टोकन को वािी पोशाक के सदृश पोशाक पहनता है, या टोकन के सदृश कोई टोकन धारण करता है, धारण करना । वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । अध्याय 13 िोक सेिकों के विधिपूणभ प्राधिकार के अिमाि के विषय में समनों की 206. जो कोई, ककसी ऐसे िोक सेवक द्वारा ननकािे गए समन, सूचना या आदेश की तामीि या अन्य तामीि स े बचने के लिए फरार हो जाता है, जो ऐस े िोक सेवक के नात े ऐसे समन, सचू ना कायवष ाही स े या आदेश को ननकािने के लिए वैध रूप से सिम हो, — बचने के लिए फरार हो जाना । (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ि) समन या सूचना या आदेश ककसी न्यायािय में स्वयं या अलभकताष द्वारा उपक्स्थत होने के लिए, या दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि प्रस्तुत करने के लिए है, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । समन की 207. जो कोई, ककसी िोक सेवक द्वारा, जो िोक सेवक के नात े कोई समन, सूचना तामीि का या या आदेश ननकािने के लिए वैध रूप से सिम है, ननकािे गए समन, सूचना या आदेश की अन्य कायवष ाही का या उसके तामीि, अपने पर या ककसी अन्य व्यक्‍ त पर होना ककसी प्रकार साशय ननवाररत करता है, प्रकाशन का या ककसी ऐसे समन, सूचना या आदेश का ककसी ऐसे स्थान में ववधधपूवकष िगाया जाना ननवारण करना ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 91 साशय ननवाररत करता है, या ककसी ऐस े समन, सूचना या आदेश को ककसी ऐस े स्थान से, जहां ववधधपूवकष िगाया हुआ है, साशय हटाता है, या ककसी ऐसे िोक सेवक के प्राधधकार के अधीन की जाने वािी ककसी उद्घ ोर्णा का ववधधपूवकष ककया जाना साशय ननवाररत करता है, जो ऐसे िोक सेवक के नात े ऐसी उद्घ ोर्णा का ककया जाना ननहदषष् ट करन े के लिए वैध रूप से सिम है,— (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ि) जहां समन, सूचना, आदेश या उद्घ ोर्णा ककसी न्यायािय में स्वयं या अलभकताष द्वारा उपक्स्थत होने के लिए या दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि प्रस्तुत करन े के लिए है, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 208. जो कोई, ककसी िोक सेवक द्वारा ननकाि े गए उस समन, सूचना, आदेश या िोक सेवक का आदेश न मानकर उद्घ ोर्णा के पािन में, क्जस े ऐस े िोक सेवक के नात े ननकािने के लिए वह वैध रूप स े अनुपक्स्थत सिम हो, ककसी ननक्श् चत स्थान और समय पर स्वयं या अलभकताष द्वारा उपक्स्थत होने के रहना । लिए वैध रूप से आबद्ध होते हुए, उस स्थान या समय पर उपक्स्थत होने का साशय िोप करता है, या उस स्थान से, जहां उपक्स्थत होने के लिए वह आबद्ध है, उस समय स े पूव ष चिा जाता है, क्जस समय चिा जाना उसके लिए ववधधपूणष होता,— (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ि) जहां समन, सूचना, आदेश या उद्घ ोर्णा ककसी न्यायािय में स्वयं या ककसी अलभकताष द्वारा उपक्स्थत होने के लिए है, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) क, उच् च न्यायािय द्वारा ननकािे गए उपक्स्थनत-आदेश के पािन में उस न्यायािय के समि उपक्स्थत होने के लिए वैध रूप से आबद्ध होत े हुए, उपक्स्थत होने में साशय िोप करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (ि) क, क्जिा न्यायाधीश द्वारा ननकािे गए समन के पािन में उस क्जिा न्यायाधीश के समि सािी के रूप में उपक्स्थत होने के लिए वैध रूप स े आबद्ध होते हुए, उपक्स्थत होने में साशय िोप करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । 2023 का 46 209. जो कोई, भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 की धारा 84 की उपधारा (1) भारतीय नागररक सुरिा के अधीन प्रकालशत ककसी उद्घ ोर्णा की अपेिानुसार ववननहदषष् ट स्थान और ववननहदषष् ट समय संहहता, 2023 पर उपक्स्थत होने में असफि रहता है , तो वह कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की धारा 84 के की हो सकेगी या जुमाषन े से या दोनों स े या सामुदानयक सेवा स े दंडडत ककया जाएगा और अधीन ककसी जहां उस धारा की उपधारा (4) के अधीन कोई ऐसी घोर्णा की गई है क्जसमें उस े उद्घ ोवर्त उद्घ ोर्णा के जवाब में अपराधी के रूप में घोवर्त ककया गया है, वहां वह ऐस े कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष अनुपक्स्थत । तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ।92 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दस्तावेज या 210. जो कोई, ककसी िोक सेवक को, ऐसे िोक सेवक के नात े ककसी दस्तावेज या इिै‍राननक इिै‍राननक अलभिेि को प्रस्तुत करने या पररदत्त करन े के लिए ववधधक रूप से आबद्ध होते अलभिेि प्रस्ततु हुए, उसको इस प्रकार प्रस्तुत करन े या पररदत्त करन े का साशय िोप करेगा,— करने के लिए ववधधक रूप स े (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या आबद्ध व्यक्‍त जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया का िोक सेवक को प्रस्ततु करन े जाएगा ; का िोप । (ि) और जहां वह दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि ककसी न्यायािय में प्रस्तुत या पररदत्त ककया जाना हो, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । दृष् टांत क, जो एक क्जिा न्यायािय के समि दस्तावेज प्रस्तुत करन े के लिए ववधधक रूप से आबद्ध है, उसको प्रस्तुत करन े का साशय िोप करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । सूचना या 211. जो कोई, ककसी िोक सेवक को, ऐसे िोक सेवक के नात े ककसी ववर्य पर कोई जानकारी देने के सूचना या जानकारी देने के लिए ववधधक रूप स े आबद्ध होत े हुए, ववधध द्वारा अपेक्षित रीनत लिए ववधधक रूप से और समय पर ऐसी सूचना या जानकारी देने का साशय िोप करता है,— स े आबद्ध व्यक्‍ त द्वारा (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या िोक सेवक को जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; सूचना या जानकारी देने का (ि) जहां दी जाने के लिए अपेक्षित सूचना या जानकारी, ककसी अपराध के ककए िोप । जाने के ववर्य में है, या ककसी अपराध के ककए जाने का ननवारण करने के प्रयोजन से या ककसी अपराधी को पकडने के लिए अपेक्षित है, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ग) जहां दी जाने के लिए अपेक्षित सूचना या जानकारी भारतीय नागररक सुरिा 2023 का 46 संहहता, 2023 की धारा 394 के अधीन हदए गए आदेश द्वारा अपेक्षित है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी या जुमाषने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । लमथ्या सचू ना 212. जो कोई, ककसी िोक सेवक को, ऐसे िोक सेवक के नाते, ककसी ववर्य पर देना । सूचना देने के लिए ववधधक रूप से आबद्ध होते हुए, उस ववर्य पर सच् ची सूचना के रूप में ऐसी सूचना देता है, क्जसका लमथ्या होना वह जानता है या क्जसके लमथ्या होने का ववश् वास करन े का कारण उसके पास है,— (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ि) वह सूचना, क्जस े देने के लिए वह ववधधक रूप स े आबद्ध है, कोई अपराध ककए जाने के ववर्य में हो, या ककसी अपराध के ककए जाने का ननवारण करने केअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 93 प्रयोजन से, या ककसी अपराधी को पकडने के लिए अपेक्षित हो, तो वह दोनों में से, ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) क, एक भ-ू धारक, यह जानत े हुए कक उसकी भू-सम्पदा की सीमाओ ं के अंदर एक हत्या की गई है, उस क्जि े के मक्जस्रेट को जानबूझकर यह लमथ्या सूचना देता है कक मत्ृ यु सांप के काटने के पररणामस्वरूप दघु टष ना स े हुई है । क इस धारा में पररभावर्त अपराध का दोर्ी है । (ि) क, जो िाम चौकीदार है, यह जानते हुए कक अनजाने िोगों का एक बडा धगरोह य के घर में, जो पडोस के गांव का ननवासी एक धनी व्यापारी है, डकैती करने के लिए उसके गांव से होकर गया है और ननकटतम पुलिस थाने के अधधकारी को उपरो‍ त घटना की सूचना शीघ्र और ठीक समय पर देन े के लिए ववधधक रूप स े आबद्ध होत े हुए, पुलिस अधधकारी को जानबूझकर यह लमथ्या सूचना देता है कक संहदग्ध शीि के िोगों का एक धगरोह ककसी लभन्न हदशा में क्स्थत एक दरू स्थ स्थान पर डकैती करने के लिए गांव स े होकर गया है । यहां क, इस धारा में पररभावर्त अपराध का दोर्ी है । स्पष् टीकरण—धारा 211 में और इस धारा में, “अपराध” शब्द के अंतगतष भारत से बाहर ककसी स्थान पर ककया गया कोई ऐसा काय ष आता है, जो यहद भारत में ककया जाता, तो ननम् नलिखित धारा अथाषत ् धारा 103, धारा 105, धारा 307, धारा 309 की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4), धारा 310 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5), धारा 311, धारा 312, धारा 326 के िंड (च) और िंड (छ), धारा 331 की उपधारा (4), उपधारा (6), उपधारा (7) और उपधारा (8), धारा 332 के िंड (क) और िंड (ि) में स े ककसी धारा के अधीन दंडनीय होता ; और “अपराधी” शब्द के अंतगतष कोई भी ऐसा व्यक्‍ त आता है, जो कोई ऐसा काय ष करने का दोर्ी अलभकधथत हो । 213. जो कोई, सत्य कथन करन े के लिए शपथ या प्रनतज्ञान द्वारा अपने आप को शपथ या प्रनतज्ञान स े आबद्ध करने से इंकार करता है, जबकक उससे अपने को इस प्रकार आबद्ध करने की अपेिा इंकार करना, ऐसे िोक सेवक द्वारा की जाए जो यह अपेिा करन े के लिए ववधधक रूप से सिम है कक जबकक िोक वह व्यक्‍ त इस प्रकार अपने को आबद्ध करे, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह सेवक द्वारा मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, वह वैसा करने दंडडत ककया जाएगा । के लिए सम्यक् रूप से अपेक्षित ककया जाए । 214. जो कोई, ककसी िोक सेवक से ककसी ववर्य पर सत्य कथन करने के लिए प्रश् न करन े के लिए प्राधधकृत ववधधक रूप से आबद्ध होत े हुए, ऐस े िोक सेवक की ववधधक शक्‍ तयों के प्रयोग में उस िोक सेवक का िोक सेवक द्वारा उस ववर्य के बारे में उससे पूछे गए ककसी प्रश् न का उत्तर देने से इंकार उत्तर देने से करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, इंकार करना । जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 215. जो कोई, अपने द्वारा ककए गए ककसी कथन पर हस्तािर करने को ऐसे िोक कथन पर हस्तािर करने सेवक द्वारा अपेिा ककए जाने पर, जो उसस े यह अपेिा करन े के लिए ववधधक रूप से सिम से इंकार । है कक वह उस कथन पर हस्तािर करे, उस कथन पर हस्तािर करन े से इंकार करता है, वह94 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सादा कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो तीन हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । शपथ हदिान े या 216. जो कोई, ककसी िोक सवे क या ककसी अन्य व्यक्‍ त से, जो ऐसे शपथ हदिाने या प्रनतज्ञान करान े प्रनतज्ञान देने के लिए ववधध द्वारा प्राधधकृत है, ककसी ववर्य पर सत्य कथन करन े के लिए के लिए प्राधधकृत शपथ या प्रनतज्ञान द्वारा ववधधक रूप से आबद्ध होत े हुए ऐसे िोक सेवक या यथापूवो‍ त िोक सेवक के, या व्यक्‍ त के अन्य व्यक्‍ त से उस ववर्य के संबंध में कोई ऐसा कथन करता है, जो लमथ्या है, और समि शपथ या क्जसके लमथ्या होने का या तो उस े ज्ञान है, या ववश् वास है या क्जसके सत्य होने का उस े प्रनतज्ञान पर ववश् वास नहीं है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक लमथ्या कथन । की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । इस आशय स े 217. जो कोई, ककसी िोक सेवक को कोई ऐसी सूचना, क्जसके लमथ्या होने का उसे लमथ्या सूचना ज्ञान या ववश् वास है, इस आशय से देता है कक वह उस िोक सेवक को प्रेररत करे या यह देना कक िोक सेवक अपनी सम्भाव्य जानते हुए देता है कक वह उसको उसके द्वारा प्रेररत करेगा कक वह िोक सेवक— ववधधपूण ष शक्‍ त (क) कोई ऐसी बात करे या करने का िोप करे क्जसे वह िोक सेवक, यहद उस े का उपयोग दसू रे व्यक्‍त को िनत उस संबंध में, क्जसके बारे में ऐसी सूचना दी गई है, तथ्यों की सही क्स्थनत का पता करन े के लिए होता तो न करता या करन े का िोप न करता ; या करे । (ि) ऐसे िोक सेवक की ववधधपूण ष शक्‍ त का उपयोग करे क्जस उपयोग से ककसी व्यक्‍ त को िनत या िोभ हो, वह दोनों में से, ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) क, एक मक्जस्रेट को यह सूचना देता है कक य एक पुलिस अधधकारी, जो ऐस े मक्जस्रेट का अधीनस्थ है, कतव्ष य पािन में उपेिा या अवचार का दोर्ी है, यह जानत े देता है कक ऐसी सूचना लमथ्या है, और यह सम्भाव्य है कक उस सूचना से वह मक्जस्रेट, य को पदच्युत कर देगा । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (ि) क, एक िोक सेवक को यह लमथ्या सूचना देता है कक य के पास गुप् त स्थान में ननवर्द्ध नमक है । वह सूचना यह जानत े हुए देता है कक ऐसी सूचना लमथ्या है, और यह जानत े हुए देता है कक यह सम्भाव्य है कक उस सूचना के पररणामस्वरूप य के पररसर की तिाशी िी जाएगी, क्जससे य को िोभ होगा । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (ग) एक पुलिस को, क यह लमथ्या सूचना देता है कक एक ववलशष् ट िाम के पास उस पर हमिा ककया गया है और उस े िूट लिया गया है । वह अपने पर हमिावर के रूप में ककसी व्यक्‍ त का नाम नहीं िेता । ककन्त ु वह जानता है कक यह संभाव्य है कक इस सूचना के पररणामस्वरूप पुलिस उस िाम में जांच करेगी और तिालशयां िेगी, क्जससे िामवालसयों या उनमें से कुछ को िोभ होगा । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । िोक सेवक के 218. जो कोई, ककसी िोक सेवक के ववधधपूण ष प्राधधकार द्वारा ककसी संपवत्त को ि े ववधधपूण ष प्राधधकार द्वारा लिए जाने का प्रनतरोध यह जानत े हुए या यह ववश् वास करन े का कारण रिते हुए करता है संपवत्त लिए जान े कक वह ऐसा िोक सेवक है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह का प्रनतरोध । मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से,अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 95 दंडडत ककया जाएगा । 219. जो कोई, ऐसी ककसी संपवत्त के ववक्रय में, जो ऐस े िोक सेवक के नात े ककसी िोक सेवक के प्राधधकार द्वारा िोक सेवक के ववधधपूण ष प्राधधकार द्वारा ववक्रय के लिए प्रस्थावपत की गई है, साशय बाधा ववक्रय के लिए डािता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो प्रस्थावपत की सकेगी, या जुमाषन े से, जो पाचं हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया गई संपवत्त के जाएगा । ववक्रय में बाधा डािना । 220. जो कोई, संपवत्त के ककसी ऐसे ववक्रय में, जो िोक सेवक के नाते िोक सेवक के िोक सेवक के प्राधधकार द्वारा ववधधपूण ष प्राधधकार द्वारा हो रहा हो, ककसी ऐसे व्यक्‍ त के ननलमत्त चाहे वह व्यक्‍ त वह स्वयं ववक्रय के लिए हो, या कोई अन्य हो, ककसी संपवत्त का क्रय करता है या ककसी संपवत्त के लिए बोिी िगाता प्रस्थावपत की है, क्जसके बारे में वह जानता है कक वह व्यक्‍ त उस ववक्रय में उस सपं वत्त के क्रय करन े के गई संपवत्त का बारे में ककसी ववधधक असमथतष ा के अधीन है या ऐसी संपवत्त के लिए यह आशय रिकर अवैध क्रय या उसके लिए बोिी िगाता है कक ऐसी बोिी िगाने स े क्जन बाध्यताओं के अधीन वह अपने आप को अवैध बोिी डािता है उन्हें उस े पूरा नहीं करना है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी िगाना । अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दो सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 221. जो कोई, ककसी िोक सवे क के िोक कृत्यों के ननवहष न में स्वेच्छया बाधा डािता िोक सेवक के िोक कृत्यों के है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो ननवहष न में बाधा सकेगी, या जुमाषने से, जो दो हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत डािना । ककया जाएगा । 222. जो कोई, ककसी िोक सेवक को, उसके िोक कतव्ष य के ननष्पादन में सहायता देने िोक सेवक की सहायता करने या पहुंचान े के लिए ववधध द्वारा आबद्ध होते हुए, ऐसी सहायता देने का साशय िोप का िोप, जबकक करता है,— सहायता देने के लिए ववधध (क) वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक मास तक की हो सकेगी, या द्वारा आबद्ध जुमाषने से, जो दो हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया हो । जाएगा ; (ि) और जहां ऐसी सहायता की मांग उसस े ऐसे िोक सेवक द्वारा, जो ऐसी मांग करने के लिए ववधधक रूप से सिम हो, न्यायािय द्वारा ववधधपूवकष ननकािी गई ककसी आदेलशका के ननष्पादन के, या अपराध के ककए जान े का ननवारण करन े के, या बिवे या दंगे को दबान े के, या ऐस े व्यक्‍ त को, क्जस पर अपराध का आरोप है या जो अपराध का या ववधधपूण ष अलभरिा से ननकि भागने का दोर्ी है, पकडने के प्रयोजनों से की जाए, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 223. जो कोई, यह जानत े हुए कक वह ऐस े िोक सवे क द्वारा प्रख्यावपत ककसी आदेश िोक सेवक द्वारा सम्यक् से, जो ऐसे आदेश को प्रख्यावपत करन े के लिए ववधधपूवषक सश‍ त है, कोई काय ष करने से रूप स े ववरत रहन े के लिए या अपने कब्जे में की, या अपने प्रबधं के अधीन, ककसी संपवत्त के बारे प्रख्यावपत में कोई ववशेर् व्यवस्था करन े के लिए ननहदषष् ट ककया गया है, ऐसे ननदेश की अवज्ञा करता आदेश की है,— अवज्ञा ।96 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (क) यहद ऐसी अवज्ञा ववधधपूवकष ननयोक्जत ककन्हीं व्यक्‍ तयों को बाधा, िोभ या िनत, या बाधा, िोभ या िनत का जोखिम काररत करे, या काररत करन े की प्रववृत्त रिती है, तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दो हजार पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (ि) और जहां ऐसी अवज्ञा मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरिा को संकट काररत करे, या काररत करन े की प्रववृत्त रिती है, या बिवा या दंगा काररत करती है, या काररत करने की प्रववृत्त रिती है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—यह आवश्यक नहीं है कक अपराधी का आशय अपहानन उत्पन्न करन े का हो या उसके ध्यान में यह हो कक उसकी अवज्ञा करन े से अपहानन होना संभाव्य है । यह पयाषप् त है कक क्जस आदेश की वह अवज्ञा करता है, उस आदेश का उस े ज्ञान है, और यह भी ज्ञान है कक उसके अवज्ञा करने स े अपहानन उत्पन् न होती या होनी संभाव्य है । दृष् टांत कोई आदेश, क्जसमें यह ननदेश है कक अमुक धालमकष जुिूस अमुक सडक से होकर न ननकिे, ऐसे िोक सेवक द्वारा प्रख्यावपत ककया जाता है, जो ऐसा आदेश प्रख्यावपत करन े के लिए ववधधपूवकष सश‍ त है । क यह जानत े हुए उस आदेश की अवज्ञा करता है, और उसके द्वारा बिवे का संकट काररत करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । िोक सेवक को 224. जो कोई, ककसी िोक सेवक को या ऐसे ककसी व्यक्‍ त को क्जससे उस िोक िनत करन े की सेवक के हहतबद्ध होने का उस े ववश् वास हो, इस प्रयोजन स े िनत की कोई धमकी देता है धमकी । कक उस िोक सेवक को उत् प्रेररत ककया जाए कक वह ऐसे िोक सेवक के कृत्यों के प्रयोग से संस‍ त कोई काय ष करे, या करन े से प्रववरत रहे, या करन े में वविम्ब करे, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास स,े क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । िोक सेवक स े 225. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को इस प्रयोजन से िनत की कोई धमकी देता है कक वह संरिा के लिए उस व्यक्‍ त को उत् प्रेररत करे कक वह ककसी िनत से संरिा के लिए कोई वैध आवेदन ककसी आवेदन करन े स े ऐसे िोक सेवक से करन े से ववरत रहे, या छोड दे, जो ऐसे िोक सेवक के नाते ऐसी संरिा ववरत रहने के लिए ककसी करन े या कराने के लिए ववधधक रूप से सश‍ त हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास व्यक्‍ त को से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया उत् प्रेररत करन े के जाएगा । लिए िनत की धमकी । ववधधपूण् ष शक्‍त 226. जो कोई, ककसी िोक सवे क को अपने शासकीय कतव्ष य को करने के लिए बाध्य का प्रयोग करने करने या शासकीय कतव्ष यों का ननवहष न करने से ववरत रहने के आशय से आत्महत्या का या प्रयोग करने प्रयत्न करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या से ववरत रहन े के लिए आत्महत्या जुमाषने से, या दोनों से, या सामुदानयक सेवा से दंडनीय होगा । करने का प्रयत्न ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 97 अध्याय 14 लमथ्या साक्ष्य और िोक न्याय के विरुद्ि अपरािों के विषय में 227. जो कोई, शपथ द्वारा या ववधध के ककसी अलभव्य‍ त उपबंध द्वारा सत्य कथन लमथ्या साक्ष्य देना । करन े के लिए ववधधक रूप स े आबद्ध होत े हुए, या ककसी ववर्य पर घोर्णा करन े के लिए ववधध द्वारा आबद्ध होत े हुए, ऐसा कोई कथन करता है, जो लमथ्या है, और या तो क्जसके लमथ्या होने का उस े ज्ञान है या ववश् वास है, या क्जसके सत्य होने का उस े ववश् वास नहीं है, वह लमथ्या साक्ष्य देता है, यह कहा जाता है । स्पष् टीकरण 1—कोई कथन चाहे वह मौखिक हो, या अन्यथा ककया गया हो, इस धारा के अथ ष के अंतगतष आता है । स्पष् टीकरण 2—अनुप्रमाखणत करन े वािे व्यक्‍ त के अपने ववश् वास के बारे में लमथ्या कथन इस धारा के अथ ष के अंतगतष आता है और कोई व्यक्‍ त यह कहने से कक उस े उस बात का ववश् वास है, क्जस बात का उस े ववश् वास नहीं है, तथा यह कहने से कक वह उस बात को जानता है क्जस बात को वह नहीं जानता, लमथ्या साक्ष्य देने का दोर्ी हो सकेगा । दृष् टांत (क) क एक न्यायसंगत दावे के समथनष में, जो य के ववरुद्ध ख के एक हजार रुपए के लिए है, ववचारण के समय शपथ पर लमथ्या कथन करता है कक उसने य को ख के दावे का न्यायसंगत होना स्वीकार करत े हुए सुना था । क ने लमथ्या साक्ष्य हदया है । (ि) क सत्य कथन करन े के लिए शपथ द्वारा आबद्ध होत े हुए कथन करता है कक वह अमुक हस्तािर के संबंध में यह ववश् वास करता है कक वह य का हस्तिेि है, जबकक वह उसके य का हस्तिेि होने का ववश् वास नहीं करता है । यहां क वह कथन करता है, क्जसका लमथ्या होना वह जानता है, और इसलिए लमथ्या साक्ष्य देता है । (ग) य के हस्तिेि के साधारण स्वरूप को जानत े हुए क यह कथन करता है कक अमुक हस्तािर के संबंध में उसका यह ववश् वास है कक वह य का हस्तिेि है ; क उसके ऐसा होने का ववश् वास सद्भ ावपूवकष करता है । यहां, क का कथन केवि अपने ववश् वास के संबंध में है, और उसके ववश् वास के संबंध में सत्य है, और इसलिए, यद्यवप वह हस्तािर य का हस्तिेि न भी हो, क ने लमथ्या साक्ष्य नहीं हदया है । (घ) क शपथ द्वारा सत्य कथन करने के लिए आबद्ध होत े हुए यह कथन करता है कक वह यह जानता है कक य एक ववलशष् ट हदन एक ववलशष् ट स्थान में था, जबकक वह उस ववर्य में कुछ भी नहीं जानता । क लमथ्या साक्ष्य देता है, चाहे बताए हुए हदन य उस स्थान पर रहा हो या नहीं । (ङ) क एक दभु ावर्या या अनुवादक ककसी कथन या दस्तावेज के, क्जसका यथाथष भार्ान्तरण या अनुवाद करन े के लिए वह शपथ द्वारा आबद्ध है, ऐसे भार्ान्तरण या अनुवाद को, जो यथाथ ष भार्ान्तरण या अनुवाद नहीं है और क्जसके यथाथ ष होने का वह ववश् वास नहीं करता, यथाथ ष भार्ान्तरण या अनुवाद के रूप में देता है या प्रमाखणत करता है । क ने लमथ्या साक्ष्य हदया है । 228. जो कोई, इस आशय से ककसी पररक्स्थनत को अक्स्तत्व में िाता है, या ककसी लमथ्या साक्ष्य गढ़ना । पुस्तक या अलभिेि या इिै‍राननक अलभिेि में कोई लमथ्या प्रववक्ष् ट करता है, या लमथ्या98 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कथन अंतववष्ष ट करने वािा कोई दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि रचता है कक ऐसी पररक्स्थनत, लमथ्या प्रववक्ष् ट या लमथ्या कथन न्यानयक कायषवाही में, या ऐसी ककसी कायवष ाही में जो िोक सेवक के समि उसके उस नात े या मध्यस्थ के समि ववधध द्वारा की जाती है, साक्ष्य में दलशतष हो और कक इस प्रकार साक्ष्य में दलशतष होने पर ऐसी पररक्स्थनत, लमथ्या प्रववक्ष् ट या लमथ्या कथन के कारण कोई व्यक्‍ त क्जसे ऐसी कायवष ाही में साक्ष्य के आधार पर राय कायम करनी है ऐसी कायवष ाही के पररणाम के लिए ताक्ववक ककसी बात के संबंध में गित राय बनाए, वह “लमथ्या साक्ष्य गढ़ता है”, यह कहा जाता है । दृष् टांत (क) क एक ब‍से में, जो य का है, इस आशय से आभूर्ण रिता है कक व े उस ब‍स े में पाए जाएं, और इस पररक्स्थनत से य चोरी के लिए दोर्लसद्ध ठहराया जाए । क ने लमथ्या साक्ष्य गढ़ा है । (ि) क अपनी दकु ान की बही में एक लमथ्या प्रववक्ष् ट इस प्रयोजन से करता है कक वह न्यायािय में सम्पोर्क साक्ष्य के रूप में काम में िाई जाए । क ने लमथ्या साक्ष्य गढ़ा है । (ग) य को एक आपराधधक र्डय ंत्र के लिए दोर्लसद्ध ठहराया जाने के आशय स े क एक पत्र य के हस्तिेि की अनुकृनत करके लििता है, क्जससे यह तात्पनयषत है कक य ने उस े ऐसे आपराधधक र्डय ंत्र के सह-अपराधी को संबोधधत ककया है और उस पत्र को ऐस े स्थान पर रि देता है, क्जसके संबंध में वह यह जानता है कक पुलिस अधधकारी संभाव्यत: उस स्थान की तिाशी िेंग े । क ने लमथ्या साक्ष्य गढ़ा है । लमथ्या साक्ष्य के 229. (1) जो कोई, साशय ककसी न्यानयक कायवष ाही के ककसी प्रक्रम में लमथ्या साक्ष्य लिए दंड । देता है या ककसी न्यानयक कायवष ाही के ककसी प्रक्रम में उपयोग में िाए जाने के प्रयोजन स े लमथ्या साक्ष्य गढ़ता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर्ष तक की हो सकेगी दंडडत ककया जाएगा, और दस हजार रुपए तक के जुमाषने के लिए भी दायी होगा ; (2) जो कोई, उपधारा (1) में ननहदषष्ट से लभन्न ककसी अन्य मामि े में साशय लमथ्या साक्ष्य देता है या गढ़ता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा, और पांच हजार रुपए तक के जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण 1—सेना न्यायािय के समि ववचारण न्यानयक कायवष ाही है । स्पष् टीकरण 2—न्यायािय के समि कायवष ाही प्रारम्भ होने के पूव,ष जो ववधध द्वारा ननहदषष् ट अन्वेर्ण होता है, वह न्यानयक कायवष ाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेर्ण ककसी न्यायािय के सामने न भी हो । दृष् टांत यह अलभननश् चय करन े के प्रयोजन से कक ‍या य को ववचारण के लिए सुपुदष ककया जाना चाहहए, मक्जस्रेट के समि जांच में क शपथ पर कथन करता है, क्जसका वह लमथ्या होना जानता है । यह जांच न्यानयक कायवष ाही का एक प्रक्रम है, इसलिए क ने लमथ्या साक्ष्य हदया है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 99 स्पष् टीकरण 3—न्यायािय द्वारा ववधध के अनुसार ननहदषष् ट और न्यायािय के प्राधधकार के अधीन संचालित अन्वेर्ण न्यानयक कायवष ाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेर्ण ककसी न्यायािय के सामने न भी हो । दृष् टांत संबंधधत स्थान पर जा कर भूलम की सीमाओं को अलभननक्श् चत करन े के लिए न्यायािय द्वारा प्रनतननयु‍ त अधधकारी के समि जांच में क शपथ पर कथन करता है क्जसका लमथ्या होना वह जानता है । यह जांच न्यानयक कायवष ाही का एक प्रक्रम है, इसलिए क ने लमथ्या साक्ष्य हदया है । 230. (1) जो कोई, भारत में तत्समय प्रवत्तृ ववधध के द्वारा मत्ृ यु से दंडनीय अपराध मत्ृ यु स े दंडनीय अपराध के लिए के लिए ककसी व्यक्‍ त को दोर्लसद्ध कराने के आशय से या संभाव्यत: उसके द्वारा दोर्लसद्धध दोर्लसद्ध करवाता है यह जानत े हुए लमथ्या साक्ष्य देता है या गढ़ता है, वह आजीवन करान े के कारावास से, या कठोर कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया आशय स े जाएगा, और पचास हजार रुपए तक के जुमाषने का भी दायी होगा । लमथ्या साक्ष्य देना या (2) यहद ननदोर् व्यक्‍ त को उपधारा (1) में ननहदषष्ट ऐसे लमथ्या साक्ष्य के गढ़ना । पररणामस्वरूप दोर्लसद्ध ककया जाए, और उसे ननष्पाहदत ककया जाए, तो उस व्यक्‍ त को, जो ऐसा लमथ्या साक्ष्य देता है, या तो मत्ृ यु दंड या उपधारा (1) में ववननहदषष्ट दंड हदया जाएगा । 231. जो कोई, इस आशय से या यह सम्भाव्य जानत े हुए कक उसके द्वारा वह ककसी आजीवन कारावास या व्यक्‍ त को ऐसे अपराध के लिए, जो भारत में तत्समय प्रवत्तृ ववधध द्वारा मत्ृ यु से दंडनीय कारावास से न हो ककन्तु आजीवन कारावास या सात वर् ष या उसस े अधधक की अवधध के कारावास स े दंडनीय अपराध दंडनीय हो, दोर्लसद्ध करवाता है, लमथ्या साक्ष्य देता है या गढ़ता है, वह वैसे ही दंडडत के लिए ककया जाएगा जैसे वह व्यक्‍ त दंडनीय होता जो उस अपराध के लिए दोर्लसद्ध होता । दोर्लसद्धध करान े के दृष् टांत आशय स े लमथ्या साक्ष्य क न्यायािय के समि इस आशय से लमथ्या साक्ष्य देता है कक उसके द्वारा य डकैती देना या गढ़ना । के लिए दोर्लसद्ध ककया जाए । डकैती का दंड जुमाषना सहहत या रहहत आजीवन कारावास या ऐसा कहठन कारावास है, जो दस वर् ष तक की अवधध का हो सकता है । क इसलिए जुमाषने सहहत या रहहत आजीवन कारावास या कारावास स े दंडनीय है । 232. (1) जो कोई, ककसी अन्य व्यक्‍त के शरीर, ख्यानत या संपवत्त को या ककसी ऐसे ककसी व्यक्‍ त को लमथ्या व्यक्‍त के शरीर या ख्यानत को क्जससे कक वह व्यक्‍त हहतबद्ध है, कोई िनत काररत करने साक्ष्य देने के की धमकी उस अन्य व्यक्‍त को इस आशय स े देता है कक वह व्यक्‍ त लमथ्या साक्ष्य दे तो लिए वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी या धमकाना । जुमाषने से या दोनों स े दंडडत ककया जाएगा ; (2) यहद कोई ननदोर् व्यक्‍ त उपधारा (1) में ननहदषष्ट लमथ्या साक्ष्य के पररणामस्वरूप मत्ृ यु से या सात वर् ष से अधधक के कारावास से दोर्लसद्ध और दंडाहदष् ट ककया जाता है तो ऐसा व्यक्‍ त, जो धमकी देता है, उसी दंड से दंडडत ककया जाएगा और उसी रीनत में और उसी सीमा तक दंडाहदष् ट ककया जाएगा जैसे ननदोर् व्यक्‍त दंडडत और दंडाहदष् ट ककया गया है ।100 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उस साक्ष्य को 233. जो कोई, ककसी साक्ष्य को, क्जसका लमथ्या होना या गढ़ा होना वह जानता है, काम में िाना, सत्य या असिी साक्ष्य के रूप में भ्रष् टतापूवकष उपयोग में िाता है, या उपयोग में िाने का क्जसका लमथ्या प्रयत् न करता है, वह ऐस े दंडडत ककया जाएगा, मानो उसन े लमथ्या साक्ष्य हदया हो या गढ़ा होना ज्ञात है । हो । लमथ्या प्रमाणपत्र 234. जो कोई, ऐसा प्रमाणपत्र, क्जसका हदया जाना या हस्तािररत ककया जाना ववधध जारी करना या द्वारा अपेक्षित हो, या जो ककसी ऐसे तथ्य से संबंधधत हो, क्जसका वैसा प्रमाणपत्र ववधध हस्तािररत द्वारा साक्ष्य में िाह्य हो, यह जानत े हुए या ववश् वास करत े हुए कक वह ककसी ताक्ववक बात करना । के बारे में लमथ्या है, वैसा प्रमाणपत्र जारी करता है या हस्तािररत करता है, वह उसी प्रकार दंडडत ककया जाएगा, मानो उसने लमथ्या साक्ष्य हदया हो । प्रमाणपत्र को, 235. जो कोई, ककसी ऐसे प्रमाणपत्र को यह जानते हुए कक वह ककसी ताक्ववक बात के क्जसका लमथ्या संबंध में लमथ्या है सत्य प्रमाणपत्र के रूप में भ्रष् टतापूवकष उपयोग में िाता है, या उपयोग में होना ज्ञात है, िाने का प्रयत् न करता है, वह ऐसे दंडडत ककया जाएगा, मानो उसने लमथ्या साक्ष्य हदया हो । सत्य के रूप में काम में िाना । ऐसी घोर्णा में, 236. जो कोई, अपने द्वारा की गई या हस्तािररत ककसी घोर्णा में, क्जसकी ककसी जो साक्ष्य के तथ्य के साक्ष्य के रूप में िेने के लिए कोई न्यायािय, या कोई िोक सेवक या अन्य रूप में ववधध व्यक्‍ त ववधध द्वारा आबद्ध या प्राधधकृत है, कोई ऐसा कथन करता है, जो ककसी ऐसी बात द्वारा िी जा सके, ककया गया के संबंध में, जो उस उद्देश्य के लिए ताक्ववक हो क्जसके लिए वह घोर्णा की जाए या लमथ्या कथन । उपयोग में िाई जाए, लमथ्या है और क्जसके लमथ्या होने का उस े ज्ञान या ववश् वास है, या क्जसके सत्य होने का उस े ववश् वास नहीं है, वह उसी प्रकार दंडडत ककया जाएगा, मानो उसने लमथ्या साक्ष्य हदया हो । ऐसी घोर्णा का 237. जो कोई, ककसी ऐसी घोर्णा को, यह जानत े हुए कक वह ककसी ताक्ववक बात के लमथ्या होना संबंध में लमथ्या है, भ्रष् टतापूवकष सत्य के रूप में उपयोग में िाता है, या उपयोग में िाने का जानते हुए, उस े प्रयत् न करता है, वह उसी प्रकार दंडडत ककया जाएगा, मानो उसने लमथ्या साक्ष्य हदया हो । सत्य के रूप में काम में िाना । स्पष् टीकरण—कोई घोर्णा, जो केवि ककसी अनौपचाररकता के आधार पर अिाह्य है, धारा 236 और इस धारा के अथ ष के अंतगषत घोर्णा है । अपराध के 238. जो कोई, यह जानत े हुए या यह ववश् वास करन े का कारण रिते हुए कक कोई साक्ष्य का अपराध ककया गया है, उस अपराध के ककए जाने के ककसी साक्ष्य का वविोप, इस आशय से वविोपन, या काररत करता है कक अपराधी को ववधधक दंड स े बचाया जा सके या उस आशय स े उस अपराधी को बचाने के लिए अपराध से संबंधधत कोई ऐसी सूचना देता है, क्जसके लमथ्या होने का उस े ज्ञान या ववश्व ास लमथ्या सचू ना है,— देना । (क) यहद वह अपराध क्जसके ककए जाने का उस े ज्ञान या ववश् वास है, मत्ृ यु से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ि) और यहद वह अपराध आजीवन कारावास से, या ऐसे कारावास से, जो दस वर् ष तक का हो सकेगा, दंडनीय हो, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के, कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ग) यहद वह अपराध ऐस े कारावास से उतनी अवधध के लिए दंडनीय हो, जो दसअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 101 वर् ष तक की न हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत भांनत के कारावास से उतनी अवधध के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत कारावास की दीघतष म अवधध की एक-चौथाई तक हो सकेगी या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत क यह जानते हुए कक ख ने य की हत्या की है, ख को दंड से बचान े के आशय से मतृ शरीर को नछपाने में ख की सहायता करता है । क दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष की हो सकेगी और जुमाषने से भी दंडनीय है । 239. जो कोई, यह जानत े हुए या यह ववश् वास करन े का कारण रिते हुए कक कोई सूचना देने के लिए आबद्ध अपराध ककया गया है, उस अपराध के बारे में कोई सूचना क्जसे देने के लिए वह ववधधक रूप व्यक्‍त द्वारा से आबद्ध है, देने का साशय िोप करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, अपराध की क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी या पांच हजार रुपए तक के जुमाषने से, या दोनों सूचना देने का साशय िोप । से, दंडडत ककया जाएगा । 240. जो कोई, यह जानत े हुए, या यह ववश् वास करन े का कारण रिते हुए, कक कोई ककए गए अपराध के अपराध ककया गया है, उस अपराध के बारे में कोई ऐसी सचू ना देता है, क्जसके लमथ्या होने ववर्य में का उस े ज्ञान या ववश् वास हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो लमथ्या सूचना वर् ष तक की हो सकेगी, या जमु ाषने से या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । देना । स्पष् टीकरण—धारा 238 और धारा 239 में और इस धारा में “अपराध” शब्द के अंतगतष भारत से बाहर ककसी स्थान पर ककया गया कोई भी ऐसा काय ष आता है, जो यहद भारत में ककया जाता तो ननम् नलिखित धाराओं अथाषत ् धारा 103, धारा 105, धारा 307, धारा 309 की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4), धारा 310 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5), धारा 311, धारा 312, धारा 326 के िंड (च) और िंड (छ), धारा 331 की उपधारा (4), उपधारा (6), उपधारा (7) और उपधारा (8), धारा 332 के िंड (क) और िंड (ि) में से ककसी भी धारा के अधीन दंडनीय होता । 241. जो कोई, ककसी ऐस े दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि को नछपाता है या नष् ट साक्ष्य के रूप में ककसी करता है क्जसे ककसी न्यायािय में या ऐसी कायवष ाही में, जो ककसी िोक सेवक के समि दस्तावेज या उसकी वैसी हैलसयत में ववधधपूवकष की गई है, साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए उस े इिै‍राननक ववधधपूवकष वववश ककया जा सके, या पूवो‍ त न्यायािय या िोक सेवक के समि साक्ष्य के अलभिेि का रूप में प्रस्तुत ककए जाने या उपयोग में िाए जाने स े ननवाररत करन े के आशय से, या उस प्रस्तुत ककया जाना ननवाररत प्रयोजन के लिए उस दस्तावजे या इिै‍राननक अलभिेि को प्रस्तुत करन े को उस े ववधधपूवकष करन े के लिए समननत या अपेक्षित ककए जाने के पश् चात,् ऐसे संपूण ष दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि उसको नष् ट को, या उसके ककसी भाग को लमटाता है, या ऐसा बनाता है, जो पढ़ा न जा सके, वह दोनों करना । में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 242. जो कोई, ककसी दसू रे का लमथ्या प्रनतरूपण करता है और ऐसे धाररत ककए हुए वाद या अलभयोजन में रूप में ककसी वाद या आपराधधक अलभयोजन में कोई स्वीकृनत या कथन करता है, या दाव े ककसी काय ष या की संस्वीकृनत करता है, या कोई आदेलशका ननकिवाता है या जमानतदार या प्रनतभू बनाता कायवष ाही के है, या कोई भी अन्य काय ष करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी प्रयोजन से अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । लमथ्या प्रनतरूपण ।102 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— संपवत्त को जब्त 243. जो कोई, ककसी संपवत्त को, या उसमें के ककसी हहत को इस आशय से कपटपूवकष ककए जान े में या हटाता है, नछपाता है या ककसी व्यक्‍ त को अंतररत या पररदत्त करता है कक उसके द्वारा वह ननष्पादन में उस संपवत्त या उसमें के ककसी हहत का ऐस े दंडादेश के अधीन जो न्यायािय या ककसी अन्य अलभगहृ ीत ककए जाने से ननवाररत सिम प्राधधकारी द्वारा सुनाया जा चुका है या क्जसके बारे में वह जानता है कक न्यायािय करने के लिए उस े या अन्य सिम प्राधधकारी द्वारा उसका सुनाया जाना सभं ाव्य है, जब्ती के रूप में या कपटपूवकष हटाना जुमाषने के चुकाने के लिए लिया जाना या ऐसी डडक्री या आदेश के ननष्पादन में, जो लसववि या नछपाना । वाद में न्यायािय द्वारा हदया गया हो या क्जसके बारे में वह जानता है कक लसववि वाद में न्यायािय द्वारा उसका सुनाया जाना संभाव्य है, लिया जाना ननवाररत करे, वह दोनों में, स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने स े या जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । संपवत्त पर उसके 244. जो कोई, ककसी संपवत्त को, या उसमें के ककसी हहत को, यह जानते हुए कक ऐसी जब्त ककए जान े ककसी संपवत्त या हहत पर उसका कोई अधधकार या अधधकारपूण ष दावा नहीं है, कपटपूवकष में या ननष्पादन प्रनतगहृ ीत करता है, प्राप् त करता है या उस पर दावा करता है या ककसी संपवत्त या उसमें के में अलभगहृ ीत ककए जान े स े ककसी हहत पर ककसी अधधकार के बारे में इस आशय से प्रवंचना करता है कक उसके द्वारा ननवाररत करन े वह उस संपवत्त या उसमें के हहत का ऐसे दंडादेश के अधीन, जो न्यायािय या ककसी अन्य के लिए सिम प्राधधकारी द्वारा सुनाया जा चुका है या क्जसके बारे में वह जानता है कक न्यायािय कपटपूवकष या ककसी अन्य सिम प्राधधकारी द्वारा उसका सुनाया जाना संभाव्य है, जब्ती के रूप में या दावा । जुमाषने के चुकाने के लिए लिया जाना, या ऐसी डडक्री या आदेश के ननष्पादन में, जो लसववि वाद में न्यायािय द्वारा हदया गया हो, या क्जसके बारे में वह जानता है कक लसववि वाद में न्यायािय द्वारा उसका हदया जाना संभाव्य है, लिया जाना ननवाररत करे, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास स,े क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । ऐसी रालश के 245. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त के वाद में ऐसी रालश के लिए, जो ऐसे व्यक्‍ त को देय लिए, जो देय न हो या देय रालश से अधधक हो, या ककसी ऐसी संपवत्त या संपवत्त में के हहत के लिए, नहीं है, क्जसका ऐसा व्यक्‍ त हकदार न हो, अपने ववरुद्ध कोई डडक्री या आदेश कपटपूवकष पाररत कपटपूवकष डडक्री होने देना सहन करवाता है, या पाररत ककया जाना सहन करता है या ककसी डडक्री या आदेश को उसके तुष् ट करना । कर हदए जाने के पश् चात ् या ककसी ऐसी बात के लिए, क्जसके ववर्य में उस डडक्री या आदेश की तुक्ष् ट कर दी गई है, अपने ववरुद्ध कपटपूवकष ननष्पाहदत करवाता है या ककया जाना सहन करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । दृष् टांत य के ववरुद्ध एक वाद क संक्स्थत करता है । य यह संभाव्य जानत े हुए कक क उसके ववरुद्ध डडक्री अलभप्राप् त कर िेगा, ख के वाद में, क्जसका उसके ववरुद्ध कोई न्यायसंगत दावा नहीं है, अधधक रकम के लिए अपने ववरुद्ध ननणषय ककया जाना इसलिए कपटपूवकष सहन करता है कक ख स्वयं अपने लिए या य के फायदे के लिए य की संपवत्त के ककसी ऐस े ववक्रय के आगमों का अंश िहण करे, जो क की डडक्री के अधीन ककया जाए । य ने इस धारा के अधीन अपराध ककया है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 103 246. जो कोई, कपटपवू कष या बेईमानी स े या ककसी व्यक्‍ त को िनत या िोभ काररत बेईमानी स े न्यायािय में करन े के आशय स े न्यायािय में कोई ऐसा दावा करता है, क्जसका लमथ्या होना वह जानता लमथ्या दावा हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, करना । दंडडत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । 247. जो कोई ककसी व्यक्‍ त के ववरुद्ध ऐसी रालश के लिए, जो देय न हो, या जो देय ऐसी रालश के लिए जो देय रालश से अधधक हो, या ककसी संपवत्त या संपवत्त में के हहत के लिए, क्जसका वह हकदार न नहीं है, हो, डडक्री या आदेश कपटपूवकष अलभप्राप् त करता है या ककसी डडक्री या आदेश को, उसके तुष् ट कपटपूवकष डडक्री कर हदए जाने के पश् चात ् या ऐसी बात के लिए, क्जसके ववर्य में उस डडक्री या आदेश की अलभप्राप् त तुक्ष् ट कर दी गई हो, ककसी व्यक्‍ त के ववरुद्ध कपटपूवकष ननष्पाहदत करवाता है या अपने करना । नाम में कपटपूवकष ऐसा कोई काय ष ककया जाना सहन करता है या ककए जाने की अनुमनत देता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से क्जसकी अवधध दो वर् ष की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 248. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को यह जानत े हुए कक उस व्यक्‍ त के ववरुद्ध ऐसी िनत करन े के आशय स े कायवष ाही या आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या ववधधपूण ष आधार नहीं है, िनत काररत करने अपराध का के आशय से उस व्यक्‍ त के ववरुद्ध कोई दांडडक कायवष ाही संक्स्थत करता है या करवाता है लमथ्या आरोप । या उस व्यक्‍ त पर लमथ्या आरोप िगाता है कक उसने अपराध ककया है— (क) वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या दो िाि रुपए तक के जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ि) यहद ऐसी दांडडक कायवष ाही मत्ृ यु, आजीवन कारावास या दस वर् ष या उसस े अधधक के कारावास से दंडनीय अपराध के लमथ्या आरोप पर संक्स्थत की जाए, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 249. जब कोई अपराध ककया जा चुका हो, तब जो कोई ककसी ऐसे व्यक्‍ त को, अपराधी को क्जसके बारे में वह जानता हो या ववश् वास करने का कारण रिता हो कक वह अपराधी है, संश्रय देना । ववधधक दंड से बचान े करने के आशय से संश्रय देता है या नछपाता है— (क) यहद वह अपराध मत्ृ यु से दंडनीय हो तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ि) यहद वह अपराध आजीवन कारावास से, या दस वर् ष तक के कारावास से, दंडनीय हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ग) यहद वह अपराध एक वर् ष तक, न कक दस वर् ष तक के कारावास से दंडनीय हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध उस अपराध के लिए उपबंधधत कारावास की दीघतष म अवधध की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; स्पष्टीकरण—इस धारा में “अपराध” के अंतगतष भारत से बाहर ककसी स्थान पर ककया गया ऐसा काय ष आता है, जो, यहद भारत में ककया जाता हो तो ननम् नलिखित धाराओं, अथाषत ्104 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— धारा 103, धारा 105, धारा 307, धारा 309 की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4), धारा 310 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5), धारा 311, धारा 312, धारा 326 के िंड (च) और िंड (छ), धारा 331 की उपधारा (4), उपधारा (6), उपधारा (7) और उपधारा (8), धारा 332 के िंड (क) और िंड (ि) में से ककसी धारा के अधीन दंडनीय होता और प्रत्येक एक ऐसा काय ष इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे दंडनीय समझा जाएगा, मानो अलभयु‍ त व्यक्‍ त उस े भारत में करन े का दोर्ी था । अपिाि—इस उपबंध का ववस्तार ककसी ऐसे मामि े पर नहीं है क्जससे अपराधी को संश्रय देना या नछपाना उसके पनत या पत्न ी द्वारा हो । दृष् टांत क यह जानते हुए कक ख ने डकैती की है, ख को ववधधक दंड से बचाने के लिए जानत े हुए नछपा िेता है । यहां, ख आजीवन कारावास स े दंडनीय है, क दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडनीय है और जुमाषने का भी दायी होगा । अपराधी को दंड 250. जो कोई, अपने या ककसी अन्य व्यक्‍ त के लिए कोई पररतोर्ण या अपने या स े बचान े के ककसी अन्य व्यक्‍ त के लिए ककसी संपवत्त का प्रत्यास्थापन, ककसी अपराध के नछपाने के लिए लिए उपहार, या ककसी व्यक्‍ त को ककसी अपराध के लिए ववधधक दंड से बचान े के लिए, या ककसी व्यक्‍ त आहद िेना । के ववरुद्ध ववधधक दंड हदिाने के प्रयोजन से उसके ववरुद्ध की जाने वािी कायवष ाही न करने के लिए, प्रनतफिस्वरूप प्रनतगहृ ीत करता है या अलभप्राप् त करन े का प्रयत् न करता है या प्रनतगहृ ीत करने के लिए करार करता है,— (क) यहद वह अपराध मत्ृ यु से दंडनीय हो, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ि) यहद वह अपराध आजीवन कारावास या दस वर् ष तक के कारावास से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ग) यहद वह अपराध दस वर् ष से कम के कारावास से दंडनीय हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत भांनत के कारावास से इतनी अवधध के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत कारावास की दीघतष म अवधध की एक चौथाई तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । अपराधी को 251. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को कोई अपराध उस व्यक्‍ त द्वारा नछपाए जाने के लिए बचाने के या उस व्यक्‍ त द्वारा ककसी व्यक्‍ त को ककसी अपराध के लिए ववधधक दंड से बचाए जाने के प्रनतफिस्वरूप लिए या उस व्यक्‍ त द्वारा ककसी व्यक्‍ त को ववधधक दंड हदिाने के प्रयोजन स े उसके उपहार की प्रस्थापना या ववरुद्ध की जाने वािी कायवष ाही न की जाने के लिए प्रनतफिस्वरूप कोई पररतोर्ण देता है संपवत्त का या हदिाता है या देने या हदिाने की प्रस्थापना या करार करता है, या कोई संपवत्त प्रत्यावतनष । प्रत्यावनततष करता है या कराता है,— (क) यहद वह अपराध मत्ृ यु से दंडनीय हो, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ;अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 105 (ि) यहद वह अपराध आजीवन कारावास से या दस वर् ष तक के कारावास स े दंडनीय हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ग) यहद वह अपराध दस वर् ष से कम के कारावास से दंडनीय हो, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत भांनत के कारावास से इतनी अवधध के लिए, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत कारावास की दीघतष म अवधध की एक-चौथाई तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । अपिाि—इस धारा और धारा 250 के उपबंध ऐसे ककसी मामिे को ववस्ताररत नहीं होते क्जसमें अपराध का ववधधपूवकष शमन ककया जा सके । 252. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त की ककसी ऐसी चि संपवत्त के वापस करा िेने में, क्जसस े चोरी की संपवत्त, आहद के वापस इस संहहता के अधीन दंडनीय ककसी अपराध द्वारा वह व्यक्‍ त वंधचत कर हदया गया हो, िेन े में सहायता सहायता करने के बहाने या सहायता करने के संबंध में कोई पररतोर्ण िेता है या िेने का करन े के लिए करार करता है या िेने को सम्मत होता है, वह, जब तक कक अपनी शक्‍ त में के सब उपहार िेना । साधनों को अपराधी को पकडवाने के लिए और अपराध के लिए दोर्लसद्ध कराने के लिए उपयोग में न िाए, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 253. जब ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध या आरोवपत व्यक्‍ त उस अपराध के लिए ऐस े अपराधी को संश्रय देना, ववधधक अलभरिा में होत े हुए ऐसी अलभरिा स े ननकि भागता है, या जब कभी कोई िोक जो अलभरिा से सेवक ऐस े िोक सेवक की ववधधपूण ष शक्‍ तयों का प्रयोग करत े हुए ककसी अपराध के लिए ननकि भागा है ककसी व्यक्‍ त को पकडने का आदेश दे, तब जो कोई ऐस े ननकि भागने को या पकडे जाने या क्जसको पकडने का के आदेश को जानत े हुए, उस व्यक्‍ त को पकडा जाना ननवाररत करन े के आशय से उस े आदेश हदया जा संश्रय देता है या नछपाता है, वह ननम् नलिखित प्रकार से दंडडत ककया जाएगा अथाषत,्— चुका है। (क) यहद वह अपराध, क्जसके लिए वह व्यक्‍ त अलभरिा में था या पकडे जाने के लिए आदेलशत है, मत्ृ यु से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ि) यहद वह अपराध आजीवन कारावास स े या दस वर् ष के कारावास स े दंडनीय हो, तो वह जुमाषने सहहत या रहहत दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा ; (ग) यहद वह अपराध ऐसे कारावास से दंडनीय हो, जो एक वर् ष तक का, न कक दस वर् ष तक का हो सकता है, तो वह उस अपराध के लिए उपबंधधत भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध उस अपराध के लिए उपबधंधत कारावास की दीघतष म अवधध की एक चौथाई तक की हो सकेगी, या जुमाषन े स,े या दोनों से दंडडत ककया जाएगा । स्पष्टीकरण—इस धारा में “अपराध” के अंतगषत कोई भी ऐसा काय ष या िोप भी आता है, क्जसका कोई व्यक्‍ त भारत से बाहर दोर्ी होना अलभकधथत हो, जो यहद वह भारत में106 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उसका दोर्ी होता, तो अपराध के रूप में दंडनीय होता और क्जसके लिए, वह प्रत्यपषण से संबंधधत ककसी ववधध के अधीन या अन्यथा भारत में पकडे जाने या अलभरिा में ननरुद्ध ककए जाने के दानयत्व के अधीन हो, और प्रत्येक ऐसा काय ष या िोप इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे दंडनीय समझा जाएगा, मानो अलभयु‍ त व्यक्‍ त भारत में उसका दोर्ी हुआ था । अपिाि—इस धारा के उपबंधों का ववस्तार ऐसे मामि े पर नहीं है, क्जसमें संश्रय देना या नछपाना, पकडे जाने वािे व्यक्‍ त के पनत या पत् नी द्वारा हो । िुटेरों या डाकुओ ं 254. जो कोई, यह जानत े हुए या ववश् वास करन े का कारण रित े हुए कक कोई व्यक्‍ त िटू को संश्रय देने के या डकैती हाि ही में करन े वािे हैं या हाि ही में िटू या डकैती कर चुके हैं, उनको या उनमें से लिए शाक्स्त । ककसी को, ऐसी िूट या डकैती का ककया जाना सुकर बनान े के, या उनको या उनमें स े ककसी को दंड स े बचान े के आशय स े सश्रं य देता है, वह कहठन कारावास स,े क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । स्पष् टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, यह तववहीन है कक िूट या डकैती भारत के भीतर या भारत से बाहर करने के लिए आशनयत है या की जा चुकी है । अपिाि—इस धारा के उपबंधों का ववस्तार ऐसे मामि े पर नहीं है, क्जसमें संश्रय देना या नछपाना अपराधी के पनत या पत्न ी द्वारा हो । िोक सवे क द्वारा 255. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए ववधध के ऐस े ककसी ननदेश की, जो उस संबंध में हो कक ककसी व्यक्‍त को उससे ऐसे िोक सेवक के नात े ककस ढंग का आचरण करना चाहहए, जानत े हुए अवज्ञा ककसी व्यक्‍ त दंड स े या ककसी संपवत्त के जब्ती को ववधधक दंड से बचान े के आशय से या संभाव्यत: उसके द्वारा बचाता है यह जानते हुए या उतने स े बचान े के दंड की अपेिा, क्जससे वह दंडनीय है, उसके द्वारा कम दंड हदिवाता है यह संभाव्य जानत े हुए या आशय स े ववधध ककसी संपवत्त को ऐसी जब्ती या ककसी भार से, क्जसके लिए वह संपवत्त ववधध के द्वारा दानयत्व के के ननदेश की अवज्ञा । अधीन है बचान े के आशय से या संभाव्यत: उसके द्वारा बचाएगा यह जानत े हुए करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । ककसी व्यक्‍त 256. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए और ऐस े िोक सेवक के नात े कोई अलभिेि या को दंड स े या अन्य िेि तैयार करन े का भार रित े हुए, उस अलभिेि या िेि की इस प्रकार से रचना, ककसी संपवत्त को क्जसे वह जानता है कक अशुद्ध है िोक को या ककसी व्यक्‍ त को हानन या िनत काररत जब्ती से बचान े के आशय स े करन े के आशय से या संभाव्यत: उसके द्वारा काररत करता है यह जानते हुए या ककसी िोक सेवक व्यक्‍ त को वैध दंड से बचान े के आशय से या संभाव्यत: उसके द्वारा बचाएगा यह जानते द्वारा अशुद्ध हुए या ककसी संपवत्त को ऐसी जब्ती या अन्य भार से, क्जसके दानयत्व के अधीन वह संपवत्त अलभिेि या ववधध के अनुसार है, बचान े के आशय स े या संभाव्यत: उसके द्वारा बचाएगा या जानत े हुए िेि की रचना । करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । न्यानयक कायवष ाही 257. जो कोई, िोक सेवक होत े हुए, न्यानयक कायवष ाही के ककसी प्रक्रम में कोई ररपोटष, में ववधध के आदेश, अधधमत या ववननश् चय, क्जसका ववधध के प्रनतकूि होना वह जानता है, भ्रष् टतापूवकष प्रनतकूि ररपोटष, आहद का िोक या ववद्वेर्पूवकष देता है, या सुनाता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी सेवक द्वारा अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । भ्रष् टतापवू षक ककया जाना ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 107 258. जो कोई, ककसी ऐसे पद पर होत े हुए, क्जससे व्यक्‍ तयों को ववचारण या परररोध प्राधधकार वाि े व्यक्‍त द्वारा के लिए सुपुदष करन े का, या व्यक्‍ तयों को परररोध में रिन े का उस े ववधधक प्राधधकार है जो यह जानता ककसी व्यक्‍ त को उस प्राधधकार के प्रयोग में यह जानते हुए भ्रष् टतापूवकष या ववद्वेर्पूवकष है कक वह ववधध ववचारण या परररोध के लिए सुपुदष करता है या परररोध में रिता है कक ऐसा करन े में वह के प्रनतकूि काय ष कर रहा है, ववधध के प्रनतकूि काय ष कर रहा है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी ववचारण के लिए अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । या परररोध करन े के लिए सुपुदषगी । 259. कोई ऐसा िोक सेवक होत े हुए, जो ककसी अपराध के लिए आरोवपत या पकड े पकडने के लिए आबद्ध िोक जाने के दानयत्व के अधीन ककसी व्यक्‍ त को पकडने या परररोध में रिन े के लिए सेवक के सेवक द्वारा नात े ववधधक रूप से आबद्ध है, ऐसे व्यक्‍ त को पकडने का साशय िोप करता है या ऐस े पकडने का परररोध में से ऐसे व्यक्‍ त का ननकि भागना साशय सहन करता है या ऐसे व्यक्‍ त के साशय िोप । ननकि भागने में या ननकि भागने के लिए प्रयत् न करने में साशय मदद करता है, वह ननम् नलिखित रूप से दंडडत ककया जाएगा,— (क) यहद परररुद्ध व्यक्‍ त या जो व्यक्‍ त पकडा जाना चाहहए था वह मत्ृ यु से दंडनीय अपराध के लिए आरोवपत या पकडे जाने के दानयत्व के अधीन हो, तो वह जुमाषने सहहत या रहहत दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी ; या (ि) यहद परररुद्ध व्यक्‍ त या जो व्यक्‍ त पकडा जाना चाहहए था वह आजीवन कारावास या दस वर् ष तक की अवधध के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए आरोवपत है या पकडे जाने के दानयत्व के अधीन है, तो वह जुमाषने सहहत या रहहत दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी ; या (ग) यहद परररुद्ध व्यक्‍ त या जो पकडा जाना चाहहए था वह दस वर् ष स े कम की अवधध के लिए कारावास से दंडनीय अपराध के लिए आरोवपत है या पकडे जाने के दानयत्व के अधीन है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से । 260. जो कोई, ऐसा िोक सवे क होत े हुए, जो ककसी अपराध के लिए न्यायािय के दंडादेश के अधीन या दंडादेश के अधीन या अलभरिा में रि े जाने के लिए ववधधपवू कष सुपुदष ककए गए ककसी व्यक्‍ त ववधधपूवकष सुपुदष को पकडने या परररोध में रिने के लिए ऐसे िोक सेवक के नात े ववधधक रूप से आबद्ध है, ककए गए ऐसे व्यक्‍ त को पकडने का साशय िोप करता है, या ऐसे परररोध में से साशय ऐसे व्यक्‍ त व्यक्‍ त को का ननकि भागना सहन करता है या ऐसे व्यक्‍ त के ननकि भागने में, या ननकि भागने का पकडने के लिए प्रयत् न करन े में साशय मदद करता है, वह ननम् नलिखित रूप से दंडडत ककया जाएगा,— आबद्ध िोक सेवक द्वारा पकडने का (क) यहद परररुद्ध व्यक्‍ त या जो व्यक्‍ त पकडा जाना चाहहए था वह मत्ृ यु साशय िोप । दंडादेश के अधीन हो, तो वह जुमाषन े सहहत या रहहत आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध चौदह वर् ष तक की हो सकेगी; या (ि) यहद परररुद्ध व्यक्‍ त या जो व्यक्‍ त पकडा जाना चाहहए था वह न्यायािय के दंडादेश से, या ऐसे दंडादेश से िघुकरण के आधार पर आजीवन कारावास या दस वर् ष की या उसस े अधधक की अवधध के लिए कारावास के अध्यधीन हो, तो वह जुमाषन े सहहत या रहहत, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से क्जसकी अवधध सात वर् ष तक108 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— की हो सकेगी; या (ग) यहद परररुद्ध व्यक्‍ त या जो व्यक्‍ त पकडा जाना चाहहए था वह न्यायािय के दंडादेश से दस वर् ष स े कम की अवधध के लिए कारावास के अध्यधीन हो या यहद वह व्यक्‍ त अलभरिा में रि े जाने के लिए ववधधपूवकष सपु ुदष ककया गया हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों स े दंडनीय होगा । िोक सेवक 261. जो कोई, ऐसा िोक सवे क होत े हुए, जो अपराध के लिए आरोवपत या दोर्लसद्ध द्वारा उपेिा स े या अलभरिा में रि े जाने के लिए ववधधपूवकष सुपुदष ककए गए ककसी व्यक्‍ त को परररोध में परररोध या रिन े के लिए ऐसे िोक सेवक के नात े ववधधक रूप से आबद्ध हो, ऐसे व्यक्‍ त का परररोध अलभरिा में स े ननकि भागना में से ननकि भागना उपेिा स े सहन करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष सहन करना । तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । ककसी व्यक्‍त 262. जो कोई ककसी ऐसे अपराध के लिए, क्जसका उस पर आरोप है, या क्जसके द्वारा ववधध के लिए वह दोर्लसद्ध ककया गया है, ववधध के अनुसार अपने पकडे जाने में साशय प्रनतरोध अनुसार अपन े करता है या अवैध बाधा डािता है, या ककसी अलभरिा से, क्जसमें वह ककसी ऐसे अपराध के पकडे जान े में प्रनतरोध या लिए ववधधपूवकष ननरुद्ध है, ननकि भागता है, या ननकि भागने का प्रयत् न करता है, वह बाधा । दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में उपबंधधत दंड, उस दंड के अनतरर‍ त है क्जससे वह व्यक्‍ त, क्जसे पकडा जाना हो, या अलभरिा में ननरुद्ध रिा जाना हो, उस अपराध के लिए दंडनीय था, क्जसका उस पर आरोप िगाया गया था या क्जसके लिए वह दोर्लसद्ध ककया गया था । ककसी अन्य 2 63. जो कोई, ककसी अपराध के लिए ककसी दसू रे व्यक्‍ त के ववधध के अनुसार पकडे व्यक्‍त के ववधध जाने में साशय प्रनतरोध करता है या अवैध बाधा डािता है, या ककसी दसू रे व्यक्‍ त को ककसी के अनसु ार पकड े जान े में प्रनतरोध ऐसी अलभरिा से, क्जसमें वह व्यक्‍ त ककसी अपराध के लिए ववधधपूवकष ननरुद्ध हो, साशय या बाधा । छुडवाता है या छुडान े का प्रयत् न करता है,— (क) वह दोनों में से ककसी भानंत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; या (ि) यहद उस व्यक्‍ त पर, क्जसे पकडा जाना हो, या जो छुडाया गया हो, या क्जसके छुडाने का प्रयत् न ककया गया हो, आजीवन कारावास से, या दस वर् ष तक की अवधध के कारावास से दंडनीय अपराध का आरोप हो या वह उसके लिए पकडे जाने के दानयत्व के अधीन हो, तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; या (ग) यहद उस व्यक्‍ त पर, क्जसे पकडा जाना हो या जो छुडाया गया हो, या क्जसके छुडाने का प्रयत् न ककया गया हो, मत्ृ य-ु दंड से दंडनीय अपराध का आरोप हो या वह उसके लिए पकडे जाने के दानयत्व के अधीन हो तो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; याअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 109 (घ) यहद वह व्यक्‍ त, क्जसे पकडा जाना हो या जो छुडाया गया हो, या क्जसके छुडाने का प्रयत् न ककया गया हो, ककसी न्यायािय के दंडादेश के अधीन या वह ऐसे दंडादेश के िघुकरण के आधार पर आजीवन कारावास या दस वर् ष या उससे अधधक अवधध के कारावास से दंडनीय हो, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा ; या (ङ) यहद वह व्यक्‍ त, क्जसे पकडा जाना हो, या जो छुडाया गया हो या क्जसके छुडाने का प्रयत् न ककया गया हो, मत्ृ यु दंडादेश के अधीन हो, तो वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, इतनी अवधध के लिए जो दस वर् ष स े अनधधक है, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 264. जो कोई, ऐसा िोक सवे क होत े हुए जो ककसी व्यक्‍ त को पकडने या परररोध में उन दशाओं में, क्जनके लिए रिन े के लिए िोक सेवक के नात े वैध रूप से आबद्ध है, उस व्यक्‍ त को ककसी ऐसी दशा अन्यथा उपबंध में, क्जसके लिए धारा 259, धारा 260 या धारा 261 या ककसी अन्य तत्समय प्रवत्तृ ववधध में नहीं है, िोक कोई उपबंध नहीं है, पकडने का िोप करता है या परररोध में स े ननकि भागना सहन करता सेवक द्वारा है,— पकडने का िोप करना या ननकि भागना (क) यहद वह ऐसा साशय करता है, तो वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास या सहन से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषन े स,े या दोनों से ; और करना । (ि) यहद वह ऐसा उपेिापूवकष करता है तो वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों स,े दंडडत ककया जाएगा । 265. जो कोई, स्वय ं अपने या ककसी अन्य व्यक्‍ त के ववधधपूवकष पकडे जाने में साशय अन्यथा अनुपबंधधत कोई प्रनतरोध करता है या अवैध बाधा डािता है या ककसी अलभरिा में से, क्जसमें वह दशाओ ं में ववधधपूवकष ननरुद्ध हो, ननकि भागता है या ननकि भागने का प्रयत् न करता है या ककसी ववधधपूवकष अन्य व्यक्‍ त को ऐसी अलभरिा में से, क्जसमें वह व्यक्‍ त ववधधपूवकष ननरुद्ध हो, छुडाता है पकडन े में प्रनतरोध या बाधा या छुडाने का प्रयत् न करता है वह ककसी ऐसी दशा में, क्जसके लिए धारा 262 या धारा 263 या ननकि या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध में उपबंध नहीं है, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास भागना या से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया छुडाना । जाएगा । 266. जो कोई, दंड का सशत ष पररहार स्वीकार कर िेने पर ककसी शत ष का क्जस पर दंड के पररहार की शत ष का ऐसा पररहार हदया गया था, जानत े हुए अनतक्रमण करता है, यहद वह उस दंड का, क्जसके अनतक्रमण । लिए वह मूित: दंडाहदष् ट ककया गया था, कोई भाग पहिे ही न भोग चुका हो, तो वह उस दंड से और यहद वह उस दंड का कोई भाग भोग चुका हो, तो वह उस दंड के उतने भाग से, क्जतन े को वह पहिे ही भोग चुका हो, दंडडत ककया जाएगा । 267. जो कोई, ककसी िोक सेवक का उस समय, जबकक ऐसा िोक सेवक न्यानयक न्यानयक कायषवाही में बैठे कायवष ाही के ककसी प्रक्रम में बैठा हुआ हो, साशय कोई अपमान करता है या उसके काय ष में हुए िोक सेवक कोई ववघ् न डािता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, का साशय या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । अपमान या उसके कायष में ववघ्न ।110 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— असेसर का 268. जो कोई, ककसी मामि े में प्रनतरूपण द्वारा या अन्यथा, अपने को यह जानत े हुए प्रनतरूपण । असेसर के रूप में तालिकांककत, पेनलित या गहृ ीतशपथ साशय कराएगा या होने देना जानते हुए सहन करता है कक वह इस प्रकार तालिकांककत, पेनलित या गहृ ीतशपथ होने का ववधध द्वारा हकदार नहीं है या यह जानत े हुए कक वह इस प्रकार तालिकांककत, पेनलित या गहृ ीतशपथ ववधध के प्रनतकूि हुआ है, ऐसे असेसर के रूप में स्वेच्छा सेवा करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । जमानतपत्र या 269. जो कोई, ककसी अपराध से आरोवपत ककए जाने पर और जमानतपत्र पर या बंधपत्र पर छोड े अपने बंधपत्र पर छोड हदए जाने पर, जमानत या बंधपत्र के ननबंधनों के अनुसार न्यायािय गए व्यक्‍त में पयाषप् त कारणों के बबना (जो साबबत करने का भार उस पर होगा), उपक्स्थत होने में द्वारा न्यायािय में उपक्स्थत होने असफि रहता है वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक में असफिता । की हो सकेगी या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—इस धारा के अधीन दंड— (क) उस दंड के अनतरर‍ त है, क्जसके लिए अपराधी उस अपराध के लिए, क्जसके लिए उस े आरोवपत ककया गया है, दोर्लसद्धध पर दायी होता है ; और (ि) न्यायािय की बंधपत्र के जब्ती का आदेश करन े की शक्‍ त पर प्रनतकूि प्रभाव डािने वािा नहीं है । अध्याय 15 िोक स्िास्थ्य, सुरक्षा, सुवििा, लशष् टता और सिाचार पर प्रभाि डाििे िािे अपरािों के विषय में िोक न्यूसेन्स । 270. वह व्यक्‍ त िोक न्यूसेन्स का दोर्ी है, जो कोई ऐसा काय ष करता है या ककसी ऐसे अवैध िोप का दोर्ी है, क्जससे िोक को या जनसाधारण को जो आस-पास में रहत े हों या आस-पास की सम्पवत्त पर अधधभोग रित े हों, कोई सामान्य िनत, संकट या िोभ काररत हो या क्जससे उन व्यक्‍ तयों का क्जन्हें ककसी िोक अधधकार को उपयोग में िाने का मौका पड,े िनत, बाधा, संकट या िोभ काररत होना अवश्यंभावी हो, ककंतु कोई सामान्य न्यूसेन्स इस आधार पर माफी योग्य नहीं है कक उसस े कुछ सुववधा या भिाई काररत होती है । उपेिापूण ष काय ष 271. जो कोई, ववधधववरुद्ध रूप से या उपेिा से ऐसा कोई काय ष करता है, क्जससे कक क्जसस े जीवन के और क्जससे वह जानता है या ववश् वास करने का कारण रिता हो कक जीवन के लिए लिए संकटपूण ष संकटपूण ष ककसी रोग का संक्रमण फैिना संभाव्य है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास रोग का संक्रमण फैिना संभाव्य से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया हो । जाएगा । पररद्वेर्पूण ष 272. जो कोई, पररद्वेर् से ऐसा कोई काय ष करता है क्जससे कक, और क्जससे वह काय,ष क्जससे जानता या ववश् वास करन े का कारण रिता है कक जीवन के लिए संकटपूण ष ककसी रोग का जीवन के लिए संक्रम फैिना संभाव्य है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास स,े क्जसकी अवधध दो वर् ष संकटपूण ष रोग का संक्रमण तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । फैिना संभाव्य हो ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 111 273. जो कोई, पररवहन के ककसी ढंग को संगरोधन की क्स्थनत में रिे जाने के, या संगरोधन के संगरोधन की क्स्थनत वािे ककसी ऐस े पररवहन का समागम ववननयलमत करने के, या ऐस े ननयम की स्थानों के, जहां कोई संक्रामक रोग फैि रहा हो और अन्य स्थानों के बीच समागम अवज्ञा । ववननयलमत करने के लिए सरकार द्वारा बनाए गए ककसी ननयम को जानते हुए अवज्ञा करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 274. जो कोई, ककसी िान े या पीने की वस्त ु को इस आशय से कक वह ऐसी वस्तु के ववक्रय के लिए िाद्य या पेय के रूप में बेच े या यह संभाव्य जानत े हुए कक वह िाद्य या पेय के रूप में आशनयत िाद्य बेची जाएगी, ऐसे अपलमधश्रत करता है कक ऐसी वस्तु िाद्य या पेय के रूप में हाननकर बन या पेय का जाए वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो अपलमश्रण । सकेगी, या जुमाषन े से, जो पाचं हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 275. जो कोई ककसी ऐसी वस्तु को, जो हाननकर बना दी गई हो, या हो गई हो, या हाननकर िाद्य िान-े पीने के लिए अनुपयु‍ त दशा में हो, यह जानत े हुए या यह ववश् वास करन े का कारण या पेय का रित े हुए कक वह िाद्य या पेय के रूप में हाननकर है, िाद्य या पेय के रूप में बेचता है, ववक्रय । या बेचन े की प्रस्थापना करता है या बेचने के लिए अलभदलशतष करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 276. जो कोई, ककसी ओर्धध या भेर्जीय ननलमनषत में अपलमश्रण इस आशय से कक या ओर्धधयों का यह सम्भाव्य जानत े हुए कक वह ककसी ओर्धीय प्रयोजन के लिए ऐसे बेची जाएगी या अपलमश्रण । उपयोग की जाएगी, मानो उसमें ऐसा अपलमश्रण न हुआ हो, ऐसे प्रकार से करेगा कक उस ओर्धध या भेर्जीय ननलमनषत की प्रभावकाररता कम हो जाए, कक्रया बदि जाए या वह हाननकर हो जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 277. जो कोई, यह जानत े हुए कक ककसी ओर्धध या भेर्जीय ननलमनषत में इस प्रकार स े अपलमधश्रत अपलमश्रण ककया गया है कक उसकी प्रभावकाररता कम हो गई या उसकी कक्रया बदि गई है, ओर्धधयों का या वह हाननकर बन गई है, उसे बेचता है या बेचने की प्रस्थापना करता है या बेचने के लिए ववक्रय । अलभदलशतष करता है, या ककसी ओर्धािय से ओर्धीय प्रयोजनों के लिए उस े अनपलमधश्रत के तौर पर देता है या उसका अपलमधश्रत होना न जानने वािे व्यक्‍ त द्वारा ओर्धीय प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग काररत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 278. जो कोई, ककसी ओर्धध या भेर्जीय ननलमनषत को, लभन्न ओर्धध या भेर्जीय ओर्धध का ननलमनषत के तौर पर जानत े हुए बेचता है या बेचने की प्रस्थापना करता है या बेचने के लिए लभन् न ओर्धध अलभदलशतष करता है या ओर्धीय प्रयोजनों के लिए और्धािय से देता है, वह दोनों में से या ननलमनषत के ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो तौर पर पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । ववक्रय ।112 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— िोक जि-स्रोत 279. जो कोई, ककसी िोक जि-स्रोत या जिाशय के जि को स्वेच्छया इस प्रकार या जिाशय का भ्रष् ट या गंदा करता है कक वह उस प्रयोजन के लिए, क्जसके लिए वह साधारण तौर पर जि किुवर्त उपयोग में आता है, कम उपयोगी हो जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, करना । क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । वायुमण्डि को 280. जो कोई, ककसी स्थान के वायुमण्डि को स्वेच्छया इस प्रकार दवूर्त करता है कक स्वास्थ्य के लिए वह जनसाधारण के स्वास्थ्य के लिए, जो पडोस में ननवास या कारबार करते हों, या िोक हाननकर माग ष स े आत-े जाते हों, हाननकर बन जाए, वह जुमाषन े से, जो एक हजार रुपए तक का हो बनाना । सकेगा, दक्ण्डत ककया जाएगा । िोक माग ष पर 281. जो कोई, ककसी िोक माग ष पर ऐस े उताविेपन या उपेिा स े कोई वाहन चिाता उताविेपन स े है या सवार होकर हांकता है क्जससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या ककसी अन्य वाहन चिाना या व्यक्‍ त को उपहनत या िनत काररत होना सम्भाव्य हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के हांकना । कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । जियान का 282. जो कोई, ककसी जियान को ऐसे उताविेपन या उपेिा स े चिाता है, क्जसस े उताविेपन स े मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या ककसी अन्य व्यक्‍ त को उपहनत या िनत काररत होना चिाना । सम्भाव्य हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । भ्रामक प्रकाश, 283. जो कोई, ककसी भ्रामक प्रकाश, धचह्न या बोये का प्रदशनष इस आशय से, या यह धचह्न या बोय े सम्भाव्य जानते हुए करता है, कक ऐसा प्रदशनष ककसी नौपररवाहक को माग ष भ्रष् ट कर देगा, का प्रदशनष । वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, और ऐसे जुमाषने से जो दस हजार रुपए से कम नहीं होगा दक्ण्डत ककया जाएगा । असुरक्षित या 284. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को ककसी जियान में जिमाग ष से, जानत े हुए या अनतभाररत उपेिापूवकष भाडे पर तब िे जाता है, या िे जाने देता है, जब वह जियान ऐसी दशा में हो जियान से भाड े या इतना िदा हुआ हो क्जससे उस व्यक्‍ त का जीवन संकटापन्न हो सकता हो, वह दोनों में के लिए जिमाग ष स े ककसी व्यक्‍त से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, को िे जाना । जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । िोक माग ष या 285. जो कोई, ककसी काय ष को करके या अपने कब्जे में की, या अपने भारसाधन के नौपररवहन पथ अधीन ककसी सम्पवत्त की व्यवस्था करन े का िोप करन े के द्वारा, ककसी िोकमाग ष या में संकट या नौपररवहन के िोक पथ में ककसी व्यक्‍ त को संकट, बाधा या िनत काररत करता है वह बाधा । जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दक्ण्डत ककया जाएगा । ववर्ैिे पदाथ ष के 286. जो कोई, ककसी ववर्ैिे पदाथ ष से कोई काय ष ऐसे उताविेपन या उपेिा से करता संबंध में है, क्जससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए, या क्जससे ककसी व्यक्‍ त को, उपहनत या िनत उपेिापूण ष काररत होना सम्भाव्य हो या अपने कब्जे में के ककसी ववर्िै े पदाथ ष की ऐसी व्यवस्था करने आचरण । का, जो ऐसे ववर्ैि े पदाथ ष स े मानव जीवन को ककसी अधधसम्भाव्य संकट से बचान े के लिए पयाषप् त हो, जानते हुए या उपेिापूवकष िोप करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 113 287. जो कोई, अक्ग् न या ककसी ज्विनशीि पदाथ ष से कोई काय ष ऐसे उताविेपन या अक्ग् न या उपेिा से करता है क्जससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या क्जससे ककसी अन्य व्यक्‍ त ज्विनशीि को उपहनत या िनत काररत होना सम्भाव्य हो या अपने कब्जे में की अक्ग् न या ककसी पदाथ ष के ज्विनशीि पदाथ ष की ऐसी व्यवस्था करन े का, जो ऐसी अक्ग् न या ज्विनशीि पदाथ ष से सम्बन्ध में मानव जीवन को ककसी अधधसम्भाव्य संकट स े बचान े के लिए पयाषप् त हो, जानत े हुए या उपेिापूण ष उपेिापूवकष िोप करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह आचरण । मास तक की हो सकेगी या जुमाषने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 288. जो कोई, ककसी ववस्फोटक पदाथ ष से, कोई काय ष ऐसे उताविेपन या उपेिा स े ववस्फोटक करता है, क्जससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या क्जससे ककसी अन्य व्यक्‍ त को पदाथ ष के बारे उपहनत या िनत काररत होना सम्भाव्य हो, या अपने कब्जे में की ककसी ववस्फोटक पदाथ ष में उपेिापूण ष की ऐसी व्यवस्था करन े का, जैसी ऐसे पदाथ ष स े मानव जीवन को अधधसम्भाव्य संकट स े आचरण । बचान े के लिए पयाषप् त हो, जानत े हुए या उपेिापूवकष िोप करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 289. जो कोई, ककसी मशीनरी से, कोई काय ष ऐसे उताविपे न या उपेिा से करता है, मशीनरी के क्जससे मानव जीवन संकटापन्न हो जाए या क्जसस े ककसी अन्य व्यक्‍ त को उपहनत या िनत सम्बन्ध में काररत होना सम्भाव्य हो, या अपने कब्जे में की या अपनी देि-रेि के अधीन की ककसी उपेिापूण ष मशीनरी की ऐसी व्यवस्था करन े का जो, ऐसी मशीनरी से मानव जीवन को ककसी आचरण । अलभसम्भाव्य संकट से बचान े के लिए पयाषप् त हो, जानत े हुए या उपेिापूवकष िोप करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 290. जो कोई, ककसी ननमाषण को धगराने, उसकी मरम्मत करन े में या सक्न्नमाषण करने ककसी ननमाषण में उस ननमाषण के ऐसे उपाय करने का, जो उस ननमाषण के या उसके ककसी भाग के धगरने को धगराने, से मानव जीवन को ककसी अधधसम्भाव्य संकट से बचान े के लिए पयाषप् त हो, जानत े हुए या उसकी मरम्मत उपेिापूवकष िोप करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह करन े या मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, संननमाषण करन े दक्ण्डत ककया जाएगा । के संबंध में उपेिापूणष आचरण । 291. जो कोई, अपने कब्जे में के ककसी जीव-जन्त ु के सबं ंध में ऐसे उपाय करने का, जीव-जन्तु के जो ऐसे जीव-जन्तु से मानव जीवन को ककसी अलभसम्भाव्य संकट या घोर उपहनत के ककसी संबंध में अधधसंभाव्य संकट स े बचान े के लिए पयाषप् त हो, जानत े हुए या उपेिापूवकष िोप करता है, उपेिापूण ष वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या आचरण । जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 292. जो कोई, ककसी ऐस े मामि े में िोक न्यूसेन्स करता है जो इस संहहता द्वारा अन्यथा अन्यथा दण्डनीय नहीं है, वह जुमाषने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दक्ण्डत अनुपबक्न्धत ककया जाएगा । मामिों में िोक न्यूसेन्स के लिए दण्ड ।114 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न्यूसेन्स बन्द 293. जो कोई, ककसी िोक सेवक द्वारा, क्जसको ककसी न्यूसेन्स की पुनराववृत्त न करने के व्यादेश करन े या उस े चािू न रिन े के लिए व्यादेश प्रचालित करन े का प्राधधकार हो, ऐसे व्याहदष् ट के पश् चात ् ककए जाने पर, ककसी िोक न्यूसेन्स की पुनराववृत्त करता है, या उस े चािू रिता है, वह सादा उसका चाि ू रिना । कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । अश् िीि पुस्तकों, 294. (1) उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए, ककसी पुस्तक, पुक्स्तका, कागज, िेि, आहद का ववक्रय रेिाधचत्र, रंगधचत्र, रूपण, आकृनत या अन्य वस्तु क्जसके अंतगतष इिै‍राननक प्ररूप में ककसी आहद । अंतवस्ष तु का प्रदशनष भी है, को अश् िीि समझा जाएगा यहद वह कामोद्दीपक है या कामुक व्यक्‍ तयों के लिए रुधचकर है या उसका या (जहां उसमें दो या अधधक सुलभन् न मदें समाववष् ट हैं वहां) उसकी ककसी मद का प्रभाव, समि रूप स े ववचार करन े पर, ऐसा है जो उन व्यक्‍ तयों को दरु ाचारी तथा भ्रष् ट बनाए क्जसके द्वारा उसमें अन्तववष्ष ट या सक्न्न ववष् ट ववर्य का पढ़ा जाना, देिा जाना या सुना जाना सभी सुसंगत पररक्स्थनतयों को ध्यान में रित े हए सम्भाव्य है । (2) जो कोई— (क) ककसी अश् िीि पुस्तक, पुक्स्तका, कागज, रेिाधचत्र, रंगधचत्र, रूपण या आकृनत या ककसी भी अन्य अश् िीि वस्तु को, चाहे वह ककसी भी रीनतयों में कुछ भी हो, बेचता है, भाडे पर देता है, ववतररत करता है, िोक प्रदलशतष करता है, या उसको ककसी भी प्रकार पररचालित करता है, या उस े ववक्रय, भाडे, ववतरण, िोक प्रदशनष या पररचािन के प्रयोजनों के लिए रचता है, उत्पाहदत करता है, या अपने कब्जे में रिता है; या (ि) ककसी अश् िीि वस्तु का आयात या ननयाषत या िे जाना पूवो‍ त प्रयोजनों में से ककसी प्रयोजन के लिए करता है या यह जानत े हुए, या यह ववश् वास करन े का कारण रिते हुए करता है कक ऐसी वस्तु बेची, भाडे पर दी, ववतररत या िोक प्रदलशतष या, ककसी प्रकार से पररचालित की जाएगी; या (ग) ककसी ऐस े कारबार में भाग िेता है या उसस े िाभ प्राप् त करता है, क्जस कारबार में वह यह जानता है या यह ववश् वास करन े का कारण रिता है कक कोई ऐसी अश् िीि वस्तु पूवो‍ त प्रयोजनों में से ककसी प्रयोजन के लिए रची जाती, उत्पाहदत की जाती, क्रय की जाती, रिी जाती, आयात की जाती, ननयाषत की जाती, प्रवहण की जाती, िोक प्रदलशतष की जाती या ककसी भी प्रकार से पररचालित की जाती है ; या (घ) यह ववज्ञावपत करता है या ककन्हीं साधनों द्वारा वे चाहे कुछ भी हो यह ज्ञात कराता है कक कोई व्यक्‍ त ककसी ऐसे काय ष में, जो इस धारा के अधीन अपराध है, िगा हुआ है, या िगन े के लिए तैयार है, या यह कक कोई ऐसी अश् िीि वस्तु ककसी व्यक्‍ त से या ककसी व्यक्‍ त के द्वारा प्राप् त की जा सकती है ; या (ङ) ककसी ऐस े काय ष को, जो इस धारा के अधीन अपराध है, करने की प्रस्थापना करेगा या करन े का प्रयत् न करता है, प्रथम दोर्लसद्धध पर दोनों में से ककसी भांनत के कारावास स,े क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी और जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, तथा द्ववतीय या पश् चात व् ती दोर्लसद्धध की दशा में दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधधअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 115 पांच वर् ष तक की हो सकेगी और जुमाषने से भी, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा दक्ण्डत ककया जाएगा । अपिाि—इस धारा का ववस्तार ननम् नलिखित पर नहीं होगा,— (क) ककसी ऐसी पस्ु तक, पुक्स्तका, कागज, िेि, रेिाधचत्र, रंगधचत्र, रूपण या आकृनत— (i) क्जसका प्रकाशन िोकहहत में होने के कारण इस आधार पर न्यायोधचत साबबत हो गया है कक ऐसी पुस्तक, पुक्स्तका, कागज, िेि, रेिाधचत्र, रंगधचत्र, रूपण या आकृनत ववज्ञान, साहहत्य, किा या ववद्या या सवजष न सम्बन्धी अन्य उद्देश्यों के हहत में है; या (ii) जो सद्भ ावपूवकष धालमकष प्रयोजनों के लिए रिी जाती है या उपयोग में िाई जाती है; (ि) ककसी ऐसे रूपण जो— 1958 का 24 (i) प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थि और अवशेर् अधधननयम, 1958 के अथ ष में प्राचीन संस्मारक पर या उसमें; या (ii) ककसी मंहदर पर या उसमें या मूनतयष ों को ि े जाने के उपयोग में िाए जाने वािे या ककसी धालमकष प्रयोजन के लिए रि े या उपयोग में िाए जाने वाि े ककसी रथ पर, तक्षित, उत्कीण,ष रंगधचबत्रत या अन्यथा रूवपत हो । 295. जो कोई, ककसी लशश ु को कोई ऐसी अश् िीि वस्तु, जो धारा 294 में ननहदषष् ट है, लशशु को अश् िीि वस्तुओ ं बेचेगा, भाडे पर देता है, ववतरण करता है, प्रदलशतष करता है या पररचालित करता है या ऐसा का ववक्रय, करन े की प्रस्थापना या प्रयत् न करता है प्रथम दोर्लसद्धध पर दोनों में स े ककसी भांनत के आहद । कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, और जुमाषने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, तथा द्ववतीय या पश् चात व् ती दोर्लसद्धध की दशा में दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी और जुमाषने से भी, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दक्ण्डत ककया जाएगा । 296. जो कोई,— अश् िीि कायष और गाने । (क) ककसी िोक स्थान में कोई अश् िीि काय ष करता है ; या (ि) ककसी िोक स्थान में या उसके समीप कोई अश् िीि गाने, पवांडे या शब्द गाएगा, सुनाएगा या उच् चाररत करेगा, क्जससे दसू रों को िोभ होता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 297. (1) जो कोई, ऐसी कोई िाटरी, जो न तो राज्य िाटरी हो और न तत्संबंधधत िाटरी कायाषिय रिना । राज्य सरकार द्वारा प्राधधकृत िाटरी हो, ननकािने के प्रयोजन के लिए कोई कायाषिय या स्थान रिता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा ; (2) जो कोई, ऐसी िाटरी में ककसी हटकट, िाट, संख् यांक या आकृनत को ननकािने से116 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— संबंधधत या िागू होने वािी ककसी घटना या पररक्स् थनत पर ककसी व् यक्‍ त के फायदे के लिए ककसी रालश को देने की, या ककसी माि के पररदान को, या ककसी बात को करने की, या ककसी बात स े दरू रहने की कोई प्रस् थापना प्रकालशत करता है, वह जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दक्ण्ड त ककया जाएगा । अध् याय 16 िम भ से संबंधित अपरािों के विषय में ककसी वग ष के धम ष 298. जो कोई, ककसी उपासना स् थान को या व् यक्‍ तयों के ककसी वग ष द्वारा पववत्र का अपमान करन े मानी गई ककसी वस् तु को नष्ट , नुकसानिस् त या अपववत्र इस आशय से करता है कक ककसी के आशय स े उपासना के स्थ ान वग ष के धम ष का उसके द्वारा अपमान ककए जाए या यह सम्भ ाव् य जानते हुए करता है कक को िनत करना व् यक्‍ तयों का कोई वग ष ऐस े नाश, नुकसान या अपववत्र ककए जाने को अपने धम ष के प्रनत या अपववत्र अपमान समझेगा, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक करना। की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । ववमलशतष और 299. जो कोई, भारत के नागररकों के ककसी वग ष की धालमषक भावनाओं को आहत करने ववद्वेर्पूण ष काय ष के ववमलशतष और ववद्वेर्पूण ष आशय से उस वग ष के धम ष या धालमकष ववश् वासों का अपमान जो ककसी वग ष के धमष या धालमषक उच् चाररत या लिखित शब् दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृश् यरूपणों द्वारा या इिै‍राननक ववश् वासों का साधनों द्वारा या अन् यथा करता है या करने का प्रयत् न करता है, वह दोनों में से ककसी अपमान करके भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों उसकी धालमषक भावनाओ ं को से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । आहत करन े के आशय स े ककए गए हों । धालमकष जमाव 300. जो कोई, धालमकष उपासना या धालमकष संस् कारों में वैध रूप से िग े हुए ककसी जमाव में में ववघ्न स् वेच् छया ववघ्न काररत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक करना । वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमानष े से, या दोनों स,े दक्ण्ड त ककया जाएगा । कबिस् तानों, 301. जो कोई, ककसी उपासना स् थान में, या ककसी कबिस् तान पर या अन्त् येक्ष् ट आहद में कक्रयाओं के लिए या मतृ कों के अवशेर्ों के लिए ननिेप स् थान के रूप में पथृ क् रिे गए अनतचार ककसी स् थान में अनतचार या ककसी मानव शव की अवहेिना या अन् त् येक्ष् ट संस् कारों के लिए करना । एकबत्रत ककन्ह ीं व् यक्‍ तयों को ववघ् न काररत, इस आशय से करता है कक ककसी व् यक्‍त की भावनाओं को ठेस पहुंचाए या ककसी व् यक्‍ त के धम ष का अपमान करे, या यह सम् भाव् य जानते हुए करेगा कक उसके द्वारा ककसी व् यक्‍ त की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी, या ककसी व् यक्‍ त के धम ष का अपमान होगा, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । ककसी व्यक्‍त 302. जो कोई, ककसी व् यक्‍ त की धालमकष भावनाओं को ठेस पहुंचाने के ववमलशतष की धालमकष आशय से उसकी श्रवणगोचरता में कोई शब् द उच् चाररत करता है या कोई ध् वनन करता है या भावनाओं को उसकी दृक्ष् टगोचरता में कोई अंगवविेप करता है, या कोई वस् त ु रिता है, वह दोनों में स े ठेस पहुंचाने के ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या ववमलशतष आशय से शब् द दोनों से, दक्ण्ड त ककया जाएगा । उच् चाररत करना, आहद ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 117 अध्याय 17 सम्पवि के विरुद्ि अपरािों के विषय में चोरी के विषय में 303. (1) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त के कब्जे में से, उस व्यक्‍ त की सम्मनत के बबना चोरी । कोई चि सम्पवत्त बेईमानी से िे िेने का आशय रिते हुए वह सम्पवत्त ऐसे िेने के लिए हटाता है, वह चोरी करता है, यह कहा जाता है । स्पष् टीकरण 1—जब तक कोई वस्त ु भूबद्ध रहती है, चि सम्पवत्त न होने से चोरी का ववर्य नहीं होती ; ककन्तु ज्यों ही वह भूलम से पथृ क् की जाती है वह चोरी का ववर्य होने योग्य हो जाती है । स्पष् टीकरण 2—हटाना, जो उसी काय ष द्वारा ककया गया है क्जससे पथृ ‍ करण ककया गया है, चोरी हो सकेगा । स्पष् टीकरण 3—कोई व्यक्‍ त ककसी चीज का हटाना काररत करता है, यह कहा जाता है जब वह उस बाधा को हटाता है जो उस चीज को हटाने से रोके हुए हो या जब वह उस चीज को ककसी दसू री चीज से पथृ क् करता है तथा जब वह वास्तव में उस े हटाता है । स्पष् टीकरण 4—वह व्यक्‍ त जो ककसी साधन द्वारा ककसी जीव-जन्त ु का हटाना काररत करता है, उस जीव-जन्त ु को हटाता है, यह कहा जाता है ; और यह कहा जाता है कक वह ऐसी प्रत्येक चीज को हटाता है जो इस प्रकार उत्पन्न की गई गनत के पररणामस्वरूप उस जीव-जन्तु द्वारा हटाई जाती है । स्पष् टीकरण 5—इस धारा में वखणतष संपवत्त अलभव्य‍ त या वववक्षित हो सकती है, और वह या तो कब्जा रिन े वाि े व्यक्‍ त द्वारा, या ककसी ऐसे व्यक्‍ त द्वारा, जो उस प्रयोजन के लिए अलभव्य‍ त या वववक्षित प्राधधकार रिता है, दी जा सकती है । दृष् टांत (क) य की सम्मनत के बबना य के कब्जे में से एक विृ बईे मानी से िेने के आशय से य की भूलम पर िगे हुए उस विृ को क काट डािता है । यहां, जैसे ही क ने इस प्रकार िेने के लिए उस विृ को पथृ क् ककया, उसने चोरी की । (ि) क अपनी जेब में कुत्तों के लिए ििचाने वािी वस्तु रिता है, और इस प्रकार य के कुत्तों को अपने पीछे चिने के लिए उत् प्रेररत करता है । यहां, यहद क का आशय य की सम्मनत के बबना य के कब्जे में से उस कुत्ते को बेईमानी से िेना हो, तो जैसे ही य के कुत्त े ने क के पीछे चिना आरंभ ककया, क ने चोरी की । (ग) मू्यवान वस्तु की पेटी िे जात े हुए एक बैि क को लमिता है । वह उस बैि को इसलिए एक िास हदशा में हांकता है कक वे मू्यवान वस्तुएं बेईमानी से िे सके । जसै े ही उस बैि ने गनतमान होना प्रारम्भ ककया, क ने मू्यवान वस्तुएं चोरी की । (घ) क, जो य का सेवक है और क्जसे य ने अपनी प्िेट की देि-रेि न्यस्त कर दी है, य की सम्मनत के बबना प्िेट को िेकर बेईमानी से भाग गया । क ने चोरी की । (ङ) य यात्रा को जात े समय अपनी प्िेट िौटकर आन े तक, क को, जो एक भाण्डागाररक है, न्यस्त कर देता है । क उस प्िेट को एक सुनार के पास ि े जाता है और118 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— वह प्िेट बेच देता है । यहां वह प्िेट य के कब्जे में नहीं थी, इसलिए वह य के कब्जे में स े नहीं िी जा सकती थी और क ने चोरी नहीं की है, चाहे उसने आपराधधक न्यासभंग ककया हो । (च) क्जस घर पर य का अधधभोग है उसके मेज पर य की अंगूठी क को लमिती है । यहां, वह अंगूठी य के कब्जे में है, और यहद क उसको बेईमानी से हटाता है, तो वह चोरी करता है । (छ) क को राजमाग ष पर पडी हुई अंगूठी लमिती है, जो ककसी व्यक्‍ त के कब्जे में नहीं है । क ने उसके िे िेने से चोरी नहीं की है, भिे ही उसने संपवत्त का आपराधधक दवुवनष नयोग ककया हो । (ज) य के घर में मेज पर पडी हुई य की अंगूठी क देिता है । तिाशी और पता िगन े के भय से उस अंगूठी का तुरंत दवुवनषनयोग करन े का साहस न करते हुए क उस अंगूठी को ऐसे स्थान पर, जहां से उसका य को कभी भी लमिना अनत अनधधसम्भाव्य है, इस आशय से नछपा देता है कक नछपाने के स्थान से उस े उस समय िे िे और बेच दे जबकक उसका िोया जाना याद न रहे । यहां, क ने उस अंगूठी को प्रथम बार हटाते समय चोरी की है । (झ) य को, जो एक जौहरी है, क अपनी घडी समय ठीक करन े के लिए पररदत्त करता है । य उसको अपनी दकु ान पर िे जाता है । क, क्जस पर उस जौहरी का, कोई ऐसा ऋण नहीं है, क्जसके लिए कक वह जौहरी उस घडी को प्रनतभूनत के रूप में ववधधपूवकष रोक सके, िुिे तौर पर उस दकु ान में घुसता है, य के हाथ से अपनी घडी बिपूवकष िे िेता है, और उसको िे जाता है । यहां क ने भिे ही आपराधधक अनतचार और हमिा ककया हो, उसने चोरी नहीं की है, ‍योंकक जो कुछ भी उसने ककया, बेईमानी से नहीं ककया । (ञ) यहद उस घडी की मरम्मत के संबंध में य को क से धन देय है, और यहद य उस घडी को उस ऋण की प्रनतभूनत के रूप में ववधधपूवकष रि े रिता है और क उस घडी को य के कब्जे में से इस आशय स े िे िेता है कक य को उसके ऋण की प्रनतभूनत रूप उस संपवत्त से वंधचत कर दे तो उसने चोरी की है ‍योंकक जो कुछ वह िेता है, उस े बेईमानी स े िेता है । (ट) और यहद क अपनी घडी य के पास धगरवी रिने के बाद घडी के बदिे लिए गए ऋण को चुकाए बबना उस े य के कब्जे में से य की सम्मनत के बबना िे िेता है, तो उसने चोरी की है, यद्यवप वह घडी उसकी अपनी ही संपवत्त है, ‍योंकक जो कुछ वह िेता है, उस े बेईमानी से िेता है । (ठ) क एक वस्तु को उस समय तक रि िेने के आशय से जब तक कक उसके प्रत्यावतष न के लिए पुरस्कार के रूप में उस े य स े धन अलभप्राप् त न हो जाए, य की सम्मवत्त के बबना य के कब्जे में से िते ा है । यहां क बेईमानी से िेता है, इसलिए, क ने चोरी की । (ड) क, जो य का लमत्र है, य की अनुपक्स्थनत में य के पुस्तकािय में जाता है, और य की अलभव्य‍ त सम्मनत के बबना एक पुस्तक केवि पढ़न े के लिए और वापस करन े के आशय से ि े जाता है । यहां यह अधधसम्भाव्य है कक क ने यह ववचार ककया हो कक पस्ु तक उपयोग में िाने के लिए उसको य की वववक्षित सम्मनत प्राप् त है, यहद क का यह ववचार था,अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 119 तो क ने चोरी नहीं की है । (ढ) य की पत्न ी से क लभिादान मांगता है । वह क को धन, भोजन और कपडे देती है क्जनको क जानता है कक व े उसके पनत य के हैं । यहां, यह अधधसंभाव्य है कक क का यह ववचार हो कक य की पत्न ी को लभिा देने का प्राधधकार है । यहद क का यह ववचार था, तो क ने चोरी नहीं की है । (ण) क, य की पत् नी का जार है । वह क को एक मू्यवान संपवत्त देती है क्जसके संबंध में क यह जानता है कक वह उसके पनत य की है, और वह ऐसी संपवत्त है, क्जसको देने का प्राधधकार उसे य से प्राप् त नहीं है । यहद क उस संपवत्त को बेईमानी से िेता है, तो वह चोरी करता है । (त) य की संपवत्त को अपनी स्वयं की संपवत्त होने का सद्भ ावपूवकष ववश् वास करत े हुए ख के कब्जे में से उस संपवत्त को क िे िेता है । यहां क बेईमानी से नहीं िेता, इसलिए वह चोरी नहीं करता । (2) जो कोई चोरी करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा और इस धारा के अधीन ककसी व्यक्‍त के दसू रे या पश्चातवती दोर्लसद्धध के मामिे में, उस े ऐसे कहठन कारावास से क्जसकी अवधध एक वर् ष से कम नहीं होगी ककंन्तु पांच वर् ष तक हो सकेगी और जुमाषने से दंडडत ककया जाएगा : परन्तु चोरी के उन मामिों में जहां चोरी की गई संपवत्त का मू्य पांच हजार रुपए स े कम है और कोई व्यक्‍त पहिी बार के लिए दोर्लसद्ध ककया गया है, चोरी की गई संपवत्त के वापस करने पर या संपवत्त को प्रत्यावनततष करने पर उसे सामुदानयक सेवा स े दंडडत ककया जाएगा । 304. (1) चोरी "झपटमारी" है, यहद चोरी करने के लिए अपराधी अचानक या शीघ्रता झपटमारी । से या बिपूवकष ककसी व्यक्‍त से या उसके कब्जे में से ककसी चि संपवत्त को अलभिहण कर िेता है या प्राप्त कर िेता है या छीन िेता है या िे िेता है । (2) जो कोई, झपटमारी करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और वह जुमाषने का भी दायी होगा । 305. जो कोई,— ननवास-गहृ , या यातायात के (क) ऐसे ककसी भवन, तम्ब ू या जियान में चोरी करता है, जो मानव ननवास के साधन या पूजा स्थि, आहद में रूप में, या संपवत्त की अलभरिा के लिए उपयोग में आता है ; या चोरी । (ि) ऐसे ककसी यातायात के साधन में चोरी करता है, जो माि या याबत्रयों के यातायात के लिए उपयोग ककया जाता है ; या (ग) ऐस े ककसी यातायात के साधन से ककसी वस्तु या माि की चोरी करता है, जो माि या याबत्रयों के यातायात के लिए उपयोग ककया जाता है ; या (घ) ककसी पूजा स्थि की मूनत ष या प्रतीक की चोरी करता है ;या (ङ) सरकार या ककसी स्थानीय प्राधधकरण की ककसी संपवत्त की चोरी करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी,120 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दक्ण्डत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । लिवपक या सेवक 306. जो कोई, लिवपक या सेवक होते हुए, या लिवपक या सेवक की हैलसयत में द्वारा स्वामी के ननयोक्जत होत े हुए, अपने मालिक या ननयो‍ता के कब्जे की ककसी संपवत्त की चोरी करता है, कब्जे में संपवत्त वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, की चोरी । दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । चोरी करन े के 307. जो कोई, चोरी करन े के लिए, या चोरी करन े के पश् चात ् ननकि भागने के लिए, लिए मत्ृ य,ु या चोरी द्वारा िी गई संपवत्त को रि े रिने के लिए, ककसी व्यक्‍ त की मत्ृ यु, या उस े उपहनत या उपहनत या उसका अवरोध काररत करन े की, या मत्ृ यु का, उपहनत का या अवरोध का भय अवरोध काररत करने की तैयारी काररत करन े की तैयारी करके चोरी करता है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस के पश् चात ् वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । चोरी । दृष् टांत (क) य के कब्जे में की संपवत्त पर क चोरी करता है और यह चोरी करते समय अपने पास अपने वस् त्रों के भीतर एक भरी हुई वपस्तौि रिता है, क्जसे उसन े य द्वारा प्रनतरोध ककए जाने की दशा में य को उपहनत करने के लिए अपने पास रिा था । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (ि) क, य की जेब काटता है, और ऐसा करन े के लिए अपने कई साधथयों को अपने पास इसलिए ननयु‍ त करता है कक यहद य यह समझ जाए कक ‍या हो रहा है और प्रनतरोध करे, या क को पकडने का प्रयत् न करे, तो वे य का अवरोध करें । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । उद्िापि के विषय में उद्दापन । 308. (1) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को स्वयं उस व्यक्‍ त को या ककसी अन्य व्यक्‍ त को कोई िनत करने के भय में साशय डािता है, और उसके द्वारा इस प्रकार भय में डािे गए व्यक्‍ त को, कोई संपवत्त या मू्यवान प्रनतभूनत या हस्तािररत या मुरांककत कोई चीज, क्जसे मू्यवान प्रनतभूनत में पररवनततष ककया जा सके, ककसी व्यक्‍ त को पररदत्त करने के लिए बेईमानी से उत् प्रेररत करता है, वह उद्दापन करता है । दृष् टांत (क) क यह धमकी देता है कक यहद य ने उसको धन नहीं हदया, तो वह य के बारे में मानहाननकारक अपमानिेि प्रकालशत करेगा । अपने को धन देने के लिए वह इस प्रकार य को उत् प्रेररत करता है । क ने उद्दापन ककया है । (ि) क, य को यह धमकी देता है कक यहद वह क को कुछ धन देने के संबंध में अपन े आपको आबद्ध करन े वािा एक वचनपत्र हस्तािररत करके क को पररदत्त नहीं कर देता, तो वह य के लशशु को सदोर् परररोध में रिेगा । य वचनपत्र हस्तािररत करके पररदत्त कर देता है । क ने उद्दापन ककया है । (ग) क यह धमकी देता है कक यहद य, ख को कुछ उपज पररदत्त कराने के लिए शाक्स्तयु‍ त बंधपत्र हस्तािररत नहीं करेगा और ख को न देगा, तो वह य के िेत को जोत डािने के लिए िठैत भेज देगा और उसके द्वारा य को वह बंधपत्र हस्तािररत करन े के लिएअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 121 और पररदत्त करने के लिए उत् प्रेररत करता है । क ने उद्दापन ककया है । (घ) क, य को घोर उपहनत करन े के भय में डािकर बेईमानी से य को उत् प्रेररत करता है कक वह कोरे कागज पर हस्तािर कर दे या अपनी मरु ा िगा दे और उसे क को पररदत्त कर दे । य उस कागज पर हस्तािर करके उसे क को पररदत्त कर देता है यहां, इस प्रकार हस्तािररत कागज मू्यवान प्रनतभूनत में पररवनततष ककया जा सकता है, इसलिए क ने उद्दापन ककया है । (ङ) क, य को ककसी इिै‍राननक डडवाइस के माध्यम से यह संदेश भेजकर धमकी देता है कक "तुम्हारा बच्चा मेरे कब्जे में है और उसे मार हदया जाएगा यहद तुम मुझे एक िाि रुपए नहीं देते हो" क इस प्रकार य को उसे पैसे देने के लिए उत् प्रेररत करता है । क ने "उद्दापन" ककया है । (2) जो कोई, उद्दापन करता है, वह दोनों में से ककसी भानंत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (3) जो कोई, उद्दापन करन े के लिए ककसी व्यक्‍ त को ककसी िनत के पहुंचाने के भय में डािता है या भय में डािने का प्रयत् न करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (4) जो कोई, उद्दापन करन े के लिए ककसी व्यक्‍ त को स्वयं उसकी या ककसी अन्य व्यक्‍ त की मत्ृ यु या घोर उपहनत के भय में डािता है या भय में डािने का प्रयत् न करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (5) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को स्वयं उसकी या ककसी अन्य व्यक्‍ त की मत्ृ यु या घोर उपहनत के भय में डािकर उद्दापन करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (6) जो कोई, उद्दापन करन े के लिए ककसी व्यक्‍ त को, स्वय ं उसके ववरुद्ध या ककसी अन्य व्यक्‍ त के ववरुद्ध यह अलभयोग िगाने का भय हदििाता है या यह भय हदििाने का प्रयत् न करता है कक उसने ऐसा अपराध ककया है, या करन े का प्रयत् न ककया है, जो मत्ृ यु से या आजीवन कारावास से, या दस वर् ष तक के कारावास से दण्डनीय है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (7) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को स्वयं उसके ववरुद्ध या ककसी अन्य व्यक्‍ त के ववरुद्ध यह अलभयोग िगाने के भय में डािकर कक उसने कोई ऐसा अपराध ककया है, या करन े का प्रयत् न ककया है, जो मत्ृ यु से या आजीवन कारावास स े या ऐसे कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडनीय है, या यह कक उसने ककसी अन्य व्यक्‍ त को ऐसा अपराध करने के लिए उत् प्रेररत करन े का प्रयत् न ककया है, उद्दापन करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा122 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— और जुमाषने का भी दायी होगा । िूट और डकैती के विषय में िूट । 309. (1) सब प्रकार की िूट में या तो चोरी या उद्दापन होता है । (2) चोरी “िूट” है, यहद उस चोरी को करने के लिए, या उस चोरी के करने में या उस चोरी द्वारा अलभप्राप् त सम्पवत्त को ि े जाने या ि े जाने का प्रयत् न करन े में, अपराधी उस उद्देश्य स े स्वेच्छया ककसी व्यक्‍ त की मत्ृ यु, या उपहनत या उसका सदोर् अवरोध या तत्काि मत्ृ यु का, या तत्काि उपहनत का, या तत्काि सदोर् अवरोध का भय काररत करता या काररत करने का प्रयत् न करता है । (3) उद्दापन “िूट” है, यहद अपराधी वह उद्दापन करत े समय भय में डािे गए व्यक्‍ त की उपक्स्थनत में है, और उस व्यक्‍ त को स्वयं उसकी या ककसी अन्य व्यक्‍ त की तत्काि मत्ृ यु या तत्काि उपहनत या तत्काि सदोर् अवरोध के भय में डािकर वह उद्दापन करता है और इस प्रकार भय में डािकर इस प्रकार भय में डािे गए व्यक्‍ त को उद्दापन की जाने वािी चीज उसी समय और वहां ही पररदत्त करने के लिए उत् प्रेररत करता है । स्पष् टीकरण—अपराधी का उपक्स्थत होना कहा जाता है, यहद वह उस अन्य व्यक्‍ त को तत्काि मत्ृ यु के, तत्काि उपहनत के, या तत्काि सदोर् अवरोध के भय में डािने के लिए पयाषप् त रूप से ननकट हो । दृष् टांत (क) क, य को दबोच िेता है, और य के कपडे में से य का धन और आभूर्ण य की सम्मनत के बबना कपटपूवकष ननकाि िेता है । यहां, क ने चोरी की है और वह चोरी करने के लिए स्वेच्छया य का सदोर् अवरोध काररत करता है । इसलिए क ने िूट की है । (ि) क, य को राजमाग ष पर लमिता है, एक वपस्तौि हदििाता है और य की थैिी मांगता है । पररणामस्वरूप य अपनी थैिी दे देता है । यहां क ने य को तत्काि उपहनत का भय हदििाकर थैिी उद्दावपत की है और उद्दापन करत े समय वह उसकी उपक्स्थनत में है । अत: क ने िूट की है । (ग) क राजमाग ष पर य और य के लशश ु से लमिता है । क उस लशश ु को पकड िेता है और यह धमकी देता है कक यहद य उसको अपनी थैिी नहीं पररदत्त कर देता, तो वह उस लशशु को कगार से नीचे फेंक देगा । पररणामस्वरूप य अपनी थैिी पररदत्त कर देता है । यहां क ने य को यह भय काररत करके कक वह उस लशशु को, जो वहां उपक्स्थत है, तत्काि उपहनत करेगा, य से उसकी थैिी उद्दावपत की है । इसलिए क ने य को िूटा है । (घ) क, य स े यह कह कर सम्पवत्त अलभप्राप् त करता है कक “तुम्हारा लशश ु मेरी टोिी के हाथों में है, यहद तुम हमारे पास दस हजार रुपया नहीं भेज दोगे, तो वह मार डािा जाएगा।” यह उद्दापन है, और इसी रूप में दण्डनीय है ; ककन्त ु यह िूट नहीं है, जब तक कक य को उसके लशशु की तत्काि मत्ृ यु के भय में न डािा जाए । (4) जो कोई, िूट करता है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने से भी दण्डनीय होगा, और यहद िूट राजमाग ष पर सूयाषस्त के पश्चात ् और सूयोदय के पूव ष की जाए, तो कारावास चौदह वर् ष तक का होअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 123 सकेगा । (5) जो कोई, िूट करन े का प्रयत् न करता है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (6) यहद कोई व्यक्‍ त िूट करन े में या िूट का प्रयत् न करन े में स्वेच्छया उपहनत काररत करता है, तो ऐसा व्यक्‍ त और कोई अन्य व्यक्‍ त ऐसी िटू करन े में, या िूट का प्रयत् न करन े में संयु‍ त तौर पर संबंधधत होगा, वह आजीवन कारावास स े या कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जमु ाषने का भी दायी होगा । 310. (1) जब पांच या अधधक व्यक्‍ त संयु‍ त होकर िूट करत े हैं या करने का प्रयत् न डकैती । करत े हैं या जहां कक व े व्यक्‍ त, जो संयु‍ त होकर िूट करत े हैं या करन े का प्रयत् न करत े हैं और वे व्यक्‍ त जो उपक्स्थत हैं और ऐसे िूट के ककए जान े या ऐस े प्रयत् न में मदद करत े हैं, कुि लमिाकर पांच या अधधक हैं, तब प्रत्येक व्यक्‍ त जो इस प्रकार िटू करता है, या उसका प्रयत् न करता है या उसमें मदद करता है, कहा जाता है कक वह “डकैती” करता है । (2) जो कोई डकैती करता है, वह आजीवन कारावास से, या कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (3) यहद ऐस े पांच या अधधक व्यक्‍ तयों में से, जो संयु‍ त होकर डकैती कर रहे हों, कोई एक व्यक्‍ त इस प्रकार डकैती करने में हत्या कर देता है, तो उन व्यक्‍ तयों में स े प्रत्येक व्यक्‍ त मत्ृ यु से, या आजीवन कारावास से, या कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष से कम नहीं होगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जो कोई, डकैती करन े के लिए कोई तैयारी करता है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । (5) जो कोई, डकैती करन े के प्रयोजन से एकबत्रत पांच या अधधक व्यक्‍ तयों में स े एक है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (6) जो कोई, ऐसे व्यक्‍ तयों की टोिी का है, जो अभ्यासत: डकैती करने के प्रयोजन से सहयु‍ त हों, वह आजीवन कारावास से, या कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 311. यहद िूट या डकैती करत े समय अपराधी ककसी घातक आयुध का उपयोग करता मत्ृ यु या घोर उपहनत काररत है, या ककसी व्यक्‍ त को घोर उपहनत काररत करता है, या ककसी व्यक्‍ त की मत्ृ यु काररत करन े के प्रयत् न करन े या उस े घोर उपहनत काररत करन े का प्रयत् न करता है, तो वह कारावास, क्जससे ऐसा के साथ िूट या अपराधी दक्ण्डत ककया जाएगा, सात वर् ष से कम का नहीं होगा । डकैती । 312. यहद िूट या डकैती करन े का प्रयत् न करत े समय, अपराधी ककसी घातक आयुध घातक आयुध से सक्ज् जत से सक्ज् जत है, तो वह कारावास, क्जससे ऐसा अपराधी दक्ण्डत ककया जाएगा, सात वर् ष से होकर िूट या कम का नहीं होगा । डकैती करन े का प्रयत् न ।124 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— िुटेरों, आहद की 313. जो कोई, ऐसे व्यक्‍ तयों की टोिी का है, जो अभ्यासत: चोरी या िूट करन े स े टोिी का होने के सहयु‍ त हों और वह टोिी डाकुओं की टोिी नहीं है, वह कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध लिए दण्ड । सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । सम्पवि के आपराधिक िवुिनभियोि के विषय में सम्पवत्त का 314. जो कोई, बेईमानी से ककसी चि सम्पवत्त का दवुवनष नयोग करता है या उसको बेईमानी स े अपने उपयोग के लिए संपररवनततष कर िेता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, दवुवनषनयोग । क्जसकी अवधध छह मास से कम नहीं होगी ककन्तु जो दो वर् ष तक की हो सकेगी और जुमाषन े से भी, दक्ण्डत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) क, य की सम्पवत्त को उस समय जब कक क उस सम्पवत्त को िेता है, यह ववश् वास रित े हुए कक वह सम्पवत्त उसी की है, य के कब्जे में से सद्भ ावपूवकष िेता है । क, चोरी का दोर्ी नहीं है । ककन्तु यहद क अपनी भूि मािूम होने के पश् चात ् उस सम्पवत्त का बेईमानी से अपने लिए ववननयोग कर िेता है, तो वह इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (ि) क, जो य का लमत्र है, य की अनुपक्स्थनत में य के पुस्तकािय में जाता है और य की अलभव्य‍ त सम्मवत्त के बबना एक पुस्तक िे जाता है । यहां यहद, क का यह ववचार था कक पढ़ने के प्रयोजन के लिए पुस्तक िेने की उसको य की वववक्षित सम्मनत प्राप् त है, तो क ने चोरी नहीं की है । ककन्त ु यहद क बाद में उस पुस्तक को अपने फायदे के लिए बेच देता है, तो वह इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (ग) क और ख एक घोडे के संयु‍ त स्वामी हैं । क उस घोडे को उपयोग में िाने के आशय से ख के कब्जे में स े उस े ि े जाता है । यहां, क को उस घोडे को उपयोग में िान े का अधधकार है, इसलिए वह उसका बेईमानी से दवुवनषनयोग नहीं है । ककन्त ु यहद क उस घोडे को बेच देता है, और सम्पूण ष आगम का अपने लिए ववननयोग कर िेता है तो वह इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । स्पष् टीकरण 1—केवि कुछ समय के लिए बेईमानी से दवुवनषनयोग करना इस धारा के अथ ष के अंतगषत दवुवनषनयोग है । दृष् टांत क को य का एक सरकारी वचनपत्र लमिता है, क्जस पर कोरा पष्ृ ठांकन है । क, यह जानत े हुए कक वह वचनपत्र य का है, उस े ऋण के लिए प्रनतभूनत के रूप में बकैं कार के पास इस आशय से धगरवी रि देता है कक वह भववष्य में उस े य को प्रत्यावनततष कर देगा । क ने इस धारा के अधीन अपराध ककया है । स्पष् टीकरण 2—क्जस व्यक्‍ त को ऐसी सम्पवत्त पडी लमि जाती है, जो ककसी अन्य व्यक्‍ त के कब्जे में नहीं है और वह उसके स्वामी के लिए उसको संरक्षित रिन े या उसके स्वामी को उस े प्रत्यावनततष करन े के प्रयोजन से ऐसी सम्पवत्त को िेता है, वह न तो बेईमानी से उस े िेता है और न बेईमानी से उसका दवुवनषनयोग करता है, और ककसी अपराध का दोर्ी नहीं है, ककन्तु वह ऊपर पररभावर्त अपराध का दोर्ी है, यहद वह उसके स्वामी को जानते हुए या िोज ननकािने के साधन रित े हुए या उसके स्वामी को िोज ननकािने और सूचनाअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 125 देने के युक्‍ तयु‍ त साधन उपयोग में िाने और उसके स्वामी को उसकी मांग करन े को समथ ष करन े के लिए उस सम्पवत्त की युक्‍ तयु‍ त समय तक रि े रिन े के पूव ष उसको अपने लिए ववननयोक्जत कर िेता है । ऐसी दशा में युक्‍ तयु‍ त साधन ‍या हैं, या युक्‍ तयु‍ त समय ‍या है, यह तथ्य का प्रश् न है । यह आवश्यक नहीं है कक पाने वािा यह जानता हो कक सम्पवत्त का स्वामी कौन है या यह कक कोई ववलशष् ट व्यक्‍ त उसका स्वामी है । यह पयाषप् त है कक उसको ववननयोक्जत करते समय उस े यह ववश् वास नहीं है कक वह उसकी अपनी सम्पवत्त है, या सद् भावपूवकष यह ववश् वास है कक उसका असिी स्वामी नहीं लमि सकता । दृष् टांत (क) क को राजमाग ष पर एक रुपया पडा लमिता है । यह न जानत े हुए कक वह रुपया ककसका है, क उस रुपए को उठा िेता है । यहां क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध नहीं ककया है । (ि) क को सडक पर एक धचट्ठी पडी लमिती है, क्जसमें एक बकैं नोट है । उस धचट्ठी में हदए हुए ननदेश और ववर्य-वस्तु स े उस े ज्ञात हो जाता है कक वह नोट ककसका है । वह उस नोट का ववननयोग कर िेता है । वह इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (ग) वाहक-देय एक चेक क को पडा लमिता है । वह उस व्यक्‍ त के संबंध में क्जसका चेक िोया है, कोई अनुमान नहीं िगा सकता, ककन्त ु उस चेक पर उस व्यक्‍ त का नाम लििा है, क्जसने वह चेक लििा है । क यह जानता है कक वह व्यक्‍ त क को उस व्यक्‍ त का पता बता सकता है क्जसके पि में वह चेक लििा गया था, क उसके स्वामी को िोजने का प्रयत् न ककए बबना उस चेक का ववननयोग कर िेता है । वह इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (घ) क देिता है कक य की थैिी, क्जसमें धन है, य से धगर गई है । क वह थैिी य को प्रत्यावनततष करने के आशय से उठा िेता है । ककन्त ु तत्पश् चात ् उस े अपने उपयोग के लिए ववननयोक्जत कर िेता है । क ने इस धारा के अधीन अपराध ककया है । (ङ) क को एक थैिी, क्जसमें धन है, पडी लमिती है । वह नहीं जानता है कक वह ककसकी है । उसके पश् चात ् उसे यह पता चि जाता है कक वह य की है, और वह उस े अपने उपयोग के लिए ववननयोक्जत कर िेता है । क इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । (च) क को एक मू्यवान अगं ूठी पडी लमिती है । वह नहीं जानता है कक वह ककसकी है । क उसके स्वामी को िोज ननकािने का प्रयत् न ककए बबना उस े तुरन्त बेच देता है । क इस धारा के अधीन अपराध का दोर्ी है । 315. जो कोई, ककसी सम्पवत्त को, यह जानत े हुए कक ऐसी सम्पवत्त ककसी व्यक्‍ त की ऐसी सम्पवत्त का बेईमानी से मत्ृ यु के समय उस मतृ व्यक्‍ त के कब्जे में थी, और तब से ककसी व्यक्‍ त के कब्जे में नहीं दवुवनषनयोग जो रही है, जो ऐसे कब्जे का वैध रूप से हकदार है, बेईमानी से दवुवनषनयोक्जत करता है या अपने मतृ व्यक्‍त की उपयोग में संपररवनततष कर िेता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी मत्ृ यु के समय अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने से भी दण्डनीय होगा, उसके कब्जे में थी । और यहद वह अपराधी, ऐसे व्यक्‍ त की मत्ृ यु के समय लिवपक या सेवक के रूप में उसके126 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— द्वारा ननयोक्जत था, तो कारावास सात वर् ष तक का हो सकेगा । दृष् टांत य के कब्जे में फनीचर और धन था । वह मर जाता है । उसका सेवक क, उस धन के ककसी ऐसे व्यक्‍ त के कब्जे में आन े से पूव,ष जो ऐसे कब्ज े का हकदार है, बेईमानी से उसका दवुवनषनयोग करता है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । आपराधिक न्यासभंि के विषय में आपराधधक 316. (1) जो कोई, सम्पवत्त या सम्पवत्त पर कोई भी आधधपत्य ककसी प्रकार स े अपने न्यासभंग । को न्यस्त ककए जाने पर उस सम्पवत्त का बेईमानी स े दवुवनषनयोग कर िेता है या उस े अपने उपयोग में संपररवनततष कर िेता है या क्जस प्रकार ऐसा न्यास ननवहष न ककया जाना है, उसको ववहहत करने वािी ववधध के ककसी ननदेश का, या ऐसे न्यास के ननवहष न के बारे में उसके द्वारा की गई ककसी अलभव्य‍ त या वववक्षित वैध संववदा का अनतक्रमण करके बेईमानी से उस सम्पवत्त का उपयोग या व्ययन करता है, या जानबूझकर ककसी अन्य व्यक्‍ त का ऐसा करना सहन करता है, वह आपराधधक न्यास भंग करता है । स्पष् टीकरण 1—जो व्यक्‍ त, ककसी स्थापन का ननयोजक होत े हुए, चाहे वह स्थापन कमचष ारी भववष्य-ननधध और प्रकीण ष उपबंध अधधननयम, 1952 की धारा 17 के अधीन छूट 1952 का 19 प्राप् त है या नहीं, तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा स्थावपत भववष्य-ननधध या कुटुंब पेंशन ननधध में जमा करने के लिए कमचष ारी-अलभदाय की कटौती कमचष ारी को संदेय मजदरू ी में से करता है उसके बारे में यह समझा जाएगा कक उसके द्वारा इस प्रकार कटौती ककए गए अलभदाय की रकम उस े न्यस्त कर दी गई है और यहद वह उ‍ त ननधध में ऐस े अलभदाय का संदाय करन े में, उ‍ त ववधध का अनतक्रमण करके व्यनतक्रम करेगा तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कक उसने यथापूवो‍ त ववधध के ककसी ननदेश का अनतक्रमण करके उ‍ त अलभदाय की रकम का बेईमानी स े उपयोग ककया है । स्पष् टीकरण 2—जो व्यक्‍ त, ननयोजक होत े हुए, कमचष ारी राज्य बीमा अधधननयम, 1948 के अधीन स्थावपत कमचष ारी राज्य बीमा ननगम द्वारा धाररत और शालसत कमचष ारी 1948 का 34 राज्य बीमा ननगम ननधध में जमा करन े के लिए कमचष ारी को संदेय मजदरू ी में से कमचष ारी- अलभदाय की कटौती करता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कक उस े अलभदाय की वह रकम न्यस्त कर दी गई है, क्जसकी उसने इस प्रकार कटौती की है और यहद वह उ‍ त ननधध में ऐस े अलभदाय के संदाय करन े में, उ‍ त अधधननयम का अनतक्रमण करके, व्यनतक्रम करता है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कक उसने यथापूवो‍ त ववधध के ककसी ननदेश का अनतक्रमण करके उ‍ त अलभदाय की रकम का बेईमानी से उपयोग ककया है । दृष् टांत (क) क एक मतृ व्यक्‍ त की वसीयत का ननष्पादक होत े हुए उस ववधध की, जो सामान को वसीयत के अनुसार ववभाक्जत करन े के लिए उसको ननदेश देती है, बेईमानी से अवज्ञा करता है, और उस सामान को अपने उपयोग के लिए ववननयोक्जत कर िेता है । क ने आपराधधक न्यासभंग ककया है । (ि) क भांडागाररक है । य यात्रा को जाते हुए अपना फनीचर क के पास उस संववदा के अधीन न्यस्त कर जाता है कक वह भांडागार के कमरे के लिए ठहराई गई रालश के दे हदए जाने पर िौटा हदया जाएगा । क उस माि को बेईमानी स े बेच देता है । क ने आपराधधकअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 127 न्यासभंग ककया है । (ग) क, जो किकत्ता में ननवास करता है, य का, जो हद्िी में ननवास करता है अलभकताष है । क और य के बीच यह अलभव्य‍ त या वववक्षित संववदा है कक य द्वारा क को प्रेवर्त सब रालशया ं क द्वारा य के ननदेश के अनुसार ववननहहत की जाएंगी । य, क को इन ननदेशों के साथ एक िाि रुपए भेजता है कक उसको कंपनी पत्रों में ववननहहत ककया जाए । क उन ननदेशों की बेईमानी स े अवज्ञा करता है और उस धन को अपने कारबार के उपयोग में िे आता है । क ने आपराधधक न्यासभंग ककया है । (घ) ककंतु यहद दृष् टांत (ग) में क बेईमानी से नहीं बक््क सद्भ ावपूवकष यह ववश् वास करत े हुए कक बकैं ऑफ बंगाि में अंश धारण करना य के लिए अधधक फायदाप्रद होगा, य के ननदेशों की अवज्ञा करता है, और कंपनी पत्र िरीदने के बजाय य के लिए बकैं ऑफ बंगाि के अंश िरीदता है, तो यद्यवप य को हानन हो जाए और उस हानन के कारण, वह क के ववरुद्ध लसववि कायवष ाही करन े का हकदार हो, तथावप, यत: क ने, बेईमानी से काय ष नहीं ककया है, उसने आपराधधक न्यासभंग नहीं ककया है । (ङ) एक राजस्व अधधकारी, क के पास िोक धन न्यस्त ककया गया है और वह उस सब धन को, जो उसके पास न्यस्त ककया गया है, एक ननक्श् चत िजान े में जमा कर देने के लिए या तो ववधध द्वारा ननदेलशत है या सरकार के साथ अलभव्य‍ त या वववक्षित संववदा द्वारा आबद्ध है । क उस धन को बेईमानी से ववननयोक्जत कर िेता है । क ने आपराधधक न्यासभंग ककया है । (च) भूलम से या जि से िे जाने के लिए य ने क के पास, जो एक वाहक है, संपवत्त न्यस्त की है । क उस संपवत्त का बेईमानी से दवुवनषनयोग कर िेता है । क ने आपराधधक न्यासभंग ककया है । (2) जो कोई, आपराधधक न्यासभंग करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमानष े से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (3) जो कोई, वाहक, घाटवाि, या भांडागाररक के रूप में अपने पास संपवत्त न्यस्त ककए जाने पर ऐसी संपवत्त के ववर्य में आपराधधक न्यासभंग करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जो कोई, लिवपक या सेवक होत े हुए, या लिवपक या सेवक के रूप में ननयोक्जत होत े हुए, और इस नात े ककसी प्रकार संपवत्त, या संपवत्त पर कोई भी आधधपत्य अपने में न्यस्त होत े हुए, उस संपवत्त के ववर्य में आपराधधक न्यासभंग करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (5) जो कोई, िोक सेवक के नात े या बकैं र, व्यापारी, फै‍टर, दिाि, अटनी या अलभकताष के रूप में अपने कारबार के अनुक्रम में ककसी प्रकार संपवत्त या संपवत्त पर कोई भी आधधपत्य अपने को न्यस्त होत े हुए उस संपवत्त के ववर्य में आपराधधक न्यासभंग करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ।128 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— चुराई िुई संपवि प्राप् त करि े के विषय में चुराई हुई 317. (1) वह संपवत्त, क्जसका कब्जा चोरी द्वारा, या उद्दापन द्वारा या िूट द्वारा या संपवत्त । छि द्वारा अंतररत ककया गया है, और वह संपवत्त, क्जसका आपराधधक दवुवनषनयोग ककया गया है, या क्जसके ववर्य में आपराधधक न्यासभंग ककया गया है, चुराई हुई “संपवत्त” कहिाती है, चाहे वह अंतरण या वह दवुवनषनयोग या न्यासभंग भारत के भीतर ककया गया हो या बाहर, ककंतु यहद ऐसी संपवत्त तत्पश् चात ् ऐसे व्यक्‍ त के कब्जे में पहुंच जाती है, जो उसके कब्जे के लिए वैध रूप से हकदार है, तो वह चुराई हुई संपवत्त नहीं रह जाती । (2) जो कोई, ककसी चुराई हुई संपवत्त को, यह जानत े हुए या ववश् वास करन े का कारण रित े हुए कक वह चुराई हुई संपवत्त है, बेईमानी से प्राप् त करता है या रिता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमानष े से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (3) जो कोई, ऐसी चुराई गई संपवत्त को बेईमानी स े प्राप् त करता है या रि े रिता है, क्जसके कब्जे के ववर्य में वह यह जानता है या ववश् वास करन े का कारण रिता है कक वह डकैती द्वारा अंतररत की गई है, या ककसी ऐसे व्यक्‍ त से, क्जसके संबंध में वह यह जानता है या ववश् वास करन े का कारण रिता है कक वह डाकुओं की टोिी का है या रहा है, ऐसी संपवत्त, क्जसके ववर्य में वह यह जानता है या ववश् वास करन े का कारण रिता है कक वह चुराई हुई है, बेईमानी से प्राप् त करता है, वह आजीवन कारावास से, या कहठन कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जो कोई, ऐसी सपं वत्त, क्जसके संबंध में वह यह जानता है, या ववश् वास करन े का कारण रिता है कक वह चुराई हुई संपवत्त है, अभ्यासत: प्राप्त करता है, या अभ्यासत: उसमें व्यवहार करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (5) जो कोई, ऐसी संपवत्त को नछपाने में, या व्ययननत करने में, या इधर-उधर करन े में स्वेच्छया सहायता करता है, क्जसके ववर्य में वह यह जानता है या ववश् वास करन े का कारण रिता है कक वह चुराई हुई संपवत्त है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । छि के विषय में छि । 318. (1) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त से प्रवंचना कर उस व्यक्‍ त को, क्जसे इस प्रकार प्रवंधचत ककया गया है, कपटपूवकष या बेईमानी से उत् प्रेररत करता है कक वह कोई संपवत्त ककसी व्यक्‍ त को पररदत्त कर दे, या यह सम्मनत दे दे कक कोई व्यक्‍ त ककसी संपवत्त को रि रिे या साशय उस व्यक्‍ त को, क्जसे इस प्रकार प्रवंधचत ककया गया है, उत् प्रेररत करता है कक वह ऐसा कोई काय ष करे, या करन े का िोप करे, क्जसे वह यहद उस े प्रत्येक प्रकार प्रवंधचत न ककया गया होता तो, न करता, या करन े का िोप न करता, और क्जस काय ष या िोप स े उस व्यक्‍ त को शारीररक, मानलसक, ख्यानत संबंधी या साम्पवत्तक नुकसान या अपहानन काररत होती है, या काररत होनी सम्भाव्य है, वह छि करता है, यह कहा जाता है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 129 स्पष् टीकरण—तथ्यों का बेईमानी से नछपाना इस धारा के अथ ष के अंतगतष प्रवंचना है । दृष् टांत (क) क लसववि सेवा में होने का लमथ्या अपदेश करके साशय य से प्रवंचना करता है, और इस प्रकार बेईमानी स े य को उत् प्रेररत करता है कक वह उस े उधार पर माि ि े िेने दे, क्जसका मू्य चुकाने का उसका इरादा नहीं है । क छि करता है । (ि) क एक वस्तु पर कूटकृत धचह्न बनाकर य से साशय प्रवंचना करके उस े यह ववश् वास कराता है कक वह वस्तु ककसी प्रलसद्ध ववननमाषता द्वारा बनाई गई है, और इस प्रकार उस वस्तु का क्रय करन े और उसका मू्य चुकाने के लिए य को बेईमानी से उत् प्रेररत करता है । क छि करता है । (ग) क, य को ककसी वस्तु का, नकिी सैम्पि हदििाकर य से साशय प्रवंचना करके उस े यह ववश् वास कराता है कक वह वस्तु उस सैम्पि के अनुरूप है, और उसके द्वारा उस वस्तु को िरीदने और उसका मू्य चुकान े के लिए य को बईे मानी से उत् प्रेररत करता है । क छि करता है । (घ) क ककसी वस्त ु का मू्य देने में ऐसी कोठी पर हुंडी करके, जहां क का कोई धन जमा नहीं है, और क्जसके द्वारा क को हुंडी का अनादर ककए जाने की प्रत्याशा है, आशय से य की प्रवंचना करता है, और उसके द्वारा बेईमानी स े य को उत् प्रेररत करता है कक वह वस्तु पररदत्त कर दे क्जसका मू्य चुकान े का उसका आशय नहीं है । क छि करता है । (ङ) क ऐसे नगों को, क्जनको वह जानता है कक वे हीरे नहीं हैं, हीरों के रूप में धगरवी रिकर य से साशय प्रवंचना करता है, और उसके द्वारा धन उधार देने के लिए य को बेईमानी से उत् प्रेररत करता है । क छि करता है । (च) क साशय प्रवंचना करके य को यह ववश् वास कराता है कक क को जो धन य उधार देगा उस े वह चुका देगा, और उसके द्वारा बेईमानी से य को उत् प्रेररत करता है कक वह उस े धन उधार दे दे, जबकक क का आशय उस धन को चुकाने का नहीं है । क छि करता है । (छ) क, य स े साशय प्रवंचना करके यह ववश् वास हदिाता है कक क का इरादा य को नीि के पौधों का एक ननक्श् चत पररमाण पररदत्त करने का है, क्जसको पररदत्त करने का उसका आशय नहीं है, और उसके द्वारा ऐसे पररदान के ववश् वास पर अधिम धन देने के लिए य को बेईमानी से उत् प्रेररत करता है । क छि करता है । यहद क धन अलभप्राप् त करत े समय नीि पररदत्त करन े का आशय रिता हो, और उसके पश् चात ् अपनी संववदा भंग कर दे और वह उस े पररदत्त न करे, तो वह छि नहीं करता है, ककंतु संववदा भंग करन े के लिए केवि लसववि कायवष ाही के दानयत्व के अधीन है । (ज) क साशय प्रवंचना करके य को यह ववश् वास हदिाता है कक क न े य के साथ की गई संववदा के अपने भाग का पािन कर हदया है, जबकक उसका पािन उसन े नहीं ककया है, और उसके द्वारा य को बेईमानी से उत् प्रेररत करता है कक वह धन दे । क छि करता है । (झ) क, ख को एक संपदा बचे ता है और हस्तांतररत करता है । क यह जानत े हुए कक ऐसे ववक्रय के पररणामस्वरूप उस संपवत्त पर उसका कोई अधधकार नहीं है, ख को ककए गए पूव ष ववक्रय और हस्तांतरण के तथ्य को प्रकट न करत े हुए उस े य के हाथ बेच देता है या130 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— बंधक रि देता है, और य से ववक्रय या बंधक धन प्राप् त कर िेता है । क छि करता है । (2) जो कोई, छि करता है, दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (3) जो कोई, इस ज्ञान के साथ छि करता है कक यह सम्भाव्य है कक वह उसके द्वारा उस व्यक्‍ त को सदोर् हानन पहुंचाए, क्जसका हहत उस संव्यवहार में क्जससे वह छि संबंधधत है, संरक्षित रिन े के लिए वह या तो ववधध द्वारा, या वैध संववदा द्वारा, आबद्ध था, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (4) जो कोई, छि करता है और उसके द्वारा उस व्यक्‍ त को, क्जसे प्रवंधचत ककया गया है, बेईमानी स े उत् प्रेररत करता है कक वह कोई संपवत्त ककसी व्यक्‍ त को पररदत्त कर दे, या ककसी भी मू्यवान प्रनतभूनत को, या ककसी चीज को, जो हस्तािररत या मुरांककत है, और जो मू्यवान प्रनतभूनत में संपररवनततष ककए जाने योग्य है, पूणषत: या अंशत: रच दे, पररवनततष कर दे, या नष् ट कर दे, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास स,े क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । प्रनतरूपण द्वारा 319. (1) कोई व्यक्‍ त प्रनतरूपण द्वारा छि करता है, यह तब कहा जाता है, जब छि । वह यह अपदेश करके कक वह कोई अन्य व्यक्‍ त है, या एक व्यक्‍ त को ककसी अन्य व्यक्‍ त के रूप में जानते हुए प्रनतस्थावपत करके, या यह ननरूवपत करके कक वह या कोई अन्य व्यक्‍ त, कोई ऐसा व्यक्‍ त है, जो वस्तुत: उससे या अन्य व्यक्‍ त से लभन् न है, छि करता है । स्पष् टीकरण—यह अपराध हो जाता है, चाहे वह व्यक्‍ त, क्जसका प्रनतरूपण ककया गया है, वास्तववक व्यक्‍ त हो या का्पननक । दृष् टांत (क) क उसी नाम का अमुक धनवान बकैं र है इस अपदेश द्वारा छि करता है । क प्रनतरूपण द्वारा छि करता है । (ि) ख, क्जसकी मत्ृ यु हो चुकी है, होने का अपदेश करन े द्वारा क छि करता है । क प्रनतरूपण द्वारा छि करता है । (2) जो कोई, प्रनतरूपण द्वारा छि करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । कपटपूण भ वििेखों और संपवि व्ययिों के विषय में िेनदारों में 320. जो कोई, ककसी संपवत्त का अपने िेनदारों या ककसी अन्य व्यक्‍ त के िेनदारों के ववतरण ननवाररत बीच ववधध के अनुसार ववतररत ककया जाना उसके द्वारा ननवाररत करन े के आशय से, या करने के लिए उसके द्वारा सम्भाव्यत: ननवाररत करता है यह जानत े हुए उस संपवत्त को बेईमानी स े या संपवत्त का बेईमानी स े या कपटपूवकष अपसाररत करता है या नछपाता है या ककसी व्यक्‍ त को पररदत्त करता है या कपटपूवकष पयाषप् त प्रनतफि के बबना ककसी व्यक्‍ त को अंतररत करता है या करवाता है, वह दोनों में स े अपसारण या ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास से कम नहीं होगी ककन्तु जो दो वर् ष नछपाना ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 131 तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । 321. जो कोई, ककसी ऋण का या मांग का, जो स्वय ं उसको या ककसी अन्य व्यक्‍ त ऋण को िेनदारों के लिए को देय हो, अपने या ऐसे अन्य व्यक्‍ त के ऋणों को चुकाने के लिए ववधध के अनुसार उपिब्ध होने स े उपिभ्य होना कपटपूवकष या बेईमानी से ननवाररत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के बेईमानी स े या कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत कपटपूवकष ककया जाएगा । ननवाररत करना। 322. जो कोई, बेईमानी स े या कपटपूवकष ककसी ऐस े वविेि या लिित को हस्तािररत अन्तरण के ऐस े वविेि का, करता है, ननष्पाहदत करता है, या उसका पिकार बनता है, क्जसस े ककसी सम्पवत्त का, या उसम ें क्जसमें प्रनतफि के ककसी हहत का, अंतररत ककया जाना, या ककसी भार के अधीन ककया जाना, तात्पनयतष है, और के संबंध में क्जसमें ऐस े अंतरण या भार के प्रनतफि स े संबंधधत, या उस व्यक्‍ त या उन व्यक्‍ तयों स े लमथ्या कथन संबंधधत, क्जसके या क्जनके उपयोग या फायदे के लिए उसका प्रवनततष होना वास्तव में आशनयत अन्तववष्ष ट है, बेईमानी से या है, कोई लमथ्या कथन अन्तववष्ष ट है, वह दोनों में स े ककसी भानंत के कारावास से, क्जसकी अवधध कपटपूवकष तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने स,े या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । ननष्पादन । 323. जो कोई, बेईमानी स े या कपटपूवकष अपनी या ककसी अन्य व्यक्‍ त की ककसी सम्पवत्त का बेईमानी स े या सम्पवत्त को नछपाता है या अपसाररत करता है, या उसके नछपाए जाने में या अपसाररत ककए कपटपूवकष जाने में बेईमानी स े या कपटपूवकष सहायता करता है, या बेईमानी से ककसी ऐसी मांग या अपसारण या दावे को, क्जसका वह हकदार है, छोड देता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, नछपाया जाना । क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । ररष्ष् ट के विषय में 324. (1) जो कोई, इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानत े हुए कक, वह िोक को या ररक्ष् ट । ककसी व्यक्‍ त को सदोर् हानन या नुकसान काररत करे, ककसी सम्पवत्त का नाश या ककसी सम्पवत्त में या उसकी क्स्थनत में ऐसी तब्दीिी काररत करता है, क्जससे उसका मू्य या उपयोधगता नष् ट या कम हो जाती है, या उस पर िनतकारक प्रभाव पडता है, वह ररक्ष् ट करता है । स्पष् टीकरण 1—ररक्ष् ट के अपराध के लिए यह आवश्यक नहीं है कक अपराधी िनतिस्त या नष् ट सम्पवत्त के स्वामी को हानन या नुकसान काररत करन े का आशय रिे । यह पयाषप् त है कक उसका यह आशय है या वह यह सम्भाव्य जानता है कक वह ककसी सम्पवत्त को िनत करके ककसी व्यक्‍ त को, चाहे वह सम्पवत्त उस व्यक्‍ त की हो या नहीं, सदोर् हानन या नुकसान काररत करे । स्पष् टीकरण 2—ऐसी सम्पवत्त पर प्रभाव डािने वािे काय ष द्वारा, जो उस काय ष को करन े वािे व्यक्‍ त की हो, या संयु‍ त रूप से उस व्यक्‍ त की और अन्य व्यक्‍ तयों की हो, ररक्ष् ट की जा सकेगी । दृष् टांत (क) य की सदोर् हानन काररत करन े के आशय से य की मू्यवान प्रनतभूनत को क स्वेच्छया जिा देता है। क ने ररक्ष् ट की है । (ि) य की सदोर् हानन करने के आशय से, उसके बफष-घर में क पानी छोड देता है,132 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— और इस प्रकार बफष को गिा देता है । क ने ररक्ष् ट की है । (ग) क इस आशय स े य की अंगूठी नदी में स्वेच्छया फैंक देता है कक य को उसके द्वारा सदोर् हानन काररत हो । क ने ररक्ष् ट की है । (घ) क यह जानत े हुए कक उसका सामान उस ऋण की तुक्ष् ट के लिए जो य को उसके द्वारा देय है, ननष्पादन में िी जाने वािी है, उस सामान को इस आशय से नष् ट कर देता है कक ऐसा करके ऋण की तुक्ष् ट अलभप्राप् त करने में य को ननवाररत कर दे और इस प्रकार य को नुकसान काररत करे । क ने ररक्ष् ट की है । (ङ) क एक पोत का बीमा कराने के पश् चात ् उस े इस आशय से कक बीमा करन े वािों को नुकसान काररत करे, उसको स्वेच्छया संत्य‍ त करा देता है । क ने ररक्ष् ट की है । (च) य को, क्जसने बाटमरी पर धन उधार हदया है, नुकसान काररत करने के आशय से क उस पोत को संत्य‍ त करा देता है । क ने ररक्ष् ट की है । (छ) य के साथ एक घोडे में संयु‍ त संपवत्त रित े हुए य को सदोर् हानन काररत करन े के आशय से क उस घोडे को गोिी मार देता है । क ने ररक्ष् ट की है । (ज) क इस आशय से और यह सम्भाव्य जानत े हुए कक वह य की फसि को नुकसान काररत करे, य के िेत में पशुओं का प्रवेश काररत कर देता है, क ने ररक्ष् ट की है । (2) जो कोई ररक्ष् ट करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (3) जो कोई, ररक्ष् ट करता है और उसके द्वारा सरकारी या स्थानीय प्राधधकरण की संपवत्त सहहत ककसी संपवत्त की हानन या िनत काररत करता है वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (4) जो कोई, ररक्ष् ट करता है और उसके द्वारा बीस हजार रुपए स े अधधक ककन्तु एक िाि रुपए के अनधधक रकम, की हानन या नुकसान काररत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (5) जो कोई, ररक्ष् ट करता है और उसके द्वारा एक िाि रुपए या उससे अधधक रकम की हानन या नुकसान काररत करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (6) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को मत्ृ यु या उसे उपहनत या उसका सदोर् अवरोध काररत करन े की या मत्ृ यु का, या उपहनत का, या सदोर् अवरोध का भय काररत करने की, तयै ारी करके ररक्ष् ट करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । जीव-जन्तु का 325. जो कोई, ककसी जीव-जन्त ु का वध करने, ववर् देने, ववकिांग करन े या वध करन े या ननरुपयोगी बनाने द्वारा ररक्ष् ट करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी उसे ववकिांग अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । करने द्वारा ररक्ष् ट ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 133 326. जो कोई, ककसी ऐस े काय ष के करने द्वारा ररक्ष् ट करता है,— िनत, जिप्िावन, अक्ग् न या (क) क्जससे कृवर्क प्रयोजनों के लिए, या मानव प्राखणयों के या उन जीव-जन्तुओं ववस्फोटक के, जो सम्पवत्त है, िान े या पीने के, या सफाई के या ककसी ववननमाषण को चिाने के पदाथ ष द्वारा जिप्रदाय में कमी काररत होती हो या कमी काररत होना वह सम्भाव्य जानता हो वह ररक्ष् ट । दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ि) क्जससे ककसी िोक सडक, पुि, नाव्य, नदी या प्राकृनतक या कृबत्रम नाव्य जिसरणी को यात्रा या सम्पवत्त प्रवहण के लिए अगम्य या कम ननरापद बना हदया जाए या बना हदया जाना वह सम्भाव्य जानता हो, वह दोनों में से, ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ग) क्जसस े ककसी िोक जिननकास में िनतप्रद या नुकसानप्रद जिप्िावन या बाधा काररत हो जाए, या होना वह सम्भाव्य जानता हो, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (घ) क्जससे रेि, वायुयान या पोत या अन्य चीज के, जो नौ-चािकों के लिए माग ष प्रदशनष के लिए रिी गई हो, नष्ट करने या हटाने या कोई ऐसा काय ष करन े द्वारा, क्जसस े कोई ऐसा धचन्ह या लसग्नि जो नौ-चािकों के लिए माग ष प्रदशकष के रूप में कम उपयोगी बन जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (ङ) क्जससे ककसी िोक सेवक के प्राधधकार द्वारा िगाए गए ककसी भूलम धचह्न के नष् ट करन े या हटाने द्वारा या कोई ऐसा काय ष करन े द्वारा, क्जसस े ऐसा भूलम धचह्न ऐसे भूलम धचह्न के रूप में कम उपयोगी बन जाए, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा ; (च) क्जससे कृवर् उपज सहहत ककसी सम्पवत्त का नुकसान काररत करन े के आशय से, या यह सम्भाव्य जानत े हुए कक वह उसके द्वारा ऐसा नुकसान अक्ग् न या ककसी ववस्फोटक पदाथ ष द्वारा काररत हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा ; (छ) क्जससे ककसी ऐस े ननमाषण का, जो साधारण तौर पर उपासना स्थान के रूप में या मानव-आवास के रूप में या संपवत्त की अलभरिा के स्थान के रूप में उपयोग में आता हो, नाश काररत करन े के आशय से, या यह सम्भाव्य जानत े हुए कक वह उसके द्वारा उसका नाश अक्ग् न या ककसी ववस्फोटक पदाथ ष द्वारा काररत हो, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा ।134 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— रेि, वायुयान, 327. (1) जो कोई, ककसी रेि, वायुयान, त्िायु‍ त जियान या बीस टन या उसस े त्िायु‍ त या अधधक बोझ वािे जियान को नष् ट करन े या असुरक्षित बना देने के आशय से, या यह बीस टन बोझ संभाव्य जानत े हुए कक वह उसके द्वारा उसे नष् ट करेगा, या असुरक्षित बना देता है, उस वािे जियान को नष् ट करन े या रेि, वायुयान, या जियान की ररक्ष् ट करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, असुरक्षित बनान े क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी के आशय स े होगा । ररक्ष् ट । (2) जो कोई, अक्ग् न या ककसी ववस्फोटक पदाथ ष द्वारा ऐसी ररक्ष् ट करता है, या करन े का प्रयत् न करता है, जैसी उपधारा (1) में वखणतष है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । चोरी, आहद 328. जो कोई, ककसी जियान को यह आशय रित े हुए कक वह उसमें अंतववष्ष ट ककसी करने के आशय संपवत्त की चोरी करे या बेईमानी से ऐसी ककसी संपवत्त का दवुवनषनयोग करे, या इस आशय से स े जियान को कक ऐसी चोरी या संपवत्त का दवुवनषनयोग ककया जाए, साशय भूलम पर चढ़ा देता है या ककनारे साशय भूलम या ककनारे पर चढ़ा से िगा देता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर्ष तक देने के लिए की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । दंड । आपराधिक अनतचार के विषय में आपराधधक 329. (1) जो कोई, ऐसी संपवत्त में या ऐसी संपवत्त पर, जो ककसी दसू रे के कब्जे में है, अनतचार और इस आशय से प्रवशे करता है कक वह कोई अपराध करे या ककसी व्यक्‍ त को, क्जसके कब्जे गहृ -अनतचार । में ऐसी संपवत्त है अलभत्रस्त, अपमाननत या िुब्ध करे, या ऐसी संपवत्त में या ऐसी संपवत्त पर ववधधपूवकष प्रवेश करके वहा ं ववधधववरुद्ध रूप में इस आशय से बना रहता है कक उसके द्वारा वह ककसी ऐसे व्यक्‍ त को अलभत्रस्त, अपमाननत या िुब्ध करे या इस आशय से बना रहता है कक वह कोई अपराध करे, वह “आपराधधक अनतचार” करता है, यह कहा जाता है । (2) जो कोई, ककसी ननमाषण, तम्बू या जियान में, जो मानव-आवास के रूप में उपयोग में आता है, या ककसी ननमाषण में, जो उपासना-स्थान के रूप में, या ककसी संपवत्त की अलभरिा के स्थान के रूप में उपयोग में आता है, प्रवेश करके या उसमें बना रह कर, आपराधधक अनतचार करता है, वह “गहृ -अनतचार” करता है, यह कहा जाता है । स्पष् टीकरण—आपराधधक अनतचार करन े वािे व्यक्‍ त के शरीर के ककसी भाग का प्रवेश गहृ -अनतचार गहठत करन े के लिए पयाषप् त प्रवेश है । (3) जो कोई, आपराधधक अनतचार करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । (4) जो कोई, गहृ -अनतचार करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । गहृ -अनतचार और 330. (1) जो कोई, यह पूवाषवधानी बरतने के पश् चात ् गहृ -अनतचार करता है कक ऐसे गहृ -भेदन । गहृ -अनतचार को ककसी ऐसे व्यक्‍ त से नछपाया जाए क्जसे उस ननमाषण, तम्बू या जियान में से, जो अनतचार का ववर्य है, अनतचारी को अपवक्जतष करने या बाहर कर देने का अधधकारअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 135 है, वह “प्रच्छन्न गहृ -अनतचार” करता है, यह कहा जाता है । (2) जो व्यक्‍ त गहृ -अनतचार करता है, वह “गहृ -भेदन” करता है, यह कहा जाता है, यहद वह उस घर में या उसके ककसी भाग में इसमें इसके पश्चात ् वखणतष छह तरीकों में स े ककसी तरीके से प्रवेश करता है या यहद वह उस घर में या उसके ककसी भाग में अपराध करन े के प्रयोजन से होत े हुए, या वहां अपराध कर चुकने पर, उस घर से या उसके ककसी भाग से ऐस े ननम्नलिखित तरीकों में से ककसी तरीके से बाहर ननकिता है, अथाषत ् :— (क) यहद वह ऐस े रास्त े स े प्रवेश करता है या बाहर ननकिता है, जो स्वयं उसन े या उस गहृ -अनतचार के ककसी दष्ु प्रेरक ने वह गहृ -अनतचार करन े के लिए बनाया है ; (ि) यहद वह ककसी ऐस े रास्त े से, जो उससे या उस अपराध के दष्ु प्रेरक स े लभन्न ककसी व्यक्‍ त द्वारा मानव प्रवेश के लिए आशनयत नहीं है, या ककसी ऐसे रास्त े से, क्जस तक कक वह ककसी दीवार या ननमाषण पर सीढ़ी द्वारा या अन्यथा चढ़कर पहुंचा है, प्रवेश करता है या बाहर ननकिता है ; (ग) यहद वह ककसी ऐसे रास्त े से प्रवेश करता है या बाहर ननकिता है क्जसको उसने या उस गहृ -अनतचार के ककसी दष्ु प्रेरक ने वह गहृ -अनतचार करने के लिए ककसी ऐसे साधन द्वारा िोिा है, क्जसके द्वारा उस रास्त े का िोिा जाना उस घर के अधधभोगी द्वारा आशनयत नहीं था ; (घ) यहद उस गहृ -अनतचार को करने के लिए, या गहृ -अनतचार के पश् चात ् उस घर से ननकि जाने के लिए वह ककसी तािे को िोिकर प्रवेश करता या बाहर ननकिता है ; (ङ) यहद वह आपराधधक बि के प्रयोग या हमिे या ककसी व्यक्‍ त पर हमिा करन े की धमकी द्वारा अपना प्रवेश करता है या प्रस्थान करता है ; (च) यहद वह ककसी ऐसे रास्त े से प्रवेश करता है या बाहर ननकिता है क्जसके हुआ बारे में वह जानता है कक वह ऐसे प्रवशे या प्रस्थान को रोकन े के लिए बंद ककया है और अपने द्वारा या उस गहृ -अनतचार के दष्ु प्रेरक द्वारा िोिा गया है । स्पष् टीकरण—कोई उपघर या ननमाषण जो ककसी घर के साथ-साथ अधधभोग में है, और क्जसके और ऐसे घर के बीच आन े जाने का अव्यवहहत भीतरी रास्ता है, इस धारा के अथ ष के अंतगतष उस घर का भाग है । दृष् टांत (क) य के घर की दीवार में छेद करके और उस छेद में स े अपना हाथ डािकर क गहृ - अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । (ि) क त्िों के बीच की बारी में से रेंग कर एक पोत में प्रवेश करने द्वारा गहृ - अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । (ग) य के घर में एक खिडकी स े प्रवेश करन े द्वारा क गहृ -अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । (घ) एक बंद द्वार को िोिकर य के घर में उस द्वार से प्रवेश करने द्वारा क गहृ - अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है ।136 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ङ) य के घर में द्वार के छेद में से तार डािकर लसटकनी को ऊपर उठाकर उस द्वार में प्रवेश करन े द्वारा क गहृ -अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । (च) क को य के घर के द्वार की चाबी लमि जाती है, जो य से िो गई थी, और वह उस चाबी से द्वार िोि कर य के घर में प्रवेश करने द्वारा गहृ -अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । (छ) य अपनी ड योढ़ी में िडा है । य को ध‍ के स े धगराकर क उस घर में बिात ् प्रवेश करन े द्वारा गहृ -अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । (ज) य, जो म का दरबान है, म की ड योढ़ी में िडा है । य को मारन े की धमकी देकर क उसको ववरोध करन े से भयोपरत ् करके उस घर में प्रवेश करन े द्वारा गहृ -अनतचार करता है । यह गहृ -भेदन है । गहृ -अनतचार या 331. (1) जो कोई, प्रच्छन्न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन करता है, वह दोनों में से ककसी गहृ -भेदन के भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और लिए दंड । जुमाषने का भी दायी होगा । (2) जो कोई, सूयाषस्त के पश् चात ् और सूयोदय स े पूव ष गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (3) जो कोई, कारावास से दंडनीय अपराध करन े के लिए प्रच्छन् न गहृ -अनतचार का गहृ -भेदन करेगा, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने से भी दंडनीय होगा, तथा यहद वह अपराध, क्जसका ककया जाना आशनयत हो, चोरी हो, तो कारावास की अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी । (4) जो कोई, कारावास स े दंडनीय कोई अपराध करने के लिए सूयाषस्त के पश् चात ् और सूयोदय से पूव ष प्रच्छन्न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध पांच वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा, तथा यहद वह अपराध क्जसका ककया जाना आशनयत हो, चोरी हो, तो कारावास की अवधध चौदह वर् ष तक की हो सकेगी । (5) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को उपहनत काररत करने की या ककसी व्यक्‍ त पर हमिा करन े की या ककसी व्यक्‍ त का सदोर् अवरोध करन े की या ककसी व्यक्‍ त को उपहनत के, या हमिे के, या सदोर् अवरोध के भय में डािने की तैयारी करके, प्रच्छन्न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (6) जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को उपहनत काररत करने की या ककसी व्यक्‍ त पर हमिा करन े की या ककसी व्यक्‍ त का सदोर् अवरोध या सूयाषस्त के पश् चात ् और सूयोदय से पूव ष गहृ -भेदन करने की या ककसी व्यक्‍ त को उपहनत के, या हमिे के, या सदोर् अवरोध के, भय में डािने की तैयारी करके, प्रच्छन् न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन करता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध चौदह वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 137 (7) जो कोई, प्रच्छन्न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन करत े समय ककसी व्यक्‍ त को घोर उपहनत काररत करता है या ककसी व्यक्‍ त की मत्ृ यु या घोर उपहनत काररत करने का प्रयत् न करेगा, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । (8) यहद प्रच्छन्न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन सूयाषस्त के पश् चात ् और सूयोदय से पूवष करत े समय ऐसे अपराध का दोर्ी कोई व्यक्‍ त स्वेच्छया ककसी व्यक्‍ त की मत्ृ य ु या घोर उपहनत काररत करता है या मत्ृ यु या घोर उपहनत काररत करन े का प्रयत् न करता है, तो ऐस े प्रच्छन् न गहृ -अनतचार या गहृ -भेदन सूयाषस्त के पश् चात ् और सूयोदय से पूव ष करन े में संयु‍ तत: संबंधधत प्रत्येक व्यक्‍ त, आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । 332. जो कोई, ऐसा अपराध करन े के लिए गहृ -अनतचार करता है — अपराध काररत करन े के लिए (क) जो मत्ृ यु से दंडनीय है, वह आजीवन कारावास से, या कहठन कारावास से, गहृ -अनतचार । क्जसकी अवधध दस वर् ष स े अधधक नहीं होगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा ; (ि) जो आजीवन कारावास से दंडनीय है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष से अधधक नहीं होगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ; (ग) जो कारावास से दंडनीय है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा : परन्तु यहद वह अपराध, क्जसका ककया जाना आशनयत हो, चोरी हो, तो कारावास की अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी । 333. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को उपहनत काररत करन े की, या ककसी व्यक्‍ त पर उपहनत, हमिा या सदोर् हमिा करन े की, या ककसी व्यक्‍ त का सदोर् अवरोध करन े की या ककसी व्यक्‍ त को उपहनत अवरोध की के, या हमिे के, या सदोर् अवरोध के भय में डािने की तैयारी करके गहृ -अनतचार करता है, तैयारी के वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, पश् चात ् गहृ - दंडडत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । अनतचार । 334. (1) जो कोई, ककसी ऐसे बंद पात्र को, क्जसमें संपवत्त हो या क्जसमें संपवत्त होने ऐस े पात्र को, क्जसमें संपवत्त का उस े ववश् वास हो, बेईमानी से या ररक्ष् ट करने के आशय से तोडकर िोिता है या अबंधधत है, बेईमानी से करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो तोडकर सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । िोिना । (2) जो कोई, ऐसा बंद पात्र, क्जसमें संपवत्त हो, या क्जसमें संपवत्त होने का उस े ववश् वास हो, अपने पास न्यस्त ककए जाने पर उसको िोिने का प्राधधकार न रित े हुए, बेईमानी से या ररक्ष् ट करन े के आशय से, उस पात्र को तोडकर िोिता है या अबंधधत करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े138 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— से, या दोनों से, दंडडत ककया जाएगा । अध्याय 18 िस्तािेजों और संपवि धचह्िों संबंिी अपरािों के विषय में लमथ्या दस्तावेज 335. उस व्यक्‍ त के बारे में यह कहा जाता है कक वह व्यक्‍ त लमथ्या दस्तावेज या रचना । लमथ्या इिै‍राननक अलभिेि रचता है,— (अ) जो बेईमानी से या कपटपूवकष इस आशय से— (i) ककसी दस्तावेज को या दस्तावेज के भाग को रधचत, हस्तािररत, मुरांककत या ननष्पाहदत करता है ; (ii) ककसी इिै‍राननक अलभिेि को या ककसी इिै‍राननक अलभिेि के भाग को रधचत या पारेवर्त करता है ; (iii) ककसी इिै‍राननक अलभिेि पर कोई इिै‍ राननक हस्तािर करता है ; (iv) ककसी दस्तावेज के ननष्पादन का या ऐसे व्यक्‍ त या इिै‍ राननक हस्तािर की अधधप्रमाखणकता का द्योतन करन े वािा कोई धचह्न िगाता है, कक यह ववश् वास ककया जाए कक ऐसा दस्तावेज या दस्तावेज के भाग, इिै‍राननक अलभिेि या इिै‍ राननक हस्तािर की रचना, हस्तािरण, मुरांकन, ननष्पादन, पारेर्ण या िगाना ऐसे व्यक्‍ त द्वारा या ऐसे व्यक्‍ त के प्राधधकार द्वारा ककया गया था, क्जसके द्वारा या क्जसके प्राधधकार द्वारा उसकी रचना, हस्तािरण, मुरांकन या ननष्पादन, िगाए जाने या पारेवर्त न होने की बात वह जानता है ; या (आ) जो ककसी दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि के ककसी ताक्ववक भाग में पररवतनष , उसके द्वारा या ऐसे ककसी अन्य व्यक्‍ त द्वारा, चाहे ऐसा व्यक्‍ त, ऐसे पररवतनष के समय जीववत हो या नहीं, उस दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि के रधचत या ननष्पाहदत ककए जाने या इिै‍ राननक हस्तािर ककए जाने के पश् चात,् उस े रद्द करके या अन्यथा, ववधधपूवकष प्राधधकार के बबना, बेईमानी से या कपटपूवकष करता है ; या (इ) जो ककसी व्यक्‍ त द्वारा, यह जानत े हुए कक ऐसा व्यक्‍त ककसी दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि की ववर्य-वस्त ु को या पररवतनष के रूप को, धचत्त-ववकृनत या मत्तता की हाित होने के कारण जान नहीं सकता था या उस प्रवंचना के कारण, जो उसस े की गई है, जानता नहीं है, उस दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि को बेईमानी से या कपटपूवकष हस्तािररत, मुरांककत, ननष्पाहदत या पररवनततष ककया जाना या ककसी इिै‍राननक अलभिेि पर अपने इिै‍ राननक हस्तािर ककया जाना काररत करता है । दृष् टांत हुआ (क) क के पास य द्वारा ख पर लििा 10,000 रुपए का एक प्रत्यय पत्र है । ख से कपट करन े के लिए क 10,000 में एक शून्य बढ़ा देता है और उस रालश को 1,00,000 रुपए इस आशय से बना देता है कक ख यह ववश् वास कर िे कक य ने वह पत्र ऐसा ही लििा था । क ने कूटरचना की है । (ि) क इस आशय स े कक वह य की सम्पदा ख को बेच दे और उसके द्वारा ख स े क्रय धन अलभप्राप् त कर िे, य के प्राधधकार के बबना य की मुरा एक ऐसी दस्तावेज परअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 139 िगाता है, जो कक य की ओर से क की सम्पदा का हस्तान्तर-पत्र होना तात्पनयतष है । क ने कूटरचना की है । (ग) एक बकैं र पर लिि े हुए और वाहक को देय चेक को क उठा िेता है । चेक ख द्वारा हस्तािररत है, ककन्तु उस चेक में कोई रालश अंककत नहीं है । क दस हजार रुपए की रालश अंककत करके चेक को कपटपूवकष भर िेता है । क कूटरचना करता है । (घ) क अपने अलभकताष ख के पास एक बकैं र पर लििा हुआ, क द्वारा हस्तािररत चेक, देय धनरालश अंककत ककए बबना छोड देता है । ख को क इस बात के लिए प्राधधकृत कर देता है कक वह कुछ संदाय करन े के लिए चेक में ऐसी धनरालश, जो दस हजार रुपए स े अधधक न हो अंककत करके चेक भर िे । ख कपटपूवकष चेक में बीस हजार रुपए अंककत करके उस े भर िेता है । ख कूटरचना करता है । (ङ) क, ख के प्राधधकार के बबना ख के नाम में अपने ऊपर एक ववननमयपत्र इस आशय से लििता है कक वह एक बकैं र से असिी ववननमयपत्र की भांनत बट्टा देकर उस े भुना िे, और उस ववननमयपत्र को उसकी पररप‍ वता पर ि े िे, यहां क इस आशय से उस ववननमयपत्र को लििता है कक प्रवंचना करके बकैं र को यह अनुमान करा दे कक उस े ख की प्रनतभूनत प्राप् त है, और इसलिए वह उस ववननमयपत्र को बट्टा िेकर भुना दे । क कूटरचना का दोर्ी है । (च) य की वसीयत में ये शब्द अन्तववष्ष ट हैं कक “म ैं ननदेश देता हूं कक मेरी समस्त शेर् सम्पवत्त क, ख और ि में बराबर बांट दी जाए” । क बईे मानी से ख का नाम इस आशय से िुरच डािता है कक यह ववश् वास कर लिया जाए कक समस्त सम्पवत्त उसके स्वयं के लिए और ि के लिए ही छोडी गई थी । ख ने कूटरचना की है । (छ) क एक सरकारी वचनपत्र को पष्ृ ठांककत करता है और उस पर शब्द “य को या उसके आदेशानुसार दे दो” लििकर और पष्ृ ठांकन पर हस्तािर करके उस े य को या उसके आदेशानुसार देय कर देता है । ख बेईमानी से “य को या उसके आदेशानुसार दे दो” इन शब्दों को छीिकर लमटा डािता है, और इस प्रकार उस ववशेर् पष्ृ ठांकन को एक कोरा पष्ृ ठांकन में पररवनततष कर देता है । ख कूटरचना करता है । (ज) क एक सम्पदा य को बचे देता है और उसका हस्तांतर-पत्र लिि देता है । उसके पश् चात ् क, य को कपट करके सम्पदा स े वंधचत करने के लिए उसी सम्पदा को एक हस्तान्तर-पत्र क्जस पर य के हस्तान्तर-पत्र की तारीि से छह मास पूव ष की तारीि पडी हुई है, ख के नाम इस आशय से ननष्पाहदत कर देता है कक यह ववश् वास कर लिया जाए कक उसने अपनी सम्पदा य को हस्तान्तररत करन े से पूव ष ख को हस्तान्तररत कर दी थी । क ने कूटरचना की है । (झ) य अपनी वसीयत क स े लििवाता है । क साशय एक ऐसे वसीयतदार का नाम लिि देता है, जो कक उस वसीयतदार से लभन्न है, क्जसका नाम य ने कहा है, और य को यह ननरूवपत करके कक उसने वसीयत उसके अनुदेशों के अनुसार ही तैयार की है, य को वसीयत पर हस्तािर करन े के लिए उत् प्रेररत करता है । क ने कूटरचना की है । (ञ) क एक पत्र लििता है और ख के प्राधधकार के बबना, इस आशय से कक उस पत्र के द्वारा य से और अन्य व्यक्‍ तयों से लभिा अलभप्राप् त करे, ख के नाम के हस्तािर यह प्रमाखणत करत े हुए कर देता है कक क अच्छे शीि का व्यक्‍ त है और अनवेक्षित दभु ाषग्य के140 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कारण दीन अवस्था में है । यहां क, ने य को सम्पवत्त, अिग करन े के लिए उत् प्रेररत करन े की लमथ्या दस्तावेज रची है, इसलिए क ने कूटरचना की है । (ट) ख के प्राधधकार के बबना क इस आशय से कक उसके द्वारा य के अधीन नौकरी अलभप्राप् त करे, क के शीि को प्रमाखणत करते हुए एक पत्र लििता है, और उस े ख के नाम से हस्तािररत करता है । क ने कूटरचना की है ‍योंकक उसका आशय कूटरधचत प्रमाणपत्र द्वारा य को प्रवंधचत करन े का और ऐसा करके य की सेवा की अलभव्य‍ त या वववक्षित संववदा में प्रववष्ट होने के लिए उत् प्रेररत करन े का था । स्पष् टीकरण 1—ककसी व्यक्‍ त का स्वयं अपने नाम का हस्तािर करना कूटरचना की कोहट में आ सकेगा । दृष् टांत (क) क एक ववननमयपत्र पर अपने हस्तािर इस आशय से करता है कक यह ववश् वास कर लिया जाए कक वह ववननमयपत्र उसी नाम के ककसी अन्य व्यक्‍ त द्वारा लििा गया था । क ने कूटरचना की है । (ि) क एक कागज के टुकडे पर शब्द “प्रनतगहृ ीत ककया” लििता है और उस पर य के नाम के हस्तािर इसलिए करता है कक ख बाद में इस कागज पर एक ववननमयपत्र, जो ख ने य के ऊपर ककया है, लिि े और उस ववननमयपत्र का इस प्रकार परक्रामण करे, मानो वह य के द्वारा प्रनतगहृ ीत कर लिया गया था । क कूटरचना का दोर्ी है, तथा यहद ख इस तथ्य को जानत े हुए क के आशय के अनुसरण में, उस कागज पर ववननमयपत्र लिि देता है, तो ख भी कूटरचना का दोर्ी है । (ग) क अपने नाम के ककसी अन्य व्यक्‍ त के आदेशानुसार देय ववननमयपत्र पडा पाता है । क उसे उठा िाता है और यह ववश् वास कराने के आशय से स्वयं अपने नाम पष्ृ ठांककत करता है कक इस ववननमयपत्र पर पष्ृ ठांकन उसी व्यक्‍ त द्वारा लििा गया था क्जसके आदेशानुसार वह देय है । यहां, क ने कूटरचना की है । (घ) क, ख के ववरुद्ध एक डडक्री के ननष्पादन में बेची गई सम्पदा को िरीदता है । ख सम्पदा के अलभगहृ ीत ककए जाने के पश् चात ् य के साथ दस्ु सक्न्ध करके क को कपटवंधचत करन े और यह ववश् वास कराने के आशय से कक वह पट्टा अलभिहण से पूव ष ननष्पाहदत ककया गया था, नाममात्र के भाटक पर और एक िम्बी कािावधध के लिए य के नाम उस सम्पदा का पट्टा कर देता है और पट्टे पर अलभिहण से छह मास पूव ष की तारीि डाि देता है । ख यद्यवप पट्टे का ननष्पादन स्वय ं अपने नाम से करता है, तथावप उस पर पूव ष की तारीि डािकर वह कूटरचना करता है । (ङ) क एक व्यापारी अपने हदवािे का पूवाषनुमान करके अपना सामान ख के पास क के फायदे के लिए और अपने िेनदारों को कपटवंधचत करन े के आशय से रि देता है; और प्राप् त मू्य के बदिे में, ख को एक धनरालश देने के लिए अपने को आबद्ध करत े हुए, एक वचनपत्र उस संव्यवहार की सच् चाई की रंगत देने के लिए लिि देता है, और इस आशय से कक यह ववश् वास कर लिया जाए कक यह वचनपत्र उसने उस समय से पूव ष ही लििा था जब उसका हदवािा ननकिने वािा था, उस पर पहिे की तारीि डाि देता है । क ने पररभार्ा के प्रथम शीर्कष के अधीन कूटरचना की है । स्पष् टीकरण 2—कोई लमथ्या दस्तावेज ककसी कक््पत व्यक्‍ त के नाम से इस आशय स ेअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 141 रचना कक यह ववश् वास कर लिया जाए कक वह दस्तावेज एक वास्तववक व्यक्‍ त द्वारा रची गई थी, या ककसी मतृ व्यक्‍ त के नाम स े इस आशय स े रचना कक यह ववश् वास कर लिया जाए कक वह दस्तावेज उस व्यक्‍ त द्वारा उसके जीवन काि में रची गई थी, कूटरचना की कोहट में आ सकेगा । दृष् टांत क एक कक््पत व्यक्‍ त के नाम कोई ववननमयपत्र लििता है, और उसका परक्रामण करन े के आशय से उस ववननमयपत्र को ऐसे कक््पत व्यक्‍ त के नाम से कपटपूवकष प्रनतगहृ ीत कर िेता है । क कूटरचना करता है । स्पष् टीकरण 3—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “इिै‍ राननक हस्तािर करना” पद का 2000 का 21 वही अथ ष होगा, जो उसका सचू ना प्रौद्योधगकी अधधननयम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के िंड (घ) में है । 336. (1) जो कोई, ककसी लमथ्या दस्तावेज या लमथ्या इिै‍राननक अलभिेि या कूटरचना । दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि के ककसी भाग को इस आशय से रचता है कक िोक को या ककसी व्यक्‍ त को नुकसान या िनत काररत की जाए, या ककसी दाव े या हक का समथनष ककया जाए, या यह काररत ककया जाए कक कोई व्यक्‍ त संपवत्त अिग करे या कोई अलभव्य‍ त या वववक्षित संववदा करे या इस आशय से रचता है कक कपट करे, या कपट ककया जा सके, वह कूटरचना करता है । (2) जो कोई, कूटरचना करता है, वह दोनों में से ककसी भानंत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों स,े दक्ण्डत ककया जाएगा । (3) जो कोई, कूटरचना इस आशय से करता है कक वह दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि क्जसकी कूटरचना की जाती है, छि के प्रयोजन से उपयोग में िाई जाएगी, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा, और जुमाषने का भी दायी होगा । (4) जो कोई, कूटरचना इस आशय से करता है कक वह दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि क्जसकी कूटरचना की जाती है, ककसी पिकार की ख्यानत की अपहानन करेगी, या यह सम्भाव्य जानते हुए करता है कक इस प्रयोजन से उसका उपयोग ककया जाए, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 337. जो कोई, ऐस े दस्तावजे की या ऐस े इिै‍राननक अलभिेि की क्जसका ककसी न्यायािय के अलभिेि की या न्यायािय का या न्यायािय में अलभिेि या कायवष ाही होना, या सरकार द्वारा जारी ककसी िोक रक्जस्टर पहचान दस्तावेज, क्जसके अतं गतष पहचान पत्र या आधार काड ष भी है, या जन्म, वववाह या आहद की अन्त्येक्ष् ट का रक्जस्टर, या िोक सेवक द्वारा िोक सेवक के नात े रिा गया रक्जस्टर होना कूटरचना । तात्पनयषत हो, या ककसी प्रमाणपत्र की या ऐसी दस्तावेज की क्जसके बारे में यह तात्पनयषत हो कक वह ककसी िोक सेवक द्वारा उसकी पदीय हैलसयत में रची गई है, या जो ककसी वाद को संक्स्थत करन े या वाद में प्रनतरिा करन े का, उसमें कोई कायवष ाही करने का, या दावा संस्वीकृत कर िेने का, प्राधधकार हो या कोई मुख्तारनामा हो, कूटरचना करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा ।142 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— स्पष् टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “रक्जस्टर” के अंतगतष सूचना प्रौद्योधगकी अधधननयम, 2000 की धारा 2 की उपधारा (1) के िंड (द) में यथापररभावर्त इिै‍राननक 2000 का 21 रूप में रिी गई कोई सूची, डाटा या ककसी प्रववक्ष्ट का अलभिेि भी है । मू्यवान 338. जो कोई, ककसी ऐसी दस्तावेज की, क्जसका कोई मू्यवान प्रनतभूनत या वसीयत प्रनतभूनत, या पुत्र के दत्तकिहण का प्राधधकार होना तात्पनयषत हो, या क्जसका ककसी म्ू यवान प्रनतभूनत वसीयत, आहद की रचना या अन्तरण का, या उस पर के मूिधन, ब्याज या िाभांश को प्राप् त करन े का, या की कूटरचना । ककसी धन, चि सम्पवत्त या मू्यवान प्रनतभूनत को प्राप् त करन े या पररदत्त करन े का प्राधधकार होना तात्पनयतष हो, या ककसी दस्तावेज को, क्जसका धन हदए जाने की अलभस्वीकृनत करने वािा ननस्तारणपत्र या रसीद होना, या ककसी चि संपवत्त या मू्यवान प्रनतभूनत के पररदान के लिए ननस्तारणपत्र या रसीद होना तात्पनयषत हो, कूटरचना करता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दस वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । धारा 337 या 339. जो कोई, ककसी दस्तावेज या ककसी इिै‍राननक अलभिेि को उस े कूटरधचत धारा 338 में जानत े हुए और यह आशय रित े हुए कक वह कपटपूवकष या बेईमानी स े असिी रूप में वखणषत दस्तावेज उपयोग में िाया जाएगा, अपने कब्जे में रिेगा, यहद वह दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि को, उस े कूटरधचत जानते हुए और इस संहहता की धारा 337 में वखणतष भांनत का हो तो वह दोनों में से ककसी भांनत के उस े असिी के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जमु ाषने रूप में उपयोग में से भी दण्डनीय होगा, तथा यहद वह दस्तावेज धारा 338 में वखणतष भांनत की हो तो वह िान े का आशय रित े हुए कब्ज े आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष में रिना । तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । कूटरधचत 340. (1) वह लमथ्या दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि जो पूणतष : या भागत: दस्तावेज या कूटरचना द्वारा रचा गया है, कूटरधचत दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि कहिाता है । इिै‍राननक अलभिेि और (2) जो कोई, ककसी ऐसी दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि को, क्जसके बारे में वह इसे असिी के यह जानता या ववश् वास करन े का कारण रिता हो कक वह कूटरधचत दस्तावेज या रूप में उपयोग में िाना । इिै‍राननक अलभिेि है, कपटपूवकष या बेईमानी से असिी के रूप में उपयोग में करता है, वह उसी प्रकार दक्ण्डत ककया जाएगा, मानो उसने ऐसे दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि की कूटरचना की हो । धारा 338 के 341. (1) जो कोई, ककसी मुरा, पट्टी या छाप िगाने के अन्य उपकरण को इस अधीन दण्डनीय आशय से बनाता है या उसकी कूटकृनत तैयार करता है कक उस े कोई ऐसी कूटरचना करने के कूटरचना करन े के प्रयोजन के लिए उपयोग में िाया जाए, जो इस संहहता की धारा 338 के अधीन दण्डनीय है, आशय से कूटकृत मुरा, आहद का या इस आशय से, ककसी ऐसी मुरा, पट्टी या अन्य उपकरण को, उस े कूटकृत जानत े हुए बनाना या कब्जे अपने कब्जे में रिता है, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास में रिना । से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दण्डनीय होगा । (2) जो कोई, ककसी मुरा, पट्टी या छाप िगाने के अन्य उपकरण को इस आशय से बनाता है या उसकी कूटकृनत करता है, कक उस े कोई ऐसी कूटरचना करन े के प्रयोजन के लिए उपयोग में िाया जाए, जो धारा 338 से लभन्न इस अध्याय की ककसी धारा के अधीन दण्डनीय है, या इस आशय से ककसी ऐसी मरु ा, पट्टी या अन्य उपकरण को, उस े कूटकृत जानत े हुए अपने कब्जे में रिता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकीअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 143 अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । (3) जो कोई, ककसी मुरा, पट्टी या अन्य उपकरण को कूटकृत जानत े हुए अपने कब्जे में रिता है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । (4) जो कोई, ककसी मुरा, पट्टी या अन्य उपकरण को कूटकृत जानते हुए या उसके बारे में ऐसा ववश्वास रिने के कारण कपटपूवकष या बेईमानी से इसे असिी के रुप में उपयोग करता है, उसी रीनत में दंडनीय होगा, जैस े मानो उसने इस प्रकार की मुरा, पट्टी या अन्य उपकरण का ननमाषण या उसे कूटकृत ककया हो । 342. (1) जो कोई, ककसी पदाथ ष के ऊपर, या उसके उपादान में, ककसी ऐसी धारा 338 में वखणतष दस्तावेजों अलभििणा या धचह्न की, क्जसे धारा 338 में वखणतष ककसी दस्तावेज के अधधप्रमाणीकरण के के प्रयोजन के लिए, उपयोग में िाया जाता हो, कूटकृनत यह आशय रित े हुए बनाता है कक अधधप्रमाणीकरण ऐसी अलभििणा या ऐस े धचह्न की, ऐसे पदाथ ष पर उस समय कूटरधचत की जा रही या के उपयोग मे उसके पश् चात ् कूटरधचत की जाने वािी ककसी दस्तावेज को अधधप्रमाणीकृत का आभास प्रदान िाई जाने वािी अलभििणा या करन े के प्रयोजन से उपयोग में िाया जाता है या जो ऐस े आशय से कोई ऐसा पदाथ ष अपने धचह्न की कब्जे में रिता है, क्जस पर या क्जसके उपादान में ऐसी अलभििणा को या ऐस े धचह्न की कूटकृनत बनाना कूटकृनत बनाई गई हो, वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास या कूटकृत से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी धचह्नयु‍त पदाथष को कब्जें मे दायी होगा । रिना । (2) जो कोई, ककसी पदाथ ष के ऊपर, या उसके उपादान में, ककसी ऐसी अलभििणा या धचह्न की, क्जसे धारा 338 में वखणतष दस्तावेजों से लभन् न ककसी दस्तावेज या इिै‍राननक अलभिेि के अधधप्रमाणीकरण के प्रयोजन के लिए, उपयोग में िाया जाता हो, कूटकृनत यह आशय रित े हुए बनाता है कक वह ऐसी अलभििणा या ऐसे धचह्न को, ऐसे पदाथ ष पर उस समय कूटरधचत की जा रही या उसके पश् चात ् कूटरधचत की जाने वािी ककसी दस्तावजे को अधधप्रमाणीकृत का आभास प्रदान करन े के प्रयोजन से उपयोग में िाया जाता है या जो ऐसे आशय से कोई ऐसा पदाथ ष अपने कब्जे में रिता है, क्जस पर या क्जसके उपादान में ऐसी अलभििणा या ऐस े धचह्न की कूटकृनत बनाई गई हो, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जमु ाषने का भी दायी होगा । 343. जो कोई, कपटपूवकष या बेईमानी से, या िोक को या ककसी व्यक्‍ त को नुकसान वसीयत, दत्तकिहण या िनत काररत करन े के आशय से, ककसी ऐसे दस्तावेज को, जो वसीयत या पुत्र के प्राधधकार-पत्र या दत्तकिहण करने का प्राधधकार-पत्र या कोई म्ू यवान प्रनतभूनत हो, या होना तात्पनयतष हो, मू्यवान रद्द, नष् ट या ववरूवपत करता है या रद्द, नष् ट या ववरूवपत करन े का प्रयत् न करता है, या प्रनतभूनत को नछपाता है या नछपाने का प्रयत् न करता है या ऐसी दस्तावेज के ववर्य में ररक्ष् ट करता है, कपटपूवकष रद्द, नष् ट, आहद वह आजीवन कारावास से, या दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात करना । वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषने का भी दायी होगा । 344. जो कोई, लिवपक, अधधकारी या सेवक होत े हुए, या लिवपक, अधधकारी या सेवक िेिा का लमथ्याकरण । के नात े ननयोक्जत होत े हुए या काय ष करत े हुए, ककसी पुस्तक, इिै‍राननक अलभिेि, कागज, िेि, मू्यवान प्रनतभूनत या िेिा को जो उसके ननयोजक का हो या उसके ननयोजक के144 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कब्जे में हो या क्जस े उसने ननयोजक के लिए या उसकी ओर से प्राप् त ककया हो, साशय और कपट करन े के आशय से नष् ट, पररवनततष , ववकृत या लमथ्याकृत करता है या ककसी ऐसी पुस्तक, इिै‍राननक अलभिेि, कागज, िेि मू्यवान प्रनतभूनत या िेिा में साशय और कपट करन े के आशय से कोई लमथ्या प्रववक्ष् ट करता है या करन े के लिए दष्ु प्रेरण करता है, या उसमें स े या उसमें ककसी ताक्ववक ववलशक्ष् ट का िोप या पररवतनष करता है या करन े का दष्ु प्रेरण करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—इस धारा के अधीन ककसी आरोप में, ककसी ववलशष् ट व्यक्‍ त का, क्जससे कपट करना आशनयत था, नाम बताए बबना या ककसी ववलशष् ट धनरालश का, क्जसके ववर्य में कपट ककया जाना आशनयत था या ककसी ववलशष् ट हदन का, क्जस हदन अपराध ककया गया था, ववननदेश ककए बबना, कपट करन े के साधारण आशय का अलभकथन पयाषप् त होगा । संपवि धचह्िों के विषय में सम्पवत्त-धचह्न । 345. (1) वह धचह्न, जो यह द्योतन करने के लिए उपयोग में िाया जाता है कक चि संपवत्त ककसी ववलशष् ट व्यक्‍ त की है, सम्पवत्त धचह्न कहा जाता है । (2) जो कोई, ककसी चि सम्पवत्त या माि को या ककसी पेटी, पैकेज या अन्य पात्र को, क्जसमें चि सम्पवत्त या माि रिा है, ऐसी रीनत से धचक्ह्नत करता है या ककसी पेटी, पकै ेज या अन्य पात्र को, क्जस पर कोई धचह्न है, ऐसी रीनत स े उपयोग में िाता है, जो इसलिए युक्‍ तयु‍ त रूप से प्रकक््पत है कक उसस े यह ववश् वास काररत हो जाए कक इस प्रकार धचक्ह्नत सम्पवत्त या माि, या इस प्रकार धचक्ह्नत ककसी ऐसे पात्र में रिी हुई कोई सम्पवत्त या माि, ऐसे व्यक्‍ त का है, क्जसका वह नहीं है, वह लमथ्या सम्पवत्त-धचह्न का उपयोग करता है, यह कहा जाता है । (3) जो कोई, ककसी लमथ्या सम्पवत्त-धचह्न का उपयोग करता है, जब तक कक वह यह साबबत न कर दे कक उसने कपट करन े के आशय के बबना काय ष ककया है, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से दक्ण्डत ककया जाएगा । िनत काररत 346. जो कोई, ककसी सम्पवत्त-धचह्न को, यह आशय रिते हुए, या यह सम्भाव्य करने के आशय जानत े हुए कक वह उसके द्वारा ककसी व्यक्‍ त को िनत करे, ककसी सम्पवत्त-धचह्न को स े सम्पवत्त-धचह्न अपसाररत करता है, नष् ट करता है, ववरूवपत करता है या उसमें कुछ जोडता, वह दोनों में से को बबगाडना । ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । सम्पवत्त-धचह्न 347. (1) जो कोई, ककसी सम्पवत्त-धचह्न का, जो ककसी अन्य व्यक्‍ त द्वारा उपयोग में का कूटकरण । िाया जाता हो, कूटकरण करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों स,े दक्ण्डत ककया जाएगा । (2) जो कोई ककसी सम्पवत्त-धचह्न का, जो िोक सेवक द्वारा उपयोग में िाया जाता हो, या ककसी ऐस े धचह्न का, जो िोक सेवक द्वारा यह द्योतन करन े के लिए उपयोग में िाया जाता हो कक कोई सम्पवत्त ककसी ववलशष् ट व्यक्‍ त द्वारा या ककसी ववलशष् ट समय या स्थान पर ववननलमतष की गई है, या यह कक वह सम्पवत्त ककसी ववलशष् ट ‍ वालिटी की है या ककसी ववलशष् ट कायाषिय में से पाररत हो चुकी है, या यह कक ककसी छूट की हकदार है,अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 145 कूटकरण करता है, या ककसी ऐसे धचह्न को उस े कूटकृत जानत े हुए असिी के रूप में उपयोग में िाता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । 348. जो कोई, सम्पवत्त-धचह्न के कूटकरण के प्रयोजन से कोई डाई, पट्टी या अन्य सम्पवत्त-धचह्न के कूटकरण के लिए उपकरण बनाता है या अपने कब्जे में रिता है, या यह द्योतन करने के प्रयोजन से कक कोई उपकरण कोई माि ऐसे व्यक्‍ त का है, क्जसका वह नहीं है, ककसी सम्पवत्त-धचह्न को अपने कब्जे में बनाना या उस रिता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो पर कब्जा । सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 349. जो कोई, ककसी माि या चीजों को, स्वयं उन पर या ककसी ऐसी पेटी, पैकेज या कूटकृत हुआ सम्पवत्त-धचह्न अन्य पात्र पर, क्जसमें ऐसा माि रिा हो, कोई कूटकृत सम्पवत्त-धचह्न िगा या छपा से धचक्ह्नत हुआ होत े हुए, बेचता है या बेचन े के लिए अलभदलशतष करता है या अपने कब्जे में रिता है, माि का जब तक कक वह यह साबबत न कर दे कक— ववक्रय । (क) इस धारा के ववरुद्ध अपराध न करन े की सब युक्‍ तयु‍ त पूवाषवधानी बरतते हुए, धचह्न के असिीपन के सम्बन्ध में संदेह करन े के लिए उसके पास कोई कारण अधधकधथत अपराध करत े समय नहीं था; तथा (ि) अलभयोजक द्वारा या उसकी ओर से मांग ककए जाने पर, उसन े उन व्यक्‍ तयों के ववर्य में, क्जनसे उसने ऐसा माि या चीजें अलभप्राप् त की थीं, वह सब जानकारी दे दी थी, जो उसकी शक्‍ त में थी; या (ग) अन्यथा उसने ननदोवर्तापूवकष काय ष ककया था, वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । 350. (1) जो कोई, ककसी पेटी, पैकेज या अन्य पात्र के ऊपर, क्जसमें माि रिा हुआ ककसी ऐस े पात्र है, ऐसी रीनत से कोई ऐसा लमथ्या धचह्न बनाता है, जो इसलिए युक्‍ तयु‍ त रूप से प्रकक््पत के ऊपर लमथ्या धचह्न बनाना है कक उसस े ककसी िोक सेवक को या ककसी अन्य व्यक्‍ त को यह ववश् वास काररत हो जाए क्जसमें माि कक ऐसे पात्र में ऐसा माि है, जो उसमें नहीं है, या यह कक उसमें ऐसा माि नहीं है, जो रिा है । उसमें है, या यह कक ऐसे पात्र में रिा हुआ माि ऐसी प्रकृनत या ‍ वालिटी का है जो उसकी वास्तववक प्रकृनत या ‍ वालिटी स े लभन्न है, जब तक कक वह यह साबबत न कर दे कक उसने वह काय ष कपट करने के आशय के बबना ककया है वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध तीन वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमानष े से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (2) जो कोई, उपधारा (1) के अधीन प्रनतवर्द्ध ककसी प्रकार से ककसी ऐसे लमथ्या धचह्न का उपयोग करता है, जब तक कक वह यह साबबत न कर दे कक उसने वह काय ष कपट करन े के आशय के बबना ककया है, वह उसी प्रकार दक्ण्डत ककया जाएगा, मानो उसने उपधारा (1) के अधीन अपराध ककया हो । अध्याय 19 आपराधिक अलभत्रास, अपमाि, क्षोभ, माििानि, आहि के विषय में 351. (1) जो कोई, ककसी अन्य व्यक्‍ त के शरीर, ख्यानत या सम्पवत्त को या ककसी आपराधधक अलभत्रास ।146 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ऐसे व्यक्‍ त के शरीर या ख्यानत को, क्जससे कक वह व्यक्‍ त हहतबद्ध हो, कोई िनत करन े की धमकी, उस अन्य व्यक्‍ त को इस आशय स े देता है कक उस े संत्रास काररत ककया जाए, या उसस े ऐसी धमकी के ननष्पादन का पररवजनष करन े के साधन स्वरूप कोई ऐसा काय ष कराया जाए, क्जसे करन े के लिए वह वैध रूप से आबद्ध न हो, या ककसी ऐसे काय ष को करन े का िोप कराया जाए, क्जसे करन े के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह आपराधधक अलभत्रास करता है । स्पष् टीकरण—ककसी ऐसे मतृ व्यक्‍ त की ख्यानत को िनत करन े की धमकी क्जससे वह व्यक्‍ त, क्जसे धमकी दी गई है, हहतबद्ध हो, इस धारा के अन्तगषत आता है । दृष् टांत लसववि वाद चिाने से रोकन े के लिए ख को उत् प्रेररत करने के प्रयोजन से ख के घर को जिाने की धमकी क देता है । क आपराधधक अलभत्रास का दोर्ी है । (2) जो कोई, आपराधधक अलभत्रास का अपराध करेगा, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (3) जो कोई, धमकी, मत्ृ यु या घोर उपहनत काररत करने की, या अक्ग् न द्वारा ककसी सम्पवत्त का नाश काररत करन े की या मत्ृ यु दण्ड से या आजीवन कारावास से, या सात वर् ष की अवधध तक के कारावास से दण्डनीय अपराध काररत करन े की, या ककसी महहिा पर असनतत्व का िांछन िगाने की धमकी देकर आपराधधक अलभत्रास का अपराध करता है ; तो वह दोनों में स े ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (4) जो कोई, अनाम संसूचना द्वारा या उस व्यक्‍ त का, क्जसने धमकी दी हो, नाम या ननवास-स्थान नछपाने की पूवाषवधानी करके आपराधधक अलभत्रास का अपराध करता है, वह उपधारा (1) के अधीन उस अपराध के लिए उपबक्न्धत दण्ड के अनतरर‍ त, दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, दक्ण्डत ककया जाएगा । िोकशांनत भगं 352. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को साशय अपमाननत करता है और उसके द्वारा उस कराने को व्यक्‍ त को इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानत े हुए, प्रकोवपत करता है कक ऐसे प्रकोपन प्रकोवपत करन े से वह िोक शाक्न्त भंग या कोई अन्य अपराध काररत करे, वह दोनों में से ककसी भांनत के के आशय स े साशय कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत अपमान । ककया जाएगा । िोक ररक्ष् टकारक 353. (1) जो कोई, ककसी कथन, लमथ्या जानकारी, जनश्रुनत या ररपोटष को— व‍त व्य । (क) इस आशय से कक, या क्जससे यह सम्भाव्य हो कक, भारत की सेना, नौसेना या वायुसेना का कोई अधधकारी, सैननक, नाववक या वायुसैननक ववरोह करे या अन्यथा वह अपने उस नात,े अपने कतव्ष य की अवहेिना करे या उसके पािन में असफि रहे ; या (ि) इस आशय से कक, या क्जससे यह सम्भाव्य हो कक, िोक या िोक के ककसी भाग को ऐसा भय या संत्रास काररत हो क्जससे कोई व्यक्‍ त राज्य के ववरुद्ध या िोक-प्रशाक्न्त के ववरुद्ध अपराध करन े के लिए उत् प्रेररत हो ; याअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 147 (ग) इस आशय स े कक, या क्जससे यह सम्भाव्य हो कक, उसस े व्यक्‍ तयों का कोई वग ष या समुदाय ककसी दसू रे वग ष या समुदाय के ववरुद्ध अपराध करन े के लिए उद्दीप् त ककया जाए, रचता है, प्रकालशत करता है या पररचालित करता है, क्जसके अंतगतष इिै‍राननक माध्यम स े रचना, प्रकाशन या पररचािन भी है, वह कारावास से, जो तीन वर् ष तक का हो सकेगा, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (2) जो कोई, लमथ्या जानकारी, जनश्रुनत या संत्रासकारी समाचार अन्तववष्ष ट करने वािे ककसी कथन या ररपोटष को, क्जसके अन्तगतष इिै‍राननक साधन के माध्यम स े भी है इस आशय से कक, या क्जससे यह संभाव्य हो कक, ववलभन्न धालमकष , मूिवंशीय, भार्ायी या प्रादेलशक समूहों या जानतयों या समुदायों के बीच शत्रुता, घणृ ा या वैमनस्य की भावनाएं, धम,ष मूिवंश, जन्म-स्थान, ननवास-स्थान, भार्ा, जानत या समुदाय के आधारों पर या अन्य ककसी भी आधार पर पैदा या संप्रवनततष हो, रचता है, प्रकालशत करता है या पररचालित करता है, वह कारावास से, जो तीन वर् ष तक का हो सकेगा, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (3) जो कोई, उपधारा (2) में ववननहदषष् ट अपराध, ककसी पूजा के स्थान में या ककसी जमाव में, जो धालमकष पूजा या धालमकष कम ष करन े में िगा हुआ हो, करता है, वह कारावास से, जो पांच वर् ष तक का हो सकेगा, दंडडत ककया जाएगा और जुमाषन े का भी दायी होगा । अपिाि—ऐसा कोई कथन, लमथ्या जानकारी, जनश्रुनत या ररपोटष इस धारा के अथ ष के अन्तगषत अपराध की कोहट में नहीं आती, जब उस े रचने वािे, प्रकालशत करन े वािे या पररचालित करने वािे व्यक्‍ त के पास इस ववश् वास के लिए युक्‍ तयु‍ त आधार हो कक ऐसा कथन, लमथ्या जानकारी, जनश्रुनत या ररपोटष सत्य है और वह उस े सद् भावपूवकष तथा पूवो‍ त जैसे ककसी आशय के बबना रचता है, प्रकालशत करता है या पररचालित करता है । 354. जो कोई, ककसी व्यक्‍ त को यह ववश् वास करन े के लिए उत् प्रेररत करके, या व्यक्‍ त को यह ववश् वास करने उत् प्रेररत करने का प्रयत् न करके, कक यहद वह उस बात को न करें, क्जसे उसस े कराना के लिए अपराधी का उद्देश्य हो, या यहद वह उस बात को करें क्जसका उसस े िोप कराना अपराधी उत् प्ररेरत करके का उद्देश्य हो, तो वह या कोई व्यक्‍ त, क्जससे वह हहतबद्ध है, अपराधी के ककसी काय ष से कक वह दैवी दैवी अप्रसाद का भाजन हो जाएगा, या बना हदया जाएगा, स्वेच्छया उस व्यक्‍ त से कोई अप्रसाद का भाजन होगा, ऐसी बात करवाएगा या करवाने का प्रयत् न करेगा, क्जसे करन े के लिए वह वैध रूप स े कराया गया आबद्ध न हो, या ककसी ऐसी बात के करन े का िोप करवाएगा या करवाने का प्रयत् न करेगा, काय ष । क्जसे करन े के लिए वह वैध रूप से हकदार हो, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध एक वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । दृष् टांत (क) क, यह ववश् वास कराने के आशय से य के द्वार पर धरना देता है कक इस प्रकार धरना देने से वह य को दैवी अप्रसाद का भाजन बना रहा है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । (ि) क, य को धमकी देता है कक यहद य अमुक काय ष नहीं करेगा, तो क अपने बच् चों में से ककसी एक का वध ऐसी पररक्स्थनतयों में कर डािेगा, क्जससे ऐसे वध करने के148 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पररणामस्वरूप यह ववश् वास ककया जाए, कक य दैवी अप्रसाद का भाजन बना हदया गया है । क ने इस धारा में पररभावर्त अपराध ककया है । मत्त व्यक्‍त 355. जो कोई, मत्तता की हाित में ककसी िोक स्थान में, या ककसी ऐसे स्थान में, द्वारा िोक क्जसमें उसका प्रवेश करना अनतचार हो, आता है और वहां इस प्रकार का आचरण करता है स्थान में क्जससे ककसी व्यक्‍ त को िोभ हो, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध चौबीस घंटे तक अवचार । की हो सकेगी, या जुमाषने स,े जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, या सामुदानयक सेवा से, दंडडत ककया जाएगा । माििानि के विषय में मानहानन । 356. (1) जो कोई, बोिे गए या पढ़े जाने के लिए आशनयत शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपणों द्वारा ककसी व्यक्‍ त के बारे में कोई िांछन इस आशय स े िगाता है या प्रकालशत करता है कक ऐसे िांछन से ऐसे व्यक्‍ त की ख्यानत की अपहानन की जाए या यह जानत े हुए या ववश् वास करन े का कारण रिते हुए िगाता है या प्रकालशत करता है, ऐस े िांछन से ऐसे व्यक्‍ त की ख्यानत की अपहानन होगी, इसमें इसके पश्चात ् अपवाहदत दशाओं के लसवाय उसके बारे में कहा जाता है कक वह उस व्यक्‍ त की मानहानन करता है । स्पष् टीकरण 1—ककसी मतृ व्यक्‍ त को कोई िांछन िगाना मानहानन की कोहट में आ सकेगा यहद वह िांछन उस व्यक्‍ त की ख्यानत की, यहद वह जीववत होता, अपहानन करता, और उसके पररवार या अन्य ननकट सम्बक्न्धयों की भावनाओं को उपहत करन े के लिए आशनयत हो । स्पष् टीकरण 2—ककसी कम्पनी या संगम या व्यक्‍ तयों के समूह के सम्बन्ध में उसकी वैसी हैलसयत में कोई िांछन िगाना मानहानन की कोहट में आ सकेगा । स्पष् टीकरण 3—अनुक्प के रूप में, या व्यंगोक्‍ त के रूप में अलभव्य‍ त िांछन मानहानन की कोहट में आ सकेगा । स्पष् टीकरण 4—कोई िांछन ककसी व्यक्‍ त की ख्यानत की अपहानन करने वािा नहीं कहा जाता जब तक कक वह िांछन दसू रों की दृक्ष् ट में प्रत्यित: या अप्रत्यित: उस व्यक्‍ त के सदाचाररक या बौद्धधक स्वरूप को कम न करे या उस व्यक्‍ त की जानत के या उसकी आजीववका के सम्बन्ध में उसके शीि को कम न करे या उस व्यक्‍ त की साि को कम न करे या यह ववश् वास न कराए कक उस व्यक्‍ त का शरीर घणृ ोत्पादक दशा में है या ऐसी दशा में है जो साधारण रूप से ननकृष् ट समझी जाती है । दृष् टांत (क) क यह ववश् वास कराने के आशय से कक य ने ख की घडी अवश्य चुराई है, कहता है, “य एक ईमानदार व्यक्‍ त है, उसने ख की घडी कभी नहीं चुराई है” । जब तक कक यह अपवादों में स े ककसी के अन्तगतष न आता हो, यह मानहानन है । (ि) क से पूछा जाता है कक ख की घडी ककसने चुराई है । क यह ववश् वास कराने के आशय से कक य ने ख की घडी चुराई है, य की ओर संकेत करता है जब तक कक यह अपवादों में स े ककसी के अन्तगतष न आता हो, यह मानहानन है । (ग) क यह ववश् वास कराने के आशय से कक य ने ख की घडी चुराई है, य का एक धचत्रअनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 149 िींचता है क्जसमें वह ख की घडी िेकर भाग रहा है । जब तक कक यह अपवादों में से ककसी के अन्तगतष न आता हो, यह मानहानन है । अपिाि 1—ककसी ऐसी बात का िांछन िगाना, जो ककसी व्यक्‍ त के सम्बन्ध में सत्य हो, मानहानन नहीं है, यहद यह िोक क्याण के लिए हो कक वह िांछन िगाया जाए या प्रकालशत ककया जाए । वह िोक क्याण के लिए है या नहीं, यह तथ्य का प्रश् न है । अपिाि 2—उसके िोक कृत्यों के ननवहष न में िोक सेवक के आचरण के ववर्य में या उसके शीि के ववर्य में, जहां तक उसका शीि उस आचरण से प्रकट होता हो, न कक उसस े आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भ ावपूवकष अलभव्य‍ त करना मानहानन नहीं है । अपिाि 3—ककसी िोक प्रश् न के सम्बन्ध में ककसी व्यक्‍ त के आचरण के ववर्य में, और उसके शीि के ववर्य में, जहां तक कक उसका शीि उस आचरण से प्रकट होता हो, न कक उसस े आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भ ावपवू कष अलभव्य‍ त करना मानहानन नहीं है । दृष् टांत ककसी िोक प्रश् न पर सरकार को अजी देने में, ककसी िोक प्रश् न के लिए सभा बुिाने के अपेिण पर हस्तािर करने में, ऐसी सभा का सभापनतत्व करने में या उसमें उपक्स्थत होने में, ककसी ऐसी सलमनत का गठन करने में या उसमें सक्म्मलित होने में, जो िोक समथनष आमंबत्रत करती है, ककसी ऐसे पद के ककसी ववलशष्ट अभ्यथी के लिए मत देने में या उसके पि में प्रचार करन े में, क्जसके कतव्ष यों के दितापूण ष ननवहष न से िोक हहतबद्ध है, य के आचरण के ववर्य में क द्वारा कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भ ावपवू कष अलभव्य‍ त करना मानहानन नहीं है । अपिाि 4—ककसी न्यायािय की कायवष ाहहयों की या ककन्हीं ऐसी कायवष ाहहयों के पररणाम की सारत: सही ररपोटष को प्रकालशत करना मानहानन नहीं है । स्पष् टीकरण—कोई मक्जस्रेट या अन्य अधधकारी, जो ककसी न्यायािय में ववचारण से पूव ष की प्रारक्म्भक जांच िुिे न्यायािय में कर रहा हो, उपरो‍ त धारा के अथ ष के अन्तगतष न्यायािय है । अपिाि 5—ककसी ऐसे मामिे के गुणागुण के ववर्य में चाहे वह लसववि हो या दाक्ण्डक, जो ककसी न्यायािय द्वारा ववननक्श् चत हो चुका हो या ककसी ऐसे मामिे के पिकार, सािी या अलभकता ष के रूप में ककसी व्यक्‍ त के आचरण के ववर्य में या ऐसे व्यक्‍ त के शीि के ववर्य में, जहां तक कक उसका शीि उस आचरण से प्रकट होता हो, न कक उसके आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद् भावपवू कष अलभव्य‍ त करना मानहानन नहीं है । दृष् टांत (क) क कहता है “म ैं समझता हूं कक उस ववचारण में य का साक्ष्य ऐसा परस्पर ववरोधी है कक वह अवश्य ही मूि ष या बेईमान होना चाहहए” । यहद क ऐसा सद् भावपूवकष कहता है तो वह इस अपवाद के अन्तगतष आ जाता है, ‍योंकक जो राय वह य के शीि के सम्बन्ध में अलभव्य‍ त करता है, वह ऐसी है जैसी कक सािी के रूप में य के आचरण से, न कक उसके150 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— आगे, प्रकट होती है । (ि) ककन्तु यहद क कहता है “जो कुछ य ने उस ववचारण में दृढ़तापूवकष कहा है, म ैं उस पर ववश् वास नहीं करता ‍योंकक म ैं जानता हूं कक वह सत्यवाहदता से रहहत व्यक्‍ त है,” तो क इस अपवाद के अन्तगतष नहीं आता है, ‍योंकक वह राय जो वह य के शीि के सम्बन्ध में अलभव्य‍ त करता है, ऐसी राय है, जो सािी के रूप में य के आचरण पर आधाररत नहीं है । अपिाि 6—ककसी ऐसी कृनत के गुणागुण के ववर्य में, क्जसको उसके कताष न े िोक के ननणषय के लिए रिा हो, या उसके कताष के शीि के ववर्य में, जहां तक कक उसका शीि ऐसी कृनत में प्रकट होता हो, न कक उसके आगे, कोई राय सद्भ ावपूवकष अलभव्य‍ त करना मानहानन नहीं है । स्पष् टीकरण—कोई कृनत िोक के ननणयष के लिए अलभव्य‍ त रूप से या कताष की ओर से ककए गए ऐसे कायों द्वारा, क्जनसे िोक के ननणयष के लिए ऐसा रिा जाना वववक्षित हो, रिी जा सकती है । दृष् टांत (क) जो व्यक्‍ त पुस्तक प्रकालशत करता है वह उस पुस्तक को िोक के ननणयष के लिए रिता है । (ि) वह व्यक्‍ त, जो िोक के समि भार्ण देता है, उस भार्ण को िोक के ननणयष के लिए रिता है । (ग) वह अलभनेता या गायक, जो ककसी िोक रंगमंच पर आता है, अपने अलभनय या गायन को िोक के ननणयष के लिए रिता है । (घ) क, य द्वारा प्रकालशत एक पुस्तक के संबंध में कहता है “य की पुस्तक मूितष ापूणष है, य अवश्य कोई दबु िष पुरुर् होना चाहहए । य की पुस्तक अलशष् टतापूण ष है, य अवश्य ही अपववत्र ववचारों का व्यक्‍ त होना चाहहए” । यहद क ऐसा सद् भावपूवकष कहता है, तो वह इस अपवाद के अन्तगतष आता है, ‍योंकक वह राय जो वह, य के ववर्य में अलभव्य‍ त करता है, य के शीि स े वही ं तक, न कक उसस े आगे सम्बन्ध रिती है जहां तक कक य का शीि उसकी पुस्तक से प्रकट होता है । (ङ) ककन्तु यहद क कहता है “मुझे इस बात का आश् चयष नहीं है कक य की पुस्तक मूितष ापूण ष तथा अलशष् टतापूणष है ‍योंकक वह एक दबु िष और िम्पट व्यक्‍ त है” । क इस अपवाद के अन्तगषत नहीं आता ‍योंकक वह राय, जो कक वह य के शीि के ववर्य में अलभव्य‍ त करता है, ऐसी राय है जो य की पुस्तक पर आधाररत नहीं है । अपिाि 7—ककसी ऐसे व्यक्‍ त द्वारा, जो ककसी अन्य व्यक्‍ त के ऊपर कोई ऐसा प्राधधकार रिता हो, जो या तो ववधध द्वारा प्रदत्त हो या उस अन्य व्यक्‍ त के साथ की गई ककसी ववधधपूण ष संववदा से उद्भूत हो, ऐस े ववर्यों में, क्जनसे कक ऐसा ववधधपूण ष प्राधधकार सम्बक्न्धत हो, उस अन्य व्यक्‍ त के आचरण की सद्भ ावपूवकष की गई कोई पररननन्दा मानहानन नहीं है ।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 151 दृष् टांत ककसी सािी के आचरण की या न्यायािय के ककसी अधधकारी के आचरण की सद्भ ावपूवकष पररननन्दा करन े वािा कोई न्यायाधीश, उन व्यक्‍ तयों की, जो उसके आदेशों के अधीन है, सद्भ ावपूवकष पररननन्दा करन े वािा कोई ववभागाध्यि, अन्य लशशुओं की उपक्स्थनत में ककसी लशशु की सद्भ ावपूवकष पररननन्दा करने वािा वपता या माता, अन्य ववद्याधथयष ों की उपक्स्थनत में ककसी ववद्याथी की सद्भ ावपूवकष पररननन्दा करन े वािा लशिक, क्जसे ववद्याथी के माता-वपता के प्राधधकार प्राप् त हैं, सेवा में लशधथिता के लिए सेवक की सद्भ ावपूवकष पररननन्दा करने वािा स्वामी, अपने बकैं के रोकडडए की, ऐसे रोकडडए के रूप में, ऐसे रोकडडए के आचरण के लिए, सद्भ ावपूवकष पररननन्दा करन े वािा कोई बकैं कार इस अपवाद के अन्तगतष आते हैं । अपिाि 8—ककसी व्यक्‍ त के ववरुद्ध कोई अलभयोग ऐसे व्यक्‍ तयों में स े ककसी व्यक्‍ त के समि सद् भावपूवकष िगाना, जो उस व्यक्‍ त के ऊपर अलभयोग की ववर्य-वस्तु के सम्बन्ध में ववधधपूण ष प्राधधकार रित े हों, मानहानन नहीं है । दृष् टांत यहद क एक मक्जस्रेट के समि य पर सद्भ ावपवू कष अलभयोग िगाता है, यहद क एक सेवक य के आचरण के सम्बन्ध में य के मालिक से सद्भ ावपूवकष लशकायत करता है ; यहद क एक लशश ु य के सम्बन्ध में य के वपता स े सद्भ ावपूवकष लशकायत करता है ; तो क इस अपवाद के अन्तगतष आता है । अपिाि 9—ककसी अन्य के शीि पर िांछन िगाना मानहानन नहीं है, परन्त ु यह तब जबकक उस े िगाने वािे व्यक्‍त के या ककसी अन्य व्यक्‍ त के हहत की संरिा के लिए, या िोक क्याण के लिए, वह िाछं न सद्भ ावपूवकष िगाया गया हो । दृष् टांत (क) क एक दकु ानदार है । वह ख से, जो उसके कारबार का प्रबन्ध करता है, कहता है, “य को कुछ मत बेचना जब तक कक वह तुम्हें नकद धन न दे दे, ‍योंकक उसकी ईमानदारी के बारे में मेरी राय अच्छी नहीं है”। यहद उसने य पर यह िांछन अपने हहतों की संरिा के लिए सद्भ ावपूवकष िगाया है, तो क इस अपवाद के अन्तगतष आता है । (ि) क, एक मक्जस्रेट अपने वररष् ठ अधधकारी को ररपोटष देत े हुए, य के शीि पर िांछन िगाता है । यहां, यहद वह िांछन सद् भावपूवकष और िोक क्याण के लिए िगाया गया है, तो क इस अपवाद के अन्तगतष आता है । अपिाि 10—एक व्यक्‍ त को दसू रे व्यक्‍ त के ववरुद्ध सद् भावपूवकष सावधान करना मानहानन नहीं है, परन्तु यह तब जब कक ऐसी सावधानी उस व्यक्‍ त की भिाई के लिए, क्जसे वह दी गई हो, या ककसी ऐस े व्यक्‍ त की भिाई के लिए, क्जसस े वह व्यक्‍ त हहतबद्ध हो, या िोक क्याण के लिए आशनयत हो । (2) जो कोई, ककसी अन्य व्यक्‍ त की मानहानन करेगा, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, या सामुदानयक सेवा से दक्ण्डत152 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ककया जाएगा । (3) जो कोई, ककसी बात को यह जानते हुए या ववश् वास करन े का अच्छा कारण रिते हुए कक ऐसी बात ककसी व्यक्‍ त के लिए मानहाननकारक है, मुहरत करेगा, या उत्कीण ष करेगा, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । (4) जो कोई, ककसी मुहरत या उत्कीणष पदाथ ष को, क्जसमें मानहाननकारक ववर्य अन्तववष्ष ट है, यह जानत े हुए कक उसमें ऐसा ववर्य अन्तववष्ष ट है, बेचता है या बेचने की प्रस्थापना करता है, वह सादा कारावास से, क्जसकी अवधध दो वर् ष तक की हो सकेगी, या जुमाषने से, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । असिाय व्यष्क् त की पररचयाभ करि े की और उसकी आिश्यकताओं की पूनत भ करिे की संवििा का भंि के विषय में असहाय व्यक्‍ त 357. जो कोई, ककसी ऐस े व्यक्‍ त की, जो ककशोरावस्था या धचत्त-ववकृनत या रोग या की पररचया ष करने शारीररक दबु िष ता के कारण असहाय है, या अपने ननजी सुरिा की व्यवस्था या अपनी ननजी की और उसकी आवश्यकताओं की पूनत ष करने के लिए असमथ ष है, पररचयाष करने के लिए या उसकी आवश्यकताओं की पूनत ष करने आवश्यकताओं की पूनत ष करन े के लिए ववधधपूण ष संववदा द्वारा आबद्ध होते हुए, स्वेच्छया की संववदा का ऐसा करन े का िोप करता है, वह दोनों में से ककसी भांनत के कारावास से, क्जसकी अवधध भंग । तीन मास तक की हो सकेगी, या जुमाषन े से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दक्ण्डत ककया जाएगा । अध्याय 20 निरसि और व्यािवृ ि ननरसन और 358. (1) भारतीय दंड संहहता का इसके द्वारा ननरसन ककया जाता है । 1860 का 45 व्याववृत्त । (2) उपधारा (1) में ननहदषष्ट संहहता के ननरसन के होते हुए भी, ननम्नलिखित पर इसका कोई प्रभाव नहीं होगा,— (क) ऐसी ननरलसत संहहता के पूव ष सप्रं वतनष या उसके अधीन सम्यक् रूप स े की गई या सहन की गई कोई बात; या (ि) ऐसी ननरलसत संहहता के अधीन अक्जषत, प्रोद्भूत या उपगत कोई अधधकार, ववशेर्ाधधकार, बाध्यता या उत्तरदानयत्व ; या (ग) ऐसी ननरलसत संहहता के ववरुद्ध ककए गए ककन्हीं अपराधों के संबंध में उपगत कोई शाक्स्त, या दंड ; या (घ) ऐसी ककसी शाक्स्त या दंड के संबंध में कोई अन्वेर्ण या उपचार; या (ङ) पूवो‍त ऐसी ककसी शाक्स्त या दंड के संबंध में कोई कायवष ाही, अन्वेर्ण या उपचार और ऐसी कोई कायवष ाही या उपचार संक्स्थत हो सकेगा, जारी रह सकेगा या प्रवत्तृ हो सकेगा और ऐसी ककसी शाक्स्त का अधधरोपण इस प्रकार ककया जा सकेगा, मानो उस संहहता का ननरसन नहीं ककया गया है।अनुभाग 1क ] भारत का राजपत्र असाधारण 153 (3) ऐसे ननरसन के होत े हु ए भी, उ‍तच संहहता के अधीन की गई कोई बात या कोई कारषवाई, इस संहहता के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी । (4) ननरसन के प्रभाव के संबंध में, उपधारा (2) में ववलशष्ट ववर्यों का उ्िेि, 1897 का 10 साधारण िंड अधधननयम, 1897 की धारा 6 के साधारणतया िागू होने पर प्रनतकूि प्रभाव डािने या प्रभाववत करने वािा नहीं माना जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 155 भारतीय नागररक सुरक्षा संहिता, 2023 (2023 का अधिननयम संखयांक 46) [25 हिसम्बर, 2023] िण्ड प्रक्रिया संबंिी विधि का समेकन और संशोिन करन े के लिए अधिननयम भारत गणराज्य के चौहत्तरवें वर् ष में संसद् द्वारा ननम् नलिखित रूप में यह अधधननयलमत हो :— अध्याय 1 प्रारंलभक 1. (1) इस अधधननयम का संक्षिप् त नाम भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 संक्षिप्त नाम, ववथतार और है । प्रारंभ । (2) इस संहहता के अध्याय 9, अध्याय 11 और अध्याय 12 से संबंधधत उपबंधों से लभन्न उपबंध,— (क) नागािडैं राज्य को ; (ि) जनजानत िेत्रों को, िागू नह ं होंगे, ककंतु संबद्ध राज्य सरकार, अधधसूचना द्वारा, ऐसे उपबंधों या उनमें स े ककसी को, यथास्थथनत, संपूण ष नागािडैं राज्य या ऐसे जनजानत िेत्र या उनके ककसी भाग पर, ऐसे अनुपूरक, आनुर्ंधगक या पाररणालमक उपान्तरों psसहहत, िागू कर सकेगी, जैसा156 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अधधसूचना में ववननहदषष् ट ककया जाए । स्पष् टीकरण—इस धारा में, “जनजानत िेत्र” से वे राज्यिेत्र अलभप्रेत हैं, जो 21 जनवर , 1972 के ठीक पहिे, संववधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 में यथाननहदषष् ट असम के जनजानत िेत्रों में सस्म्मलित थे और जो लििांग नगरपालिका की थथानीय सीमाओं के भीतर के ित्रे ों स े लभन्न हैं । (3) यह ऐसी तार ि से प्रवत्तृ होगी, स्जसे भारत सरकार, राजपत्र में अधधसूचना द्वारा, ननयत करे । पररभार्ाएं । 2. (1) इस संहहता में, जब तक कक संदभ ष से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) “श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधन” के अंतगतष वीडडयो कांफ्रेंलसगं के प्रयोजनों के लिए पहचान, तिािी और अलभग्रहण या साक्ष्य की प्रकियाओं को अलभलिखित करना, इिैक्ट्राननक संसूचना का पारेर्ण और ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए ककसी संसूचना डडवाइस का प्रयोग और ऐस े अन्य साधन भी हैं, स्जस े राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंधधत करे ; (ि) “जमानत” स े ककसी अधधकार या न्यायािय द्वारा अधधरोवपत कनतपय ितों पर ककसी अपराध के काररत ककए जाने के अलभयुक्ट्त या संहदग्ध व्यस्क्ट्त द्वारा ककसी बंधपत्र या जमानतपत्र के ननष्पादन पर ववधध की अलभरिा से ऐसे व्यस्क्ट्त का छोडा जाना अलभप्रेत है ; (ग) “जमानतीय अपराध” से ऐसा अपराध अलभप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में हदिाया गया है या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध द्वारा जमानतीय बनाया गया है और “अजमानतीय अपराध” से कोई अन्य अपराध अलभप्रेत है ; (घ) “जमानतपत्र” से प्रनतभूनत के साथ छोडे जाने के लिए कोई वचनबंध अलभप्रेत है ; (ङ) “बंधपत्र” स े प्रनतभूनत के बबना छोडे जाने के लिए कोई वैयस्क्ट्तक बंधपत्र या वचनबंध अलभप्रेत है ; (च) “आरोप” के अंतगतष , जब आरोप में एक स े अधधक िीर् ष हों, आरोप का कोई भी िीर् ष है ; (छ) “संज्ञेय अपराध” से ऐसा अपराध अलभप्रेत है स्जसके लिए और “संज्ञेय मामिा” से ऐसा मामिा अलभप्रेत है स्जसमें, कोई पुलिस अधधकार प्रथम अनुसूची के या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अनुसार वारंट के बबना धगरफ्तार कर सकता है ; (ज) “पररवाद” स े इस संहहता के अधीन मस्जथरेट द्वारा कारषवाई ककए जान े की दृस्ष् ट से मौखिक या लिखित रूप में उससे ककया गया यह अलभकथन अलभप्रेत है कक ककसी व्यस्क्ट् त ने, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात, अपराध ककया है, ककंतु इसमें पुलिस ररपोटष सस्म्मलित नह ं है । स्पष् टीकरण—ऐसे ककसी मामिे में, जो अन्वेर्ण के पश् चात ् ककसी असंज्ञेय अपराध का ककया जाना प्रकट करता है, पुलिस अधधकार द्वारा की गई ररपोटष पररवाद समझी जाएगी और वह पुलिस अधधकार स्जसके द्वारा ऐसी ररपोटष की गई है, पररवाद समझा जाएगा ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 157 (झ) “इिैक्ट्राननक संसूचना” से ककसी इिैक्ट्राननक डडवाइस, स्जसके अंतगतष टेि फोन, मोबाइि फोन या अन्य बेतार दरू संचार डडवाइस या कंप्यूटर या श्रव्य–दृश्य प्िेयर या कैमरा या कोई अन्य इिैक्ट्राननक डडवाइस या इिैक्ट्राननक प्ररूप, जो केंद्र य सरकार द्वारा अधधसूचना द्वारा ववननहदषष्ट ककया जाए, सस्म्मलित है, के साधन द्वारा ककसी लिखित, मौखिक, सधचत्र सूचना या वीडडयो अंतवथष तु की संसूचना अलभप्रेत है, स्जसे (चाहे ककसी एक व्यस्क्ट्त से अन्य व्यस्क्ट्त को या एक डडवाइस से ककसी अन्य डडवाइस को या ककसी व्यस्क्ट्त से ककसी डडवाइस को या ककसी डडवाइस से ककसी व्यस्क्ट्त को) पारेवर्त या अंतररत ककया जाता है ; (ञ) “उच् च न्यायािय” से अलभप्रेत है,— (i) ककसी राज्य के संबंध में, उस राज्य का उच् च न्यायािय ; (ii) ककसी ऐसे संघ राज्यिेत्र के संबंध में, स्जस पर ककसी राज्य के उच् च न्यायािय की अधधकाररता का ववथतार ववधध द्वारा ककया गया है, वह उच् च न्यायािय ; (iii) ककसी अन्य संघ राज्यिेत्र के संबंध में, भारत के उच् चतम न्यायािय से लभन्न , उस संघ राज्यिेत्र के लिए दास्डडक अपीि का सवोच् च न्यायािय ; (ट) “जांच” से, ववचारण से लभन्न , ऐसी प्रत्येक जांच अलभप्रेत है जो इस संहहता के अधीन ककसी मस्जथरेट या न्यायािय द्वारा की जाए ; (ठ) “अन्वेर्ण” के अंतगतष वे सब कायवष ाहहयां हैं जो इस संहहता के अधीन ककसी पुलिस अधधकार द्वारा या ककसी भी ऐस े व्यस्क्ट् त (मस्जथरेट से लभन्न ) द्वारा जो मस्जथरेट द्वारा इस ननलमत्त प्राधधकृत ककया गया है, साक्ष्य एकत्र करने के लिए की जाएं । स्पष्टीकरण—जहां ककसी वविेर् अधधननयम के उपबंधों में से कोई भी इस संहहता के उपबंधों से असंगत है, वहां वविेर् अधधननयम के उपबंध अलभभावी होंगे ; (ड) “न्यानयक कायवष ाह ” के अंतगतष कोई ऐसी कायवष ाह आती है स्जसके अनुिम में साक्ष्य, ववधधक रूप से िपथ पर लिया जाता है या लिया जा सकेगा ; (ढ) ककसी न्यायािय या मस्जथरेट के संबंध में “थथानीय अधधकाररता” से वह थथानीय िेत्र अलभप्रेत है स्जसके भीतर ऐसा न्यायािय या मस्जथरेट इस संहहता के अधीन अपनी सभी या ककन्ह ं िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे थथानीय िेत्र में संपूण ष राज्य या राज्य का कोई भाग समाववष् ट हो सकेगा जो राज्य सरकार, अधधसूचना द्वारा ववननहदषष् ट करे ; (ण) “असंज्ञेय अपराध” से ऐसा अपराध अलभप्रेत है स्जसके लिए और “असंज्ञेय मामिा” स े ऐसा मामिा अलभप्रेत है स्जसमें ककसी पुलिस अधधकार को वारंट के बबना धगरफ्तार करन े का प्राधधकार नह ं है ; (त) “अधधसूचना” से राजपत्र में प्रकालित कोई अधधसूचना अलभप्रेत है ;158 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (थ) “अपराध” से कोई ऐसा काय ष या िोप अलभप्रेत है जो तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा दडडनीय बनाया गया है और इसके अंतगतष कोई ऐसा काय ष भी है स्जसके संबंध में पिु अनतचार अधधननयम, 1871 की धारा 20 के अधीन कोई 1871 का 1 पररवाद ककया जा सकेगा ; (द) “पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार ” के अंतगतष , जब पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार थाने से अनुपस्थथत है या बीमार या अन्य कारण से अपने कतव्ष यों का पािन करन े में असमथ ष है, तब थाने में उपस्थथत ऐसा पुलिस अधधकार है, जो ऐसे अधधकार से पंस्क्ट् त में ठीक नीचे है और कान्थटेबि की पंस्क्ट् त से ऊपर है, या जब राज्य सरकार ऐसा ननदेि दे तब, इस प्रकार उपस्थथत कोई अन्य पुलिस अधधकार भी है ; (ध) “थथान” के अंतगतष गहृ , भवन, तम्बू, यान और जियान भी हैं ; (न) “पुलिस ररपोटष” स े ककसी पुलिस अधधकार द्वारा धारा 193 की उपधारा (3) के अधीन मस्जथरेट को भेजी गई ररपोटष अलभप्रेत है ; (प) “पुलिस थाना” से कोई भी चौकी या थथान अलभप्रेत है स्जसे राज्य सरकार द्वारा साधारणतया या वविेर्तया पुलिस थाना घोवर्त ककया गया है और इसके अंतगतष राज्य सरकार द्वारा इस ननलमत्त ववननहदषष् ट कोई थथानीय िेत्र भी हैं ; (फ) “िोक अलभयोजक” स े धारा 18 के अधीन ननयुक्ट् त कोई व्यस्क्ट् त अलभप्रेत है और इसके अंतगषत िोक अलभयोजक के ननदेिों के अधीन काय ष करन े वािा कोई व्यस्क्ट् त भी है ; (ब) “उपिडड” से ककसी स्जि े का कोई उपिडड अलभप्रेत है ; (भ) “समन-मामिा” स े ऐसा मामिा अलभप्रेत है जो ककसी अपराध से संबंधधत है और जो वारंट-मामिा नह ं है ; (म) “पीडडत” से ऐसा व्यस्क्ट् त अलभप्रेत है स्जसे अलभयुक्ट् त के काय ष या िोप के कारण कोई हानन या िनत काररत हुई है और इसके अंतगषत ऐसे पीडडत का संरिक या ववधधक वाररस भी है ; (य) “वारंट-मामिा” से ऐसा मामिा अलभप्रेत है जो मत्ृ य,ु आजीवन कारावास या दो वर् ष से अधधक की अवधध के कारावास स े दडडनीय ककसी अपराध स े संबंधधत है । (2) उन िब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्ट् त हैं और पररभावर्त नह ं हैं, ककंतु सूचना प्रौद्ौ़योधगकी अधधननयम, 2000 और भारतीय न्याय संहहता, 2023 में पररभावर्त 2000 का 2 हैं, वह अथ ष होंगे, जो उनके उस अधधननयम और संहहता में हैं । 2023 का 45 ननदेिों का अथ ष 3. (1) जब तक संदभ ष से अन्यथा अपेक्षित न हो, ककसी ववधध में, ककसी िेत्र के िगाना । संबंध में, ककसी मस्जथरेट, बबना ककसी वविेर्क िब्दों के, प्रथम वग ष मस्जथरेट या द्ववतीय वग ष मस्जथरेट के प्रनत ककसी ननदेि का, ऐस े िेत्र में अधधकाररता का प्रयोग करने वािे, यथास्थथनत, न्यानयक मस्जथरेट प्रथम वग ष या न्यानयक मस्जथरेट द्ववतीय वग ष के प्रनतननदेि के रूप में अथ ष िगाया जाएगा । (2) जहां, इस संहहता से लभन् न ककसी ववधध के अधीन, ककसी मस्जथरेट द्वारा ककएअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 159 जा सकन े वािे कृत्य ऐसे मामिों से संबंधधत हैं,— (क) स्जनमें साक्ष्य का मलू यांकन या छानबीन या कोई ऐसा ववननश् चय करना अंतवलषित है स्जससे ककसी व्यस्क्ट् त को ककसी दंड या िास्थत की या अन्वेर्ण, जांच या ववचारण िंबबत रहने तक अलभरिा में ननरोध की संभावना हो सकती है या स्जसका प्रभाव उस े ककसी न्यायािय के समि ववचारण के लिए भेजना होगा, वहां वे कृत्य इस संहहता के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यानयक मस्जथरेट द्वारा ककए जाएंगे ; या (ि) जो प्रिासननक या कायपष ािक प्रकार के हैं जैस े अनुज्ञस्प् त का अनुदान, अनुज्ञस्प् त का ननिंबन या रद्द ककया जाना, अलभयोजन की मंजूर या अलभयोजन वापस िेना, वहां वे िंड (क) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा ककए जाएंगे । 2023 का 45 4. (1) भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अधीन सभी अपराधों का अन्वेर्ण, जांच, भार तीय न्याय ववचारण और उनके संबंध में अन्य कायवष ाह , इसमें इसके पश् चात ् अन्तववष्ष ट उपबंधों के संहहता, 2023 और अन्य अनुसार की जाएगी । ववधधयों के (2) ककसी अन्य ववधध के अधीन सभी अपराधों का अन्वेर्ण, जांच, ववचारण और अधीन अपराधों का ववचारण । उनके संबंध में अन्य कायवष ाह इन्ह ं उपबंधों के अनुसार ककंत ु ऐसे अपराधों के अन्वेर्ण, जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह की र नत या थथान का ववननयमन करन े वाि तत्समय प्रवत्तृ ककसी अधधननयलमनत के अधीन रहत े हुए, की जाएगी । 5. इससे प्रनतकूि ककसी ववननहदषष् ट उपबंध के अभाव में, इस संहहता की कोई बात, व्याव वृत्त । तत्समय प्रवत्तृ ककसी वविेर् या थथानीय ववधध पर, या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध द्वारा प्रदत्त ककसी वविेर् अधधकाररता या िस्क्ट् त या ववहहत प्रकिया के ककसी वविेर् प्ररूप पर प्रभाव नह ं डािेगी । अध्याय 2 िंड न्यायाियों और कायााियों का गठन 6. उच् च न्यायाियों और इस संहहता से लभन् न ककसी ववधध के अधीन गहठत दंड न्यायाियों के वग ष । न्यायाियों के अनतररक्ट् त, प्रत्येक राज्य में ननम् नलिखित वगों के दंड न्यायािय होंगे, अथाषत ् :— (i) सेिन न्यायािय ; (ii) प्रथम वग ष न्यानयक मस्जथरेट ; (iii) द्ववतीय वग ष न्यानयक मस्जथरेट ; और (iv) कायपष ािक मस्जथरेट । 7. (1) प्रत्येक राज्य एक सेिन िंड होगा या सेिन िंडों से लमिकर बनेगा और प्रादेल िक िंड । प्रत्येक सेिन िंड इस संहहता के प्रयोजनों के लिए एक स्जिा होगा या स्जिों स े लमिकर बनेगा । (2) राज्य सरकार, उच् च न्यायािय से परामि ष के पश् चात,् ऐसे िंडों और स्जिों की सीमाओं या संख्या में पररवतनष कर सकेगी । (3) राज्य सरकार, उच् च न्यायािय से परामि ष के पश् चात,् ककसी स्जिे को उपिंडों160 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— में ववभास्जत कर सकेगी और ऐसे उपिंडों की सीमाओ ं या संख्या में पररवतनष कर सकेगी । (4) ककसी राज्य में, इस संहहता के प्रारंभ के समय ववद्यमान सेिन िंड, स्जिे और उपिंड इस धारा के अधीन बनाए गए समझे जाएंगे । सेिन 8. (1) राज्य सरकार, प्रत्येक सेिन िंड के लिए एक सेिन न्यायािय थथावपत न्यायािय । करेगी । (2) प्रत्येक सेिन न्यायािय में एक न्यायाधीि पीठासीन होगा, जो उच् च न्यायािय द्वारा ननयुक्ट् त ककया जाएगा । (3) उच् च न्यायािय, अपर सेिन न्यायाधीिों को भी सेिन न्यायािय में अधधकाररता का प्रयोग करन े के लिए ननयुक्ट् त कर सकता है । (4) उच् च न्यायािय द्वारा एक सेिन िंड के सेिन न्यायाधीि को दसू रे िंड का अपर सेिन न्यायाधीि भी ननयुक्ट् त ककया जा सकेगा और ऐसी दिा में, वह मामिों को ननपटाने के लिए दसू रे िंड के ऐसे थथान या थथानों में बैठ सकेगा, स्जनका उच् च न्यायािय ननदेि दे । (5) जहां ककसी सिे न न्यायाधीि का पद ररक्ट् त होता है वहां उच् च न्यायािय ककसी अनत-आवश्यक आवेदन के, जो ऐस े सेिन न्यायािय के समि ककया जाता है या िंबबत है, ककसी अपर सेिन न्यायाधीि द्वारा या यहद अपर सेिन न्यायाधीि नह ं है तो सेिन िंड के मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा, ननपटाए जाने के लिए व्यवथथा कर सकेगा और ऐसे प्रत्येक न्यायाधीि या मस्जथरेट को ऐसे आवेदन पर कायवष ाह करन े की अधधकाररता होगी । (6) सेिन न्यायािय सामान्यत: अपनी बैठक ऐसे थथान या थथानों पर करेगा जो उच् च न्यायािय अधधसूचना द्वारा ववननहदषष् ट करे ; ककंतु यहद ककसी वविेर् मामिे में, सेिन न्यायािय की यह राय है कक सेिन िंड में ककसी अन्य थथान में बैठक करन े से पिकारों और साक्षियों को सुववधा होगी तो वह, अलभयोजन और अलभयुक्ट् त की सहमनत स े उस मामि े को ननपटाने के लिए या उसमें ककसी सािी या साक्षियों की पर िा करन े के लिए उस थथान पर बैठक कर सकेगा । (7) सिे न न्यायाधीि समय-समय पर ऐस े अपर सेिन न्यायाधीिों के बीच काय ष के ववतरण के संबंध में इस संहहता से संगत आदेि दे सकेगा । (8) सिे न न्यायाधीि, अपनी अनुपस्थथनत या काय ष करन े में असमथतष ा की दिा में, ककसी अनत-आवश्यक आवेदन के, अपर सेिन न्यायाधीि द्वारा या यहद कोई अपर सेिन न्यायाधीि न हो तो, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा, ननपटाए जाने के लिए भी व्यवथथा कर सकता है ; और यह समझा जाएगा कक ऐसे न्यायाधीि या मस्जथरेट को ऐसे आवेदन पर कायवष ाह करन े की अधधकाररता है । स्पष् टीकरण—इस संहहता के प्रयोजनों के लिए “ननयुस्क्ट् त” के अंतगतष सरकार द्वारा संघ या ककसी राज्य के कायकष िापों के संबंध में ककसी सेवा या पद पर ककसी व्यस्क्ट् त की प्रथम ननयुस्क्ट् त, तैनाती या प्रोन्ननत नह ं है, जहां ककसी ववधध के अधीन ऐसी ननयुस्क्ट् त, तैनाती या प्रोन्न नत सरकार द्वारा ककए जाने के लिए अपेक्षित है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 161 9. (1) प्रत्येक स्जिे में प्रथम वग ष और द्ववतीय वग ष न्यानयक मस्जथरेटों के इतने न्या नयक मस्जथरेटों के न्यायािय और ऐसे थथानों में थथावपत ककए जाएंगे स्जतने और जो राज्य सरकार, उच् च न्यायािय । न्यायािय से परामि ष के पश् चात,् अधधसूचना द्वारा ववननहदषष् ट करे : परंतु राज्य सरकार, उच् च न्यायािय से परामि ष के पश् चात,् ककसी थथानीय िेत्र के लिए प्रथम वग ष या द्ववतीय वग ष के न्यानयक मस्जथरेटों के एक या अधधक वविेर् न्यायािय, ककसी वविेर् मामिे या वविेर् वग ष के मामिों का ववचारण करन े के लिए थथावपत कर सकेगी और जहां कोई ऐसा वविेर् न्यायािय थथावपत ककया जाता है उस थथानीय िेत्र में मस्जथरेट के ककसी अन्य न्यायािय को ककसी ऐस े मामि े या ऐस े वग ष के मामिों का ववचारण करन े की अधधकाररता नह ं होगी, स्जनके ववचारण के लिए न्यानयक मस्जथरेट का ऐसा वविेर् न्यायािय थथावपत ककया गया है । (2) ऐसे न्यायाियों के पीठासीन अधधकार उच् च न्यायािय द्वारा ननयुक्ट् त ककए जाएंगे । (3) उच् च न्यायािय, जब कभी उस े यह समीचीन या आवश्यक प्रतीत हो, ककसी लसववि न्यायािय में न्यायाधीि के रूप में कायरष त राज्य की न्यानयक सेवा के ककसी सदथय को प्रथम वग ष या द्ववतीय वग ष न्यानयक मस्जथरेट की िस्क्ट् तयां प्रदान कर सकेगा । 10. (1) उच् च न्यायािय, प्रत्येक स्जिे में ककसी प्रथम वग ष न्यानयक मस्जथरेट को मुख्य न्यानयक मस्जथरेट और मुख्य न्यानयक मस्जथरेट ननयुक्ट् त करेगा । अपर मुख्य (2) उच् च न्यायािय ककसी प्रथम वग ष न्यानयक मस्जथरेट को अपर मुख्य न्यानयक न्यानयक मस्जथरेट ननयुक्ट् त कर सकेगा और ऐसे मस्जथरेट को इस संहहता के अधीन या तत्समय मस्जथरेट, आहद । प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन मुख्य न्यानयक मस्जथरेट की सभी या कोई िस्क्ट् तयां होंगी, स्जसका उच् च न्यायािय ननदेि दें । (3) उच् च न्यायािय, आवश्यकतानुसार ककसी उपिंड में ककसी प्रथम वग ष न्यानयक मस्जथरेट को उपिंड न्यानयक मस्जथरेट के रूप में पदालभहहत कर सकेगा और उस े इस धारा में ववननहदषष् ट उत्तरदानयत्वों से मुक्ट् त कर सकेगा । (4) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के साधारण ननयंत्रण के अधीन रहत े हुए प्रत्येक उपिंड न्यानयक मस्जथरेट को उपिंड में न्यानयक मस्जथरेटों (अपर मुख्य न्यानयक मस्जथरेटों से लभन्न ) के काम पर पयवष ेिण और ननयंत्रण की ऐसी िस्क्ट् तयां भी होंगी और वह उनका प्रयोग करेगा, जो उच् च न्यायािय साधारण या वविेर् आदेि द्वारा इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे । 11. (1) यहद केंद्र य या राज्य सरकार द्वारा उच् च न्यायािय से ऐसा करने के लिए ववि ेर् न्यानयक अनुरोध ककया जाता है तो वह ककसी व्यस्क्ट् त को जो सरकार के अधीन कोई पद धारण मस्जथरेट । करता है या स्जसने कोई पद धारण ककया है, ककसी थथानीय िेत्र में, ववलिष्ट मामिों या ववलिष्ट वग ष के मामिों के संबंध में प्रथम वग ष या द्ववतीय वग ष न्यानयक मस्जथरेट को इस संहहता द्वारा या इसके अधीन प्रदान की गई या प्रदान की जा सकन े वाि सभी या कोई िस्क्ट् तयां प्रदत्त कर सकेगा : परंतु ऐसी कोई िस्क्ट् त ऐसे ककसी व्यस्क्ट् त को प्रदान नह ं की जाएगी जब तक उसके पास ववधधक मामिों के संबधं में ऐसी अहषता या अनुभव नह ं है जो उच् च न्यायािय,162 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ननयमों द्वारा ववननहदषष् ट करे । (2) ऐस े मस्जथरेट वविेर् न्यानयक मस्जथरेट कहिाएंगे और एक समय में एक वर् ष से अनधधक की इतनी अवधध के लिए ननयुक्ट् त ककए जाएंगे जो उच् च न्यायािय, साधारण या वविेर् आदेि द्वारा ननदेि दे । न्यानयक 12. (1) उच् च न्यायािय के ननयंत्रण के अधीन रहत े हुए, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, मस्जथरेटों की समय-समय पर उन िेत्रों की थथानीय सीमाएं पररननस्श् चत कर सकेगा स्जनके भीतर धारा थथानीय 9 या धारा 11 के अधीन ननयुक्ट् त मस्जथरेट उन सभी िस्क्ट् तयों का या उनमें से ककन्ह ं का अधधकाररता । प्रयोग कर सकेंगे, जो इस संहहता के अधीन िमि: उनमें ववननहहत की जाएं : परंतु वविेर् न्यानयक मस्जथरेट का न्यायािय उस थथानीय िेत्र के भीतर, स्जसके लिए वह थथावपत ककया गया है, ककसी थथान में अपनी बैठक कर सकेगा । (2) ऐसे पररननश् चय द्वारा, जैसा उपबंधधत है उसके लसवाय, प्रत्येक ऐसे मस्जथरेट की अधधकाररता और िस्क्ट् तयों का ववथतार स्जिे में सवत्रष होगा । (3) जहां धारा 9 या धारा 11 के अधीन ननयुक्ट् त ककसी मस्जथरेट की थथानीय अधधकाररता का ववथतार ककसी उस स्जिे के, स्जसमें वह मामूि तौर पर न्यायािय की बैठकें करता है, बाहर ककसी िेत्र तक है वहां इस संहहता में सेिन न्यायािय या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के प्रनत ककसी ननदेि का ऐसे मस्जथरेट के संबंध में, जब तक कक संदभ ष स े अन्यथा अपेक्षित न हो, यह अथ ष िगाया जाएगा कक वह अपनी थथानीय अधधकाररता के भीतर संपूण ष िेत्र में उक्ट् त स्जिा के संबंध में अधधकाररता का प्रयोग करने वािे, यथास्थथनत, सेिन न्यायािय या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के प्रनत ननदेि है । न्यानयक 13. (1) प्रत्येक मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, सेिन न्यायाधीि के अधीनथथ होगा और मस्जथरेटों का प्रत्येक अन्य न्यानयक मस्जथरेट, सेिन न्यायाधीि के साधारण ननयंत्रण के अधीन रहत े अधीनथथ होना । हुए, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के अधीनथथ होगा । (2) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, समय-समय पर, अपने अधीनथथ न्यानयक मस्जथरेटों के बीच काय ष के ववतरण के बारे में, इस संहहता से संगत ननयम बना सकेगा या वविर्े आदेि दे सकेगा । कायपष ािक 14. (1) राज्य सरकार, प्रत्येक स्जिे में उतने व्यस्क्ट् तयों को, स्जतन े वह उधचत मस्जथरेट । समझे, कायपष ािक मस्जथरेट ननयुक्ट् त कर सकेगी और उनमें से एक को स्जिा मस्जथरेट ननयुक्ट् त करेगी । (2) राज्य सरकार, ककसी कायषपािक मस्जथरेट को अपर स्जिा मस्जथरेट ननयुक्ट् त कर सकेगी, और ऐसे मस्जथरेट को इस संहहता के अधीन या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन स्जिा मस्जथरेट की ऐसी िस्क्ट् तयां होंगी, स्जसे राज्य सरकार ननहदषष् ट करे । (3) जब कभी, ककसी स्जिा मस्जथरेट के पद की ररस्क्ट् त के पररणामथवरूप, कोई अधधकार उस स्जिे के कायपष ािक प्रिासन के लिए अथथायी रूप से उत्तरवती होता है तो ऐसा अधधकार , राज्य सरकार द्वारा आदेि हदए जाने तक, िमिः उन सभी िस्क्ट् तयों का प्रयोग और उन सभी कतव्ष यों का पािन करेगा जो इस संहहता द्वारा स्जिा मस्जथरेट को प्रदत्त और अधधरोवपत की जाएं । (4) राज्य सरकार, आवश्यकतानुसार, ककसी कायपष ािक मस्जथरेट को उपिंड का भारसाधक बना सकेगी और उसको भारसाधन से मुक्ट् त कर सकेगी तथा इस प्रकार ककसीअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 163 उपिंड का भारसाधक बनाया गया मस्जथरेट, उपिंड मस्जथरेट कहिाएगा । (5) राज्य सरकार, साधारण या वविेर् आदेि द्वारा तथा ऐसे ननयंत्रण और ननदेिों के अधीन रहत े हुए, जो वह अधधरोवपत करना ठीक समझे, उपधारा (4) के अधीन अपनी िस्क्ट् तयां, स्जिा मस्जथरेट को प्रत्यायोस्जत कर सकेगी । (6) इस धारा की कोई बात, तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन, कायपष ािक मस्जथरेट की सभी िस्क्ट् तयां या उनमें स े कोई िस्क्ट् त पुलिस आयुक्ट् त को प्रदत्त करन े स े राज्य सरकार को ननवाररत नह ं करेगी । 15. राज्य सरकार, ववलिष् ट िेत्रों के लिए या ववलिष् ट कृत्यों का पािन करन े के ववि ेर् लिए कायपष ािक मस्जथरेट या ऐसे ककसी पुलिस अधधकार को, जो पुलिस अधीिक की कायपष ािक मस्जथरेट । पंस्क्ट्त से नीचे का न हो या समतुलय को, जो वविेर् कायपष ािक मस्जथरेट के रूप में ज्ञात होंगे, इतनी अवधध के लिए स्जतनी वह उधचत समझे, ननयुक्ट् त कर सकेगी और इस संहहता के अधीन कायपष ािक मस्जथरेटों को प्रदत्त की जा सकन े वाि िस्क्ट् तयों में स े ऐसी िस्क्ट् तयां, स्जन्हें वह उधचत समझे, इन वविेर् कायपष ािक मस्जथरेटों को प्रदत्त कर सकेगी । 16. (1) राज्य सरकार के ननयंत्रण के अधीन रहत े हुए स्जिा मस्जथरेट, समय-समय काय पष ािक पर, उन िेत्रों की थथानीय सीमाएं पररननस्श् चत कर सकेगा स्जनके भीतर कायपष ािक मस्जथरेटों की थथानीय मस्जथरेट उन सभी िस्क्ट् तयों का या उनमें से ककन्ह ं का प्रयोग कर सकेंगे, जो इस संहहता अधधकाररता । के अधीन उनमें ववननहहत की जाएं । (2) ऐसे पररननश् चय द्वारा, जैसा उपबंधधत है उसके लसवाय, प्रत्येक ऐसे मस्जथरेट की अधधकाररता और िस्क्ट् तयों का ववथतार स्जिे में सवत्रष होगा । 17. (1) सभी कायपष ािक मस्जथरेट, स्जिा मस्जथरेट के अधीनथथ होंगे और ककसी काय पष ािक मस्जथरेटों का उपिंड में िस्क्ट्तयों का प्रयोग करने वािा प्रत्येक कायपष ािक मस्जथरेट (उपिंड मस्जथरेट अधीनथथ होना । से लभन्न ), स्जिा मस्जथरेट के साधारण ननयंत्रण के अधीन रहत े हुए, उपिंड मस्जथरेट के भी अधीनथथ होगा । (2) स्जिा मस्जथरेट, समय-समय पर, अपने अधीनथथ कायपष ािक मस्जथरेटों के बीच काय ष के ववतरण या आबंटन के बारे में इस संहहता से संगत ननयम बना सकेगा या वविेर् आदेि दे सकेगा । 18. (1) प्रत्येक उच् च न्यायािय के लिए, केंद्र य सरकार या राज्य सरकार उस उच् च िोक अलभयोजक । न्यायािय से परामि ष के पश्च ात,् यथास्थथनत, केंद्र य या राज्य सरकार की ओर स े ऐसे न्यायािय में ककसी अलभयोजन, अपीि या अन्य कायवष ाह के संचािन के लिए एक िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त करेगी और एक या अधधक अपर िोक अलभयोजक भी ननयुक्ट् त कर सकेगी : परंतु राष्र य राजधानी राज्यिेत्र हदलि के संबंध में, केंद्र य सरकार हदलि उच्च न्यायािय से परामि ष के पश्चात,् इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजकों की ननयुस्क्ट्त करेगी । (2) केंद्र य सरकार, ककसी स्जिे या थथानीय िेत्र में ककसी मामि े का संचािन करने के प्रयोजनों के लिए एक या अधधक िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त कर सकेगी ।164 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (3) राज्य सरकार, प्रत्येक स्जिे के लिए, एक िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त करेगी और स्जिे के लिए एक या अधधक अपर िोक अलभयोजक भी ननयुक्ट् त कर सकेगी : परंतु एक स्जिे के लिए ननयुक्ट् त ककया गया िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक, ककसी अन्य स्जिे के लिए भी, यथास्थथनत, िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त ककया जा सकेगा । (4) स्जिा मस्जथरेट, सिे न न्यायाधीि के परामि ष से, ऐसे व्यस्क्ट् तयों के नामों का एक पैनि तैयार करेगा जो उसकी राय में, उस स्जि े के लिए िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त ककए जाने के योग्य हैं । (5) कोई व्यस्क्ट् त, राज्य सरकार द्वारा स्जिे के लिए िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक तब तक ननयुक्ट् त नह ं ककया जाएगा जब तक कक उसका नाम उपधारा (4) के अधीन स्जिा मस्जथरेट द्वारा तैयार ककए गए नामों के पैनि में न हो । (6) उपधारा (5) में ककसी बात के होत े हुए भी, जहां ककसी राज्य में अलभयोजन अधधकाररयों का ननयलमत काडर है वहां राज्य सरकार, ऐसा काडर गहठत करने वािे व्यस्क्ट् तयों में से ह िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त करेगी : परंतु जहां, राज्य सरकार की राय में ऐसे काडर में से कोई उपयुक्ट् त व्यस्क्ट् त ऐसी ननयुस्क्ट् त के लिए उपिब्ध नह ं है वहां वह सरकार उपधारा (4) के अधीन स्जिा मस्जथरेट द्वारा तैयार ककए गए नामों के पैनि में से, यथास्थथनत, िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक के रूप में ककसी व्यस्क्ट् त को ननयुक्ट् त कर सकेगी । स्पष् टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए,— (क) “अलभयोजन अधधकाररयों का ननयलमत काडर” से अलभयोजन अधधकाररयों का वह काडर अलभप्रेत है, स्जसमें िोक अलभयोजक का पद चाहे वह ककसी भी नाम से ज्ञात हो, सस्म्मलित है, और स्जसमें सहायक िोक अलभयोजक की, चाहे वह ककसी भी नाम से ज्ञात हो, प्रोन्न नत के लिए उपबंध ककया गया है,; (ि) “अलभयोजन अधधकार ” से इस संहहता के अधीन िोक अलभयोजक, वविेर् िोक अलभयोजक, अपर िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजक के कृत्यों का पािन करन े के लिए ननयुक्ट् त ककया गया व्यस्क्ट् त अलभप्रेत है, चाहे वह ककसी भी नाम से ज्ञात हो । (7) कोई व्यस्क्ट् त उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) या उपधारा (6) के अधीन िोक अलभयोजक या अपर िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त ककए जाने का पात्र तभी होगा जब वह कम से कम सात वर् ष तक अधधवक्ट् ता के रूप में ववधध व्यवसाय करता रहा हो । (8) केंद्र य सरकार या राज्य सरकार ककसी मामिे या ककसी वग ष के मामिों के प्रयोजनों के लिए ककसी व्यस्क्ट्त को, जो अधधवक्ट्ता के रूप में कम से कम दस वर् ष तक ववधध व्यवसाय करता रहा हो, वविेर् िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त कर सकेगी : परंतु न्यायािय इस उपधारा के अधीन पीडडत को, अलभयोजन की सहायता करने के लिए अपनी पसंद का अधधवक्ट् ता रिन े के लिए अनुज्ञात कर सकेगा । (9) उपधारा (7) और उपधारा (8) के प्रयोजनों के लिए, वह अवधध, स्जसके दौरान ककसी व्यस्क्ट् त ने अधधवक्ट्ता के रूप में ववधध व्यवसाय ककया है या िोक अलभयोजक याअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 165 अपर िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजक या अन्य अलभयोजन अधधकार के रूप में, चाहे वह ककसी भी नाम से ज्ञात हो, सेवा की है (चाहे इस संहहता के प्रारंभ के पहिे या पश् चात)् यह समझा जाएगा कक वह ऐसी अवधध है स्जसके दौरान ऐसे व्यस्क्ट् त ने अधधवक्ट् ता के रूप में ववधध व्यवसाय ककया है । 19. (1) राज्य सरकार, प्रत्येक स्जिे में मस्जथरेटों के न्यायाियों में अलभयोजन का सहा यक िोक अलभयोजक । संचािन करन े के लिए एक या अधधक सहायक िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त करेगी । (2) केंद्र य सरकार, मस्जथरेटों के न्यायाियों में ककसी मामिे या मामिों के वगष के संचािन के प्रयोजनों के लिए एक या अधधक सहायक िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त कर सकेगी । (3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में अंतववष्ष ट उपबंधों पर प्रनतकूि प्रभाव डाि े बबना, जहां कोई सहायक िोक अलभयोजक ककसी ववलिष् ट मामि े के प्रयोजनों के लिए उपिब्ध नह ं है, वहां स्जिा मस्जथरेट, राज्य सरकार को चौदह हदन की सूचना देने के पश्चात,् ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को उस मामि े का भारसाधक सहायक िोक अलभयोजक ननयुक्ट् त कर सकता है : परंतु कोई पुलिस अधधकार , सहायक िोक अलभयोजक के रूप में ननयुक्ट्त ककए जाने के लिए पात्र नह ं होगा,— (क) यहद उसने उस अपराध के अन्वेर्ण में कोई भाग लिया है, स्जसके संबंध में अलभयुक्ट्त अलभयोस्जत ककया जा रहा है; या (ि) यहद वह ननर िक की पंस्क्ट् त से नीचे का है । 20. (1) राज्य सरकार,— अलभ योजन ननदेिािय । (क) राज्य में एक अलभयोजन ननदेिािय थथावपत कर सकेगी, स्जसमें एक अलभयोजन ननदेिक और उतने अलभयोजन उपननदेिक हो सकेंगे, जैसा वह ठीक समझे ; और (ि) प्रत्येक स्जिे के स्जिा अलभयोजन ननदेिािय में उतने अलभयोजन उप- ननदेिक और अलभयोजन सहायक ननदेिक हो सकेंगे, जैसा वह ठीक समझे । (2) कोई व्यस्क्ट् त,— (क) अलभयोजन ननदेिक या अलभयोजन उप-ननदेिक के रूप में ननयुस्क्ट् त के लिए तभी पात्र होगा यहद वह अधधवक्ट् ता के रूप में कम-से-कम पंद्रह वर् ष तक व्यवसाय में रहा है, सेिन न्यायाधीि है या रहा है ; और (ि) अलभयोजन सहायक ननदेिक के रूप में ननयुस्क्ट्त के लिए तभी पात्र होगा यहद वह अधधवक्ट्ता के रूप में कम स े कम सात वर् ष तक व्यवसाय में रहा हो या प्रथम वग ष मस्जथरेट रहा हो । (3) अलभयोजन ननदेिािय का प्रधान अलभयोजन ननदेिक होगा, जो राज्य में गहृ ववभाग के प्रिासननक ननयंत्रण के अधीन कृत्य करेगा । (4) प्रत्येक अलभयोजन उप-ननदेिक या अलभयोजन सहायक ननदेिक, अलभयोजन ननदेिक के अधीनथथ होगा ; और प्रत्येक अलभयोजन सहायक ननदेिक, अलभयोजन उप- ननदेिक के अधीनथथ होगा ।166 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (5) उच् च न्यायाियों में मामिों का संचािन करन े के लिए, धारा 18 की उपधारा (1) या उपधारा (8) के अधीन राज्य सरकार द्वारा ननयुक्ट् त प्रत्येक िोक अलभयोजक, अपर िोक अलभयोजक और वविेर् िोक अलभयोजक, अलभयोजन ननदेिक के अधीनथथ होंगे । (6) धारा 18 की उपधारा (3) या उपधारा (8) के अधीन स्जिा न्यायाियों में मामिों का संचािन करन े के लिए राज्य सरकार द्वारा ननयुक्ट् त प्रत्येक िोक अलभयोजक, अपर िोक अलभयोजक और वविेर् िोक अलभयोजक, और धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन ननयुक्ट् त प्रत्येक सहायक िोक अलभयोजक, अलभयोजन उप-ननदेिक, अलभयोजन सहायक ननदेिक के अधीनथथ होंगे । (7) अलभयोजन ननदेिक की िस्क्ट् तयां और कृत्य, ऐसे मामिों की कायवष ाहहयों के िीघ्र ननपटारे के लिए तथा अपीि फाइि करने पर राय देने के लिए मानीटर करना होगा, स्जसमें अपराध दस वर् ष या उससे अधधक या आजीवन कारावास या मत्ृ यु से दंडनीय है । (8) अलभयोजन उप-ननदेिक की िस्क्ट्तयां और कृत्य ऐसे मामिों में स्जनमें अपराध सात वर् ष या उससे अधधक के लिए दंडनीय है, ककंतु दस वर् ष से कम हो, उनके त्वररत ननपटान को सुननस्श्चत करने के लिए पुलिस ररपोटष की पर िा करना और संवीिा करना तथा मानीटर करना होगा । (9) अलभयोजन सहायक ननदेिक के कृत्य ऐसे मामिों का मानीटर करना होगा, स्जनमें कोई अपराध सात वर् ष से कम के लिए दंडनीय है । (10) उपधारा (7), उपधारा (8) और उपधारा (9) में अंतववष्ष ट ककसी बात के होते हुए भी, अलभयोजन का ननदेिक, उप-ननदेिक या सहायक ननदेिक को, इस संहहता के अधीन सभी कारषवाइयों के लिए संव्यवहार करने की िस्क्ट्त होगी और उसके लिए दायी होंगे । (11) अलभयोजन ननदेिक, अलभयोजन उप-ननदेिक या अलभयोजन सहायक ननदेिक की अन्य िस्क्ट्तयां और कृत्य और वह िेत्र, स्जसके लिए प्रत्येक अलभयोजन उप-ननदेिक या अलभयोजन सहायक ननदेिक ननयुक्ट्त ककया गया है, वह होगा, स्जसे राज्य सरकार, अधधसूचना द्वारा, ननहदषष्ट करे । (12) इस धारा के उपबंध, िोक अलभयोजक के कृत्यों का पािन करते समय, राज्य के महाधधवक्ट् ता पर िागू नह ं होंगे । अध्याय 3 न्यायाियों की शक्‍ त न्यायािय, 21. इस संहहता के अन्य उपबंधों के अधीन रहत े हुए,— स्जनके द्वारा (क) भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अधीन ककसी अपराध का ववचारण 2023 का 45 अपराध ननम्नलिखित के द्वारा ककया जा सकेगा— ववचारणीय ह ैं । (i) उच् च न्यायािय ; या (ii) सेिन न्यायािय ; या (iii) ककसी अन्य न्यायािय, स्जसके द्वारा ऐस े अपराध का ववचारणीय होना प्रथम अनुसूची में दिाषया गया है :अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 167 2023 का 45 परंतु भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70 या धारा 71 के अधीन ककसी अपराध का ववचारण यथासाध्य ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जाएगा, स्जसमें महहिा पीठासीन हो ; (ि) ककसी अन्य ववधध के अधीन ककसी अपराध का ववचारण, जब ऐसी ववधध में इस ननलमत्त कोई न्यायािय उस्लिखित है, तब ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जाएगा और जब कोई न्यायािय इस प्रकार उस्लिखित नह ं है तब उसका ववचारण ननम्नलिखित द्वारा ककया जा सकेगा— (i) उच् च न्यायािय ; या (ii) कोई अन्य न्यायािय, स्जसके द्वारा ऐसे अपराध का ववचारणीय होना प्रथम अनुसूची में दिाषया गया है । 22. (1) उच् च न्यायािय, ववधध द्वारा प्राधधकृत कोई दंडादेि दे सकेगा । दंडाद ेि, जो (2) सेिन न्यायाधीि या अपर सेिन न्यायाधीि, ववधध द्वारा प्राधधकृत कोई भी उच् च न्यायािय और सेिन दंडादेि दे सकेगा ; ककंतु ऐसे ककसी न्यायाधीि द्वारा हदया गया मत्ृ य ु दंडादेि, उच् च न्यायाधीि दे न्यायािय द्वारा अलभपुष् ट ककए जाने के अध्यधीन होगा । सकेंगे । 23. (1) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट का न्यायािय, मत्ृ यु या आजीवन कारावास या दंडाद ेि, जो सात वर् ष से अधधक की अवधध के लिए कारावास के दंडादेि के लसवाय, ववधध द्वारा मस्जथरेट दे सकेंगे । प्राधधकृत कोई दंडादेि दे सकेगा । (2) प्रथम वग ष मस्जथरेट का न्यायािय, तीन वर् ष से अनधधक अवधध के लिए कारावास का या पचास हजार रुपए से अनधधक जुमाषने का, या दोनों का, या सामुदानयक सेवा का, दंडादेि दे सकेगा । (3) द्ववतीय वग ष मस्जथरेट का न्यायािय, एक वर् ष से अनधधक अवधध के लिए कारावास का या दस हजार रुपए स े अनधधक जुमाषने का, या दोनों का, या सामुदानयक सेवा का, दंडादेि दे सकेगा । स्पष्टीकरण—“सामुदानयक सेवा” से ऐसा काय ष अलभप्रेत है, स्जसको ककसी दोर्लसद्ध व्यस्क्ट्त को दंड के ऐसे रूप में करने के लिए न्यायािय आदेि करे, जो समुदाय के िाभ के लिए हो, स्जसके लिए वह ककसी पाररश्रलमक का हकदार नह ं होगा । 24. (1) ककसी मस्जथरेट का न्यायािय जुमाषना देने में व्यनतिम होने पर इतनी जुम ाषना देने में अवधध का कारावास अधधननणीत कर सकेगा, जो ववधध द्वारा प्राधधकृत है : व्यनतिम होने पर कारावास परंतु वह अवधध— का दंडादेि । (क) धारा 23 के अधीन मस्जथरेट की िस्क्ट् त स े अधधक की न हो ; (ि) जहां कारावास मुख्य दंडादेि के भाग के रूप में अधधननणीत ककया गया है, वहां वह उस कारावास की अवधध के चौथाई से अधधक की नह ं होगी स्जसको मस्जथरेट, जुमाषना देने में व्यनतिम होने पर दंडादेि के रूप में स े अन्यथा उस अपराध के लिए अधधरोवपत करने के लिए सिम है । (2) इस धारा के अधीन अधधननणीत कारावास, धारा 23 के अधीन मस्जथरेट द्वारा अधधननणीत की जा सकन े वाि अधधकतम अवधध के कारावास के मुख्य दंडादेि के अनतररक्ट् त हो सकेगा ।168 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— एक ह ववचारण 25. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त एक ह ववचारण में दो या अधधक अपराधों के लिए में कई अपराधों दोर्लसद्ध ककया जाता है तब न्यायािय, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 9 के 2023 का 45 के लिए उपबंधों के अधीन रहते हुए, उस े ऐस े अपराधों के लिए ववहहत ववलभन्न दंडों में स े उन दंडों दोर्लसद्ध होने के लिए, स्जन्हें देने के लिए ऐसा न्यायािय सिम है, दंडादेि दे सकेगा ; और न्यायािय, के मामिों में अपराधों की गंभीरता पर ववचार करते हुए, ऐसे दंडादेि साथ-साथ या िमवती रूप से दंडादेि । भोगने का आदेि देगा । (2) दंडादेिों के िमवती होने की दिा में, केवि इस कारण से कक कई अपराधों के लिए संकलित दंड उस दंड स े अधधक है जो वह न्यायािय एक अपराध के लिए दोर्लसद्धध पर देने के लिए सिम है, न्यायािय के लिए यह आवश्यक नह ं होगा कक अपराधी को उच् चतर न्यायािय के समि ववचारण के लिए भेजे : परंतु— (क) ककसी भी दिा में, ऐसा व्यस्क्ट् त बीस वर् ष स े अधधक की अवधध के कारावास के लिए दंडाहदष् ट नह ं ककया जाएगा ; (ि) संकलित दंड, उस दंड की मात्रा के दगु न े स े अधधक नह ं होगा स्जस े एक अपराध में देने के लिए वह न्यायािय सिम है । (3) ककसी लसद्धदोर् व्यस्क्ट् त द्वारा अपीि के प्रयोजन के लिए, उन िमवती दंडादेिों का योग, जो इस धारा के अधीन उसके ववरुद्ध हदए गए हैं, एक दंडादेि समझा जाएगा । िस्क्ट् तया ं प्रदान 26. (1) इस संहहता के अधीन िस्क्ट् तयां प्रदान करन े में, यथास्थथनत, उच् च करन े का ढंग । न्यायािय या राज्य सरकार आदेि द्वारा, व्यस्क्ट् तयों को वविेर्तया नाम से या उनके पद के आधार पर या पदधाररयों के वगों को साधारणतया उनके पद य अलभधानों से, सिक्ट्त कर सकेगी । (2) ऐसा प्रत्येक आदेि उस तार ि से प्रभावी होगा स्जस तार ि को वह ऐसे सिक्ट् त ककए गए व्यस्क्ट् त को संसूधचत ककया जाता है । ननयुक्ट् त 27. सरकार की सेवा में पद धारण करने वािा ऐसा व्यस्क्ट् त, स्जसमें, उच् च अधधकाररयों की न्यायािय या राज्य सरकार द्वारा, इस संहहता के अधीन कोई िस्क्ट् त ककसी समग्र िस्क्ट् तया ं । थथानीय िेत्र के लिए ननहहत की गई हैं, जब कभी उसी प्रकार के समान या उच् चतर पद पर उसी राज्य सरकार के अधीन वैसे ह थथानीय िेत्र के भीतर ननयुक्ट् त ककया जाता है, तब वह, जब तक, यथास्थथनत, उच् च न्यायािय या राज्य सरकार अन्यथा ननदेि न दे या न दे चुकी हो, उस थथानीय िेत्र में, स्जसमें वह ऐसे ननयुक्ट् त ककया गया है, उन्ह ं िस्क्ट् तयों का प्रयोग करेगा । िस्क्ट् तयों को 28. (1) यथास्थथनत, उच् च न्यायािय या राज्य सरकार, उन सब िस्क्ट् तयों को या वापस िेना । उनमें से ककसी को वापस ि े सकेगी जो उसने या उसके अधीनथथ ककसी अधधकार ने ककसी व्यस्क्ट् त को इस संहहता के अधीन प्रदान की हैं । (2) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या स्जिा मस्जथरेट द्वारा प्रदत्त ककन्ह ं िस्क्ट् तयों को संबंधधत मस्जथरेट द्वारा वापस लिया जा सकेगा स्जसके द्वारा व े िस्क्ट् तयां प्रदान की गई थी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 169 29. (1) इस संहहता के अन्य उपबंधों के अधीन रहत े हुए, ककसी न्यायाधीि या न्या याधीिों मस्जथरेट की िस्क्ट् तयों का प्रयोग और कतव्ष यों का पािन उसके पद-उत्तरवती द्वारा ककया और मस्जथरेटों की िस्क्ट्त यों जा सकेगा । का उनके पद- (2) जब इस बारे में कोई िकं ा है कक पद-उत्तरवती कौन है तब सेिन न्यायाधीि उत्तरवनतयष ों लिखित आदेि द्वारा यह अवधाररत करेगा कक कौन सा न्यायाधीि, इस संहहता के या द्वारा प्रयोग इसके अधीन ककन्ह ं कायवष ाहहयों या आदेिों के प्रयोजनों के लिए पद-उत्तरवती समझा ककया जा सकना । जाएगा । (3) जब इस बारे में कोई िंका है कक ककसी मस्जथरेट का पद-उत्तरवती कौन है तब, यथास्थथनत, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या स्जिा मस्जथरेट लिखित आदेि द्वारा यह अवधाररत करेगा कक कौन सा मस्जथरेट इस संहहता के, या इसके अधीन ककन्ह ं कायवष ाहहयों या आदेिों के प्रयोजनों के लिए ऐसे मस्जथरेट का पद-उत्तरवती समझा जाएगा । अध्याय 4 िररष् ठ पुलिस अधिकाररयों की शक्‍ तयां और मक्िस्रेट तथा पुलिस को सिायता 30. पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार से पंस्क्ट् त में वररष् ठ पुलिस अधधकार , वररष् ठ पुलिस सवत्रष थथानीय िेत्र में, स्जसमें वे ननयुक्ट् त हैं, उन िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकेंगे स्जनका अधधकाररयों की िस्क्ट् तया ं । प्रयोग अपने थाने की सीमाओं के भीतर ऐसे अधधकार द्वारा ककया जा सकेगा । 31. प्रत्येक व्यस्क्ट् त, ऐसे मस्जथरेट या पुलिस अधधकार की सहायता करन े के लिए जनत ा कब आबद्ध है, जो ननम् नलिखित कायों में उधचत रूप से उसकी सहायता मांगता है,— मस्जथरेट और पुलिस की (क) ककसी अन्य ऐस े व्यस्क्ट् त को, स्जसे ऐसा मस्जथरेट या पुलिस अधधकार सहायता करेगी । धगरफ्तार करने के लिए प्राधधकृत है, पकडना या उसका ननकि भागने से रोकना ; या (ि) िास्न्त भंग का ननवारण या दमन ; या (ग) ककसी िोक संपवत्त को िनत पहुंचाने के प्रयत्न का ननवारण । 32. जब कोई वारंट, पुलिस अधधकार से लभन्न ककसी व्यस्क्ट् त को ननदेलित है तब पुलि स अधधकार कोई भी अन्य व्यस्क्ट् त उस वारंट के ननष्पादन में सहायता कर सकेगा यहद वह व्यस्क्ट् त, से लभन् न ऐसे व्यस्क्ट् त को स्जसे वारंट ननदेलित है, पास में है और वारंट के ननष्पादन में काय ष कर रहा है । सहायता जो वारंट का ननष्पादन कर रहा है । 2023 का 45 33. (1) प्रत्येक व्यस्क्ट् त, जो भारतीय न्याय संहहता, 2023 की ननम् नलिखित कुछ अपराधों धाराओं में से ककसी के अधीन दंडनीय ककसी अपराध के ककए जाने से या ककसी अन्य की सूचना जनता द्वारा व्यस्क्ट् त द्वारा करने के आिय से अवगत है, अथाषत:्— हदया जाना । (i) धारा 103 से धारा 105 (दोनों सहहत) ; (ii) धारा 111 स े धारा 113 (दोनों सहहत) ; (iii) धारा 140 से धारा 144 (दोनों सहहत) ;170 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (iv) धारा 147 से धारा 154 (दोनों सहहत) और धारा 158 ; (v) धारा 178 स े धारा 182 (दोनों सहहत) ; (vi) धारा 189 और धारा 191 ; (vii) धारा 274 से धारा 280 (दोनों सहहत) ; (viii) धारा 307 ; (ix) धारा 309 से धारा 312 (दोनों सहहत) ; (x) धारा 316 की उपधारा (5) ; (xi) धारा 326 से धारा 328 (दोनों सहहत) ; और (xii) धारा 331 और धारा 332, उधचत प्रनतहेतु के अभाव में, स्जसे साबबत करन े का भार इस प्रकार अवगत व्यस्क्ट् त पर होगा, ऐसे ककए जाने या आिय की सूचना तुरंत ननकटतम मस्जथरेट या पुलिस अधधकार को देगा ौ़। (2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “अपराध” पद के अंतगतष भारत के बाहर ककसी थथान में ककया गया कोई ऐसा काय ष भी है जो यहद भारत में ककया जाता तो अपराध होता । ग्राम के मामिों 34. (1) ककसी ग्राम के मामिों के संबंध में ननयोस्जत प्रत्येक अधधकार और ग्राम में के संबंध में ननवास करन े वािा प्रत्येक व्यस्क्ट् त, ननकटतम मस्जथरेट को या ननकटतम पुलिस थाने के ननयोस्जत भारसाधक अधधकार को, जो भी ननकटतर हो, कोई भी जानकार जो उसके पास अधधकाररयों का ननम् नलिखित के बारे में हो, तत्काि संसूधचत करेगा,— कनतपय ररपोटष करन े का (क) ऐसे ग्राम में या ऐसे ग्राम के पास ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त का, जो चुराई हुई कतव्ष य । संपवत्त का कुख्यात प्रापक या वविेता है, थथायी या अथथायी ननवास ; (ि) ककसी व्यस्क्ट् त का, स्जसका वह िुटेरा, ननकि भागा लसद्धदोर् या उद्घ ोवर्त अपराधी होना जानता है या स्जसके ऐसा होने का उधचत रूप से संदेह करता है, ऐसे ग्राम के ककसी भी थथान में आना-जाना या उसमें से होकर जाना ; (ग) ऐस े ग्राम में या उसके ननकट कोई अजमानतीय अपराध या भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 189 और धारा 191 के अधीन दंडनीय कोई अपराध 2023 का 45 ककया जाना या करन े का आिय ; (घ) ऐस े ग्राम में या उसके ननकट कोई आकस्थमक या अप्राकृनतक मत्ृ यु होना, या सन्देहजनक पररस्थथनतयों में कोई मत्ृ य ु होना, या ऐसे ग्राम में या उसके ननकट ककसी िव का, या िव के अगं का ऐसी पररस्थथनतयों में, स्जनसे उधचत रूप से संदेह पैदा होता है कक ऐसी मत्ृ यु हुई, पाया जाना, या ऐस े ग्राम स े ककसी व्यस्क्ट् त का, ऐसी पररस्थथनतयों में स्जनसे उधचत रूप से संदेह पैदा होता है कक ऐसे व्यस्क्ट् त के संबंध में अजमानतीय अपराध ककया गया है, गायब हो जाना ; (ङ) ऐसे ग्राम के ननकट, भारत के बाहर ककसी थथान में ऐसा कोई काय ष ककया जाना या करने का आिय जो यहद भारत में ककया जाता तो भारतीय न्याय संहहता, 2023 का 45 2023 की ननम्नलिखित धाराओं, अथाषत—् धारा 103, धारा 105, धारा 111, धारा 112, धारा 113, धारा 178 से धारा 181 (दोनों सहहत), धारा 305, धारा 307,अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 171 धारा 309 से धारा 312 (दोनों सहहत), धारा 326 के िंड (च) और िंड (छ), धारा 331 या धारा 332 में से ककसी के अधीन दंडनीय अपराध होता ; (च) व्यवथथा बनाए रिने या अपराध के ननवारण या व्यस्क्ट् त या संपवत्त की सुरिा पर संभाव्यता प्रभाव डािने वािा कोई ववर्य स्जसके संबंध में स्जिा मस्जथरेट ने राज्य सरकार की पूव ष मंजूर से ककए गए साधारण या वविेर् आदेि द्वारा उस े ननदेि हदया है कक वह उस ववर्य पर जानकार संसूधचत करे । (2) इस धारा में,— (i) “ग्राम” के अंतगतष ग्राम-भूलमयां भी हैं ; (ii) “उद् घोवर्त अपराधी” पद के अंतगतष ऐसा व्यस्क्ट् त भी है, स्जसे भारत के ककसी ऐसे राज्यिेत्र में, स्जस पर इस संहहता का ववथतार नह ं है, ककसी न्यायािय या प्राधधकार ने ककसी ऐसे काय ष के बारे में, अपराधी उद्घ ोवर्त ककया है, जो यहद उन राज्यिेत्रों में, स्जन पर इस संहहता का ववथतार है, ककया जाता तो भारतीय 2023 का 45 न्याय संहहता, 2023 के अधीन दस वर् ष या उससे अधधक के कारावास या आजीवन कारावास या मत्ृ यु से दंडनीय होता ; (iii) “ग्राम के मामिों के संबधं में ननयोस्जत अधधकार ” िब्दों से ग्राम पंचायत का कोई सदथय अलभप्रेत है और इसके अंतगषत मुखिया और प्रत्येक ऐसा अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त भी है, जो ग्राम के प्रिासन के संबंध में ककसी कृत्य का पािन करन े के लिए ननयुक्ट् त ककया गया है । अध्याय 5 व्यक्‍ तयों की धगरफ्तारी 35. (1) कोई पुलिस अधधकार , मस्जथरेट के आदेि के बबना और वारंट के बबना पुलि स वारंट के ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार कर सकता है— बबना कब धगरफ्तार कर (क) जो पुलिस अधधकार की उपस्थथनत में संज्ञेय अपराध करता है ; या सकेगी । (ि) स्जसके ववरुद्ध इस बारे में उधचत पररवाद ककया जा चुका है या ववश् वसनीय सूचना प्राप् त हो चुकी है या उधचत संदेह ववद्यमान है कक उसने कारावास से, स्जसकी अवधध सात वर् ष से कम की हो सकेगी या स्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो सकेगी, चाहे वह जुमाषन े सहहत हो या जुमाषने के बबना, दंडनीय संज्ञेय अपराध ककया है, यहद ननम् नलिखित ितें पूर कर द जाती हैं, अथाषत ् — (i) पुलिस अधधकार के पास ऐसे पररवाद, सूचना या संदेह के आधार पर यह ववश् वास करन े का कारण है कक उस व्यस्क्ट् त ने उक्ट् त अपराध ककया है ; (ii) पुलिस अधधकार का यह समाधान हो गया है कक ऐसी धगरफ्तार — (क) ऐस े व्यस्क्ट् त को कोई और अपराध करन े स े रोकन े के लिए ; या (ि) अपराध के समुधचत अन्वेर्ण के लिए ; या (ग) ऐसे व्यस्क्ट् त को ऐसे अपराध के साक्ष्य को गायब करने या ऐसे साक्ष्य के साथ ककसी भी र नत में छेडछाड करन े से रोकन े के लिए ; या (घ) उस व्यस्क्ट् त को, ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को, जो मामि े के तथ्यों172 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— से पररधचत है, उत् प्रेररत करन,े उस े धमकी देने या उसको वचन देने से, स्जससे उस े न्यायािय या पुलिस अधधकार को ऐस े तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाया जा सके, रोकने के लिए ; या (ङ) जब तक ऐसे व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार नह ं कर लिया जाता है, न्यायािय में उसकी उपस्थथनत, जब भी अपेक्षित हो, सुननस्श्च त नह ं की जा सकती, आवश्यक है और पुलिस अधधकार ऐसी धगरफ्तार करते समय अपने कारणों को िेिबद्ध करेगा : परंतु कोई पुलिस अधधकार , ऐसे सभी मामिों में, जहां ककसी व् यस्क्ट् त की धगरफ्तार इस उपधारा के उपबंधों के अधीन अपेक्षित नह ं है, धगरफ्तार न करने के कारणों को िेिबद्ध करेगा ; या (ग) स्जसके ववरुद्ध ववश् वसनीय सूचना प्राप् त हो चुकी है कक उसने कारावास से, स्जसकी अवधध सात वर्ष से अधधक की हो सकेगी, चाहे वह जुमाषने सहहत हो या जुमाषने के बबना, या मत्ृ यु दंडादेि से दंडनीय संज्ञेय अपराध ककया है और पुलिस अधधकार के पास उस सूचना के आधार पर यह ववश् वास करन े का कारण है कक उस व्यस्क्ट् त ने उक्ट् त अपराध ककया है ; या (घ) जो या तो इस संहहता के अधीन या राज्य सरकार के आदेि द्वारा अपराधी उद्घ ोवर्त ककया जा चुका है ; या (ङ) स्जसके कब्जे में कोई ऐसी चीज पाई जाती है स्जसके चुराई हुई संपवत्त होने का उधचत रूप से संदेह ककया जा सकता है और स्जस पर ऐसी चीज के बारे में अपराध करन े का उधचत रूप से संदेह ककया जा सकता है ; या (च) जो पुलिस अधधकार को उस समय बाधा पहुंचाता है जब वह अपना कतव्ष य कर रहा है, या जो ववधधपूण ष अलभरिा से ननकि भागा है या ननकि भागने का प्रयत् न करता है ; या (छ) स्जस पर संघ के सिथ त्र बिों में से ककसी से अलभत्याजक होने का उधचत संदेह है ; या (ज) जो भारत से बाहर ककसी थथान में ककसी ऐसे काय ष ककए जाने से, जो यहद भारत में ककया गया होता तो अपराध के रूप में दंडनीय होता, और स्जसके लिए वह प्रत्यपषण संबंधी ककसी ववधध के अधीन या अन्यथा भारत में पकडे जाने का या अलभरिा में ननरुद्ध ककए जान े का भागी है, संबद्ध रह चुका है या स्जसके ववरुद्ध इस बारे में उधचत पररवाद ककया जा चुका है या ववश् वसनीय सूचना प्राप् त हो चुकी है या उधचत संदेह ववद्यमान है कक वह ऐसे संबद्ध रह चुका है ; या (झ) जो छोडा गया लसद्धदोर् होत े हुए धारा 394 की उपधारा (5) के अधीन बनाए गए ककसी ननयम को भगं करता है ; या (ञ) स्जसकी धगरफ्तार के लिए ककसी अन्य पुलिस अधधकार से लिखित या मौखिक अध्यपेिा प्राप् त हो चुकी है, परंतु यह तब जब अध्यपेिा में उस व्यस्क्ट् त का, स्जसे धगरफ्तार ककया जाना है, और उस अपराध का या अन्य कारण का,अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 173 स्जसके लिए धगरफ्तार की जानी है, ववननदेि है और उसस े यह दलितष होता है कक अध्यपेिा जार करन े वािे अधधकार द्वारा वारंट के बबना वह व्यस्क्ट् त ववधधपूवषक धगरफ्तार ककया जा सकता था । (2) धारा 39 के उपबंधों के अधीन रहत े हुए, ऐसे ककसी व्यस्क्ट् त को, जो ककसी असंज्ञेय अपराध से संबद्ध है या स्जसके ववरुद्ध कोई पररवाद ककया जा चुका है या ववश् वसनीय सूचना प्राप् त हो चुकी है या उधचत संदेह ववद्यमान है कक वह ऐसे संबद्ध रह चुका है, मस्जथरेट के वारंट या आदेि के लसवाय, धगरफ्तार नह ं ककया जाएगा । (3) पुलिस अधधकार , ऐसे सभी मामिों में स्जनमें उपधारा (1) के अधीन ककसी व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार अपेक्षित नह ं है उस व्यस्क्ट् त को स्जसके ववरुद्ध इस बारे में उधचत पररवाद ककया जा चुका है या ववश् वसनीय सूचना प्राप् त हो चुकी है या उधचत संदेह ववद्यमान है कक उसने संज्ञेय अपराध ककया है, उसके समि या ऐस े अन्य थथान पर, जो सूचना में ववननहदषष् ट ककया जाए उपसंजात होने के लिए ननदेि देत े हुए सूचना जार करेगा । (4) जहां ऐसी सूचना ककसी व्यस्क्ट् त को जार की जाती है, वहां उस व्यस्क्ट् त का यह कतव्ष य होगा कक वह सूचना के ननबंधनों का अनुपािन करे । (5) जहां ऐसा व्यस्क्ट् त सूचना का अनुपािन करता है और अनुपािन करता रहता है वहां उस े सूचना में ननहदषष् ट अपराध के संबंध में तब तक धगरफ्तार नह ं ककया जाएगा जब तक िेिबद्ध ककए जाने वािे कारणों से पुलिस अधधकार की यह राय न हो कक उसे धगरफ्तार कर िेना चाहहए । (6) जहां ऐसा व्यस्क्ट् त, ककसी भी समय सूचना के ननबंधनों का अनुपािन करन े में असफि रहता है या अपनी पहचान कराने का अननच् छुक है वहां पुलिस अधधकार , ऐसे आदेिों के अधीन रहत े हुए, जो इस ननलमत्त ककसी सिम न्यायािय द्वारा पाररत ककए गए हों, सूचना में वखणतष अपराध के लिए उसे धगरफ्तार कर सकेगा । (7) कोई भी धगरफ्तार , ऐसे अपराध के मामिे में जो तीन वर् ष से कम के कारावास से दंडनीय है और ऐसा व्यस्क्ट्त जो लिधथिांग है या साठ वर् ष स े अधधक की आयु का है, ऐसे अधधकार , जो पुलिस उप अधीिक से नीचे की पंस्क्ट्त का न हो, की पूव ष अनुमनत के बबना नह ं की जाएगी । 36. प्रत्येक पुलिस अधधकार , धगरफ्तार करते समय,— धगर फ्तार की प्रकिया और (क) अपने नाम की सह , दृश्यमान और थपष् ट पहचान धारण करेगा, स्जससे धगरफ्तार करन े उसकी आसानी से पहचान हो सके ; वािे अधधकार (ि) धगरफ्तार का एक ज्ञापन तैयार करेगा, जो— के कतव्ष य । (i) कम स े कम एक सािी द्वारा अनुप्रमाखणत ककया जाएगा, जो धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त के कुटुंब का सदथय है या उस पररिेत्र का, जहां धगरफ्तार की गई है, प्रनतस्ष् ठत सदथय है ; (ii) धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त द्वारा प्रनतहथतािररत ककया जाएगा ; और (ग) जब तक उसके कुटुंब के ककसी सदथय द्वारा ज्ञापन को अनुप्रमाखणत न कर हदया गया हो, धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को यह सूचना देगा कक उस े यह174 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अधधकार है कक उसके ककसी नातेदार या लमत्र को, स्जसका वह नाम दे, उसकी धगरफ्तार की सूचना द जाए । पदालभहहत 37. राज्य सरकार,— पुलिस (क) प्रत्येक स्जिा तथा राज्य थतर पर एक पुलिस ननयंत्रण कि की थथापना अधधकार । करेगी ; (ि) प्रत्येक स्जिे और प्रत्येक पुलिस थाने में ककसी ऐस े पुलिस अधधकार को, पदालभहहत करेगी, जो सहायक पुलिस उप ननर िक की पंस्क्ट्त से नीचे का नह ं होगा, जो धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट्तयों के नाम और पते, ऐसे अपराध की प्रकृनत स्जसका उस पर आरोप िगाया गया है, जो प्रत्येक पुलिस थाने में और स्जिा थतर के मुख्याियों पर ककसी भी र नत में, स्जसमें डडस्जटि ढंग भी है, प्रमुितया प्रदलितष की जाएगी, के बारे में जानकार बनाए रिने के लिए स्जम्मदे ार होगा । धगरफ्तार ककए 38. जब ककसी व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार ककया जाता है और पुलिस द्वारा पूछताछ की गए व्यस्क्ट्त का जाती है, तब धगरफ्तार व्यस्क्ट् त पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधधवक्ट् ता से लमिने पूछताछ के दौरान का हकदार होगा ककंतु संपूण ष पूछताछ के दौरान नह ं । अपनी पसंद के अधधवक्ट् ता स े लमिन े का अधधकार । नाम और 39. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त स्जसने पुलिस अधधकार की उपस्थथनत में असंज्ञेय ननवास बताने स े अपराध ककया है या स्जस पर पुलिस अधधकार की उपस्थथनत में असंज्ञेय अपराध करने इंकार करने पर का अलभयोग िगाया गया है, उस अधधकार की मांग पर अपना नाम और ननवास बताने धगरफ्तार । से इंकार करता है या ऐसा नाम या ननवास बताता है, स्जसके बारे में उस अधधकार को यह ववश् वास करन े का कारण है कक वह लमथ्या है, तब वह ऐस े अधधकार द्वारा इसलिए धगरफ्तार ककया जा सकता है कक उसका नाम और ननवास अलभननस्श् चत ककया जा सके । (2) जब ऐसे व्यस्क्ट् त का सह नाम और ननवास अलभननस्श् चत कर लिया जाता है, तब वह इस बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोड हदया जाएगा कक यहद उससे मस्जथरेट के समि उपस्थथत होन े की अपेिा की गई तो वह उसके समि उपस्थथत होगा : परंतु यहद ऐसा व्यस्क्ट् त भारत में ननवासी नह ं है तो वह जमानतपत्र भारत में ननवासी प्रनतभू या प्रनतभुओं द्वारा प्रनतभूत ककया जाएगा । (3) यहद धगरफ्तार के समय से चौबीस घंटों के भीतर ऐसे व्यस्क्ट् त का सह नाम और ननवास अलभननस्श् चत नह ं ककया जाता है या यहद वह बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े में या यहद ऐसी अपेिा की जाए, पयाषप् त प्रनतभू देने में असफि रहता है तो वह अधधकाररता रिन े वािे ननकटतम मस्जथरेट के पास तत्काि भेज हदया जाएगा । प्राइवेट व्यस्क्ट् त 40. (1) कोई प्राइवेट व्यस्क्ट् त ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को, जो उसकी उपस्थथनत में द्वारा धगरफ्तार अजमानतीय और संज्ञेय अपराध करता है, या ककसी उद् घोवर्त अपराधी को धगरफ्तार कर और ऐसी सकता है या धगरफ्तार करवा सकता है और ऐसे धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार पर प्रकिया । अनावश्यक वविंब के बबना, छह घंटे के भीतर, पुलिस अधधकार के हवािे कर देगा या हवािे करवा देगा या पुलिस अधधकार की अनुपस्थथनत में ऐसे व्यस्क्ट् त को अलभरिा में ननकटतम पुलिस थाने िे जाएगा या लभजवाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 175 (2) यहद यह ववश् वास करन े का कारण है कक ऐसा व्यस्क्ट् त धारा 35 की उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन आता है तो पुलिस अधधकार उस े अलभरिा में ि े िेगा । (3) यहद यह ववश् वास करन े का कारण है कक उसने असंज्ञये अपराध ककया है और वह पुलिस अधधकार की मांग पर अपना नाम और ननवास बताने से इंकार करता है, या ऐसा नाम या ननवास बताता है, स्जसके बारे में ऐसे अधधकार को यह ववश् वास करन े का कारण है कक वह लमथ्या है, तो उसके ववर्य में धारा 39 के उपबंधों के अधीन कायवष ाह की जाएगी ; ककंत ु यहद यह ववश् वास करन े का कोई पयाषप् त कारण नह ं है कक उसने कोई अपराध ककया है तो वह तुरंत छोड हदया जाएगा । 41. (1) जब कायपष ािक या न्यानयक मस्जथरेट की उपस्थथनत में उसकी थथानीय मस्ज थरेट द्वारा अधधकाररता के भीतर कोई अपराध ककया जाता है तब वह अपराधी को थवयं धगरफ्तार धगरफ्तार । कर सकता है या धगरफ्तार करन े के लिए ककसी व्यस्क्ट् त को आदेि दे सकता है और तब जमानत के बारे में इसमें अंतववष्ष ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपराधी को अलभरिा के लिए सुपुदष कर सकता है । (2) कोई कायपष ािक या न्यानयक मस्जथरेट ककसी भी समय अपनी थथानीय अधधकाररता के भीतर ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार कर सकता है, या अपनी उपस्थथनत में उसकी धगरफ्तार का ननदेि दे सकता है, स्जसकी धगरफ्तार के लिए वह उस समय और उन पररस्थथनतयों में वारंट जार करन े के लिए सिम है । 42. (1) धारा 35 और धारा 39 से धारा 41 तक की धाराओ ं में (दोनों सहहत) ककसी सि थ त्र बिों के सदथयों का बात के होत े हुए भी, संघ के सिथ त्र बिों का कोई भी सदथय अपन े पद य कतव्ष यों का धगरफ्तार से ननवहष न करन े में अपने द्वारा की गई या की जाने के लिए तात्पनयषत ककसी बात के लिए संरिण । तब तक धगरफ्तार नह ं ककया जाएगा, जब तक केंद्र य सरकार की सहमनत नह ं िे ि जाती । (2) राज्य सरकार अधधसूचना द्वारा ननदेि दे सकती है कक उसमें यथाववननहदषष् ट बि के ऐसे वग ष या प्रवग ष के सदथयों को, स्जन्हें िोक व्यवथथा बनाए रिने का कायभष ार सौंपा गया है, जहां-कह ं वे सेवा कर रहे हों, उपधारा (1) के उपबंध िागू होंगे और तब उस उपधारा के उपबंध इस प्रकार िागू होंगे मानो उसमें आन े वािे “केंद्र य सरकार” पद के थथान पर “राज्य सरकार” पद रि हदया गया हो । 43. (1) धगरफ्तार करन े में पुलिस अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त, जो धगरफ्तार कर धगर फ्तार कैस े की जाएगी । रहा है, धगरफ्तार ककए जाने वािे व्यस्क्ट् त के िर र को वथतुत: छुएगा या परररुद्ध करेगा, जब तक उसने वचन या कम ष द्वारा अपने को अलभरिा में समवपतष न कर हदया हो : परंतु जहां ककसी महहिा को धगरफ्तार ककया जाना है वहां जब तक कक पररस्थथनतयों से इसके ववपर त उपदलितष न हो, धगरफ्तार की मौखिक सूचना पर अलभरिा में उसके समपणष कर देने की उपधारणा की जाएगी और जब तक कक पररस्थथनतयों में अन्यथा अपेक्षित न हो या जब तक पुलिस अधधकार महहिा न हो, तब तक पुलिस अधधकार महहिा को धगरफ्तार करन े के लिए उसके िर र को नह ं छुएगा । (2) यहद ऐसा व्यस्क्ट् त अपन े धगरफ्तार ककए जाने के प्रयास का बिात ् प्रनतरोध करता है या धगरफ्तार से बचन े का प्रयत् न करता है तो ऐसा पुलिस अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त धगरफ्तार करन े के लिए आवश्यक सब साधनों को उपयोग में िा सकता है ।176 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (3) पुलिस अधधकार , अपराध की प्रकृनत और गम्भीरता को ध्यान में रिते हुए, ककसी ऐसे व्यस्क्ट्त की धगरफ्तार करते समय या न्यायािय के समि ऐसे व्यस्क्ट्त को प्रथतुत करते समय हथकडी का प्रयोग कर सकता है, जो अभ्यालसक या आदतन अपराधी है या अलभरिा से ननकि भागा है, या स्जसने संगहठत अपराध, आतंकवाद कृत्य, और्ध संबंधी अपराध, अथत्र और िथत्र का अवैध कब्जे, हत्या, बिात्संग, अम्ि य हमिा, लसक्ट्कों और करेंसी नोट का कूटकरण, मानव दव्ु याषपार, बच्चों के ववरुद्ध िधैंगक अपराध या राज्य के ववरुद्ध अपराध को काररत ककया है । (4) इस धारा की कोई बात, ऐसे व्यस्क्ट् त की, स्जस पर मत्ृ यु या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध का अलभयोग नह ं है, मत्ृ य ु काररत करने का अधधकार नह ं देती है । (5) असाधारण पररस्थथनतयों के लसवाय, कोई महहिा सूयाषथत के पश् चात ् और सूयोदय से पहिे धगरफ्तार नह ं की जाएगी और जहां ऐसी असाधारण पररस्थथनतयां ववद्यमान हैं, वहां महहिा पुलिस अधधकार , लिखित में ररपोटष करके, उस प्रथम श्रेणी के मस्जथरेट की पूव ष अनुमनत अलभप्राप् त करेगी, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर अपराध ककया गया है या धगरफ्तार की जानी है । उस थथान की 44. (1) यहद धगरफ्तार के वारंट के अधीन काय ष करन े वािे ककसी व्यस्क्ट् त को, या तिािी स्जसमें धगरफ्तार करन े के लिए प्राधधकृत ककसी पुलिस अधधकार को, यह ववश् वास करन े का कारण ऐसा व्यस्क्ट् त है कक वह व्यस्क्ट् त स्जसे धगरफ्तार ककया जाना है, ककसी थथान में प्रववष् ट हुआ है, या उसके प्रववष् ट हुआ है भीतर है तो ऐसे थथान में ननवास करन े वािा, या उस थथान का भारसाधक कोई भी स्जसकी व्यस्क्ट् त, पूवोक्ट् त रूप में कायष करने वािे व्यस्क्ट् त द्वारा या ऐसे पुलिस अधधकार द्वारा मांग धगरफ्तार की जानी है । की जान े पर उसमें उसे अबाध प्रवेि करन े देगा और उसके भीतर तिािी िेने के लिए सब उधचत सुववधाएं देगा । (2) यहद ऐसे थथान में प्रवेि उपधारा (1) के अधीन नह ं हो सकता तो ककसी भी मामिे में उस व्यस्क्ट् त के लिए, जो वारंट के अधीन काय ष कर रहा है, और ककसी ऐसे मामिे में, स्जसमें वारंट ननकािा जा सकता है ककंत ु धगरफ्तार ककए जान े वािे व्यस्क्ट् त को भाग जान े का अवसर हदए बबना प्राप् त नह ं ककया जा सकता, पुलिस अधधकार के लिए यह ववधधपूण ष होगा कक वह ऐसे थथान में प्रवेि करे और वहां तिािी िे और ऐसे थथान में प्रवेि कर पाने के लिए ककसी गहृ या थथान के, चाहे वह उस व्यस्क्ट् त का हो स्जसे धगरफ्तार ककया जाना है, या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त का हो, ककसी बाहर या भीतर द्वार या खिडकी को तोडकर िोि िे यहद अपने प्राधधकार और प्रयोजन की सूचना देने के तथा प्रवेि करने की सम्यक् रूप से मांग करन े के पश् चात ् वह अन्यथा प्रवेि प्राप् त नह ं कर सकता है : परंतु यहद ऐसा कोई थथान ऐसा कमरा है जो (धगरफ्तार ककए जाने वािे व्यस्क्ट् त से लभन्न ) ऐसी महहिा के वाथतववक अधधभोग में है जो रूह़ि के अनुसार िोगों के सामने नह ं आती है तो ऐसा व्यस्क्ट् त या पुलिस अधधकार उस कमरे में प्रवेि करन े के पूव ष उस महहिा को सूचना देगा कक वह वहां से हट जाने के लिए थवतंत्र है और हट जाने के लिए उस े प्रत्येक उधचत सुववधा देगा और तब कमरे को तोडकर िोि सकता है और उसमें प्रवेि कर सकता है । (3) कोई पुलिस अधधकार या धगरफ्तार करने के लिए प्राधधकृत अन्य व्यस्क्ट् त ककसी घर या थथान का कोई बाहर या भीतर द्वार या खिडकी अपने को या ककसी अन्यअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 177 व्यस्क्ट् त को जो धगरफ्तार करन े के प्रयोजन से ववधधपूवकष प्रवेि करन े के पश् चात ् वहां ननरुद्ध है, मुक्ट् त करने के लिए तोडकर िोि सकता है । 45. पुलिस अधधकार ऐसे ककसी व्यस्क्ट् त को स्जसे धगरफ्तार करन े के लिए वह अन्य अधधकाररताओं प्राधधकृत है, वारंट के बबना धगरफ्तार करन े के प्रयोजन से भारत के ककसी थथान में उस में अपराधधयों का व्यस्क्ट् त का पीछा कर सकता है । पीछा करना । 46. धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को उससे अधधक अवरुद्ध नह ं ककया जाएगा अन ावश्यक अवरोध न स्जतना उसको ननकि भागने से रोकन े के लिए आवश्यक है । करना । 47. (1) ककसी व्यस्क्ट् त को वारंट के बबना धगरफ्तार करन े वािा प्रत्येक पुलिस धगर फ्तार ककए गए व्यस्क्ट्त को अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त उस व्यस्क्ट् त को उस अपराध की, स्जसके लिए वह धगरफ्तार धगरफ्तार के ककया गया है, पूण ष ववलिस्ष् टयां या ऐसी धगरफ्तार के अन्य आधार तुरंत संसूधचत करेगा । आधारों और (2) जहां कोई पुलिस अधधकार अजमानतीय अपराध के अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त से लभन्न जमानत के अधधकार की ककसी व्यस्क्ट् त को वारंट के बबना धगरफ्तार करता है वहां वह धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त सूचना हदया को सूचना देगा कक वह जमानत पर छोडे जाने का हकदार है और वह अपनी ओर से जाना । प्रनतभुओं का इंतजाम करे । 48. (1) इस संहहता के अधीन कोई धगरफ्तार करन े वािा प्रत्येक पुलिस अधधकार धगर फ्तार करन े वािे व्यस्क्ट् त या अन्य व्यस्क्ट् त, ऐसी धगरफ्तार और उस थथान के बारे में, जहां धगरफ्तार ककया गया की धगरफ्तार , व्यस्क्ट् त रिा जा रहा है, जानकार , उसके लमत्रों, नातेदारों या ऐसे अन्य व्यस्क्ट् त को स्जसे आहद के बारे में धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त द्वारा ऐसी जानकार देने के प्रयोजन के लिए प्रकट या नातेदार या नामननहदषष् ट को तथा स्जिे में पदालभहहत पुलिस अधधकार को भी तुरंत देगा । लमत्र को जानकार देने (2) पुलिस अधधकार धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को, जैसे ह वह पुलिस थाने में की बाध्यता । िाया जाता है, उपधारा (1) के अधीन उसके अधधकारों के बारे में सूधचत करेगा । (3) इस तथ्य की प्रववस्ष् ट कक ऐसे व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार की सूचना ककसे द गई है, पुलिस थाने में रिी जाने वाि पुथतक में ऐसे प्ररूप में, जो राज्य सरकार द्वारा इस ननलमत्त ववहहत ककया जाए, की जाएगी । (4) उस मस्जथरेट का, स्जसके समि ऐसे धगरफ्तार ककया गया व्यस्क्ट् त, प्रथतुत ककया जाता है, यह कतव्ष य होगा कक वह अपना समाधान करे कक उपधारा (2) और उपधारा (3) की अपेिाओं का ऐसे धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त के संबंध में अनुपािन ककया गया है । 49. (1) जब कभी,— धगर फ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त की (i) पुलिस अधधकार द्वारा ऐसे वारंट के अधीन, जो जमानत लिए जाने का तिािी । उपबंध नह ं करता है या ऐसे वारंट के अधीन, जो जमानत लिए जान े का उपबंध करता है ककंतु धगरफ्तार ककया गया व्यस्क्ट् त जमानत नह ं दे सकता है, कोई व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककया जाता है ; और (ii) जब कभी कोई व्यस्क्ट् त वारंट के बबना या प्राइवेट व्यस्क्ट् त द्वारा वारंट के अधीन धगरफ्तार ककया जाता है और ववधधक रूप से उसकी जमानत नह ं ि जा सकती है या वह जमानत देने में असमथ ष है,178 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तब धगरफ्तार करने वािा अधधकार , या जब धगरफ्तार प्राइवेट व्यस्क्ट् त द्वारा की जाती है तब वह पुलिस अधधकार , स्जसे वह व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को सौंपता है, उस व्यस्क्ट् त की तिािी ि े सकता है और पहनन े के आवश्यक वथत्रों को छोडकर उसके पास पाई गई सब वथतुओं को सुरक्षित अलभरिा में रि सकता है और जहां धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त से कोई वथतु अलभगहृ त की जाती है वहां ऐसे व्यस्क्ट् त को एक रसीद द जाएगी स्जसमें पुलिस अधधकार द्वारा कब्जे में की गई वथतु दलितष होंगी । (2) जब कभी ककसी महहिा की तिािी करना आवश्यक हो तब ऐसी तिािी लिष् टता का पूरा ध्यान रित े हुए अन्य महहिा द्वारा की जाएगी । आिामक 50. वह अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त, जो इस संहहता के अधीन धगरफ्तार करता है आयुधों का धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त से कोई आिामक आयुध, जो उसके िर र पर हों, िे सकता है अलभग्रहण करन े और ऐसे लिए गए सब आयुध उस न्यायािय या अधधकार को पररदत्त करेगा, स्जसके की िस्क्ट्त । समि वह अधधकार या धगरफ्तार करन े वािा व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को प्रथतुत करन े के लिए इस संहहता द्वारा अपेक्षित है । पुलिस अधधकार 51. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त, ऐसा अपराध करने के आरोप में धगरफ्तार ककया जाता की प्राथनष ा पर है जो ऐसी प्रकृनत का है और स्जसका ऐसी पररस्थथनतयों में ककया जाना अलभकधथत है कक धचककत्सा- यह ववश् वास करने के उधचत आधार हैं कक उसकी िार ररक पर िा ऐसा अपराध ककए जाने व्यवसायी द्वारा के बारे में साक्ष्य प्रदान करेगी, तो ऐस े पुलिस अधधकार की, जो उप ननर िक की पंस्क्ट् त अलभयुक्ट् त की से नीचे का न हो, प्राथनष ा पर काय ष करन े में रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी के लिए और पर िा । सद्भ ावपूवकष उसकी सहायता करन े में और उसके ननदेिाधीन काय ष करने में ककसी व्यस्क्ट् त के लिए यह ववधधपूण ष होगा कक वह धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त की ऐसी पर िा करे जो उन तथ्यों को, जो ऐसा साक्ष्य प्रदान कर सकें, अलभननस्श् चत करन े के लिए उधचत रूप से आवश्यक है और उतना बि प्रयोग करे स्जतना उस प्रयोजन के लिए उधचत रूप से आवश्यक है । (2) जब कभी इस धारा के अधीन ककसी महहिा की िार ररक पर िा की जानी है तो ऐसी पर िा केवि ककसी महहिा द्वारा जो रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी है या उसके पयवष ेिण में की जाएगी । (3) रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी अवविंब अन्वेर्ण अधधकार को पर िा ररपोटष भेजेगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में और धारा 52 तथा धारा 53 में— (क) ‘पर िा’ में िून, िून के धब्बों, सीमन, िधैंगक अपराधों की दिा में थ वाब, थूक और पसीना, बाि के नमूनों और उंगि के नािून की कतरनों की आधुननक और वैज्ञाननक तकनीकों के, स्जनके अंतगतष डी.एन.ए. प्रोफाइि करना भी है, प्रयोग द्वारा पर िा और ऐस े अन्य पर िण, स्जन्हें रस्जथर कृत धचककत्सा- व्यवसायी ककसी ववलिष् ट मामिे में आवश्यक समझता है, सस्म्मलित होंगे ; (ि) “रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी” से वह धचककत्सा-व्यवसायी अलभप्रेत है, स्जसके पास राष्र य धचककत्सा आयोग अधधननयम, 2019 के अधीन मान्यताप्राप्त 2019 कर 30 कोई धचककत्सीय अहषता है और स्जसका नाम इस अधधननयम के अधीन राष्र य धचककत्सा रस्जथटर या राज्य धचककत्सा रस्जथटर में प्रववष् ट ककया गया है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 179 52. (1) जब ककसी व्यस्क्ट् त को बिात्संग या बिात्संग का प्रयत् न करन े का अपराध बिा त्संग के करन े के आरोप में धगरफ्तार ककया जाता है और यह ववश् वास करन े के उधचत आधार हैं अपराधी व्यस्क्ट् त की धचककत्सा- कक उस व्यस्क्ट् त की पर िा से ऐसा अपराध करन े के बारे में साक्ष्य प्राप् त होगा तो सरकार व्यवसायी द्वारा द्वारा या ककसी थथानीय प्राधधकार द्वारा चिाए जा रहे अथपताि में ननयोस्जत ककसी पर िा । रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी के लिए और उस थथान से जहां अपराध ककया गया है, सोिह ककिोमीटर की पररधध के भीतर ऐसे धचककत्सा-व्यवसायी की अनुपस्थथनत में ऐस े पुलिस अधधकार के ननवेदन पर, जो उप ननर िक की पंस्क्ट् त से नीचे का न हो, ककसी अन्य रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी के लिए, तथा सद्भ ावपूवकष उसकी सहायता के लिए तथा उसके ननदेि के अधीन काय ष कर रहे ककसी व्यस्क्ट् त के लिए, ऐसे धगरफ्तार व्यस्क्ट् त की ऐसी पर िा करना और उस प्रयोजन के लिए उतनी िस्क्ट् त का प्रयोग करना स्जतनी युस्क्ट् तयुक्ट् त रूप से आवश्यक हो, ववधधपूण ष होगा । (2) ऐसी पर िा करन े वािा रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी ऐस े व्यस्क्ट् त की बबना ककसी वविंब के पर िा करेगा और उसकी पर िा की एक ररपोटष तैयार करेगा, स्जसमें ननम् नलिखित ववलिस्ष् टयां द जाएंगी, अथाषत ् :— (i) अलभयुक्ट् त और उस व्यस्क्ट् त का, जो उस े िाया है, नाम और पता ; (ii) अलभयुक्ट् त की आयु ; (iii) अलभयुक्ट् त के िर र पर िनत के ननिान, यहद कोई हो ; (iv) डी.एन.ए. प्रोफाइि करन े के लिए अलभयुक्ट् त के िर र से ि गई सामग्री का वणनष ; और (v) उधचत ब्यौरे सहहत, अन्य तास्ववक ववलिस्ष् टयां । (3) ररपोटष में संिेप में वे कारण अधधकधथत ककए जाएंगे, स्जनसे प्रत्येक ननष्कर्ष ननकािा गया है । (4) पर िा प्रारंभ करन े और समाप् त करने का सह समय भी ररपोटष में अंककत ककया जाएगा । (5) रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी, बबना ककसी वविंब के अन्वेर्ण अधधकार को ररपोटष भेजेगा, जो उसे धारा 193 में ननहदषष् ट मस्जथरेट को उस धारा की उपधारा (6) के िंड (क) में ननहदषष् ट दथतावेजों के भाग के रूप में भेजेगा । 53. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककया जाता है, तब धगरफ्तार ककए जाने के धगर फ्तार तुरंत पश् चात ् उसकी केंद्र य सरकार या राज्य सरकार की सेवा के अधीन धचककत्सा व्यस्क्ट् त की धचककत्सा अधधकार द्वारा और जहां धचककत्सा अधधकार उपिब्ध नह ं हैं, वहां रस्जथर कृत धचककत्सा अधधकार द्वारा व्यवसायी द्वारा पर िा की जाएगी : पर िा । परंतु यहद धचककत्सा अधधकार या रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी की यह राय है कक ऐसे व्यस्क्ट्त की एक और पर िा की जानी आवश्यक है, तो वह ऐसा कर सकेगा : परंतु यह और कक जहां धगरफ्तार ककया गया व्यस्क्ट् त महहिा है, वहां उसके िर र की पर िा केवि महहिा धचककत्सा अधधकार और जहां महहिा धचककत्सा अधधकार उपिब्ध नह ं है, वहां रस्जथर कृत महहिा धचककत्सा व्यवसायी द्वारा या उसके पयवष ेिण के अधीन की जाएगी ।180 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त की इस प्रकार पर िा करन े वािा धचककत्सा अधधकार या रस्जथर कृत धचककत्सा व्यवसायी ऐसी पर िा का अलभिेि तैयार करेगा स्जसमें धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त के िर र पर ककन्ह ं िनतयों या हहसं ा के धचह्नों तथा अनुमाननत समय का वणषन करेगा जब ऐसी िनत या धचह्न पहुंचाए गए होंगे । (3) जहां उपधारा (1) के अधीन पर िा की जाती है वहां ऐसी पर िा की ररपोटष की एक प्रनत, यथास्थथनत, धचककत्सा अधधकार या रस्जथर कृत धचककत्सा व्यवसायी द्वारा धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त या ऐसे धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त द्वारा नामननहदषष् ट व्यस्क्ट् त को द जाएगी । धगरफ्तार व्यस्क्ट्त 54. जहां कोई व्यस्क्ट् त ककसी अपराध को करने के आरोप पर धगरफ्तार ककया जाता की लिनाख्त । है और उसकी लिनाख्त ककसी अन्य व्यस्क्ट् त या व्यस्क्ट् तयों द्वारा ऐसे अपराधों के अन्वेर्ण के लिए आवश्यक समझी जाती है तो वहां वह न्यायािय, स्जसकी अधधकाररता है, पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार के ननवेदन पर, धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त की, ऐसी र नत से जो न्यायािय ठीक समझता है, ककसी अन्य व्यस्क्ट् त या ककन्ह ं अन्य व्यस्क्ट् तयों द्वारा लिनाख्त कराने का आदेि दे सकेगा : परंतु यहद धगरफ्तार ककए गए व् यस्क्ट् त की लिनाख् त करने वािा व् यस्क्ट् त मानलसक या िार ररक रूप से ननःिक्ट्त है, तो लिनाख् त करने की ऐसी प्रकिया मस्जथ रेट के पयवष ेिण के अधीन होगी जो यह सुननस्श् चत करने के लिए समुधचत कदम उठाएगा कक उस व् यस्क्ट् त द्वारा धगरफ्तार ककए गए व्य स्क्ट् त की उन पद्धनतयों का प्रयोग करते हुए लिनाख् त की जाए, जो उस व् यस्क्ट् त के लिए सुववधापूण ष हों और लिनाख्त प्रकिया ककसी श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों द्वारा अलभलिखित की जाएगी । जब पुलिस 55. (1) जब अध्याय 13 के अधीन अन्वेर्ण करता हुआ कोई पुलिस थाने का अधधकार वारंट भारसाधक अधधकार , या कोई पुलिस अधधकार , अपने अधीनथथ ककसी अधधकार से ककसी के बबना ऐसे व्यस्क्ट् त को जो वारंट के बबना ववधधपूवकष धगरफ्तार ककया जा सकता है, वारंट के धगरफ्तार करन े बबना (अपनी उपस्थथनत से, अन्यथा) धगरफ्तार करने की अपेिा करता है, तब वह उस के लिए अपन े व्यस्क्ट् त का, स्जसे धगरफ्तार ककया जाना है और उस अपराध का या अन्य कारण का, अधीनथथ को स्जसके लिए धगरफ्तार की जानी है, ववननदेि करते हुए लिखित आदेि उस अधधकार को प्रनतननयुक्ट्त पररदत्त करेगा स्जससे यह अपेिा है कक वह धगरफ्तार करे और इस प्रकार अपेक्षित करता है तब प्रकिया । अधधकार उस व्यस्क्ट् त को, स्जसे धगरफ्तार करना है, उस आदेि का सार धगरफ्तार करन े के पूव ष सूधचत करेगा और यहद वह व्यस्क्ट् त अपेिा करे तो उस े वह आदेि हदिा देगा । (2) उपधारा (1) की कोई बात ककसी पुलिस अधधकार की धारा 35 के अधीन ककसी व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार करन े की िस्क्ट् त पर प्रभाव नह ं डािेगी । धगरफ्तार ककए गए 56. अलभयुक्ट् त को अलभरिा में रिन े वािे व्यस्क्ट् त का यह कतव्ष य होगा कक वह व्यस्क्ट्त का अलभयुक्ट् त के थवाथथ्य और सुरिा की उधचत देिभाि करे । थवाथथ्य और सुरिा । धगरफ्तार ककए गए 57. वारंट के बबना धगरफ्तार करन े वािा पुलिस अधधकार अनावश्यक वविंब के व्यस्क्ट् त का बबना और जमानत के संबंध में इसमें अंतववष्ष ट उपबंधों के अधीन रहत े हुए, उस व्यस्क्ट् त मस्जथरेट या को, जो धगरफ्तार ककया गया है, उस मामि े में अधधकाररता रिन े वािे मस्जथरेट के पुलिस थाने के समि या ककसी पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार के समि िे जाएगा या भेजेगा । भारसाधक अधधकार के समि िे जाया जाना ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 181 58. कोई पुलिस अधधकार वारंट के बबना धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को उसस े धगरफ् तार ककए अधधक अवधध के लिए अलभरिा में ननरुद्ध नह ं रिगे ा जो उस मामिे की सब गए व्यस्क्ट्त का चौबीस घंटे स े पररस्थथनतयों में उधचत है तथा ऐसी अवधध, मस्जथरेट के धारा 187 के अधीन वविेर् अधधक ननरुद्ध आदेि के अभाव में धगरफ्तार के थथान से मस्जथरेट के न्यायािय तक यात्रा के लिए न ककया जाना । आवश्यक समय को छोडकर, चौबीस घंटे से अधधक की नह ं होगी, चाहे उसकी अधधकाररता है या नह ं । 59. पुलिस थानों के भारसाधक अधधकार , स्जिा मस्जथरेट को, या उसके द्वारा पुलि स का धगरफ्ताररयों की ऐसा ननदेि देने पर, उपिंड मस्जथरेट को, अपने-अपने थानों की सीमाओं के भीतर वारंट ररपोटष करना । के बबना धगरफ्तार ककए गए सब व्यस्क्ट् तयों के मामिों की ररपोटष करेंगे, चाहे उन व्यस्क्ट् तयों की जमानत िे ि गई हो या नह ं । 60. पुलिस अधधकार द्वारा धगरफ्तार ककए गए ककसी व्यस्क्ट् त का उन्मोचन उसी के पकड े गए व्यस्क्ट् त का बंधपत्र या जमानतपत्र पर या मस्जथरेट के वविेर् आदेि के अधीन ह ककया जाएगा, उन्मोचन । अन्यथा नह ं । 61. (1) यहद कोई व्यस्क्ट् त ववधधपूण ष अलभरिा में से ननकि भागता है या छुडा लिया ननक ि भागन े पर पीछा करने और जाता है तो वह व्यस्क्ट् त, स्जसकी अलभरिा स े वह ननकि भागा है, छुडाया गया है, उसका कफर पकड िेन े तुरंत पीछा कर सकता है और भारत के ककसी थथान में उसे धगरफ्तार कर सकता है । की िस्क्ट्त । (2) उपधारा (1) के अधीन धगरफ्ताररयों को धारा 44 के उपबंध िागू होंगे भि े ह ऐसी धगरफ्तार करने वािा व्यस्क्ट् त वारंट के अधीन काय ष न कर रहा हो और धगरफ्तार करन े का प्राधधकार रिन े वािा पुलिस अधधकार न हो । 62. कोई धगरफ्तार , इस संहहता या धगरफ्तार के लिए उपबंध करन े वाि तत्समय धगर फ्तार का प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के उपबंधों के अनुसार ह की जाएगी । सवथष ा सहंहता के अनुसार ह ककया जाना । अध्याय 6 उपक्स्थत िोने को वििश करने के लिए आिेलशकाएं क—समन 63. न्यायािय द्वारा इस संहहता के अधीन जार ककया गया प्रत्येक समन,— सम न का प्ररूप । (i) लिखित रूप में और दो प्रनतयों में, उस न्यायािय के पीठासीन अधधकार द्वारा या अन्य ऐसे अधधकार द्वारा, स्जसे उच् च न्यायािय ननयम द्वारा समय- समय पर ननदेलित करे, हथतािररत होगा और उस पर उस न्यायािय की मुद्रा िगी होगी ; या (ii) ककसी गू़ििेखित या इिैक्ट्राननक संसूचना के ककसी अन्य प्ररूप में होगा और स्जस पर न्यायािय की मुद्रा िगी होगी या डडस्जटि हथतािर होंगे । 64. (1) प्रत्येक समन की तामीि पुलिस अधधकार द्वारा या ऐसे ननयमों के अधीन सम न की जो राज्य सरकार इस ननलमत्त बनाए, उस न्यायािय के, स्जसने वह समन जार ककया है, तामीि कैस े की जाए । ककसी अधधकार द्वारा या अन्य िोक सेवक द्वारा की जाएगी : परंतु पुलिस थाना या न्यायािय का रस्जथरार पता, ई-मिे पता, फोन नम्बर और ऐसे अन्य ब्यौरे स्जन्हें राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंधधत करे, की प्रववस्ष्ट के लिए एक रस्जथटर रिेगा ।182 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) यहद साध्य हो तो समन ककए गए व्यस्क्ट् त पर समन की तामीि उस े उस समन की दो प्रनतयों में से एक का पररदान या ननववदान करके वैयस्क्ट् तक रूप से की जाएगी : परंतु न्यायािय की मुद्रा िगा हुआ समन ऐसे प्ररूप में और ऐसी र नत में जो राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंधधत करे, इिैक्ट्राननक संसूचना द्वारा तामीि ककया जा सकेगा। (3) प्रत्येक व्यस्क्ट् त, स्जस पर समन की इस प्रकार तामीि की गई है, यहद तामीि करन े वािे अधधकार द्वारा ऐसी अपेिा की जाती है तो, दसू र प्रनत के पष्ृ ठ भाग पर उसके लिए रसीद हथतािररत करेगा । ननगलमत 65. (1) ककसी कंपनी या ननगम पर समन की तामीि कंपनी या ननगम के ननकायों, फमों ननदेिक, प्रबंधक, सधचव या अन्य अधधकार पर तामीि करके की जा सकती है या भारत और सोसाइहटयों में कंपनी या ननगम के ननदेिक, प्रबंधक, सधचव या अन्य अधधकार के पते पर पर समन की रस्जथर कृत डाक द्वारा भेजे गए पत्र द्वारा की जा सकती है, उस दिा में तामीि तब हुई तामीि । समझी जाएगी जब डाक से साधारण रूप से वह पत्र पहुंचता है । स्पष् टीकरण—इस धारा में “कंपनी” से कोई ननगलमत ननकाय अलभप्रेत है और “ननगम” से कंपनी अधधननयम, 2013 के अधीन रस्जथर कृत कोई ननगलमत कंपनी या 2013 का 18 अन्य ननगलमत ननकाय अथवा सोसाइट रस्जथर करण अधधननयम, 1860 के अधीन कोई 1860 का 21 रस्जथर कृत सोसाइट अलभप्रेत है । (2) ककसी फम ष या व्यस्ष्टयों के अन्य संगम पर समन की तामीि ऐसे फम ष या संगम के ककसी भागीदार पर इसे तामीि करके की जा सकेगी या ऐसे भागीदार के पते पर रस्जथर कृत डाक द्वारा भेजे गए पत्र द्वारा की जा सकेगी, उस दिा में तामीि तब हुई समझी जाएगी, जब डाक स े साधारण रूप से वह पत्र पहुंचेगा । जब समन ककए 66. जहां समन ककया गया व्यस्क्ट् त सम्यक् तत्परता बरतने पर भी न लमि सके, गए व्यस्क्ट् त न वहां समन की तामीि दो प्रनतयों में से एक को उसके पररवार के उसके साथ रहने वािे लमि सके, तब ककसी वयथक पुरुर् सदथय के पास उस व्यस्क्ट् त के लिए छोडकर की जा सकेगी और यहद तामीि । तामीि करन े वािे अधधकार द्वारा ऐसी अपेिा की जाती है तो, स्जस व्यस्क्ट् त के पास समन ऐसे छोडा जाता है, वह दसू र प्रनत के पष्ृ ठ भाग पर उसके लिए रसीद हथतािररत करेगा । स्पष् टीकरण—सेवक, इस धारा के अथ ष में पररवार का सदथय नह ं है । जब पूव ष 67. यहद धारा 64, धारा 65 या धारा 66 में उपबंधधत रूप से तामीि सम्यक् उपबंधधत प्रकार तत्परता बरतने पर भी न की जा सके तो तामीि करन े वािा अधधकार समन की दो से तामीि न की प्रनतयों में से एक को उस घर या वासथथान के, स्जसमें समन ककया गया व्यस्क्ट् त जा सके, तब साधारणतया ननवास करता है, ककसी सहजदृश्य भाग में िगाएगा ; और तब न्यायािय प्रकिया । ऐसी जांच करन े के पश् चात ् जैसी वह ठीक समझ े या तो यह घोवर्त कर सकेगा कक समन की सम्यक् तामीि हो गई है या वह ऐसी र नत से नई तामीि का आदेि दे सकेगा, स्जस े वह उधचत समझ े । सरकार सेवक 68. (1) जहां समन ककया गया व्यस्क्ट् त सरकार की सकिय सेवा में है वहां समन पर तामीि । जार करन े वािा न्यायािय साधारणतया ऐसा समन दो प्रनतयों में उस कायाषिय के प्रधान को भेजेगा, स्जसमें वह व्यस्क्ट् त सेवक है और तब वह प्रधान, धारा 64 में उपबंधधत प्रकारअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 183 से समन की तामीि कराएगा और उस धारा द्वारा अपेक्षित पष्ृ ठांकन सहहत उस पर अपने हथतािर करके उस े न्यायािय को िौटा देगा । (2) ऐसा हथतािर सम्यक् तामीि का साक्ष्य होगा । 69. जब न्यायािय यह चाहता है कक उसके द्वारा जार ककए गए समन की तामीि थथा नीय उसकी थथानीय अधधकाररता के बाहर ककसी थथान में की जाए तब वह साधारणतया ऐसा सीमाओ ं के बाहर समन की समन दो प्रनतयों में उस मस्जथरेट को भेजेगा स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर तामीि । उसकी तामीि की जानी है या समन ककया गया व्यस्क्ट् त ननवास करता है । 70. (1) जब न्यायािय द्वारा जार ककए गए समन की तामीि उसकी थथानीय ऐसे मामिों में अधधकाररता के बाहर की गई है तब और ऐसे ककसी मामि े में स्जसमें वह अधधकार स्जसने और जब तामीि करने समन की तामीि की है, मामिे की सुनवाई के समय उपस्थथत नह ं है, मस्जथरेट के समि वािा अधधकार ककया गया तात्पनयषत यह िपथपत्र कक ऐसे समन की तामीि हो गई है और समन की उपस्थथत न हो दसू र प्रनत, स्जसका उस व्यस्क्ट् त द्वारा स्जसको समन पररदत्त या ननववदत्त ककया गया था, तब तामीि का या स्जसके पास वह छोडा गया था (धारा 64 या धारा 66 में उपबंधधत प्रकार से), सबूत । पष्ृ ठांककत होना तात्पनयतष है, साक्ष्य में ग्राह्य होगी और जब तक तत् प्रनतकूि साबबत न ककया जाए, उसमें ककए गए कथन सह माने जाएंगे । (2) इस धारा में वखणतष िपथपत्र समन की दसू र प्रनत से संिग् न ककया जा सकेगा और उस न्यायािय को भेजा जा सकता है । (3) धारा 64 स े धारा 71 (दोनों सहहत) के अधीन इिैक्ट्राननक संसूचना के माध्यम से तामीि ककए गए सभी समन सम्यक् रूप से तामीि ककए गए समझे जाएंगे और ऐसे समन की एक प्रनत प्रमाखणत की जाएगी और समन की तामीि के सबूत के रूप में रिी जाएगी । 71. (1) इस अध्याय की पूवषवती धाराओं में ककसी बात के होत े हुए भी, सािी के साि ी पर समन लिए समन जार करने वािा न्यायािय, ऐसा समन जार करन े के अनतररक्ट् त और उसके की तामीि । साथ-साथ ननदेि दे सकता है कक उस समन की एक प्रनत की तामीि, सािी के उस थथान के पते पर, जहां वह साधारणतया ननवास करता है या कारबार करता है या अलभिाभ के लिए, थवय ं काम करता है, इिैक्ट्राननक संसूचना द्वारा या रस्जथर कृत डाक द्वारा, की जाए । (2) जब सािी द्वारा हथतािर की गई तात्पनयतष अलभथवीकृनत या डाक कमषचार द्वारा ककया गया तात्पनयतष यह पष्ृ ठांकन कक सािी ने समन िेने से इंकार कर हदया है, प्राप् त हो जाता है या न्यायािय के समाधानप्रद रूप में, इिैक्ट्राननक संसूचना द्वारा धारा 70 की उपधारा (3) के अधीन समन के पररदान के सबूत पर, समन जार करने वािा न्यायािय यह घोवर्त कर सकेगा कक समन की तामीि सम्यक् रूप से कर द गई है । ख—धगरफ्तारी का िारंट 72. (1) न्यायािय द्वारा इस संहहता के अधीन जार ककया गया धगरफ्तार का धगर फ्तार के प्रत्येक वारंट लिखित रूप में और ऐसे न्यायािय के पीठासीन अधधकार द्वारा हथतािररत वारंट का प्ररूप और अवधध । होगा और उस पर उस न्यायािय की मुद्रा िगी होगी । (2) ऐसा प्रत्येक वारंट तब तक प्रवतनष में रहेगा जब तक वह उस े जार करने वाि े184 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न्यायािय द्वारा रद्द नह ं कर हदया जाता है या जब तक वह ननष्पाहदत नह ं कर हदया जाता है । प्रनतभूनत लिए 73. (1) ककसी व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार के लिए वारंट जार करन े वािा कोई जान े का ननदेि न्यायािय वारंट पर पष्ृ ठांकन द्वारा थववववेकानुसार यह ननदेि दे सकेगा कक यहद वह देने की िस्क्ट्त । व्यस्क्ट् त न्यायािय के समि ववननहदषष् ट समय पर और तत्पश् चात ् जब तक न्यायािय द्वारा अन्यथा ननदेि नह ं हदया जाता है तब तक अपनी उपस्थथनत के लिए पयाषप्त प्रनतभुओं सहहत बंधपत्र ननष्पाहदत करता है तो वह अधधकार स्जसे वारंट ननदेलित ककया गया है, ऐसी प्रनतभूनत िेगा और उस व्यस्क्ट् त को अलभरिा से छोड देगा । (2) पष्ृ ठांकन में ननम् नलिखित बातें कधथत होंगी :— (क) प्रनतभुओं की संख्या ; (ि) वह रकम, स्जसके लिए िमिः प्रनतभ ू और वह व्यस्क्ट् त, स्जसकी धगरफ्तार के लिए वारंट जार ककया गया है, आबद्ध होने हैं ; (ग) वह समय, जब न्यायािय के समि उसे उपस्थथत होना है । (3) जब कभी इस धारा के अधीन प्रनतभूनत ि जाती है तब वह अधधकार , स्जसे वारंट ननदेलित है बंधपत्र न्यायािय के पास भेज देगा । वारंट ककसको 74. (1) धगरफ्तार का वारंट साधारणतया एक या अधधक पुलिस अधधकाररयों को ननदेलित होंग े । ननदेलित होगा ; ककंतु यहद ऐसे वारंट का तुरंत ननष्पादन आवश्यक है और कोई पुलिस अधधकार तुरंत न लमि सके तो वारंट जार करन े वािा न्यायािय ककसी अन्य व्यस्क्ट् त या व्यस्क्ट् तयों को उस े ननदेलित कर सकता है और ऐसा व्यस्क्ट् त या ऐसे व्यस्क्ट् त उसका ननष्पादन करेंगे । (2) जब वारंट एक से अधधक अधधकाररयों या व्यस्क्ट् तयों को ननदेलित है तब उसका ननष्पादन उन सबके द्वारा या उनमें स े ककसी एक या अधधक के द्वारा ककया जा सकेगा । वारंट ककसी भी 75. (1) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या प्रथम वग ष मस्जथरेट ककसी ननकि भागे व्यस्क्ट् त को लसद्धदोर्, उद्घ ोवर्त अपराधी या ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त की, जो ककसी अजमानतीय अपराध ननदेलित हो के लिए अलभयुक्ट् त है और धगरफ्तार से बच रहा है, धगरफ्तार करन े के लिए वारंट अपनी सकेंगे । थथानीय अधधकाररता के भीतर के ककसी भी व्यस्क्ट् त को ननदेलित कर सकता है । (2) ऐसा व्यस्क्ट् त वारंट की प्रास्प् त को लिखित रूप में अलभथवीकार करेगा और यहद वह व्यस्क्ट् त, स्जसकी धगरफ्तार के लिए वह वारंट जार ककया गया है, उसके भारसाधन के अधीन ककसी भूलम या अन्य संपवत्त में है या प्रवेि करता है तो वह उस वारंट का ननष्पादन करेगा । (3) जब वह व्यस्क्ट् त, स्जसके ववरुद्ध ऐसा वारंट जार ककया गया है, धगरफ्तार कर लिया जाता है, तब वह वारंट सहहत ननकटतम पुलिस अधधकार के हवािे कर हदया जाएगा, जो, यहद धारा 73 के अधीन प्रनतभूनत नह ं ि गई है तो, उस े उस मामिे में अधधकाररता रिने वािे मस्जथरेट के समि लभजवाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 185 76. ककसी पुलिस अधधकार को ननदेलित वारंट का ननष्पादन ककसी अन्य ऐस े पुलि स अधधकार पुलिस अधधकार द्वारा भी ककया जा सकता है स्जसका नाम वारंट पर उस अधधकार को ननदेलित वारंट । द्वारा पष्ृ ठांककत ककया जाता है स्जसे वह ननदेलित या पष्ृ ठांककत है । 77. पुलिस अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त, जो धगरफ्तार के वारंट का ननष्पादन कर रहा वारंट के सार है, उस व्यस्क्ट् त को, स्जसे धगरफ्तार करना है, उसका सार सूधचत करेगा और यहद ऐसी की सूचना । अपेिा की जाती है तो वारंट उस व्यस्क्ट् त को हदिा देगा । 78. पुलिस अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त, जो धगरफ्तार के वारंट का ननष्पादन करता धगर फ्तार ककए है, धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को (धारा 73 के प्रनतभूनत संबंधी उपबंधों के अधीन रहते गए व्यस्क्ट्त का न्यायािय के हुए) अनावश्यक वविंब के बबना उस न्यायािय के समि िाएगा, स्जसके समि उस समि व्यस्क्ट् त को प्रथतुत करन े के लिए वह ववधध द्वारा अपेक्षित है : अवविम्ब िाया परंतु ऐसा वविंब ककसी भी दिा में धगरफ्तार के थथान स े मस्जथरेट के न्यायािय जाना । तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोडकर चौबीस घंटे से अधधक नह ं होगा । 79. धगरफ्तार का वारंट भारत के ककसी भी थथान में ननष्पाहदत ककया जा सकेगा । वारंट कहां ननष्पाहदत ककया जा सकेगा । 80. (1) जब वारंट का ननष्पादन उस े जार करन े वाि े न्यायािय की थथानीय अधध काररता के अधधकाररता के बाहर ककया जाना है तब वह न्यायािय, ऐसा वारंट अपनी अधधकाररता के बाहर ननष्पादन के लिए भेजा भीतर ककसी पुलिस अधधकार को ननदेलित करन े के बजाय उस े डाक द्वारा या अन्यथा गया वारंट । ककसी ऐस े कायपष ािक मस्जथरेट या स्जिा पुलिस अधीिक या पुलिस आयुक्ट् त को भजे सकेगा स्जसकी अधधकाररता का थथानीय सीमाओं के भीतर उसका ननष्पादन ककया जाना है, और वह कायपष ािक मस्जथरेट या स्जिा अधीिक या आयुक्ट् त उस पर अपना नाम पष्ृ ठांककत करेगा और यहद साध्य है तो उसका ननष्पादन इसमें इसके पूव ष उपबंधधत र नत से कराएगा । (2) उपधारा (1) के अधीन वारंट जार करने वािा न्यायािय धगरफ्तार ककए जाने वािे व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध ऐसी जानकार का सार ऐसी दथतावेजों सहहत, यहद कोई हों, जो धारा 83 के अधीन कारषवाई करन े वािे न्यायािय को, यह ववननस्श् चत करन े में कक उस व्यस्क्ट् त की जमानत मंजूर की जाए या नह ं समथ ष बनाने के लिए पयाषप् त हैं, वारंट के साथ भेजेगा । 81. (1) जब पुलिस अधधकार को ननदेलित वारंट का ननष्पादन उस े जार करने वािे अधध काररता के न्यायािय की थथानीय अधधकाररता के बाहर ककया जाना है तब वह पुलिस अधधकार उसे बाहर ननष्पादन के लिए पुलिस पष्ृ ठांकन के लिए साधारणतया ऐसे कायपष ािक मस्जथरेट के पास, या पुलिस थाने के अधधकार को भारसाधक अधधकार से अननम् न पंस्क्ट् त के पुलिस अधधकार के पास, स्जसकी अधधकाररता ननदेलित वारंट । की थथानीय सीमाओं के भीतर उस वारंट का ननष्पादन ककया जाना है, िे जाएगा । (2) ऐसा मस्जथरेट या पुलिस अधधकार उस पर अपना नाम पष्ृ ठांककत करेगा और ऐसा पष्ृ ठांकन उस पुलिस अधधकार के लिए, स्जसको वह वारंट ननदेलित ककया गया है, उसका ननष्पादन करन े के लिए पयाषप् त प्राधधकार होगा और थथानीय पुलिस, यहद ऐसी अपेिा की जाती है तो ऐसे अधधकार की ऐसे वारंट का ननष्पादन करन े में सहायता करेगी । (3) जब कभी यह ववश् वास करन े का कारण है कक उस मस्जथरेट या पुलिस अधधकार186 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— का, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर वह वारंट ननष्पाहदत ककया जाना है, पष्ृ ठांकन प्राप् त करन े में होन े वािे वविंब से ऐसा ननष्पादन नह ं हो पाएगा, तब वह पुलिस अधधकार , स्जसे वह ननदेलित ककया गया है, उसका ननष्पादन उस न्यायािय की स्जसने उसे जार ककया है, थथानीय अधधकाररता से परे ककसी थथान में ऐसे पष्ृ ठांकन के बबना कर सकेगा । स्जस व्यस्क्ट्त के 82. (1) जब धगरफ्तार के वारंट का ननष्पादन उस स्जिे से बाहर ककया जाता है ववरुद्ध वारंट स्जसमें वह जार ककया गया था, तब धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को, उस दिा के लसवाय, जार ककया गया स्जसमें वह न्यायािय स्जसने वह वारंट जार ककया है, धगरफ्तार के थथान से तीस है, उसके ककिोमीटर के भीतर है या उस कायपष ािक मस्जथरेट या स्जिा पुलिस अधीिक या पुलिस धगरफ्तार होन े आयुक्ट् त से, स्जसकी अधधकाररता की थथानीय सीमाओं के भीतर धगरफ्तार की गई थी, पर प्रकिया । अधधक ननकट है, या धारा 73 के अधीन प्रनतभूनत िे ि गई है, ऐसे मस्जथरेट या स्जिा अधीिक या आयुक्ट् त के समि िे जाया जाएगा । (2) उपधारा (1) में ननहदषष्ट ककसी व्यस्क्ट्त की धगरफ्तार पर, पुलिस अधधकार ऐसी धगरफ्तार और ऐसे थथान की जहां धगरफ्तार ककया गया व्यस्क्ट्त रिा गया है, के संबंध में, स्जिे के नामननहदषष्ट पुलिस अधधकार को तथा अन्य स्जिे के ऐसे पुलिस अधधकार को, जहां धगरफ्तार ककया गया व्यस्क्ट्त साधारणतया ननवास करता है, तुरंत जानकार देगा । उस मस्जथरेट 83. (1) यहद धगरफ्तार ककया गया व्यस्क्ट् त वह व्यस्क्ट् त प्रतीत होता है जो वारंट जार द्वारा प्रकिया करन े वािे न्यायािय द्वारा आिनयत है तो ऐसा कायपष ािक मस्जथरेट या स्जिा पुलिस स्जसके समि अधीिक या पुलिस आयुक्ट् त उस न्यायािय के पास उसे अलभरिा में भेजने का ननदेि देगा : ऐसे धगरफ्तार परंतु यहद अपराध जमानतीय है और ऐसा व्यस्क्ट् त ऐसा जमानतपत्र देने के लिए ककया गया व्यस्क्ट् त िाया तैयार और रजामंद है स्जससे ऐसे मस्जथरेट, स्जिा अधीिक या आयुक्ट् त का समाधान हो जाए । जाए या वारंट पर धारा 73 के अधीन ननदेि पष्ृ ठांककत है और ऐसा व्यस्क्ट् त ऐसे ननदेि द्वारा अपेक्षित प्रनतभूनत देन े के लिए तैयार और रजामदं है तो वह मस्जथरेट, स्जिा अधीिक या आयुक्ट् त, यथास्थथनत, ऐसा जमानतपत्र या प्रनतभूनत िेगा और बंधपत्र उस न्यायािय को भेज देगा स्जसने वारंट जार ककया था : परंतु यह और कक यहद अपराध अजमानतीय है तो (धारा 480 के उपबंधों के अधीन रहत े हुए) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के लिए, या उस स्जि े के स्जसमें धगरफ्तार की गई है सेिन न्यायाधीि के लिए धारा 80 की उपधारा (2) में ननहदषष् ट जानकार और दथतावेजों पर ववचार करन े के पश् चात ् ऐसे व्यस्क्ट् त को छोड देना ववधधपूण ष होगा । (2) इस धारा की कोई बात पुलिस अधधकार को धारा 73 के अधीन प्रनतभूनत िेने से रोकन े वाि न समझी जाएगी । ग—उदघ ोषणा और कुकी फरार व्यस्क्ट्त के 84. (1) यहद ककसी न्यायािय को (चाहे साक्ष्य िेने के पश् चात ् या लिए बबना) यह लिए उद् घोर्णा । ववश् वास करन े का कारण है कक कोई व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध उसने वारंट जार ककया है, फरार हो गया है, या अपने को नछपा रहा है स्जससे ऐसे वारंट का ननष्पादन नह ं ककया जा सकता तो ऐसा न्यायािय उसस े यह अपेिा करन े वाि लिखित उद्घ ोर्णा प्रकालित कर सकेगा कक वह व्यस्क्ट् त ववननहदषष् ट थथान में और ववननहदषष् ट समय पर, जो उस उद्घ ोर्णा के प्रकािन की तार ि से कम से कम तीस हदन पश् चात ् का होगा, उपस्थथत हो ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 187 (2) उद्घ ोर्णा ननम् नलिखित रूप से प्रकालित की जाएगी :— (i) (क) वह उस नगर या ग्राम के, स्जसमें ऐसा व्यस्क्ट् त साधारणतया ननवास करता है, ककसी सहजदृश्य थथान में सावजष ननक रूप से प़ि जाएगी ; (ि) वह उस घर या वासथथान के, स्जसमें ऐसा व्यस्क्ट् त साधारणतया ननवास करता है, ककसी सहजदृश्य भाग पर या ऐसे नगर या ग्राम के ककसी सहजदृश्य थथान पर िगाई जाएगी ; (ग) उसकी एक प्रनत उस न्यायािय के ककसी सहजदृश्य भाग पर िगाई जाएगी ; (ii) यहद न्यायािय ठीक समझता है तो वह यह ननदेि भी दे सकेगा कक उद्घ ोर्णा की एक प्रनत उस थथान में, पररचालित ककसी दैननक समाचारपत्र में प्रकालित की जाए जहां ऐसा व्यस्क्ट् त साधारणतया ननवास करता है । (3) उद्घ ोर्णा जार करन े वािे न्यायािय द्वारा यह लिखित कथन कक उद् घोर्णा ववननहदषष् ट हदन उपधारा (2) के िंड (i) में ववननहदषष् ट र नत से सम्यक् रूप से प्रकालित कर द गई है, इस बात का ननश् चायक साक्ष्य होगा कक इस धारा की अपेिाओं का अनुपािन कर हदया गया है और उद्घ ोर्णा उस हदन प्रकालित कर द गई थी । (4) जहां उपधारा (1) के अधीन प्रकालित की गई उद्घ ोर्णा ऐसे अपराध के अलभयुक्ट्त व्यस्क्ट्त के संबंध में, स्जसे भारतीय न्याय संहहता, 2023 या तत्समय प्रवत्तृ 2023 का 45 ककसी अन्य ववधध के अधीन दस वर् ष या अधधक के कारावास से या आजीवन कारावास या मत्ृ यु दडड से दंडनीय बनाया गया है और ऐसा व्यस्क्ट् त उद् घोर्णा में अपेक्षित ववननहदषष् ट थथान और समय पर उपस्थथत होने में असफि रहता है तो न्यायािय, तब ऐसी जांच करन े के पश् चात ् जैसी वह ठीक समझता है, उस े उद् घोवर्त अपराधी प्रकट कर सकेगा और उस प्रभाव की घोर्णा कर सकेगा । (5) उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध न्यायािय द्वारा उपधारा (4) के अधीन की गई घोर्णा को उसी प्रकार िागू होंगे, जैसे व े उपधारा (1) के अधीन प्रकालित उद्घ ोर्णा को िागू होत े हैं । 85. (1) धारा 84 के अधीन उद् घोर्णा जार करने वािा न्यायािय, ऐसे कारणों से, फरा र व्यस्क्ट् त जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, उद् घोर्णा जार ककए जान े के पश् चात ् ककसी भी समय, की संपवत्त की कुकी । उद् घोवर्त व्यस्क्ट् त की चि या अचि, या दोनों प्रकार की, ककसी भी संपवत्त की कुकी का आदेि दे सकता है : परंतु यहद उद् घोर्णा जार करत े समय न्यायािय का िपथपत्र द्वारा या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कक वह व्यस्क्ट् त स्जसके संबंध में उद् घोर्णा ननकाि जाती है— (क) अपनी समथत संपवत्त या उसके ककसी भाग का व्ययन करन े वािा है ; या (ि) अपनी समथत संपवत्त या उसके ककसी भाग को उस न्यायािय की थथानीय अधधकाररता से हटाने वािा है, तो वह उद्घ ोर्णा जार करन े के साथ ह साथ संपवत्त की कुकी का आदेि दे सकेगा । (2) ऐसा आदेि उस स्जिे में, स्जसमें वह हदया गया है, उस व्यस्क्ट् त की ककसी भी संपवत्त की कुकी प्राधधकृत करेगा और उस स्जिे के बाहर की उस व्यस्क्ट् त की ककसी संपवत्त188 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— की कुकी तब प्राधधकृत करेगा जब वह उस स्जिा मस्जथरेट द्वारा, स्जसके स्जिे में ऐसी संपवत्त स्थथत है, पष्ृ ठांककत कर हदया जाए । (3) यहद वह संपवत्त स्जसको कुकष करन े का आदेि हदया गया है, ऋण या अन्य चि संपवत्त हो, तो इस धारा के अधीन कुकी— (क) अलभग्रहण द्वारा की जाएगी ; या (ि) ररसीवर की ननयुस्क्ट् त द्वारा की जाएगी ; या (ग) उद् घोवर्त व्यस्क्ट् त को या उसके ननलमत्त ककसी को भी उस सपं वत्त का पररदान करने का प्रनतर्ेध करने वािे लिखित आदेि द्वारा की जाएगी ; या (घ) इन र नतयों में से सब या ककन्ह ं दो से की जाएगी, जैसा न्यायािय ठीक समझे । (4) यहद वह संपवत्त स्जसको कुकष करन े का आदेि हदया गया है, अचि है तो इस धारा के अधीन कुकी राज्य सरकार को राजथव देने वाि भूलम की दिा में उस स्जिे के किक्ट्टर के माध्यम से की जाएगी स्जसमें वह भूलम स्थथत है, और अन्य सब दिाओं में,— (क) कब्जा िेकर की जाएगी ; या (ि) ररसीवर की ननयुस्क्ट् त द्वारा की जाएगी ; या (ग) उद् घोवर्त व्यस्क्ट् त को या उसके ननलमत्त ककसी को भी संपवत्त का ककराया देने या उस संपवत्त का पररदान करन े का प्रनतर्ेध करन े वािे लिखित आदेि द्वारा की जाएगी ; या (घ) इन र नतयों में से सब या ककन्ह ं दो से की जाएगी, जसै ा न्यायािय ठीक समझे । (5) यहद वह संपवत्त, स्जसको कुकष करन े का आदेि हदया गया है, जीवधन है या ववनश् वर प्रकृनत की है तो, यहद न्यायािय समीचीन समझता है तो वह उसके तुरंत वविय का आदेि दे सकता है और ऐसी दिा में वविय के आगम न्यायािय के आदेि के अधीन रहेंगे । (6) इस धारा के अधीन ननयुक्ट् त ररसीवर की िस्क्ट् तयां, कतव्ष य और दानयत्व वे ह होंगे, जो लसववि प्रकिया संहहता, 1908 के अधीन ननयुक्ट् त ररसीवर के होत े हैं । 1908 का 5 उद्घोवर्त 86. न्यायािय, पुलिस अधीिक या पुलिस आयुक्ट्त की पंस्क्ट्त या इससे ऊपर के व्यस्क्ट्त की ककसी पुलिस अधधकार से लिखित अनुरोध प्राप्त होने पर अध्याय 8 में उपबंधधत प्रकिया संपवत्त की के अनुसार ककसी उद्घोवर्त व्यस्क्ट्त से संबंधधत संपवत्त की पहचान, कुकी और जब्ती के पहचान और लिए ककसी न्यायािय या संबंधधत राज्य के ककसी प्राधधकार से सहायता का अनुरोध करने कुकी । की प्रकिया का आरंभ करेगा । कुकी के बारे 87. (1) यहद धारा 85 के अधीन कुकष की गई ककसी संपवत्त के बारे में उस कुकी की में दाव े और तार ि से छह मास के भीतर कोई व्यस्क्ट् त, जो उद् घोवर्त व्यस्क्ट् त से लभन् न है, इस आधार आपवत्तयां । पर दावा या उसके कुकष ककए जान े पर आपवत्त करता है कक दावेदार या आपवत्तकताष का उस संपवत्त में कोई हहत है और ऐसा हहत धारा 85 के अधीन कुकष नह ं ककया जा सकता तो उस दावे या आपवत्त की जांच की जाएगी, और उसे पूणषत: या भागत: मंजूर या नामंजूरअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 189 ककया जा सकता है : परंतु इस उपधारा द्वारा अनुज्ञात अवधध के भीतर ककए गए ककसी दाव े या आपवत्त को दावेदार या आपवत्तकताष की मत्ृ यु हो जाने की दिा में उसके ववधधक प्रनतननधध द्वारा चािू रिा जा सकेगा । (2) उपधारा (1) के अधीन दावे या आपवत्तयां उस न्यायािय में, स्जसके द्वारा कुकी का आदेि जार ककया गया है, या यहद दावा या आपवत्त ऐसी संपवत्त के बारे में है जो धारा 85 की उपधारा (2) के अधीन पष्ृ ठांककत आदेि के अधीन कुकष की गई है तो, उस स्जिे के, स्जसमें कुकी की जाती है मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के न्यायािय में की जा सकेगी । (3) प्रत्येक ऐसे दावे या आपवत्त की जांच उस न्यायािय द्वारा की जाएगी स्जसमें वह ककया गया या की गई है : परंतु यहद वह मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के न्यायािय में ककया गया है या की गई है तो वह उस े ननपटारे के लिए अपने अधीनथथ ककसी मस्जथरेट को दे सकेगा । (4) कोई व्यस्क्ट् त, स्जसके दावे या आपवत्त को उपधारा (1) के अधीन आदेि द्वारा पूणतष : या भागत: नामंजूर कर हदया गया है, ऐसे आदेि की तार ि से एक वर् ष की अवधध के भीतर, उस अधधकार को लसद्ध करन े के लिए, स्जसका दावा वह वववादग्रथत संपवत्त के बारे में करता है, वाद संस्थथत कर सकेगा ; ककंत ु वह आदेि ऐसे वाद के, यहद कोई हो, पररणाम के अधीन रहत े हुए ननश् चायक होगा । 88. (1) यहद उद्घ ोवर्त व्यस्क्ट् त उद्घ ोर्णा में ववननहदषष् ट समय के भीतर उपस्थथत कुकष की हुई हो जाता है तो न्यायािय संपवत्त को कुकी से ननमुक्ट्ष त करन े का आदेि देगा । संपवत्त को ननमुक्ट्ष त करना, (2) यहद उद्घ ोवर्त व्यस्क्ट् त उद् घोर्णा में ववननहदषष् ट समय के भीतर उपस्थथत नह ं वविय और होता है तो कुकष संपवत्त, राज्य सरकार के व्यय के अधीन रहेगी, और उसका वविय कुकी वापस करना । की तार ि से छह मास का अवसान हो जाने पर तथा धारा 87 के अधीन ककए गए ककसी दावे या आपवत्त का उस धारा के अधीन ननपटारा हो जाने पर ह ककया जा सकता है ककंतु यहद वह िीघ्रतया और प्रकृत्या ियिीि है या न्यायािय के ववचार में वविय करना थवामी के फायदे के लिए होगा तो इन दोनों दिाओं में से ककसी में भी न्यायािय, जब कभी ठीक समझे, उसका वविय करा सकेगा । (3) यहद कुकी की तार ि से दो वर् ष के भीतर कोई व्यस्क्ट् त, स्जसकी संपवत्त उपधारा (2) के अधीन राज्य सरकार के व्यय के अधीन है या रह है, उस न्यायािय के समि, स्जसके आदेि स े वह संपवत्त कुकष की गई थी या उस न्यायािय के समि, स्जसके ऐसा न्यायािय अधीनथथ है, थवेच्छा से उपस्थथत हो जाता है या पकडकर िाया जाता है और उस न्यायािय को समाधानप्रद रूप में यह साबबत कर देता है कक वह वारंट के ननष्पादन से बचन े के प्रयोजन से फरार नह ं हुआ या नह ं नछपा और यह कक उस े उद्घ ोर्णा की ऐसी सूचना नह ं लमि थी स्जससे वह उसमें ववननहदषष् ट समय के भीतर उपस्थथत हो सकता तो ऐसी संपवत्त का, या यहद वह वविय कर द गई है तो वविय के िुद्ध आगमों का, या यहद उसका केवि कुछ भाग वविय ककया गया है तो ऐसे वविय के िुद्ध आगमों और अवलिष् ट संपवत्त का, कुकी के पररणामथवरूप उपगत सब िचों को उसमें से चकु ा कर, उस े पररदान कर हदया जाएगा ।190 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कुकष संपवत्त की 89. धारा 88 की उपधारा (3) में ननहदषष् ट कोई व्यस्क्ट् त, जो संपवत्त या उसके वविय वापसी के लिए के आगमों के पररदान के इंकार से व्यधथत है, उस न्यायािय से अपीि कर सकेगा स्जसमें आवेदन नामंजूर प्रथम उस्लिखित न्यायािय के दंडादेिों से सामान्यतया अपीिें होती हैं । करन े वािे आदेि से अपीि । घ—आिेलशकाओं संबंिी अन्य ननयम समन के थथान 90. न्यायािय ककसी भी ऐसे मामि े में, स्जसमें वह ककसी व्यस्क्ट् त की उपस्थथनत के पर या उसके लिए समन जार करने के लिए इस संहहता द्वारा सिक्ट् त ककया गया है, अपने कारणों को अनतररक्ट्त वारंट अलभलिखित करन े के पश् चात,् उसकी धगरफ्तार के लिए वारंट जार कर सकेगा— का जार ककया (क) यहद या तो ऐसा समन जार ककए जाने के पूव ष या पश् चात ् ककंतु उसकी जाना । उपस्थथनत के लिए ननयत समय के पूव ष न्यायािय को यह ववश् वास करन े का कारण हदिाई पडता है कक वह फरार हो गया है या समन का पािन नह ं करेगा ; या (ि) यहद वह ऐसे समय पर उपस्थथत होने में असफि रहता है और यह साबबत कर हदया जाता है कक उस पर समन की तामीि सम्यक् रूप से ऐसे समय में कर द गई थी कक उसके तद्नुसार उपस्थथत होने के लिए अवसर था और ऐसी असफिता के लिए कोई उधचत प्रनतहेत ु नह ं हदया जाता है । उपस्थथनत के 91. जब कोई व्यस्क्ट् त, स्जसकी उपस्थथनत या धगरफ्तार के लिए ककसी न्यायािय लिए बंधपत्र या का पीठासीन अधधकार समन या वारंट जार करने के लिए सिक्ट् त है, ऐसे न्यायािय में जमानतपत्र िेन े उपस्थथत है तब वह अधधकार उस व्यस्क्ट् त से अपेिा कर सकेगा कक वह उस न्यायािय की िस्क्ट्त । में या ककसी अन्य न्यायािय में, स्जसको मामिा ववचारण के लिए अंतररत ककया जाता है, अपनी उपस्थथनत के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करे । उपस्थथनत का 92. जब कोई व्यस्क्ट् त, जो इस संहहता के अधीन लिए गए ककसी बंधपत्र या बंधपत्र या जमानतपत्र द्वारा न्यायािय के समि उपस्थथत होने के लिए आबद्ध है, उपस्थथत नह ं जमानतपत्र भगं होता है तब उस न्यायािय का पीठासीन अधधकार यह ननदेि देत े हुए वारंट जार कर करन े पर सकेगा कक वह व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककया जाए और उसके समि प्रथतुत ककया जाए । धगरफ्तार । इस अध्याय के 93. समन और वारंट तथा उन्हें जार करने, उनकी तामीि और उनके ननष्पादन उपबंधों का संबंधी जो उपबंध इस अध्याय में हैं वे इस संहहता के अधीन जार ककए गए प्रत्येक समन साधारणतया और धगरफ्तार के प्रत्येक वारंट को, यथािक्ट्य िागू होंगे । समनों और धगरफ्तार के वारंटों को िाग ू होना । अध्याय 7 चीिें प्रस्तुत करने को वििश करने के लिए आिेलशकाए ं क—प्रस्तुत करने के लिए समन दथतावेज या 94. (1) जब कभी कोई न्यायािय या पुलिस थाने का कोई भारसाधक अधधकार अन्य चीज यह समझता है कक ककसी ऐसे अन्वेर्ण, जांच, ववचारण, या अन्य कायषवाह के प्रयोजनों प्रथतुत करने के के लिए, जो इस संहहता के अधीन ऐसे न्यायािय या अधधकार के द्वारा या समि हो लिए समन । रह है, ककसी दथतावेज इिैक्ट्राननक संसूचना, स्जसमें ऐसी संसूचना डडवाइस भी िालमि है, स्जसमें डडस्जटि साक्ष्य अन्तववषष्ट होना संभाव्य है या अन्य चीज का प्रथतुत ककयाअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 191 जाना आवश्यक या वांछनीय है तो स्जस व्यस्क्ट् त के कब्जे या िस्क्ट् त में ऐसी दथतावेज या चीज के होने का ववश् वास है उसके नाम ऐसा न्यायािय समन या ऐसा अधधकार एक लिखित आदेि उससे यह अपेिा करत े हुए जार कर सकेगा कक उस समन या आदेि में उस्लिखित समय और थथान पर उसे प्रथतुत करे या उपस्थथत हो और उसे प्रथतुत करे । (2) यहद कोई व्यस्क्ट् त, स्जससे इस धारा के अधीन दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करन े की ह अपेिा की गई है, उस े प्रथतुत करन े के लिए थवयं उपस्थथत होने के बजाय उस दथतावेज या चीज को प्रथतुत करवा दे तो यह समझा जाएगा कक उसने उस अपेिा का अनुपािन कर हदया है । (3) इस धारा की कोई बात— 2023 का 47 (क) भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 129 और धारा 130 या बकैं कार 1891 का 13 बह साक्ष्य अधधननयम, 1891 पर प्रभाव डािने वाि नह ं समझी जाएगी  या (ि) डाक प्राधधकार की अलभरिा में ककसी पत्र, पोथटकाड ष या अन्य दथतावेज या ककसी पासिष या चीज को िागू होने वाि नह ं समझी जाएगी । 95. (1) यहद ककसी स्जिा मस्जथरेट, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, सेिन न्यायािय या पत्रों के संबंध उच् च न्यायािय की राय में ककसी डाक प्राधधकार की अलभरिा की कोई दथतावेज, पासिष में प्रकिया । या चीज इस संहहता के अधीन ककसी अन्वेर्ण, जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह के प्रयोजन के लिए चाहहए तो ऐसा मस्जथरेट या न्यायािय, यथास्थथनत, डाक प्राधधकार से यह अपेिा कर सकेगा कक उस दथतावेज, पासिष या चीज का पररदान उस व्यस्क्ट् त को, स्जसका वह मस्जथरेट या न्यायािय ननदेि दे, कर हदया जाए । (2) यहद ककसी अन्य मस्जथरेट की, चाहे वह कायपष ािक है या न्यानयक, या ककसी पुलिस आयुक्ट् त या स्जिा पुलिस अधीिक की राय में ऐसी कोई दथतावेज, पासिष या चीज ऐसे ककसी प्रयोजन के लिए चाहहए तो वह, यथास्थथनत, डाक प्राधधकार से अपेिा कर सकेगा कक वह ऐसी दथतावेज, पासिष या चीज के लिए तिािी कराए और उसे उपधारा (1) के अधीन स्जिा मस्जथरेट, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या न्यायािय के आदेिों के लमिने तक ननरुद्ध रि े । ख—तिाशी-िारंट 96. (1) जहां— तिा िी-वारंट कब जार ककया (क) ककसी न्यायािय को यह ववश् वास करन े का कारण है कक वह व्यस्क्ट् त, जा सकेगा । स्जसको धारा 94 के अधीन समन या आदेि या धारा 95 की उपधारा (1) के अधीन अपेिा संबोधधत की गई है या की जाती है, ऐसे समन या अपेिा द्वारा यथा अपेक्षित दथतावेज या चीज प्रथतुत नह ं करेगा या हो सकता है कक प्रथतुत न करे  या (ि) ऐसी दथतावेज या चीज के बारे में न्यायािय को यह ज्ञात नह ं है कक वह ककसी व्यस्क्ट् त के कब्जे में है  या (ग) न्यायािय यह समझता है कक इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह के प्रयोजनों की पूनत ष साधारण तिािी या ननर िण से होगी, वहां वह तिािी-वारंट जार कर सकेगा  और वह व्यस्क्ट् त, स्जसे ऐसा वारंट ननदेलित है, उसके अनुसार और इसमें इसके पश् चात ् अंतववष्ष ट उपबंधों के अनुसार तिािी िे सकेगा या ननर िण कर सकेगा ।192 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) यहद, न्यायािय ठीक समझता है, तो वह वारंट में उस ववलिष् ट थथान या उसके भाग को ववननहदषष् ट कर सकेगा और केवि उसी थथान या भाग की तिािी या ननर िण होगा  तथा वह व्यस्क्ट् त, स्जसको ऐसे वारंट के ननष्पादन का भार सौंपा जाता है, केवि उसी थथान या भाग की तिािी िेगा या ननर िण करेगा, जो ऐसे ववननहदषष् ट है । (3) इस धारा की कोई बात स्जिा मस्जथरेट या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट से लभन्न ककसी मस्जथरेट को डाक प्राधधकार की अलभरिा में ककसी दथतावेज, पासिष या अन्य चीज की तिािी के लिए वारंट जार करन े के लिए प्राधधकृत नह ं करेगी । उस थथान की 97. (1) यहद स्जिा मस्जथरेट, उपिंड मस्जथरेट या प्रथम वग ष मस्जथरेट को सूचना तिािी, स्जसमें लमिने पर और ऐसी जांच के पश् चात ् जैसी वह आवश्यक समझे, यह ववश् वास करने का चुराई हुई संपवत्त, कारण है कक कोई थथान चुराई हुई संपवत्त के ननिेप या वविय के लिए या ककसी ऐसी कूटरधचत आपवत्तजनक वथतु के, स्जसको यह धारा िागू होती है, ननिेप, वविय या उत्पादन के लिए दथतावेज, आहद उपयोग में िाया जाता है, या कोई ऐसी आपवत्तजनक वथतु ककसी थथान में ननक्षिप् त है, होन े का संदेह है । तो वह कांथटेबि की पंस्क्ट् त से ऊपर के ककसी पुलिस अधधकार को वारंट द्वारा यह प्राधधकार दे सकेगा कक वह— (क) उस थथान में ऐसी सहायता के साथ, जैसी आवश्यक हो, प्रवेि करे  (ि) वारंट में ववननहदषष् ट र नत से उसकी तिािी िे  (ग) वहां पाई गई ककसी भी संपवत्त या वथतु को, स्जसके चुराई हुई संपवत्त या ऐसी आपवत्तजनक वथतु, स्जसको यह धारा िागू होती है, होने का उस े उधचत संदेह है, कब्जे में िे  (घ) ऐसी संपवत्त या वथत ु को मस्जथरेट के पास ि े जाए या अपराधी को मस्जथरेट के समि िे जाने तक उसको उसी थथान पर पहरे में रि े या अन्यथा उस े ककसी सुरक्षित थथान में रि े  (ङ) ऐसे थथान में पाए गए ऐसे प्रत्येक व्यस्क्ट् त को अलभरिा में ि े और मस्जथरेट के समि िे जाए, स्जसके बारे में प्रतीत हो कक वह ककसी ऐसी संपवत्त या वथतु के ननिेप, वविय या उत्पादन में यह जानत े हुए या संदेह करन े का उधचत कारण रित े हुए संसगी रहा है कक, यथास्थथनत, वह चुराई हुई संपवत्त है या ऐसी आपवत्तजनक वथतु है, स्जसको यह धारा िागू होती है । (2) वे आपवत्तजनक वथतुएं, स्जनको यह धारा िागू होती है, ननम् नलिखित हैं — (क) कूटकृत लसक्ट् का  (ि) लसक्ट्का-ननमाषण अधधननयम, 2011 के उलिंघन में बनाए गए या 201 1 का 11 सीमािुलक अधधननयम, 1962 की धारा 11 के अधीन तत्समय प्रवत्तृ ककसी 1962 का 52 अधधसूचना के उलिंघन में भारत में िाए गए धातु-िंड  (ग) कूटकृत करेंसी नोट  कूटकृत थटाम्प  (घ) कूटरधचत दथतावेज  (ङ) नकली मुद्राएं  (च) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 294 में ननहदषष् ट अश् ि ि 202 3 का 45 वथतुएं अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 193 (छ) िंड (क) स े (च) तक के िंडों में उस्लिखित वथतुओं में स े ककसी के उत्पादन के लिए प्रयुक्ट् त उपकरण या सामग्री । 98. (1) जहां, राज्य सरकार को प्रतीत होता है कक— कुछ प्रकािनों (क) ककसी समाचारपत्र या पुथतक में  या के जब्त होने की घोर्णा (ि) ककसी दथतावेज में, करन े और चाहे वह कह ं भी मुहद्रत हुई हो, कोई ऐसी बात अंतववषष्ट है स्जसका प्रकािन भारतीय उनके लिए तिािी-वारंट 2023 का 45 न्याय संहहता, 2023 की धारा 152 या धारा 196 या धारा 197 या धारा 294 या धारा जार करन े की 295 या धारा 299 के अधीन दंडनीय है, वहां राज्य सरकार, ऐसी बात अंतववषष् ट करने िस्क्ट् त । वािे समाचारपत्र के अंक की प्रत्येक प्रनत का और ऐसी पुथतक या अन्य दथतावेज की प्रत्येक प्रनत का सरकार के पि में जब्त कर लिए जाने की घोर्णा, अपनी राय के आधारों का कथन करते हुए, अधधसूचना द्वारा कर सकेगी और तब भारत में, जहां भी वह लमिे, कोई भी पुलिस अधधकार उसे अलभगहृ त कर सकेगा और कोई मस्जथरेट, उप- ननर िक से अननम् न पंस्क्ट् त के ककसी पुलिस अधधकार को, ककसी ऐसे पररसर में, जहां ऐसे ककसी अंक की कोई प्रनत या ऐसी कोई पुथतक या अन्य दथतावेज है या उसके होने का उधचत संदेह है, प्रवेि करने और उसके लिए तिािी िेने के लिए वारंट द्वारा प्राधधकृत कर सकेगा । (2) इस धारा में और धारा 99 में— (क) “समाचारपत्र” और “पुथतक” के व े ह अथ ष होंगे, जो प्रेस और पुथतक 1867 का 25 रस्जथर करण अधधननयम, 1867 में हैं ; (ि) “दथतावेज” के अंतगतष रंगधचत्र, रेिाधचत्र या फोटोधचत्र या अन्य दृश्यरूपण भी हैं । (3) इस धारा के अधीन पाररत ककसी आदेि या की गई ककसी कारषवाई को ककसी न्यायािय में धारा 99 के उपबंधों के अनुसार ह प्रश् नगत ककया जाएगा, अन्यथा नह ं । 99. (1) ककसी ऐसे समाचारपत्र, पुथतक या अन्य दथतावेज में, स्जसके बारे में धारा जब्त ी की 98 के अधीन जब्ती की घोर्णा की गई है, कोई हहत रिन े वािा कोई व्यस्क्ट् त उस घोर्णा को अपाथत करने घोर्णा के राजपत्र में प्रकािन की तार ि से दो मास के भीतर उस घोर्णा को इस आधार के लिए उच् च पर अपाथत कराने के लिए उच् च न्यायािय में आवेदन कर सकेगा कक समाचारपत्र के उस न्यायािय में अंक या उस पुथतक या अन्य दथतावेज में, स्जसके बारे में वह घोर्णा की गई थी, कोई आवेदन । ऐसी बात अंतववष्ष ट नह ं है, जो धारा 98 की उपधारा (1) में ननहदषष् ट है । (2) जहां उच् च न्यायािय में तीन या अधधक न्यायाधीि हैं, वहां ऐसा प्रत्येक आवेदन उच् च न्यायािय के तीन न्यायाधीिों से बनी वविेर् न्यायपीठ द्वारा सुना और अवधाररत ककया जाएगा और जहां उच् च न्यायािय में तीन से कम न्यायाधीि हैं वहां ऐसी वविेर् न्यायपीठ में उस उच् च न्यायािय के सब न्यायाधीि होंगे । (3) ककसी समाचारपत्र के संबंध में ऐसे ककसी आवेदन की सुनवाई में, उस समाचारपत्र में, स्जसकी बाबत जब्ती की घोर्णा की गई थी, अंतववष्ष ट िब्दों, धचह्नों या दृश्यरूपणों की प्रकृनत या प्रववृत्त के सबूत में सहायता के लिए उस समाचारपत्र की कोई प्रनत साक्ष्य में द जा सकेगी ।194 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (4) यहद उच् च न्यायािय का इस बारे में समाधान नह ं होता है कक समाचारपत्र के उस अंक में या उस पुथतक या अन्य दथतावेज में, स्जसके बारे में वह आवेदन ककया गया है, कोई ऐसी बात अंतववष्ष ट है जो धारा 98 की उपधारा (1) में ननहदषष् ट है, तो वह जब्ती की घोर्णा को अपाथत कर देगा । (5) जहां उन न्यायाधीिों में, स्जनसे वविेर् न्यायपीठ बनी है, मतभेद है वहां ववननश् चय उन न्यायाधीिों की बहुसंख्या की राय के अनुसार होगा । सदोर् परररुद्ध 100. यहद ककसी स्जिा मस्जथरेट, उपिंड मस्जथरेट या प्रथम वग ष मस्जथरेट को यह व्यस्क्ट् तयों के ववश् वास करन े का कारण है कक कोई व्यस्क्ट् त ऐसी पररस्थथनतयों में परररुद्ध है, स्जनमें वह लिए तिािी । परररोध अपराध की कोहट में आता है, तो वह तिािी-वारंट जार कर सकेगा और वह व्यस्क्ट् त, स्जसको ऐसा वारंट ननदेलित ककया जाता है, ऐसे परररुद्ध व्यस्क्ट् त के लिए तिािी िे सकेगा, और ऐसी तिािी तद्नुसार ह ि जाएगी और यहद वह व्यस्क्ट् त लमि जाए, तो उस े तुरंत मस्जथरेट के समि िे जाया जाएगा, जो ऐसा आदेि करेगा जैसा उस मामि े की पररस्थथनतयों में उधचत प्रतीत हो । अपहृत महहिा 101. ककसी महहिा या ककसी बालिका के ककसी ववधधववरुद्ध प्रयोजन के लिए अपहृत को वापस करन े ककए जाने या ववधधववरुद्ध ननरुद्ध रि े जाने का िपथ पर पररवाद ककए जान े की दिा में के लिए वववि स्जिा मस्जथरेट, उपिंड मस्जथरेट या प्रथम वगष मस्जथरेट यह आदेि कर सकेगा कक उस करन े की महहिा को तुरंत थवतंत्र ककया जाए या वह बालिका उसके माता-वपता, संरिक या अन्य िस्क्ट्त । व्यस्क्ट् त को, जो उस बालिका का ववधधपूण ष भारसाधक है, तुरंत वापस कर द जाए और ऐसे आदेि का अनुपािन ऐसे बि के प्रयोग द्वारा, जैसा आवश्यक हो, करा सकता है । ग.—तिाशी संबंिी सािारण उपबंि तिािी-वारंटों का 102. धारा 32, धारा 72, धारा 74, धारा 76, धारा 79, धारा 80 और धारा 81 के ननदेिन, आहद । उपबंध, जहां तक हो सके, उन सब तिािी-वारंटों को िाग ू होंगे जो धारा 96, धारा 97, धारा 98 या धारा 100 के अधीन जार ककए जात े हैं । बंद थथान के 103. (1) जब कभी इस अध्याय के अधीन तिािी लिए जाने या ननर िण ककए भारसाधक जाने वािा कोई थथान बंद है तब उस थथान में ननवास करन े वािा या उसका भारसाधक व्यस्क्ट् त तिािी व्यस्क्ट् त उस अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त की, जो वारंट का ननष्पादन कर रहा है, मांग पर िेन े देंग े । और वारंट के प्रथतुत ककए जान े पर उस े उसमें अबाध प्रविे करन े देगा और वहां तिािी िेने के लिए सब उधचत सुववधाएं देगा । (2) यहद उस थथान में इस प्रकार प्रवेि प्राप् त नह ं हो सकता है तो वह अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त, जो वारंट का ननष्पादन कर रहा है धारा 44 की उपधारा (2) द्वारा उपबंधधत र नत से कायवष ाह कर सकेगा । (3) जहां ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त के बारे में, जो ऐसे थथान में या उसके आसपास है, उधचत रूप से यह संदेह ककया जाता है कक वह अपने िर र पर कोई ऐसी वथतु नछपाए हुए है स्जसके लिए तिािी ि जानी चाहहए तो उस व्यस्क्ट् त की तिािी ि जा सकेगी और यहद वह व्यस्क्ट् त महहिा है, तो तिािी लिष् टता का पूण ष ध्यान रित े हुए अन्य महहिा द्वारा ि जाएगी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 195 (4) इस अध्याय के अधीन तिािी िेने के पूव ष ऐसा अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त, जब तिािी िेने ह वािा हो, तिािी में उपस्थथत रहन े और उसके सािी बनन े के लिए उस मुहलिे के, स्जसमें तिािी लिया जाने वािा थथान है, दो या अधधक थवतंत्र और प्रनतस्ष् ठत ननवालसयों को या यहद उक्ट् त मुहलिे का ऐसा कोई ननवासी नह ं लमिता है या उस तिािी का सािी होने के लिए रजामदं नह ं है तो ककसी अन्य मुहलिे के ऐसे ननवालसयों को बिु ाएगा और उनको या उनमें से ककसी को ऐसा करन े के लिए लिखित आदेि जार कर सकेगा । (5) तिािी उनकी उपस्थथनत में ि जाएगी और ऐसी तिािी के अनुिम में अलभगहृ त सब चीजों की और स्जन-स्जन थथानों में वे पाई गई हैं उनकी सूची ऐस े अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा तैयार की जाएगी और ऐसे साक्षियों द्वारा उस पर हथतािर ककए जाएंगे, ककंतु इस धारा के अधीन तिािी के सािी बनन े वािे ककसी व्यस्क्ट् त से, तिािी के सािी के रूप में न्यायािय में उपस्थथत होने की अपेिा, उस दिा में ह की जाएगी, जब वह न्यायािय द्वारा वविेर् रूप से समन ककया गया हो । (6) तिािी लिए जाने वाि े थथान के अधधभोगी को या उसकी ओर से ककसी व्यस्क्ट् त को तिािी के दौरान उपस्थथत रहने की अनुमनत प्रत्येक दिा में द जाएगी और इस धारा के अधीन तैयार की गई उक्ट् त साक्षियों द्वारा हथतािररत सूची की एक प्रनतलिवप ऐसे अधधभोगी या ऐसे व्यस्क्ट् त को पररदत्त की जाएगी । (7) जब ककसी व्यक्‍तत की तलाशी उपधारा (3) के अधीन ली जाती है तब कब्जे में ली गई सब चीजो ं की सूची तैयार की जाएगी और उसकी एक प्रकतकलकप ऐसे व्यक्‍तत को पररदत्त की जाएगी । (8) कोई व्यस्क्ट् त जो इस धारा के अधीन तिािी में उपस्थथत रहन े और सािी बनन े के लिए ऐस े लिखित आदेि द्वारा, जो उस े पररदत्त या ननववदत्त ककया गया है, बुिाए जान े पर, ऐसा करन े स े उधचत कारण के बबना इंकार या उसमें उपेिा करेगा, उसके बारे में यह समझा 2023 का 45 जाएगा कक उसन े भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 222 के अधीन अपराध ककया है । 104. जब तिािी-वारंट को ककसी ऐस े थथान में ननष्पाहदत करन े में, जो उस न्यायािय अधध काररता के परे तिािी में की, स्जसन े उस े जार ककया है, थथानीय अधधकाररता से परे है, उन चीजों में से, स्जनके लिए पाई गई चीजों तिािी ि गई है, कोई चीजें पाई जाए ं तब व े चीजें, इसमें इसके पश् चात ् अंतववष्ष ट उपबंधों के का व्ययन । अधीन तैयार की गई, उनकी सूची सहहत उस न्यायािय के समि, स्जसन े वारंट जार ककया था तुरंत िे जाई जाएंगी ककंत ु यहद वह थथान ऐसे न्यायािय की अपिे ा उस मस्जथरेट के अधधक समीप है, जो वहां अधधकाररता रिता है, तो सूची और चीजें उस मस्जथरेट के समि तुंरत िे जाई जाएंगी और जब तक कक प्रनतकूि अच्छा कारण न हो, वह मस्जथरेट उन्हें ऐसे न्यायािय के पास ि े जान े के लिए प्राधधकृत करन े का आदेि देगा । घ—प्रकीणा 105. इस अध्याय या धारा 185 के अधीन ककसी संपवत्त, वथतु या चीज के थथान श्रव्य -दृश्य इिैक्ट्राननक की तिािी करने या कब्ज े में िेने की प्रकिया, स्जसके अंतगतष ऐसी तिािी और साधनों के अलभग्रहण के अनुिम में सभी अलभगहृ त सभी वथतुओं की सूची तैयार करना और माध्यम से तिािी और साक्षियों द्वारा ऐसी सूची पर हथतािर करना ककसी श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के अलभग्रहण को माध्यम से मोबाइि फोन को वर यता देत े हुए अलभलिखित ककया जाएगा और पुलिस अलभलिखित करना ।196 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अधधकार वविंब ककए बबना यथास्थथनत स्जिा मस्जथरेट, उपिंड मस्जथरेट या प्रथम वगष न्यानयक मस्जथरेट को ऐसे अलभिेिन को भेजेगा । कुछ संपवत्त को 106. (1) कोई पुलिस अधधकार ककसी ऐसी संपवत्त को, अलभगहृ त कर सकता है अलभगहृ त करन े स्जसके बारे में यह अलभकथन या संदेह है कक वह चुराई हुई है या जो ऐसी पररस्थथनतयों की पुलिस में पाई जाती है, स्जनसे ककसी अपराध के ककए जाने का सदं ेह हो । अधधकार की (2) यहद ऐसा पुलिस अधधकार पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार के अधीनथथ है िस्क्ट् त । तो वह उस अधधग्रहण की ररपोटष उस अधधकार को तत्काि देगा । (3) उपधारा (1) के अधीन काय ष करन े वािा प्रत्येक पुलिस अधधकार अधधकाररता रिन े वािे मस्जथरेट को अलभग्रहण की ररपोटष तुरंत देगा और जहां अलभगहृ त संपवत्त ऐसी है कक वह सुगमता से न्यायािय में नह ं िाई जा सकती है या जहां ऐसी संपवत्त की अलभरिा के लिए उधचत थथान प्राप् त करन े में कहठनाई है, या जहां अन्वेर्ण के प्रयोजन के लिए संपवत्त को पुलिस अलभरिा में ननरंतर रिा जाना आवश्यक नह ं समझा जाता है वहां वह उस संपवत्त को ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त की अलभरिा में देगा जो यह वचनबंध करते हुए बंधपत्र ननष्पाहदत करे कक वह संपवत्त को जब कभी अपेिा की जाए तब न्यायािय के समि प्रथतुत करेगा और उसके व्ययन की बाबत न्यायािय के अनतररक्ट् त आदेिों का पािन करेगा  परंतु जहां उपधारा (1) के अधीन अलभगहृ त की गई संपवत्त िीघ्रतया और प्रकृत्या ियिीि हो और यहद ऐसी संपवत्त के कब्जे का हकदार व्यस्क्ट् त अज्ञात है या अनुपस्थथत है और ऐसी संपवत्त का मूलय पांच सौ रुपए स े कम है, तो उसका पुलिस अधीिक के आदेि से तत्काि नीिामी द्वारा वविय ककया जा सकेगा । धारा 503 और धारा 504 के उपबंध, यथासाध्य ननकटतम रूप में, ऐसे वविय के िुद्ध आगमों को िागू होंगे । संपवत्त की कुकी, 107. (1) जहा ं ककसी पुलिस अधधकार को अन्वेर्ण करते समय यह ववश्वास करने जब्ती या का कारण है कक कोई संपवत्त प्रत्यित: या अप्रत्यित: ककसी अपराधी कियाकिाप के वापसी । पररणामथवरूप या ककसी अपराध के काररत करने से व्युत्पन्न होती है या प्राप्त की जाती है तो वह, यथास्थथनत, पुलिस अधीिक या पुलिस आयुक्ट्त के अनुमोदन से ऐसी संपवत्त की कुकी के लिए मामि े का ववचारण करने के लिए अपराध का संज्ञान करने या सुपुदष करने के लिए अधधकाररता का प्रयोग करने वाि े न्यायािय या मस्जथरेट को, आवेदन दे सकेगा । (2) यहद न्यायािय या मस्जथरेट को साक्ष्य िेने के पूव ष या पश्चात ् यह ववश्वास करने का कारण है कक सभी या ऐसी संपवत्तयों में स े कोई अपराध के लिए प्रयुक्ट्त की जाती है तो न्यायािय या मस्जथरेट ऐस े व्यस्क्ट्त को चौदह हदनों के भीतर कारण दलितष करने के लिए नोहटस जार कर सकेगा कक क्ट्यों न कुकी का आदेि ककया जाए । (3) जहां उपधारा (2) के अधीन ककसी व्यस्क्ट्त को जार ककया गया नोहटस ककसी ऐसी संपवत्त को ववननहदषष्ट करता है जो कक ककसी ऐसे व्यस्क्ट्त के ननलमत्त ककसी अन्य व्यस्क्ट्त द्वारा धाररत की जा रह है तो ऐसे नोहटस की एक प्रनत ऐसे अन्य व्यस्क्ट्त को भी तामीि की जा सकेगी । (4) न्यायािय या मस्जथरेट, थपष्ट करण, यहद कोई हो, पर ववचार करने के पश्चात ् उपधारा (2) के अधीन कारण बताओ नोहटस जार कर सकेगा और ऐस े न्यायािय याअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 197 मस्जथरेट अपने समि उपिब्ध तास्त्वक तथ्य को तथा ऐसे व्यस्क्ट्त या व्यस्क्ट्तयों को युस्क्ट्तयुक्ट्त सुनवाई का अवसर देने के पश्चात ् ऐसी संपवत्तयों के संबंध में, जो अपराध का आगम होना पाई जाती हैं, कुकी का आदेि पाररत कर सकेगा : परंतु यहद ऐसा व्यस्क्ट्त कारण बताओ नोहटस में ववननहदषष्ट चौदह हदनों की अवधध के भीतर न्यायािय या मस्जथरेट के समि उपस्थथत नह ं होता है तो न्यायािय या मस्जथरेट एकपिीय आदेि पाररत कर सकेगा । (5) उपधारा (2) में अंतववष्ष ट ककसी बात के होते हुए भी, यहद न्यायािय या मस्जथरेट की यह राय है कक उक्ट्त उपधारा के अधीन नोहटस के जार होने स े कुकी या अधधग्रहण का उद्देश्य ववफि हो जाएगा तो न्यायािय या मस्जथरेट ऐसी संपवत्त की सीधे कुकी या अधधग्रहण का एकपिीय अंतररम आदेि पाररत कर सकेगा और ऐसा आदेि उपधारा (6) के अधीन आदेि पाररत करने तक प्रवत्तृ रहेगा । (6) यहद न्यायािय या मस्जथरेट यह पाता है कक कुकष या अलभगहृ त संपवत्त अपराध का आगम है तो न्यायािय या मस्जथरेट आदेि द्वारा स्जिा मस्जथरेट को ऐसे व्यस्क्ट्तयों को, जो ऐसे अपराध स े प्रभाववत हुए हों अपराध के ऐसे आगमों को आनुपानतक रूप में ववतररत करने का ननदेि दे सकेगा । (7) उपधारा (6) के अधीन पाररत ककसी आदेि की प्रास्प्त पर स्जिा मस्जथरेट साठ हदन की अवधध के भीतर अपराध के आगमों को या तो थवयं ववतरण करेगा या अपने अधीनथथ ककसी अधधकार को ऐसे ववतरण को करने के लिए प्राधधकृत करेगा । (8) यहद ऐसे आगमों को प्राप्त करने के लिए कोई दावेदार नह ं है या कोई दावेदार अलभननश्चय नह ं है या दावेदारों के समाधान के पश्चात ् कोई अधधिेर् है तो अपराध के ऐसे आगमों को सरकार जब्त कर िेगी । 108. कोई मस्जथरेट ककसी थथान की, स्जसकी तिािी के लिए वह तिािी वारंट मस्ज थरेट अपनी जार करन े के लिए सिम है, अपनी उपस्थथनत में तिािी लिए जाने का ननदेि दे सकता उपस्थथनत में तिािी लिए है । जान े का ननदेि दे सकता है । 109. यहद कोई न्यायािय ठीक समझता है, तो वह ककसी दथतावेज या चीज को, प्रथत ुत ककए गए जो इस संहहता के अधीन उसके समि प्रथतुत की गई है, पररबद्ध कर सकता है । दथतावेज आहद, को पररबद्ध करन े की िस्क्ट् त । 110. (1) जहां उन राज्यिेत्रों का कोई न्यायािय, स्जन पर इस संहहता का ववथतार आद ेलिकाओं के है (स्जन्हें इसके पश् चात ् इस धारा में उक्ट् त राज्यिेत्र कहा गया है) यह चाहता है कक— बारे में व्यनतकार (क) ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के नाम ककसी समन की  या व्यवथथा । (ि) ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार के लिए ककसी वारंट की  या (ग) ककसी व्यस्क्ट् त के नाम यह अपेिा करन े वाि े ऐस े ककसी समन की कक वह ककसी दथतावेज या अन्य चीज को प्रथतुत करे, या उपस्थथत हो और उसे प्रथतुत करे  या (घ) ककसी तिािी-वारंट की, जो उस न्यायािय द्वारा जार ककया गया है, तामीि या ननष्पादन ककसी ऐसे थथान में198 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ककया जाए जो— (i) उक्ट् त राज्यिेत्रों के बाहर भारत में ककसी राज्य या िेत्र के न्यायािय की थथानीय अधधकाररता के भीतर है, वहां वह ऐसे समन या वारंट की तामीि या ननष्पादन के लिए, दो प्रनतयों में, उस न्यायािय के पीठासीन अधधकार के पास डाक द्वारा या अन्यथा भेज सकता है  और जहां िंड (क) या िंड (ग) में ननहदषष् ट ककसी समन की तामीि इस प्रकार कर द गई है वहां धारा 70 के उपबंध उस समन के संबंध में ऐसे िागू होंगे, मानो स्जस न्यायािय को वह भेजा गया है उसका पीठासीन अधधकार उक्ट् त राज्यिेत्रों में मस्जथरेट है  (ii) भारत के बाहर ककसी ऐसे देि या थथान में है, स्जसकी बाबत केंद्र य सरकार द्वारा, दांडडक मामिों के संबंध में समन या वारंट की तामीि या ननष्पादन के लिए ऐसे देि या थथान की सरकार के (स्जसे इस धारा में इसके पश् चात ् संववदाकार राज्य कहा गया है) साथ व्यवथथा की गई है, वहां वह ऐसे न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट को ननहदषष् ट ऐसे समन या वारंट को, दो प्रनतयों में, ऐस े प्ररूप में और पारेर्ण के लिए ऐसे प्राधधकार को भेजगे ा, जो केंद्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे । (2) जहां उक्ट् त राज्यिेत्रों के न्यायािय को— (क) ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के नाम कोई समन  या (ि) ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार के लिए कोई वारंट  या (ग) ककसी व्यस्क्ट् त से यह अपेिा करने वािा ऐसा कोई समन कक वह कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करे या उपस्थथत हो और उस े प्रथतुत करे  या (घ) कोई तिािी-वारंट, जो ननम् नलिखित में से ककसी के द्वारा जार ककया गया है — (I) उक्ट् त राज्यिेत्रों के बाहर भारत में ककसी राज्य या ित्रे के न्यायािय  (II) ककसी संववदाकार राज्य का कोई न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट, तामीि या ननष्पादन के लिए प्राप् त होता है, वहां वह उसकी तामीि या ननष्पादन ऐसे कराएगा मानो वह ऐसा समन या वारंट है जो उस े उक्ट् त राज्यिेत्रों के ककसी अन्य न्यायािय से अपनी थथानीय अधधकाररता के भीतर तामीि या ननष्पादन के लिए प्राप् त हुआ है  और जहां— (i) धगरफ्तार का वारंट ननष्पाहदत कर हदया जाता है, वहां धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त के बारे में कायवष ाह यथासंभव धारा 82 और धारा 83 द्वारा ववहहत प्रकिया के अनुसार की जाएगी ; (ii) तिािी-वारंट ननष्पाहदत कर हदया जाता है वहां तिािी में पाई गई चीजों के बारे में कायवष ाह यथासंभव धारा 104 में ववहहत प्रकिया के अनुसार की जाएगी  परंतु उस मामिे में, जहां संववदाकार राज्य स े प्राप् त समन या तिािी वारंट का ननष्पादन कर हदया गया है, तिािी में प्रथतुत ककए गए दथतावेज या चीजें या पाई गई चीजें, समन या तिािी वारंट जार करन े वािे न्यायािय की, ऐस े प्राधधकार की माध्यम से अग्रेवर्त की जाएंगी जो केंद्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा,अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 199 इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे । अध्याय 8 कुछ मामिों में सिायता के लिए व्यनतकारी व्यिस्था और संपवि की कुकी तथा िब्ती के लिए प्रक्रिया 111. इस अध्याय में, जब तक कक संदभ ष से अन्यथा अपेक्षित न हो,— पररभ ार्ाए ं । (क) “संववदाकार राज्य” से भारत से बाहर कोई देि या थथान अलभप्रेत है स्जसके संबंध में केंद्र य सरकार द्वारा संधध के माध्यम स े या अन्यथा ऐसे देि की सरकार के साथ कोई व्यवथथा की गई है  (ि) “पहचान करना” के अंतगतष यह सबूत थथावपत करना है कक संपवत्त ककसी अपराध के ककए जाने से व्युत्पन् न हुई है या उसमें उपयोग की गई है  (ग) “अपराध के आगम” से आपराधधक कियाकिापों के (स्जनके अंतगतष मुद्रा अंतरणों को अंतवलषित करने वािे अपराध हैं) पररणामथवरूप ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा प्रत्यि या अप्रत्यि रूप से व्युत्पन् न या अलभप्राप् त कोई संपवत्त या ऐसी ककसी संपवत्त का मूलय अलभप्रेत है  (घ) “संपवत्त” से भौनतक या अभौनतक, चि या अचि, मूत ष या अमूतष प्रत्येक प्रकार की सपं वत्त और आस्थत तथा ऐसी संपवत्त या आस्थत में हक या हहत को सास्क्ष्यत करने वािा वविेि और लिित अलभप्रेत है जो ककसी अपराध के ककए जाने से व्युत्पन् न होती है या उसमें उपयोग की जाती है और इसके अंतगतष अपराध के आगम के माध्यम से अलभप्राप् त संपवत्त है  (ङ) “पता िगाना” से ककसी संपवत्त की प्रकृनत, उसका स्रोत, व्ययन, संचिन, हक या थवालमत्व का अवधारण करना अलभप्रेत है । 112. (1) यहद ककसी अपराध के अन्वेर्ण के अनुिम में, अन्वेर्ण अधधकार या भार त से बाहर अन्वेर्ण अधधकार की पंस्क्ट् त से वररष् ठ कोई अधधकार यह आवेदन करता है कक भारत से ककसी देि या थथान में बाहर ककसी देि या थथान में साक्ष्य उपिब्ध हो सकता है तो कोई दांडडक न्यायािय अन्वेर्ण के अनुरोध पत्र जार करके उस देि या थथान के ककसी ऐसे न्यायािय या प्राधधकार को, जो लिए सिम ऐसे अनुरोध पर कारषवाई करने के लिए सिम है, यह अनुरोध पत्र जार कर सकेगा कक प्राधधकार को वह ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त की मौखिक पर िा करे, स्जससे मामिे के तथ्यों और पररस्थथनतयों अनुरोध पत्र । से अवगत होने की आिा की जाती है और ऐसी पर िा के अनुिम में ककए गए उसके कथन को अलभलिखित करे और ऐसे व्यस्क्ट् त या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त से यह भी अपेिा करे कक वह उस मामिे स े संबंधधत ऐसे दथतावेज या चीज को प्रथतुत करे जो उसके कब्जे में है और इस प्रकार लिए गए या संगहृ त ककए गए सभी साक्ष्य या उसकी अधधप्रमाखणत प्रनतयां या इस प्रकार संगहृ त चीज को ऐसा पत्र भेजन े वाि े न्यायािय को अग्रेवर्त करे । (2) अनुरोध पत्र ऐसी र नत में पारेवर्त ककया जाएगा जो केंद्र य सरकार इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे । (3) उपधारा (1) के अधीन अलभलिखित प्रत्येक कथन या प्राप् त प्रत्येक दथतावेज या चीज इस संहहता के अधीन अन्वेर्ण के दौरान संगहृ त साक्ष्य समझा जाएगा ।200 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— भारत स े बाहर 113. (1) भारत स े बाहर के ककसी देि या थथान के ऐस े न्यायािय या प्राधधकार के ककसी देि या से, जो उस देि या थथान में अन्वेर्ण के अधीन ककसी अपराध के संबंध में ककसी व्यस्क्ट् त थथान से भारत की पर िा करन े के लिए या ककसी दथतावेज या चीज को प्रथतुत कराने के लिए उस देि में अन्वेर्ण के या थथान में ऐसा पत्र जार करने के लिए सिम है, अनुरोध पत्र की प्रास्प् त पर, केंद्र य लिए ककसी सरकार यहद वह उधचत समझे तो,— न्यायािय या प्राधधकार को (i) उसे मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या न्यानयक मस्जथरेट को, स्जसे वह इस अनुरोध पत्र । ननलमत्त ननयुक्ट् त करे, अग्रेवर्त कर सकेगी जो उस व्यस्क्ट् त को तत्पश्चात ् अपने समि बुिाएगा तथा उसके कथन को अलभलिखित करेगा या दथतावेज या चीज को प्रथतुत करवाएगा ; या (ii) उस पत्र को अन्वेर्ण के लिए ककसी पुलिस अधधकार को भेज सकेगा जो तत्पश्चात ् उसी र नत में अपराध का इस प्रकार अन्वेर्ण करेगा, मानो वह अपराध भारत के भीतर ककया गया हो । (2) उपधारा (1) के अधीन लिए गए या संगहृ त सभी साक्ष्य, उसकी अधधप्रमाखणत प्रनतयां या इस प्रकार संगहृ त चीज, यथास्थथनत, मस्जथरेट या पुलिस अधधकार द्वारा उस न्यायािय या प्राधधकार को, स्जसने अनुरोध पत्र जार ककया है, पारेर्ण के लिए केंद्र य सरकार को ऐसी र नत में, स्जसे केंद्र य सरकार उधचत समझे, अग्रेवर्त की जाएगी । व्यस्क्ट् तयों का 114. (1) जहा ं भारत का कोई न्यायािय, ककसी आपराधधक मामि े के संबंध में यह अंतरण चाहता है कक उपस्थथत होने या ककसी दथतावेज या अन्य चीज को प्रथतुत करन े के लिए, सुननस्श् चत करन े ककसी व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार के लिए ककसी वारंट का, जो उस न्यायािय द्वारा जार में सहायता । ककया गया है, ननष्पादन ककसी संववदाकार राज्य के ककसी थथान में ककया जाए वहां वह ऐसे वारंट को दो प्रनतयों में और ऐसे प्ररूप में ऐसे न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट को, ऐसे प्राधधकार के माध्यम से भेजेगा, जो केंद्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे, और, यथास्थथनत, वह न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट उसका ननष्पादन कराएगा । (2) यहद, ककसी अपराध के ककसी अन्वेर्ण या ककसी जांच के दौरान अन्वेर्ण अधधकार या अन्वेर्ण अधधकार से पंस्क्ट् त में वररष् ठ ककसी अधधकार द्वारा यह आवेदन ककया जाता है कक ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त की, जो ककसी संववदाकार राज्य के ककसी थथान में है, ऐसे अन्वेर्ण या जांच के संबंध में उपस्थथनत अपेक्षित है और न्यायािय का यह समाधान हो जाता है कक ऐसी उपस्थथनत अपेक्षित है तो वह उक्ट् त व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध ऐस े समन या वारंट को तामीि और ननष्पादन कराने के लिए, दो प्रनतयों में, ऐसे न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट को ऐसे प्ररूप में जार करेगा, जो केंद्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे । (3) जहां भारत के ककसी न्यायािय को, ककसी आपराधधक मामिे के संबंध में, ककसी संववदाकार राज्य के ककसी न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट द्वारा जार ककया गया कोई वारंट ककसी व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार के लिए प्राप् त होता है स्जसमें ऐसे व्यस्क्ट् त से उस न्यायािय में या ककसी अन्य अन्वेर्ण अलभकरण के समि उपस्थथत होन े या उपस्थथत होन े और कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करने की अपेिा की गई है वहां वह उसका ननष्पादन इस प्रकार कराएगा मानो यह ऐसा वारंट हो जो उसे भारत के ककसी अन्यअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 201 न्यायािय से अपनी थथानीय अधधकाररता के भीतर ननष्पादन के लिए प्राप् त हुआ है । (4) जहां उपधारा (3) के अनुसरण में ककसी संववदाकार राज्य को अंतररत कोई व्यस्क्ट् त भारत में कैद है वहां भारत का न्यायािय या केंद्र य सरकार ऐसी ित ें अधधरोवपत कर सकेगी जो वह न्यायािय या सरकार ठीक समझे । (5) जहां उपधारा (1) या उपधारा (2) के अनुसरण में भारत को अंतररत कोई व्यस्क्ट् त ककसी संववदाकार राज्य में कैद है वहां भारत का न्यायािय यह सुननस्श् चत करेगा कक उन ितों का, स्जनके अधीन कैद भारत को अंतररत ककया जाता है, अनुपािन ककया जाए और ऐसे कैद को ऐसी ितों के अधीन अलभरिा में रिा जाएगा, जो केंद्र य सरकार लिखित रूप में ननदेलित करे । 115. (1) जहां भारत के ककसी न्यायािय के पास यह ववश् वास करन े के युस्क्ट् तयुक्ट् त संपव त्त की कुकी आधार हैं कक ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा अलभप्राप् त कोई संपवत्त ऐसे व्यस्क्ट् त को ककसी अपराध या जब्ती के आदेिों के के ककए जाने से प्रत्यि या अप्रत्यि रूप से व्युत्पन् न या अलभप्राप् त हुई है वहां वह ऐसी संबंध में संपवत्त की कुकी या जब्ती का कोई आदेि दे सकेगा जो वह धारा 116 से धारा 122 सहायता । (दोनों सहहत) के उपबंधों के अधीन ठीक समझे । (2) जहां न्यायािय ने उपधारा (1) के अधीन ककसी संपवत्त की कुकी या जब्ती का कोई आदेि हदया है और ऐसी संपवत्त के ककसी संववदाकार राज्य में होने का संदेह है वहां न्यायािय, संववदाकार राज्य के न्यायािय या प्राधधकार को ऐस े आदेि के ननष्पादन के लिए अनुरोध पत्र जार कर सकेगा । (3) जहां केंद्र य सरकार को ककसी संववदाकार राज्य के ककसी न्यायािय या ककसी प्राधधकार से अनुरोध पत्र प्राप् त होता है स्जसमें ककसी ऐसी संपवत्त की भारत में कुकी या जब्ती करन े का अनुरोध ककया गया है जो ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ककसी ऐस े अपराध के ककए जान े स े प्रत्यि या अप्रत्यि रूप से व्युत्पन् न या अलभप्राप् त की गई है जो उस संववदाकार राज्य में ककया गया है वहां केंद्र य सरकार, ऐसा अनुरोध पत्र ऐसे ककसी न्यायािय को, स्जसे वह ठीक समझ,े यथास्थथनत, धारा 116 से धारा 122 (दोनों सहहत) के या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के उपबंधों के अनुसार ननष्पादन के लिए अग्रेवर्त कर सकेगी । 116. (1) न्यायािय, धारा 115 की उपधारा (1) के अधीन या उसकी उपधारा (3) ववधध ववरुद्धतया के अधीन अनुरोध पत्र प्राप् त होने पर पुलिस उप-ननर िक से अननम् न पंस्क्ट् त के ककसी अस्जतष सपं वत्त की पहचान पुलिस अधधकार को ऐसी संपवत्त का पता िगान े और पहचान करन े के लिए सभी करना । आवश्यक कारषवाई करने के लिए ननदेि देगा । (2) उपधारा (1) में ननहदषष् ट कारषवाई के अंतगतष , ककसी व्यस्क्ट् त, थथान, संपवत्त, आस्थत, दथतावेज, ककसी बकैं या सावजष ननक ववत्तीय संथथा की िेिाबह या ककसी अन्य सुसंगत ववर्य की बाबत जांच, अन्वेर्ण या सवेिण भी हो सकेगा । (3) उपधारा (2) में ननहदषष् ट कोई जांच, अन्वेर्ण या सवेिण, उक्ट् त न्यायािय द्वारा इस ननलमत्त हदए गए ननदेिों के अनुसार उपधारा (1) में उस्लिखित अधधकार द्वारा ककया जाएगा । 117. (1) जहां धारा 116 के अधीन जांच या अन्वेर्ण करन े वािे ककसी अधधकार सम्प वत्त का अलभग्रहण या के पास यह ववश् वास करन े का कारण है कक ककसी संपवत्त के, स्जसके संबंध में ऐसी जाचं कुकी । या अन्वेर्ण ककया जा रहा है, नछपाए जाने, अंतररत ककए जाने या उसके ववर्य में ककसी202 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— र नत से व्यवहार ककए जाने की संभावना है स्जसका पररणाम ऐसी संपवत्त का व्ययन होगा वहां वह उक्ट् त संपवत्त का अलभग्रहण करन े का आदेि कर सकेगा और जहां ऐसी संपवत्त का अलभग्रहण करना साध्य नह ं है वहां वह कुकी का आदेि यह ननदेि देत े हुए कर सकेगा कक ऐसी संपवत्त ऐसा आदेि करन े वािे अधधकार की पूव ष अनुज्ञा के बबना अंतररत नह ं की जाएगी या उसके ववर्य में अन्यथा व्यवहार नह ं ककया जाएगा और ऐस े आदेि की एक प्रनत की तामीि संबंधधत व्यस्क्ट् त पर की जाएगी । (2) उपधारा (1) के अधीन ककए गए ककसी आदेि का तब तक कोई प्रभाव नह ं होगा, जब तक उक्ट् त आदेि की, उसके ककए जाने से तीस हदन की अवधध के भीतर उक्ट् त न्यायािय के आदेि द्वारा पुस्ष् ट नह ं कर द जाती है । इस अध्याय के 118. (1) न्यायािय उस िेत्र के, जहां संपवत्त स्थथत है, स्जिा मस्जथरेट को, या अधीन अन्य ककसी अधधकार को, जो स्जिा मस्जथरेट द्वारा नामननदेलित ककया जाए, ऐसी अलभगहृ त या संपवत्त के प्रिासक के कृत्यों का पािन करन े के लिए ननयुक्ट् त कर सकेगा । जब्त संपवत्त का (2) उपधारा (1) के अधीन ननयुक्ट् त ककया गया प्रिासक, उस संपवत्त को, स्जसके प्रबंध । संबंध में धारा 117 की उपधारा (1) के अधीन या धारा 120 के अधीन आदेि ककया गया है, ऐसी र नत स े और ऐसी ितों के अधीन रहत े हुए, जो केंद्र य सरकार द्वारा ववननहदषष् ट की जाएं, प्राप् त करेगा और उसका प्रबंध करेगा । (3) प्रिासक, केंद्र य सरकार को जब्त संपवत्त के व्ययन के लिए ऐसे उपाय भी करेगा, जो केंद्र य सरकार ननदेलित करे । संपवत्त की जब्ती 119. (1) यहद, धारा 116 के अधीन जांच, अन्वेर्ण या सवेिण के पररणामथवरूप, की सूचना । न्यायािय के पास यह ववश् वास करन े का कारण है कक सभी या कोई संपवत्त, अपराध से प्राप्त आगम है तो वह ऐसे व्यस्क्ट् त पर (स्जसे इसमें इसके पश् चात ् प्रभाववत व्यस्क्ट् त कहा गया है) ऐसी सूचना की तामीि कर सकेगा, स्जसमें उसस े यह अपेिा की गई हो कक वह उस सूचना में ववननहदषष् ट तीस हदन की अवधध के भीतर उस आय, उपाजनष या आस्थतयों के वे स्रोत, स्जनसे या स्जनके द्वारा उसने ऐसी संपवत्त अस्जतष की है, वह साक्ष्य स्जस पर वह ननभरष करता है तथा अन्य सुसंगत जानकार और ववलिस्ष् टयां उपदलितष करे और यह कारण बताए कक, यथास्थथनत, ऐसी सभी या ककसी संपवत्त को अपराध से प्राप्त आगम क्ट्यों न घोवर्त ककया जाए और उस े केंद्र य सरकार द्वारा क्ट्यों न जब्त कर लिया जाए । (2) जहां ककसी व्यस्क्ट् त को उपधारा (1) के अधीन सूचना में यह ववननहदषष् ट ककया जाता है कक कोई संपवत्त ऐसे व्यस्क्ट् त की ओर से ककसी अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा धाररत है वहा ं सूचना की एक प्रनत की ऐसे अन्य व्यस्क्ट् त पर भी तामीि की जाएगी । कनतपय मामिों 120. (1) न्यायािय, धारा 119 के अधीन जार की गई कारण बताओ सूचना के में संपवत्त की थपष् ट करण पर, यहद कोई हो, और उसके समि उपिब्ध सामधग्रयों पर ववचार करन े के जब्ती । पश् चात ् तथा प्रभाववत व्यस्क्ट् त को (और ऐसे मामिे में जहां प्रभाववत व्यस्क्ट् त सूचना में ववननहदषष् ट कोई संपवत्त ककसी अन्य व्यस्क्ट् त के माध्यम से धाररत करता है वहां ऐसे अन्य व्यस्क्ट् त को भी) सुनवाई का युस्क्ट् तयुक्ट् त अवसर देने के पश् चात,् आदेि द्वारा, अपना यह ननष्कर् ष अलभलिखित करेगा कक प्रश् नगत सभी या कोई सपं वत्त अपराध से प्राप्त आगम है या नह ं : परंतु यहद प्रभाववत व्यस्क्ट् त (और मामि े में जहां प्रभाववत व्यस्क्ट् त सूचना मेंअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 203 ववननहदषष् ट कोई संपवत्त ककसी अन्य व्यस्क्ट् त के माध्यम से धाररत करता है वहां ऐसा अन्य व्यस्क्ट् त भी) न्यायािय के समि उपस्थथत नह ं होता है या कारण बताओ सूचना में ववननहदषष् ट तीस हदन की अवधध के भीतर उसके समि अपना मामिा ननरुवपत नह ं करता है तो न्यायािय, अपने समि उपिब्ध साक्ष्य के आधार पर इस उपधारा के अधीन एकपिीय ननष्कर् ष अलभलिखित करन े के लिए अग्रसर हो सकेगा । (2) जहां न्यायािय का यह समाधान हो जाता है कक कारण बताओ सूचना में ननहदषष् ट संपवत्त में से कुछ अपराध से प्राप्त आगम है ककंत ु ऐसी संपवत्त की ववननहदषष् ट रूप से पहचान करना संभव नह ं है वहां न्यायािय के लिए ऐसी संपवत्त को ववननहदषष् ट करना जो उसके सवोत्तम ननणयष के अनुसार अपराध से प्राप्त आगम है और तद्नुसार उपधारा (1) के अधीन ननष्कर् ष अलभलिखित करना ववधधपूण ष होगा । (3) जहां न्यायािय इस धारा के अधीन इस आिय का ननष्कर् ष अलभलिखित करता है कक कोई संपवत्त अपराध से प्राप्त आगम है वहां ऐसी संपवत्त सभी ऋणभारों से मुक्ट्त होकर केंद्र य सरकार द्वारा जब्त की जाएगी । (4) जहां ककसी कंपनी के कोई िेयर इस धारा के अधीन केंद्र य सरकार द्वारा जब्त 2013 का 18 कर लिए जात े हैं वहां कंपनी अधधननयम, 2013 में या कंपनी के संगम-अनुच्छेद में ककसी बात के होत े हुए भी, कंपनी केंद्र य सरकार को ऐसे िेयरों के अंतररती के रूप में तुरंत रस्जथटर करेगी । 121. (1) जहां न्यायािय यह घोर्णा करता है कक कोई सपं वत्त धारा 120 के अधीन जब्त ी के बदि े केंद्र य सरकार द्वारा जब्त कर ि गई है और यह ऐसा मामिा है जहां ऐसी संपवत्त के जुमाषना । केवि कुछ भाग का स्रोत न्यायािय के समाधानप्रद रूप में साबबत नह ं ककया गया है वहां वह प्रभाववत व्यस्क्ट् त को, जब्ती के बदिे में ऐसे भाग के बाजार मूलय के बराबर जुमाषन े का संदाय करने का ववकलप देत े हुए, आदेि देगा । (2) उपधारा (1) के अधीन जुमाषना अधधरोवपत करन े का आदेि देने के पूव,ष प्रभाववत व्यस्क्ट् त को सुनवाई का युस्क्ट् तयुक्ट् त अवसर हदया जाएगा । (3) जहां प्रभाववत व्यस्क्ट् त, उपधारा (1) के अधीन देय जुमाषन े का ऐसे समय के भीतर, जो उस ननलमत्त अनुज्ञात ककया जाए, संदाय कर देता है वहां न्यायािय, आदेि द्वारा, धारा 120 के अधीन की गई जब्ती की घोर्णा को वापस िे सकेगा और तब ऐसी संपवत्त ननमुक्ट्ष त हो जाएगी । 122. जहां धारा 117 की उपधारा (1) के अधीन कोई आदेि करन े या धारा 119 के कुछ अंतरणों अधीन कोई सूचना जार करने के पश् चात,् उक्ट् त आदेि या सूचना में ननहदषष् ट कोई संपवत्त का अमान् य और िून्य ककसी भी र नत से अंतररत कर द जाती है वहां इस अध्याय के अधीन कायवष ाहहयों के होना। प्रयोजनों के लिए, ऐसे अंतरणों पर ध्यान नह ं हदया जाएगा और यहद ऐसी संपवत्त बाद में धारा 120 के अधीन केंद्र य सरकार द्वारा जब्त कर ि जाती है तो ऐसी संपवत्त का अंतरण अमान्य और िून्य समझा जाएगा । 123. इस अध्याय के अधीन केंद्र य सरकार को ककसी संववदाकार राज्य से प्राप् त प्रत्येक अन ुरोध पत्र की अनुरोध पत्र, समन या वारंट और ककसी संववदाकार राज्य को पारेवर्त ककया जाने वािा बाबत प्रकिया । प्रत्येक अनुरोध पत्र, समन या वारंट केंद्र य सरकार द्वारा, ऐस े प्ररूप में और ऐसी र नत स े जो केंद्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे, यथास्थथनत, संववदाकार राज्य204 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— को पारेवर्त ककया जाएगा या भारत के संबंधधत न्यायािय को भेजा जाएगा । इस अध्याय का 124. केंद्र य सरकार, राजपत्र में अधधसूचना द्वारा, यह ननदेि दे सकेगी कक ऐस े िागू होना । संववदाकार राज्य के संबंध में, स्जसके साथ पारथपररक व्यवथथा की गई है, इस अध्याय का िागू होना ऐसी ितों, अपवादों या अहषताओं के अधीन होगा जो उक्ट् त अधधसूचना में ववननहदषष् ट की जाएं । अध्याय 9 पररशांनत कायम रखने के लिए और सिाचार के लिए प्रनतभूनत दोर्लसद्धध पर 125. (1) जब सेिन न्यायािय या प्रथम वग ष मस्जथरेट का न्यायािय ककसी पररिांनत कायम व्यस्क्ट् त को उपधारा (2) में ववननहदषष् ट अपराधों में से ककसी अपराध के लिए या ककसी ऐस े रिने के लिए अपराध के दष्ु प्रेरण के लिए लसद्धदोर् ठहराता है और उसकी यह राय है कक यह प्रनतभूनत । आवश्यक है कक पररिांनत कायम रिन े के लिए ऐस े व्यस्क्ट् त से प्रनतभूनत ि जाए, तब न्यायािय ऐसे व्यस्क्ट् त को दंडादेि देत े समय उसे आदेि दे सकेगा कक वह तीन वर् ष से अनधधक इतनी अवधध के लिए, स्जतनी वह ठीक समझ,े पररिांनत कायम रिन े के लिए, बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करे । (2) उपधारा (1) में ननहदषष् ट अपराध ननम् नलिखित हैं — (क) भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अध्याय 11 के अधीन दंडनीय कोई 202 3 का 45 अपराध, जो धारा 193 की उपधारा (1) या धारा 196 या धारा 197 के अधीन दंडनीय अपराध से लभन्न है ; (ि) कोई ऐसा अपराध जो, या स्जसके अंतगतष , हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग या ररस्ष् ट करना है ; (ग) आपराधधक अलभत्रास का कोई अपराध ; (घ) कोई अन्य अपराध, स्जससे पररिांनत भंग हुई है या स्जससे पररिांनत भंग आिनयत है, या स्जसके बारे में ज्ञात था कक उसस े पररिांनत भंग संभाव्य है । (3) यहद दोर्लसद्धध अपीि पर या अन्यथा अपाथत कर द जाती है तो बंधपत्र या जमानतपत्र जो ऐसे ननष्पाहदत ककया गया था, िून्य हो जाएगा । (4) इस धारा के अधीन आदेि अपीि न्यायािय द्वारा या ककसी न्यायािय द्वारा भी जब वह पुनर िण की अपनी िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर रहा हो, ककया जा सकेगा । अन्य दिाओ ं में 126. (1) जब ककसी कायपष ािक मस्जथरेट को सूचना लमिती है कक यह संभाव्य है पररिांनत कायम कक कोई व्यस्क्ट् त पररिांनत भंग करेगा या िोक प्रिांनत वविुब्ध करेगा या कोई ऐसा सदोर् रिन े के लिए काय ष करेगा स्जससे संभाव्यत: पररिांनत भंग हो जाएगी या िोक प्रिांनत वविुब्ध हो प्रनतभनूत । जाएगी तब यहद उसकी राय में कायवष ाह करन े के लिए पयाषप् त आधार है तो वह, ऐसे व्यस्क्ट् त से इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत र नत से अपेिा कर सकता है कक वह कारण दलितष करे कक एक वर् ष स े अनधधक की इतनी अवधध के लिए, स्जतनी मस्जथरेट ननयत करना ठीक समझे, पररिांनत कायम रिन े के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े के लिए आदेि क्ट्यों न हदया जाए । (2) इस धारा के अधीन कायषवाह ककसी कायपष ािक मस्जथरेट के समि तब की जा सकती है जब या तो वह थथान जहां पररिांनत भंग या वविोभ की आिंका है, उसकीअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 205 थथानीय अधधकाररता के भीतर है या ऐसी अधधकाररता के भीतर कोई ऐसा व्यस्क्ट् त है, जो ऐसी अधधकाररता के परे संभाव्यत: पररिांनत भंग करेगा या िोक प्रिांनत वविुब्ध करेगा या यथापूवोक्ट् त कोई सदोर् काय ष करेगा । 127. (1) जब ककसी कायपष ािक मस्जथरेट को सूचना लमिती है कक उसकी थथानीय कनत पय बातों को अधधकाररता के भीतर कोई ऐसा व्यस्क्ट् त है जो ऐसी अधधकाररता के भीतर या बाहर— फैिाने वािे व्यस्क्ट्त यों स े (i) या तो मौखिक रूप से या लिखित रूप से या ककसी अन्य रूप से सदाचार के लिए ननम् नलिखित बातें सािय फैिाता है या फैिाने का प्रयत् न करता है या फैिाने का प्रनतभनूत । दष्ु प्रेरण करता है, अथाषत ् :— 2023 का 45 (क) कोई ऐसी बात, स्जसका प्रकािन भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 152 या धारा 196 या धारा 197 या धारा 299 के अधीन दंडनीय है ; या (ि) ककसी न्यायाधीि से, जो अपने पद य कतव्ष यों के ननवषहन में कायष कर रहा है या काय ष करन े का तात्पय ष रिता है, संबद्ध कोई बात जो भारतीय 2023 का 45 न्याय संहहता, 2023 के अधीन आपराधधक अलभत्रास या मानहानन की कोहट में आती है ; या 2023 का 45 (ii) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 294 में यथाननहदषष् ट कोई अश् ि ि वथतु वविय के लिए बनाता, उत्पाहदत करता, प्रकालित करता या रिता है, आयात करता है, ननयाषत करता है, प्रवहण करता है, वविय करता है, भाडे पर देता है, ववतररत करता है, सावजष ननक रूप से प्रदलितष करता है या ककसी अन्य प्रकार स े पररचालित करता है, और उस मस्जथरेट की राय में कायवष ाह करन े के लिए पयाषप् त आधार है, तब ऐसा मस्जथरेट, ऐस े व्यस्क्ट् त से इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत र नत से अपेिा कर सकता है कक वह कारण दलितष करे कक एक वर् ष से अनधधक की इतनी अवधध के लिए, स्जतनी वह मस्जथरेट ठीक समझे, उस े अपन े सदाचार के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करने के लिए आदेि क्ट्यों न हदया जाए । 1867 का 25 (2) प्रेस और पुथ तक रस्जथ र करण अधधननयम, 1867 में हदए गए ननयमों के अधीन रस्जथर कृत, और उनके अनुरूप संपाहदत, मुहद्रत और प्रकालित ककसी प्रकािन में अंतववष्ष ट ककसी बात के बारे में कोई कायवष ाह ऐसे प्रकािन के संपादक, थवत्वधार , मुद्रक या प्रकािक के ववरुद्ध राज्य सरकार के, या राज्य सरकार द्वारा इस ननलमत्त सिक्ट् त ककए गए ककसी अधधकार के आदेि से या उसके प्राधधकार के अधीन ह की जाएगी, अन्यथा नह ं । 128. जब ककसी कायपष ािक मस्जथरेट को सूचना लमिती है कक कोई व्यस्क्ट् त उसकी संहद ग्ध थथानीय अधधकाररता के भीतर अपनी उपस्थथनत नछपाने के लिए सावधाननयां बरत रहा है व्यस्क्ट् तयों स े सदाचार के लिए और यह ववश् वास करने का कारण है कक वह कोई संज्ञेय अपराध करन े की दृस्ष् ट से ऐसा प्रनतभूनत । कर रहा है, तब वह मस्जथरेट ऐसे व्यस्क्ट् त से इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत र नत से अपेिा कर सकेगा कक वह कारण दलितष करे कक एक वर् ष से अनधधक की इतनी अवधध के लिए, स्जतनी वह मस्जथरेट ठीक समझे, उसे अपने सदाचार के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करने के लिए आदेि क्ट्यों न हदया जाए ।206 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— आभ्यालसक 129. जब ककसी कायपष ािक मस्जथरेट को यह सूचना लमिती है कक उसकी थथानीय अपराधधयों स े अधधकाररता के भीतर कोई ऐसा व्यस्क्ट् त है, जो— सदाचार के लिए (क) अभ्यासत: िुटेरा, गहृ भेदक, चोर या कूटरचनयता है ; या प्रनतभनूत । (ि) चुराई हुई संपवत्त का, उसे चुराई हुई जानते हुए, अभ्यासत: प्राप्तकताष है ; या (ग) अभ्यासत: चोरों की संरिा करता है या चोरों को संश्रय देता है या चुराई हुई संपवत्त को नछपाने या उसके व्ययन में सहायता देता है ; या (घ) व्यपहरण, अपहरण, उद्दापन, छि या ररस्ष् ट का अपराध या भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अध्याय 10 के अधीन या उस संहहता की धारा 178, धारा 179, धारा 180 या धारा 181 के अधीन दंडनीय कोई अपराध अभ्यासत: करता है या करन े का प्रयत् न करता है या करन े का दष्ु प्रेरण करता है ; या (ङ) ऐसे अपराध अभ्यासत: करता है या करन े का प्रयत् न करता है या करन े का दष्ु प्रेरण करता है, स्जनमें पररिांनत भंग समाहहत है ; या 2023 का 45 (च) कोई ऐसा अपराध अभ्यासत: करता है या करन े का प्रयत् न करता है या करन े का दष्ु प्रेरण करता है जो— (i) ननम् नलिखित अधधननयमों में स े एक या अधधक के अधीन कोई अपराध है, अथाषत ् :— (क) ओर्धध और प्रसाधन सामग्री अधधननयम, 1940; 194 0 का 23 (ि) ववदेलियों ववर्यक अधधननयम, 1946 ; 194 6 का 31 (ग) कमषचार भववष्य-ननधध और प्रकीण ष उपबंध अधधननयम, 1952 ; 195 2 का 19 (घ) आवश्यक वथतु अधधननयम, 1955 ; 195 5 का 10 (ङ) लसववि अधधकार संरिण अधधननयम, 1955 ; 195 5 का 22 (च) सीमािुलक अधधननयम, 1962 ; 196 2 का 52 (छ) िाद्य सुरिा और मानक अधधननयम, 2006 ; या 200 6 का 34 (ii) जमािोर या मुनाफािोर या िाद्य या ओर्धध के अपलमश्रण या भ्रष् टाचार के ननवारण के लिए उपबंध करने वाि ककसी अन्य ववधध के अधीन दंडनीय कोई अपराध है ; या (छ) ऐसा द:ुसाहलसक और भयंकर है कक उसका प्रनतभूनत के बबना थवच्छन्द रहना समाज के लिए पररसंकटमय है, तब ऐसा मस्जथरेट, ऐसे व्यस्क्ट् त से, इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत र नत से अपेिा कर सकता है कक वह कारण दलितष करे कक तीन वर् ष स े अनधधक की इतनी अवधध के लिए, स्जतनी वह मस्जथरेट ठीक समझता है, उस े अपने सदाचार के लिए जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े का आदेि क्ट्यों न हदया जाए । आदेि का हदया 130. जब कोई मस्जथरेट, जो धारा 126, धारा 127, धारा 128 या धारा 129 के जाना । अधीन काय ष कर रहा है, यह आवश्यक समझता है कक ककसी व्यस्क्ट् त स े अपेिा की जाए कक वह उस धारा के अधीन कारण दलितष करे तब वह मस्जथरेट प्राप् त सूचना का सार, उस बंधपत्र की रकम, जो ननष्पाहदत ककया जाना है, वह अवधध स्जसके लिए वह प्रवतषनअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 207 में रहेगा और प्रनतभुओं की पयाषप्तता और उपयुक्ट्तता पर ववचार करने के पश्चात ् प्रनतभुओं की संख्या बताते हुए लिखित आदेि देगा । 131. यहद वह व्यस्क्ट् त, स्जसके बारे में ऐसा आदेि हदया जाता है, न्यायािय में न्याय ािय में उपस्थथत व्यस्क्ट्त उपस्थथत है तो वह उस े प़िकर सुनाया जाएगा या यहद वह ऐसा चाहे तो उसका सार उसे के बारे में समझाया जाएगा । प्रकिया । 132. यहद ऐसा व्यस्क्ट् त न्यायािय में उपस्थथत नह ं है तो मस्जथरेट उसस े उपस्थथत ऐस े व्यस्क्ट्त के बारे में समन या होने की अपेिा करते हुए समन, या जब ऐसा व्यस्क्ट् त अलभरिा में है तब स्जस अधधकार वारंट जो की अलभरिा में वह है उस अधधकार को उस े न्यायािय के समि िाने का ननदेि देत े हुए उपस्थथत नह ं वारंट, जार करेगा : है । परंतु जब कभी ऐस े मस्जथरेट को पुलिस अधधकार की ररपोटष पर या अन्य सूचना पर (स्जस ररपोटष या सूचना का सार मस्जथरेट द्वारा अलभलिखित ककया जाएगा), यह प्रतीत होता है कक पररिांनत भंग होने के डर के लिए कारण है और ऐसे व्यस्क्ट् त की तुरंत धगरफ्तार के बबना ऐस े पररिानंत भंग करन े का ननवारण नह ं ककया जा सकता है तब वह मस्जथरेट उसकी धगरफ्तार के लिए ककसी समय वारंट जार कर सकेगा । 133. धारा 132 के अधीन जार ककए गए प्रत्येक समन या वारंट के साथ धारा सम न या वारंट के साथ आदेि 130 के अधीन हदए गए आदेि की प्रनत होगी और उस समन या वारंट की तामीि या की प्रनत होगी । ननष्पादन करन े वािा अधधकार वह प्रनत उस व्यस्क्ट् त को पररदत्त करेगा स्जस पर उसकी तामीि की गई है या जो उसके अधीन धगरफ्तार ककया गया है । 134. यहद मस्जथरेट को पयाषप् त कारण हदिाई देता है तो वह ऐसे ककसी व्यस्क्ट् त वैयस् क्ट् तक उपस्थथनत स े को, स्जससे इस बात का कारण दलितष करन े की अपेिा की गई है कक उस े पररिांनत अलभमुस्क्ट्त देने कायम रिन े या सदाचार के लिए बंधपत्र ननष्पाहदत करन े के लिए आदेि क्ट्यों न हदया की िस्क्ट्त । जाए, वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत से अलभमुस्क्ट् त दे सकेगा और अधधवक्ट्ता द्वारा उपस्थथत होने की अनुज्ञा दे सकेगा । 135. (1) जब धारा 130 के अधीन आदेि ककसी व्यस्क्ट् त को, जो न्यायािय में सूच ना की सच् चाई के बारे उपस्थथत है, धारा 131 के अधीन प़िकर सुना या समझा हदया गया है या, जब कोई में जांच । व्यस्क्ट् त धारा 132 के अधीन जार ककए गए समन या वारंट के अनुपािन या ननष्पादन में मस्जथरेट के समि उपस्थथत है या िाया जाता है तब मस्जथरेट उस सूचना की सच् चाई के बारे में जांच करने के लिए स्जसके आधार पर वह कारषवाई की गई है और ऐसा अनतररक्ट् त साक्ष्य िेने के लिए जो उस े आवश्यक प्रतीत हो अग्रसर होगा । (2) ऐसी जांच यथासाध्य, उस र नत से की जाएगी जो समन-मामिों के ववचारण और साक्ष्य के अलभिेिन के लिए इसमें इसके पश् चात ् ववहहत है । (3) उपधारा (1) के अधीन जांच प्रारंभ होने के पश् चात ् और उसकी समास्प् त से पूव ष यहद मस्जथरेट समझता है कक पररिांनत भंग का या िोक प्रिांनत वविुब्ध होने का या ककसी अपराध के ककए जान े का ननवारण करन े के लिए, या िोक सुरिा के लिए तुरंत उपाय करन े आवश्यक हैं, तो वह ऐसे कारणों से, स्जन्हें ििे बद्ध ककया जाए, उस व्यस्क्ट्त को, स्जसके बारे में धारा 130 के अधीन आदेि हदया गया है, ननदेि दे सकेगा कक वह जांच समाप् त होने तक पररिानंत कायम रिन े और सदाचार बन े रहन े के लिए बंधपत्र या208 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— जमानतपत्र ननष्पाहदत करे और जब तक ऐसा बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत नह ं कर हदया जाता है, या ननष्पादन में चूक होने की दिा में जब तक जांच समाप् त नह ं हो जाती है, उस े अलभरिा में ननरुद्ध रिा जा सकेगा : परंतु— (क) ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को, स्जसके ववरुद्ध धारा 127, धारा 128 या धारा 129 के अधीन कायवष ाह नह ं की जा रह है, सदाचार बन े रहन े के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े के लिए ननदेि नह ं हदया जाएगा ; (ि) ऐसे बंधपत्र की ित,ें चाहे वे उसकी रकम के बारे में हों या प्रनतभ ू उपिब्ध करने के या उनकी संख्या के, या उनके दानयत्व की धन संबंधी सीमा के बारे में हों, उनसे अधधक दभु रष न होंगी जो धारा 130 के अधीन आदेि में ववननहदषष् ट हैं । (4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह तथ्य कक कोई व्यस्क्ट् त आभ्यालसक अपराधी है या ऐसा द:ुसाहलसक और भयंकर है कक उसका प्रनतभूनत के बबना थवच्छन्द रहना समाज के लिए पररसंकटमय है, साधारण ख्यानत के साक्ष्य से या अन्यथा साबबत ककया जा सकेगा । (5) जहां दो या अधधक व्यस्क्ट् त जांच के अधीन ववर्य में सहयुक्ट् त रहे हैं वहां मस्जथरेट एक ह जांच या पथृ क् जांचों में, जैसा वह न्यायसंगत समझे, उनके बारे में कायवष ाह कर सकेगा । (6) इस धारा के अधीन जांच उसके आरंभ की तार ि से छह मास की अवधध के भीतर पूर की जाएगी, और यहद जांच इस प्रकार पूर नह ं की जाती है तो इस अध्याय के अधीन कायवष ाह उक्ट् त अवधध की समास्प् त पर, पयवष लसत हो जाएगी जब तक उन वविेर् कारणों से जो िेिबद्ध ककए जाएं, मस्जथरेट अन्यथा ननदेि नह ं देता है : परंतु जहां कोई व्यस्क्ट् त, ऐसी जांच के िंबबत रहन े के दौरान ननरुद्ध रिा गया है वहां उस व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध कायवष ाह , यहद पहिे ह समाप्त नह ं हो जाती है तो ऐसे ननरोध के छह मास की अवधध की समास्प् त पर समाप्त हो जाएगी । (7) जहां कायवष ाहहयों को चािू रिन े की अनुज्ञा देत े हुए उपधारा (6) के अधीन ननदेि ककया जाता है, वहां सेिन न्यायाधीि व्यधथत पिकार द्वारा उस े ककए गए आवेदन पर ऐसे ननदेि को रद्द कर सकेगा, यहद उसका यह समाधान हो जाता है कक वह ककसी वविेर् कारण पर आधाररत नह ं था या अनुधचत था । प्रनतभूनत देने का 136. यहद ऐसी जांच से यह साबबत हो जाता है कक, यथास्थथनत, पररिांनत कायम आदेि । रिन े के लिए या सदाचार बनाए रिन े के लिए यह आवश्यक है कक वह व्यस्क्ट् त, स्जसके बारे में वह जांच की गई है, बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करे तो मस्जथरेट तदनुसार आदेि देगा : परंतु— (क) ककसी व्यस्क्ट् त को उस प्रकार से लभन्न प्रकार की या उस रकम स े अधधक रकम की या उस अवधध स े द घतष र अवधध के लिए प्रनतभूनत देने के लिए आदेि नह ं हदया जाएगा, जो धारा 130 के अधीन हदए गए आदेि में ववननहदषष् ट है ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 209 (ि) प्रत्येक बंधपत्र या जमानतपत्र की रकम मामिे की पररस्थथनतयों का सम्यक् ध्यान रिकर ननयत की जाएगी और अत्यधधक न होगी ; (ग) जब वह व्यस्क्ट् त, स्जसके बारे में जांच की जाती है, लििु है, तब बंधपत्र केवि उसके प्रनतभुओं द्वारा ननष्पाहदत ककया जाएगा । 137. यहद धारा 135 के अधीन जांच पर यह साबबत नह ं होता है कक, यथास्थथनत, उस व्यस्क्ट्त का पररिांनत कायम रिने के लिए या सदाचार बनाए रिन े के लिए यह आवश्यक है कक वह उन्मोचन स्जसके ववरुद्ध व्यस्क्ट् त, स्जसके बारे में जांच की गई है, बंधपत्र ननष्पाहदत करे तो मस्जथरेट उस अलभिेि सूचना द गई में उस प्रभाव की प्रववस्ष् ट करेगा और यहद ऐसा व्यस्क्ट् त केवि उस जांच के प्रयोजनों के है । लिए ह अलभरिा में है तो उसे छोड देगा या यहद ऐसा व्यस्क्ट् त अलभरिा में नह ं है तो उस े उन्मोधचत कर देगा । 138. (1) यहद कोई व्यस्क्ट् त, स्जसके बारे में प्रनतभूनत की अपेिा करन े वािा आदेि स्जस अवधध के धारा 125 या धारा 136 के अधीन हदया गया है, ऐसा आदेि हदए जाने के समय लिए प्रनतभूनत अपेक्षित की गई कारावास के लिए दंडाहदष् ट है या दंडादेि भुगत रहा है तो वह अवधध, स्जसके लिए ऐसी है उसका प्रारंभ । प्रनतभूनत की अपेिा की गई है, ऐसे दंडादेि के अवसान पर प्रारंभ होगी । (2) अन्य दिाओं में ऐसी अवधध, ऐसे आदेि की तार ि से प्रारंभ होगी, जब तक कक मस्जथरेट पयाषप् त कारण से कोई बाद की तार ि ननयत न करे । 139. ऐसे ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ननष्पाहदत ककया जाने वािा बंधपत्र या जमानतपत्र बंधप त्र की उसे, यथास्थथनत, पररिांनत कायम रिन े या सदाचार रहन े के लिए आबद्ध करेगा और बाद अंतवथष तुएं । वािे मामि े में कारावास स े दंडनीय कोई अपराध करना या करन े का प्रयत् न या दष्ु प्रेरण करना चाहे, वह कह ं भी ककया जाए, बंधपत्र या जमानतपत्र का भंग है । 140. (1) मस्जथरेट ककसी प्रथतुत ककए गए प्रनतभू को थवीकार करन े से इंकार कर प्रनत भुओं को सकेगा या अपने द्वारा, या अपने पूववष ती द्वारा, इस अध्याय के अधीन पहिे थवीकार ककए अथवीकार करने की िस्क्ट् त । गए ककसी प्रनतभू को इस आधार पर अथवीकार कर सकेगा कक ऐसा प्रनतभू जमानतपत्र के प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्ट् त व्यस्क्ट् त है : परंतु ककसी ऐसे प्रनतभू को इस प्रकार थवीकार करन े से इंकार करन े या उस े अथवीकार करन े के पहिे वह प्रनतभू की उपयुक्ट् तता के बारे में या तो थवयं िपथ पर जांच करेगा या अपने अधीनथथ मस्जथरेट से ऐसी जांच और उसके बारे में ररपोटष करवाएगा । (2) ऐसा मस्जथरेट जांच करन े के पहिे प्रनतभू को और ऐस े व्यस्क्ट् त को, स्जसने वह प्रनतभू प्रथतुत ककया है, उधचत सूचना देगा और जांच करन े में अपने सामने हदए गए साक्ष्य के सार को अलभलिखित करेगा । (3) यहद मस्जथरेट का अपने समि या उपधारा (1) के अधीन प्रनतननयुक्ट् त मस्जथरेट के समि ऐसे हदए गए साक्ष्य पर और ऐसे मस्जथरेट की ररपोटष पर (यहद कोई हो), ववचार करन े के पश् चात ् यह समाधान हो जाता है कक वह प्रनतभ ू जमानतपत्र के प्रयोजनों के लिए अनुपयुक्ट् त व्यस्क्ट् त है तो वह उस प्रनतभू को, यथास्थथनत, थवीकार करन े से इंकार करन े का या उस े अथवीकार करन े का आदेि करेगा और ऐसा करन े के लिए अपने कारण अलभलिखित करेगा : परंतु ककसी प्रनतभू को, जो पहिे थवीकार ककया जा चुका है, अथवीकार करने का आदेि देने के पहिे मस्जथरेट अपना समन या वारंट, स्जसे वह ठीक समझे, जार करेगा210 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— और उस व्यस्क्ट् त को, स्जसके लिए प्रनतभ ू आबद्ध है, अपने समि उपस्थथत कराएगा या बुिवाएगा । प्रनतभूनत देन े में 141. (1) (क) यहद कोई व्यस्क्ट् त, स्जसे धारा 125 या धारा 136 के अधीन व्यनतिम होन े प्रनतभूनत देने के लिए आदेि हदया गया है, ऐसी प्रनतभूनत उस तार ि को या उस तार ि पर कारावास । के पूव,ष स्जसको वह अवधध, स्जसके लिए ऐसी प्रनतभूनत द जानी है, प्रारंभ होती है, नह ं देता है, तो वह इसमें इसके पश् चात ् ठीक आगे वखणषत दिा के लसवाय कारागार में भेज हदया जाएगा या यहद वह पहिे स े ह कारागार में है तो वह कारागार में तब तक ननरुद्ध रिा जाएगा जब तक ऐसी अवधध समाप् त न हो जाए या जब तक ऐसी अवधध के भीतर वह उस न्यायािय या मस्जथरेट को प्रनतभूनत न दे दे स्जसने उसकी अपेिा करने वािा आदेि हदया था । (ि) यहद ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा धारा 136 के अधीन मस्जथरेट के आदेि के अनुसरण में पररिांनत बनाए रिने के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत कर हदए जान े के पश् चात,् उसके बारे में ऐस े मस्जथरेट या उसके पद-उत्तरवती के समाधानप्रद रूप में यह साबबत कर हदया जाता है कक उसन े बंधपत्र या जमानतपत्र का भंग ककया है तो ऐसा मस्जथरेट या पद- उत्तरवती, ऐस े सबूत के आधारों को िेिबद्ध करन े के पश् चात,् आदेि कर सकता है कक उस व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार ककया जाए और बंधपत्र या जमानतपत्र की अवधध की समास्प् त तक कारागार में ननरुद्ध रिा जाए तथा ऐसा आदेि ऐस े ककसी अन्य दंड या जब्ती पर प्रनतकूि प्रभाव नह ं डािेगा स्जसके प्रनत उक्ट् त व्यस्क्ट्त ववधध के अनुसार दायी हो सके । (2) जब ऐस े व्यस्क्ट् त को एक वर् ष से अधधक की अवधध के लिए प्रनतभूनत देने का आदेि मस्जथरेट द्वारा हदया गया है, तब यहद ऐसा व्यस्क्ट् त यथापूवोक्ट् त प्रनतभूनत नह ं देता है तो वह मस्जथरेट यह ननदेि देत े हुए वारंट जार करेगा कक सेिन न्यायािय का आदेि होने तक, वह व्यस्क्ट् त कारागार में ननरुद्ध रिा जाए और वह कायवष ाह सुववधानुसार िीघ्र ऐसे न्यायािय के समि रिी जाएगी । (3) ऐसा न्यायािय ऐसी कायवष ाहहयों की पर िा करने के और उस मस्जथरेट से ककसी और सूचना या साक्ष्य की, स्जसे वह आवश्यक समझे, अपेिा करन े के पश् चात ् और संबद्ध व्यस्क्ट् त को सुने जाने का उधचत अवसर देने के पश् चात ् मामि े में ऐसे आदेि पाररत कर सकेगा जो वह ठीक समझे : परंतु वह अवधध (यहद कोई हो) स्जसके लिए कोई व्यस्क्ट् त प्रनतभूनत देने में असफि रहन े के कारण कारावालसत ककया जाता है, तीन वर् ष से अधधक की नह ं होगी । (4) यहद एक ह कायवष ाह के अनुिम में ऐसे दो या अधधक व्यस्क्ट् तयों से प्रनतभूनत की अपेिा की गई है, स्जनमें से ककसी एक के बारे में कायवष ाह सेिन न्यायािय को उपधारा (2) के अधीन ननदेलित की गई है, तो ऐसे ननदेि में ऐसे व्यस्क्ट् तयों में से ककसी अन्य व्यस्क्ट् त का भी, स्जसे प्रनतभूनत देने के लिए आदेि हदया गया है, मामिा सस्म्मलित ककया जाएगा और उपधारा (2) और उपधारा (3) के उपबंध उस दिा में, ऐसे अन्य व्यस्क्ट् त के मामिे को भी, इस बात के लसवाय िागू होंगे कक वह अवधध (यहद कोई हो), स्जसके लिए वह कारावालसत ककया जा सकेगा, उस अवधध से अधधक नह ं होगी, स्जसके लिए प्रनतभूनत देने के लिए उसे आदेि हदया गया था ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 211 (5) सेिन न्यायाधीि उपधारा (2) या उपधारा (4) के अधीन उसके समि रिी गई ककसी कायवष ाह को थववववेकानुसार अपर सेिन न्यायाधीि को अंतररत कर सकता है और ऐसे अंतरण पर ऐसा अपर सेिन न्यायाधीि ऐसी कायवष ाह के बारे में इस धारा के अधीन सेिन न्यायाधीि की िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकेगा । (6) यहद प्रनतभूनत जेि के भारसाधक अधधकार को ननववदत्त की जाती है तो वह उस मामि े को उस न्यायािय या मस्जथरेट को, स्जसने आदेि ककया, तुरन्त ननदेलित करेगा और ऐसे न्यायािय या मस्जथरेट के आदेिों की प्रतीिा करेगा । (7) पररिांनत कायम रिन े के लिए प्रनतभूनत देने में असफिता के कारण कारावास सादा होगा । (8) सदाचार के लिए प्रनतभूनत देने में असफिता के कारण कारावास, जहां कायवष ाह धारा 127 के अधीन की गई है, वहां सादा होगा और, जहा ं कायवष ाह धारा 128 या धारा 129 के अधीन की गई है वहां, जैसा प्रत्येक मामि े में न्यायािय या मस्जथरेट ननदेि दे, कहठन या सादा होगा । 142. (1) जब कभी धारा 136 के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा पाररत ककसी प्रनतभूनत देने में आदेि के मामिे में स्जिा मस्जथरेट या ककसी अन्य मामिे में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट की असफिता के यह राय है कक कोई व्यस्क्ट् त जो इस अध्याय के अधीन प्रनतभूनत देने में असफि रहन े के कारण कारण कारावालसत व्यस्क्ट् तयों को कारावालसत है, समाज या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को पररसंकट में डाि े बबना छोडा जा सकेगा तब छोडन े की वह ऐसे व्यस्क्ट् त के उन्मोधचत ककए जान े का आदेि दे सकेगा । िस्क्ट् त । (2) जब कभी कोई व्यस्क्ट् त इस अध्याय के अधीन प्रनतभूनत देने में असफि रहने के कारण कारावालसत ककया गया हो तब उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय या जहां आदेि ककसी अन्य न्यायािय द्वारा ककया गया है वहां धारा 136 के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा पाररत ककसी आदेि के मामि े में स्जिा मस्जथरेट या ककसी अन्य मामि े में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट प्रनतभूनत की रकम को या प्रनतभुओ ं की संख्या को या उस समय को, स्जसके लिए प्रनतभूनत की अपेिा की गई है, कम करत े हुए आदेि दे सकेगा । (3) उपधारा (1) के अधीन आदेि ऐस े व्यस्क्ट् त का उन्मोचन या तो ितों के बबना या ऐसी ितों पर, स्जन्हें वह व्यस्क्ट् त थवीकार करे, ननदेलित कर सकेगा : परंतु अधधरोवपत की गई कोई ित ष उस अवधध की समास्प् त पर, प्रवत्तृ न रहेगी स्जसके लिए प्रनतभूनत देने का आदेि हदया गया है । (4) राज्य सरकार, ननयमों द्वारा उन ितों को ववहहत कर सकेगी स्जन पर सित ष उन्मोचन ककया जाए । (5) यहद कोई ित,ष स्जस पर ऐसा कोई व्यस्क्ट् त उन्मोधचत ककया गया है, धारा 136 के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा पाररत ककसी आदेि के मामि े में स्जिा मस्जथरेट या ककसी अन्य मामिे में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट की राय में, स्जसने उन्मोचन का आदेि हदया था या उसके उत्तरवती की राय में पूर नह ं की गई है, तो वह उस आदेि को रद्द कर सकेगा । (6) जब उन्मोचन का सित ष आदेि उपधारा (5) के अधीन रद्द कर हदया जाता है तब ऐसा व्यस्क्ट् त ककसी पुलिस अधधकार द्वारा वारंट के बबना धगरफ्तार ककया जा सकेगा और कफर धारा 136 के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा पाररत ककसी आदेि के212 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— मामिे में स्जिा मस्जथरेट या ककसी अन्य मामिे में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के समि प्रथतुत ककया जाएगा । (7) उस दिा के लसवाय स्जसमें ऐसा व्यस्क्ट् त मूि आदेि के ननबंधनों के अनुसार उस अवधध के िेर् भाग के लिए, स्जसके लिए उसे प्रथम बार कारागार सुपुदष ककया गया था या ननरुद्ध ककए जाने का आदेि हदया गया था (और ऐसा भाग उस अवधध के बराबर समझा जाएगा, जो उन्मोचन की ितों के भंग होने की तार ि और उस तार ि के बीच की है स्जसको यह ऐसे सित ष उन्मोचन के अभाव में छोडे जाने का हकदार होता) प्रनतभूनत दे देता है, धारा 136 के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा पाररत ककसी आदेि के मामि े में स्जिा मस्जथरेट या ककसी अन्य मामि े में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट उस व्यस्क्ट् त को ऐसा िेर् भाग भुगतने के लिए कारागार भेज सकेगा । (8) उपधारा (7) के अधीन कारागार भेजा गया व्यस्क्ट् त, ऐस े न्यायािय या मस्जथरेट को, स्जसने ऐसा आदेि ककया था या उसके उत्तरवती को, पूवोक्ट् त िेर् भाग के लिए मिू आदेि के ननबंधनों के अनुसार प्रनतभूनत देने पर, धारा 141 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ककसी भी समय छोडा जा सकेगा । (9) उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय पररिांनत कायम रिने के लिए या सदाचार के लिए बंधपत्र को, जो उसके द्वारा ककए गए ककसी आदेि स े इस अध्याय के अधीन ननष्पाहदत ककया गया है, पयाषप् त कारणों से, जो अलभलिखित ककए जाएं, ककसी समय भी रद्द कर सकेगा और जहां ऐसा बंधपत्र धारा 136 के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट द्वारा पाररत ककसी आदेि के मामि े में स्जिा मस्जथरेट या ककसी अन्य मामि े में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के या उसके स्जिे के ककसी न्यायािय के आदेि के अधीन ननष्पाहदत ककया गया है वहां वह उस े ऐसे रद्द कर सकेगा । (10) कोई प्रनतभ ू स्जसे ककसी अन्य व्यस्क्ट् त के िांनतमय आचरण या सदाचार के लिए इस अध्याय के अधीन बंधपत्र के ननष्पाहदत करन े के लिए आदेलित है, ऐसा आदेि करन े वािे न्यायािय से बंधपत्र को रद्द करन े के लिए ककसी भी समय आवेदन कर सकेगा और ऐसा आवेदन ककए जाने पर न्यायािय यह अपेिा करत े हुए कक वह व्यस्क्ट् त, स्जसके लिए ऐसा प्रनतभू आबद्ध है, उपस्थथत हो या उसके समि िाया जाए, समन या वारंट, जो भी वह ठीक समझे, जार करेगा । बंधपत्र की िेर् 143. (1) जब वह व्यस्क्ट् त, स्जसको उपस्थथनत के लिए धारा 140 की उपधारा (3) अवधध के लिए के परंतुक के अधीन या धारा 142 की उपधारा (10) के अधीन समन या वारंट जार प्रनतभूनत । ककया गया है, मस्जथरेट या न्यायािय के समि उपस्थथत होता है या िाया जाता है तब वह मस्जथरेट या न्यायािय ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा ननष्पाहदत बंधपत्र या जमानतपत्र को रद्द कर देगा और उस व्यस्क्ट् त को ऐसे बंधपत्र की अवधध के िर्े भाग के लिए उसी भांनत की, जैसी मूि प्रनतभूनत थी, नई प्रनतभूनत देने के लिए आदेि देगा । (2) ऐसा प्रत्येक आदेि धारा 139 से धारा 142 तक की धाराओं के (स्जसके अंतगतष ये दोनों धाराएं भी हैं) प्रयोजनों के लिए, यथास्थथनत, धारा 125 या धारा 136 के अधीन हदया गया आदेि समझा जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 213 अध्याय 10 पत् नी, संतान और माता-वपता के भरणपोषण के लिए आिेश 144. (1) यहद पयाषप् त साधनों वािा कोई व्यस्क्ट् त— पत् नी, संतान और माता-वपता (क) अपनी पत्न ी का, जो थवयं का भरणपोर्ण करन े में असमथ ष है ; या के भरणपोर्ण (ि) अपनी धमजष या अधमजष संतान का, चाहे वववाहहत हो या नह ं हो, जो के लिए थवयं का भरणपोर्ण करन े में असमथ ष है ; या आदेि । (ग) अपनी धमजष या अधमजष संतान का (जो वववाहहत पुत्री नह ं है), स्जसने वयथकता प्राप् त कर ि है, जहां ऐसी संतान ककसी िार ररक या मानलसक असामान्यता या िनत के कारण थवयं का भरणपोर्ण करने में असमथ ष है ; या (घ) अपने वपता या माता का, जो थवयं का भरणपोर्ण करन े में असमथ ष है, भरणपोर्ण करने में उपेिा करता है या भरणपोर्ण करन े से इंकार करता है तो प्रथम वग ष मस्जथरेट, ऐसी उपेिा या इंकार के साबबत हो जाने पर, ऐसे व्यस्क्ट् त को यह ननदेि दे सकेगा कक वह अपनी पत् नी या ऐसी संतान, वपता या माता के भरणपोर्ण के लिए ऐसी मालसक दर पर, स्जसे मस्जथरेट ठीक समझे, मालसक भत्ता दे और उस भत्ते का संदाय ऐस े व्यस्क्ट् त को करे स्जसको संदाय करन े का मस्जथरेट समय-समय पर ननदेि दे : परंतु मस्जथरेट, िंड (ि) में ननहदषष् ट पुत्री के वपता को ननदेि दे सकेगा कक वह उस समय तक ऐसा भत्ता दे जब तक वह वयथक नह ं हो जाती है यहद मस्जथरेट का यह समाधान हो जाता है कक ऐसी पुत्री के, यहद वह वववाहहत हो, पनत के पास पयाषप् त साधन नह ं है : परंतु यह और कक मस्जथरेट, इस उपधारा के अधीन भरणपोर्ण के लिए मालसक भत्ते के संबंध में कायवष ाह के िंबबत रहन े के दौरान, ऐसे व्यस्क्ट् त को यह आदेि दे सकेगा कक वह अपनी पत् नी या ऐसी संतान, वपता या माता के अंतररम भरणपोर्ण के लिए मालसक भत्ता और ऐसी कायषवाह का व्यय दे स्जसे मस्जथरेट उधचत समझे और ऐस े व्यस्क्ट् त को उसका संदाय करे, स्जसको संदाय करने का मस्जथरेट, समय-समय पर ननदेि दे : परंतु यह भी कक दसू रे परंतुक के अधीन अंतररम भरणपोर्ण के लिए मालसक भत्त े और कायवष ाह के व्ययों का कोई आवेदन, यथासंभव, ऐसे व्यस्क्ट् त पर आवेदन की सूचना की तामीि की तार ि से साठ हदन के भीतर ननपटाया जाएगा । स्पष् टीकरण—इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए “पत्न ी” के अंतगतष ऐसी महहिा भी है, स्जसके पनत ने उसस े वववाह-ववच्छेद कर लिया है या स्जसने अपने पनत से वववाह- ववच्छेद कर लिया है और स्जसने पुनवववष ाह नह ं ककया है । (2) भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के लिए ऐसा कोई भत्ता और कायवष ाह के लिए व्यय, आदेि की तार ि से, या, यहद ऐसा आदेि हदया जाता है तो, यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण और कायवष ाह के व्ययों के लिए आवेदन की तार ि से संदेय होंगे । (3) यहद कोई व्यस्क्ट् त स्जसे ऐसा आदेि हदया गया हो, उस आदेि का अनुपािन करन े में पयाषप् त कारण के बबना असफि रहता है तो उस आदेि के प्रत्येक भंग के लिए214 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ऐसा कोई मस्जथरेट देय रकम के ऐसी र नत से उद्गहृ त ककए जाने के लिए वारंट जार कर सकेगा जैसी र नत जुमाषने उद्गहृ त करने के लिए उपबंधधत है, और उस वारंट के ननष्पादन के पश् चात ् प्रत्येक मास के न चुकाए गए, यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के लिए पूरे भत्ते और कायवष ाह के व्यय या उसके ककसी भाग के लिए ऐसे व्यस्क्ट् त को एक मास तक की अवधध के लिए, या यहद वह उसस े पूव ष चुका हदया जाता है तो चुका देने के समय तक के लिए, कारावास का दंडादेि दे सकेगा : परंतु इस धारा के अधीन देय ककसी रकम की वसूि के लिए कोई वारंट तब तक जार न ककया जाएगा जब तक उस रकम को उद्गहृ त करने के लिए, उस तार ि से स्जसको वह देय हुई एक वर् ष की अवधध के भीतर न्यायािय से आवेदन नह ं ककया गया है : परंतु यह और कक यहद ऐसा व्यस्क्ट् त इस ित ष पर भरणपोर्ण करन े की प्रथथापना करता है कक उसकी पत्न ी उसके साथ रहे और वह पनत के साथ रहन े से इंकार करती है तो ऐसा मस्जथरेट उसके द्वारा कधथत इंकार के ककन्ह ं आधारों पर ववचार कर सकता है और ऐसी प्रथथापना के ककए जाने पर भी वह इस धारा के अधीन आदेि दे सकता है यहद उसका समाधान हो जाता है कक ऐसा आदेि देने के लिए न्यायसंगत आधार है । स्पष् टीकरण—यहद पनत ने अन्य थत्री स े वववाह कर लिया है या वह रिेि रिता है तो यह उसकी पत् नी द्वारा उसके साथ रहन े से इंकार का न्यायसंगत आधार माना जाएगा । (4) कोई पत्न ी अपने पनत से इस आधार के अधीन यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के लिए भत्ता और कायवष ाह के व्यय प्राप् त करन े की हकदार न होगी, यहद वह जारता की दिा में रह रह है या यहद वह पयाषप् त कारण के बबना अपने पनत के साथ रहन े से इंकार करती है या यहद वे पारथपररक सम्मनत से पथृ क् रह रहे हैं । (5) मस्जथरेट यह साबबत होने पर आदेि को रद्द कर सकता है कक कोई पत् नी, स्जसके पि में इस धारा के अधीन आदेि हदया गया है जारता की दिा में रह रह है या पयाषप् त कारण के बबना अपने पनत के साथ रहने से इंकार करती है या वे पारथपररक सम्मनत से पथृ क् रह रहे हैं । प्रकिया । 145. (1) ककसी व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध धारा 144 के अधीन कायवष ाह ककसी ऐसे स्जिे में की जा सकती है— (क) जहां वह है ; या (ि) जहां वह या उसकी पत्न ी ननवास करती है ; या (ग) जहां उसने अंनतम बार, यथास्थथनत, अपनी पत्न ी के साथ या अधमषज संतान की माता के साथ ननवास ककया है ; या (घ) जहां उसका वपता ननवास करता है या उसकी माता ननवास करती है । (2) ऐसी कायवष ाह में सब साक्ष्य, ऐसे व्यस्क्ट् त की उपस्थथनत में, स्जसके ववरुद्ध भरणपोर्ण के लिए संदाय का आदेि देने की प्रथथापना है, या जब उसकी वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत से अलभमुस्क्ट् त दे द गई है तब उसके अधधवक्ट्ता की उपस्थथनत में लिया जाएगा और उस र नत से अलभलिखित ककया जाएगा जो समन-मामिों के लिए ववहहत है : परंतु यहद मस्जथरेट का यह समाधान हो जाए कक ऐसा व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध भरणपोर्ण के लिए संदाय का आदेि देने की प्रथथापना है, तामीि से जानबूझकर बचअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 215 रहा है या न्यायािय में उपस्थथत होने में जानबूझकर उपेिा कर रहा है तो मस्जथरेट मामि े को एकपिीय रूप में सुनने और अवधारण करन े के लिए अग्रसर हो सकेगा और ऐसे हदया गया कोई आदेि उसकी तार ि से तीन मास के भीतर ककए गए आवेदन पर दलितष अच्छे कारण से ऐस े ननबंधनों के अधीन स्जनके अंतगतष ववरोधी पिकार को िचे के संदाय के बारे में ऐस े ननबंधन भी हैं जो मस्जथरेट न्यायोधचत और उधचत समझें, अपाथत ककया जा सकेगा । (3) धारा 144 के अधीन आवेदनों पर कायवष ाह करन े में न्यायािय को िस्क्ट् त होगी कक वह िचों के बारे में ऐसा आदेि दे जो न्यायसंगत है । 146. (1) धारा 144 के अधीन भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के लिए भत्ते में मालसक भत्ता पान े वाि े या, यथास्थथनत, अपनी पत्न ी, संतान, वपता या माता को पररवतनष । भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के लिए मालसक भत्ता देने के लिए उसी धारा के अधीन आहदष् ट ककसी व्यस्क्ट् त की पररस्थथनतयों में तब्द ि साबबत हो जाने पर मस्जथरेट, यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के लिए भत्ते में ऐसा पररवतनष कर सकेगा, जो वह ठीक समझे । (2) जहां मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है कक धारा 144 के अधीन हदया गया कोई आदेि ककसी सिम लसववि न्यायािय के ककसी ववननश् चय के पररणामथवरूप रद्द या पररवनततष ककया जाना चाहहए वहां वह, यथास्थथनत, उस आदेि को तद्नुसार रद्द कर देगा या पररवनततष कर देगा । (3) जहां धारा 144 के अधीन कोई आदेि ऐसी थत्री के पि में हदया गया है स्जसके पनत ने उससे वववाह-ववच्छेद कर लिया है या स्जसन े अपने पनत स े वववाह-ववच्छेद प्राप् त कर लिया है वहां यहद मस्जथरेट का यह समाधान हो जाता है कक— (क) उस थत्री ने ऐसे वववाह-ववच्छेद की तार ि के पश् चात ् पुन: वववाह कर लिया है, तो वह ऐसे आदेि को उसके पुनवववष ाह की तार ि से रद्द कर देगा ; (ि) उस थत्री के पनत ने उससे वववाह-ववच्छेद कर लिया है और उस महहिा ने उक्ट् त आदेि के पूव ष या पश् चात ् वह पूर धनरालि प्राप् त कर ि है जो पिकारों को िागू ककसी रूह़िजन्य या वैयस्क्ट्तक ववधध के अधीन ऐसे वववाह-ववच्छेद पर देय थी तो वह ऐसे आदेि को,— (i) उस दिा में स्जसमें ऐसी धनरालि ऐसे आदेि से पूव ष दे द गई थी उस आदेि के हदए जाने की तार ि से रद्द कर देगा ; (ii) ककसी अन्य दिा में उस अवधध की, यहद कोई हो, स्जसके लिए पनत द्वारा उस थत्री को वाथतव में भरणपोर्ण हदया गया है, समास्प् त की तार ि से रद्द कर देगा ; (ग) उस महहिा ने अपने पनत से वववाह-ववच्छेद प्राप् त कर लिया है और उसने अपने वववाह-ववच्छेद के पश् चात ् अपने, यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण के आधारों का थवेच्छा से अभ्यपणष कर हदया था, तो वह आदेि को उसकी तार ि से रद्द कर देगा । (4) ककसी भरणपोर्ण या दहेज की, ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त द्वारा, स्जस े धारा 144 के अधीन भरणपोर्ण और अंतररम भरणपोर्ण या उनमें स े ककसी के लिए कोई मालसक भत्ता216 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— संदाय ककए जाने का आदेि हदया गया है, वसूि के लिए डडिी करन े के समय लसववि न्यायािय उस रालि की भी गणना करेगा जो ऐसे आदेि के अनुसरण में, यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण या उनमें से ककसी के लिए मालसक भत्त े के रूप में उस व्यस्क्ट् त को संदाय की जा चुकी है या उस व्यस्क्ट् त द्वारा वसूि की जा चुकी है । भरणपोर्ण के 147. यथास्थथनत, भरणपोर्ण या अंतररम भरणपोर्ण और कायवष ाहहयों के व्ययों आदेि का के आदेि की प्रनत, उस व्यस्क्ट् त को, स्जसके पि में वह हदया गया है या उसके संरिक प्रवतनष । को, यहद कोई हो, या उस व्यस्क्ट् त को, स्जसे, यथास्थथनत, भरणपोर्ण के लिए भत्ता या अंतररम भरणपोर्ण के लिए भत्ता और कायवष ाह के लिए व्यय हदया जाना है, नन:िुलक द जाएगी और ऐसे आदेि का प्रवतनष ककसी ऐसे थथान में, जहां वह व्यस्क्ट् त है, स्जसके ववरुद्ध वह आदेि हदया गया था, ककसी मस्जथरेट द्वारा पिकारों को पहचान के बारे में और, यथास्थथनत, देय भत्ते या व्ययों के न हदए जाने के बारे में ऐसे मस्जथरेट का समाधान हो जाने पर ककया जा सकेगा । अध्याय 11 िोक व्यिस्था और प्रशांनत बनाए रखना क—विधिविरुदि िमाि लसववि बि के 148. (1) कोई कायपष ािक मस्जथरेट या पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार या प्रयोग द्वारा ऐसे भारसाधक अधधकार की अनुपस्थथनत में उप ननर िक की पंस्क्ट् त से अननम् न कोई जमाव को पुलिस अधधकार ककसी ववधधववरुद्ध जमाव को, या पांच या अधधक व्यस्क्ट् तयों के ककसी नततर-बबतर ऐसे जमाव को, स्जससे िोकिांनत वविुब्ध होने की संभाव् यता है, नततर-बबतर होने का करना । समादेि दे सकता है और तब ऐसे जमाव के सदथयों का यह कतव्ष य होगा कक वे तद्नुसार नततर-बबतर हो जाएं । (2) यहद ऐसा समादेि हदए जाने पर ऐसा कोई जमाव नततर-बबतर नह ं होता है या यहद ऐसे समाहदष् ट हुए बबना वह इस प्रकार से आचरण करता है, स्जससे उसका नततर- बबतर न होने का ननश् चय दलितष होता है, तो उपधारा (1) में ननहदषष् ट कोई कायपष ािक मस्जथरेट या पुलिस अधधकार उस जमाव को बि द्वारा नततर-बबतर करन े की कायवष ाह कर सकेगा और ककसी व्यस्क्ट्त से जो सिथ त्र बि का अधधकार या सदथय नह ं है और उस नात े काय ष नह ं कर रहा है, ऐसे जमाव को नततर-बबतर करन े के प्रयोजन के लिए और यहद आवश्यक हो तो उन व्यस्क्ट् तयों को, जो उसमें सस्म्मलित हैं, इसलिए धगरफ्तार करन े और परररुद्ध करने के लिए कक ऐसा जमाव नततर-बबतर ककया जा सके या उन्हें ववधध के अनुसार दंड हदया जा सके, सहायता की अपेिा कर सकेगा । जमाव को नततर- 149. (1) धारा 148 की उपधारा (1) में ननहदषष्ट यहद कोई ऐसा जमाव अन्यथा बबतर करने के नततर-बबतर नह ं ककया जा सकता है और िोक सुरिा के लिए यह आवश्यक है कक उसको लिए सिथ त्र बि नततर-बबतर ककया जाना चाहहए तो स्जिा मस्जथरेट या उसके द्वारा प्राधधकृत कोई अन्य का प्रयोग । कायपष ािक मस्जथरेट, जो उपस्थथत हो, सिथ त्र बि द्वारा उसे नततर-बबतर करवा सकेगा । (2) ऐसा मस्जथरेट ककसी ऐस े अधधकार से, जो सिथ त्र बि के व्यस्क्ट् तयों की ककसी टुकडी का समादेिन कर रहा है, यह अपेिा कर सकेगा कक वह अपने समादेिाधीन सिथ त्र बि की मदद स े जमाव को नततर-बबतर कर दे और उसमें सस्म्मलित ऐस े व्यस्क्ट् तयों को, स्जनकी बाबत मस्जथरेट ननदेि दे या स्जन्हें जमाव को नततर-बबतर करनेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 217 या ववधध के अनुसार दंड देने के लिए धगरफ्तार और परररुद्ध करना आवश्यक है, धगरफ्तार और परररुद्ध करे । (3) सिथत्र बि का प्रत्येक ऐसा अधधकार ऐसी अध्यपेिा का पािन ऐसी र नत स े करेगा जैसी वह ठीक समझे, ककंतु ऐसा करन े में केवि इतने ह बि का प्रयोग करेगा और िर र और संपवत्त को केवि इतनी ह हानन पहुंचाएगा स्जतनी उस जमाव को नततर- बबतर करन े और ऐसे व्यस्क्ट् तयों को धगरफ्तार और ननरुद्ध करन े के लिए आवश्यक है । 150. जब कोई ऐसा जमाव िोक सुरिा को थपष् टतया सकं टापन्न कर देता है और जमाव को ककसी कायपष ािक मस्जथरेट स े संपकष नह ं ककया जा सकता है तब सिथ त्र बि का कोई नततर-बबतर करन े की सिथ त्र आयुक्ट् त या राजपबत्रत अधधकार ऐसे जमाव को अपने समादेिाधीन सिथ त्र बि की मदद बि के कुछ से नततर-बबतर कर सकेगा और ऐसे ककन्ह ं व्यस्क्ट् तयों को, जो उसमें सस्म्मलित हों, ऐसे अधधकाररयों की जमाव को नततर-बबतर करन े के लिए या इसलिए कक उन्हें ववधध के अनुसार दंड हदया जा िस्क्ट्त । सके, धगरफ्तार और परररुद्ध कर सकेगा, ककंत ु यहद उस समय, जब वह इस धारा के अधीन काय ष कर रहा है, कायपष ािक मस्जथरेट स े संपकष करना उसके लिए साध्य हो जाता है तो वह ऐसा करेगा और तब स े इस बारे में कक वह ऐसी कायवष ाह चािू रि े या न रि,े मस्जथरेट के अनुदेिों का पािन करेगा । 151. (1) ककसी काय ष के लिए, जो धारा 148, धारा 149 या धारा 150 के अधीन धारा 148, धारा ककया गया तात्पनयतष है, ककसी व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध कोई अलभयोजन ककसी दंड न्यायािय 149 तथा धारा में— 150 के अधीन ककए गए कायों के (क) जहां ऐसा व्यस्क्ट् त सिथ त्र बि का कोई अधधकार या सदथय है, वहा ं लिए अलभयोजन केंद्र य सरकार की मंजूर के बबना संस्थथत नह ं ककया जाएगा ; से संरिण । (ि) ककसी अन्य मामि े में राज्य सरकार की मंजूर के बबना संस्थथत नह ं ककया जाएगा । (2) (क) उक्ट् त धाराओं में से ककसी के अधीन सद्भ ावपूवकष काय ष करन े वािे ककसी कायपष ािक मस्जथरेट या पुलिस अधधकार के बारे में ; (ि) धारा 148 या धारा 149 के अधीन अपेिा के अनुपािन में सद्भ ावपूवकष काय ष करन े वािे ककसी व्यस्क्ट् त के बारे में ; (ग) धारा 150 के अधीन सद्भ ावपूवकष काय ष करन े वाि े सिथ त्र बि के ककसी अधधकार के बारे में ; (घ) सिथ त्र बि का कोई सदथय स्जस आदेि का पािन करन े के लिए आबद्ध हो उसके पािन में ककए गए ककसी काय ष के लिए उस सदथय के बारे में, यह नह ं समझा जाएगा कक उसने कोई अपराध ककया है : (3) इस धारा में और इस अध्याय की पूववष ती धाराओं में— (क) “सिथ त्र बि” पद स े भूलम बि के रूप में कियािीि सेना, नौसेना और वायुसेना अलभप्रेत हैं और इसके अंतगतष इस प्रकार कियािीि संघ के अन्य सिथ त्र बि भी हैं ; (ि) सिथ त्र बि के संबंध में “अधधकार ” से सिथ त्र बि के आकफसर के रूप में आयुक्ट् त, राजपबत्रत या वेतनभोगी व्यस्क्ट् त अलभप्रेत हैं और इसके अंतगतष कननष् ठ218 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कमीिंड आकफसर, वारंट आकफसर, पेट आकफसर, गरै -कमीिंड आकफसर तथा अराजपबत्रत आकफसर भी हैं ; (ग) सिथत्र बि के संबंध में “सदथय” से सिथत्र बि के अधधकार से लभन्न उसका कोई सदथय अलभप्रेत है । ख—िोक न्यूसेन्स न्यूसेन्स हटाने 152. (1) जब ककसी स्जिा मस्जथरेट या उपिंड मस्जथरेट का या राज्य सरकार के लिए सित ष द्वारा इस ननलमत्त वविेर्तया सिक्ट् त ककसी अन्य कायपष ािक मस्जथरेट का ककसी पुलिस आदेि । अधधकार से ररपोटष या अन्य सूचना प्राप् त होने पर और ऐसा साक्ष्य (यहद कोई हो) िने े पर, जैसा वह ठीक समझे, यह ववचार है कक— (क) ककसी िोक थथान या ककसी माग,ष नद या जिसरणी से, जो जनता द्वारा ववधधपूवकष उपयोग में िाई जाती है या िाई जा सके, कोई ववधधववरुद्ध बाधा या न्यूसेन्स हटाया जाना चाहहए ; या (ि) ककसी व्यापार या उपजीववका को चिाना या ककसी माि या पडय वथतु को रिना समाज के थवाथथ्य या िार ररक सुि के लिए हाननकर है और पररणामत: ऐसा व्यापार या उपजीववका प्रनतवर्द्ध या ववननयलमत की जानी चाहहए या ऐसा माि या पडय वथतु हटा द जानी चाहहए या उसको रिना ववननयलमत ककया जाना चाहहए ; या (ग) ककसी भवन का ननमाषण या ककसी पदाथ ष का व्ययन, स्जससे सम्भाव्य है कक अस्ग् नकांड या ववथफोट हो जाए, रोक हदया या बंद कर हदया जाना चाहहए ; या (घ) कोई भवन, तंबू, संरचना या कोई विृ ऐसी दिा में है कक सभं ाव्य है कक वह धगर जाए और पडोस में रहन े या कारबार करन े वािे या पास से ननकिने वािे व्यस्क्ट् तयों को उसस े हानन हो, और पररणामत: ऐस े भवन, तम्ब ू या संरचना को हटाना, या उसकी मरम्मत करना या उसमें आिंब िगाना, या ऐस े विृ को हटाना या उसमें आिंब िगाना आवश्यक है ; (ङ) ऐसे ककसी माग ष या िोक थथान के पाश् वथष थ ककसी तािाब, कुएं या उत्िनन को इस प्रकार से बाड िगा द जानी चाहहए कक जनता को होने वािे ितरे का ननवारण हो सके ; या (च) ककसी भयानक जीवजंत ु को नष् ट, परररुद्ध या उसका अन्यथा व्ययन ककया जाना चाहहए, तब ऐसा मस्जथरेट ऐसी बाधा या न्यूसेंस पैदा करने वाि े या ऐसा व्यापार या उपजीववका चिाने वािे या ककसी ऐसे माि या पडय वथतु को रिने वािे या ऐसे भवन, तंबू, संरचना, पदाथ,ष तािाब, कुएं या उत्िनन का थवालमत्व या कब्जा या ननयंत्रण रिने वािे या ऐसे जीवजंतु या विृ का थवालमत्व या कब्जा रिने वािे व्यस्क्ट् त से यह अपेिा करते हुए सित ष आदेि दे सकेगा कक उतने समय के भीतर, स्जतना उस आदेि में ननयत ककया जाए, वह— (i) ऐसी बाधा या न्यूसेन्स को हटा दे ; याअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 219 (ii) ऐसा व्यापार या उपजीववका चिाना छोड दे या उस े ऐसी र नत से बंद कर दे या ववननयलमत करे, जैसी ननदेलित की जाए या ऐसे मामिे या पडय वथतु को हटाए या उसको रिना ऐसी र नत से ववननयलमत करे जैसी ननदेलित की जाए ; या (iii) ऐसे भवन का ननमाषण रोके या बंद करे, या ऐस े पदाथ ष के व्ययन में पररवतनष करे ; या (iv) ऐसे भवन, तंबू या संरचना को हटाए, उसकी मरम्मत कराए या उसमें आिम्ब िगाए या ऐसे विृ ों को हटाए या उनमें आिंब िगाए ; या (v) ऐस े तािाब, कुएं या उत्िनन को बाड िगाए ; या (vi) ऐस े भयानक जीवजंतु को उस र नत स े नष् ट करे, परररुद्ध करे या उसका व्ययन करे, जो उस आदेि में उपबंधधत है, या यहद वह ऐसा करने में आपवत्त करता है तो वह थवयं उसके समि या उसके अधीनथथ ककसी अन्य कायपष ािक मस्जथरेट के समि उस समय और थथान पर, जो उस आदेि द्वारा ननयत ककया जाएगा, उपस्थथत हो और इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत प्रकार से कारण दलितष करे कक उस आदेि को अंनतम क्ट्यों न कर हदया जाए । (2) मस्जथरेट द्वारा इस धारा के अधीन सम्यक् रूप से हदए गए ककसी भी आदेि को ककसी लसववि न्यायािय में प्रश् नगत नह ं ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—“िोक थथान” के अंतगतष राज्य की संपवत्त, पडाव के मैदान और थवच्छता या आमोद-प्रमोद के प्रयोजन के लिए िाि छोडे गए मैदान भी हैं । 153. (1) आदेि की तामीि उस व्यस्क्ट् त पर, स्जसके ववरुद्ध वह ककया गया है, आदेि की यहद साध्य हो तो, उस र नत से की जाएगी, जो समनों की तामीि के लिए इसमें तामीि या अधधसूचना । उपबंधधत है । (2) यहद ऐसे आदेि की तामीि इस प्रकार नह ं की जा सकती है तो उसकी अधधसूचना ऐसी र नत से प्रकालित उद्घ ोर्णा द्वारा की जाएगी, जैसी राज्य सरकार ननयम द्वारा ननदेि करे और उसकी एक प्रनत ऐस े थथान या थथानों पर धचपका द जाएगी, जो उस व्यस्क्ट् त को सूचना पहुंचाने के लिए सबस े अधधक उपयुक्ट् त हैं । 154. वह व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध ऐसा आदेि हदया गया है— स्जस व्यस्क्ट् त को आदेि (क) उस आदेि द्वारा ननदेलित काय ष उस समय के भीतर और उस र नत से संबोधधत है वह करेगा जो आदेि में ववननहदषष् ट है, या उसका पािन (ि) उस आदेि के अनुसार उपस्थथत होगा और उसके ववरुद्ध कारण दलितष करे या कारण करेगा और ऐसी उपस्थथनत या वचुअष ि सुनवाई श्रव्ृ य-दृश्य कांफ्रेंलसगं के माध्यम से दलितष करे । अनुज्ञात की जा सकेगी । 155. यहद व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध धारा 154 के अधीन कोई आदेि हदया गया है धारा 154 का ऐसे काय ष को नह ं करता है या उपस्थथत होकर कारण दलितष नह ं करता है, तो वह अनुपािन करने में असफिता 2023 का 45 भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 223 में उस ननलमत्त ववननहदषष्ट िास्थत का दायी के लिए िास्थत । होगा और आदेि अंनतम कर हदया जाएगा ।220 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— जहां िोक 156. (1) जहां ककसी माग,ष नद , जिसरणी या थथान के उपयोग में जनता को होने अधधकार के वाि बाधा, न्यूसेन्स या ितरे का ननवारण करने के प्रयोजन के लिए कोई आदेि धारा अस्थतत्व स े 152 के अधीन ककया जाता है वहां मस्जथरेट उस व्यस्क्ट् त के स्जसके ववरुद्ध वह आदेि इंकार ककया ककया गया है अपने समि उपस्थथत होन े पर, उससे प्रश् न करेगा कक क्ट्या वह उस माग,ष जाता है वहा ं नद , जिसरणी या थथान के बारे में ककसी िोक अधधकार के अस्थतत्व से इंकार करता है प्रकिया । और यहद वह ऐसा करता है तो मस्जथरेट धारा 157 के अधीन कायवष ाह करन े के पहिे उस बात की जांच करेगा । (2) यहद ऐसी जांच में मस्जथरेट इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक ऐसे इंकार के समथनष में कोई ववश् वसनीय साक्ष्य है तो वह कायवष ाह को तब तक के लिए रोक देगा जब तक ऐसे अधधकार के अस्थतत्व का मामिा सिम न्यायािय द्वारा ववननस्श् चत नह ं कर हदया जाता है ; और यहद वह इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक ऐसा कोई साक्ष्य नह ं है तो वह धारा 157 के अनुसार कायवष ाह करेगा । (3) मस्जथरेट द्वारा उपधारा (1) के अधीन प्रश् न ककए जाने पर, जो व्यस्क्ट् त उसमें ननहदषष् ट प्रकार के िोक अधधकार के अस्थतत्व स े इंकार नह ं करता है या ऐसा इंकार करन े पर उसके समथनष में ववश् वसनीय साक्ष्य देने में असफि रहता है उस े पश् चात व् ती कायवष ाहहयों में ऐसा कोई इंकार नह ं करन े हदया जाएगा । व्यस्क्ट्त स्जसके 157. (1) यहद वह व्यस्क्ट् त, स्जसके ववरुद्ध धारा 152 के अधीन आदेि हदया गया ववरुद्ध धारा है, उपस्थथत है और आदेि के ववरुद्ध कारण दलितष करता है तो मस्जथरेट उस मामि े में 152 के अधीन उस प्रकार साक्ष्य िेगा जैसे समन मामि े में लिया जाता है । कोई आदेि (2) यहद मस्जथरेट का यह समाधान हो जाता है कक आदेि या तो जैसा मूित: हदया गया है वहा ं कारण ककया गया था उस रूप में या ऐसे पररवतनष के साथ, स्जसे वह आवश्यक समझे, दलितष करने के युस्क्ट् तयुक्ट् त और उधचत है तो वह आदेि, यथास्थथनत, पररवतनष के बबना या ऐसे पररवतनष लिए प्रकिया । सहहत अंनतम कर हदया जाएगा । (3) यहद मस्जथरेट का ऐसा समाधान नह ं होता है तो उस मामि े में आगे कोई कायवष ाह नह ं की जाएगी : परन्तु इस धारा के अधीन कायवष ाहहयां नब्बे हदन की अवधध के भीतर यथासंभविीघ्र पूर की जाएंगी, जो उन कारणों के लिए जो िेिबद्ध ककए जाएं, एक सौ बीस हदन तक ववथताररत की जा सकेगी । थथानीय अन्वेर्ण 158. मस्जथरेट धारा 156 या धारा 157 के अधीन ककसी जांच के प्रयोजनों के के लिए ननदेि देने लिए,— और वविेर्ज्ञ की (क) ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा, स्जसे वह ठीक समझे, थथानीय अन्वेर्ण ककए जाने पर िा करने की के लिए ननदेि दे सकेगा ; या मस्जथरेट की िस्क्ट् त । (ि) ककसी वविेर्ज्ञ को समन कर सकेगा और उसकी पर िा कर सकेगा । मस्जथरेट की 159. (1) जहां मस्जथरेट धारा 158 के अधीन ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा थथानीय लिखित अनुदेि अन्वेर्ण ककए जाने के लिए ननदेि देता है, वहां मस्जथरेट— आहद देने की (क) उस व्यस्क्ट् त को ऐसे लिखित अनुदेि दे सकेगा जो उसके मागदष िनष के िस्क्ट् त । लिए आवश्यक प्रतीत हों ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 221 (ि) यह घोवर्त कर सकेगा कक थथानीय अन्वेर्ण का सभी आवश्यक व्यय, या उसका कोई भाग, ककसके द्वारा हदया जाएगा । (2) ऐसे व्यस्क्ट् त की ररपोटष को मामि े में साक्ष्य के रूप में प़िा जा सकेगा । (3) जहां मस्जथरेट धारा 158 के अधीन ककसी वविेर्ज्ञ को समन करता है और उसकी पर िा करता है वहां मस्जथरेट ननदेि दे सकेगा कक ऐसे समन करन े और पर िा करन े के िचे ककसके द्वारा हदए जाएंगे । 160. (1) जब धारा 155 या धारा 157 के अधीन आदेि अंनतम कर हदया जाता है आदेि अंनतम कर हदए जाने तब मस्जथरेट उस व्यस्क्ट् त को, स्जसके ववरुद्ध वह आदेि हदया गया है, उसकी सूचना पर प्रकिया और देगा और उससे यह भी अपिे ा करेगा कक वह उस आदेि द्वारा ननदेलित काय ष इतने उसकी अवज्ञा के समय के भीतर करे, स्जतना सूचना में ननयत ककया जाए और उस े सूचना देगा कक अवज्ञा पररणाम । 2023 का 45 करन े पर वह भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 223 द्वारा उपबंधधत िास्थत का दायी होगा । (2) यहद ऐसा काय ष ननयत समय के भीतर नह ं ककया जाता है तो मस्जथरेट उस े ननष्पाहदत करा सकेगा और उसके ककए जाने में हुए िचों को ककसी भवन, माि या अन्य संपवत्त के, जो उसके आदेि द्वारा हटाई गई है, वविय द्वारा या ऐस े मस्जथरेट की थथानीय अधधकाररता के भीतर या बाहर स्थथत उस व्यस्क्ट् त की अन्य चि संपवत्त के करथथम ् और वविय द्वारा वसूि कर सकेगा और यहद ऐसी अन्य संपवत्त ऐसी अधधकाररता के बाहर है तो उस आदेि से ऐसी कुकी और वविय तब प्राधधकृत होगा जब वह उस मस्जथरेट द्वारा पष्ृ ठ ांककत कर हदया जाता है स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर कुकष की जाने वाि संपवत्त पाई जाती है । (3) इस धारा के अधीन सद्भ ावपूवकष की गई ककसी बात के बारे में कोई वाद नह ं िाया जाएगा । 161. (1) यहद धारा 152 के अधीन आदेि देने वािा मस्जथरेट यह समझता है कक जांच के िंबबत रहने तक जनता को आसन्न ितरे या गंभीर ककथम की हानन का ननवारण करन े के लिए तुरंत व्यादेि । उपाय ककए जाने चाहहएं तो वह, उस व्यस्क्ट् त को, स्जसके ववरुद्ध आदेि हदया गया था, ऐसा व्यादेि देगा जैसा उस ितरे या हानन को, मामि े का अवधारण होने तक, दरू या ननवाररत करन े के लिए अपेक्षित है । (2) यहद ऐस े व्यादेि के तत्काि पािन में उस व्यस्क्ट् त द्वारा व्यनतिम ककया जाता है तो मस्जथरेट थवयं ऐस े साधनों का उपयोग कर सकेगा या करवा सकेगा जो वह उस ितरे को दरू करन े या हानन का ननवारण करन े के लिए ठीक समझे । (3) मस्जथरेट द्वारा इस धारा के अधीन सद् भावपूवकष की गई ककसी बात के बारे में कोई वाद नह ं िाया जाएगा । 162. कोई स्जिा मस्जथरेट या उपिंड मस्जथरेट या राज्य सरकार या स्जिा मस्जथरेट िोक मस्जथरेट द्वारा इस ननलमत्त सिक्ट् त ककया गया कोई अन्य कायपष ािक मस्जथरेट या न् यूसेंस की पुनराववृत्त या 2023 का 45 पुलिस उपायुक्ट्त ककसी व्यस्क्ट् त को आदेि दे सकेगा कक वह भारतीय न्याय संहहता, 2023 उसे चाि ू रिन े में या ककसी अन्य वविेर् या थथानीय ववधध में यथापररभावर्त िोक न्यूसेंस की न तो का प्रनतर्ेध कर पुनराववृत्त करे और न उस े चािू रि े । सकता है ।222 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ग—न्यूसेंस या आशंक्रकत खतरे के अनत-आिश्यक मामि े न्यूसेंस या 163. (1) उन मामिों में, स्जनमें स्जिा मस्जथरेट या उपिंड मस्जथरेट या राज्य आिंककत ितरे सरकार द्वारा इस ननलमत्त वविेर्तया सिक्ट् त ककए गए ककसी अन्य कायपष ािक मस्जथरेट के अनत- आवश्यक की राय में इस धारा के अधीन कायवष ाह करन े के लिए पयाषप् त आधार है और तुरंत मामिों में ननवारण या िीघ्र उपचार करना वांछनीय है, वह मस्जथरेट ऐसे लिखित आदेि द्वारा, आदेि जार स्जसमें मामि े के तास्ववक तथ्यों का कथन होगा और स्जसकी तामीि धारा 153 द्वारा करन े की िस्क्ट् त । उपबंधधत र नत से कराई जाएगी, ककसी व्यस्क्ट् त को काय-ष वविेर् न करन े या अपने कब्जे की या अपने प्रबंध के अधीन ककसी ववलिष् ट संपवत्त की कोई ववलिष् ट व्यवथथा करने का ननदेि उस दिा में दे सकता है स्जसमें ऐसा मस्जथरेट समझता है कक ऐसे ननदेि से यह संभाव्य है, या ऐस े ननदेि की यह प्रववृत्त है कक ववधधपूवकष ननयोस्जत ककसी व्यस्क्ट् त को बाधा, िोभ या िनत का, या मानव जीवन, थवाथथ्य या सुरिा को ितरे का, या िोक प्रिांनत वविुब्ध होने का, या बिवे या दंगे का ननवारण हो जाएगा । (2) इस धारा के अधीन आदेि, आपात की दिाओ ं में या उन दिाओ ं में जब पररस्थथनतयां ऐसी हैं कक उस व्यस्क्ट् त पर, स्जसके ववरुद्ध वह आदेि ननदेलित है, सूचना की तामीि सम्यक् समय में करन े की गुंजाइि न हो, एकपिीय रूप में पाररत ककया जा सकता है । (3) इस धारा के अधीन आदेि ककसी ववलिष् ट व्यस्क्ट् त को, या ककसी वविेर् थथान या िेत्र में ननवास करन े वािे व्यस्क्ट् तयों को या आम जनता को, जब वे ककसी वविर्े थथान या िेत्र में जाते रहत े हैं या जाएं, ननदेलित ककया जा सकता है । (4) इस धारा के अधीन कोई आदेि उस आदेि के हदए जाने की तार ि से दो मास से आगे प्रवत्तृ न रहेगा : परंतु यहद राज्य सरकार मानव जीवन, थवाथथ्य या िेम को ितरे का ननवारण करन े के लिए या बिवे या ककसी दंगे का ननवारण करन े के लिए ऐसा करना आवश्यक समझती है तो वह अधधसूचना द्वारा यह ननदेि दे सकती है कक मस्जथरेट द्वारा इस धारा के अधीन ककया गया कोई आदेि उतनी अनतररक्ट् त अवधध के लिए, स्जतनी वह उक्ट् त अधधसूचना में ववननहदषष् ट करे, प्रवत्तृ रहेगा ; ककंतु वह अनतररक्ट् त अवधध उस तार ि से छह मास से अधधक की न होगी स्जसको मस्जथरेट द्वारा हदया गया आदेि ऐसे ननदेि के अभाव में समाप् त हो गया होता । (5) कोई मस्जथरेट या तो थवप्रेरणा से या ककसी व्यधथत व्यस्क्ट् त के आवेदन पर ककसी ऐसे आदेि को वविंडडत या पररवनततष कर सकता है जो थवयं उसने या उसके अधीनथथ ककसी मस्जथरेट ने या उसके पद-पूववष ती ने इस धारा के अधीन हदया है । (6) राज्य सरकार उपधारा (4) के परंतुक के अधीन अपने द्वारा हदए गए ककसी आदेि को या तो थवप्रेरणा से या ककसी व्यधथत व्यस्क्ट् त के आवेदन पर वविंडडत या पररवनततष कर सकती है । (7) जहां उपधारा (5) या उपधारा (6) के अधीन आवेदन प्राप् त होता है वहां, यथास्थथनत, मस्जथरेट या राज्य सरकार आवेदक को या तो थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा उसके समि उपस्थथत होने और आदेि के ववरुद्ध कारण दलितष करन े का िीघ्र अवसर देगी ; और यहद, यथास्थथनत, मस्जथरेट या राज्य सरकार आवेदन को पूणतष : या अंित:अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 223 नामंजूर कर दे तो वह ऐसा करन े के अपने कारणों को िेिबद्ध करेगी । घ—अचि संपवि के बारे में वििाि 164. (1) जब कभी ककसी कायपष ािक मस्जथरेट का, पुलिस अधधकार की ररपोटष स े या जहां भूलम या जि स े संबद्ध अन्य सूचना पर समाधान हो जाता है कक उसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर ककसी भूलम वववादों स े या जि या उसकी सीमाओ ं स े सबं द्ध ऐसा वववाद ववद्यमान है, स्जसस े पररिांनत भंग होना पररिांनत भगं संभाव्य है, तब वह अपना ऐसा समाधान होन े के आधारों का कथन करत े हुए और ऐसे वववाद होना संभाव्य है, वहां प्रकिया । से संबद्ध पिकारों स े यह अपिे ा करत े हुए लिखित आदेि देगा कक व े ववननहदषष् ट तार ि और समय पर थवय ं या अधधवक्ट्ता द्वारा उसके न्यायािय में उपस्थथत हों और वववाद की ववर्यवथतु पर वाथतववक कब्जे के तथ्य के बारे में अपन-ेअपन े दावों का लिखित कथन प्रथतुत करें । (2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए “भूलम या जि” पद के अंतगतष भवन, बाजार, मीनिेत्र, फसिें, भूलम की अन्य उपज और ऐसी ककसी संपवत्त का ककराया या िाभ भी हैं । (3) इस आदेि की एक प्रनत की तामीि इस संहहता द्वारा समनों की तामीि के लिए उपबंधधत र नत से ऐस े व्यस्क्ट् त या व्यस्क्ट् तयों पर की जाएगी, स्जन्हें मस्जथरेट ननदेलित करे और कम से कम एक प्रनत वववाद की ववर्यवथत ु पर या उसके ननकट ककसी सहजदृश्य थथान पर िगाकर प्रकालित की जाएगी । (4) मस्जथरेट तब वववाद की ववर्यवथत ु को पिकारों में से ककसी के भी कब्जे में रिन े के अधधकार के गुणागुण या दावे के प्रनत ननदेि ककए बबना उन कथनों का, जो ऐसे प्रथतुत ककए गए हैं, पररिीिन करेगा, पिकारों को सुनेगा और ऐसा सभी साक्ष्य िेगा जो उनके द्वारा प्रथतुत ककया जाए, ऐसा अनतररक्ट् त साक्ष्य, यहद कोई हो, िेगा जैसा वह आवश्यक समझे और यहद संभव हो तो यह ववननस्श् चत करेगा कक क्ट्या उन पिकारों में से कोई उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा हदए गए आदेि की तार ि पर वववाद की ववर्यवथतु पर कब्जा रिता था और यहद रिता था तो वह कौन सा पिकार था : परंतु यहद मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है कक कोई पिकार उस तार ि के, स्जसको पुलिस अधधकार की ररपोटष या अन्य सूचना मस्जथरेट को प्राप् त हुई, ठीक पूव ष दो मास के भीतर या उस तार ि के पश् चात ् और उपधारा (1) के अधीन उसके आदेि की तार ि के पूव ष बिात ् और सदोर् रूप से बेकब्जा ककया गया है तो वह यह मान सकेगा कक उस प्रकार बेकब्जा ककया गया पिकार उपधारा (1) के अधीन उसके आदेि की तार ि को कब्जा रिता था । (5) इस धारा की कोई बात, उपस्थथत होने के लिए ऐसे अपेक्षित ककसी पिकार को या ककसी अन्य हहतबद्ध व्यस्क्ट् त को यह दलितष करन े स े नह ं रोकेगी कक कोई पूवोक्ट् त प्रकार का वववाद वतमष ान नह ं है या नह ं रहा है और ऐसी दिा में मस्जथरेट अपने उक्ट्त आदेि को रद्द कर देगा और उस पर आगे की सभी कायवष ाहहयां रोक द जाएंगी ककंतु उपधारा (1) के अधीन मस्जथरेट का आदेि ऐस े रद्दकरण के अधीन रहत े हुए अंनतम होगा । (6) (क) यहद मस्जथरेट यह ववननश् चय करता है कक पिकारों में से एक का वववाद की उक्ट् त ववर्यवथतु पर ऐसा कब्जा था या उपधारा (4) के परंतुक के अधीन ऐसा कब्जा माना जाना चाहहए, तो वह यह घोर्णा करने वािा कक ऐसा पिकार उस पर तब तक224 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कब्जा रिन े का हकदार है जब तक उस े ववधध के सम्यक् अनुिम में बेदिि न कर हदया जाए ; और यह ननर्ेध करने वािा कक जब तक ऐसी बेदिि न कर द जाए तब तक ऐसे कब्जे में कोई ववघ् न न डािा जाए, आदेि जार करेगा ; और जब वह उपधारा (4) के परंतुक के अधीन कायवष ाह करता है तब उस पिकार को, जो बिात ् और सदोर् बेकब्जा ककया गया है, कब्जा िौटा सकता है । (ि) इस उपधारा के अधीन हदया गया आदेि उपधारा (3) में अधधकधथत र नत स े तामीि और प्रकालित ककया जाएगा । (7) जब ककसी ऐसी कायवष ाह के पिकार की मत्ृ यु हो जाती है तब मस्जथरेट मतृ पिकार के ववधधक प्रनतननधध को कायवष ाह का पिकार बनवा सकेगा और कफर जांच चािू रिेगा और यहद इस बारे में कोई प्रश् न उत्पन्न होता है कक मतृ पिकार का ऐसी कायवष ाह के प्रयोजन के लिए ववधधक प्रनतननधध कौन है तो मतृ पिकार का प्रनतननधध होने का दावा करने वािे सब व्यस्क्ट् तयों को उस कायवष ाह का पिकार बना लिया जाएगा । (8) यहद मस्जथरेट की यह राय है कक उस संपवत्त की, जो इस धारा के अधीन उसके समि िंबबत कायवष ाह में वववाद की ववर्यवथत ु है, कोई फसि या अन्य उपज िीघ्रतया और प्रकृत्या ियिीि है तो वह ऐसी संपवत्त की उधचत अलभरिा या वविय के लिए आदेि दे सकता है और जांच के समाप् त होने पर ऐसी संपवत्त के या उसके वविय के आगमों के व्ययन के लिए ऐसा आदेि दे सकता है जो वह ठीक समझे । (9) यहद मस्जथरेट ठीक समझ े तो वह इस धारा के अधीन कायवष ाहहयों के ककसी प्रिम में पिकारों में से ककसी के आवेदन पर ककसी सािी के नाम समन यह ननदेि देत े हुए जार कर सकता है कक वह उपस्थथत हो या कोई दथतावेज या चीज प्रथतुत करे । (10) इस धारा की कोई बात धारा 126 के अधीन कायवष ाह करन े की मस्जथरेट की िस्क्ट् तयों का अलपीकरण करने वाि नह ं समझी जाएगी । वववाद की 165. (1) यहद धारा 164 की उपधारा (1) के अधीन आदेि करन े के पश् चात ् ककसी ववर्यवथतु का समय मस्जथरेट मामिे को आपानतक समझता है या यहद वह ववननश् चय करता है कक कुकष करने की पिकारों में स े ककसी का धारा 164 में यथाननहदषष् ट कब्जा उस समय नह ं था, या यहद और ररसीवर ननयुक्ट् त करन े वह अपना समाधान नह ं कर पाता है कक उस समय उनमें से ककसका ऐसा कब्जा वववाद की िस्क्ट्त । की ववर्यवथतु पर था तो वह वववाद की ववर्यवथतु को तब तक के लिए कुकष कर सकता है जब तक कोई सिम न्यायािय उसके कब्जे का हकदार व्यस्क्ट् त होने के बारे में उसके पिकारों के अधधकारों का अवधारण नह ं कर देता है : परंतु यहद ऐसे मस्जथरेट का समाधान हो जाता है कक वववाद की ववर्यवथतु के बारे में पररिांनत भंग होने की कोई संभाव्यता नह ं रह तो वह ककसी समय भी कुकी वापस ि े सकता है । (2) जब मस्जथरेट वववाद की ववर्यवथत ु को कुकष करता है तब यहद ऐसी वववाद की ववर्यवथतु के संबंध में कोई ररसीवर ककसी लसववि न्यायािय द्वारा ननयुक्ट् त नह ं ककया गया है तो, वह उसके लिए ऐसा व्यवथथा कर सकता है जो वह उस संपवत्त की देिभाि के लिए उधचत समझता है या यहद वह ठीक समझता है तो, उसके लिए ररसीवर ननयुक्ट् त कर सकता है स्जसको मस्जथरेट के ननयंत्रण के अधीन रहत े हुए वे सब िस्क्ट् तयांअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 225 1908 का 5 प्राप् त होंगी जो लसववि प्रकिया संहहता, 1908 के अधीन ररसीवर की होती हैं : परंतु यहद वववाद की ववर्यवथतु के संबंध में कोई ररसीवर ककसी लसववि न्यायािय द्वारा बाद में ननयुक्ट् त कर हदया जाता है तो मस्जथरेट— (क) अपने द्वारा ननयुक्ट् त ररसीवर को आदेि देगा कक वह वववाद की ववर्यवथतु का कब्जा लसववि न्यायािय द्वारा ननयुक्ट् त ररसीवर को दे दे और तत्पश् चात ् वह अपने द्वारा ननयुक्ट् त ररसीवर को उन्मोधचत कर देगा ; (ि) ऐसे अन्य आनुर्ंधगक या पाररणालमक आदेि कर सकेगा, जो न्यायसंगत हैं । 166. (1) जब ककसी कायपष ािक मस्जथरेट का, पुलिस अधधकार की ररपोटष से या भूलम या जि के उपयोग के अन्य सूचना पर, समाधान हो जाता है कक उसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर ककसी अधधकार से भूलम या जि के उपयोग के ककसी अलभकधथत अधधकार के बारे में, चाहे ऐसे अधधकार का संबद्ध वववाद । दावा सुिाचार के रूप में ककया गया हो या अन्यथा, वववाद वतमष ान है स्जससे पररिांनत भंग होनी संभाव्य है, तब वह अपना ऐसा समाधान होने के आधारों का कथन करते हुए और वववाद से संबद्ध पिकारों से यह अपेिा करते हुए लिखित आदेि दे सकता है कक वे ववननहदषष् ट तार ि और समय पर थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा उसके न्यायािय में उपस्थथत हों और अपने-अपने दावों का लिखित कथन प्रथतुत करें । स्पष् टीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, “भूलम या जि” पद का वह अथष होगा, जो धारा 164 की उपधारा (2) में हदया गया है । (2) मस्जथरेट तब इस प्रकार प्रथतुत ककए गए कथनों का पररिीिन करेगा, पिकारों को सुनेगा, ऐसा सब साक्ष्य िेगा जो उनके द्वारा प्रथतुत ककया जाए, ऐसे साक्ष्य के प्रभाव पर ववचार करेगा, ऐसा अनतररक्ट् त साक्ष्य, यहद कोई हो, िेगा जो वह आवश्यक समझे और, यहद संभव हो तो ववननश् चय करेगा कक क्ट्या ऐसा अधधकार वतमष ान है ; और ऐसी जांच के मामि े में धारा 164 के उपबंध, जहां तक हो सके, िागू होंगे । (3) यहद उस मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है कक ऐसे अधधकार वतमष ान हैं तो वह ऐसे अधधकार के प्रयोग में ककसी भी हथतिेप का प्रनतर्ेध करन े का और यथोधचत मामि े में ऐसे ककसी अधधकार के प्रयोग में ककसी बाधा को हटाने का भी आदेि दे सकता है : परंतु जहां ऐसे अधधकार का प्रयोग वर् ष में हर समय ककया जा सकता है वहां जब तक ऐसे अधधकार का प्रयोग उपधारा (1) के अधीन पुलिस अधधकार की ररपोटष या अन्य सूचना की, स्जसके पररणामथवरूप जांच संस्थथत की गई है, प्रास्प् त के ठीक पहिे तीन मास के भीतर नह ं ककया गया है या जहां ऐसे अधधकार का प्रयोग ववलिष् ट मौसमों में या ववलिष् ट अवसरों पर ह ककया जा सकता है, वहां जब तक ऐसे अधधकार का प्रयोग ऐसी प्रास्प् त के पूव ष के ऐसे मौसमों में से अंनतम मौसम के दौरान या ऐसे अवसरों में से अंनतम अवसर पर नह ं ककया गया है, ऐसा कोई आदेि नह ं हदया जाएगा । (4) जब धारा 164 की उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई ककसी कायवष ाह में मस्जथरेट को यह मािूम पडता है कक वववाद भूलम या जि के उपयोग के ककसी अलभकधथत अधधकार के बारे में है, तो वह, अपने कारण अलभलिखित करन े के पश् चात ् कायवष ाह को ऐसे चािू रि सकता है, मानो वह उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई हो और जब उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई ककसी कायवष ाह में मस्जथरेट को यह226 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— मािूम पडता है कक वववाद के संबंध में धारा 164 के अधीन कायवष ाह की जानी चाहहए तो वह अपने कारण अलभलिखित करन े के पश् चात ् कायवष ाह को ऐस े चािू रि सकता है, मानो वह धारा 164 की उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई हो । थथानीय जांच । 167. (1) जब कभी धारा 164, धारा 165 या धारा 166 के प्रयोजनों के लिए थथानीय जांच आवश्यक हो, तब कोई स्जिा मस्जथरेट या उपिंड मस्जथरेट अपने अधीनथथ ककसी मस्जथरेट को जांच करन े के लिए प्रनतननयुक्ट् त कर सकता है और उसे ऐसे लिखित अनुदेि दे सकता है जो उसके मागदष िनष के लिए आवश्यक प्रतीत हों और घोवर्त कर सकता है कक जांच के सब आवश्यक व्यय या उसका कोई भाग, ककसके द्वारा हदया जाएगा । (2) ऐसे प्रनतननयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की ररपोटष को मामि े में साक्ष्य के रूप में प़िा जा सकता है । (3) जब धारा 164, धारा 165 या धारा 166 के अधीन कायवष ाह के ककसी पिकार द्वारा कोई िचे ककए गए हैं तब ववननश् चय करने वािा मस्जथरेट यह ननदेि दे सकता है कक ऐसे िचे ककसके द्वारा हदए जाएंगे, ऐस े पिकार द्वारा हदए जाएंग े या कायवष ाह के ककसी अन्य पिकार द्वारा और पूरे के पूरे हदए जाएंगे या भाग या अनुपात में ; और ऐसे िचों के अंतगषत साक्षियों के और अधधवक्ट्ताओं की फीस के बारे में वे व्यय भी हो सकत े है, स्जन्हें न्यायािय उधचत समझे । अध्याय 12 पुलिस का ननिारक काया पुलिस का सज्ञं ेय 168. प्रत्येक पुलिस अधधकार ककसी संज्ञेय अपराध के ककए जाने का ननवारण करने अपराधों का के प्रयोजन से हथतिेप कर सकेगा और अपनी पूर सामथ्य ष से उस े ननवाररत करेगा । ननवारण करना । संज्ञेय अपराधों 169. प्रत्येक पुलिस अधधकार , स्जसे ककसी संज्ञेय अपराध को करन े की पररकलपना के ककए जान े की सूचना प्राप् त होती है, ऐसी सूचना की संसूचना उस पुलिस अधधकार को, स्जसके वह की पररकलपना अधीनथथ है, और ककसी ऐस े अन्य अधधकार को देगा स्जसका कतव्ष य ककसी ऐस े अपराध की सूचना । के ककए जाने का ननवारण या संज्ञान करना है । संज्ञेय अपराधों 170. (1) कोई पुलिस अधधकार , स्जसे कोई संज्ञेय अपराध करन े की पररकलपना का का ककया जाना पता है, ऐसी पररकलपना करन े वािे व्यस्क्ट् त को मस्जथरेट के आदेिों के बबना और वारंट रोकन े के लिए के बबना उस दिा में धगरफ्तार कर सकता है स्जसमें ऐसे अधधकार को प्रतीत होता है कक धगरफ्तार । उस अपराध का ककया जाना अन्यथा नह ं रोका जा सकता । (2) उपधारा (1) के अधीन धगरफ्तार ककए गए ककसी व्यस्क्ट् त को उसकी धगरफ्तार के समय से चौबीस घंटे की अवधध से अधधक के लिए अलभरिा में उस दिा के लसवाय ननरुद्ध नह ं रिा जाएगा स्जसमें उसका और आगे ननरुद्ध रिा जाना इस संहहता के या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के ककन्ह ं अन्य उपबंधों के अधीन अपेक्षित या प्राधधकृत है । िोक संपवत्त की 171. ककसी पुलिस अधधकार की दृस्ष् टगोचरता में ककसी भी चि या अचि हानन का सावजष ननक संपवत्त को हानन पहुंचाने का प्रयत् न ककए जान े पर वह उसका, या ककसी ननवारण । सावजष ननक भूलम-धचह्न या बोया या नौपररवहन के लिए प्रयुक्ट् त अन्य धचह्न के हटाए जानेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 227 या उसे हानन पहुंचाए जान े का, ननवारण करन े के लिए अपन े ह प्राधधकार से हथतिेप कर सकता है । 172. (1) सभी व्यस्क्ट्त इस अध्याय के अधीन अपने ककसी भी कतव्ष य को पूरा व्यस्क्ट्तयों का पुलिस के करने में हदए गए पुलिस अधधकार के ववधधपूण ष ननदेिों के अनुरूप आबद्ध होंगे । ववधधपूण ष (2) कोई पुलिस अधधकार उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा हदए गए ककसी ननदेिों के ननदेि के अनुरूप ककसी व्यस्क्ट्त को प्रनतरोध करने, इन्कार करने, अवज्ञा करने या अनुरूप बाध्य होना । अवहेिना करने के लिए ननरुद्ध कर सकेगा या हटा सकेगा और या तो ऐस े व्यस्क्ट्त को मस्जथरेट के समि ि े जा सकेगा या छोटे मामिों में उस े यथासंभव िीघ्रता स े चौबीस घंटे की अवधध के भीतर छोड सकेगा । अध्याय 13 पुलिस को सूचना और उनकी अन्िेषण करने की शक्‍ तयां 173. (1) संज्ञेय अपराध के ककए जाने स े संबंधधत प्रत्येक सूचना, उस िेत्र पर संज्ञेय मामिों में सूचना । ववचार ककए बबना जहां अपराध ककया गया है, मौखिक रूप से या इिैक्ट्राननक संसूचना द्वारा पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को द जा सकेगी और यहद,— (i) मौखिक रूप से द गई है, तो उसके द्वारा या उसके ननदेि के अधीन िेिबद्ध की जाएगी और सचू ना देने वािे को प़िकर सनु ाई जाएगी और प्रत्येक ऐसी सूचना पर, चाहे वह लिखित रूप में द गई हो या पूवोक्ट् त रूप में िेिबद्ध की गई हो, उस व्यस्क्ट् त द्वारा हथतािर ककए जाएंगे ; (ii) यहद इिैक्ट्राननक संसूचना द्वारा द गई है, तो उस े देने वाि े व्यस्क्ट्त द्वारा तीन हदनों के भीतर हथतािररत ककए जाने पर उसके द्वारा अलभिेि पर ि जाएगी, और उसका सार ऐसी पुथतक में, जो उस अधधकार द्वारा ऐसे रूप में रिी जाएगी, स्जसे राज्य सरकार, इस ननलमत्त ननयमों द्वारा ववहहत करे, प्रववष्ट ककया जाएगा : 2023 का 45 परंतु यहद ककसी महहिा द्वारा, स्जसके ववरुद्ध भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, या धारा 124 के अधीन ककसी अपराध के ककए जान े या ककए जाने का प्रयत् न ककए जाने का अलभकथन ककया गया है, कोई सूचना द जाती है तो ऐसी सूचना ककसी महहिा पुलिस अधधकार या ककसी महहिा अधधकार द्वारा अलभलिखित की जाएगी : परन् तु यह और कक— 2023 का 45 (क) यहद वह व् यस्क्ट् त, स्जसके ववरुद्ध भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79 या धारा 124 के अधीन ककसी अपराध के ककए जाने का या ककए जाने का प्रयत् न ककए जाने का अलभकथन ककया गया है, अथ थायी या थ थायी रूप से मानलसक या िार ररक रूप स े हदव्यांग है, तो ऐसी सूचना ककसी पुलिस अधधकार द्वारा उस व् यस्क्ट् त के, जो ऐस े अपराध की ररपोटष करने की वांछा करता है, ननवास-थ थान पर या उस व् यस्क्ट् त के228 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ववकल प के ककसी सुगम थ थान पर, यथास्थ थनत, ककसी द्ववभावर्ए या ककसी वविेर् लििक की उपस्थ थनत में अलभलिखित की जाएगी ; (ि) ऐसी सूचना के अलभिेिन की वीडडयो कफल म तैयार की जाएगी ; (ग) पुलिस अधधकार धारा 183 की उपधारा (6) के िंड (क) के अधीन ककसी मस्जथ रेट द्वारा उस व् यस्क्ट् त का कथन यथासंभविीघ्र अलभलिखित कराएगा । (2) उपधारा (1) के अधीन अलभलिखित सूचना की प्रनतलिवप, सूचना देने वािे को तत्काि नन:िुलक द जाएगी । (3) धारा 175 में अंतववष्ष ट उपबंधों पर प्रनतकूि प्रभाव डाि े बबना, ऐस े ककसी संज्ञेय अपराध को करने से संबंधधत सूचना की प्रास्प्त पर, स्जसमें तीन वर् ष या उससे अधधक का दंड है ककन्तु सात वर् ष से कम का है, थाने का भारसाधक अधधकार अपराध की प्रकृनत और गंभीरता पर ववचार करते हुए उप-पुलिस अधीिक की पंस्क्ट्त से अन्यून ककसी अधधकार से प्राप्त पूव ष अनुमनत से,— (i) यह अलभननस्श्चत करने के लिए कक क्ट्या चौदह हदन की अवधध के भीतर मामिे में कायवष ाह के लिए कोई प्रथमदृष्टया मामिा ववद्यमान है, आरंलभक जांच करने के लिए कायवष ाह कर सकेगा ; या (ii) जब कोई प्रथमदृष्टया मामिा ववद्यमान है, तब अन्वेर्ण के लिए कायवष ाह करेगा । (4) कोई व्यस्क्ट् त, जो ककसी पुलिस थान े के भारसाधक अधधकार के उपधारा (1) में ननहदषष् ट सूचना को अलभलिखित करन े से इंकार करने से व्यधथत है ऐसी सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा संबद्ध पुलिस अधीिक को भेज सकता है जो, यहद उसका यह समाधान हो जाता है कक ऐसी सूचना से ककसी संज्ञेय अपराध का ककया जाना प्रकट होता है तो, या तो थवयं मामिे का अन्वेर्ण करेगा या अपने अधीनथथ ककसी पुलिस अधधकार द्वारा इस संहहता द्वारा उपबंधधत र नत में अन्वेर्ण ककए जाने का ननदेि देगा और उस अधधकार को उस अपराध के संबंध में पुलिस थान े के भारसाधक अधधकार की सभी िस्क्ट् तयां होंगी ; स्जसके न हो सकने पर, ऐसा व्यधथत व्यस्क्ट्त, मस्जथरेट को आवेदन कर सकेगा । असंज्ञेय मामिों 174. (1) जब पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को उस थाने की सीमाओं के के बारे में सूचना भीतर असंज्ञेय अपराध के ककए जाने की सूचना द जाती है तब वह ऐसी सूचना का सार, और ऐस े मामिों ऐसी पुथतक में, जो ऐसे अधधकार द्वारा ऐसे प्ररूप में रिी जाएगी, जो राज्य सरकार, का अन्वेर्ण । इस ननलमत्त ननयमों द्वारा ववहहत करे, प्रववष् ट करेगा या प्रववष् ट करवाएगा और— (i) सूचना देने वािे को मस्जथरेट के पास जाने को ननदेलित करेगा ; (ii) सभी ऐसे मामिों की पाक्षिक दैननक डायर ररपोटष मस्जथरेट को भेजेगा । (2) कोई पुलिस अधधकार ककसी असंज्ञेय मामि े का अन्वेर्ण ऐसे मस्जथरेट के आदेि के बबना नह ं करेगा स्जसे ऐस े मामि े का ववचारण करन े की या मामि े को ववचारणाथ ष सुपुदष करने की िस्क्ट् त है । (3) कोई पुलिस अधधकार ऐसा आदेि लमिने पर (वारंट के बबना धगरफ्तार करन े की िस्क्ट् त के लसवाय) अन्वेर्ण के बारे में वैसी ह िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकता है जसै ी पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार संज्ञेय मामिे में कर सकता है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 229 (4) जहां मामिे का संबंध ऐसे दो या अधधक अपराधों से है, स्जनमें से कम से कम एक संज्ञेय है, वहां इस बात के होत े हुए भी कक अन्य अपराध असंज्ञेय हैं, वह मामिा संज्ञेय मामिा समझा जाएगा । 175. (1) कोई पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार , मस्जथरेट के आदेि के बबना संज्ञेय मामिों का अन्वेर्ण ककसी ऐसे संज्ञेय मामिे का अन्वेर्ण कर सकता है, स्जसकी जांच या ववचारण करने की करन े की िस्क्ट् त उस थाने की सीमाओं के भीतर के थथानीय िेत्र पर अधधकाररता रिने वािे पुलिस न्यायािय को अध्याय 14 के उपबंधों के अधीन है : अधधकार की िस्क्ट् त । परन्तु अपराध की प्रकृनत और गंभीरता पर ववचार करत े हुए, पुलिस अधीिक, उप पुलिस अधीिक स े मामि े का अन्वेर्ण करन े के लिए अपेिा कर सकेगा । (2) ऐस े ककसी मामि े में पुलिस अधधकार की ककसी कायवष ाह को ककसी भी प्रिम में इस आधार पर प्रश् नगत नह ं ककया जाएगा कक वह मामिा ऐसा मामिा था स्जसमें ऐसा अधधकार इस धारा के अधीन अन्वेर्ण करन े के लिए सिक्ट् त नह ं था । (3) धारा 210 के अधीन सिक्ट् त कोई मस्जथरेट, धारा 173 की उपधारा (4) के अधीन ककए गए िपथ-पत्र द्वारा समधथतष आवेदन पर ववचार करने के पश्चात ् और ऐसी जांच, जो वह आवश्यक समझे, करन े के पश्चात ् तथा इस संबंध में ककए गए ननवेदन पर, ऊपर उस्लिखित ककए गए अनुसार ऐसे अन्वेर्ण का आदेि कर सकेगा । (4) धारा 210 के अधीन, सिक्ट् त कोई मस्जथरेट, िोक सेवक के ववरुद्ध पररवाद की प्रास्प्त पर, जो उसके िासकीय कतव्ष यों के ननवहष न के दौरान उत्पन्न हुआ हो, ननम्नलिखित के अध्यधीन— (क) उसके वररष्ठ अधधकार स े घटना के तथ्यों और पररस्थथनतयों को अंतववष्ष ट करने वाि ररपोटष की प्रास्प्त, और (ि) िोक सेवक द्वारा ककए गए दृ़िकथनों, जो ऐसी स्थथनत की बारे में है स्जसका पररणाम इस प्रकार यह अलभकधथत घटना है, पर ववचार करने के पश्चात,् अन्वेर्ण का आदेि कर सकेगा । 176. (1) यहद पुलिस थान े के भारसाधक अधधकार को, सूचना प्राप् त होने पर या अन्वेर्ण के लिए प्रकिया । अन्यथा, यह संदेह करन े का कारण है कक ऐसा अपराध ककया गया है स्जसका अन्वेर्ण करन े के लिए धारा 175 के अधीन वह सिक्ट् त है तो वह उस अपराध की ररपोटष उस मस्जथरेट को तत्काि भेजेगा जो ऐसे अपराध का पुलिस ररपोटष पर संज्ञान करन े के लिए सिक्ट् त है और मामिे के तथ्यों और पररस्थथनतयों का अन्वेर्ण करन े के लिए, और यहद आवश्यक हो तो अपराधी का पता चिाने और उसकी धगरफ्तार के उपाय करन े के लिए, उस थथान पर या तो थवयं जाएगा या अपने अधीनथथ अधधकाररयों में से एक को भेजेगा जो ऐसी पंस्क्ट् त से ननम् नतर पंस्क्ट् त का न होगा स्जसे राज्य सरकार साधारण या वविेर् आदेि द्वारा इस ननलमत्त ववहहत करे : परंतु— (क) जब ऐसे अपराध के ककए जाने की कोई सूचना ककसी व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध उसका नाम देकर की गई है और मामिा गंभीर प्रकार का नह ं है तब यह आवश्यक न होगा कक पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार उस थथान पर अन्वेर्ण करन े के लिए थवयं जाए या अधीनथथ अधधकार को भेजे ;230 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) यहद पुलिस थान े के भारसाधक अधधकार को यह प्रतीत होता है कक अन्वेर्ण करन े के लिए पयाषप् त आधार नह ं है तो वह उस मामिे का अन्वेर्ण न करेगा : परंतु यह और कक बिात्संग के अपराध के संबंध में, पीडडत का कथन, पीडडत के ननवास पर या उसकी पसंद के थथान पर और यथासाध्य, ककसी महहिा पुलिस अधधकार द्वारा उसके माता-वपता या संरिक या नजद की नातेदार या पररिेत्र के सामास्जक कायकष ताष की उपस्थथनत में अलभलिखित ककया जाएगा और ऐसा कथन ककसी श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों, स्जसके अंतगतष मोबाइि फोन भी है, के माध्यम से भी अलभलिखित ककया जा सकेगा । (2) उपधारा (1) के पहिे परंतुक के िंड (क) और िंड (ि) में वखणतष दिाओं में स े प्रत्येक दिा में पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार अपनी ररपोटष में उसके द्वारा उस उपधारा की अपेिाओं का पूणतष या अनुपािन न करने के अपने कारणों का कथन करेगा और मस्जथरेट को पाक्षिक दैननक डायर ररपोटष भेजेगा और उक्ट् त परंतुक के िंड (ि) में वखणतष दिा में, अधधकार , सूचना देने वािे को, यहद कोई हो, ऐसी र नत से, जो राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ननयमों द्वारा ववहहत की जाए, भी तत्काि अधधसूधचत करेगा । (3) ककसी ऐसे अपराध के जो सात वर् ष या अधधक के लिए दंडनीय बनाया गया है, के होने से संबंधधत प्रत्येक सूचना की प्रास्प्त पर पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार ऐसी तार ि से जो इस संबंध में पाचं वर्ों की अवधध के भीतर राज्य सरकार द्वारा अधधसूधचत की जाए, अपराध में न्याय संबंधी साक्ष्य संग्रहण करने के लिए न्याय संबंधी वविेर्ज्ञ को अपराध थथि पर लभजवाएगा और मोबाइि फोन या ककसी अन्य इिैक्ट्राननक डडवाइस पर प्रकिया की वीडडयोग्राफी भी बनवाएगा : परन्तु जहां ऐसे ककसी अपराध के संबंध में न्याय संबंधी सुववधा उपिब्ध नह ं है वहां राज्य सरकार जब तक राज्य में उस मामिे के संबंध में सुववधा उपिब्ध नह ं कराती है या नह ं तो ककसी अन्य राज्य की ऐसी सुववधा के उपयोग को अधधसूधचत करेगी । ररपोटें कैसे द 177. (1) धारा 176 के अधीन मस्जथरेट को भेजी जाने वाि प्रत्येक ररपोटष, यहद जाएंगी । राज्य सरकार ऐसा ननदेि देती है, तो पुलिस के ऐसे वररष् ठ अधधकार के माध्यम से द जाएगी, स्जसे राज्य सरकार साधारण या वविेर् आदेि द्वारा इस ननलमत्त ननयत करे । (2) ऐसा वररष् ठ अधधकार पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को ऐसे अनुदेि दे सकता है जो वह ठीक समझे और उस ररपोटष पर उन अनुदेिों को अलभलिखित करन े के पश् चात ् उस े अवविंब मस्जथरेट के पास भेज देगा । अन्वेर्ण या 178. मस्जथरेट, धारा 176 के अधीन कोई ररपोटष प्राप् त होने पर अन्वेर्ण के लिए प्रारंलभक जांच ननदेि दे सकता है, या यहद वह ठीक समझे तो वह इस संहहता में उपबंधधत र नत स े करने की िस्क्ट्त । मामि े की प्रारंलभक जांच करन े के लिए या उसको अन्यथा ननपटाने के लिए तुरंत कायवष ाह कर सकता है, या अपने अधीनथथ ककसी मस्जथरेट को कायवष ाह करन े के लिए प्रनतननयुक्ट् त कर सकता है । साक्षियों की 179. (1) कोई पुलिस अधधकार , जो इस अध्याय के अधीन अन्वेर्ण कर रहा है, उपस्थथनत की अपने थाने की या ककसी पास के थाने की सीमाओं के भीतर ववद्यमान ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त अपेिा करने की से, स्जसका द गई सूचना से या अन्यथा उस मामि े के तथ्यों और पररस्थथनतयों से पुलिस अधधकार की िस्क्ट्त । पररधचत होना प्रतीत होता है, अपने समि उपस्थथत होने की अपेिा लिखित आदेि द्वारा कर सकता है और वह व्यस्क्ट् त अपेिानुसार उपस्थथत होगा :अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 231 परंतु ककसी पुरुर् से जो पंद्रह वर् ष से कम आयु का है या साठ वर्ष से अधधक आयु का है या ककसी महहिा से या ककसी मानलसक या िार ररक रूप से हदव्यांग व् यस्क्ट् त या ऐसा व्यस्क्ट्त या गंभीर बीमार से ग्रथत व्यस्क्ट्त से ऐसे थथान से स्जसमें ऐसा पुरुर् या महहिा ननवास करती है, लभन् न ककसी थथान पर उपस्थथत होने की अपेिा नह ं की जाएगी : परन्तु और यह कक यहद ऐसा व्यस्क्ट्त पुलिस थाने में उपस्थथत होने के लिए इच्छुक है तो ऐसे व्यस्क्ट्त को ऐसा करने के लिए अनुज्ञात ककया जा सकेगा । (2) अपने ननवास-थथान स े लभन्न ककसी थथान पर उपधारा (1) के अधीन उपस्थथत होने के लिए प्रत्येक व्यस्क्ट् त के उधचत िचों का पुलिस अधधकार द्वारा संदाय कराने के लिए राज्य सरकार इस ननलमत्त बनाए गए ननयमों द्वारा उपबंध कर सकती है । 180. (1) कोई पुलिस अधधकार , जो इस अध्याय के अधीन अन्वेर्ण कर रहा है या पुलिस द्वारा साक्षियों की ऐसे अधधकार की अपेिा पर काय ष करन े वािा पुलिस अधधकार , जो ऐसी पंस्क्ट् त से पर िा । ननम् नतर पंस्क्ट् त का नह ं है स्जसे राज्य सरकार साधारण या वविेर् आदेि द्वारा इस ननलमत्त ववहहत करे, मामिे के तथ्यों और पररस्थथनतयों से पररधचत समझे जान े वािे ककसी व्यस्क्ट् त की मौखिक पर िा कर सकता है । (2) ऐसा व्यस्क्ट् त उन प्रश् नों के लसवाय, स्जनके उत्तरों की प्रववृत्त उसे आपराधधक आरोप या िास्थत या जब्ती की आिंका में डािने की है, ऐसे मामिे से संबंधधत उन सब प्रश् नों का सह -सह उत्तर देने के लिए आबद्ध होगा जो ऐसा अधधकार उससे पूछता है । (3) पुलिस अधधकार इस धारा के अधीन पर िा के दौरान उसके समि ककए गए ककसी भी कथन को िेिबद्ध कर सकेगा और यहद वह ऐसा करता है, तो वह प्रत्येक ऐसे व्यस्क्ट् त के कथन का पथृ क् और सह अलभिेि बनाएगा, स्जसका कथन वह अलभलिखित करता है : परंतु इस उपधारा के अधीन ककया गया कथन श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों द्वारा भी अलभलिखित ककया जा सकेगा : परंतु यह और कक ककसी ऐसी महहिा का कथन, स्जसके ववरुद्ध भारतीय न्याय 2023 का 45 संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79 या धारा 124 के अधीन ककसी अपराध के ककए जाने या ककए जाने का प्रयत् न ककए जाने का अलभकथन ककया गया है, ककसी महहिा पुलिस अधधकार या ककसी महहिा अधधकार द्वारा अलभलिखित ककया जाएगा । 181. (1) ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ककसी पुलिस अधधकार से इस अध्याय के अधीन पुलिस को ककया गया अन्वेर्ण के दौरान ककया गया कोई कथन, यहद िेिबद्ध ककया जाता है तो कथन करने कथन और वािे व्यस्क्ट् त द्वारा हथतािररत नह ं ककया जाएगा, और न ऐसा कोई कथन या उसका उसका कोई अलभिेि, चाहे वह पुलिस डायर में हो या न हो, और न ऐसे कथन या अलभिेि का उपयोग । कोई भाग ऐसे ककसी अपराध की, जो ऐसा कथन ककए जाने के समय अन्वेर्ण के अधीन था, ककसी जांच या ववचारण में, इसमें इसके पश् चात ् यथाउपबंधधत के लसवाय, ककसी भी प्रयोजन के लिए उपयोग में िाया जाएगा :232 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— परंतु जब कोई ऐसा सािी, स्जसका कथन उपयुषक्ट् त रूप में िेिबद्ध कर लिया गया है, ऐसी जांच या ववचारण में अलभयोजन की ओर से बुिाया जाता है तब यहद उसके कथन का कोई भाग, सम्यक् रूप स े साबबत कर हदया गया है तो, अलभयुक्ट् त द्वारा और न्यायािय की अनुमनत से अलभयोजन द्वारा उसका उपयोग ऐसे सािी का िंडन करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 148 द्वारा उपबंधधत र नत से ककया जा 2023 का 47 सकता है और जब ऐसे कथन का कोई भाग इस प्रकार उपयोग में िाया जाता है तब उसका कोई भाग ऐसे सािी की पुन:पर िा में भी, ककंत ु उसकी प्रनतपर िा में ननहदषष् ट ककसी बात का थपष् ट करण करन े के प्रयोजन से ह , उपयोग में िाया जा सकता है । (2) इस धारा की ककसी बात के बारे में यह नह ं समझा जाएगा कक वह भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 26 के िंड (क) के उपबंधों के भीतर आने वािे ककसी 2023 का 47 कथन को िागू होती है या उस अधधननयम की धारा 23 की उपधारा (2) के परंतुक के उपबंधों पर प्रभाव डािती है । स्पष् टीकरण—उपधारा (1) में ननहदषष् ट कथन में ककसी तथ्य या पररस्थथनत के कथन का िोप, िंडन हो सकता है यहद वह उस सदं भ ष को ध्यान में रित े हुए, स्जसमें ऐसा िोप ककया गया है महत्वपूणष और अन्यथा संगत प्रतीत होता है और कोई िोप ककसी ववलिष् ट संदभ ष में िंडन है या नह ं यह तथ्य का प्रश् न होगा । कोई उत् प्रेरणा न 182. (1) कोई पुलिस अधधकार या प्राधधकार वािा अन्य व्यस्क्ट् त, भारतीय साक्ष्य हदया जाना । अधधननयम, 2023 की धारा 22 में यथावखणषत कोई उत् प्रेरणा, धमकी या वचन न तो देगा 2023 का 47 और न करेगा तथा न हदिवाएगा और न करवाएगा । (2) ककंत ु कोई पुलिस अधधकार या अन्य व्यस्क्ट् त इस अध्याय के अधीन ककसी अन्वेर्ण के दौरान ककसी व्यस्क्ट् त को कोई कथन करने से, जो वह अपनी थवतंत्र इच्छा से करना चाहे, ककसी चेतावनी द्वारा या अन्यथा ननवाररत न करेगा : परंतु इस धारा की कोई बात धारा 183 की उपधारा (4) के उपबंधों पर प्रभाव नह ं डािेगी । संथवीकृनतयों 183. (1) स्जिे का कोई मस्जथरेट, स्जसमें ककसी अपराध के ककए जाने के बारे में और कथनों को सूचना रस्जथर कृत की गई है, चाहे उस े मामि े में अधधकाररता प्राप्त हो या न हो, इस अलभलिखित अध्याय के अधीन या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन ककसी अन्वेर्ण के करना । दौरान या तत्पश् चात ् ककन्तु जांच या ववचारण प्रारंभ होने के पूव ष ककसी समय उसके द्वारा की गई ककसी संथवीकृनत या कथन को अलभलिखित कर सकता है : परंतु इस उपधारा के अधीन की गई कोई संथवीकृनत या कथन अपराध के अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के अधधवक्ट् ता की उपस्थथनत में श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से भी अलभलिखित ककया जा सकेगा : परंतु यह और कक ककसी पुलिस अधधकार द्वारा, स्जसे तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन मस्जथरेट की कोई िस्क्ट् त प्रदत्त की गई है, कोई संथवीकृनत अलभलिखित नह ं की जाएगी । (2) मस्जथरेट ककसी ऐसी संथवीकृनत को अलभलिखित करन े के पूव ष उस व्यस्क्ट् त को, जो संथवीकृनत कर रहा है, यह समझाएगा कक वह ऐसी सथं वीकृनत करन े के लिए आबद्ध नह ं है और यहद वह ऐसा करता है तो वह उसके ववरुद्ध साक्ष्य में उपयोग में िाई जाअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 233 सकती है ; और मस्जथरेट कोई ऐसी संथवीकृनत तब तक अलभलिखित न करेगा जब तक उस े करन े वािे व्यस्क्ट् त से प्रश्न करन े पर, उसके पास यह ववश् वास करन े का कारण न हो कक वह थवेच्छा से की जा रह है । (3) सथं वीकृनत अलभलिखित ककए जाने स े पूव ष यहद मस्जथरेट के समि उपस्थथत होने वािा व्यस्क्ट् त यह कथन करता है कक वह संथवीकृनत करन े के लिए इच्छुक नह ं है तो मस्जथरेट ऐसे व्यस्क्ट् त के पुलिस की अलभरिा में ननरोध को प्राधधकृत नह ं करेगा । (4) ऐसी संथवीकृनत ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की पर िा को अलभलिखित करन े के लिए धारा 316 में उपबंधधत र नत से अलभलिखित की जाएगी और संथवीकृनत करने वाि े व्यस्क्ट् त द्वारा उस पर हथतािर ककए जाएंग े ; और मस्जथरेट ऐस े अलभिेि के नीचे ननम् नलिखित भाव का एक ज्ञापन लििेगा :— “मनैं े ............ (नाम) को यह समझा हदया है कक वह संथवीकृनत करन े के लिए आबद्ध नह ं है और यहद वह ऐसा करता है तो कोई संथवीकृनत, जो वह करेगा, उसके ववरुद्ध साक्ष्य में उपयोग में िाई जा सकती है और मुझे ववश् वास है कक यह संथवीकृनत थवेच्छा से की गई है । यह मेर उपस्थथनत में और मेरे सुनते हुए लििी गई है और स्जस व्यस्क्ट् त ने यह संथवीकृनत की है उस े यह प़िकर सुना द गई है और उसने उसका सह होना थवीकार ककया है और उसके द्वारा ककए गए कथन का पूरा और सह वत्तृ ांत इसमें है । (हथतािररत) क. ि. मस्जथरेट ।” (5) उपधारा (1) के अधीन ककया गया (संथवीकृनत से लभन्न ) कोई कथन साक्ष्य अलभलिखित करने के लिए इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत ऐसी र नत से अलभलिखित ककया जाएगा जो मस्जथरेट की राय में, मामि े की पररस्थथनतयों में सवाषधधक उपयुक्ट् त हो ; तथा मस्जथरेट को उस व्यस्क्ट् त को िपथ हदिाने की िस्क्ट् त होगी स्जसका कथन इस प्रकार अलभलिखित ककया जाता है । 2023 का 45 (6) (क) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79 या धारा 124 के अधीन दंडनीय मामिों में मस्जथ रेट उस व् यस्क्ट् त का, स्जसके ववरुद्ध उपधारा (5) में ववननहदषष्ट र नत में ऐसा अपराध ककया गया है, कथन जैसे ह अपराध का ककया जाना पुलिस की जानकार में िाया जाता है, अलभलिखित करेगा : परन्तु ऐसा कथन जहां तक साध्य हो, महहिा मस्जथरेट द्वारा और उसकी अनुपस्थथनत में पुरूर् मस्जथरेट द्वारा महहिा की उपस्थथनत में अलभलिखित ककया जा सकेगा : परन्तु यह और कक ऐसे अपराधों से संबंधधत मामिों में जो दस वर् ष या उसस े अधधक के कारावास स े या आजीवन या मत्ृ युदंड से दंडनीय है, मस्जथरेट, पुलिस अधधकार द्वारा उसके समि िाए गए साक्ष्य के कथन को अलभलिखित करेगा : परन् तु यह भी कक यहद कथन करने वािा व् यस्क्ट् त अथ थायी या थ थायी रूप से मानलसक या िार ररक रूप स े हदव्यांग है, तो मस्जथ रेट कथन अलभलिखित करने में ककसी द्ववभावर्ए या वविेर् लििक की सहायता िेगा :234 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— परन् तु यह भी कक यहद कथन करने वािा व् यस्क्ट् त अथ थायी या थ थायी रूप से मानलसक या िार ररक रूप से हदव्यांग है तो ककसी द्ववभावर्ए या वविेर् लििक की सहायता से उस व् यस्क्ट् त द्वारा ककए गए कथन, श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों, अधधमानत: मोबाइि फोन के माध्यम से अलभलिखित ककया जाएगा । (ि) ऐसे ककसी व् यस्क्ट् त के, जो अथ थायी या थ थायी रूप से मानलसक या िार ररक रूप से हदव्यांग है, िंड (क) के अधीन अलभलिखित कथन को भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 142 में यथाववननहदषष् ट, मुख् य पर िा के थ थान पर एक कथन समझा 2023 का 47 जाएगा और ऐसा कथन करने वाि े की, ववचारण के समय उसको अलभलिखित करने की आवश् यकता के बबना, ऐसे कथन पर प्रनतपर िा की जा सकेगी । (7) इस धारा के अधीन ककसी संथवीकृनत या कथन को अलभलिखित करने वािा मस्जथरेट, उस े उस मस्जथरेट के पास भेजेगा, स्जसके द्वारा मामि े की जांच या ववचारण ककया जाना है । बिात्संग के 184. (1) जहां, ऐसे प्रिम के दौरान जब बिात्संग या बिात्संग करन े का प्रयत् न पीडडत व्यस्क्ट्त करन े के अपराध का अन्वेर्ण ककया जा रहा है उस महहिा के िर र की, स्जसके साथ की धचककत्सीय बिात्संग ककया जाना या करन े का प्रयत् न करना अलभकधथत है, ककसी धचककत्सा वविेर्ज्ञ पर िा । से पर िा कराना प्रथथावपत है वहां ऐसी पर िा, सरकार या ककसी थथानीय प्राधधकार द्वारा चिाए जा रहे ककसी अथपताि में ननयोस्जत रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी द्वारा, और ऐसे व्यवसायी की अनुपस्थथनत में ककसी अन्य रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी द्वारा, ऐसी महहिा की सहमनत से या उसकी ओर से ऐसी सहमनत देने के लिए सिम व्यस्क्ट् त की सहमनत से की जाएगी और ऐसी महहिा को, ऐसा अपराध ककए जाने स े संबंधधत सूचना प्राप् त होने के समय से चौबीस घंटे के भीतर ऐसे रस्जथर कृत धचककत्सा- व्यवसायी के पास भेजा जाएगा । (2) वह रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी, स्जसके पास ऐसी महहिा भेजी जाती है, बबना ककसी वविंब के, उसके िर र की पर िा करेगा और एक पर िा ररपोटष तैयार करेगा स्जसमें ननम् नलिखित ब्यौरे हदए जाएंगे, अथाषत ् :— (i) महहिा का, और उस व्यस्क्ट् त का, जो उस े िाया है, नाम और पता ; (ii) महहिा की आयु ; (iii) डी. एन. ए. प्रोफाइि करन े के लिए महहिा के िर र से ि गई सामग्री का वणनष ; (iv) महहिा के िर र पर िनत के, यहद कोई हैं, धचह्न ; (v) महहिा की साधारण मानलसक दिा ; और (vi) उधचत ब्यौरे सहहत अन्य तास्ववक ववलिस्ष् टयां । (3) ररपोटष में संिेप में वे कारण अलभलिखित ककए जाएंगे स्जनसे प्रत्येक ननष्कर् ष ननकािा गया है । (4) ररपोटष में ववननहदषष् ट रूप से यह अलभलिखित ककया जाएगा कक ऐसी पर िा के लिए महहिा की सहमनत या उसकी ओर से ऐसी सहमनत देने के लिए सिम व्यस्क्ट् त की सहमनत, अलभप्राप् त कर ि गई है । (5) ररपोटष में पर िा प्रारंभ और समाप् त करन े का सह समय भी अंककत ककया जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 235 (6) रस्जथर कृत धचककत्सा-व्यवसायी, सात हदनों की अवधध के भीतर ररपोटष अन्वेर्ण अधधकार को भेजेगा जो उस े धारा 193 में ननहदषष् ट मस्जथरेट को, उस धारा की उपधारा (6) के िंड (क) में ननहदषष् ट दथतावेजों के भाग के रूप में भजे ेगा । (7) इस धारा की ककसी बात का यह अथ ष नह ं िगाया जाएगा कक वह महहिा की सहमनत के बबना या उसकी ओर से ऐसी सहमनत देने के लिए सिम ककसी व्यस्क्ट् त की सहमनत के बबना ककसी पर िा को ववधधमान्य बनाती है । स्पष् टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए “पर िा” और “रस्जथर कृत धचककत्सा- व्यवसायी” के वह अथ ष हैं, जो धारा 51 में उनके लिए िमिः हैं । 185. (1) जब कभी पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार या अन्वेर्ण करने वािे पुलिस अधधकार द्वारा तिािी । पुलिस अधधकार के पास यह ववश् वास करन े के उधचत आधार हैं कक ककसी ऐसे अपराध के अन्वेर्ण के प्रयोजनों के लिए, स्जसका अन्वेर्ण करने के लिए वह प्राधधकृत है, आवश्यक कोई चीज उस पुलिस थाने की, स्जसका वह भारसाधक है या स्जससे वह संिग् न है, सीमाओं के भीतर ककसी थथान में पाई जा सकती है और उसकी राय में ऐसी चीज अनुधचत वविंब के बबना तिािी से अन्यथा अलभप्राप् त नह ं की जा सकती, तब ऐसा अधधकार केस डायर में अपने ववश् वास के आधारों को िेिबद्ध करन,े और यथासंभव उस चीज को, स्जसके लिए तिािी ि जानी है, ऐसे िेि में ववननहदषष् ट करन े के पश् चात ् उस थाने की सीमाओं के भीतर ककसी थथान में ऐसी चीज के लिए तिािी िे सकता है या तिािी करा सकेगा । (2) उपधारा (1) के अधीन कायवष ाह करन े वािा पुलिस अधधकार , यहद साध्य है तो, तिािी थवयं िेगा । परन्तु इस धारा के अधीन संचालित की गई तिािी श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से अधधमानतः मोबाइि फोन द्वारा अलभलिखित की जा सकेगी । (3) यहद वह तिािी थवय ं िेने में असमथ ष है और कोई अन्य ऐसा व्यस्क्ट् त, जो तिािी िेने के लिए सिम है, उस समय उपस्थथत नह ं है तो वह, ऐसा करन े के अपने कारणों को िेिबद्ध करने के पश् चात,् अपने अधीनथथ ककसी अधधकार से अपेिा कर सकता है कक वह तिािी िे और ऐसे अधीनथथ अधधकार को ऐसा लिखित आदेि देगा स्जसमें उस थथान को स्जसकी तिािी ि जानी है, और यथासंभव उस चीज को, स्जसके लिए तिािी ि जानी है, ववननहदषष् ट ककया जाएगा और तब ऐसा अधीनथथ अधधकार उस चीज के लिए तिािी उस थथान में िे सकेगा । (4) तिािी-वारंटों के बारे में इस संहहता के उपबंध और तिालियों के बारे में धारा 103 के साधारण उपबंध इस धारा के अधीन ि जान े वाि तिािी को, जहां तक हो सके, िागू होंगे । (5) उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन बनाए गए ककसी भी अलभिेि की प्रनतयां तत्काि, ककन्तु अडताि स घंटों के पश्चात ् नह ं, ऐसे ननकटतम मस्जथरेट को भेजी जाएंगी, जो उस अपराध का संज्ञान िेने के लिए सिक्ट् त है और स्जस थथान की तिािी ि गई है, उसके थवामी या अधधभोगी को, उसके आवेदन करन े पर, उसकी एक प्रनत मस्जथरेट द्वारा नन:िुलक द जाएगी ।236 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पुलिस थाने का 186. (1) पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार या उपननर िक से अननम् न पंस्क्ट् त भारसाधक का पुलिस अधधकार , जो अन्वेर्ण कर रहा है, ककसी दसू रे पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार कब अधधकार से, चाहे वह उस स्जिे में हो या दसू रे स्जि े में हो, ककसी थथान में ऐस े मामि े ककसी अन्य अधधकार से में तिािी करवाने की अपेिा कर सकता है, स्जसमें पूवकष धथत अधधकार थवयं अपने थाने तिािी-वारंट जार की सीमाओं के भीतर ऐसी तिािी करा सकेगा । करने की अपेिा कर सकता है । (2) ऐसा अधधकार ऐसी अपिे ा ककए जाने पर धारा 185 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह करेगा और यहद कोई चीज लमिे तो उसे उस अधधकार के पास भेजेगा, स्जसकी अपेिा पर तिािी ि गई है । (3) जब कभी यह ववश् वास करन े का कारण है कक दसू रे पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार से उपधारा (1) के अधीन तिािी करवाने की अपेिा करन े में जो वविंब होगा उसका पररणाम यह हो सकता है कक अपराध ककए जाने का साक्ष्य नछपा हदया जाए या नष् ट कर हदया जाए, तब पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार के लिए या उस अधधकार के लिए, जो इस अध्याय के अधीन अन्वेर्ण कर रहा है, यह ववधधपूण ष होगा कक वह दसू रे पुलिस थाने की थथानीय सीमाओं के भीतर ककसी थथान की, धारा 185 के उपबंधों के अनुसार, ऐसी तिािी करे या तिािी करवाए, मानो ऐसा थथान उसके अपने थाने की सीमाओं के भीतर हो । (4) कोई अधधकार , जो उपधारा (3) के अधीन तिािी संचालित कर रहा है, उस पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को, स्जसकी सीमाओ ं के भीतर ऐसा थथान है, तिािी की सूचना तत्काि भेजेगा और ऐसी सूचना के साथ धारा 103 के अधीन तैयार की गई सूची की (यहद कोई हो) प्रनत भी भेजेगा और उस अपराध का संज्ञान करन े के लिए सिक्ट् त ननकटतम मस्जथरेट को धारा 185 की उपधारा (1) और उपधारा (3) में ननहदषष् ट अलभिेिों की प्रनतयां भी भेजगे ा । (5) स्जस थथान की तिािी ि गई है, उसके थवामी या अधधभोगी को, आवेदन करन े पर उस अलभिेि की, जो मस्जथरेट को उपधारा (4) के अधीन भेजा जाए, प्रनत नन:िुलक द जाएगी । जब चौबीस घंटे 187. (1) जब कभी कोई व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककया गया है और अलभरिा में ननरुद्ध के भीतर है और यह प्रतीत हो कक अन्वेर्ण धारा 58 द्वारा ननयत चौबीस घंटे की अवधध के भीतर अन्वेर्ण पूरा न पूरा नह ं ककया जा सकता और यह ववश् वास करने के लिए आधार है कक अलभयोग या ककया जा सके, तब प्रकिया । सूचना दृ़ि आधार पर है तब पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार या यहद अन्वेर्ण करने वािा पुलिस अधधकार उपननर िक से ननम् नतर पंस्क्ट् त का नह ं है तो वह, ननकटतम मस्जथरेट को इसमें इसके पश् चात ् ववहहत डायर की मामिे में संबंधधत प्रववस्ष् टयों की एक प्रनतलिवप भेजेगा और साथ ह अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को भी उस मस्जथरेट के पास भेजेगा । (2) वह मस्जथरेट, स्जसके पास अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त इस धारा के अधीन भेजा जाता है, इस बात पर यह ववचार ककए बबना कक क्ट्या उसके पास उस मामिे के ववचारण की अधधकाररता है या नह ं है, अलभयुक्ट्त व्यस्क्ट्त पर ववचार करने के पश्चात ् कक क्ट्या ऐसा व्यस्क्ट्त जमानत पर नह ं छोडा गया है या उसकी जमानत रद्द कर द गई है, अलभयुक्ट् त का ऐसी अलभरिा में, जैसी वह मस्जथरेट ठीक समझे, इतनी अवधध के लिए, जो कुि लमिाकर पूणतष : या भागत: पंद्रह हदन से अधधक न हो, उपधारा (3) में यथा उपबंधधत यथास्थथनत, साठ हदन या नब्बे हदन की उसकी ननरुद्ध अवधध में से प्रारंलभक चाि सअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 237 हदन या साठ हदन के दौरान ककसी भी समय ननरुद्ध ककया जाना समय-समय पर प्राधधकृत कर सकता है तथा यहद उस े मामि े के ववचारण की या ववचारण के लिए सुपुदष करन े की अधधकाररता नह ं है और अधधक ननरुद्ध रिना उसके ववचार में अनावश्यक है तो वह अलभयुक्ट् त को ऐसे मस्जथरेट के पास, स्जसे ऐसी अधधकाररता है, लभजवाने के लिए आदेि दे सकता है : (3) मस्जथरेट अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त का पुलिस अलभरिा से अन्यथा ननरोध पंद्रह हदन की अवधध से आगे के लिए उस दिा में प्राधधकृत कर सकता है स्जसमें उसका समाधान हो जाता है कक ऐसा करन े के लिए पयाषप् त आधार ववद्यमान है, ककंत ु कोई भी मस्जथरेट अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त का इस उपधारा के अधीन अलभरिा में ननरोध,— (i) कुि लमिाकर नब्बे हदन स े अधधक की अवधध के लिए प्राधधकृत नह ं करेगा जहां अन्वेर्ण ऐसे अपराध के संबंध में है जो मत्ृ यु, आजीवन कारावास या दस वर् ष की अवधध या अधधक के लिए कारावास से दंडनीय है ; (ii) कुि लमिाकर साठ हदन से अधधक की अवधध के लिए प्राधधकृत नह ं करेगा जहां अन्वेर्ण ककसी अन्य अपराध के संबंध में है, और, यथास्थथनत, नब्बे हदन या साठ हदन की उक्ट् त अवधध की समास्प् त पर यहद अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त जमानत देने के लिए तैयार है और दे देता है तो उस े जमानत पर छोड हदया जाएगा और यह समझा जाएगा कक इस उपधारा के अधीन जमानत पर छोडा गया प्रत्येक व्यस्क्ट् त अध्याय 35 के प्रयोजनों के लिए उस अध्याय के उपबंधों के अधीन छोडा गया है ; (4) कोई मस्जथरेट इस धारा के अधीन ककसी अलभयुक्ट् त का पुलिस अलभरिा में ननरोध तब तक प्राधधकृत नह ं करेगा जब तक कक अलभयुक्ट् त उसके समि पहि बार और तत्पश् चात ् हर बार, जब तक अलभयुक्ट् त पुलिस की अलभरिा में रहता है, व्यस्क्ट् तगत रूप से प्रथतुत नह ं ककया जाता है ककंत ु मस्जथरेट अलभयुक्ट् त के या तो व्यस्क्ट् तगत रूप स े या श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से प्रथतुत ककए जाने पर न्यानयक अलभरिा में ननरोध को और ब़िा सकेगा ; (5) कोई द्ववतीय वग ष मस्जथरेट, जो उच् च न्यायािय द्वारा इस ननलमत्त वविेर्तया सिक्ट् त नह ं ककया गया है, पुलिस की अलभरिा में ननरोध प्राधधकृत नह ं करेगा । स्पष् टीकरण 1—िंकाएं दरू करन े के लिए इसके द्वारा यह घोवर्त ककया जाता है कक उपधारा (3) में ववननहदषष् ट अवधध समाप् त हो जाने पर भी अलभयुक्ट् त-व्यस्क्ट् त तब तक अलभरिा में ननरुद्ध रिा जाएगा जब तक कक वह जमानत नह ं दे देता है । स्पष् टीकरण 2—यहद यह प्रश् न उठता है कक क्ट्या कोई अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त मस्जथरेट के समि प्रथतुत ककया गया था, जैसा कक उपधारा (4) के अधीन अपेक्षित है, तो अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की पेिी को, यथास्थथनत, ननरोध प्राधधकृत करन े वािे आदेि पर उसके हथतािर से या मस्जथरेट द्वारा अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से पेिी के बारे में प्रमाखणत आदेि द्वारा साबबत ककया जा सकता है : परंतु अठारह वर् ष से कम आय ु की महहिा की दिा में, ककसी प्रनतप्रेर्ण गहृ या मान्यताप्राप् त सामास्जक संथथा की अलभरिा में ननरोध ककए जाने को प्राधधकृत ककया जाएगा :238 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— परन्तु यह और कक ककसी व्यस्क्ट्त को पुलिस अलभरिा के अधीन पुलिस थाना से या न्यानयक अलभरिा के अधीन कारागार से या केन्द्र य सरकार या राज्य सरकार द्वारा कारागार के रूप में घोवर्त ककसी थथान से लभन्न थथान में ननरुद्ध नह ं रिा जाएगा । (6) उपधारा (1) या उपधारा (5) में ककसी बात के होत े हुए भी, पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार या अन्वेर्ण करन े वािा पुलिस अधधकार , यहद उपननर िक से ननम् नतर पंस्क्ट् त का नह ं है तो, जहां न्यानयक मस्जथरेट न लमि सकता हो, वहां कायपष ािक मस्जथरेट को स्जसको मस्जथरेट की िस्क्ट् तयां प्रदान की गई हैं, इसमें इसके पश् चात ् ववहहत डायर की मामि े से संबंधधत प्रववस्ष् टयों की एक प्रनतलिवप भेजेगा और साथ ह अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को भी उस कायपष ािक मस्जथरेट के पास भेजेगा और तब ऐसा कायपष ािक मस्जथरेट िेिबद्ध ककए जाने वािे कारणों से ककसी अलभयुक्ट् त-व्यस्क्ट् त का ऐसी अलभरिा में ननरोध, जैसा वह ठीक समझे, ऐसी अवधध के लिए प्राधधकृत कर सकता है जो कुि लमिाकर सात हदन से अधधक नह ं हो और ऐसे प्राधधकृत ननरोध की अवधध की समास्प् त पर उस े जमानत पर छोड हदया जाएगा, ककंतु उस दिा में नह ं स्जसमें अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के आगे और ननरोध के लिए आदेि ऐसे मस्जथरेट द्वारा ककया गया है जो ऐसा आदेि करन े के लिए सिम है और जहां ऐसे आगे और ननरोध के लिए आदेि ककया जाता है वहां वह अवधध, स्जसके दौरान अलभयुक्ट् त-व्यस्क्ट् त इस उपधारा के अधीन ककसी कायपष ािक मस्जथरेट के आदेिों के अधीन अलभरिा में ननरुद्ध ककया गया था, उपधारा (3) में ववननहदषष् ट अवधध की संगणना करने में हहसाब में ि जाएगी : परंतु उक्ट् त अवधध की समास्प्त के पूव ष कायपष ािक मस्जथरेट, मामि े के अलभिेि, मामि े स े संबंधधत डायर की प्रववस्ष् टयों के सहहत जो, यथास्थथनत, पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार या अन्वेर्ण करन े वािे अधधकार द्वारा उस े भेजी गई थी, ननकटतम न्यानयक मस्जथरेट को भेजेगा । (7) इस धारा के अधीन पुलिस अलभरिा में ननरोध प्राधधकृत करन े वािा मस्जथरेट ऐसा करन े के अपने कारण अलभलिखित करेगा । (8) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट से लभन्न कोई मस्जथरेट जो ऐसा आदेि दे, अपन े आदेि की एक प्रनतलिवप आदेि देने के अपने कारणों के सहहत मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को भेजेगा । (9) यहद समन मामिे के रूप में मस्जथरेट द्वारा ववचारणीय ककसी मामि े में अन्वेर्ण, अलभयुक्ट् त के धगरफ्तार ककए जाने की तार ि स े छह मास की अवधध के भीतर समाप् त नह ं होता है तो मस्जथरेट अपराध में आगे और अन्वेर्ण को रोकन े के लिए आदेि करेगा जब तक अन्वेर्ण करन े वािा अधधकार , मस्जथरेट का समाधान नह ं कर देता है कक वविेर् कारणों स े और न्याय के हहत में छह मास की अवधध के आगे अन्वेर्ण जार रिना आवश्यक है । (10) जहा ं उपधारा (9) के अधीन ककसी अपराध का आगे और अन्वेर्ण रोकने के लिए आदेि हदया गया है वहां यहद सेिन न्यायाधीि का उस े आवेदन हदए जान े पर या अन्यथा, समाधान हो जाता है कक उस अपराध का आगे और अन्वेर्ण ककया जाना चाहहए तो वह उपधारा (9) के अधीन ककए गए आदेि को रद्द कर सकता है और यह ननदेि दे सकता है कक जमानत और अन्य मामिों के बारे में ऐस े ननदेिों के अधीन रहते हुए जो वह ववननहदषष् ट करे, अपराध का आगे और अन्वेर्ण ककया जाए ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 239 188. जब कोई अधीनथथ पुलिस अधधकार इस अध्याय के अधीन कोई अन्वेर्ण अधीनथथ पुलिस अधधकार द्वारा करता है तब वह उस अन्वेर्ण के पररणाम की ररपोटष पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार अन्वेर्ण की को करेगा । ररपोटष । 189. यहद इस अध्याय के अधीन अन्वेर्ण पर पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार जब साक्ष्य अपयाषप् त हो को प्रतीत होता है कक ऐसा पयाषप् त साक्ष्य या संदेह का उधचत आधार नह ं है, स्जसस े तब अलभयुक्ट् त अलभयुक्ट् त को मस्जथरेट के पास भेजना न्यायानुमत है तो ऐसा अधधकार उस दिा में, का छोडा स्जसमें वह व्यस्क्ट् त अलभरिा में है, उसके द्वारा जैसा ऐसा अधधकार ननहदषष् ट करे, यह जाना । बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े पर उस े छोड देगा कक यहद और जब अपेिा की जाए, तो और तब वह ऐसे मस्जथरेट के समि उपस्थथत होगा, जो पुलिस ररपोटष पर ऐस े अपराध का संज्ञान करन े के लिए, और अलभयुक्ट् त का ववचारण करन े या उस े ववचारणाथ ष सुपुदष करन े के लिए सिक्ट् त है । 190. (1) यहद इस अध्याय के अधीन अन्वेर्ण करन े पर पुलिस थाने के भारसाधक जब साक्ष्य पयाषप् त है तब अधधकार को प्रतीत होता है कक यथापूवोक्ट् त पयाषप् त साक्ष्य या उधचत आधार है, तो वह मामिों का अधधकार पुलिस ररपोटष पर उस अपराध का संज्ञान करन े के लिए और अलभयुक्ट् त का मस्जथरेट के ववचारण करन े या उस े ववचारणाथ ष सुपुदष करने के लिए सिक्ट् त मस्जथरेट के पास पास भेज हदया जाना । अलभयुक्ट् त को अलभरिा में भेजेगा या यहद अपराध जमानतीय है और अलभयुक्ट् त प्रनतभूनत देने के लिए समथ ष है तो ऐसे मस्जथरेट के समि ननयत हदन उसके उपस्थथत होने के लिए और ऐसे मस्जथरेट के समि, जब तक अन्यथा ननदेि न हदया जाए तब तक, हदन- प्रनतहदन उसकी उपस्थथनत के लिए प्रनतभूनत िेगा । परन्तु यहद अलभयुक्ट्त अलभरिा में नह ं है, तब पुलिस अधधकार मस्जथरेट के समि उसकी उपस्थथनत के लिए ऐसे व्यस्क्ट्त से प्रनतभूनत िे सकेगा और ऐसा मस्जथरेट स्जसको ऐसी ररपोटष भेजी गई है, इस आधार पर उसे थवीकार करने से इन्कार नह ं करेगा कक अलभयुक्ट्त को अलभरिा में नह ं लिया गया है । (2) जब पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार अलभयुक्ट् त को इस धारा के अधीन मस्जथरेट के पास भेजता है या ऐसे मस्जथरेट के समि उसके उपस्थथत होने के लिए प्रनतभूनत िेता है तब उस मस्जथरेट के पास वह ऐसा कोई आयुध या अन्य वथतु जो उसके समि प्रथतुत करना आवश्यक हो, भेजेगा और यहद कोई पररवाद हो, तो उससे और ऐसे अधधकार को मामिे के तथ्यों और पररस्थथनतयों से पररधचत प्रतीत होने वािे उतने व्यस्क्ट् तयों से, स्जतन े वह आवश्यक समझे मस्जथरेट के समि ननदेलित प्रकार से उपस्थथत होने के लिए और (यथास्थथनत) अलभयोजन करन े के लिए या अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आरोप के ववर्य में साक्ष्य देने के लिए बंधपत्र ननष्पाहदत करन े की अपेिा करेगा । (3) यहद बंधपत्र में मुख्य न्यानयक मस्जथरेट का न्यायािय उस्लिखित है तो उस न्यायािय के अंतगतष कोई ऐसा न्यायािय भी समझा जाएगा स्जसे ऐसा मस्जथरेट मामिे की जांच या ववचारण के लिए ननदेलित करता है, परंतु यह तब जब ऐसे ननदेि की उधचत सूचना उस पररवाद या उन व्यस्क्ट् तयों को दे द गई है । (4) वह अधधकार , स्जसकी उपस्थथनत में बंधपत्र ननष्पाहदत ककया जाता है, उस बंधपत्र की एक प्रनतलिवप उन व्यस्क्ट् तयों में से एक को पररदत्त करेगा जो उसे ननष्पाहदत करता है और तब मूि बंधपत्र को अपनी ररपोटष के साथ मस्जथरेट के पास भेजेगा ।240 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पररवाद और 191. ककसी पररवाद या सािी से, जो ककसी न्यायािय में जा रहा है, पुलिस साक्षियों स े अधधकार के साथ जाने की अपेिा नह ं की जाएगी, और न तो उस े अनावश्यक रूप से पुलिस अधधकार के साथ जान े अवरुद्ध ककया जाएगा या असुववधा पहुंचाई जाएगी और न उसस े अपनी उपस्थथनत के की अपेिा न लिए उसके अपने बंधपत्र से लभन्न कोई प्रनतभूनत देने की अपेिा की जाएगी  ककया जाना और उनका अवरुद्ध परंतु यहद कोई पररवाद या सािी उपस्थथत होने से, या धारा 190 में ननहदषष् ट न ककया जाना । प्रकार का बंधपत्र ननष्पाहदत करन े से, इंकार करता है तो पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार उस े मस्जथरेट के पास अलभरिा में भेज सकता है, जो उस े तब तक अलभरिा में ननरुद्ध रि सकता है जब तक वह ऐसा बंधपत्र ननष्पाहदत नह ं कर देता है या जब तक मामि े की सुनवाई समाप् त नह ं हो जाती है । अन्वेर्ण में 192. (1) प्रत्येक पुलिस अधधकार , जो इस अध्याय के अधीन अन्वेर्ण करता है, कायवष ाहहयों की अन्वेर्ण में की गई अपनी कायवष ाह को हदन-प्रनतहदन एक डायर में लििेगा, स्जसमें उस डायर । समय जब उस े सूचना लमि , उस समय जब उसने अन्वेर्ण आरंभ ककया और जब समाप् त ककया, वह थथान या वे थथान जहां वह गया और अन्वेर्ण द्वारा अलभननस्श् चत पररस्थथनतयों का वववरण होगा । (2) धारा 180 के अधीन अन्वेर्ण के दौरान अलभलिखित ककए गए साक्षियों के कथन केस डायर में अंत:थथावपत ककए जाएंगे । (3) उपधारा (1) में ननहदषष् ट डायर स्जलद रूप में होगी और उसके पष्ृ ठ सम्यक् रूप से संख्यांककत होंगे । (4) कोई दंड न्यायािय ऐसे न्यायािय में जांच या ववचारण के अधीन मामिे की पुलिस डायररयों को मंगा सकता है और ऐसी डायररयों को मामि े में साक्ष्य के रूप में तो नह ं ककंतु ऐसी जांच या ववचारण में अपनी सहायता के लिए उपयोग में िा सकता है । (5) न तो अलभयुक्ट् त और न उसके अलभकताष, ऐसी डायररयों को मंगाने के हकदार होंग े और न वह या वे केवि इस कारण उन्हें देिने के हकदार होंगे कक व े न्यायािय द्वारा देिी गई हैं, ककंत ु यहद वे उस पुलिस अधधकार द्वारा, स्जसन े उन्हें लििा है, अपनी थमनृत को ताजा करन े के लिए उपयोग में िाई जाती है, या यहद न्यायािय उन्हें ऐस े पुलिस अधधकार की बातों का िंडन करन े के प्रयोजन के लिए उपयोग में िाता है तो भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की, यथास्थथनत, धारा 148 या धारा 164 के उपबंध िागू होंग े । 2023 का 47 अन्वेर्ण के 193. (1) इस अध्याय के अधीन ककया जाने वािा प्रत्येक अन्वेर्ण अनावश्यक समाप् त हो जान े वविंब के बबना पूरा ककया जाएगा । पर पुलिस अधधकार की (2) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, 2023 का 45 ररपोटष । धारा 68, धारा 70 या धारा 71 या िैधगकं अपराधों से बािकों का संरिण अधधननयम, 2012 की धारा 4, धारा 6, धारा 8 या धारा 10 के अधीन ककसी अपराध के संबंध में अन्वेर्ण 2012 का 32 उस तार ि से, स्जसको पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार द्वारा सूचना अलभलिखित की गई थी, दो मास के भीतर पूरा ककया जा सकेगा । (3) (i) जैसे ह जांच पूर होती है, वैस े ह पुलिस थाने का भारसाधक अधधकार , पुलिस ररपोटष पर उस अपराध का संज्ञान करन े के लिए सिक्ट् त मस्जथरेट को, राज्य सरकार द्वारा ववहहत प्ररूप में, स्जसमें इिैक्ट्राननक संसूचना का माध्यम भी है, एक ररपोटषअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 241 भेजेगा, स्जसमें ननम् नलिखित बातें कधथत होंगी :— (क) पिकारों के नाम ; (ि) सूचना का थवरूप ; (ग) मामिे की पररस्थथनतयों से पररधचत प्रतीत होन े वािे व्यस्क्ट् तयों के नाम ; (घ) क्ट्या कोई अपराध ककया गया प्रतीत होता है और यहद ककया गया प्रतीत होता है, तो ककसके द्वारा ; (ङ) क्ट्या अलभयुक्ट् त धगरफ्तार कर लिया गया है ; (च) क्ट्या अलभयुक्ट्त अपने बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोड हदया गया है ; (छ) क्ट्या अलभयुक्ट्त धारा 190 के अधीन अलभरिा में भेजा जा चुका है ; 2023 का 45 (ज) जहां अन्वेर्ण भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 के अधीन ककसी अपराध के संबंध में है, वहां क्ट्या महहिा की धचककत्सा पर िा की ररपोटष संिग् न की गई है ; (झ) इिैक्ट्राननक युस्क्ट्त की दिा में अलभरिा का अनुिम ; (ii) पुलिस अधधकार नब्बे हदन की अवधध के भीतर अन्वेर्ण की प्रगनत की सूचना, ककन्ह ं भी साधनों द्वारा, स्जनके अंतगतष इिैक्ट्राननक संसूचना का माध्यम भी है, सूचना देने वािे या पीडडत व्यस्क्ट्त को देगा ; (iii) वह अधधकार अपने द्वारा की गई कायवष ाह की संसूचना, उस व्यस्क्ट् त को, यहद कोई हो, स्जसने अपराध ककए जाने के संबंध में सवप्रष थम सूचना द , उस र नत से देगा, जो राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंधधत करे । (4) जहां धारा 177 के अधीन कोई वररष् ठ पुलिस अधधकार ननयुक्ट् त ककया गया है वहां ऐसे ककसी मामिे में, स्जसमें राज्य सरकार साधारण या वविेर् आदेि द्वारा ऐसा ननदेि देती है, वह ररपोटष उस अधधकार के माध्यम से द जाएगी और वह, मस्जथरेट का आदेि होने तक के लिए, पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को यह ननदेि दे सकता है कक वह आगे और अन्वेर्ण करे । (5) जब कभी इस धारा के अधीन भेजी गई ररपोटष से यह प्रतीत होता है कक अलभयुक्ट् त को उसके बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोड हदया गया है, तब मस्जथरेट उस बंधपत्र या जमानतपत्र के उन्मोचन के लिए या अन्यथा ऐसा आदेि करेगा, जैसा वह ठीक समझे । (6) जब ऐसी ररपोटष का संबधं ऐसे मामि े स े है, स्जसको धारा 190 िाग ू होती है, तब पुलिस अधधकार मस्जथरेट को ररपोटष के साथ-साथ ननम् नलिखित भी भेजेगा :— (क) वे सब दथतावेज या उनके सुसंगत उद्ध रण, स्जन पर ननभरष करने का अलभयोजन का ववचार है और जो उनस े लभन्न हैं स्जन्हें अन्वेर्ण के दौरान मस्जथरेट को पहिे ह भेज हदया गया है ; (ि) उन सब व्यस्क्ट् तयों के, स्जनकी साक्षियों के रूप में पर िा करने का अलभयोजन का ववचार है, धारा 180 के अधीन अलभलिखित कथन । (7) यहद पुलिस अधधकार की यह राय है कक ऐस े ककसी कथन का कोई भाग242 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कायवष ाह की ववर्यवथतु से ससु ंगत नह ं है या उसे अलभयुक्ट् त को प्रकट करना न्याय के हहत में आवश्यक नह ं है और िोकहहत के लिए असमीचीन है तो वह कथन के उस भाग को उपदलितष करेगा और अलभयुक्ट् त को द जाने वाि प्रनतलिवप में से उस भाग को ननकाि देने के लिए ननवेदन करत े हुए और ऐसा ननवेदन करन े के अपने कारणों का कथन करत े हुए एक हटप्पण मस्जथरेट को भेजेगा । (8) उपधारा (7) में अंतववष्ष ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां मामि े का अन्वेर्ण करन े वािा पुलिस अधधकार धारा 230 के अधीन अलभयुक्ट्त को प्रदान करने के लिए मस्जथरेट को सम्यक् रूप से सूचीबद्ध अन्य दथतावेजों के साथ पुलिस ररपोटष की उतनी संख्या में प्रनतयां, जो अपेक्षित हों, भी प्रथतुत करेगा : परन्तु इिैक्ट्राननक संसूचना द्वारा ररपोटष या अन्य दथतावेजों के प्रदाय को सम्यक् रूप से तामीि हुआ माना जाएगा । (9) इस धारा की कोई बात ककसी अपराध के बारे में उपधारा (3) के अधीन मस्जथरेट को ररपोटष भेज द जाने के पश् चात ् आगे और अन्वेर्ण को ननवाररत करने वाि नह ं समझी जाएगी तथा जहां ऐसे अन्वेर्ण पर पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को कोई अनतररक्ट् त मौखिक या दथतावेजी साक्ष्य लमि े वहां वह ऐसे साक्ष्य के संबंध में अनतररक्ट् त ररपोटष या ररपोटें मस्जथरेट को ऐस े साक्ष्य के संबंध में आगे ररपोटष या ररपोटें ऐसे प्ररूप में, जो राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंध करें भेजेगा, और उपधारा (3) से उपधारा (8) तक के उपबंध ऐसी ररपोटष या ररपोटों के बारे में, जहां तक हो सके, वैसे ह िागू होंगे, जैसे वे उपधारा (3) के अधीन भेजी गई ररपोटष के संबंध में िागू होत े हैं : परन्तु ववचारण के दौरान मामिे का ववचारण करने वािे न्यायािय की अनुमनत से अनतररक्ट्त अन्वेर्ण संचालित ककया जा सकेगा और जो नब्बे हदन की अवधध के भीतर पूरा ककया जाएगा स्जसका ववथतार न्यायािय की अनुमनत से ककया जा सकेगा । आत्महत्या, 194. (1) जब पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार , या राज्य सरकार द्वारा उस आहद पर पुलिस ननलमत्त वविेर्तया सिक्ट् त ककए गए ककसी अन्य पुलिस अधधकार को यह सूचना लमिती का जांच करना है कक ककसी व्यस्क्ट् त ने आत्महत्या कर ि है या कोई व्यस्क्ट् त ककसी अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा और ररपोटष देना । या जीव-जंत ु द्वारा या ककसी यंत्र द्वारा या दघु टष ना द्वारा मारा गया है, या कोई व्यस्क्ट् त ऐसी पररस्थथनतयों में मरा है स्जनसे उधचत रूप से यह संदेह होता है कक ककसी अन्य व्यस्क्ट् त ने कोई अपराध ककया है तो वह मत्ृ य ु समीिाएं करन े के लिए सिक्ट् त ननकटतम कायपष ािक मस्जथरेट को तुरंत उसकी सूचना देगा और जब तक राज्य सरकार द्वारा ववहहत ककसी ननयम द्वारा या स्जिा या उपिंड मस्जथरेट के ककसी साधारण या वविेर् आदेि द्वारा अन्यथा ननदेलित न हो वह उस थथान को जाएगा जहां ऐसे मतृ व्यस्क्ट् त का िर र है और वहां पडोस के दो या अधधक प्रनतस्ष् ठत ननवालसयों की उपस्थथनत में अन्वेर्ण करेगा और मत्ृ यु के दृश्यमान कारण की ररपोटष तैयार करेगा स्जसमें ऐसे घावों, अस्थथभंगों, नीिों और िनत के अन्य धचह्नों का जो िर र पर पाए जाएं, वणनष होगा और यह कथन होगा कक ऐसे धचह्न ककस प्रकार से और ककस आयुध या उपकरण द्वारा (यहद कोई हो) ककए गए प्रतीत होते हैं । (2) उस ररपोटष पर ऐसे पुलिस अधधकार और अन्य व्यस्क्ट् तयों द्वारा, या उनमें स े इतनों द्वारा जो उसस े सहमत हैं, हथतािर ककए जाएंगे और वह स्जिा मस्जथरेट याअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 243 उपिंड मस्जथरेट को चौबीस घंटों के भीतर तत्काि भेज द जाएगी । (3) जब— (i) मामिे में ककसी महहिा द्वारा उसके वववाह की तार ि से सात वर् ष के भीतर आत्महत्या अंतवलषित है ; या (ii) मामिा ककसी महहिा की उसके वववाह के सात वर् ष के भीतर ऐसी पररस्थथनतयों में मत्ृ यु से संबंधधत है जो यह युस्क्ट् तयुक्ट् त संदेह उत्पन् न करती है कक ककसी अन्य व्यस्क्ट् त ने ऐसी महहिा के संबंध में कोई अपराध ककया है ; या (iii) मामिा ककसी महहिा की उसके वववाह के सात वर् ष के भीतर मत्ृ यु से संबंधधत है और उस महहिा के ककसी नातेदार ने उस ननलमत्त ननवेदन ककया है ; या (iv) मत्ृ यु के कारण की बाबत कोई संदेह है ; या (v) ककसी अन्य कारण से पुलिस अधधकार ऐसा करना समीचीन समझता है, तब ऐसे ननयमों के अधीन रहत े हुए, जो राज्य सरकार द्वारा इस ननलमत्त ववहहत ककए जाएं, वह अधधकार यहद मौसम ऐसा है और दरू इतनी है कक राथत े में िर र के ऐसे सडने की जोखिम के बबना, स्जससे उसकी पर िा व्यथ ष हो जाए, उस े लभजवाया जा सकता है तो िर र को उसकी पर िा की दृस्ष्ट से, ननकटतम लसववि सजनष के पास या राज्य सरकार द्वारा इस ननलमत्त ननयुक्ट् त व्यस्क्ट्त अन्य अहहतष धचककत्सक के पास भेजेगा । (4) ननम् नलिखित मस्जथरेट मत्ृ यु-समीिा करने के लिए सिक्ट् त हैं, अथाषत ् कोई स्जिा मस्जथरेट या उपिंड मस्जथरेट और राज्य सरकार द्वारा या स्जिा मस्जथरेट द्वारा इस ननलमत्त वविेर्तया सिक्ट् त ककया गया कोई अन्य कायपष ािक मस्जथरेट । 195. (1) धारा 194 के अधीन कायवष ाह करने वािा पुलिस अधधकार यथापूवोक्ट् त व्यस्क्ट् तयों को समन करन े की दो या अधधक व्यस्क्ट् तयों को उक्ट् त अन्वेर्ण के प्रयोजन से और ककसी अन्य ऐस े व्यस्क्ट् त िस्क्ट् त । को, जो मामि े के तथ्यों से पररधचत प्रतीत होता है, लिखित आदेि द्वारा समन कर सकता है तथा ऐसे समन ककया गया प्रत्येक व्यस्क्ट् त उपस्थथत होने के लिए और उन प्रश् नों के लसवाय, स्जनके उत्तरों की प्रववृत्त उस े आपराधधक आरोप या िास्थत या जब्ती की आिंका में डािने की है, सब प्रश् नों का सह -सह उत्तर देने के लिए आबद्ध होगा : परन्तु पद्रंह वर् ष से कम की आयु या साठ वर् ष की आयु से ऊपर के ककसी व्यस्क्ट्त या महहिा या मानलसक या िार ररक रूप स े हदव्यांग या गंभीर बीमार स े ग्रथत ककसी व्यस्क्ट्त से, उस थथान के लसवाय जहां ऐसा व्यस्क्ट्त रहता है, ककसी थथान पर उपस्थथत होने की अपेिा नह ं की जाएगी : परन्तु यह और कक यहद ऐसा व्यस्क्ट्त पुलिस थाने में उपस्थथत होने और उत्तर देने के लिए इच्छुक हो तो ऐसे व्यस्क्ट्त को ऐसा करने के लिए अनुज्ञात ककया जा सकेगा । (2) यहद तथ्यों से ऐसा कोई संज्ञेय अपराध, स्जसे धारा 190 िागू है, प्रकट नह ं होता है तो पुलिस अधधकार ऐसे व्यस्क्ट् त से मस्जथरेट के न्यायािय में उपस्थथत होने की अपेिा न करेगा । 196. (1) जब मामिा धारा 194 की उपधारा (3) के िंड (i) या िंड (ii) में मत्ृ यु के कारण की मस्जथरेट ननहदषष् ट प्रकृनत का है, तब मत्ृ यु के कारण की जांच, पुलिस अधधकार द्वारा ककए जाने द्वारा जांच । वािे अन्वेर्ण के बजाय या उसके अनतररक्ट् त, वह ननकटतम मस्जथरेट करेगा जो मत्ृ यु-244 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— समीिा करन े के लिए सिक्ट् त है और धारा 194 की उपधारा (1) में वखणतष ककसी अन्य दिा में इस प्रकार सिक्ट् त ककया गया कोई भी मस्जथरेट कर सकेगा ; और यहद वह ऐसा करता है तो उस े ऐसी जांच करन े में व े सब िस्क्ट् तयां होंगी, जो उस े ककसी अपराध की जांच करन े में होतीं । (2) जहां,— (क) कोई व्यस्क्ट् त मर जाता है या गायब हो जाता है, या (ि) ककसी महहिा के साथ बिात्संग ककया गया अलभकधथत है, तो उस दिा में जब ऐसा व्यस्क्ट् त या महहिा पुलिस अलभरिा या इस संहहता के अधीन मस्जथरेट या न्यायािय द्वारा प्राधधकृत ककसी अन्य अलभरिा में है, वहां पुलिस द्वारा की गई जांच या ककए गए अन्वेर्ण के अनतररक्ट् त, ऐसे मस्जथरेट द्वारा, स्जसकी अधधकाररता की थथानीय सीमाओं के भीतर अपराध ककया गया है, जांच की जाएगी । (3) ऐसी जांच करन े वािा मस्जथरेट उसके संबंध में लिए गए साक्ष्य को इसमें इसके पश् चात ् ववहहत ककसी प्रकार से, मामिे की पररस्थथनतयों के अनुसार अलभलिखित करेगा । (4) जब कभी ऐसे मस्जथरेट के ववचार में यह समीचीन है कक ककसी व्यस्क्ट् त के, जो पहिे ह गाड हदया गया है, मतृ िर र की इसलिए पर िा की जाए कक उसकी मत्ृ यु के कारण का पता चिे तब मस्जथरेट उस िर र को ननकिवा सकेगा और उसकी पर िा करा सकेगा । (5) जहां कोई जांच इस धारा के अधीन की जानी है, वहां मस्जथरेट, जहा ं कह ं साध्य है, मतृ क के उन नातदे ारों को, स्जनके नाम और पते ज्ञात हैं, सूचना देगा और उन्हें जांच के समय उपस्थथत रहन े को अनुज्ञात करेगा । (6) उपधारा (2) के अधीन कोई जांच या अन्वेर्ण करन े वािा मस्जथरेट या कायपष ािक मस्जथरेट या पुलिस अधधकार , ककसी व्यस्क्ट् त की मत्ृ यु के चौबीस घंटे के भीतर उसकी पर िा ककए जान े की दृस्ष् ट से िर र को ननकटतम लसववि सजनष या अन्य अहहतष धचककत्सा व्यस्क्ट्त को, जो इस ननलमत्त राज्य सरकार द्वारा ननयुक्ट् त ककया गया हो, भेजेगा, जब तक कक िेिबद्ध ककए जाने वािे कारणों से ऐसा करना संभव न हो । स्पष् टीकरण—इस धारा में “नातेदार” पद से माता-वपता, संतान, भाई, बहन और पनत या पत्न ी अलभप्रेत हैं । अध्याय 14 िांचों और विचारणों में िंड न्यायाियों की अधिकाररता जांच और ववचारण 197. प्रत्येक अपराध की जाचं और ववचारण साधारणतया पर ऐस े न्यायािय द्वारा का साधारण ककया जाएगा स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर वह अपराध ककया गया है । थथान । जांच या 198. (क) जहां यह अननस्श्च त है कक कई थथानीय िेत्रों में से ककसमें अपराध ककया ववचारण का गया है ; या थथान । (ि) जहां अपराध अंित: एक थथानीय िेत्र में और अंित: ककसी दसू रे में ककया गया है ; या (ग) जहां अपराध चािू रहने वािा है और उसका ककया जाना एक से अधधकअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 245 थथानीय िेत्रों में चािू रहता है ; या (घ) जहां वह ववलभन्न थथानीय िेत्रों में ककए गए कई कायों से लमिकर बनता है, वहां उसकी जांच या ववचारण ऐसे थथानीय िेत्रों में से ककसी पर अधधकाररता रिने वािे न्यायािय द्वारा ककया जा सकेगा । 199. जब कोई काय ष ककसी की गई बात के और ककसी ननकिे हुए पररणाम के अपराध वहां ववचारणीय होगा कारण अपराध है तब ऐसे अपराध की जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा जहां काय ष ककया सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर ऐसी बात की गई या ऐसा पररणाम गया या जहां ननकिा । पररणाम ननकिा । 200. जब कोई काय ष ककसी ऐसे अन्य काय ष स े संबंधधत होने के कारण अपराध है, जहां काय ष अन्य अपराध से जो थवयं भी अपराध है या अपराध होता यहद कताष अपराध करन े के लिए समथ ष होता, संबंधधत होने के तब प्रथम वखणतष अपराध की जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है कारण अपराध स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर उन दोनों में से कोई भी काय ष ककया गया है । है वहा ं ववचारण का थथान । 201. (1) डकैती के, हत्या सहहत डकैती के, डकैतों की टोि का होने के, या कुछ अपराधों की दिा में अलभरिा स े ननकि भागने के ककसी अपराध की जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ववचारण का ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर अपराध ककया गया है या थथान । अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त लमिा है । (2) ककसी व्यस्क्ट् त के व्यपहरण या अपहरण के ककसी अपराध की जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर वह व्यस्क्ट् त व्यपहृत या अपहृत ककया गया या िे जाया गया या नछपाया गया या ननरुद्ध ककया गया है । (3) चोर , उद्दापन या िूट के ककसी अपराध की जांच या ववचारण, ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर ऐसा अपराध ककया गया है या चुराई हुई संपवत्त को, जो कक अपराध का ववर्य है, उस े करन े वािे व्यस्क्ट् त द्वारा या ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त द्वारा कब्जे में रिी गई है, स्जसने उस संपवत्त को चुराई हुई संपवत्त जानत े हुए या ववश् वास करन े का कारण रिते हुए प्राप् त ककया या रि े रिा । (4) आपराधधक दवुवनषनयोग या आपराधधक न्यास-भंग के ककसी अपराध की जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर अपराध ककया गया है या उस संपवत्त का, जो अपराध का ववर्य है, कोई भाग अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त द्वारा प्राप् त ककया गया या रिा गया है या उसका िौटाया जाना या िेिा हदया जाना अपेक्षित है । (5) ककसी ऐसे अपराध की, स्जसमें चुराई हुई संपवत्त का कब्जा भी है, जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर ऐसा अपराध ककया गया है या चुराई हुई संपवत्त ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा कब्जे में रिी गई है, स्जसने उस े चुराई हुई जानत े हुए या ववश् वास करन े का कारण होत े हुए प्राप् त ककया या रि े रिा ।246 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— इिैक्ट्राननक 202. (1) ककसी ऐसे अपराध की, स्जसमें छि करना भी है, जांच या उनका ववचारण, संसूचना के उस दिा में, स्जसमें ऐसी प्रवंचना, इिैक्ट्राननक संसूचना या पत्रों या दरू संचार संदेिों के साधनों, पत्रों, माध्यम से की गई है, ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय आहद द्वारा ककए अधधकाररता के भीतर ऐसी इिैक्ट्राननक संसूचना ऐसे पत्र या संदेि भेजे गए हैं या प्राप् त गए अपराध । ककए गए हैं तथा छि करन े और बेईमानी से संपवत्त का पररदान उत् प्रेररत करन े वािे ककसी अपराध की जांच या उनका ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर संपवत्त, प्रवंधचत व्यस्क्ट् त द्वारा पररदत्त की गई है या अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त द्वारा प्राप् त की गई है । (2) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 82 के अधीन दंडनीय ककसी अपराध 2023 का 45 की जांच या उनका ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर अपराध ककया गया है या अपराधी न े प्रथम वववाह की अपनी पत्न ी या पनत के साथ अंनतम बार ननवास ककया है या प्रथम वववाह की पत्न ी अपराध के ककए जाने के पश् चात ् थथायी रूप से ननवास करती है । यात्रा या 203. यहद कोई अपराध उस समय ककया गया है जब वह व्यस्क्ट् त, स्जसके द्वारा, जियात्रा में या वह व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध, या वह चीज स्जसके बारे में वह अपराध ककया गया, ककया गया ककसी यात्रा या जियात्रा पर है, तो उसकी जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया अपराध । जा सकता है, स्जसकी थथानीय अधधकाररता में होकर या उसके भीतर वह व्यस्क्ट् त या चीज उस यात्रा या जियात्रा के दौरान गई है । एक साथ 204. जहां,— ववचारणीय (क) ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ककए गए अपराध ऐसे हैं कक प्रत्येक ऐसे अपराध के अपराधों के लिए ववचारण का लिए धारा 242, धारा 243 या धारा 244 के उपबंधों के आधार पर एक ह ववचारण में थथान । उस पर आरोप िगाया जा सकता है और उसका ववचारण ककया जा सकेगा ; या (ि) कई व्यस्क्ट् तयों द्वारा ककया गया अपराध या ककए गए अपराध ऐसे हैं कक उनके लिए उन पर धारा 246 के उपबंधों के आधार पर एक साथ आरोप िगाया जा सकता है और ववचारण ककया जा सकेगा, वहां अपराध की जांच या ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है जो उन अपराधों में से ककसी की जांच या ववचारण करन े के लिए सिम है । ववलभन् न सेिन 205. इस अध्याय के पूववष ती उपबंधों में ककसी बात के होत े हुए भी, राज्य सरकार िंडों में मामिों ननदेि दे सकती है कक ऐस े ककन्ह ं मामिों का या ककसी वग ष के मामिों का ववचारण, जो के ववचारण का ककसी स्जिे में ववचारणाथ ष सुपुदष हो चुके हैं, ककसी भी सेिन िंड में ककया जा सकता है : आदेि देने की िस्क्ट् त । परंतु यह तब जब कक ऐसा ननदेि उच् च न्यायािय या उच् चतम न्यायािय द्वारा संववधान के अधीन या इस संहहता के या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन पहिे ह जार ककए गए ककसी ननदेि के ववरुद्ध नह ं है । संदेह की दिा में 206. जहां दो या अधधक न्यायािय एक ह अपराध का संज्ञान कर िेत े हैं और यह उच् च न्यायािय प्रश् न उठता है कक उनमें से ककसे उस अपराध की जांच या ववचारण करना चाहहए, वहां का वह स्जिा वह प्रश् न— ववननस्श् चत करना, स्जसमें जांच या (क) यहद वे न्यायािय एक ह उच् च न्यायािय के अधीनथथ हैं तो उस उच् च ववचारण होगा । न्यायािय द्वारा ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 247 (ि) यहद वे न्यायािय एक ह उच् च न्यायािय के अधीनथथ नह ं हैं, तो उस उच् च न्यायािय द्वारा स्जसकी अपीि दांडडक अधधकाररता की थथानीय सीमाओं के भीतर कायवष ाह पहिे प्रारंभ की गई है, ववननस्श् चत ककया जाएगा, और तब उस अपराध के संबंध में अन्य सब कायवष ाहहयां बंद कर द जाएंगी । 207. (1) जब ककसी प्रथम वग ष मस्जथरेट को यह ववश् वास करन े का कारण हदिाई थथानीय अधधकाररता के देता है कक उसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर के ककसी व्यस्क्ट् त ने ऐसी अधधकाररता के परे ककए गए बाहर, (चाहे भारत के भीतर या बाहर) ऐसा अपराध ककया है, स्जसकी जांच या ववचारण अपराध के लिए धारा 197 से धारा 205 तक की धाराओं (स्जनके अंतगतष ये दोनों धाराएं भी हैं), के समन या वारंट उपबंधों के अधीन या तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन ऐसी अधधकाररता के भीतर नह ं जार करन े की ककया जा सकता है ककंतु जो तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन भारत में ववचारणीय है िस्क्ट् त । तब ऐसा मस्जथरेट उस अपराध की जांच ऐसे कर सकता है, मानो वह ऐसी थथानीय अधधकाररता के भीतर ककया गया है और ऐसे व्यस्क्ट् त को अपने समि उपस्थथत होन े के लिए इसमें इसके पूव ष उपबंधधत प्रकार से वववि कर सकता है और ऐसे व्यस्क्ट् त को ऐसे अपराध की जांच या ववचारण करन े की अधधकाररता वािे मस्जथरेट के पास भेज सकता है या यहद ऐसा अपराध मत्ृ यु से या आजीवन कारावास से दंडनीय नह ं है और ऐसा व्यस्क्ट् त इस धारा के अधीन कारषवाई करन े वािे मस्जथरेट को समाधानप्रद रूप में जमानत देने के लिए तैयार और इच्छुक है तो ऐसी अधधकाररता वािे मस्जथरेट के समि उसकी उपस्थथनत के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र िे सकेगा । (2) जब ऐसी अधधकाररता वािे मस्जथरेट एक से अधधक हैं और इस धारा के अधीन काय ष करन े वािा मस्जथरेट अपना समाधान नह ं कर पाता है कक ककस मस्जथरेट के पास या समि ऐसा व्यस्क्ट् त भेजा जाए या उपस्थथत होने के लिए आबद्ध ककया जाए, तो मामि े की ररपोटष उच् च न्यायािय के आदेि के लिए की जाएगी । 208. जब कोई अपराध भारत से बाहर— भारत से बाहर ककया गया (क) भारत के ककसी नागररक द्वारा चाहे िुिे समुद्र पर या अन्यत्र ; या अपराध। (ि) ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा, जो भारत का नागररक नह ं है, भारत में रस्जथर कृत ककसी पोत या ववमान पर, ककया जाता है, तब उस अपराध के बारे में उसके ववरुद्ध ऐसी कायवष ाह की जा सकती है मानो वह अपराध भारत के भीतर उस थथान में ककया गया है, जहां वह पाया गया है या जहां अपराध भारत में रस्जथर कृत है : परंतु इस अध्याय की पूववष ती धाराओं में से ककसी बात के होत े हुए भी, ऐसे ककसी अपराध की भारत में जांच या उसका ववचारण केंद्र य सरकार की पूव ष मंजूर के बबना नह ं ककया जाएगा । 209. जब ककसी ऐसे अपराध की, स्जसका भारत से बाहर ककसी िेत्र में ककया जाना भारत स े बाहर ककए गए अलभकधथत है, जांच या ववचारण धारा 208 के उपबंधों के अधीन ककया जा रहा है तब, यहद अपराधों के बारे केंद्र य सरकार उधचत समझ े तो यह ननदेि दे सकती है कक उस िेत्र में या उस िेत्र के लिए में साक्ष्य िेना । या तो वाथतववक प्ररूप में या इिैक्ट्राननक प्ररूप में न्यानयक अधधकार के समि या उस िेत्र में या उस िेत्र के लिए भारत के राजननयक या कौंसि य प्रनतननधध के समि हदए गए248 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अलभसाक्ष्यों की या प्रथतुत ककए गए प्रदिों की प्रनतयों को ऐसी जांच या ववचारण करने वािे न्यायािय द्वारा ककसी ऐसे मामिे में साक्ष्य के रूप में लिया जाएगा स्जसमें ऐसा न्यायािय ऐसी ककन्ह ं बातों के बारे में, स्जनसे ऐसे अलभसाक्ष्य या प्रदि ष संबंधधत हैं साक्ष्य िेने के लिए कमीिन जार कर सकेगा । अध्याय 15 कायिा ाहियां शुरू करने के लिए अपेक्षक्षत शतें मस्जथरेटों द्वारा 210. (1) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहत े हुए, कोई प्रथम वग ष मस्जथरेट अपराधों का और उपधारा (2) के अधीन वविेर्तया सिक्ट् त ककया गया कोई द्ववतीय वग ष मस्जथरेट, संज्ञान । ककसी भी अपराध का संज्ञान ननम् नलिखित दिाओं में कर सकता है :— (क) उन तथ्यों का पररवाद प्राप् त होने पर, स्जनमें ककसी वविेर् ववधध के अधीन प्राधधकृत ककए गए ककसी व्यस्क्ट्त द्वारा फाइि ककया गया कोई पररवाद भी है, जो ऐसे अपराध को गहठत करता है ; (ि) ऐस े तथ्यों के बारे में (इिैक्ट्राननक ढंग सहहत ककसी ढंग में प्रथतुत) पुलिस ररपोटष पर ; (ग) पुलिस अधधकार से लभन्न ककसी व्यस्क्ट् त से प्राप् त इस सूचना पर या थवयं अपनी इस जानकार पर, कक ऐसा अपराध ककया गया है । (2) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट ककसी द्ववतीय वग ष मस्जथरेट को ऐसे अपराधों का, स्जनकी जांच या ववचारण करना उसकी िमता के भीतर है, उपधारा (1) के अधीन संज्ञान करन े के लिए सिक्ट् त कर सकता है । अलभयुक्ट् त के 211. जब मस्जथरेट ककसी अपराध का संज्ञान धारा 210 की उपधारा (1) के िंड (ग) आवेदन पर के अधीन करता है तब अलभयुक्ट् त को, कोई साक्ष्य िेने से पहिे, सूचना द जाएगी कक अंतरण । वह मामि े की ककसी अन्य मस्जथरेट से जांच या ववचारण कराने का हकदार है और यहद अलभयुक्ट् त, या यहद एक से अधधक अलभयुक्ट् त हैं तो उनमें से कोई, संज्ञान करने वािे मस्जथरेट के समि आगे कायवष ाह ककए जाने पर आपवत्त करता है तो मामिा उस अन्य मस्जथरेट को अंतररत कर हदया जाएगा जो मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा इस ननलमत्त ववननहदषष् ट ककया जाए । मामिे 212. (1) कोई मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, अपराध का संज्ञान करने के पश् चात ् मस्जथरेटों के मामि े को जांच या ववचारण के लिए अपने अधीनथथ ककसी सिम मस्जथरेट के हवािे हवािे करना । कर सकता है । (2) मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा इस ननलमत्त सिक्ट् त ककया गया कोई प्रथम वग ष मस्जथरेट, अपराध का संज्ञान करन े के पश् चात,् मामि े को जांच या ववचारण के लिए अपने अधीनथथ ककसी ऐस े सिम मस्जथरेट के हवािे कर सकता है स्जसे मुख्य न्यानयक मस्जथरेट साधारण या वविेर् आदेि द्वारा ववननहदषष् ट करे, और तब ऐसा मस्जथरेट जांच या ववचारण कर सकेगा । अपराधों का 213. इस संहहता द्वारा या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध द्वारा अलभव्यक्ट् त रूप सेिन न्यायाियों से जैसा उपबंधधत है उसके लसवाय, कोई सेिन न्यायािय आरंलभक अधधकाररता वािे द्वारा संज्ञान । न्यायािय के रूप में ककसी अपराध का संज्ञान तब तक नह ं करेगा जब तक मामिा इसअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 249 संहहता के अधीन मस्जथरेट द्वारा उसके सुपदु ष नह ं कर हदया गया है । 214. अपर सेिन न्यायाधीि ऐस े मामिों का ववचारण करेगा, स्जन्हें ववचारण के अपर सिे न न्यायाधीिों को लिए उस िंड का सेिन न्यायाधीि साधारण या वविेर् आदेि द्वारा उसके हवािे करता हवाि े ककए गए है या स्जनका ववचारण करन े के लिए उच् च न्यायािय वविेर् आदेि द्वारा उस े ननदेि देता मामिों पर उनके है । द्वारा ववचारण । 215. (1) कोई न्यायािय,— िोक न्याय के ववरुद्ध अपराधों 2023 का 45 (क) (i) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 206 स े धारा 223 (स्जनके अंतगतष के लिए और धारा 209 के लसवाय ये दोनों धाराएं भी हैं) के अधीन दंडनीय ककसी अपराध का ; या साक्ष्य में हदए गए दथतावेजों स े (ii) ऐसे अपराध के ककसी दष्ु प्र ेरण या ऐसा अपराध करन े के प्रयत् न का ; या संबंधधत अपराधों (iii) ऐसा अपराध करन े के लिए ककसी आपराधधक र्डय ंत्र का, के लिए िोक सेवकों के संज्ञान संबद्ध िोक सेवक के, या ककसी अन्य ऐस े िोक सेवक के, स्जसके वह ववधधपणू ष प्रिासननक तौर पर अधीनथथ है या कोई अन्य िोक सेवक जो संबद्ध िोक सेवक प्राधधकार के अवमान के लिए द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधधकृत है, लिखित पररवाद पर ह करेगा, अन्यथा अलभयोजन । नह ं ; 2023 का 45 (ि) (i) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की ननम् नलिखित धाराओं अथाषत ् धारा 229 स े धारा 233 (स्जनके अंतगतष ये दोनों धाराएं भी हैं), धारा 236, धारा 237, धारा 242 से धारा 248 (स्जनके अंतगतष ये दोनों धाराएं भी हैं) और धारा 267 से ककन्ह ं के अधीन दंडनीय ककसी अपराध का, जब ऐसे अपराध के बारे में यह अलभकधथत है कक वह ककसी न्यायािय में की कायषवाह में या उसके संबंध में ककया गया है ; या (ii) उक्ट्त संहहता की धारा 336 की उपधारा (1) में वखणतष या धारा 340 की उपधारा (2) या धारा 342 के अधीन दंडनीय अपराध का, जब ऐसे अपराध के बारे में यह अलभकधथत है कक वह ककसी न्यायािय में की कायवष ाह में प्रथतुत ककए गए या साक्ष्य में हदए गए ककसी दथतावेज के बारे में ककया गया है ; या (iii) उपिंड (i) या उपिंड (ii) में ववननहदषष् ट ककसी अपराध को करन े के लिए आपराधधक र्ड यंत्र या उस े करन े के प्रयत् न या उसके दष्ु प्रेरण के अपराध का, संज्ञान ऐसे न्यायािय के, या न्यायािय के ऐसे अधधकार के, स्जसे वह न्यायािय इस ननलमत्त लिखित रूप में प्राधधकृत करे या ककसी अन्य न्यायािय के, स्जसके वह न्यायािय अधीनथथ है लिखित पररवाद पर ह करेगा अन्यथा नह ं । (2) जहां ककसी िोक सेवक द्वारा या ककसी अन्य िोक सेवक द्वारा जो उपधारा (1) के िंड (क) के अधीन उसके द्वारा ऐसा करने के लिए प्राधधकृत है, कोई पररवाद ककया गया है वहां ऐसा कोई प्राधधकार , स्जसके वह प्रिासननक तौर पर अधीनथथ है, उस पररवाद को वापस िेने का आदेि दे सकता है और ऐसे आदेि की प्रनत न्यायािय को भेजेगा ; और न्यायािय द्वारा उसकी प्रास्प् त पर उस पररवाद के संबंध में आगे कोई कायवष ाह नह ं की जाएगी : परंतु ऐसे वापस िेने का कोई आदेि उस दिा में नह ं हदया जाएगा स्जसमें ववचारण प्रथम बार के न्यायािय में समाप् त हो चुका है ।250 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (3) उपधारा (1) के िंड (ि) में “न्यायािय” िब्द से कोई लसववि, राजथव या दंड न्यायािय अलभप्रेत है और उसके अंतगतष ककसी केंद्र य या राज्य अधधननयम द्वारा या उसके अधीन गहठत कोई अधधकरण भी है, यहद वह उस अधधननयम द्वारा इस धारा के प्रयोजनाथ ष न्यायािय घोवर्त ककया गया है । (4) उपधारा (1) के िंड (ि) के प्रयोजनों के लिए, कोई न्यायािय, उस न्यायािय के, स्जसमें ऐसे पूवकष धथत न्यायािय की अपीिनीय डडकियों या दंडादेिों की साधारणतया अपीि होती है, अधीनथथ समझा जाएगा या ऐसा लसववि न्यायािय, स्जसकी डडकियों की साधारणतया कोई अपीि नह ं होती है, उस मामूि आरंलभक लसववि अधधकाररता वािे प्रधान न्यायािय के अधीनथथ समझा जाएगा स्जसकी थथानीय अधधकाररता के भीतर ऐसा लसववि न्यायािय स्थथत है : परन्तु— (क) जहां अपीिें एक से अधधक न्यायािय में होती हैं वहां अवर अधधकाररता वािा अपीि न्यायािय वह न्यायािय होगा स्जसके अधीनथथ ऐसा न्यायािय समझा जाएगा ; (ि) जहां अपीिें लसववि न्यायािय में और राजथव न्यायािय में भी होती हैं वहां ऐसा न्यायािय उस मामि े या कायवष ाह के थवरूप के अनुसार, स्जसके संबंध में उस अपराध का ककया जाना अलभकधथत है, लसववि या राजथव न्यायािय के अधीनथथ समझा जाएगा । धमकी देने, 216. कोई सािी या कोई अन्य व्यस्क्ट् त भारतीय न्याय संहहता, 2023 की 2023 का 45 आहद की दिा धारा 232 के अधीन अपराध के संबंध में पररवाद फाइि कर सकेगा । में साक्षियों के लिए प्रकिया । राज्य के ववरुद्ध 217. (1) कोई न्यायािय,— अपराधों के लिए (क) भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अध्याय 7 के अधीन या धारा 196, 2023 का 45 और ऐस े अपराध धारा 299 या धारा 353 की उपधारा (1) के अधीन दंडनीय ककसी अपराध का ; या करन े के लिए आपराधधक (ि) ऐसा अपराध करन े के लिए आपराधधक र्ड यंत्र का ; या र्ड यंत्र के लिए (ग) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 47 में यथावखणतष ककसी दष्ु प्रेरण 2023 का 45 अलभयोजन । का, संज्ञान, केंद्र य सरकार या राज्य सरकार की पूव ष मंजूर से ह करेगा, अन्यथा नह ं । (2) कोई न्यायािय,— (क) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 197 या धारा 353 की उपधारा (2) 2023 का 45 या उपधारा (3) के अधीन दंडनीय ककसी अपराध का, या (ि) ऐसा अपराध करन े के लिए आपराधधक र्ड यंत्र का, संज्ञान केंद्र य सरकार या राज्य सरकार या स्जिा मस्जथरेट की पूव ष मंजूर से ह करेगा, अन्यथा नह ं । (3) कोई न्यायािय भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 61 की उपधारा (2) के 2023 का 45 अधीन दंडनीय ककसी आपराधधक र्ड यंत्र के ककसी ऐसे अपराध का, जो मत्ृ यु, आजीवन कारावास या दो वर् ष या उससे अधधक की अवधध के कठोर कारावास स े दंडनीय अपराधअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 251 करन े के आपराधधक र्ड यंत्र से लभन्न है, संज्ञान तब तक नह ं करेगा, जब तक राज्य सरकार या स्जिा मस्जथरेट ने कायवष ाह िुरू करने के लिए लिखित सम्मनत नह ं दे द है : परंतु जहां आपराधधक र्डय ंत्र ऐसा है, स्जस े धारा 215 के उपबंध िाग ू हैं, वहां ऐसी कोई सम्मनत आवश्यक नह ं होगी । (4) केंद्र य सरकार या राज्य सरकार, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन मंजूर देने के पूव ष और स्जिा मस्जथरेट, उपधारा (2) के अधीन मंजूर देने स े पूव,ष और राज्य सरकार या स्जिा मस्जथरेट, उपधारा (3) के अधीन सम्मनत देने के पूव,ष ऐसे पुलिस अधधकार द्वारा जो ननर िक की पंस्क्ट् त से नीचे का नह ं है, प्रारंलभक अन्वेर्ण ककए जाने का आदेि दे सकता है और उस दिा में ऐसे पुलिस अधधकार की वे िस्क्ट् तयां होंगी, जो धारा 174 की उपधारा (3) में ननहदषष् ट हैं । 218. (1) जब ककसी व्यस्क्ट् त पर, जो न्यायाधीि या मस्जथरेट या ऐसा िोक सेवक न्यायाधीिों और िोक सेवकों का है या था स्जसे सरकार द्वारा या उसकी मंजूर स े ह उसके पद से हटाया जा सकता है, अलभयोजन । अन्यथा नह ं, ककसी ऐसे अपराध का अलभयोग है, स्जसके बारे में यह अलभकधथत है कक वह उसके द्वारा तब ककया गया था, जब वह अपने पद य कतव्ष य के ननवषहन में काय ष कर रहा था या जब उसका ऐसे काय ष करना तात्पनयतष था, तब कोई भी न्यायािय, ऐसे 2014 का 1 अपराध का संज्ञान, जैसा िोकपाि और िोकायुक्ट् त अधधननयम, 2013 में अन्य था उपबस्न्ध त है, उसके लसवाय— (क) ऐसे व्यस्क्ट् त की दिा में, जो संघ के कायषकिाप के संबंध में, यथास्थथनत, ननयोस्जत है या अलभकधथत अपराध के ककए जाने के समय ननयोस्जत था, केंद्र य सरकार की ; (ि) ऐसे व्यस्क्ट् त की दिा में, जो ककसी राज्य के कायकष िाप के संबंध में, यथास्थथनत, ननयोस्जत है या अलभकधथत अपराध के ककए जान े के समय ननयोस्जत था, उस राज्य सरकार की, पूव ष मंजूर से ह करेगा, अन्यथा नह ं : परंतु जहां अलभकधथत अपराध, िंड (ि) में ननहदषष् ट ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा उस अवधध के दौरान ककया गया था, जब राज्य में संववधान के अनुच्छेद 356 के िंड (1) के अधीन की गई उद्घ ोर्णा प्रवत्तृ थी, वहां िंड (ि) इस प्रकार िागू होगा, मानो उसमें आने वािे “राज्य सरकार” पद के थथान पर “केंद्र य सरकार” पद रि हदया गया है : परन्तु यह और कक ऐसी सरकार मंजूर के लिए अनुरोध की प्रास्प्त की तार ि से एक सौ बीस हदनों की अवधध के भीतर ननणषय करेगी और यहद वह ऐसा करने में असफि हो जाती है, तो मंजूर , ऐसी सरकार द्वारा द गई समझी जाएगी : परन्तु यह भी कक ऐसे ककसी िोक सेवक की दिा में, स्जसके बारे में यह अलभकथन 2023 का 45 ककया गया है कक उसने भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, धारा 143, धारा 199 या धारा 200 के अधीन कोई अपराध ककया है, कोई पूव ष मंजूर अपेक्षित नह ं होगी । (2) कोई भी न्यायािय संघ के सिथ त्र बि के ककसी सदथय द्वारा ककए गए ककसी252 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अपराध का संज्ञान, स्जसके बारे में यह अलभकधथत है कक वह उसके द्वारा तब ककया गया था, जब वह अपने पद य कतषव्य के ननवषहन में काय ष कर रहा था या जब उसका ऐसे कायष करना तात्पनयषत था, केंद्र य सरकार की पूव ष मंजूर से ह करेगा, अन्यथा नह ं । (3) राज्य सरकार अधधसूचना द्वारा ननदेि दे सकती है कक उसमें यथाववननहदषष् ट बि के ऐसे वग ष या प्रवग ष के सदथयों को, स्जन्हें िोक व्यवथथा बनाए रिन े का काय-ष भार सौंपा गया है, जहां कह ं भी वे सेवा कर रहे हों, उपधारा (2) के उपबंध िागू होंगे और तब उस उपधारा के उपबंध इस प्रकार िागू होंगे, मानो उसमें आन े वािे “केंद्र य सरकार” पद के थथान पर “राज्य सरकार” पद रि हदया गया है । (4) उपधारा (3) में ककसी बात के होत े हुए भी कोई भी न्यायािय ऐसे बिों के ककसी सदथय द्वारा, स्जसे राज्य में िोक व्यवथथा बनाए रिन े का काय-ष भार सौंपा गया है, ककए गए ककसी ऐसे अपराध का संज्ञान, स्जसके बारे में यह अलभकधथत है कक वह उसके द्वारा तब ककया गया था जब वह, उस राज्य में संववधान के अनुच्छेद 356 के िंड (1) के अधीन की गई उद्घ ोर्णा के प्रवत्तृ रहने के दौरान, अपने पद य कतव्ष य के ननवहष न में काय ष कर रहा था या जब उसका ऐस े काय ष करना तात्पनयतष था, केंद्र य सरकार की पूव ष मंजूर स े ह करेगा, अन्यथा नह ं । (5) केंद्र य सरकार या राज्य सरकार उस व्यस्क्ट् त का स्जसके द्वारा और उस र नत का स्जससे वह अपराध या वे अपराध, स्जसके या स्जनके लिए ऐसे न्यायाधीि, मस्जथरेट या िोक सेवक का अलभयोजन ककया जाना है, अवधारण कर सकती है और वह न्यायािय ववननहदषष् ट कर सकती है, स्जसके समि ववचारण ककया जाना है । वववाह के ववरुद्ध 219. (1) कोई न्यायािय भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 81 से धारा 84 2023 का 45 अपराधों के लिए (दोनों सहहत) के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध से व्यधथत ककसी व्यस्क्ट् त अलभयोजन । द्वारा ककए गए पररवाद पर ह करेगा, अन्यथा नह ं : परंतु— (क) जहां ऐसा व्यस्क्ट् त बािक है या ववकृत्तधचत्त है या बौद्धधक रूप से हदव्यांग ऐसा व्यस्क्ट्त है, स्जसे उच्चतर सहायता की आवश्यकता है या रोग या अंग-िैधथलय के कारण पररवाद करन े के लिए असमथ ष है, या ऐसी महहिा है, जो थथानीय रूह़ियों और र नतयों के अनुसार िोगों के सामने आने के लिए वववि नह ं की जानी चाहहए, वहां उसकी ओर से कोई अन्य व्यस्क्ट् त न्यायािय की इजाजत से पररवाद कर सकता है ; (ि) जहां ऐसा व्यस्क्ट् त पनत है, और संघ के सिथ त्र बिों में से ककसी में स े ऐसी पररस्थथनतयों में सेवा कर रहा है, स्जनके बारे में उसके कमान अधधकार ने यह प्रमाखणत ककया है कक उनके कारण उस े पररवाद कर सकन े के लिए अनुपस्थथनत छुट्ट प्राप् त नह ं हो सकती, वहां उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार पनत द्वारा प्राधधकृत कोई अन्य व्यस्क्ट् त उसकी ओर से पररवाद कर सकता है ; (ग) जहां भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 82 के अधीन दंडनीय 2023 का 45 अपराध से व्यधथत व्यस्क्ट् त पत् नी है वहां उसकी ओर से उसके वपता, माता, भाई, बहन, पुत्र या पुत्री या उसके वपता या माता के भाई या बहन द्वारा या न्यायािय की इजाजत से, ककसी ऐसे अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा, जो उससे रक्ट् त, वववाह या दत्तकअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 253 द्वारा संबंधधत है, पररवाद ककया जा सकता है । (2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, महहिा के पनत स े लभन्न कोई व्यस्क्ट् त, 2023 का 45 उक्ट् त भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 84 के अधीन दंडनीय ककसी अपराध से व्यधथत नह ं समझा जाएगा । (3) जब उपधारा (1) के परंतुक के िंड (क) के अन्तगतष आन े वािे ककसी मामिे में, बािक या ववकृत्तधचत्त व्यस्क्ट्त की ओर से ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा पररवाद ककया जाना है, जो सिम प्राधधकार द्वारा बािक या ववकृत्तधचत्त व्यस्क्ट्त के िर र का संरिक ननयुक्ट् त या घोवर्त नह ं ककया गया है, और न्यायािय का समाधान हो जाता है कक ऐसा कोई संरिक जो ऐसे ननयुक्ट् त या घोवर्त ककया गया है तब न्यायािय इजाजत के लिए आवेदन मंजूर करन े के पूव,ष ऐसे संरिक को सूचना हदिवाएगा और सुनवाई का उधचत अवसर देगा । (4) उपधारा (1) के परंतुक के िंड (ि) में ननहदषष् ट प्राधधकार लिखित रूप में हदया जाएगा और, वह पनत द्वारा हथतािररत या अन्यथा अनुप्रमाखणत होगा, उसमें इस भाव का कथन होगा कक उस े उन अलभकथनों की जानकार दे द गई है स्जनके आधार पर पररवाद ककया जाना है और वह उसके कमान अधधकार द्वारा प्रनतहथतािररत होगा, तथा उसके साथ उस आकफसर द्वारा हथतािररत इस भाव का प्रमाणपत्र होगा कक पनत को थवयं पररवाद करने के प्रयोजन के लिए अनुपस्थथनत छुट्ट उस समय नह ं द जा सकती है । (5) ककसी दथतावेज के बारे में, स्जसका ऐसा प्राधधकार होना तात्पनयषत है और स्जससे उपधारा (4) के उपबंधों की पूनत ष होती है और ककसी दथतावेज के बारे में, स्जसका उस उपधारा द्वारा अपेक्षित प्रमाणपत्र होना तात्पनयतष है, जब तक प्रनतकूि साबबत न कर हदया जाए, यह उपधारणा की जाएगी कक वह असि है और उस े साक्ष्य में ग्रहण ककया जाएगा । 2023 का 45 (6) कोई न्यायािय भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64 के अधीन अपराध का संज्ञान, जहां ऐसा अपराध ककसी पुरुर् द्वारा अठारह वर् ष स े कम आयु की अपनी ह पत्न ी के साथ मैथुन करता है, उस दिा में न करेगा जब उस अपराध के ककए जाने की तार ि से एक वर् ष से अधधक व्यतीत हो चुका है । (7) इस धारा के उपबंध ककसी अपराध के दष्ु प्रेरण या अपराध करन े के प्रयत् न को ऐसे िागू होंगे, जैसे व े अपराध को िागू होत े हैं । 2023 का 45 220. कोई न्यायािय भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 85 के अधीन दंडनीय भारतीय न्याय संहहता, 2023 अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध को गहठत करने वािे तथ्यों की पुलिस ररपोटष पर या की धारा 85 अपराध से व्यधथत व्यस्क्ट् त द्वारा या उसके वपता, माता, भाई, बहन द्वारा या उसके वपता के अधीन या माता के भाई या बहन द्वारा ककए गए पररवाद पर या रक्ट् त, वववाह या दत्तक ग्रहण अपराधों का अलभयोजन । द्वारा उससे संबंधधत ककसी अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा न्यायािय की इजाजत से ककए गए पररवाद पर ह करेगा अन्यथा नह ं । 2023 का 45 221. कोई भी न्य ायािय भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 67 के अधीन अपराध का संज्ञान । दंडनीय ककसी अपराध का, जहां व् यस्क्ट् तयों में वैवाहहक संबंध है, उन तथ् यों का, स्जनसे पत्न ी द्वारा पनत के ववरुद्ध पररवाद फाइि ककए जाने या ककए जाने पर अपराध गहठत होता है, प्रथमदृष् ट्या समाधान होने के लसवाय संज्ञान नह ं करेगा ।254 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— मानहानन के लिए 222. (1) कोई न्यायािय भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 356 के अधीन 2023 का 45 अलभयोजन । दंडनीय अपराध का संज्ञान ऐसे अपराध से व्यधथत ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ककए गए पररवाद पर ह करेगा, अन्यथा नह ं : परंतु जहां ऐसा व्यस्क्ट् त बािक है या ववकृत्तधचत्त है या बौद्धधक रूप से हदव्यांग है या रोग या अंग-िैधथलय के कारण पररवाद करन े के लिए असमथ ष है, या ऐसी महहिा है, जो थथानीय रूह़ियों और र नतयों के अनुसार िोगों के सामने आने के लिए वववि नह ं की जानी चाहहए, वहां उसकी ओर से कोई अन्य व्यस्क्ट् त न्यायािय की इजाजत से पररवाद कर सकेगा । (2) इस संहहता में ककसी बात के होत े हुए भी, जब भारतीय न्याय संहहता, 2023 की 2023 का 45 धारा 356 के अधीन आन े वािे ककसी अपराध के बारे में यह अलभकधथत है कक वह ऐसे व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध, जो ऐसा अपराध ककए जान े के समय भारत का राष् रपनत, या भारत का उपराष् रपनत या ककसी राज्य का राज्यपाि या ककसी संघ राज्यिेत्र का प्रिासक या संघ या ककसी राज्य का या ककसी संघ राज्यिेत्र का मंत्री या संघ या ककसी राज्य के कायकष िापों के संबंध में ननयोस्जत अन्य िोक सेवक था, उसके िोक कृत्यों के ननवषहन में उसके आचरण के संबंध में ककया गया है तब सेिन न्यायािय, ऐसे अपराध का संज्ञान, उसको मामिा सुपुदष हुए बबना, िोक अलभयोजक द्वारा ककए गए लिखित पररवाद पर कर सकता है । (3) उपधारा (2) में ननहदषष् ट ऐसे प्रत्येक पररवाद में व े तथ्य, स्जनसे अलभकधथत अपराध बनता है, ऐसे अपराध का थवरूप और ऐसी अन्य ववलिस्ष् टयां वखणतष होंगी जो अलभयुक्ट् त को उसके द्वारा ककए गए अलभकधथत अपराध की सूचना देने के लिए उधचत रूप से पयाषप् त है । (4) उपधारा (2) के अधीन िोक अलभयोजक द्वारा कोई पररवाद— (क) उस राज्य सरकार की— (i) ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त की दिा में, जो उस राज्य का राज्यपाि है या रहा है या उस सरकार का मंत्री है या रहा है ; (ii) ककसी राज्य के कायकष िापों के संबंध में ननयोस्जत ककसी अन्य िोक सेवक की दिा में ; (ि) ककसी अन्य दिा में, केंद्र य सरकार की, पूव ष मंजूर से ह ककया जाएगा, अन्यथा नह ं । (5) कोई सेिन न्यायािय, उपधारा (2) के अधीन ककसी अपराध का संज्ञान तभी करेगा जब पररवाद उस तार ि से छह मास के भीतर कर हदया जाता है, स्जसको उस अपराध का ककया जाना अलभकधथत है । (6) इस धारा की कोई बात ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त के, स्जसके ववरुद्ध अपराध का ककया जाना अलभकधथत है, उस अपराध की बाबत अधधकाररता वािे ककसी मस्जथरेट के समि पररवाद करन े के अधधकार पर या ऐसे पररवाद पर अपराध का संज्ञान करन े की ऐसे मस्जथरेट की िस्क्ट् त पर प्रभाव नह ं डािेगी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 255 अध्याय 16 मक्िस्रेटों से पररिाि 223. (1) ककसी पररवाद पर अपराध का संज्ञान िेते समय अधधकाररता रिने वािा पररवाद की पर िा । मस्जथरेट पररवाद की और यहद कोई सािी उपस्थथत हैं तो उनकी िपथ पर पर िा करेगा और ऐसी पर िा का सारांि िेिबद्ध करेगा और पररवाद और साक्षियों द्वारा तथा मस्जथरेट द्वारा भी हथतािररत ककया जाएगा : परन्तु ककसी अपराध का संज्ञान मस्जथरेट द्वारा अलभयुक्ट्त को सुनवाई का अवसर हदए बबना नह ं ककया जाएगा : परंतु यह और कक जब पररवाद लिि कर ककया जाता है तब मस्जथरेट के लिए पररवाद या साक्षियों की पर िा करना आवश्यक न होगा— (क) यहद पररवाद अपने पद य कतव्ष यों के ननवहष न में काय ष करन े वािे या काय ष करन े का तात्पय ष रिने वािे िोक सेवक द्वारा या न्यायािय द्वारा ककया गया है ; या (ि) यहद मस्जथरेट जांच या ववचारण के लिए मामि े को धारा 212 के अधीन ककसी अन्य मस्जथरेट के हवािे कर देता है : परंतु यह भी कक यहद मस्जथरेट पररवाद या साक्षियों की पर िा करन े के पश् चात ् मामि े को धारा 212 के अधीन ककसी अन्य मस्जथरेट के हवािे करता है तो बाद वािे मस्जथरेट के लिए उनकी कफर से पर िा करना आवश्यक न होगा : (2) कोई मस्जथरेट ऐसे ककसी अपराध के लिए िोक सेवक के ववरूद्ध पररवाद पर संज्ञान ग्रहण नह ं करेगा जो उसके द्वारा अपने पद य कृत्यों या कतव्ष यों के ननवषहन के दौरान ककया जाना अलभकधथत है, जब तक— (क) ऐसे िोक सेवक को उस पररस्थथनत के बारे में प्राख्यान करने का अवसर नह ं हदया जाता है, स्जसके कारण ऐसी अलभकधथत घटना घहटत हुई ; और (ि) ऐसे िोक सेवक के वररष्ठ अधधकार से घटना के तथ्यों और पररस्थथनतयों को अंतववष्ष ट करने वाि ररपोटष प्राप्त नह ं हो जाती है । 224. यहद पररवाद ऐसे मस्जथरेट को ककया जाता है जो उस अपराध का संज्ञान ऐस े मस्जथरेट करन े के लिए सिम नह ं है, तो— द्वारा प्रकिया जो मामिे का (क) यहद पररवाद लिखित है तो वह उसको समुधचत न्यायािय में प्रथतुत संज्ञान करन े के करन े के लिए, उस भाव के पष्ृ ठाकं न सहहत, िौटा देगा ; लिए सिम नह ं है । (ि) यहद पररवाद लिखित में नह ं है तो वह पररवाद को उधचत न्यायािय में जाने का ननदेि देगा । 225. (1) यहद कोई मस्जथरेट ऐसे अपराध का पररवाद प्राप् त करन े पर, स्जसका आदेलिका के जार ककए जाने संज्ञान करने के लिए वह प्राधधकृत है या जो धारा 212 के अधीन उसके हवािे ककया गया को थथधगत है, ठीक समझता है तो और ऐसे मामिे में जहां अलभयुक्ट् त ऐसे ककसी थथान में ननवास करना । कर रहा है जो उस िेत्र से परे है स्जसमें वह अपनी अधधकाररता का प्रयोग करता है अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आदेलिका का जार ककया जाना थथधगत कर सकता है और यह ववननस्श् चत करन े के प्रयोजन से कक कायवष ाह करन े के लिए पयाषप् त आधार है या नह ं, या256 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तो थवयं ह मामिे की जांच कर सकता है या ककसी पुलिस अधधकार द्वारा या अन्य ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा, स्जसको वह ठीक समझ े अन्वेर्ण ककए जान े के लिए ननदेि दे सकता है : परंतु अन्वेर्ण के लिए ऐसा कोई ननदेि वहां नह ं हदया जाएगा— (क) जहां मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है कक वह अपराध स्जसका पररवाद ककया गया है अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय है ; या (ि) जहां पररवाद ककसी न्यायािय द्वारा नह ं ककया गया है जब तक कक पररवाद की या उपस्थथत साक्षियों की (यहद कोई हो) धारा 223 के अधीन िपथ पर पर िा नह ं कर ि जाती है । (2) उपधारा (1) के अधीन ककसी जांच में यहद मस्जथरेट, ठीक समझता है तो साक्षियों का िपथ पर साक्ष्य िे सकता है : परंतु यहद मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है कक वह अपराध स्जसका पररवाद ककया गया है अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय है तो वह पररवाद से अपने सब साक्षियों को प्रथतुत करन े की अपेिा करेगा और उनकी िपथ पर पर िा करेगा । (3) यहद उपधारा (1) के अधीन अन्वेर्ण ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा ककया जाता है जो पुलिस अधधकार नह ं है तो उस अन्वेर्ण के लिए उसे वारंट के बबना धगरफ्तार करने की िस्क्ट् त के लसवाय पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार को इस संहहता द्वारा प्रदत्त सभी िस्क्ट् तयां होंगी । पररवाद का 226. यहद पररवाद के और साक्षियों के िपथ पर ककए गए कथन पर (यहद कोई िाररज ककया हो), और धारा 225 के अधीन जांच या अन्वेर्ण के (यहद कोई हो) पररणाम पर, ववचार जाना । करन े के पश् चात,् मस्जथरेट की यह राय है कक कायवष ाह करन े के लिए पयाषप् त आधार नह ं है तो वह पररवाद को िाररज कर देगा और ऐसे प्रत्येक मामि े में वह ऐसा करन े के अपने कारणों को संिेप में अलभलिखित करेगा । अध्याय 17 मक्िस्रेट के समक्ष कायािािी का प्रारंभ क्रकया िाना आदेलिका का 227. (1) यहद ककसी अपराध का संज्ञान करने वाि े मस्जथरेट की राय में कायवष ाह जार ककया करन े के लिए पयाषप् त आधार हैं और— जाना । (क) मामिा, समन-मामिा प्रतीत होता है तो वह अलभयुक्ट्त की उपस्थथनत के लिए उस े समन जार करेगा ; या (ि) मामिा वारंट-मामिा प्रतीत होता है तो वह अपने या (यहद उसकी अपनी अधधकाररता नह ं है तो) अधधकाररता वािे ककसी अन्य मस्जथरेट के समि अलभयुक्ट् त के ननस्श् चत समय पर िाए जाने या उपस्थथत होने के लिए वारंट, या यहद ठीक समझता है समन, जार कर सकता है । परन्तु समन या वारंट, इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से भी जार ककए जा सकेंगे । (2) अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध उपधारा (1) के अधीन तब तक कोई समन या वारंट जार नह ं ककया जाएगा जब तक अलभयोजन के साक्षियों की सूची फाइि नह ं कर द जाती है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 257 (3) लिखित पररवाद पर संस्थथत कायवष ाह में उपधारा (1) के अधीन जार ककए गए प्रत्येक समन या वारंट के साथ उस पररवाद की एक प्रनतलिवप होगी । (4) जब तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन कोई आदेलिका फीस या अन्य फीस संदेय है तब कोई आदेलिका तब तक जार नह ं की जाएगी जब तक फीस नह ं दे द जाती है और यहद ऐसी फीस उधचत समय के भीतर नह ं द जाती है तो मस्जथरेट पररवाद को िाररज कर सकता है । (5) इस धारा की कोई बात धारा 90 के उपबंधों पर प्रभाव डािने वाि नह ं समझी जाएगी । 228. (1) जब कभी कोई मस्जथरेट समन जार करता है तब यहद उस े ऐसा करने मस्जथरेट का अलभयुक्ट् त को का कारण प्रतीत होता है तो वह अलभयुक्ट् त को वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत से अलभमुक्ट् त कर वैयस्क्ट् तक सकता है और अपने अधधवक्ट्ता द्वारा उपस्थथत होने की अनुज्ञा दे सकता है । उपस्थथनत स े (2) ककंतु मामिे की जांच या ववचारण करने वािा मस्जथरेट, थववववेकानुसार, अलभमुस्क्ट्त दे सकना । कायवष ाह के ककसी प्रिम में अलभयुक्ट् त की वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत का ननदेि दे सकता है और यहद आवश्यक हो तो उस े इस प्रकार उपस्थथत होने के लिए इसमें इसके पूव ष उपबंधधत र नत से वववि कर सकता है । 229. (1) यहद ककसी छोटे अपराध का संज्ञान करन े वािे मस्जथरेट की राय में, छोटे अपराधों के मामि े में मामि े को धारा 283 या धारा 284 के अधीन संिेपत: ननपटाया जा सकता है तो वह वविेर् समन । मस्जथरेट, उस दिा के लसवाय, जहां उन कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, उसकी प्रनतकूि राय है, अलभयुक्ट् त से यह अपेिा करत े हुए उसके लिए समन जार करेगा कक वह ववननहदषष् ट तार ि को मस्जथरेट के समि या तो थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा उपस्थथत हो या यहद वह मस्जथरेट के समि उपस्थथत हुए बबना आरोप का दोर्ी होने का अलभवचन करना चाहता है तो लिखित रूप में उक्ट् त अलभवाक् और समन में ववननहदषष् ट जुमाषने की रकम डाक या संदेिवाहक द्वारा ववननहदषष् ट तार ि के पवू ष भेज दे या यहद वह अधधवक्ट्ता द्वारा उपस्थथत होना चाहता है और ऐसे अधधवक्ट्ता द्वारा उस आरोप के दोर्ी होने का अलभवचन करना चाहता है तो अधधवक्ट्ता को अपनी ओर से आरोप के दोर्ी होने का अलभवचन करने के लिए लििकर प्राधधकृत करे और ऐसे अधधवक्ट्ता की माध्यम से जुमाषने का संदाय करे : परंतु ऐसे समन में ववननहदषष् ट जुमाषने की रकम पांच हजार रुपए से अधधक न होगी । (2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए “छोटे अपराध” स े कोई ऐसा अपराध अलभप्रेत है, जो केवि पांच हजार रुपए से अनधधक जुमाषने से दंडनीय है ककंत ु इसके अंतगतष कोई ऐसा 1988 का 59 अपराध नह ं है जो मोटरयान अधधननयम, 1988 के अधीन या ककसी अन्य ऐसी ववधध के अधीन, स्जसमें दोर्ी होने के अलभवाक् पर अलभयुक्ट् त की अनुपस्थथनत में उसको दोर्लसद्ध करन े के लिए उपबंध है, इस प्रकार दंडनीय है । (3) राज्य सरकार, ककसी मस्जथरेट को उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् तयों का प्रयोग ककसी ऐसे अपराध के संबंध में करन े के लिए, जो धारा 359 के अधीन िमनीय है, या जो कारावास से, स्जसकी अवधध तीन मास से अधधक नह ं है या जुमाषने से या दोनों से दंडनीय है अधधसूचना द्वारा वविेर् रूप से वहा ं सिक्ट् त कर सकती है, जहां मामिे के258 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तथ्यों और पररस्थथनतयों को ध्यान रित े हुए मस्जथरेट की राय है कक केवि जुमानष ा अधधरोवपत करने से न्याय के उद्देश्य पूरे हो जाएंगे । अलभयुक्ट् त को 230. ककसी ऐसे मामि े में जहां कायवष ाह पुलिस ररपोटष के आधार पर संस्थथत की पुलिस ररपोटष या गई है, वहां मस्जथरेट बबना ककसी देर के और ककसी भी दिा में अलभयुक्ट्त को पेि करने अन्य दथतावेजों या उसके उपसंजात होने की तार ि से, जो चौदह हदन की अवधध से अधधक नह ं हो, की प्रनतलिवप देना । ननम् नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रनत अलभयुक्ट् त और पीडडत को (यहद उसका प्रनतननधधत्व अधधवक्ट्ता द्वारा ककया गया हो) अवविंब नन:िुलक देगा :— (i) पुलिस ररपोटष ; (ii) धारा 173 के अधीन िेिबद्ध की गई प्रथम सूचना ररपोटष ; (iii) धारा 180 की उपधारा (3) के अधीन अलभलिखित उन सभी व्यस्क्ट् तयों के कथन, स्जनकी अपने साक्षियों के रूप में पर िा करन े का अलभयोजन का ववचार है, उनमें से ककसी ऐसे भाग को छोडकर स्जनको ऐसे छोडने के लिए ननवेदन धारा 193 की उपधारा (7) के अधीन पुलिस अधधकार द्वारा ककया गया है ; (iv) धारा 183 के अधीन िेिबद्ध की गई संथवीकृनतया ं या कथन, यहद कोई हों ; (v) कोई अन्य दथतावेज या उसका सुसंगत उद्ध रण, जो धारा 193 की उपधारा (6) के अधीन पुलिस ररपोटष के साथ मस्जथरेट को भेजी गई है : परंतु मस्जथ रेट िड ड (iii) में ननहदषष् ट कथन के ककसी ऐसे भाग का पररिीिन करने और ऐसे ननवेदन के लिए पुलिस अधधकार द्वारा हदए गए कारणों पर ववचार करने के पश् चात ् यह ननदेि दे सकता है कक कथन के उस भाग की या उसके ऐसे प्रभाग की, जैसा मस्जथ रेट ठीक समझे, एक प्रनतलिवप अलभयुक्ट् त को द जाए : परंतु यह और कक यहद मस्जथरेट का समाधान हो जाता है कक कोई दथतावेज वविािकाय है तो वह अलभयुक्ट् त और पीडडत (यहद उसका प्रनतननधधत्व अधधवक्ट्ता द्वारा ककया गया है) को उसकी प्रनतलिवप देने के बजाय इिैक्ट्राननक साधन के माध्यम से प्रनत को हदया जा सकेगा या यह ननदेि देगा कक उस े थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा न्यायािय में उसका ननर िण ह करन े हदया जाएगा : परन्तु यह भी कक इिैक्ट्राननक प्ररूप में उन दथतावेजों को प्रदाय करने के लिए ववचार ककया जाएगा जो सम्यक् रूप से प्रथतुत ककए गए हैं । सेिन न्यायािय 231. जहां पुलिस ररपोटष स े लभन्न आधार पर संस्थथत ककसी मामिे में, धारा 227 द्वारा ववचारणीय के अधीन आदेलिका जार करन े वािे मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है कक अपराध अन्य मामिों में अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय है, वहां मस्जथरेट ननम् नलिखित में से प्रत्येक अलभयुक्ट् त को कथनों और की एक प्रनतलिवप अलभयुक्ट् त को तत्काि नन:िुलक देगा :— दथतावेजों की (i) उन सभी व्यस्क्ट् तयों के, स्जनकी मस्जथरेट द्वारा पर िा की जा चुकी है, प्रनतलिवपयां धारा 223 या धारा 225 के अधीन िेिबद्ध ककए गए कथन ; देना । (ii) धारा 180 या धारा 183 के अधीन िेिबद्ध ककए गए कथन, और संथवीकृनतयां, यहद कोई हों ; (iii) मस्जथरेट के समि प्रथततु की गई कोई दथतावेजें, स्जन पर ननभरष रहनेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 259 का अलभयोजन का ववचार है : परंतु यहद मस्जथरेट का समाधान हो जाता है कक ऐसी कोई दथतावेज वविािकाय है, तो वह अलभयुक्ट् त को उसकी प्रनतलिवप देने के बजाय यह ननदेि देगा कक उसे थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा न्यायािय में उसका ननर िण ह करन े हदया जाएगा : परन्तु यह भी कक इिैक्ट्राननक प्ररूप में उन दथतावेजों को प्रदाय करने के लिए ववचार ककया जाएगा जो सम्यक् रूप से प्रथतुत ककए गए हैं । 232. जब पुलिस ररपोटष पर या अन्यथा संस्थथत ककसी मामि े में अलभयुक्ट् त जब अपराध अनन्यत: सेिन मस्जथरेट के समि उपस्थथत होता है या िाया जाता है और मस्जथरेट को यह प्रतीत होता न्यायािय है कक अपराध अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय है तो वह— द्वारा (क) धारा 230 या धारा 231 के उपबंधों का अनुपािन करन े के पश् चात ् ववचारणीय है तब मामिा उस े मामिा सेिन न्यायािय को सुपुदष करेगा और जमानत से संबंधधत इस संहहता के सुपुदष करना । उपबंधों के अधीन रहत े हुए अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को अलभरिा में तब तक के लिए प्रनतप्रेवर्त करेगा जब तक ऐसी सुपुदषगी नह ं कर द जाती है ; (ि) जमानत स े संबंधधत इस संहहता के उपबंधों के अधीन रहत े हुए ववचारण के दौरान और समाप् त होने तक अलभयुक्ट् त को अलभरिा में प्रनतप्रेवर्त करेगा ; (ग) मामिे का अलभिेि तथा दथतावेजें और वथतुए,ं यहद कोई हों, स्जन्हें साक्ष्य में प्रथतुत ककया जाना है, उस न्यायािय को भेजेगा ; (घ) मामिे के सेिन न्यायािय को सुपुदष ककए जाने की िोक अलभयोजक को सूचना देगा : परन्तु इस धारा के अधीन कायवष ाहहयां संज्ञान िेने की तार ि से नब्बे हदन की अवधध के भीतर पूर की जाएंगी और ऐसी अवधध मस्जथरेट द्वारा उन कारणों से जो िेिबद्ध ककए जाएं ऐसी उस अवधध तक ववथताररत की जा सकेगी जो एक सौ अथसी हदन की अवधध से अधधक न हो : परन्तु यह और कक जहां कोई आवेदन सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय ककसी मामिे में अलभयुक्ट्त या पीडडत या ऐसे व्यस्क्ट्त द्वारा प्राधधकृत ककए गए ककसी व्यस्क्ट्त द्वारा मस्जथरेट के समि फाइि ककया गया है तो वह मामिे को सुपुदष करने के लिए सेिन न्यायािय को भेजा जाएगा । 233. (1) जब पुलिस ररपोटष से लभन्न आधार पर संस्थथत ककसी मामि े में (स्जसे पररवाद वािे मामि े में इसमें इसके पश् चात ् पररवाद वािा मामिा कहा गया है) मस्जथरेट द्वारा की जाने वाि अनुसरण की जांच या ववचारण के दौरान उसके समि यह प्रकट ककया जाता है कक उस अपराध के बारे जान े वाि में जो उसके द्वारा की जाने वाि जांच या ववचारण का ववर्य है पुलिस द्वारा अन्वेर्ण प्रकिया और हो रहा है, तब मस्जथरेट ऐसी जांच या ववचारण की कायवष ाहहयों को रोक देगा और उसी अपराध के बारे में पुलिस अन्वेर्ण करने वािे पुलिस अधधकार से उस मामिे की ररपोटष मांगेगा । अन्वेर्ण । (2) यहद अन्वेर्ण करने वािे पुलिस अधधकार द्वारा धारा 193 के अधीन ररपोटष की जाती है और ऐसी ररपोटष पर मस्जथरेट द्वारा ऐस े व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध ककसी अपराध का संज्ञान ककया जाता है जो पररवाद वािे मामिे में अलभयुक्ट् त है तो, मस्जथरेट पररवाद वािे मामिे की और पुलिस ररपोटष स े पैदा होने वािे मामिे की जांच या ववचारण साथ-260 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— साथ ऐसे करेगा मानो दोनों मामिे पुलिस ररपोटष पर संस्थथत ककए गए हैं । (3) यहद पुलिस ररपोटष पररवाद वािे मामिे में ककसी अलभयुक्ट् त से संबंधधत नह ं है या यहद मस्जथरेट पुलिस ररपोटष पर ककसी अपराध का संज्ञान नह ं करता है तो वह उस जांच या ववचारण में जो उसके द्वारा रोक ि गई थी, इस संहहता के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह करेगा । अध्याय 18 आरोप क—आरोपों का प्ररूप आरोप की 234. (1) इस संहहता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का कथन होगा, अंतवथष त ु । स्जसका अलभयुक्ट् त पर आरोप है । (2) यहद उस अपराध का सजृ न करन े वाि ववधध द्वारा उस े कोई ववननहदषष् ट नाम हदया गया है तो आरोप में उसी नाम से उस अपराध का वणनष ककया जाएगा । (3) यहद उस अपराध का सजृ न करन े वाि ववधध द्वारा उस े कोई ववननहदषष् ट नाम नह ं हदया गया हो तो अपराध की इतनी पररभार्ा देनी होगी स्जतनी से अलभयुक्ट् त को उस बात की सूचना हो जाए स्जसका उस पर आरोप है । (4) वह ववधध और ववधध की वह धारा, स्जसके ववरुद्ध अपराध ककया जाना कधथत है, आरोप में उस्लिखित होगी । (5) यह तथ्य कक आरोप िगा हदया गया है इस कथन के समतुलय है कक ववधध द्वारा अपेक्षित प्रत्येक ित ष स्जससे आरोवपत अपराध बनता है उस ववलिष् ट मामिे में पूर हो गई है । (6) आरोप न्यायािय की भार्ा में लििा जाएगा । (7) यहद अलभयुक्ट् त ककसी अपराध के लिए पहिे दोर्लसद्ध ककए जाने पर ककसी पश् चात व् ती अपराध के लिए ऐसी पूव ष दोर्लसद्धध के कारण वधधतष दंड का या लभन् न प्रकार के दंड का भागी है और यह आिनयत है कक ऐसी पूव ष दोर्लसद्धध उस दंड को प्रभाववत करन े के प्रयोजन के लिए साबबत की जाए स्जसे न्यायािय पश् चात व् ती अपराध के लिए देना ठीक समझे तो पूव ष दोर्लसद्धध का तथ्य, तार ि और थथान आरोप में कधथत होंगे ; और यहद ऐसा कथन रह गया है तो न्यायािय दंडादेि देने के पूव ष ककसी समय भी उसे जोड सकेगा । दृष् टांत (क) क पर ख की हत्या का आरोप है । यह बात इस कथन के समतुलय है कक क का काय ष भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 100 और धारा 101 में द गई हत्या की 2023 का 45 पररभार्ा के भीतर आता है और वह उसी संहहता के साधारण अपवादों में से ककसी के भीतर नह ं आता और वह धारा 101 के पांच अपवादों में से ककसी के भीतर भी नह ं आता, या यहद वह अपवाद 1 के भीतर आता है तो उस अपवाद के तीन परंतुकों में से कोई न कोई परंतुक उस े िागू होता है । (ि) क पर असन के उपकरण द्वारा ख को थवेच्छया घोर उपहनत काररत करने के लिए भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 118 की उपधारा (2) के अधीन आरोप है । 2023 का 45अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 261 2023 का 45 यह इस कथन के समतुलय है कक उस मामिे के लिए भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 122 की उपधारा (2) द्वारा उपबंध नह ं ककया गया है और साधारण अपवाद उसको िागू नह ं होत े हैं । (ग) क पर हत्या, छि, चोर , उद्दापन या आपराधधक अलभत्रास या लमथ्या संपवत्त धचह्न को उपयोग में िाने का अलभयोग है । आरोप में उन अपराधों की भारतीय न्याय 2023 का 45 संहहता, 2023 में द गई पररभार्ाओं के ननदेि के बबना यह कथन हो सकता है कक क ने हत्या या छि या चोर या उद्दापन या आपराधधक अलभत्रास ककया है या यह कक उसने लमथ्या संपवत्त धचह्न का उपयोग ककया है ; ककंत ु प्रत्येक दिा में वे धाराएं, स्जनके अधीन अपराध दंडनीय है, आरोप में ननहदषष् ट करनी पडेंगी । 2023 का 45 (घ) क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 219 के अधीन यह आरोप है कक उसन े िोक सेवक के ववधधपूणष प्राधधकार द्वारा वविय के लिए प्रथथावपत संपवत्त के वविय में सािय बाधा डाि है । आरोप उन िब्दों में ह होना चाहहए । 235. (1) अलभकधथत अपराध के समय और थथान के बारे में और स्जस व्यस्क्ट् त के समय, थथान (यहद कोई हो) ववरुद्ध या स्जस वथतु के (यहद कोई हो) ववर्य में वह अपराध ककया गया और व्यस्क्ट्त के बारे में उस व्यस्क्ट् त या वथतु के बारे में ऐसी ववलिस्ष् टयां, जैसी अलभयुक्ट् त को उस बात की, ववलिस्ष् टयां । स्जसका उस पर आरोप है, सूचना देने के लिए उधचत रूप से पयाषप् त हैं, आरोप में अंतववष्ष ट होंगी । (2) जब अलभयुक्ट् त पर आपराधधक न्यास-भंग या बेईमानी स े धन या अन्य चि संपवत्त के दवुवनषनयोग का आरोप है तब इतना ह पयाषप् त होगा कक ववलिष् ट मदों का स्जनके ववर्य में अपराध ककया जाना अलभकधथत है, या अपराध करने की ठीक-ठीक तार िों का ववननदेि ककए बबना, उस सकि रालि का ववननदेि या उस चि संपवत्त का वणनष कर हदया जाता है स्जसके ववर्य में अपराध ककया जाना अलभकधथत है, और उन तार िों का, स्जनके बीच में अपराध का ककया जाना अलभकधथत है, ववननदेि कर हदया जाता है और ऐसे ववरधचत आरोप धारा 242 के अथ ष में एक ह अपराध का आरोप समझा जाएगा : परंतु ऐसी तार िों में से पहि और अंनतम के बीच का समय एक वर् ष से अधधक का न होगा । 236. जब मामिा इस प्रकार का है कक धारा 234 और धारा 235 में वखणतष कब अपराध ककए जान े की ववलिस्ष् टयां अलभयुक्ट् त को उस बात की, स्जसका उस पर आरोप है, पयाषप् त सूचना नह ं र नत कधथत की देती तब उस र नत की, स्जसमें अलभकधथत अपराध ककया गया, ऐसी ववलिस्ष् टयां भी, जैसी जानी चाहहए । उस प्रयोजन के लिए पयाषप् त हैं, आरोप में अंतववष्ष ट होंगी । दृष् टांत (क) क पर वथतु-वविेर् की वविेर् समय और थथान में चोर करन े का अलभयोग है । यह आवश्यक नह ं है कक आरोप में वह र नत उपवखणतष हो स्जससे चोर की गई । (ि) क पर ख के साथ कधथत समय पर और कधथत थथान में छि करने का अलभयोग है । आरोप में वह र नत, स्जससे क ने ख के साथ छि ककया, उपवखणतष करनी होगी । (ग) क पर कधथत समय पर और कधथत थथान में लमथ्या साक्ष्य देने का अलभयोग262 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— है । आरोप में क द्वारा हदए गए साक्ष्य का वह भाग उपवखणतष करना होगा स्जसका लमथ्या होना अलभकधथत है । (घ) क पर िोक सेवक ख को उसके िोक कृत्यों के ननवहष न में कधथत समय पर और कधथत थथान में बाधधत करन े का अलभयोग है । आरोप में वह र नत उपवखणतष करनी होगी स्जससे क ने ख को उसके कृत्यों के ननवषहन में बाधधत ककया । (ङ) क पर कधथत समय पर और कधथत थथान में ख की हत्या करन े का अलभयोग है । यह आवश्यक नह ं है कक आरोप में वह र नत कधथत हो स्जससे क ने ख की हत्या की । (च) क पर ख को दंड स े बचान े के आिय से ववधध के ननदेि की अवज्ञा करन े का अलभयोग है । आरोवपत अवज्ञा और अनतिंनघत ववधध का उपवणनष आरोप में करना होगा । आरोप के िब्दों 237. प्रत्येक आरोप में अपराध का वणनष करने में उपयोग में िाए गए िब्दों को का वह अथ ष लिया उस अथ ष में उपयोग में िाया गया समझा जाएगा, जो अथ ष उन्हें उस ववधध द्वारा हदया जाएगा जो उनका गया है स्जसके अधीन ऐसा अपराध दंडनीय है । उस ववधध में है स्जसके अधीन वह अपराध दंडनीय है। गिनतयों का 238. अपराध के या उन ववलिस्ष् टयों के, स्जनका आरोप में कथन होना अपेक्षित है, प्रभाव । कथन करने में ककसी गिती को और उस अपराध या उन ववलिस्ष् टयों के कथन करन े में ककसी िोप को मामिे के ककसी प्रिम में तब ह तास्ववक माना जाएगा, जब ऐसी गिती या िोप स े अलभयुक्ट् त वाथतव में भुिावे में पड गया है और उसके कारण न्याय नह ं हो पाया है, अन्यथा नह ं । दृष् टान्त (क) क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 180 के अधीन यह आरोप है 2023 का 45 कक “उसने कब्जे में ऐसा कूटकृत लसक्ट् का रिा है स्जसे वह उस समय, जब वह लसक्ट् का उसके कब्जे में आया था, जानता था कक वह कूटकृत है” और आरोप में “कपटपूवकष ” िब्द छूट गया है । जब तक यह प्रतीत नह ं होता है कक क वाथतव में इस िोप से भुिावे में पड गया, इस गिती को तास्ववक नह ं समझा जाएगा । (ि) क पर ख से छि करन े का आरोप है और स्जस र नत से उसने ख के साथ छि ककया है, वह आरोप में उपवखणतष नह ं है या अिुद्ध रूप में उपवखणतष है । क अपनी प्रनतरिा करता है, साक्षियों को प्रथतुत करता है और सव्ं यवहार का थवयं अपना वववरण देता है । न्यायािय इससे अनुमान कर सकता है कक छि करन े की र नत के उपवणनष का िोप तास्ववक नह ं है । (ग) क पर ख से छि करने का आरोप है और स्जस र नत से उसने ख से छि ककया है वह आरोप में उपवखणषत नह ं है । क और ख के बीच अनेक संव्यवहार हुए हैं और क के पास यह जानने का कक आरोप का ननदेि उनमें से ककसके प्रनत है कोई साधन नह ं था और उसने अपनी कोई प्रनतरिा नह ं की । न्यायािय ऐसे तथ्यों से यह अनुमान कर सकता है कक छि करने की र नत के उपवणषन का िोप उस मामिे में तास्ववक गिती थी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 263 (घ) क पर 21 जनवर , 2023 को िुदाबख्ि की हत्या करन े का आरोप है । वाथतव में मतृ व्यस्क्ट् त का नाम हैदरबख्ि था और हत्या की तार ि 20 जनवर , 2023 थी । क पर कभी भी एक हत्या के अनतररक्ट् त दसू र ककसी हत्या का आरोप नह ं िगाया गया और उसन े मस्जथरेट के समि हुई जांच को सुना था, स्जसमें हैदरबख्ि के मामिे का ह अनन्य रूप से ननदेि ककया गया था । न्यायािय इन तथ्यों स े यह अनुमान कर सकता है कक क उसस े भुिाव े में नह ं पडा था और आरोप में यह गिती तास्ववक नह ं थी । (ङ) क पर 20 जनवर , 2023 को हैदरबख्ि की हत्या और 21 जनवर , 2023 को िुदाबख्ि की (स्जसने उस े उस हत्या के लिए धगरफ्तार करन े का प्रयास ककया था) हत्या करन े का आरोप है । जब वह हैदरबख्ि की हत्या के लिए आरोवपत हुआ, तब उसका ववचारण िुदाबख्ि की हत्या के लिए हुआ । उसकी प्रनतरिा में उपस्थथत सािी हैदरबख्ि वािे मामि े में सािी थ े । न्यायािय इससे अनुमान कर सकता है कक क भुिावे में पड गया था और यह गिती तास्ववक थी । 239. (1) कोई भी न्यायािय ननणषय सुनाए जाने के पूव ष ककसी समय ककसी भी न्यायािय आरोप पररवनततष कर आरोप में पररवतनष या पररवधषन कर सकता है । सकता है । (2) ऐसा प्रत्येक पररवतषन या पररवधनष अलभयुक्ट् त को प़िकर सुनाया और समझाया जाएगा । (3) यहद आरोप में ककया गया पररवतनष या पररवधनष ऐसा है कक न्यायािय की राय में ववचारण को तुरंत आगे चिाने से अलभयुक्ट् त पर अपनी प्रनतरिा करने में या अलभयोजक पर मामि े के संचािन में कोई प्रनतकूि प्रभाव पडन े की संभावना नह ं है, तो न्यायािय ऐसे पररवतषन या पररवधनष के पश् चात ् थववववेकानुसार ववचारण को ऐसे आगे चिा सकता है मानो पररवनततष या पररवधधतष आरोप ह मूि आरोप है । (4) यहद पररवतनष या पररवधनष ऐसा है कक न्यायािय की राय में ववचारण को तुरंत आगे चिाने से इस बात की संभावना है कक अलभयुक्ट् त या अलभयोजक पर पूवोक्ट् त रूप से प्रनतकूि प्रभाव पडेगा तो न्यायािय या तो नए ववचारण का ननदेि दे सकता है या ववचारण को इतनी अवधध के लिए, स्जतनी आवश्यक हो, थथधगत कर सकता है । (5) यहद पररवनततष या पररवधधतष आरोप में कधथत अपराध ऐसा है, स्जसके अलभयोजन के लिए पूव ष मंजूर की आवश्यकता है, तो उस मामि े में ऐसी मंजूर अलभप्राप् त ककए बबना कोई कायवष ाह नह ं की जाएगी जब तक कक उन्ह ं तथ्यों के आधार पर, स्जन पर पररवनततष या पररवधधतष आरोप आधाररत हैं, अलभयोजन के लिए मंजूर पहिे ह अलभप्राप् त नह ं कर ि गई है । 240. जब कभी ववचारण प्रारंभ होने के पश् चात ् न्यायािय द्वारा आरोप पररवनततष जब आरोप या पररवधधतष ककया जाता है, तब अलभयोजक और अलभयुक्ट् त को— पररवनततष ककया जाता है तब (क) ककसी ऐसे सािी को, स्जसकी पर िा की जा चुकी है, पुन: बुिाने की या साक्षियों का पुन: समन करने की और उसकी ऐसे पररवतनष या पररवधनष के बारे में पर िा करन े पुन: बुिाया जाना । की अनुज्ञा द जाएगी जब तक न्यायािय का ऐसे कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, यह ववचार नह ं है कक अलभयोजक या अलभयुक्ट् त तंग करन े के या वविंब करन े के या न्याय के उद्देश्यों को ववफि करने के प्रयोजन से ऐस े सािी को पुन: बुिाना या उसकी पुन: पर िा करना चाहता है ;264 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) ककसी अन्य ऐसे सािी को भी, स्जसे न्यायािय आवश्यक समझे, बुिाने की अनुज्ञा द जाएगी । ख—आरोपों का संयोिन सुलभन् न अपराधों 241. (1) प्रत्येक सुलभन् न अपराध के लिए, स्जसका ककसी व्यस्क्ट् त पर अलभयोग है, के लिए पथृ क् पथृ क् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का ववचारण पथृ क्ट् त: ककया जाएगा : आरोप । परंतु जहां अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त, लिखित आवेदन द्वारा, ऐसा चाहता है और मस्जथरेट की राय है कक उसस े ऐस े व्यस्क्ट् त पर प्रनतकूि प्रभाव नह ं पडेगा वहां मस्जथरेट उस व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध ववरधचत सभी या ककन्ह ं आरोपों का ववचारण एक साथ कर सकेगा । (2) उपधारा (1) की कोई बात, धारा 242, धारा 243, धारा 244 और धारा 246 के उपबंधों के प्रवतनष पर प्रभाव नह ं डािेगी । दृष् टांत क पर एक अवसर पर चोर करन े और दसू रे ककसी अवसर पर घोर उपहनत काररत करन े का अलभयोग है । चोर के लिए और घोर उपहनत काररत करन े के लिए क पर पथृ क्-पथृ क् आरोप िगाने होंगे और उनका ववचारण पथृ क्ट् त: करना होगा । एक ह वर् ष में 242. (1) जब ककसी व्यस्क्ट् त पर एक ह ककथम के ऐसे एक से अधधक अपराधों का ककए गए एक अलभयोग है, ऐसे अपराधों में से पहिे अपराध से िेकर अंनतम अपराध, बारह मास के ककथम के अपराधों भीतर ह ककए गए हैं, चाहे वे एक ह व्यस्क्ट् त के बारे में ककए गए हों या नह ं, तब उस का आरोप एक साथ िगाया जा पर उनमें से पांच से अनधधक ककतन े ह अपराधों के लिए एक ह ववचारण में आरोप सके । िगाया और ववचारण ककया जा सकता है । (2) अपराध एक ह ककथम के तब होत े हैं जब व े भारतीय न्याय संहहता, 2023 या 2023 का 45 ककसी वविेर् या थथानीय ववधध की एक ह धारा के अधीन समान दंड से दंडनीय होत े हैं : परंत ु इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कक भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 303 की उपधारा (2) के अधीन दंडनीय अपराध उसी ककथम का अपराध है स्जस 2023 का 45 ककथम का उक्ट् त संहहता की धारा 305 के अधीन दंडनीय अपराध है, और भारतीय न्याय संहहता, 2023 या ककसी वविेर् या थथानीय ववधध की ककसी धारा के अधीन दंडनीय अपराध उसी ककथम का अपराध है स्जस ककथम का ऐस े अपराध करन े का प्रयत् न है, जब ऐसा प्रयत् न ह अपराध हो । एक स े अधधक 243. (1) यहद परथपर संबद्ध ऐसे कायों के, स्जनसे एक ह संव्यवहार बनता है, अपराधों के लिए एक िम में एक स े अधधक अपराध एक ह व्यस्क्ट् त द्वारा ककए गए हैं तो ऐस े प्रत्येक ववचारण । अपराध के लिए एक ह ववचारण में उस पर आरोप िगाया जा सकता है और उसका ववचारण ककया जा सकता है । (2) जब धारा 235 की उपधारा (2) में या धारा 242 की उपधारा (1) में उपबंधधत रूप में, आपराधधक न्यास भगं या बेईमानी स े सम्पवत्त के दवुवनषनयोग के एक या अधधक अपराधों से आरोवपत ककसी व्यस्क्ट् त पर उस अपराध या उन अपराधों के ककए जाने को सुकर बनाने या नछपाने के प्रयोजन स े िेिाओं के लमथ्याकरण के एक या अधधक अपराधों का अलभयोग है, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ह ववचारण में आरोप िगाया जा सकता है और ववचारण ककया जा सकता है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 265 (3) यहद अलभकधथत कायों से तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध की, स्जससे अपराध पररभावर्त या दंडनीय हों, दो या अधधक पथृ क् पररभार्ाओं में आन े वािे अपराध बनत े हैं तो स्जस व्यस्क्ट् त पर उन्हें करन े का अलभयोग है, उस पर ऐसे अपराधों में से प्रत्येक के लिए एक ह ववचारण में आरोप िगाया जा सकता है और ववचारण ककया जा सकता है । (4) यहद कई काय,ष स्जनमें स े एक स े या एक स े अधधक से थवयं अपराध गहठत करत े हैं, लमिकर लभन्न अपराध बनत े हैं तो ऐस े कायों स े लमिकर बन े अपराध के लिए और ऐसे कायों में से ककसी एक या अधधक द्वारा बन े ककसी अपराध के लिए अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त पर एक ह ववचारण में आरोप िगाया जा सकता है और ववचारण ककया जा सकता है । 2023 का 45 (5) इस धारा की कोई बात भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 9 पर प्रभाव नह ं डािेगी । उपिारा (1) के दृष् टांत (क) क एक व्यस्क्ट् त ख को, जो ववधधपूण ष अलभरिा में है, छुडाता है और ऐसा करने में कांथटेबि ग को, स्जसकी अलभरिा में ख है, घोर उपहनत काररत करता है । क पर 2023 का 45 भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 121 की उपधारा (2) और धारा 263 के अधीन अपराधों के लिए आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (ि) क हदन में गहृ भेदन इस आिय से करता है कक बिात्संग करे और ऐसे प्रविे ककए गए गहृ में ख की पत् नी से बिात्संग करता है। क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 2023 का 45 की धारा 64 और धारा 331 की उपधारा (3) के अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (ग) क के कब्जे में कई मुद्राएं हैं स्जन्हें वह जानता है कक वे कूटकृत हैं और स्जनके 2023 का 45 संबंध में वह यह आिय रिता है कक भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 337 के अधीन दंडनीय कई कूट रचनाएं करन े के प्रयोजन स े उन्हें उपयोग में िाए। क पर प्रत्येक मुद्रा पर कब्जे के लिए भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 341 की उपधारा (2) के अधीन पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (घ) ख को िनत काररत करन े के आिय से क उसके ववरुद्ध दांडडक कायवष ाह यह जानत े हुए संस्थथत करता है कक ऐसी कायवष ाह के लिए कोई न्यायसंगत या ववधधपूणष आधार नह ं है और ख पर अपराध करन े का लमथ्या अलभयोग, यह जानत े हुए िगाता है कक ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या ववधधपूण ष आधार नह ं है । क पर भारतीय 2023 का 45 न्याय संहहता, 2023 की धारा 248 के अधीन दंडनीय दो अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (ङ) ख को िनत काररत करन े के आिय से क उस पर एक अपराध करने का अलभयोग यह जानते हुए िगाता है कक ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या ववधधपूणष आधार नह ं है । ववचारण में ख के ववरुद्ध क इस आिय से लमथ्या साक्ष्य देता है कक उसके द्वारा ख को मत्ृ यु से दंडनीय अपराध के लिए दोर्लसद्ध करवाए । क पर भारतीय 2023 का 45 न्याय संहहता, 2023 की धारा 230 और धारा 248 के अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (च) क छह अन्य व्यस्क्ट् तयों के सहहत बिवा करने, घोर उपहनत करन े और ऐसे िोक सेवक266 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पर, जो ऐसे बलव े को दबाने का प्रयास ऐसे िोक सेवक के नात े अपन े कतव्ष य का ननवषहन करन े में कर रहा है, हमिा करन े के अपराध करता है । क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की 2023 का 45 धारा 117 की उपधारा (2), धारा 191 की उपधारा (2) और धारा 195 के अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (छ) ख, ग और घ के िर र को िनत की धमकी क इस आिय से एक ह समय देता है कक उन्हें संत्रास काररत ककया जाए । क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की 2023 का 45 धारा 351 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन तीनों अपराधों में से प्रत्येक के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । दृष् टांत (क) से िेकर (छ) तक में िमिः ननहदषष् ट पथृ क् आरोपों का ववचारण एक ह समय ककया जा सकेगा । उपिारा (3) के दृष् टांत (ज) क बेंत से ख पर सदोर् आघात करता है। क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 131 के अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप 2023 का 45 िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (झ) चुराए हुए धान्य के कई बोरे क और ख को, जो यह जानत े हैं कक वे चुराई हुई संपवत्त हैं, इस प्रयोजन से दे हदए जात े हैं कक वे उन्हें नछपा दें । तब क और ख उन बोरों को अनाज की िेती के तिे में नछपाने में थवेच्छया एक दसू रे की मदद करत े हैं । क और ख पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (2) और उपधारा (5) के 2023 का 45 अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वे दोर्लसद्ध ककए जा सकेंगे । (ञ) क अपने बािक को यह जानत े हुए अरक्षित डाि देती है कक यह संभाव्य है कक उसस े वह उसकी मत्ृ यु काररत कर दे । बािक ऐसे अरक्षित डािे जाने के पररणामथवरूप मर जाता है । क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 93 और धारा 105 के 2023 का 45 अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध की जा सकेगी । (ट) क कूटरधचत दथतावेज को बेईमानी से असि साक्ष्य के रूप में इसलिए उपयोग में िाता है कक एक िोक सवे क ख को भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 201 के 2023 का 45 अधीन अपराध के लिए दोर्लसद्ध करे । क पर उस संहहता की (धारा 337 के साथ पहठत) धारा 233 और धारा 340 की उपधारा (2) के अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । उपिारा (4) का दृष् टांत (ठ) ख को क िूटता है और ऐसा करन े में उसे थवेच्छया उपहनत काररत करता है । क पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 309 की 2023 का 45 उपधारा (2) और उपधारा (4) के अधीन अपराधों के लिए पथृ क्ट् त: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । जहां इस बारे में 244. (1) यहद कोई एक काय ष या कायों का िम इस प्रकृनत का है कक यह संदेह है संदेह है कक कौन- कक उन तथ्यों से, जो लसद्ध ककए जा सकत े हैं, कई अपराधों में से कौन सा अपराध बनेगा सा अपराध ककया तो अलभयुक्ट् त पर ऐसे सब अपराध या उनमें से कोई करने का आरोप िगाया जा सकेगा गया है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 267 और ऐसे आरोपों में से ककतनों पर एक साथ ववचारण ककया जा सकेगा ; या उस पर उक्ट् त अपराधों में से ककसी एक को करन े का अनुकलपत: आरोप िगाया जा सकेगा । (2) यहद ऐसे मामिे में अलभयुक्ट् त पर एक अपराध का आरोप िगाया गया है और साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कक उसने लभन्न अपराध ककया है, स्जसके लिए उस पर उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन आरोप िगाया जा सकता था, तो वह उस अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा स्जसका उसके द्वारा ककया जाना दलितष है, यद्यवप उसके लिए उस पर आरोप नह ं िगाया गया था । दृष् टांत (क) क पर ऐसे काय ष का अलभयोग है जो चोर की, या चुराई गई संपवत्त प्राप् त करने की, या आपराधधक न्यास-भंग की, या छि की कोहट में आ सकता है । उस पर चोर करन,े चुराई हुई संपवत्त प्राप्त करन,े आपराधधक न्यास-भंग करन े और छि करने का आरोप िगाया जा सकेगा या उस पर चोर करन े का या चोर की संपवत्त प्राप् त करन े का या आपराधधक न्यास-भंग करन े का या छि करन े का आरोप िगाया जा सकेगा । (ि) ऊपर वखणतष मामिे में क पर केवि चोर का आरोप है । यह प्रतीत होता है कक उसन े आपराधधक न्यास-भंग का या चुराई हुई संपवत्त प्राप् त करन े का अपराध ककया है । वह (यथास्थथनत) आपराधधक न्यास-भंग या चुराई हुई संपवत्त प्राप् त करने के लिए दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा, यद्यवप उस पर उस अपराध का आरोप नह ं िगाया गया था । (ग) क मस्जथरेट के समि िपथ पर कहता है कक उसने देिा कक ख ने ग को िाठी मार । सेिन न्यायािय के समि क िपथ पर कहता है कक ख ने ग को कभी नह ं मारा । यद्यवप यह साबबत नह ं ककया जा सकता कक इन दो परथपर ववरुद्ध कथनों में से कौन सा लमथ्या है तथावप क पर सािय लमथ्या साक्ष् य देने के लिए अनुकलपत: आरोप िगाया जा सकेगा और वह दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । 245. (1) जब ककसी व्यस्क्ट् त पर ऐसे अपराध का आरोप है स्जसमें कई ववलिस्ष् टयां जब वह अपराध, हैं, स्जनमें से केवि कुछ के संयोग से एक पूरा छोटा अपराध बनता है और ऐसा संयोग जो साबबत हुआ है, आरोवपत साबबत हो जाता है ककन्तु िेर् ववलिस्ष् टया ं साबबत नह ं होती हैं तब वह उस छोटे अपराध अपराध के के लिए दोर्लसद्ध ककया जा सकता है यद्यवप उस पर उसका आरोप नह ं था । अंतगतष है । (2) जब ककसी व्यस्क्ट् त पर ककसी अपराध का आरोप िगाया गया है और ऐसे तथ्य साबबत कर हदए जाते हैं जो उस े घटाकर छोटा अपराध कर देत े हैं तब वह छोटे अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया जा सकता है यद्यवप उस पर उसका आरोप नह ं था । (3) जब ककसी व्यस्क्ट् त पर ककसी अपराध का आरोप है तब वह उस अपराध को करन े के प्रयत् न के लिए दोर्लसद्ध ककया जा सकता है यद्यवप प्रयत् न के लिए पथृ क् आरोप न िगाया गया हो । (4) इस धारा की कोई बात ककसी छोटे अपराध के लिए उस दिा में दोर्लसद्धध प्राधधकृत करन े वाि न समझी जाएगी स्जसमें ऐस े छोटे अपराध के बारे में कायवष ाह िरूु करन े के लिए अपेक्षित ित ें पूर नह ं हुई हैं । दृष् टांत (क) क पर उस संपवत्त के बारे में, जो वाहक के नाते उसके पास न्यथत है, 2023 का 45 आपराधधक न्यास-भंग के लिए भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 316 की268 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उपधारा (3) के अधीन आरोप िगाया गया है । यह प्रतीत होता है कक उस संपवत्त के बारे में धारा 316 की उपधारा (2) के अधीन उसने आपराधधक न्यास-भंग तो ककया है ककन्तु वह उस े वाहक के रूप में न्यथत नह ं की गई थी । वह धारा 316 की उपधारा (2) के अधीन आपराधधक न्यास-भंग के लिए दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । (ि) क पर घोर उपहनत काररत करन े के लिए भारतीय न्याय संहहता, 2023 की 2023 का 45 धारा 117 की उपधारा (2) के अधीन आरोप है । वह साबबत कर देता है कक उसने घोर और आकस्थमक प्रकोपन पर काय ष ककया था । वह उस संहहता की धारा 122 की उपधारा (2) के अधीन दोर्लसद्ध ककया जा सकेगा । ककन व्यस्क्ट् तयों 246. ननम् नलिखित व्यस्क्ट् तयों पर एक साथ आरोप िगाया जा सकेगा और उनका पर संयुक्ट्त रूप एक साथ ववचारण ककया जा सकेगा, अथाषत ् :— से आरोप िगाया (क) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर एक ह संव्यवहार के अनुिम में ककए गए एक ह जा सकेगा । अपराध का अलभयोग है ; (ि) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर ककसी अपराध का अलभयोग है और वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर ऐसे अपराध का दष्ु प्रेरण या प्रयत् न करने का अलभयोग है ; (ग) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर बारह मास की अवधध के भीतर संयुक्ट् त रूप में उनके द्वारा ककए गए धारा 242 के अथाांतगतष एक ह ककथम के एक से अधधक अपराधों का अलभयोग है ; (घ) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर एक ह संव्यवहार के अनुिम में हदए गए लभन्न अपराधों का अलभयोग है ; (ङ) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर ऐसे अपराध का, स्जसके अन्तगषत चोर , उद्द पन, छि या आपराधधक दवुवनषनयोग भी है, अलभयोग है और वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर ऐसी संपवत्त को, स्जसका कब्जा प्रथम नालमत व्यस्क्ट् तयों द्वारा ककए गए ककसी ऐसे अपराध द्वारा अन्तररत ककया जाना अलभकधथत है, प्राप् त करन े या रि े रिने या उसके व्ययन या नछपाने में सहायता करन े का या ककसी ऐसे अंनतम नालमत अपराध का दष्ु प्रेरण या प्रयत् न करने का अलभयोग है ; (च) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर ऐसी चुराई हुई संपवत्त के बारे में, स्जसका कब्जा एक ह अपराध द्वारा अंतररत ककया गया है, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 2023 का 45 317 की उपधारा (2) और उपधारा (5) के, या उन धाराओं में से ककसी के अधीन अपराधों का अलभयोग है ; (छ) वे व्यस्क्ट् त, स्जन पर भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अध्याय 10 के 2023 का 45 अधीन कूटकृत लसक्ट् के के संबंध में ककसी अपराध का अलभयोग है और वे व्यस्क्ट् त स्जन पर उसी लसक्ट् के के संबधं में उक्ट् त अध्याय के अधीन ककसी भी अन्य अपराध का या ककसी ऐसे अपराध का दष्ु प्रेरण या प्रयत् न करने का अलभयोग है ; और इस अध्याय के पूववष ती भाग के उपबंध सब ऐसे आरोपों को यथािक्ट्य िागू होंगे : परन्तु जहां अनेक व्यस्क्ट् तयों पर पथृ क् अपराधों का आरोप िगाया जाता है और वे व्यस्क्ट् त इस धारा में ववननहदषष् ट कोहटयों में से ककसी में नह ं आत े हैं वहां मस्जथरेट या सेिन न्यायािय ऐसे सब व्यस्क्ट् तयों का ववचारण एक साथ कर सकता है यहद ऐसे व्यस्क्ट् त लिखित आवेदन द्वारा ऐसा चाहत े हैं और मस्जथरेट या सेिन न्यायािय का समाधान हो जाता है ककअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 269 उससे ऐसे व्यस्क्ट् तयों पर प्रनतकूि प्रभाव नह ं पडेगा और ऐसा करना समीचीन है । 247. जब एक ह व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध ऐसा आरोप ववरधचत ककया जाता है स्जसमें कई आरोपों में से एक के लिए एक से अधधक िीर् ष हैं और, जब उनमें स े एक या अधधक के लिए, दोर्लसद्धध कर द दोर्लसद्धध पर जाती है तब पररवाद या अलभयोजन का संचािन करन े वािा अधधकार न्यायािय की िेर् आरोपों को सम्मनत से िेर् आरोप या आरोपों को वापस िे सकता है या न्यायािय ऐसे आरोप या वापस िेना । आरोपों की जांच या ववचारण थवप्रेरणा से रोक सकता है और ऐसे वापस िेने का प्रभाव ऐसे आरोप या आरोपों से दोर्मुस्क्ट् त होगा ; ककन्तु यहद दोर्लसद्धध अपाथत कर द जाती है तो उक्ट् त न्यायािय (दोर्लसद्धध अपाथत करने वािे न्यायािय के आदेि के अधीन रहते हुए) ऐसे वापस लिए गए आरोप या आरोपों की जांच या ववचारण में आगे कायवष ाह कर सकता है । अध्याय 19 सेशन न्यायािय के समक्ष विचारण 248. सेिन न्यायािय के समि प्रत्येक ववचारण में, अलभयोजन का संचािन िोक ववचारण का संचािन िोक अलभयोजक द्वारा ककया जाएगा । अलभयोजक द्वारा ककया जाना । 249. जब अलभयुक्ट् त धारा 232 या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन अलभयोजन के मामिे के कथन मामि े की सुपुदषगी के अनुसरण में न्यायािय के समि उपस्थथत होता है या िाया जाता का आरंभ । है तब अलभयोजक अपने मामिे का कथन, अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध िगाए गए आरोप का वणनष करत े हुए और यह बताते हुए आरंभ करेगा कक वह अलभयुक्ट् त के दोर् को ककस साक्ष्य से साबबत करने की प्रथथापना करता है । 250. (1) अलभयुक्ट्त, धारा 232 के अधीन मामिे की सुपदु षगी की तार ि से साठ उन्मोचन । हदन की अवधध के भीतर उन्मोचन के लिए आवेदन कर सकेगा । (2) यहद मामिे के अलभिेि और उसके साथ द गई दथतावेजों पर ववचार कर िेन े पर, और इस ननलमत्त अलभयुक्ट् त और अलभयोजन के ननवेदन की सुनवाई कर िेने के पश् चात ् न्यायाधीि यह समझता है कक अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध कायवष ाह करन े के लिए पयाषप् त आधार नह ं है तो वह अलभयुक्ट् त को उन्मोधचत कर देगा और ऐसा करन े के अपने कारणों को िेिबद्ध करेगा । 251. (1) यहद पूवोक्ट् त रूप से ववचार और सुनवाई के पश्च ात,् न्यायाधीि की यह आरोप ववरधचत करना । राय है कक ऐसी उपधारणा करन े का आधार है कक अलभयुक्ट् त ने ऐसा अपराध ककया है जो,— (क) अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय नह ं है तो वह, अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आरोप ववरधचत कर सकता है और आदेि द्वारा, मामि े को ववचारण के लिए मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को अन्तररत कर सकता है या कोई अन्य प्रथम वग ष न्यानयक मस्जथरेट, ऐसी तार ि को जो वह ठीक समझ,े अलभयुक्ट् त को मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या प्रथम वग ष न्यानयक मस्जथरेट के समि हास्जर होने का ननदेि दे सकेगा, और तब ऐसा मस्जथरेट उस मामि े का ववचारण पुलिस ररपोटष पर संस्थथत वारंट मामिों के ववचारण के लिए प्रकिया के अनुसार करेगा ;270 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) अनन्यत: उस न्यायािय द्वारा ववचारणीय है तो वह, अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आरोप पर सुनवाई की पहि तार ि से साठ हदन की अवधध के भीतर आरोप लिखित रूप में ववरधचत करेगा । (2) जहां न्यायाधीि उपधारा (1) के िंड (ि) के अधीन कोई आरोप ववरधचत करता है, वहां वह आरोप या तो िार ररक रूप से या श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों से उपस्थथत अलभयुक्ट् त को प़िकर सुनाया और समझाया जाएगा और अलभयुक्ट् त से यह पूछा जाएगा कक क्ट्या वह उस अपराध का, स्जसका आरोप िगाया गया है, दोर्ी होने का अलभवचन करता है या ववचारण ककए जाने का दावा करता है । दोर्ी होने के 252. यहद अलभयुक्ट् त दोर्ी होने का अलभवचन करता है तो न्यायाधीि उस अलभवाक् अलभवचन । को िेिबद्ध करेगा और उसके आधार पर उस,े थववववेकानुसार, दोर्लसद्ध कर सकता है । अलभयोजन 253. यहद अलभयुक्ट् त अलभवचन करन े से इंकार करता है या अलभवचन नह ं करता साक्ष्य के लिए है या ववचारण ककए जाने का दावा करता है या धारा 252 के अधीन लसद्धदोर् नह ं तार ि । ककया जाता है तो न्यायाधीि साक्षियों की पर िा करन े के लिए तार ि ननयत करेगा और अलभयोजन के आवेदन पर ककसी सािी को उपस्थथत होने या कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करन े को वववि करन े के लिए कोई आदेलिका जार कर सकता है । अलभयोजन के 254. (1) ऐसे ननयत तार ि पर न्यायाधीि ऐसा सब साक्ष्य िेने के लिए अग्रसर लिए साक्ष्य । होगा जो अलभयोजन के समथनष में प्रथतुत ककया जाए : परंतु इस उपधारा के अधीन सािी का साक्ष्य, श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों से अलभलिखित ककया जा सकेगा । (2) ककसी िोक सेवक का श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से साक्ष्य का अलभसाक्ष्य लिया जा सकेगा । (3) न्यायाधीि, थववववेकानुसार, ककसी सािी की प्रनतपर िा तब तक के लिए, जब तक ककसी अन्य सािी या साक्षियों की पर िा न कर ि जाए, आथथधगत करन े की अनुज्ञा दे सकता है या ककसी सािी को अनतररक्ट् त प्रनतपर िा के लिए पुन: बुिा सकता है । दोर्मुस्क्ट् त । 255. यहद सम्बद्ध ववर्य के बारे में अलभयोजन का साक्ष्य िेने, अलभयुक्ट् त की पर िा करन े और अलभयोजन और प्रनतरिा को सुनन े के पश् चात ् न्यायाधीि का यह ववचार है कक इस बात का साक्ष्य नह ं है कक अलभयुक्ट् त ने अपराध ककया है तो न्यायाधीि दोर्मुस्क्ट् त का आदेि अलभलिखित करेगा । प्रनतरिा आरंभ 256. (1) जहां अलभयुक्ट् त धारा 255 के अधीन दोर्मुक्ट् त नह ं ककया जाता है वहां करना । उसस े अपेिा की जाएगी कक अपनी प्रनतरिा आरंभ करे और कोई भी साक्ष्य जो उसके समथनष में उसके पास हो प्रथतुत करे । (2) यहद अलभयुक्ट् त कोई लिखित कथन देता है तो न्यायाधीि उस े अलभिेि में फाइि करेगा । (3) यहद अलभयुक्ट् त ककसी सािी को उपस्थथत होने या कोई दथतावेज या चीज प्रथतुत करन े को वववि करन े के लिए कोई आदेलिका जार करन े के लिए आवेदन करता है तो न्यायाधीि ऐसी आदेलिका जार करेगा जब तक उसका ऐसे कारणों से, जोअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 271 िेिबद्ध ककए जाएंगे, यह ववचार न हो कक आवेदन इस आधार पर नामंजूर कर हदया जाना चाहहए कक वह तंग करन े या वविंब करन े या न्याय के उद्देश्यों को ववफि करन े के प्रयोजन से ककया गया है । 257. जब प्रनतरिा के साक्षियों की (यहद कोई हों) पर िा समाप् त हो जाती है, तो बहस । अलभयोजक अपने मामिे का उपसंहार करेगा और अलभयुक्ट् त या उसका अधधवक्ट्ता उत्तर देने का हकदार होगा : परन्तु जहां अलभयुक्ट् त या उसका अधधवक्ट्ता कोई ववधध-प्रश् न उठाता है, वहां अलभयोजन न्यायाधीि की अनुज्ञा से, ऐसे ववधध-प्रश् नों पर अपना ननवेदन कर सकता है । 258. (1) बहस और ववधध-प्रश् न (यहद कोई हो) सुनने के पश् चात ् न्यायाधीि दोर्मुस्क्ट् त या दोर्लसद्धध का यथािीघ्र बहस पूण ष होने की तार ि से तीस हदन की अवधध के भीतर मामिे में ननणयष ननणयष । देगा, स्जसे उन कारणों को िेिबद्ध करते हुए पतैं ाि स हदन की अवधध तक ब़िाया जा सकेगा । (2) यहद अलभयुक्ट् त दोर्लसद्ध ककया जाता है तो न्यायाधीि, उस दिा के लसवाय, स्जसमें वह धारा 401 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह करता है, दंड के प्रश् न पर अलभयुक्ट् त को सुनेगा और तब ववधध के अनुसार उसके बारे में दंडादेि देगा । 259. ऐसे मामिे में, स्जसमें धारा 234 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन पूवष पूव ष दोर्लसद्धध। दोर्लसद्धध का आरोप िगाया गया है और अलभयुक्ट् त यह थवीकार नह ं करता है कक आरोप में ककए गए अलभकथन के अनुसार उस े पहिे दोर्लसद्ध ककया गया था, न्यायाधीि उक्ट् त अलभयुक्ट् त को धारा 252 या धारा 258 के अधीन दोर्लसद्ध करन े के पश् चात ् अलभकधथत पूव ष दोर्लसद्धध के बारे में साक्ष्य िे सकेगा और उस पर ननष्कर् ष अलभलिखित करेगा : परन्तु जब तक अलभयुक्ट् त धारा 252 या धारा 258 के अधीन दोर्लसद्ध नह ं कर हदया जाता है तब तक न तो ऐसा आरोप न्यायाधीि द्वारा प़िकर सुनाया जाएगा, न अलभयुक्ट् त से उस पर अलभवचन करन े को कहा जाएगा और न पूव ष दोर्लसद्धध का ननदेि अलभयोजन द्वारा, या उसके द्वारा हदए गए ककसी साक्ष्य में, ककया जाएगा । 260. (1) धारा 222 की उपधारा (2) के अधीन अपराध का संज्ञान करने वािा धारा 222 की उपधारा (2) के सेिन न्यायािय मामिे का ववचारण, मस्जथरेट के न्यायािय के समि पुलिस ररपोटष से अधीन संस्थथत लभन्न आधार पर संस्थथत ककए गए वारंट मामिों के ववचारण की प्रकिया के अनुसार, मामिों में करेगा : प्रकिया । परन्तु जब तक सेिन न्यायािय उन कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, अन्यथा ननदेि नह ं देता है उस व्यस्क्ट् त की, स्जसके ववरुद्ध अपराध का ककया जाना अलभकधथत है अलभयोजन के सािी के रूप में पर िा की जाएगी । (2) यहद ववचारण के दोनों पिकारों में स े कोई ऐसी वांछा करता है या यहद न्यायािय ऐसा करना ठीक समझता है तो इस धारा के अधीन प्रत्येक ववचारण बंद कमरे में ककया जाएगा । (3) यहद ऐस े ककसी मामिे में न्यायािय सब अलभयुक्ट् तों को या उनमें स े ककसी को उन्मोधचत या दोर्मुक्ट् त करता है और उसकी यह राय है कक उनके या उनमें से ककसी के ववरुद्ध अलभयोग िगाने का उधचत कारण नह ं था तो वह उन्मोचन या दोर्मुस्क्ट् त के272 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अपने आदेि द्वारा (राष् रपनत या उपराष् रपनत या ककसी राज्य के राज्यपाि या ककसी सघं राज्यिेत्र के प्रिासक से लभन्न ) उस व्यस्क्ट् त को, स्जसके ववरुद्ध अपराध का ककया जाना अलभकधथत ककया गया था यह ननदेि दे सकेगा कक वह कारण दलितष करे कक वह उस अलभयुक्ट् त को या जब ऐसे अलभयुक्ट् त एक से अधधक हैं तब उनमें से प्रत्येक को या ककसी को प्रनतकर क्ट्यों न दे । (4) न्यायािय इस प्रकार ननदेलित व्यस्क्ट् त द्वारा दलितष ककसी कारण को िेिबद्ध करेगा और उस पर ववचार करेगा और यहद उसका समाधान हो जाता है कक अलभयोग िगाने का कोई उधचत कारण नह ं था, तो वह पांच हजार रुपए से अनधधक इतनी रकम का, स्जतनी वह अवधाररत करे, प्रनतकर उस व्यस्क्ट् त द्वारा अलभयुक्ट् त को या, उनमें स े प्रत्येक को या ककसी को, हदए जाने का आदेि, उन कारणों से जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, दे सकेगा । (5) उपधारा (4) के अधीन अधधननणीत प्रनतकर ऐसे वसूि ककया जाएगा मानो वह मस्जथरेट द्वारा अधधरोवपत ककया गया जुमाषना हो । (6) उपधारा (4) के अधीन प्रनतकर देने के लिए स्जस व्यस्क्ट् त को आदेि हदया जाता है उस े ऐस े आदेि के कारण इस धारा के अधीन ककए गए पररवाद के बारे में ककसी लसववि या दांडडक दानयत्व से छूट नह ं द जाएगी : परन्तु अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को इस धारा के अधीन द गई कोई रकम, उसी मामिे स े संबंधधत ककसी पश् चात व् ती लसववि वाद में उस व्यस्क्ट् त के लिए प्रनतकर अधधननणीत करते समय हहसाब में ि जाएगी । (7) उपधारा (4) के अधीन प्रनतकर देने के लिए स्जस व्यस्क्ट् त को आदेि हदया जाता है वह उस आदेि की अपीि, जहां तक वह प्रनतकर के संदाय के संबंध में है, उच् च न्यायािय में कर सकता है । (8) जब ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को प्रनतकर हदए जान े का आदेि ककया जाता है, तब उसे ऐसा प्रनतकर, अपीि प्रथतुत करन े के लिए अनुज्ञात अवधध के बीत जान े के पूव,ष या यहद अपीि प्रथतुत कर द गई है तो अपीि के ववननस्श् चत कर हदए जाने के पूव,ष नह ं हदया जाएगा । अध्याय 20 मक्िस्रेटों दिारा िारंट-मामिों का विचारण क—पुलिस ररपोटा पर संक्स्थत मामि े धारा 230 का 261. जब पुलिस ररपोटष पर संस्थथत ककसी वारंट-मामिे में अलभयुक्ट् त ववचारण के अनुपािन । प्रारंभ में मस्जथरेट के समि उपस्थथत होता है या िाया जाता है तब मस्जथरेट अपना यह समाधान कर िेगा कक उसने धारा 230 के उपबंधों का अनपु ािन कर लिया है । जब अलभयुक्ट्त 262. (1) यहद अलभयुक्ट्त, धारा 230 के अधीन दथतावेजों की प्रनतयां देने की का उन्मोचन तार ि से साठ हदन की अवधध के भीतर उन्मोचन के लिए आवेदन कर सकेगा । ककया जाएगा । (2) यहद धारा 193 के अधीन पुलिस ररपोटष और उसके साथ भेजी गई दथतावेजों पर ववचार कर िेन े पर और अलभयुक्ट् त की, या तो व्यस्क्ट्तगत रूप से या श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों द्वारा, ऐसी पर िा, यहद कोई हो, जसै ी मस्जथरेट आवश्यक समझ,ेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 273 कर िेने पर और अलभयोजन और अलभयुक्ट् त को सुनवाई का अवसर देने के पश् चात ् मस्जथरेट अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आरोप को ननराधार समझता है तो वह उस े उन्मोधचत कर देगा और ऐसा करने के अपने कारण िेिबद्ध करेगा । 263. (1) यहद ऐसे ववचार, पर िा, यहद कोई हो, और सुनवाई कर िेने पर आरोप ववरधचत करना । मस्जथरेट की यह राय है कक ऐसी उपधारणा करने का आधार है कक अलभयुक्ट् त ने इस अध्याय के अधीन ववचारणीय ऐसा अपराध ककया है स्जसका ववचारण करने के लिए, वह मस्जथरेट सिम है और जो उसकी राय में उसके द्वारा पयाषप् त रूप से दंडडत ककया जा सकता है तो वह अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आरोप की पहि सुनवाई की तार ि से साठ हदन की अवधध के भीतर लिखित रूप में ववरधचत करेगा । (2) तब वह आरोप अलभयुक्ट् त को प़ि कर सुनाया और समझाया जाएगा और उसस े यह पूछा जाएगा कक क्ट्या वह उस अपराध का, स्जसका आरोप िगाया गया है दोर्ी होने का अलभवाक् करता है या ववचारण ककए जाने का दावा करता है । 264. यहद अलभयुक्ट् त दोर्ी होने का अलभवाक् करता है तो मस्जथरेट उस अलभवाक् दोर्ी होने के को िेिबद्ध करेगा और उसके आधार पर उसे, थववववेकानुसार, दोर्लसद्ध कर सकेगा । अलभवाक् पर दोर्लसद्धध । 265. (1) यहद अलभयुक्ट् त अलभवाक् करने से इंकार करता है या अलभवाक् नह ं अलभयोजन के करता है या ववचारण ककए जाने का दावा करता है या मस्जथरेट अलभयुक्ट् त को धारा 264 लिए साक्ष्य । के अधीन दोर्लसद्ध नह ं करता है तो वह मस्जथरेट साक्षियों की पर िा के लिए तार ि ननयत करेगा : परंतु मस्जथरेट अलभयुक्ट् त को पुलिस द्वारा अन्वेर्ण के दौरान अलभलिखित ककए गए साक्षियों के कथन अधग्रम रूप से प्रदान करेगा । (2) मस्जथरेट, अलभयोजन के आवेदन पर उसके साक्षियों में से ककसी को उपस्थथत होने या कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करने का ननदेि देने वािा समन जार कर सकता है । (3) ऐसी ननयत तार ि पर मस्जथरेट ऐसा सभी साक्ष्य िने े के लिए अग्रसर होगा जो अलभयोजन के समथनष में प्रथतुत ककया जाता है : परन्तु मस्जथरेट ककसी सािी की प्रनतपर िा तब तक के लिए, जब तक ककसी अन्य सािी या साक्षियों की पर िा नह ं कर ि जाती है, आथथधगत करन े की अनुज्ञा दे सकेगा या ककसी सािी को अनतररक्ट् त प्रनतपर िा के लिए पुन: बिु ा सकेगा : परंतु यह और कक इस उपधारा के अधीन ककसी सािी की पर िा, राज्य सरकार द्वारा अधधसूधचत ककए जाने वािे अलभहहत थथान पर श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों द्वारा की जा सकेगी । 266. (1) तब अलभयुक्ट् त से अपेिा की जाएगी कक वह अपनी प्रनतरिा आरंभ करे प्रनतरिा का और अपना साक्ष्य प्रथतुत करे ; और यहद अलभयुक्ट् त कोई लिखित कथन देता है तो साक्ष्य । मस्जथरेट उस े अलभिेि में फाइि करेगा । (2) यहद अलभयुक्ट् त अपनी प्रनतरिा आरंभ करन े के पश् चात ् मस्जथरेट स े आवेदन करता है कक वह पर िा या प्रनतपर िा के, या कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करने के प्रयोजन से उपस्थथत होने के लिए ककसी सािी को वववि करन े के लिए कोई274 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— आदेलिका जार करे तो, मस्जथरेट ऐसी आदेलिका जार करेगा जब तक उसका यह ववचार न हो कक ऐसा आवेदन इस आधार पर नामंजूर कर हदया जाना चाहहए कक वह तंग करने के या वविंब करन े के या न्याय के उद्देश्यों को ववफि करन े के प्रयोजन से ककया गया है, और ऐसा कारण उसके द्वारा िेिबद्ध ककया जाएगा : परन्तु जब अपनी प्रनतरिा आरंभ करन े के पूव ष अलभयुक्ट् त ने ककसी सािी की प्रनतपर िा कर ि है या उस े प्रनतपर िा करन े का अवसर लमि चुका है तब ऐस े सािी को उपस्थथत होने के लिए इस धारा के अधीन तब तक वववि नह ं ककया जाएगा जब तक मस्जथरेट का यह समाधान नह ं हो जाता है कक ऐसा करना न्याय के प्रयोजनों के लिए आवश्यक है : परन्तु यह और कक इस उपधारा के अधीन ककसी सािी की पर िा राज्य सरकार द्वारा अधधसूधचत ककए जाने वाि े ककसी अलभहहत थथान पर श्रव्य-्दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों द्वारा की जा सकेगी । (3) मस्जथरेट उपधारा (2) के अधीन ककसी आवेदन पर ककसी सािी को समन करन े के पूव ष यह अपेिा कर सकता है कक ववचारण के प्रयोजन के लिए उपस्थथत होने में उस सािी द्वारा ककए जान े वािे उधचत व्यय न्यायािय में जमा कर हदए जाएं । ख—पुलिस ररपोटा से लभन्न आिार पर संक्स्थत मामि े अलभयोजन का 267. (1) जब पुलिस ररपोटष से लभन्न आधार पर संस्थथत ककसी वारंट-मामिे में साक्ष्य । मस्जथरेट के समि अलभयुक्ट् त उपस्थथत होता है या िाया जाता है तब मस्जथरेट अलभयोजन को सुनने के लिए और ऐसा सब साक्ष्य िेने के लिए अग्रसर होगा जो अलभयोजन के समथनष में प्रथतुत ककया जाए । (2) मस्जथरेट, अलभयोजन के आवेदन पर, उसके साक्षियों में से ककसी को उपस्थथत होने या कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करने का ननदेि देने वािा समन जार कर सकता है । अलभयुक्ट् त को 268. (1) यहद धारा 267 में ननहदषष् ट सब साक्ष्य िेने पर मस्जथरेट का, उन कारणों कब उन्मोधचत से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, यह ववचार है कक अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध ऐसा कोई मामिा ककया जाएगा । लसद्ध नह ं हुआ है जो अिंडडत रहने पर उसकी दोर्लसद्धध के लिए समुधचत आधार हो तो मस्जथरेट उसको उन्मोधचत कर देगा । (2) इस धारा की कोई बात मस्जथरेट को मामि े के ककसी पूवतष न प्रिम में अलभयुक्ट् त को उस दिा में उन्मोधचत करने से ननवाररत करन े वाि न समझी जाएगी स्जसमें ऐसा मस्जथरेट ऐस े कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, यह ववचार करता है कक आरोप ननराधार है । प्रकिया, जहां 269. (1) यहद ऐसा साक्ष्य िे लिए जाने पर या मामि े के ककसी पूवतष न प्रिम में अलभयुक्ट् त मस्जथरेट की यह राय है कक ऐसी उपधारणा करने का आधार है कक अलभयुक्ट् त ने इस उन्मोधचत नह ं अध्याय के अधीन ववचारणीय ऐसा अपराध ककया है स्जसका ववचारण करन े के लिए वह ककया जाता । मस्जथरेट सिम है और जो उसकी राय में उसके द्वारा पयाषप् त रूप से दंडडत ककया जा सकता है तो वह अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध आरोप लिखित रूप में ववरधचत करेगा । (2) तब वह आरोप अलभयुक्ट् त को प़िकर सुनाया और समझाया जाएगा और उसस े पूछा जाएगा कक क्ट्या वह दोर्ी होने का अलभवाक् करता है या प्रनतरिा करना चाहता है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 275 (3) यहद अलभयुक्ट् त दोर्ी होने का अलभवाक् करता है तो मस्जथरेट उस अलभवाक् को िेिबद्ध करेगा और उसके आधार पर उस,े थववववेकानुसार, दोर्लसद्ध कर सकेगा । (4) यहद अलभयुक्ट् त अलभवाक् करन े से इंकार करता है या अलभवाक् नह ं करता है या ववचारण ककए जाने का दावा करता है या यहद अलभयुक्ट् त को उपधारा (3) के अधीन दोर्लसद्ध नह ं ककया जाता है तो उसस े अपेिा की जाएगी कक वह मामिे की अगि सुनवाई के प्रारंभ में, या, यहद मस्जथरेट उन कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, ऐसा ठीक समझता है तो, तत्काि बताए कक क्ट्या वह अलभयोजन के उन साक्षियों में से, स्जनका साक्ष्य लिया जा चुका है, ककसी की प्रनतपर िा करना चाहता है और, यहद करना चाहता है तो ककस की । (5) यहद वह कहता है कक वह ऐसा चाहता है तो उसके द्वारा नालमत साक्षियों को पुन: बुिाया जाएगा और प्रनतपर िा के और पुन:पर िा (यहद कोई हो) के पश् चात ् वे उन्मोधचत कर हदए जाएंगे । (6) कफर अलभयोजन के ककन्ह ं िेर् साक्षियों का साक्ष्य लिया जाएगा और प्रनतपर िा के और पुन:पर िा (यहद कोई हो) के पश् चात ् वे भी उन्मोधचत कर हदए जाएंगे । (7) जहां इस संहहता के अधीन अलभयोजन को अवसर हदए जाने के बावजूद और सभी युस्क्ट्तयुक्ट्त उपाय ककए जाने के पश्चात,् यहद उपधारा (5) और उपधारा (6) के अधीन अलभयोजन साक्षियों की उपस्थथनत प्रनतपर िा के लिए सुननस्श्चत नह ं की जा सकती है, तो यह माना जाएगा कक सािी के उपिब्ध न होने के कारण ऐसे सािी की पर िा नह ं की गई है, और मस्जथरेट ऐस े कारणों स े जो िेिबद्ध ककए जाएं अलभयोजन साक्ष्य को बंद कर सकेगा और अलभिेि पर की सामधग्रयों के आधार पर मामिे में कायवष ाह कर सकेगा । 270. तब अलभयुक्ट् त से अपेिा की जाएगी कक वह अपनी प्रनतरिा आरंभ करे और प्रनतरिा का साक्ष्य । अपना साक्ष्य प्रथतुत करे और मामि े को धारा 266 के उपबंध िागू होंगे । ग—विचारण की समाक्‍ त 271. (1) यहद इस अध्याय के अधीन ककसी मामि े में, स्जसमें आरोप ववरधचत दोर्मुस्क्ट् त या दोर्लसद्धध । ककया गया है, मस्जथरेट इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त दोर्ी नह ं है तो वह दोर्मुस्क्ट् त का आदेि अलभलिखित करेगा । (2) जहां इस अध्याय के अधीन ककसी मामि े में मस्जथरेट इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त दोर्ी है ककन्तु वह धारा 364 या धारा 401 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह नह ं करता है वहां वह दंड के प्रश् न पर अलभयुक्ट् त को सुनन े के पश् चात ् ववधध के अनुसार उसके बारे में दंडादेि दे सकता है । (3) जहां इस अध्याय के अधीन ककसी मामिे में धारा 234 की उपधारा (7) के उपबंधों के अधीन पूव ष दोर्लसद्धध का आरोप िगाया गया है और अलभयुक्ट् त यह थवीकार नह ं करता है कक आरोप में ककए गए अलभकथन के अनुसार उस े पहिे दोर्लसद्ध ककया गया था वहां मस्जथरेट उक्ट् त अलभयुक्ट् त को दोर्लसद्ध करन े के पश् चात ् अलभकधथत पूव ष दोर्लसद्धध के बारे में साक्ष्य िे सकेगा और उस पर ननष्कर् ष अलभलिखित करेगा : परन्तु जब तक अलभयुक्ट् त उपधारा (2) के अधीन दोर्लसद्ध नह ं कर हदया जाता है276 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तब तक न तो ऐसा आरोप मस्जथरेट द्वारा प़िकर सुनाया जाएगा, न अलभयुक्ट् त से उस पर अलभवचन करने को कहा जाएगा, और न पूव ष दोर्लसद्धध का ननदेि अलभयोजन द्वारा, या उसके द्वारा हदए गए ककसी साक्ष्य में, ककया जाएगा । पररवाद की 272. जब कायवष ाह पररवाद पर संस्थथत की जाती है और मामि े की सुनवाई के अनुपस्थथनत । लिए ननयत ककसी हदन पररवाद अनुपस्थथत है और अपराध का ववधधपूवकष िमन ककया जा सकता है या वह संज्ञेय अपराध नह ं है तब मस्जथरेट, इसमें इसके पूव ष ककसी बात के होत े हुए भी, आरोप के ववरधचत ककए जाने के पूव ष ककसी भी समय अलभयुक्ट् त को, थववववेकानुसार, पररवाद को उपस्थथत होने के लिए तीस हदन का समय देने के पश्चात ् उन्मोधचत कर सकेगा । उधचत कारण के 273. (1) यहद पररवाद पर या पुलिस अधधकार या मस्जथरेट को द गई सूचना पर बबना अलभयोग संस्थथत ककसी मामिे में मस्जथरेट के समि एक या अधधक व्यस्क्ट् तयों पर मस्जथरेट के लिए द्वारा ववचारणीय ककसी अपराध का अलभयोग है और वह मस्जथरेट स्जसके द्वारा मामिे प्रनतकर । की सुनवाई होती है, सब अलभयुक्ट् तों को या उनमें से ककसी को उन्मोधचत या दोर्मुक्ट् त कर देता है और उसकी यह राय है कक उनके या उनमें से ककसी के ववरुद्ध अलभयोग िगाने का कोई उधचत कारण नह ं था तो वह मस्जथरेट उन्मोचन या दोर्मुस्क्ट् त के अपने आदेि द्वारा, यहद वह व्यस्क्ट् त स्जसके पररवाद या सूचना पर अलभयोग िगाया गया था उपस्थथत है तो उससे अपेिा कर सकेगा कक वह तत्काि कारण दलितष करे कक वह उस अलभयुक्ट् त को, या जब ऐस े अलभयुक्ट् त एक से अधधक हैं तो उनमें स े प्रत्येक को या ककसी को प्रनतकर क्ट्यों न दे या यहद ऐसा व्यस्क्ट् त उपस्थथत नह ं है तो उपस्थथत होने और उपयुक्ट्ष त रूप से कारण दलितष करन े के लिए उसके नाम समन जार ककए जान े का ननदेि दे सकेगा । (2) मस्जथरेट ऐसा कोई कारण, जो ऐसा पररवाद या सूचना देने वािा दलितष करता है, अलभलिखित करेगा और उस पर ववचार करेगा और यहद उसका समाधान हो जाता है कक अलभयोग िगाने का कोई उधचत कारण नह ं था तो स्जतनी रकम का जुमाषना करन े के लिए वह सिक्ट् त है, उसस े अनधधक इतनी रकम का, स्जतनी वह अवधाररत करे, प्रनतकर ऐसे पररवाद या सूचना देने वािे द्वारा अलभयुक्ट् त को या उनमें से प्रत्येक को या ककसी को हदए जाने का आदेि, ऐसे कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, दे सकेगा । (3) मस्जथरेट उपधारा (2) के अधीन प्रनतकर हदए जाने का ननदेि देने वाि े आदेि द्वारा यह अनतररक्ट् त आदेि दे सकेगा कक वह व्यस्क्ट् त, जो ऐसा प्रनतकर देने के लिए आदेलित ककया गया है, संदाय में व्यनतिम होने पर तीस हदन से अनधधक की अवधध के लिए साधारण कारावास भोगेगा । (4) जब ककसी व्यस्क्ट् त को उपधारा (3) के अधीन कारावास हदया जाता है तब भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 8 की उपधारा (6) के उपबंध, जहां तक हो सके, 2023 का 45 िागू होंगे । (5) इस धारा के अधीन प्रनतकर देने के लिए स्जस व्यस्क्ट् त को आदेि हदया जाता है, ऐसे आदेि के कारण उस े अपने द्वारा ककए गए ककसी पररवाद या द गई ककसी सूचना के बारे में ककसी लसववि या दांडडक दानयत्व से छूट नह ं द जाएगी : परन्तु अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को इस धारा के अधीन द गई कोई रकम उसी मामिे स ेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 277 संबंधधत ककसी पश् चात व् ती लसववि वाद में उस व्यस्क्ट् त के लिए प्रनतकर अधधननणीत करते समय हहसाब में ि जाएगी । (6) कोई पररवाद या सूचना देने वािा, जो द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा उपधारा (2) के अधीन दो हजार रुपए से अधधक प्रनतकर देने के लिए आदेलित ककया गया है, उस आदेि की अपीि ऐसे कर सकेगा मानो वह पररवाद या सूचना देने वािा ऐसे मस्जथरेट द्वारा ककए गए ववचारण में दोर्लसद्ध ककया गया है । (7) जब ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को ऐस े मामि े में, जो उपधारा (6) के अधीन अपीिनीय है, प्रनतकर हदए जाने का आदेि ककया जाता है तब उस े ऐसा प्रनतकर, अपीि प्रथतुत करन े के लिए अनुज्ञात अवधध के बीत जाने के पूव ष या यहद अपीि प्रथतुत कर द गई है तो अपीि के ववननस्श् चत कर हदए जाने के पूव ष न हदया जाएगा और जहां ऐसा आदेि ऐसे मामि े में हुआ है, जो ऐसे अपीिनीय नह ं है, वहां ऐसा प्रनतकर आदेि की तार ि से एक मास की समास्प् त के पूव ष नह ं हदया जाएगा । (8) इस धारा के उपबंध समन-मामिों तथा वारंट-मामिों दोनों को िागू होंगे । अध्याय 21 मक्िस्रेट दिारा समन-मामिों का विचारण 274. जब समन-मामिे में अलभयुक्ट् त मस्जथरेट के समि उपस्थथत होता है या िाया अलभयोग का सारांि बताया जाता है, तब उसे उस अपराध की ववलिस्ष् टयां बताई जाएंगी स्जसका उस पर अलभयोग है, जाना । और उससे पूछा जाएगा कक क्ट्या वह दोर्ी होन े का अलभवाक् करता है या प्रनतरिा करना चाहता है; ककन्तु यथा र नत आरोप ववरधचत करना आवश्यक न होगा : परंतु यहद मस्जथरेट अलभयोग को आधारह न समझता है, तो वह ऐसे कारणों से जो िेिबद्ध ककए जाएं, अलभयुक्ट्त को छोड देगा और ऐस े छोडे जाने का प्रभाव उन्मोचन होगा । 275. यहद अलभयुक्ट् त दोर्ी होन े का अलभवाक् करता है तो मस्जथरेट अलभयुक्ट् त का दोर्ी होने के अलभवाक् पर अलभवाक् यथासंभव उन्ह ं िब्दों में िेिबद्ध करेगा स्जनका अलभयुक्ट् त ने प्रयोग ककया है दोर्लसद्धध । और उसके आधार पर उस,े थववववेकानुसार, दोर्लसद्ध कर सकेगा । 276. (1) जहां धारा 229 के अधीन समन जार ककया जाता है और अलभयुक्ट् त छोटे मामिों में अलभयुक्ट् त की मस्जथरेट के समि उपस्थथत हुए बबना आरोप का दोर्ी होने का अलभवाक् करना चाहता अनुपस्थथनत में है, वहां वह अपना अलभवाक् अन्तववष्ष ट करने वािा एक पत्र और समन में ववननहदषष् ट दोर्ी होने के जुमाषन े की रकम डाक या संदेिवाहक द्वारा मस्जथरेट को भेजेगा । अलभवाक् पर दोर्लसद्धध । (2) तब मस्जथरेट, थववववेकानुसार, अलभयुक्ट् त को उसके दोर्ी होने के अलभवाक् के आधार पर उसकी अनुपस्थथनत में दोर्लसद्ध करेगा और समन में ववननहदषष् ट जुमाषना देने के लिए दडडादेि देगा और अलभयुक्ट् त द्वारा भेजी गई रकम उस जुमाषने में समायोस्जत की जाएगी या जहां अलभयुक्ट् त द्वारा इस ननलमत्त प्राधधकृत अधधवक्ट्ता अलभयुक्ट् त की ओर से उसके दोर्ी होने का अलभवाक् करता है वहां मस्जथरेट यथासंभव अधधवक्ट्ता द्वारा प्रयुक्ट् त ककए गए िब्दों में अलभवाक् को िेिबद्ध करेगा और थववववेकानुसार उस अलभयुक्ट् त को ऐसे अलभवाक् पर दोर्लसद्ध कर सकेगा और उस े यथापूवोक्ट् त दडडादेि दे सकेगा ।278 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— प्रकिया जब 277. (1) यहद मस्जथरेट अलभयुक्ट् त को धारा 275 या धारा 276 के अधीन दोर्लसद्ध न दोर्लसद्ध नह ं करता है तो वह अलभयोजन को सुनने के लिए और सब ऐसा साक्ष्य, जो ककया जाए । अलभयोजन के समथषन में प्रथतुत ककया जाए, िेने के लिए और अलभयुक्ट् त को भी सुनने के लिए और सब ऐसा साक्ष्य, जो वह अपनी प्रनतरिा में प्रथतुत करे, िेने के लिए, अग्रसर होगा । (2) यहद मस्जथरेट अलभयोजन या अलभयुक्ट् त के आवेदन पर ठीक समझता है, तो वह ककसी सािी को उपस्थथत होने या कोई दथतावेज या अन्य चीज प्रथतुत करने का ननदेि देने वािा समन जार कर सकता है । (3) मस्जथरेट ऐसे आवेदन पर ककसी सािी को समन करन े के पूव ष यह अपेिा कर सकता है कक ववचारण के प्रयोजनों के लिए उपस्थथत होन े में ककए जान े वािे उसके उधचत व्यय न्यायािय में जमा कर हदए जाएं । दोर्मुस्क्ट् त या 278. (1) यहद मस्जथरेट धारा 277 में ननहदषष् ट साक्ष्य और ऐसा अनतररक्ट् त साक्ष्य, दोर्लसद्धध । यहद कोई हो, जो वह थवप्रेरणा स े प्रथतुत करवाए, िेने पर इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त दोर्ी नह ं है तो वह दोर्मुस्क्ट् त का आदेि अलभलिखित करेगा । (2) जहां मस्जथरेट धारा 364 या धारा 401 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह नह ं करता है वहां यहद वह इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त दोर्ी है तो वह ववधध के अनुसार उसके बारे में दंडादेि दे सकेगा । (3) कोई मस्जथरेट, धारा 275 या धारा 278 के अधीन, ककसी अलभयुक्ट् त को, चाहे पररवाद या समन ककसी भी प्रकार का रहा हो, इस अध्याय के अधीन ववचारणीय ककसी भी ऐसे अपराध के लिए, जो थवीकृत या साबबत तथ्यों से उसके द्वारा ककया गया प्रतीत होता है, दोर्लसद्ध कर सकता है यहद मस्जथरेट का समाधान हो जाता है कक उससे अलभयुक्ट् त पर कोई प्रनतकूि प्रभाव नह ं पडेगा । पररवाद का 279. (1) यहद पररवाद पर समन जार कर हदया गया हो और अलभयुक्ट् त की उपस्थथत न उपस्थथनत के लिए ननयत हदन को, या उसके पश् चातव ् ती ककसी हदन, स्जसके लिए सुनवाई होना या उसकी थथधगत की जाती है, पररवाद उपस्थथत नह ं होता है तो, मस्जथरेट पररवाद को उपस्थथत मत्ृ यु । होने के लिए तीस हदन का समय देने के पश्चात ् इसमें इसके पूव ष ककसी बात के होत े हुए भी, अलभयुक्ट् त को दोर्मुक्ट् त कर देगा जब तक कक वह ककन्ह ं कारणों से ककसी अन्य हदन के लिए मामि े की सुनवाई थथधगत करना ठीक न समझे : परन्तु जहां पररवाद का प्रनतननधधत्व अधधवक्ट्ता द्वारा या अलभयोजन का संचािन करन े वािे अधधकार द्वारा ककया जाता है या जहां मस्जथरेट की यह राय है कक पररवाद की वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत आवश्यक नह ं है वहां मस्जथरेट उसकी उपस्थथनत से उस े अलभमुस्क्ट् त दे सकता है और मामि े में कायवष ाह कर सकता है । (2) उपधारा (1) के उपबंध, जहां तक हो सके, उन मामिों को भी िागू होंगे, जहां पररवाद के उपस्थथत न होने का कारण उसकी मत्ृ यु है । पररवाद को 280. यहद पररवाद ककसी मामि े में इस अध्याय के अधीन अंनतम आदेि पाररत वापस िेना । ककए जाने के पूव ष ककसी समय मस्जथरेट का समाधान कर देता है कक अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध, या जहां एक से अधधक अलभयुक्ट् त हैं वहां उन सब या उनमें से ककसी के ववरुद्ध उसका पररवाद वापस िेने की उस े अनुज्ञा देने के लिए पयाषप् त आधार है तो मस्जथरेट उस ेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 279 पररवाद वापस िेने की अनुज्ञा दे सकेगा और तब उस अलभयुक्ट् त को, स्जसके ववरुद्ध पररवाद इस प्रकार वापस लिया जाता है, दोर्मुक्ट् त कर देगा । 281. पररवाद स े लभन्न आधार पर संस्थथत ककसी समन-मामिे में कोई प्रथम वग ष कुछ मामिों में कायवष ाह रोक मस्जथरेट या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट की पूव ष मंजूर स े कोई अन्य न्यानयक मस्जथरेट देने की ऐसे कारणों से, जो उसके द्वारा िेिबद्ध ककए जाएंगे, कायवष ाह को ककसी भी प्रिम में िस्क्ट् त । कोई ननणयष सुनाए बबना रोक सकता है और जहां मुख्य साक्षियों के साक्ष्य को अलभलिखित ककए जाने के पश् चात ् इस प्रकार कायवष ाहहयां रोकी जाती हैं वहा ं दोर्मुस्क्ट्त का ननणषय सुना सकता है और ककसी अन्य दिा में अलभयुक्ट् त को छोड सकता है और ऐसे छोडने का प्रभाव उन्मोचन होगा । 282. जब ककसी ऐस े अपराध से संबंधधत समन-मामिे के ववचारण के दौरान जो समन-मामिों को वारंट-मामिों में छह मास से अधधक अवधध के कारावास से दंडनीय है, मस्जथरेट को यह प्रतीत होता है संपररवनततष कक न्याय के हहत में उस अपराध का ववचारण वारंट-मामिों के ववचारण की प्रकिया के करन े की अनुसार ककया जाना चाहहए तो ऐसा मस्जथरेट वारंट-मामिों के ववचारण के लिए इस न्यायािय की िस्क्ट्त । संहहता द्वारा उपबंधधत र नत से उस मामि े की पुन: सनु वाई कर सकता है और ऐसे साक्षियों को पुन: बुिा सकता है स्जनकी पर िा की जा चुकी है । अध्याय 22 संक्षक्ष‍ त विचारण 283. (1) इस संहहता में ककसी बात के होत े हुए भी,— संक्षिप्त ववचारण करन े (क) कोई मुख्य न्यानयक मस्जथरेट ; की िस्क्ट् त । (ि) कोई प्रथम वग ष मस्जथरेट, सभी ननम् नलिखित अपराधों का या उनमें से ककसी का संिेपत: ववचारण करेगा,— 2023 का 45 (i) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 303 की उपधारा (2), धारा 305 या धारा 306 के अधीन चोर , जहां चुराई हुई संपवत्त का मूलय बीस हजार रुपए से अधधक नह ं है ; 2023 का 45 (ii) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (2) के अधीन चोर की संपवत्त को प्राप् त करना या रि े रिना, जहां ऐसी संपवत्त का मूलय बीस हजार रुपए से अधधक नह ं है ; 2023 का 45 (iii) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (5) के अधीन चुराई हुई संपवत्त को नछपाने या उसका व्ययन करन े में सहायता करना, जहां ऐसी संपवत्त का मूलय बीस हजार रुपए से अधधक नह ं है ; 2023 का 45 (iv) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 331 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन अपराध ; 2023 का 45 (v) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 352 के अधीन िोकिांनत भंग करान े को प्रकोवपत करन े के आिय से अपमान और धारा 351 की उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन आपराधधक अलभत्रास ; (vi) पूववष ती अपराधों में से ककसी का दष्ु प्रेरण ; (vii) पूववष ती अपराधों में स े ककसी को करन े का प्रयत् न, जब ऐसा प्रयत् न,280 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अपराध है ; (viii) ऐस े काय ष स े होने वािा कोई अपराध, स्जसकी बाबत पि ु अनतचार अधधननयम, 1871 की धारा 20 के अधीन पररवाद ककया जा सकता है । 1871 का 1 (2) मस्जथरेट अलभयुक्ट्त को सुनवाई का युस्क्ट्तयुक्ट्त अवसर प्रदान ककए जाने के पश्चात,् ऐसे कारणों से जो ििे बद्ध ककए जाएं, ऐसे सभी या ककन्ह ं अपराधों, जो मत्ृ यु, आजीवन कारावास या तीन वर् ष से अधधक की अवधध के कारावास से दंडनीय नह ं हैं, का संक्षिप्त ववचारण कर सकेगा : परन्तु इस उपधारा के अधीन ककसी मामिे का संक्षिप्त ववचारण करने के लिए ककसी मस्जथरेट के ववननश्चय के ववरुद्ध कोई अपीि नह ं होगी । (3) जब संक्षिप् त ववचारण के दौरान मस्जथरेट को प्रतीत होता है कक मामिा इस प्रकार का है कक उसका ववचारण संिेपत: ककया जाना अवांछनीय है तो वह मस्जथरेट ककन्ह ं साक्षियों को, स्जनकी पर िा की जा चुकी है, पुन: बुिाएगा और मामिे को इस संहहता द्वारा उपबंधधत र नत से पुन: सुनने के लिए अग्रसर होगा । द्ववतीय वग ष के 284. उच् च न्यायािय ककसी ऐसे मस्जथरेट को, स्जसमें द्ववतीय वग ष मस्जथरेट की मस्जथरेटों द्वारा िस्क्ट् तयां ननहहत हैं, ककसी ऐसे अपराध का, जो केवि जुमाषन े से या जुमाषन े सहहत या संक्षिप्त रहहत छह मास से अनधधक के कारावास से दंडनीय है और ऐसे ककसी अपराध के दष्ु प्रेरण ववचारण । या ऐसे ककसी अपराध को करन े के प्रयत् न का संिेपत: ववचारण करने की िस्क्ट् त प्रदान कर सकता है । संक्षिप्त ववचारण 285. (1) इस अध्याय के अधीन ववचारणों में इसके पश् चात ् इसमें जैसा वखणतष है की प्रकिया । उसके लसवाय, इस संहहता में समन-मामिों के ववचारण के लिए ववननहदषष् ट प्रकिया का अनुसरण ककया जाएगा । (2) तीन मास से अधधक की अवधध के लिए कारावास का कोई दंडादेि इस अध्याय के अधीन ककसी दोर्लसद्धध के मामि े में न हदया जाएगा । संक्षिप्त 286. संिेपत: ववचाररत प्रत्येक मामि े में मस्जथरेट ऐसे प्ररूप में, जैसा राज्य ववचारणों में सरकार ननदेलित करे, ननम् नलिखित ववलिस्ष् टयां प्रववष् ट करेगा, अथाषत ् :— अलभिेि । (क) मामि े का िम संख्यांक ; (ि) अपराध ककए जाने की तार ि ; (ग) ररपोटष या पररवाद की तार ि ; (घ) पररवाद का (यहद कोई हो) नाम ; (ङ) अलभयुक्ट् त का नाम, उसके माता-वपता का नाम और उसका ननवास ; (च) वह अपराध स्जसका पररवाद ककया गया है और वह अपराध जो साबबत हुआ है (यहद कोई हो), और धारा 283 की उपधारा (1) के िंड (i), िंड (ii) या िड ड (iii) के अधीन आन े वािे मामिों में उस संपवत्त का मूलय स्जसके बारे में अपराध ककया गया है ; (छ) अलभयुक्ट् त का अलभवाक् और उसकी पर िा (यहद कोई हो) ; (ज) ननष्कर् ष ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 281 (झ) दंडादेि या अन्य अस्न्तम आदेि ; (ञ) कायवष ाह समाप् त होने की तार ि । 287. संिेपत: ववचाररत प्रत्येक ऐसे मामिे में, स्जसमें अलभयुक्ट् त दोर्ी होन े का संिेपत: ववचाररत अलभवाक् नह ं करता है, मस्जथरेट साक्ष्य का सारांि और ननष्कर् ष के कारणों का संक्षिप् त मामिों में कथन देत े हुए ननणषय अलभलिखित करेगा । ननणयष । 288. (1) ऐसा प्रत्येक अलभिेि और ननणयष न्यायािय की भार्ा में लििा जाएगा । अलभिेि और ननणयष की (2) उच् च न्यायािय संिेपत: ववचारण करने के लिए सिक्ट् त ककए गए ककसी भार्ा । मस्जथरेट को प्राधधकृत कर सकता है कक वह पूवोक्ट् त अलभिेि या ननणयष या दोनों उस अधधकार से तैयार कराए जो मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा इस ननलमत्त ननयुक्ट् त ककया गया है और इस प्रकार तैयार ककया गया अलभिेि या ननणषय ऐसे मस्जथरेट द्वारा हथतािररत ककया जाएगा । अध्याय 23 सौिा अलभिाक् 289. (1) यह अध्याय ऐसे अलभयुक्ट् त के संबंध में िागू होगा स्जसके ववरुद्ध— अध्याय का िागू होना । (क) पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार द्वारा धारा 193 के अधीन यह अलभकधथत करते हुए ररपोटष अग्रेवर्त की गई है कक उसके द्वारा ऐसे अपराध से लभन्न कोई अपराध ककया गया प्रतीत होता है, स्जसके लिए तत्समय प्रवत्तृ ववधध के अधीन मत्ृ यु या आजीवन या सात वर् ष से अधधक की अवधध के कारावास के दंड का उपबंध है ; या (ि) मस्जथरेट ने पररवाद पर उस अपराध का, संज्ञान िे लिया है जो उस अपराध से लभन्न है, स्जसके लिए तत्समय प्रवत्तृ ववधध के अधीन मत्ृ यु या आजीवन कारावास या सात वर् ष से अधधक की अवधध के कारावास के दंड का उपबंध है और धारा 223 के अधीन पररवाद और सािी की पर िा करन े के पश् चात ् धारा 227 के अधीन आदेलिका जार की है, ककंतु यह अध्याय वहां िागू नह ं होगा जहां ऐसा अपराध देि की सामास्जक-आधथकष दिा को प्रभाववत करता है या ककसी महहिा या लिि ु के ववरुद्ध ककया गया है । (2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, केन्द्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा तत्समय प्रवत्तृ ववधध के अधीन वे अपराध अवधाररत करेगी जो देि की सामास्जक-आधथकष दिा को प्रभाववत करत े हैं । 290. (1) ककसी अपराध का अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट्त, आरोप की ववरचना ककए जाने की सौदा अलभवाक् के लिए तार ि से तीस हदन की अवधध के भीतर, सौदा अलभवाक् के लिए उस न्यायािय में आवेदन । आवेदन फाइि कर सकेगा स्जसमें ऐसे अपराध का ववचारण िंबबत है । (2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन में उस मामि े का सक्षंिप् त वणनष होगा स्जसके संबंध में आवेदन फाइि ककया गया है, और उसमें उस अपराध का वणषन भी होगा स्जससे वह मामिा संबंधधत है तथा उसके साथ अलभयुक्ट् त का िपथ पत्र होगा स्जसमें यह कधथत होगा कक उसने ववधध के अधीन उस अपराध के लिए उपबंधधत दंड की प्रकृनत और सीमा को समझने के पश् चात ् अपने मामि े में थवेच्छा से सौदा अलभवाक् दाखिि ककया है और282 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— यह कक स्जसमें उसे ककसी न्यायािय द्वारा इससे पूव ष उसी अपराध में आरोवपत ठहराया गया था, लसद्धदोर् नह ं ठहराया गया है । (3) न्यायािय उपधारा (1) के अधीन आवेदन प्राप् त होने के पश् चात ् िोक अलभयोजक या पररवाद को और साथ ह अलभयुक्ट् त को मामि े में ननयत तार ि को उपस्थथत होने के लिए सूचना जार करेगा । (4) जहां उपधारा (3) के अधीन ननयत तार ि को िोक अलभयोजक या मामिे का पररवाद और अलभयुक्ट् त उपस्थथत होत े हैं, वहां न्यायािय अपना समाधान करन े के लिए कक अलभयुक्ट् त ने आवेदन थवेच्छा से दाखिि ककया है, अलभयुक्ट् त की बंद कमरे में पर िा करेगा, जहां मामि े का दसू रा पिकार उपस्थथत नह ं होगा और जहां— (क) न्यायािय का यह समाधान हो जाता है कक वह आवेदन अलभयुक्ट् त द्वारा थवेच्छा से फाइि ककया गया है, वहां वह िोक अलभयोजक या पररवाद और अलभयुक्ट् त को मामि े के पारथपररक संतोर्प्रद ननपटारे के लिए साठ हदन स े अनधधक का समय देगा स्जसमें अलभयुक्ट् त द्वारा पीडडत व्यस्क्ट् त को मामिे के दौरान प्रनतकर और अन्य िच ष देना सस्म्मलित है और तत्पश् चात ् मामि े की आगे सुनवाई के लिए तार ि ननयत करेगा ; (ि) न्यायािय को यह पता चिता है कक आवेदन अलभयुक्ट् त द्वारा थवेच्छा से फाइि नह ं ककया गया है, या उस े ककसी न्यायािय द्वारा ककसी मामि े में स्जसमें उस पर उसी अपराध का आरोप था, लसद्धदोर् ठहराया गया है तो वह इस संहहता के उपबंधों के अनुसार, उस प्रिम से जहां उपधारा (1) के अधीन ऐसा आवेदन फाइि ककया गया है, आगे कायवष ाह करेगा । पारथपररक 291. धारा 290 की उपधारा (4) के िंड (क) के अधीन पारथपररक संतोर्प्रद ननपटारे संतोर्प्रद ननपटारे के लिए, न्यायािय ननम् नलिखित प्रकिया अपनाएगा, अथाषत ् :— के लिए मागदष िी लसद्धांत । (क) पुलिस ररपोटष पर संस्थथत ककसी मामि े में, न्यायािय, िोक अलभयोजक, पुलिस अधधकार , स्जसने मामिे का अन्वेर्ण ककया है, अलभयुक्ट् त और मामिे में पीडडत व्यस्क्ट् त को, उस मामि े का संतोर्प्रद ननपटारा करन े के लिए बैठक में भाग िेने के लिए सूचना जार करेगा : परन्तु मामि े के संतोर्प्रद ननपटारे की ऐसी संपूण ष प्रकिया के दौरान न्यायािय का यह कतव्ष य होगा कक वह सुननस्श् चत करे कक सार प्रकिया बैठक में भाग िेने वािे पिकारों द्वारा थवेच्छा से पूण ष की गई है : परन्तु यह और कक अलभयुक्ट् त, यहद ऐसी वांछा करे तो, मामिे में िगाए गए अपने अधधवक्ट्ता, यहद कोई हो, के साथ इस बैठक में भाग िे सकेगा ; (ि) पुलिस ररपोटष से अन्यथा संस्थथत मामि े में, न्यायािय, अलभयुक्ट् त और उस मामि े में पीडडत व्यस्क्ट् त को मामि े के संतोर्प्रद ननपटारे के लिए की जाने वाि बैठक में भाग िेने के लिए सूचना जार करेगा : परन्तु न्यायािय का यह कतषव्य होगा कक वह मामि े का संतोर्प्रद ननपटारा करन े की संपूण ष प्रकिया के दौरान यह सुननस्श् चत करे कक उस े बैठक में भाग िेने वाि े पिकारोंअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 283 द्वारा थवेच्छा से पूरा ककया गया है : परन्तु यह और कक यहद मामि े में, पीडडत व्यस्क्ट् त या अलभयुक्ट् त, यहद ऐसी वांछा करे, तो वह उस मामिे में िगाए गए अपने अधधवक्ट्ता के साथ उस बैठक में भाग िे सकेगा । 292. जहां धारा 291 के अधीन बैठक में मामि े का कोई संतोर्प्रद ननपटारा तैयार पारथपररक संतोर्प्रद ननपटारे ककया गया है, वहां न्यायािय ऐसे ननपटारे की ररपोटष तैयार करेगा स्जस पर न्यायािय के की ररपोटष का पीठासीन अधधकार और उन अन्य सभी व्यस्क्ट् तयों के हथतािर होंगे स्जन्होंने बैठक में न्यायािय के भाग लिया था और यहद ऐसा कोई ननपटारा तैयार नह ं ककया जा सका है तो न्यायािय समि प्रथततु ककया जाना । ऐसा संप्रेिण िेिबद्ध करेगा और इस संहहता के उपबंधों के अनुसार उस प्रिम से आगे कायवष ाह करेगा, जहां स े उस मामि े में धारा 290 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन फाइि ककया गया है । 293. जहां धारा 292 के अधीन मामि े का कोई संतोर्प्रद ननपटारा तैयार ककया मामिे का ननपटारा । गया है वहां न्यायािय मामि े का ननपटारा ननम् नलिखित र नत से करेगा, अथाषत ् :— (क) न्यायािय, पीडडत व्यस्क्ट् त को धारा 292 के अधीन ननपटारे के अनुसार प्रनतकर देगा और दंड की मात्रा, अलभयुक्ट् त को सदाचार की पररवीिा पर या धारा 1958 का 20 401 के अधीन भत्सनष ा के पश् चात,् छोडने या अपराधी पररवीिा अधधननयम, 1958 या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के उपबंधों के अधीन अलभयुक्ट् त के संबंध में कारषवाई करने के ववर्य में पिकारों की सुनवाई करेगा और अलभयुक्ट् त पर दंड अधधरोवपत करने के लिए पश् चात व् ती िंडों में ववननहदषष् ट प्रकिया का पािन करेगा ; (ि) िंड (क) के अधीन पिकारों की सुनवाई के पश् चात ् यहद न्यायािय का 1958 का 20 यह मत हो कक धारा 401 या अपराधी पररवीिा अधधननयम, 1958 या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के उपबंध अलभयुक्ट् त के मामिे में आकृष्ट होत े हैं, तो वह अलभयुक्ट् त को पररवीिा पर छोड सकेगा या ऐसी ककसी ववधध का िाभ दे सकेगा ; (ग) िंड (ि) के अधीन पिकारों को सुनन े के पश् चात,् यहद न्यायािय को यह पता चिता है कक अलभयुक्ट् त द्वारा ककए गए अपराध के लिए ववधध में न्यूनतम दंड उपबंधधत ककया गया है तो वह अलभयुक्ट् त को ऐस े न्यूनतम दंड के आधे का दंड दे सकेगा और जहां अलभयुक्ट्त प्रथम अपराधी है और पूव ष में ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध नह ं ठहराया गया है, वह अलभयुक्ट्त को ऐसे न्यूनतम दंड के एक चौथाई का दंड दे सकेगा; (घ) िंड (ि) के अधीन पिकारों को सुनन े के पश् चात,् यहद न्यायािय को पता चिता है कक अलभयुक्ट् त द्वारा ककया गया अपराध िंड (ि) या िंड (ग) के अन्तगषत नह ं आता है तो वह अलभयुक्ट् त को ऐसे अपराध के लिए उपबंधधत या ब़िाए जा सकने वािे दंड के एक-चौथाई का दंड दे सकेगा और जहां अलभयुक्ट्त प्रथम अपराधी है और पूव ष में ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध नह ं ठहराया गया है, वह अलभयुक्ट्त को ऐसे अपराध के लिए उपबंधधत या ववथतारणीय दंड के 1/6 का दंड दे सकेगा । 294. न्यायािय, अपना ननणषय, धारा 293 के ननबंधनों के अनुसार, िुिे न्यायािय न्यायािय का ननणयष । में देगा और उस पर न्यायािय के पीठासीन अधधकार के हथतािर होंगे ।284 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ननणयष का 295. न्यायािय द्वारा इस धारा के अधीन हदया गया ननणषय अंनतम होगा और अंनतम होना । उसस े कोई अपीि (संववधान के अनुच्छेद 136 के अधीन वविेर् इजाजत याधचका और अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के अधीन ररट याधचका के लसवाय) ऐस े ननणयष के ववरुद्ध ककसी न्यायािय में नह ं होगी । सौदा अलभवाक् 296. न्यायािय के पास, इस अध्याय के अधीन अपने कृत्यों का ननवहष न करने के में न्यायािय की प्रयोजन के लिए जमानत, अपराधों के ववचारण और इस संहहता के अधीन ऐसे न्यायािय िस्क्ट् त । में ककसी मामि े के ननपटारे से संबंधधत अन्य ववर्यों के बारे में ननहहत सभी िस्क्ट् तयां होंगी । अलभयुक्ट् त द्वारा 297. इस अध्याय के अधीन अधधरोवपत कारावास के दंडादेि के ववरुद्ध अलभयुक्ट् त भोगी गई ननरोध द्वारा भोगी गई ननरोध की अवधध का मुजरा ककए जाने के लिए धारा 468 के उपबंध की अवधध का उसी र नत स े िाग ू होंगे जसै े कक वे इस संहहता के ककन्ह ं अन्य उपबंधों के अधीन कारावास के दंडादेि के कारावास के संबंध में िागू होत े हैं । ववरुद्ध मुजरा ककया जाना । व्याववृत्त । 298. इस अध्याय के उपबंध इस संहहता के ककन्ह ं अन्य उपबंधों में अन्तववष्ष ट उनसे असंगत ककसी बात के होत े हुए भी प्रभावी होंगे और ऐसे अन्य उपबंधों में ककसी बात का यह अथ ष नह ं िगाया जाएगा कक वह इस अध्याय के ककसी उपबंध के अथ ष को सीलमत करती है । स्पष् टीकरण—इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, “िोक अलभयोजक” पद का वह अथष होगा जो धारा 2 के िंड (फ) के अधीन उसका है और इसमें धारा 19 के अधीन ननयुक्ट् त सहायक िोक अलभयोजक सस्म्मलित है । अलभयुक्ट् त के 299. तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध में अन्तववष्ष ट ककसी बात के होत े हुए भी, ककसी कथनों का अलभयुक्ट् त द्वारा धारा 290 के अधीन फाइि ककए गए सौदा अलभवाक् के लिए आवेदन में उपयोग न ककया कधथत कथनों या तथ्यों का, इस अध्याय के प्रयोजन के लसवाय ककसी अन्य प्रयोजन के जाना । लिए उपयोग नह ं ककया जाएगा । अध्याय का िागू 300. इस अध्याय की कोई बात, ककिोर न्याय (बािकों की देिरेि और संरिण) न होना । अधधननयम, 2015 की धारा 2 में यथापररभावर्त ककसी ककिोर या बािक को िागू नह ं 2016 का 2 होगी । अध्याय 24 कारागारों में परररुदि या ननरुदि व्यक्‍ तयों की उपक्स्थनत पररभार्ाए ं । 301. इस अध्याय में,— (क) “ननरुद्ध” के अन्तगतष ननवारक ननरोध के लिए उपबधं करन े वाि ककसी ववधध के अधीन ननरुद्ध भी है ; — (ि) “कारागार” के अन्तगतष ननम् नलिखित भी हैं, (i) कोई ऐसा थथान स्जसे राज्य सरकार ने, साधारण या वविेर् आदेि द्वारा, अनतररक्ट् त जेि घोवर्त ककया है ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 285 (ii) कोई सुधारािय, बोथटषि-संथथा या इसी प्रकार की अन्य संथथा । 302. (1) जब कभी इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह बस्न्दयों को उपस्थथत करान े के दौरान ककसी दंड न्यायािय को यह प्रतीत होता है कक— की अपेिा करन े (क) कारागार में परररुद्ध या ननरुद्ध व्यस्क्ट् त को ककसी अपराध के आरोप का की िस्क्ट्त । उत्तर देने के लिए या उसके ववरुद्ध ककन्ह ं कायवष ाहहयों के प्रयोजन के लिए न्यायािय के समि िाया जाना चाहहए ; या (ि) न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कक ऐसे व्यस्क्ट् त की सािी के रूप में पर िा की जाए, तब वह न्यायािय, कारागार के भारसाधक अधधकार से यह अपेिा करन े वािा आदेि दे सकता है कक वह ऐसे व्यस्क्ट् त को आरोप का उत्तर देने के लिए या ऐसी कायवष ाहहयों के प्रयोजन के लिए या साक्ष्य देने के लिए न्यायािय के समि प्रथतुत करे । (2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेि द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा हदया जाता है, वहां वह कारागार के भारसाधक अधधकार को तब तक भेजा नह ं जाएगा या उसके द्वारा उस पर तब तक कोई कायवष ाह नह ं की जाएगी जब तक वह ऐसे मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा प्रनतहथतािररत न हो, स्जसके अधीनथथ वह मस्जथरेट है । (3) उपधारा (2) के अधीन प्रनतहथतािर के लिए प्रथतुत ककए गए प्रत्येक आदेि के साथ ऐसे तथ्यों का, स्जनसे मस्जथरेट की राय में आदेि आवश्यक हो गया है, एक वववरण होगा और वह मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, स्जसके समि वह प्रथतुत ककया गया है उस वववरण पर ववचार करने के पश् चात ् आदेि पर प्रनतहथतािर करन े से इंकार कर सकता है । 303. (1) राज्य सरकार या केन्द्र य सरकार, उपधारा (2) में ववननहदषष् ट बातों को धारा 302 के प्रवतनष से कुछ ध्यान में रित े हुए, ककसी समय, साधारण या वविेर् आदेि द्वारा, यह ननदेि दे सकती है व्यस्क्ट् तयों को कक ककसी व्यस्क्ट् त को या ककसी वग ष के व्यस्क्ट् तयों को उस कारागार से नह ं हटाया जाएगा अपवस्जतष करन े स्जसमें उसे या उन्हें परररुद्ध या ननरुद्ध ककया गया है, और तब, जब तक ऐसा आदेि की राज्य सरकार या प्रवत्तृ रहे, धारा 302 के अधीन हदया गया कोई आदेि, चाहे वह राज्य सरकार या केन्द्र य केन्द्र य सरकार सरकार के आदेि के पूव ष ककया गया हो या उसके पश् चात,् ऐसे व्यस्क्ट् त या ऐसे वग ष के की िस्क्ट् त । व्यस्क्ट् तयों के बारे में प्रभावी नह ं होगा । (2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेि देने के पूव,ष यथास्थथनत, राज्य सरकार या जब मामिा उसके केन्द्र य अलभकरण द्वारा संस्थथत है, तो केन्द्र य सरकार ननम् नलिखित बातों का ध्यान रिेगी, अथाषत ् :— (क) उस अपराध का थवरूप स्जसके लिए, या वे आधार, स्जन पर, उस व्यस्क्ट् त को या उस वग ष के व्यस्क्ट् तयों को कारागार में परररुद्ध या ननरुद्ध करने का आदेि हदया गया है ; (ि) यहद उस व्यस्क्ट् त को या उस वग ष के व्यस्क्ट् तयों को कारागार से हटाने की अनुज्ञा द जाए तो िोक-व्यवथथा में ववघ् न की संभाव्यता ; (ग) िोक हहत, साधारणत: ।286 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कारागार के 304. जहां वह व्यस्क्ट् त, स्जसके बारे में धारा 302 के अधीन कोई आदेि हदया गया भारसाधक है— अधधकार का कुछ आकस्थमकताओ ं (क) बीमार या अंगिैधथलय के कारण कारागार से हटाए जाने के योग्य नह ं में आदेि को है ; या कायाषस्न्वत न (ि) ववचारण के लिए सुपुदषगी के अधीन है या ववचारण के िंबबत रहने तक करना । के लिए या प्रारंलभक अन्वेर्ण तक के लिए प्रनतप्रेर्णाधीन है ; या (ग) इतनी अवधध के लिए अलभरिा में है स्जतनी आदेि का अनुपािन करने के लिए और उस कारागार में स्जसमें वह परररुद्ध या ननरुद्ध है, उस े वापस ि े आन े के लिए अपेक्षित समय के समाप् त होने के पूव ष समाप्त होती है ; या (घ) ऐसा व्यस्क्ट् त है स्जसे धारा 303 के अधीन राज्य सरकार या केन्द्र य सरकार द्वारा हदया गया कोई आदेि िागू होता है, वहां कारागार का भारसाधक अधधकार न्यायािय के आदेि को कायाषस्न्वत नह ं करेगा और ऐसा न करन े के कारणों का वववरण न्यायािय को भेजेगा : परन्तु जहां ऐसे व्यस्क्ट् त से ककसी ऐसे थथान पर, जो कारागार से पच् चीस ककिोमीटर स े अधधक दरू नह ं है, साक्ष्य देने के लिए उपस्थथत होने की अपेिा की जाती है, वहां कारागार के भारसाधक अधधकार के ऐसा न करने का कारण िंड (ि) में वखणषत कारण नह ं होगा । बन्द का 305. धारा 304 के उपबंधों के अधीन रहत े हुए, कारागार का भारसाधक अधधकार , न्यायािय में धारा 302 की उपधारा (1) के अधीन हदए गए और जहां आवश्यक है, वहां उसकी उपधारा अलभरिा (2) के अधीन सम्यक् रूप से प्रनतहथतािररत आदेि के पररदान पर, आदेि में नालमत में िाया जाना । व्यस्क्ट् त को ऐसे न्यायािय में, स्जसमें उसकी उपस्थथनत अपेक्षित है, लभजवाएगा स्जससे वह आदेि में उस्लिखित समय पर वहां उपस्थथत हो सके, और उस े न्यायािय में या उसके पास अलभरिा में तब तक रिवाएगा जब तक उसकी पर िा न कर ि जाए या जब तक न्यायािय उस े उस कारागार को, स्जसमें वह परररुद्ध या ननरुद्ध था, वापस िे जाए जाने के लिए प्राधधकृत न करे । कारागार में 306. कारागार में परररुद्ध या ननरुद्ध ककसी व्यस्क्ट् त को सािी के रूप में पर िा के सािी की पर िा लिए धारा 319 के अधीन कमीिन जार करन े की न्यायािय की िस्क्ट् त पर इस अध्याय के लिए कमीिन के उपबंधों का कोई प्रनतकूि प्रभाव नह ं पडेगा ; और अध्याय 25 के भाग ि के उपबंध जार करने की िस्क्ट् त । कारागार में ऐसे ककसी व्यस्क्ट् त की कमीिन पर पर िा के संबंध में वैसे ह िागू होंगे जैसे वे ककसी अन्य व्यस्क्ट् त की कमीिन पर पर िा के संबंध में िागू होत े हैं । अध्याय 25 िांचों और विचारणों में साक्ष्य क—साक्ष्य िेने और अलभलिखखत करन े का ढंग न्यायाियों की 307. राज्य सरकार यह अवधाररत कर सकती है कक इस संहहता के प्रयोजनों के भार्ा । लिए राज्य के अन्दर उच् च न्यायािय से लभन् न प्रत्येक न्यायािय की कौन सी भार्ा होगी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 287 308. अलभव्यक्ट् त रूप से जैसा उपबंधधत है उसके लसवाय, ववचारण या अन्य साक्ष्य का अलभयुक्ट् त की कायवष ाह के अनुिम में लिया गया सब साक्ष्य, अलभयुक्ट्त की उपस्थथनत में लिया जाएगा उपस्थथनत में या जब उसकी वैयस्क्ट्तक उपस्थथनत से अलभमुस्क्ट्त दे द गई हो तब उसके अधधवक्ट्ता की लिया जाना । उपस्थथनत में लिया जाएगा, स्जसके अन्तगतष राज्य सरकार द्वारा अधधसूधचत ककए जाने वािे अलभहहत थथान पर श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधन द्वारा लिया गया साक्ष्य भी है : परन् तु जहां अठारह वर् ष से कम आयु की महहिा का, स्जससे बिात् संग या ककसी अन्य िधैंगक अपराध के ककए जाने का अलभकथन ककया गया है, साक्ष् य अलभलिखित ककया जाना है, वहां न्य ायािय यह सुननस्श् चत करने के लिए कक ऐसी महहिा का अलभयुक्ट् त से सामना न हो और साथ ह अलभयुक्ट् त की प्रनतपर िा के अधधकार को सुननस्श् चत करते हुए समुधचत उपाय कर सकेगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में “अलभयुक्ट् त” के अन्तगतष ऐसा व्यस्क्ट् त भी है स्जसकी बाबत अध्याय 9 के अधीन कोई कायवष ाह इस संहहता के अधीन प्रारंभ की जा चुकी है । 309. (1) मस्जथरेट के समि ववचाररत सब समन-मामिों में, धारा 164 स े धारा समन-मामिों और जांचों में 167 तक की धाराओं के अधीन (स्जनके अन्तगतष ये दोनों धाराएं भी हैं) सब जांचों में, अलभिेि । और ववचारण के अनुिम की कायवष ाहहयों से लभन् न धारा 491 के अधीन सब कायवष ाहहयों में, मस्जथरेट जैसे-जैसे प्रत्येक सािी की पर िा होती जाती है, वैसे-वैसे उसके साक्ष्य के सारांि का ज्ञापन न्यायािय की भार्ा में तैयार करेगा : परन्तु यहद मस्जथरेट ऐसा ज्ञापन थवयं तैयार करन े में असमथ ष है तो वह अपनी असमथतष ा के कारण को अलभलिखित करन े के पश् चात ् ऐसे ज्ञापन को िुिे न्यायािय में थवयं बोिकर लिखित रूप में तैयार कराएगा । (2) ऐसे ज्ञापन पर मस्जथरेट हथतािर करेगा और वह अलभिेि का भाग होगा । 310. (1) मस्जथरेट के समि ववचाररत सब वारंट-मामिों में प्रत्येक सािी का वारंट-मामिों में अलभिेि । साक्ष्य जैसे-जैसे उसकी पर िा होती जाती है, वैसे-वैसे या तो थवयं मस्जथरेट द्वारा लििा जाएगा, या िुिे न्यायािय में उसके द्वारा बोिकर लििवाया जाएगा, या जहां वह ककसी िार ररक या अन्य असमथषता के कारण ऐसा करने में असमथ ष है, वहां उसके द्वारा इस ननलमत्त ननयुक्ट् त न्यायािय के ककसी अधधकार द्वारा उसके ननदेिन और अधीिण में लििा जाएगा : परंतु इस उपधारा के अधीन सािी का साक्ष्य उस अपराध के अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के अधधवक्ट् ता की उपस्थथनत में श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों द्वारा भी अलभलिखित ककया जा सकेगा । (2) जहां मस्जथरेट साक्ष्य लििवाए वहां वह यह प्रमाणपत्र अलभलिखित करेगा कक साक्ष्य उपधारा (1) में ननहदषष् ट कारणों से थवयं उसके द्वारा नह ं लििा जा सका । (3) ऐसा साक्ष्य मामूि तौर पर वत्तृ ांत के रूप में अलभलिखित ककया जाएगा ककन्तु मस्जथरेट थववववेकानुसार, ऐसे साक्ष्य के ककसी भाग को प्रश् नोत्तर के रूप में लिि या लििवा सकेगा । (4) ऐसे लििे गए साक्ष्य पर मस्जथरेट हथतािर करेगा और वह अलभिेि का भाग होगा ।288 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सेिन न्यायािय 311. (1) सेिन न्यायािय के समि सब ववचारणों में प्रत्येक सािी का साक्ष्य, के समि जैसे-जैसे उसकी पर िा होती जाती है, वैसे-वैसे या तो थवयं पीठासीन न्यायाधीि द्वारा ववचारण में लििा जाएगा, या िुिे न्यायािय में उसके द्वारा बोिकर लििवाया जाएगा, या उसके अलभिेि । द्वारा इस ननलमत्त ननयुक्ट् त न्यायािय के ककसी अधधकार द्वारा उसके ननदेिन और अधीिण में लििा जाएगा । (2) ऐसा साक्ष्य साधारणतया वत्तृ ांत के रूप में लििा जाएगा ककन्त ु पीठासीन न्यायाधीि थववववेकानुसार ऐसे साक्ष्य के ककसी भाग को प्रश् नोत्तर के रूप में लिि सकता है या लििवा सकता है । (3) ऐस े लििे गए साक्ष्य पर पीठासीन न्यायाधीि हथतािर करेगा और वह अलभिेि का भाग होगा । साक्ष्य के 312. प्रत्येक मामिे में जहां साक्ष्य धारा 310 या धारा 311 के अधीन लििा जाता है अलभिेि की वहां— भार्ा । (क) यहद सािी न्यायािय की भार्ा में साक्ष्य देता है तो उस े उसी भार्ा में लििा जाएगा; (ि) यहद वह ककसी अन्य भार्ा में साक्ष्य देता है तो उस,े यहद व्यवहाय ष हो तो, उसी भार्ा में लििा जाएगा और यहद ऐसा करना व्यवहाय ष नह ं हो तो जैसे-जैसे सािी की पर िा होती जाती है, वैसे-वैस े साक्ष्य का न्यायािय की भार्ा में सह अनुवाद तैयार ककया जाएगा, उस पर मस्जथरेट या पीठासीन न्यायाधीि द्वारा हथतािर ककए जाएंगे और वह अलभिेि का भाग होगा ; (ग) उस दिा में स्जसमें साक्ष्य िंड (ि) के अधीन न्यायािय की भार्ा स े लभन्न ककसी अन्य भार्ा में लििा जाता है तो, न्यायािय की भार्ा में उसका सह अनुवाद यथासाध्य िीघ्र तैयार ककया जाएगा, उस पर मस्जथरेट या पीठासीन न्यायाधीि हथतािर करेगा और वह अलभिेि का भाग होगा : परन्तु जब िंड (ि) के अधीन साक्ष्य अंग्रेजी में लििा जाता है और न्यायािय की भार्ा में उसके अनुवाद की ककसी पिकार द्वारा अपेिा नह ं की जाती है तो न्यायािय ऐसे अनुवाद से अलभमुस्क्ट् त दे सकेगा । ऐसे साक्ष्य के 313. (1) धारा 310 या धारा 311 के अधीन जैसे-जैसे प्रत्येक सािी का साक्ष्य पूरा पूरा होने पर होता जाता है, तो यहद अलभयुक्ट् त उपस्थथत हो तो उसकी, या यहद वह अधधवक्ट्ता द्वारा उसके संबंध में प्रकिया । उपस्थथत हो, तो उसके अधधवक्ट्ता की उपस्थथनत में सािी को प़िकर सुनाया जाएगा और यहद आवश्यक हो तो सह ककया जाएगा । (2) यहद सािी साक्ष्य के ककसी भाग के सह होने स े उस समय इंकार करता है जब वह उस े प़िकर सुनाया जाता है तो मस्जथरेट या पीठासीन न्यायाधीि साक्ष्य को ठीक करन े के थथान पर उस पर सािी द्वारा उस बाबत की गई आपवत्त का ज्ञापन लिि सकता है और उसमें ऐसी हटप्पखणयां जोडेगा जैसी वह आवश्यक समझे । (3) यहद साक्ष्य का अलभिेि उस भार्ा से लभन्न भार्ा में है स्जसमें वह हदया गया है और सािी उस भार्ा को नह ं समझता है तो, उसे ऐसे अलभिेि का ननवचष न उस भार्ा में स्जसमें वह हदया गया था या उस भार्ा में स्जसे वह समझता हो, सुनाया जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 289 314. (1) जब कभी कोई साक्ष्य ऐसी भार्ा में हदया जाए, स्जसे अलभयुक्ट् त नह ं अलभयुक्ट् त या उसके समझता है और वह न्यायािय में थवयं उपस्थथत है, तब िुिे न्यायािय में उस े उस अधधवक्ट्ता को भार्ा में उसका भार्ान्तर सुनाया जाएगा, स्जसे वह समझता है । साक्ष्य का (2) यहद वह अधधवक्ट्ता द्वारा उपस्थथत हो और साक्ष्य न्यायािय की भार्ा स े भार्ान्तर सुनाया जाना । लभन्न और अधधवक्ट्ता द्वारा न समझी जाने वाि भार्ा में हदया जाता है तो उसका भार्ान्तर ऐसे अधधवक्ट्ता को न्यायािय की भार्ा में सुनाया जाएगा । (3) जब दथतावेज, यथार नत सबूत के प्रयोजन के लिए प्रथतुत ककए जाते हैं, तब यह न्यायािय के थववववेक पर ननभरष करेगा कक वह उनमें से उतने का भार्ान्तर सुनाए स्जतना आवश्यक प्रतीत हो । 315. जब पीठासीन न्यायाधीि या मस्जथरेट सािी का साक्ष्य अलभलिखित कर िेता सािी की व्यवहार के बारे है तब वह उस सािी की पर िा ककए जात े समय उसकी व्यवहार के बारे में ऐसी में हटप्पखणयां । हटप्पखणयां भी अलभलिखित करेगा (यहद कोई हों), जो वह तास्ववक समझता है । 316. (1) जब कभी अलभयुक्ट् त की पर िा ककसी मस्जथरेट या सेिन न्यायािय अलभयुक्ट् त की पर िा का द्वारा की जाती है तब उसस े पूछे गए प्रत्येक प्रश् न और उसके द्वारा हदए गए प्रत्येक अलभिेि । उत्तर सहहत ऐसी सब पर िा थवयं पीठासीन न्यायाधीि या मस्जथरेट द्वारा या जहां वह ककसी िार ररक या अन्य असमथतष ा के कारण ऐसा करन े में असमथ ष है, वहां उसके द्वारा इस ननलमत्त ननयुक्ट् त न्यायािय के ककसी अधधकार द्वारा उसके ननदेिन और अधीिण में पूरे तौर पर अलभलिखित की जाएंगी । (2) अलभिेि, यहद साध्य हो तो, उस भार्ा में होगा स्जसमें अलभयुक्ट् त की पर िा की जाती है या यहद यह साध्य न हो तो न्यायािय की भार्ा में होगा । (3) अलभिेि अलभयुक्ट् त को हदिा हदया जाएगा या उस े प़ि कर सुना हदया जाएगा, या यहद वह उस भार्ा को नह ं समझता है स्जसमें वह लििा गया है तो उसका भार्ान्तर उस े उस भार्ा में, स्जसे वह समझता है, सुनाया जाएगा और वह अपने उत्तरों का थपष् ट करण करन े या उनमें कोई बात जोडने के लिए थवतंत्र होगा । (4) तब उस पर अलभयुक्ट् त और मस्जथरेट या पीठासीन न्यायाधीि हथतािर करेंगे और मस्जथरेट या पीठासीन न्यायाधीि अपने हथतािर से प्रमाखणत करेगा कक पर िा उसकी उपस्थथनत में की गई थी और उसने उसे सुना था और अलभिेि में अलभयुक्ट् त द्वारा ककए गए कथन का पूण ष और सह वणनष है : परन्तु कक जहां अलभयुक्ट्त अलभरिा में है तथा इिैक्ट्राननक माध्यम से उसका पर िण ककया जाता है, तो ऐसे पर िण से बहत्तर घंटे के भीतर उसके हथतािर लिए जाएंगे । (5) इस धारा की कोई बात संक्षिप् त ववचारण के अनुिम में अलभयुक्ट् त की पर िा को िागू होने वाि न समझी जाएगी । 317. जब ककसी साक्ष्य या कथन के भार्ान्तर के लिए दभु ावर्ए की सेवा की ककसी दभु ावर्या ठीक- ठीक भार्ान्तर दंड न्यायािय द्वारा अपेिा की जाती है तब वह दभु ावर्या ऐसे साक्ष्य या कथन का ठीक करन े के लिए भार्ान्तर करन े के लिए आबद्ध होगा । आबद्ध होगा ।290 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उच् च न्यायािय 318. प्रत्येक उच् च न्यायािय, साधारण ननयम द्वारा ऐसी र नत ववहहत कर सकेगा में अलभिेि । स्जससे उन मामिों में साक्षियों के साक्ष्य को और अलभयुक्ट् त की पर िा को लििा जाएगा जो उसके समि आते हैं, और ऐसे साक्ष्य और पर िा को ऐसे ननयम के अनुसार लििा जाएगा । ख—साक्षक्षयों की परीक्षा के लिए कमीशन साक्षियों को जब 319. (1) जब कभी इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह उपस्थथत होने स े के अनुिम में, न्यायािय या मस्जथरेट को प्रतीत होता है कक न्याय के उद्देश्यों के लिए अलभमुस्क्ट् त द यह आवश्यक है कक ककसी सािी की पर िा की जाए और ऐसे सािी की उपस्थथनत इतने जाए और कमीिन जार वविम्ब, व्यय या असुववधा के बबना, स्जतनी मामिे की पररस्थथनतयों में अनुधचत होगी, ककया जाएगा । नह ं कराई जा सकती है तब न्यायािय या मस्जथरेट ऐसी उपस्थथनत से अलभमुस्क्ट् त दे सकेगा और सािी की पर िा ककए जान े के लिए इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार कमीिन जार कर सकेगा : परन्तु जहां न्याय के उद्देश्यों के लिए भारत के राष् रपनत या उपराष् रपनत या ककसी राज्य के राज्यपाि या ककसी संघ राज्यिेत्र के प्रिासक की सािी के रूप में पर िा करना आवश्यक है वहां ऐसे सािी की पर िा करन े के लिए कमीिन जार ककया जाएगा । (2) न्यायािय, अलभयोजन के ककसी सािी की पर िा के लिए कमीिन जार करत े समय यह ननदेि दे सकेगा कक अधधवक्ट्ता की फीस सहहत ऐसी रकम जो न्यायािय अलभयुक्ट् त के व्ययों की पूनत ष के उधचत समझे, अलभयोजन द्वारा द जाए । कमीिन ककसको 320. (1) यहद सािी उन राज्यिेत्रों के भीतर है, स्जन पर इस संहहता का ववथतार जार ककया है, तो कमीिन, उस मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को ननदेलित होगा, स्जसकी थथानीय जाएगा । अधधकाररता के अन्दर ऐसा सािी लमि सकता है । (2) यहद सािी भारत में है, ककन्त ु ऐसे राज्य या ऐसे ककसी िेत्र में है, स्जस पर इस संहहता का ववथतार नह ं है तो कमीिन ऐसे न्यायािय या अधधकार को ननदेलित होगा स्जसे केन्द्र य सरकार अधधसूचना द्वारा इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे । (3) यहद सािी भारत से बाहर के देि या थथान में है और ऐसे देि या थथान की सरकार से केन्द्र य सरकार ने आपराधधक मामिों के संबंध में साक्षियों का साक्ष्य िेने के लिए ठहराव कर रिे हैं तो कमीिन ऐस े प्ररूप में जार ककया जाएगा, ऐस े न्यायािय या अधधकार को ननदेलित होगा और पारेवर्त ककए जाने के लिए ऐसे प्राधधकार को भजे ा जाएगा जो केन्द्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववहहत करे । कमीिनों का 321. कमीिन प्राप् त होने पर मुख्य न्यानयक मस्जथरेट या ऐसा मस्जथरेट स्जसे वह ननष्पादन । इस ननलमत्त ननयुक्ट् त करे, सािी को अपने समि आने के लिए समन करेगा या उस थथान को जाएगा जहां सािी है और उसका साक्ष्य उसी र नत से लििेगा और इस प्रयोजन के लिए उन्ह ं िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकेगा जो इस संहहता के अधीन वारंट-मामिों के ववचारण के लिए हैं । पिकार साक्षियों 322. (1) इस संहहता के अधीन ककसी ऐसी कायवष ाह के पिकार, स्जसमें कमीिन की पर िा कर जार ककया गया है, अपने-अपने ऐसे लिखित पररप्रश् न भेज सकत े हैं स्जन्हें कमीिन का सकेंगे । ननदेि देने वािा न्यायािय या मस्जथरेट वववाद्यक से सुसंगत समझता है और उस मस्जथरेट, न्यायािय या अधधकार के लिए, स्जसे कमीिन ननदेलित ककया जाता है याअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 291 स्जसे उसके ननष्पादन का कतषव्य प्रत्यायोस्जत ककया जाता है, यह ववधधपूण ष होगा कक वह ऐसे पररप्रश् नों के आधार पर सािी की पर िा करे । (2) कोई ऐसा पिकार ऐस े मस्जथरेट, न्यायािय या अधधकार के समि अधधवक्ट्ता द्वारा, या यहद अलभरिा में नह ं है तो थवयं उपस्थथत हो सकेगा और उक्ट् त सािी की पर िा, प्रनतपर िा और पुन: पर िा कर सकेगा । 323. (1) धारा 319 के अधीन जार ककए गए ककसी कमीिन के सम्यक् रूप से कमीिन का िौटाया जाना । ननष्पाहदत ककए जाने के पश् चात ् वह उसके अधीन पर क्षित साक्षियों के अलभसाक्ष्य सहहत उस न्यायािय या मस्जथरेट को, स्जसने कमीिन जार ककया था, िौटाया जाएगा; और वह कमीिन, उससे संबद्ध वववरणी और अलभसाक्ष्य सब उधचत समयों पर पिकारों के ननर िण के लिए प्राप्य होंगे, और सब न्यायसंगत अपवादों के अधीन रहत े हुए, ककसी पिकार द्वारा मामिे में साक्ष्य में प़िे जा सकेंगे और अलभिेि का भाग होंगे । 2023 का 47 (2) यहद ऐसे लिया गया कोई अलभसाक्ष्य, भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 27 द्वारा ववहहत ितों को पूरा करता है, तो वह ककसी अन्य न्यायािय के समि भी मामिे के ककसी पश् चात व् ती प्रिम में साक्ष्य में लिया जा सकेगा । 324. प्रत्येक मामि े में, स्जसमें धारा 319 के अधीन कमीिन जार ककया गया है, कायवष ाह का थथगन । जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह ऐसे ववननहदषष् ट समय तक के लिए, जो कमीिन के ननष्पादन और िौटाए जाने के लिए उधचत रूप से पयाषप् त है, थथधगत की जा सकेगी । 325. (1) धारा 321 के उपबंध और धारा 322 और धारा 323 के उतने भाग के ववदेिी कमीिनों का उपबंध, स्जतना कमीिन का ननष्पादन ककए जाने और उसके िौटाए जाने से सबं ंधधत है, ननष्पादन । इसमें इसके पश् चात ् वखणतष ककन्ह ं न्यायाियों, न्यायाधीिों या मस्जथरेटों द्वारा जार ककए गए कमीिनों के बारे में वैस े ह िागू होंगे जैसे वे धारा 319 के अधीन जार ककए गए कमीिनों को िाग ू होत े हैं । (2) उपधारा (1) में ननहदषष् ट न्यायािय, न्यायाधीि और मस्जथरेट ननम् नलिखित हैं— (क) भारत के ऐस े िेत्र के भीतर, स्जस पर इस संहहता का ववथतार नह ं है, अधधकाररता का प्रयोग करन े वािा ऐसा न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट स्जसे केन्द्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे ; (ि) भारत से बाहर के ककसी ऐसे देि या थथान में, स्जसे केन्द्र य सरकार, अधधसूचना द्वारा, इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे, अधधकाररता का प्रयोग करने वािा और उस देि या थथान में प्रवत्तृ ववधध के अधीन आपराधधक मामिों के संबंध में साक्षियों की पर िा के लिए कमीिन जार करन े का प्राधधकार रिने वािा न्यायािय, न्यायाधीि या मस्जथरेट । 326. (1) अलभयुक्ट् त की उपस्थथनत में मस्जथरेट द्वारा लिया गया और अनुप्रमाखणत धचककत्सीय सािी का ककया गया या इस अध्याय के अधीन कमीिन पर लिया गया, ककसी लसववि सजनष या अलभसाक्ष्य । अन्य धचककत्सीय सािी का अलभसाक्ष्य इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में साक्ष्य में हदया जा सकेगा, यद्यवप अलभसािी को सािी के तौर पर नह ं बुिाया गया है । (2) यहद न्यायािय यह ठीक समझता है और अलभयोजन या अलभयुक्ट् त के आवेदन292 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पर वह ऐसे ककसी अलभसािी को उसके अलभसाक्ष्य की ववर्यवथतु के बारे में समन कर सकता है और उसकी पर िा करेगा । मस्जथरेट की 327. (1) कोई दथतावेज, स्जसका ककसी व्यस्क्ट् त या सम्पवत्त के संबंध में ककसी पहचान ररपोटष । कायपष ािक मस्जथरेट की थवहथतािररत पहचान ररपोटष होना तात्पनयतष है, इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में साक्ष्य के रूप में उपयोग में िाया जा सकेगा, यद्यवप ऐसे मस्जथरेट को सािी के तौर पर नह ं बिु ाया गया है : परन्तु जहां ऐसी ररपोटष में ऐस े ककसी संहदग्ध व्यस्क्ट् त या सािी का वववरण है, स्जस े भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 19, धारा 26, धारा 27, धारा 158 या धारा 2023 का 47 160 के उपबंध िागू होत े हैं, वहां, ऐसा वववरण इस उपधारा के अधीन, उन धाराओं के उपबंधों के अनुसार के लसवाय, प्रयोग में नह ं िाया जाएगा । (2) न्यायािय, यहद वह ठीक समझता है और अलभयोजन या अलभयुक्ट् त के आवेदन पर ऐसे मस्जथरेट को समन कर सकेगा और उक्ट् त ररपोटष की ववर्य-वथत ु के बारे में उसकी पर िा करेगा । टकसाि के 328. (1) कोई दथतावेज, जो ककसी टकसाि या नोट छपाई मुद्रणािय के या अधधकाररयों का लसक्ट्योररट वप्रहंटगं प्रेस के (स्जसके अन्तगषत थटांप और िेिन सामग्री ननयंत्रक का साक्ष्य । कायाषिय भी है) या न्याय संबंधी ववभाग या न्यायािनयक प्रयोगिािा प्रभाग के ककसी राजपबत्रत अधधकार की या प्रश् नगत दथतावेजों के सरकार पर िक या प्रश् नगत दथतावेजों के राज्य पर िक की स्जसे केन्द्र य सरकार अधधसूचना द्वारा इस ननलमत्त ववननहदषष् ट करे, इस संहहता के अधीन ककसी कायवष ाह के दौरान पर िा और ररपोटष के लिए सम्यक् रूप से उस े भेजी गई ककसी सामग्री या चीज के बारे में थवहथतािररत ररपोटष होनी तात्पनयषत है, इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में साक्ष्य के तौर पर उपयोग में िाई जा सकेगी, यद्यवप ऐसे अधधकार को सािी के तौर पर नह ं बुिाया गया है । (2) यहद न्यायािय ठीक समझता है तो वह ऐसे अधधकार को समन कर सकता है और उसकी ररपोटष की ववर्य-वथतु के बारे में उसकी पर िा कर सकता है : परन्तु ऐसा कोई अधधकार ककन्ह ं ऐसे अलभिेिों को प्रथतुत करने के लिए समन नह ं ककया जाएगा स्जन पर ररपोटष आधाररत है । (3) भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 129 और धारा 130 के उपबंधों 2023 का 47 पर प्रनतकूि प्रभाव डािे बबना, ऐसा कोई अधधकार , ककसी टकसाि या नोट छपाई मुद्रणािय या लसक्ट्योररट वप्रहंटगं प्रेस या न्याय संबंधी ववभाग के महाप्रबंधक या ककसी अन्य भारसाधक अधधकार या न्यायािनयक प्रयोगिािा के भारसाधक ककसी अधधकार या प्रश् नगत दथतावेज संगठन के सरकार पर िक या प्रश् नगत दथतावेज संगठन के राज्य पर िक की अनुज्ञा के बबना,— (क) ऐसे अप्रकालित िासकीय अलभिेिों से, स्जन पर ररपोटष आधाररत है, प्राप् त कोई साक्ष्य देने के लिए अनुज्ञात नह ं ककया जाएगा ; या (ि) ककसी सामग्री या चीज की पर िा के दौरान उसके द्वारा ककए गए पर िण के थवरूप या ववलिस्ष् टयों को प्रकट करन े के लिए अनुज्ञात नह ं ककया जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 293 329. (1) कोई दथतावेज, जो ककसी सरकार वैज्ञाननक वविेर्ज्ञ की, स्जसे यह धारा कनतपय सरकार िागू होती है, इस संहहता के अधीन ककसी कायवष ाह के दौरान पर िा या ववश् िेर्ण और वैज्ञाननक ररपोटष के लिए सम्यक् रूप से उस े भेजी गई ककसी सामग्री या चीज के बारे में वविेर्ज्ञों की थवहथतािररत ररपोटष होनी तात्पनयषत है, इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या ररपोटें । अन्य कायवष ाह में साक्ष्य के तौर पर उपयोग में िाई जा सकेगी । (2) यहद न्यायािय ठीक समझता है तो वह ऐसे वविेर्ज्ञ को समन कर सकता है और उसकी ररपोटष की ववर्यवथतु के बारे में उसकी पर िा कर सकेगा । (3) जहां ऐसे ककसी वविेर्ज्ञ को न्यायािय द्वारा समन ककया जाता है और वह थवयं उपस्थथत होने में असमथ ष है वहां, उस दिा के लसवाय स्जसमें न्यायािय ने उसे थवयं उपस्थथत होने के लिए थपष् ट रूप स े ननदेि हदया है, वह अपने साथ काम करने वािे ककसी उत्तरदायी अधधकार को न्यायािय में उपस्थथत होने के लिए प्रनतननयुक्ट् त कर सकेगा, यहद वह अधधकार मामि े के तथ्यों से अवगत है तथा न्यायािय में उसकी ओर से समाधानप्रद रूप में अलभसाक्ष्य दे सकता है । (4) यह धारा ननम् नलिखित सरकार वैज्ञाननक वविेर्ज्ञों को िागू होती है, अथाषत ् :— (क) सरकार का कोई रासायननक पर िक या सहायक रासायननक पर िक ; (ि) मुख्य ववथफोटक ननयंत्रक ; (ग) ननदेिक अंगुि -छाप ब्यूरो ; (घ) ननदेिक, हाफकीन संथथान, मुम्बई ; (ङ) ककसी केन्द्र य न्यायािनयक प्रयोगिािा या ककसी राज्य न्यायािनयक प्रयोगिािा का ननदेिक, उप-ननदेिक या सहायक ननदेिक ; (च) सरकार सीरम ववज्ञानी ; (छ) कोई अन्य वैज्ञाननक वविेर्ज्ञ, जो इस प्रयोजन के लिए राज्य सरकार या केन्द्र य सरकार द्वारा, अधधसूचना द्वारा ववननहदषष् ट या प्रमाखणत ककया गया हो । 330. (1) जहां अलभयोजन या अलभयुक्ट् त द्वारा ककसी न्यायािय के समि कोई कुछ दथतावेजों का औपचाररक दथतावेज फाइि ककया गया है वहां ऐसे प्रत्येक दथतावेज की ववलिस्ष् टयां एक सूची में सबूत आवश्यक सस्म्मलित की जाएंगी और अलभयोजन या अलभयुक्ट् त या अलभयोजन या अलभयुक्ट् त के न होना । अधधवक्ट्ता से, यहद कोई हों, ऐसे दथतावेजों की पूनत ष करने के िीघ्र पश्चात ् ककसी भी दिा में ऐसी पूनत ष के पश्चात ् तीस हदन के अपश्चात,् ऐसे प्रत्येक दथतावेज का असि होना थवीकार या इंकार करने की अपेिा की जाएगी: परंतु न्यायािय अपने वववेक से ऐसे कारणों से जो अलभलिखित ककए जाएं, समय सीमा को लिधथि कर सकेगा: परंतु यह और कक ककसी वविेर्ज्ञ को न्यायािय के समि उपस्थथत होने के लिए जब तक नह ं बुिाया जाएगा तब तक ऐस े वविेर्ज्ञ की ररपोटष पर ववचारण के ककसी पिकार द्वारा वववाद नह ं ककया जाता है । (2) दथतावेजों की सूची ऐसे प्ररूप में होगी जो राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंधधत करे । (3) जहां ककसी दथतावेज का असि होना वववादग्रथत नह ं है वहां ऐसा दथतावेज294 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उस व्यस्क्ट् त के स्जसके द्वारा उसका हथतािररत होना तात्पनयतष है, हथतािर के सबूत के बबना इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में साक्ष्य में प़िा जा सकेगा : परन्तु न्यायािय, थववववेकानुसार, यह अपेिा कर सकता है कक ऐसा हथतािर साबबत ककया जाए । िोक सेवकों के 331. जब ककसी न्यायािय में इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या आचरण के अन्य कायवष ाह के दौरान कोई आवेदन ककया जाता है और उसमें ककसी िोक सेवक के सबूत के बारे में िपथपत्र । बारे में अलभकथन ककए जाते हैं तब आवेदक, आवेदन में अलभकधथत तथ्यों का िपथपत्र द्वारा साक्ष्य दे सकेगा और न्यायािय यहद ठीक समझे तो वह आदेि दे सकेगा कक ऐसे तथ्यों से संबंधधत साक्ष्य इस प्रकार हदया जाए । िपथपत्र पर 332. (1) ककसी भी व्यस्क्ट् त का ऐसा साक्ष्य जो औपचाररक है िपथपत्र द्वारा हदया औपचाररक जा सकेगा और, सभी न्यायसंगत अपवादों के अधीन रहत े हुए, इस संहहता के अधीन साक्ष्य । ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में साक्ष्य में प़िा जा सकेगा । (2) न्यायािय यहद ठीक समझ े तो वह ककसी व्यस्क्ट् त को समन कर सकता है और उसके िपथपत्र में अन्तववष्ष ट तथ्यों के बारे में उसकी पर िा कर सकता है ककन्त ु अलभयोजन या अलभयुक्ट् त के आवेदन पर ऐसा करेगा । प्राधधकार 333. (1) इस संहहता के अधीन ककसी न्यायािय के समि उपयोग में िाए जाने स्जनके समि वािे िपथपत्रों पर िपथ ग्रहण या प्रनतज्ञान ननम् नलिखित के समि ककया जा सकेगा— िपथपत्रों पर िपथ ग्रहण की (क) कोई न्यायाधीि या कोई न्यानयक या कायपष ािक मस्जथरेट ; या जा सकेगी । (ि) उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय द्वारा ननयुक्ट् त कोई िपथ आयुक्ट्त ; या (ग) नोटेर अधधननयम, 1952 के अधीन ननयुक्ट् त कोई नोटेर । 1952 का 53 (2) िपथपत्र ऐसे तथ्यों तक, स्जन्हें अलभसािी थवयं अपनी जानकार से साबबत करन े के लिए समथ ष है और ऐसे तथ्यों तक स्जनके सत्य होने का ववश् वास करने के लिए उसके पास उधचत आधार है, सीलमत होंगे और उनमें उनका कथन अिग-अिग होगा तथा ववश् वास के आधारों की दिा में अलभसािी ऐसे ववश् वास के आधारों का थपष् ट कथन करेगा । (3) न्यायािय िपथपत्र में ककसी किंकात्मक और ववसंगत बात के काटे जाने या संिोधधत ककए जाने का आदेि दे सकेगा । पूवष दोर्लसद्धध 334. पूव ष दोर्लसद्धध या दोर्मुस्क्ट् त को, इस संहहता के अधीन ककसी जांच, या दोर्मुस्क्ट्त ववचारण या अन्य कायषवाह में, ककसी अन्य ऐसे ढंग के अनतररक्ट् त, जो तत्समय प्रवत्तृ कैसे साबबत की जाए । ककसी ववधध द्वारा उपबंधधत है,— (क) ऐस े उद्ध रण द्वारा, स्जसका उस न्यायािय के, स्जसमें ऐसी दोर्लसद्धध या दोर्मुस्क्ट् त हुई, अलभिेिों को अलभरिा में रिन े वाि े अधधकार के हथतािर द्वारा प्रमाखणत उस दंडादेि या आदेि की प्रनतलिवप होना है ; या (ि) दोर्लसद्धध की दिा में, या तो ऐसे प्रमाणपत्र द्वारा, जो उस जेि के भारसाधक अधधकार द्वारा हथतािररत है स्जसमें दंड या उसका कोई भाग भोगाअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 295 गया या सुपुदषगी के उस वारंट को प्रथतुत करके, स्जनके अधीन दंड भोगा गया था, और इन दिाओं में से प्रत्येक में इस बात के साक्ष्य के साथ कक अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त वह व्यस्क्ट् त है जो ऐसे दोर्लसद्ध या दोर्मुक्ट् त ककया गया, साबबत ककया जा सकेगा । 335. (1) यहद यह साबबत कर हदया जाता है कक अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त फरार हो गया अलभयुक्ट् त की अनुपस्थथनत में है और उसके तुरन्त धगरफ्तार ककए जाने की कोई सम्भावना नह ं है तो उस अपराध के साक्ष्य का लिए, स्जसका पररवाद ककया गया है, उस व्यस्क्ट् त का ववचारण करने के लिए या ववचारण अलभिेि । के लिए सुपुदष करने के लिए सिम न्यायािय अलभयोजन की ओर से प्रथतुत ककए गए साक्षियों की (यहद कोई हो), उसकी अनुपस्थथनत में पर िा कर सकेगा और उनका अलभसाक्ष्य अलभलिखित कर सकेगा और ऐसा कोई अलभसाक्ष्य उस व्यस्क्ट् त के धगरफ्तार होने पर, उस अपराध की जाचं या ववचारण में, स्जसका उस पर आरोप है, उसके ववरुद्ध साक्ष्य में हदया जा सकेगा यहद अलभसािी मर गया है, या साक्ष्य देने के लिए असमथ ष है, या लमि नह ं सकता है या उसकी उपस्थथनत इतने वविम्ब, व्यय या असुववधा के बबना, स्जतनी कक मामि े की पररस्थथनतयों में अनुधचत होगी, नह ं कराई जा सकती है । (2) यहद यह प्रतीत होता है कक मत्ृ यु या आजीवन कारावास से दंडनीय कोई अपराध ककसी अज्ञात व्यस्क्ट् त या ककन्ह ं अज्ञात व्यस्क्ट् तयों द्वारा ककया गया है तो उच् च न्यायािय या सेिन न्यायाधीि ननदेि दे सकेगा कक कोई प्रथम वग ष मस्जथरेट जांच करे और ककन्ह ं साक्षियों की जो अपराध के बारे में साक्ष्य दे सकते हों, पर िा करे और ऐसे लिया गया कोई अलभसाक्ष्य, ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध स्जस पर अपराध का तत्पश् चात ् अलभयोग िगाया जाता है, साक्ष्य में हदया जा सकेगा यहद अलभसािी मर जाता है या साक्ष्य देने के लिए असमथ ष हो जाता है या भारत की सीमाओं स े परे है । 336. जहां िोक सेवक, वैज्ञाननक वविेर्ज्ञ या धचककत्सा अधधकार द्वारा तैयार ककया कनतपय मामिों में िोक सेवकों, गया कोई दथतावेज या ररपोटष, इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या ककसी अन्य वविेर्ज्ञों, पुलिस कायवष ाह में साक्ष्य के रूप में प्रयुक्ट्त ककए जाने के लिए तात्पनयतष है, और— अधधकाररयों का (i) ऐसा िोक सेवक, वविेर्ज्ञ या अधधकार , या तो थथानांतररत, सेवाननवतृ हो साक्ष्य । जाता है या मर जाता है; या (ii) ऐसा िोक सेवक, वविेर्ज्ञ या अधधकार , पाया नह ं जा सकता है या अलभसाक्ष्य देने के लिए असमथ ष है; या (iii) ऐसे िोक सेवक, वविेर्ज्ञ या अधधकार जो जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह करने में वविंब करते हैं, उनकी उपस्थथनत सुननस्श्चत करना है, तो न्यायािय, ऐसे दथतावेज या ररपोटष पर अलभसाक्ष्य देने के लिए ऐसे िोक सेवक, वविेर्ज्ञ या अधधकार के उतरजीवी अधधकार , जो ऐसे अलभसाक्ष्य के समय पर पद धारण ककए हुए हैं, की उपस्थथनत को सुननस्श्चत करेगा : परन्तु ककसी भी िोक सेवक, वैज्ञाननक वविेर्ज्ञ या धचककत्सा अधधकार को न्यायािय के समि उपस्थथत होने के लिए तब तक नह ं कहा जाएगा जब तक कक ऐसे िोक सेवक, वैज्ञाननक वविेर्ज्ञ या धचककत्सा अधधकार की ररपोटष पर ववचारण या अन्य कायवष ाहहयों के पिकारों में से ककसी के द्वारा उस पर वववाद नह ं ककया गया है: परन्तु यह और कक ऐसे उत्तरवती िोक सेवक, वविेर्ज्ञ या अधधकार के अलभसाक्ष्य को श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से भी अनुज्ञात ककया जा सकेगा ।296 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अध्याय 26 िांचों तथा विचारणों के बारे में सािारण उपबंि एक बार 337. (1) स्जस व्यस्क्ट् त का ककसी अपराध के लिए सिम अधधकाररता वाि े दोर्लसद्ध या न्यायािय द्वारा एक बार ववचारण ककया जा चुका है और जो ऐसे अपराध के लिए दोर्मुक्ट् त ककए दोर्लसद्ध या दोर्मुक्ट् त ककया जा चुका है, वह पुन: जब तक ऐसी दोर्लसद्धध या गए व्यस्क्ट् त का उसी अपराध के दोर्मुस्क्ट् त प्रवत्तृ रहती है तब तक न तो उसी अपराध के लिए ववचारण का भागी होगा लिए ववचारण न और न उन्ह ं तथ्यों पर ककसी ऐसे अन्य अपराध के लिए ववचारण का भागी होगा स्जसके ककया जाना । लिए उसके ववरुद्ध िगाए गए आरोप से लभन्न आरोप धारा 244 की उपधारा (1) के अधीन िगाया जा सकता था या स्जसके लिए वह उसकी उपधारा (2) के अधीन दोर्लसद्ध ककया जा सकता था । (2) ककसी अपराध के लिए दोर्मुक्ट् त या दोर्लसद्ध ककए गए ककसी व्यस्क्ट् त का ववचारण, तत्पश् चात ् राज्य सरकार की सम्मनत स े ककसी ऐस े लभन्न अपराध के लिए ककया जा सकेगा स्जसके लिए पूवगष ामी ववचारण में उसके ववरुद्ध धारा 243 की उपधारा (1) के अधीन पथृ क् आरोप िगाया जा सकता था । (3) जो व्यस्क्ट् त ककसी ऐसे काय ष से बनन े वािे ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया गया है, जो ऐसे पररणाम पैदा करता है जो उस काय ष से लमिकर उस अपराध से, स्जसके लिए वह लसद्धदोर् हुआ, लभन्न कोई अपराध बनाते हैं, उसका ऐसे अस्न्तम वखणषत अपराध के लिए तत्पश् चात ् ववचारण ककया जा सकेगा, यहद उस समय जब वह दोर्लसद्ध ककया गया था वे पररणाम हुए नह ं थ े या उनका होना न्यायािय को ज्ञात नह ं था । (4) जो व्यस्क्ट् त ककन्ह ं कायों से बनन े वािे ककसी अपराध के लिए दोर्मुक्ट् त या दोर्लसद्ध ककया गया है, उस पर ऐसी दोर्मुस्क्ट् त या दोर्लसद्धध के होने पर भी, उन्ह ं कायों से बनन े वािे और उसके द्वारा ककए गए ककसी अन्य अपराध के लिए तत्पश् चात ् आरोप िगाया जा सकेगा और उसका ववचारण ककया जा सकेगा, यहद वह न्यायािय, स्जसके द्वारा पहिे उसका ववचारण ककया गया था, उस अपराध के ववचारण के लिए सिम नह ं था स्जसके लिए बाद में उस पर आरोप िगाया जाता है । (5) धारा 281 के अधीन उन्मोधचत ककए गए व्यस्क्ट् त का उसी अपराध के लिए पुन: ववचारण उस न्यायािय की, स्जसके द्वारा वह उन्मोधचत ककया गया था, या अन्य ककसी ऐसे न्यायािय की, स्जसके प्रथम वखणतष न्यायािय अधीनथथ है, सम्मनत के बबना नह ं ककया जाएगा । (6) इस धारा की कोई बात साधारण िंड अधधननयम, 1897 की धारा 26 के या 1897 का 10 इस संहहता की धारा 208 के उपबंधों पर प्रभाव नह ं डािेगी । स्पष् टीकरण—पररवाद का िाररज ककया जाना या अलभयुक्ट् त का उन्मोचन इस धारा के प्रयोजनों के लिए दोर्मुस्क्ट् त नह ं है । दृष् टांत (क) क का ववचारण सेवक की हैलसयत में चोर करन े के आरोप पर ककया जाता है और वह दोर्मुक्ट् त कर हदया जाता है । जब तक दोर्मुस्क्ट् त प्रवत्तृ रहे, उस पर सेवक के रूप में चोर के लिए या उन्ह ं तथ्यों पर केवि चोर के लिए या आपराधधक न्यास-भंग केअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 297 लिए बाद में आरोप नह ं िगाया जा सकता । (ि) घोर उपहनत काररत करन े के लिए क का ववचारण ककया जाता है और वह दोर्लसद्ध ककया जाता है । ित व्यस्क्ट् त तत्पश् चात ् मर जाता है । आपराधधक मानववध के लिए क का पुन: ववचारण ककया जा सकेगा । (ग) ख के आपराधधक मानववध के लिए क पर सेिन न्यायािय के समि आरोप िगाया जाता है और वह दोर्लसद्ध ककया जाता है । ख की हत्या के लिए क का उन्ह ं तथ्यों पर तत्पश् चात ् ववचारण नह ं ककया जा सकेगा । (घ) ख को थवेच्छा से उपहनत काररत करने के लिए क पर प्रथम वग ष मस्जथरेट द्वारा आरोप िगाया जाता है और वह दोर्लसद्ध ककया जाता है । ख को थवेच्छा स े घोर उपहनत काररत करने के लिए क का उन्ह ं तथ्यों पर तत्पश् चात ् ववचारण नह ं ककया जा सकेगा जब तक कक मामिा इस धारा की उपधारा (3) के भीतर न आए । (ङ) ख के िर र से सम्पवत्त की चोर करन े के लिए क पर द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा आरोप िगाया जाता है और वह दोर्लसद्ध ककया जाता है । उन्ह ं तथ्यों पर तत्पश् चात ् क पर िूट का आरोप िगाया जा सकेगा और उसका ववचारण ककया जा सकेगा । (च) घ को िूटने के लिए क, ख और ग पर प्रथम वग ष मस्जथरेट द्वारा आरोप िगाया जाता है और वे दोर्लसद्ध ककए जात े हैं । डकैती के लिए उन्ह ं तथ्यों पर तत्पश् चात ् क, ख और ग पर आरोप िगाया जा सकेगा और उनका ववचारण ककया जा सकेगा । 338. (1) ककसी मामिे का भारसाधक िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजक िोक ककसी न्यायािय में, स्जसमें वह मामिा जांच, ववचारण या अपीि के अधीन है, ककसी अलभयोजकों द्वारा लिखित प्राधधकार के बबना उपस्थथत हो सकेगा और अलभवचन कर सकेगा । उपस्थथनत । (2) ककसी ऐसे मामिे में यहद कोई प्राइवेट व्यस्क्ट् त ककसी न्यायािय में ककसी व्यस्क्ट् त को अलभयोस्जत करने के लिए ककसी अधधवक्ट्ता को अनुदेि देता है तो मामिे का भारसाधक िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजक अलभयोजन का संचािन करेगा और ऐसा अनुदेलित अधधवक्ट्ता उसमें िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजक के ननदेिों के अधीन काय ष करेगा और न्यायािय की अनुज्ञा से उस मामि े में साक्ष्य की समास्प् त पर लिखित रूप में तकष प्रथतुत कर सकेगा । 339. (1) ककसी मामि े की जांच या ववचारण करन े वािा कोई मस्जथरेट, ननर िक अलभयोजन का की पंस्क्ट् त से नीचे के पुलिस अधधकार से लभन्न ककसी भी व्यस्क्ट् त द्वारा अलभयोजन के संचािन करन े की अनुज्ञा । संचालित ककए जाने की अनज्ञु ा दे सकेगा ; ककन्तु महाधधवक्ट् ता या सरकार अधधवक्ट् ता या िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजक से लभन्न कोई व्यस्क्ट् त ऐसी अनुज्ञा के बबना ऐसा करन े का हकदार न होगा : परन्तु यहद पुलिस के ककसी अधधकार ने उस अपराध के अन्वेर्ण में, स्जसके बारे में अलभयुक्ट् त का अलभयोजन ककया जा रहा है, भाग लिया है तो अलभयोजन का संचािन करन े की उस े अनुज्ञा नह ं द जाएगी । (2) अलभयोजन का संचािन करन े वािा कोई व्यस्क्ट् त थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा ऐसा कर सकेगा ।298 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— वह व्यस्क्ट् त स्जसके 340. जो व्यस्क्ट् त दंड न्यायािय के समि अपराध के लिए अलभयुक्ट् त है या स्जसके ववरुद्ध कायवष ाह ववरुद्ध इस संहहता के अधीन कायवष ाहहयां संस्थथत की गई हैं, उसका यह अधधकार होगा संस्थथत की गई है कक उसकी पसंद के अधधवक्ट्ता द्वारा उसकी प्रनतरिा की जाए । उसका प्रनतरिा करान े का अधधकार । कुछ मामिों में 341. (1) जहां न्यायािय के समि ककसी ववचारण या अपीि में, अलभयुक्ट् त का अलभयुक्ट् त को प्रनतननधधत्व ककसी अधधवक्ट्ता द्वारा नह ं ककया जाता है और जहां न्यायािय को यह राज्य के व्यय प्रतीत होता है कक अलभयुक्ट् त के पास ककसी अधधवक्ट्ता को ननयुक्ट् त करन े के लिए पयाषप् त पर ववधधक सहायता । साधन नह ं हैं, वहां न्यायािय उसकी प्रनतरिा के लिए राज्य के व्यय पर अधधवक्ट्ता ननयत करेगा । (2) राज्य सरकार के पूव ष अनुमोदन से उच् च न्यायािय— (क) उपधारा (1) के अधीन प्रनतरिा के लिए अधधवक्ट्ताओं के चयन के ढंग का; (ि) ऐसे अधधवक्ट्ताओं को न्यायाियों द्वारा अनुज्ञात की जाने वाि सुववधाओं का ; (ग) ऐसे अधधवक्ट्ताओं को सरकार द्वारा संदेय फीसों का और साधारणत: उपधारा (1) के प्रयोजनों को कायाषस्न्वत करने के लिए, उपबंध करन े वािे ननयम बना सकेगा । (3) राज्य सरकार अधधसूचना द्वारा यह ननदेि दे सकेगी कक उस तार ि से, जो अधधसूचना में ववननहदषष् ट की जाए, उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध राज्य के अन्य न्यायाियों के समि ककसी वग ष के ववचारणों के संबधं में वैस े ह िाग ू होंगे जैस े वे सेिन न्यायािय के समि ववचारणों के संबंध में िागू होत े हैं । प्रकिया, जब 342. (1) इस धारा में “ननगम” स े कोई ननगलमत कम्पनी या अन्य ननगलमत ननगम या ननकाय अलभप्रेत है, और इसके अंतगतष सोसाइट रस्जथर करण अधधननयम, 1860 के 1860 का 21 रस्जथर कृत अधीन रस्जथर कृत सोसाइट भी है । सोसाइट अलभयुक्ट् त है । (2) जहां कोई ननगम ककसी जांच या ववचारण में अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त या अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् तयों में से एक है वहां वह ऐसी जांच या ववचारण के प्रयोजनाथ ष एक प्रनतननधध ननयुक्ट् त कर सकेगा और ऐसी ननयुस्क्ट् त ननगम की मुद्रा के अधीन करना आवश्यक नह ं होगा । (3) जहां ननगम का कोई प्रनतननधध उपस्थथत होता है, वहां इस संहहता की इस अपेिा का, कक कोई बात अलभयुक्ट् त की उपस्थथनत में की जाएगी या अलभयुक्ट् त को प़िकर सुनाई जाएगी या बताई जाएगी या समझाई जाएगी, इस अपेिा के रूप में अथ ष िगाया जाएगा कक, वह बात प्रनतननधध की उपस्थथनत में की जाएगी, प्रनतननधध को प़िकर सुनाई जाएगी या बताई जाएगी या समझाई जाएगी और ककसी ऐसी अपेिा का कक अलभयुक्ट् त की पर िा की जाएगी, इस अपेिा के रूप में अथ ष िगाया जाएगा कक प्रनतननधध की पर िा की जाएगी । (4) जहां ननगम का कोई प्रनतननधध उपस्थथत नह ं होता है, वहां कोई ऐसी अपेिा, जो उपधारा (3) में ननहदषष् ट है, िागू नह ं होगी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 299 (5) जहां ननगम के प्रबंध ननदेिक द्वारा या ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त द्वारा (वह चाहे स्जस नाम से पुकारा जाए) जो ननगम के कायकष िाप का प्रबंध करता है या प्रबंध करने वािे व्यस्क्ट् तयों में से एक है, हथतािर ककया गया तात्पनयषत इस भाव का लिखित कथन फाइि ककया जाता है कक कथन में नालमत व्यस्क्ट् त को इस धारा के प्रयोजनों के लिए ननगम के प्रनतननधध के रूप में ननयुक्ट् त ककया गया है, वहां न्यायािय, जब तक इसके प्रनतकूि साबबत नह ं ककया जाता है, यह उपधारणा करेगा कक ऐसा व्यस्क्ट् त इस प्रकार ननयुक्ट् त ककया गया है । (6) यहद यह प्रश् न उठता है कक न्यायािय के समि ककसी जांच या ववचारण में ननगम के प्रनतननधध के रूप में उपस्थथत होने वािा कोई व्यस्क्ट् त ऐसा प्रनतननधध है या नह ं, तो उस प्रश् न का अवधारण न्यायािय द्वारा ककया जाएगा । 343. (1) ककसी ऐसे अपराध से, स्जसे यह धारा िागू होती है, प्रत्यि या अप्रत्यि सह-अपराधी को िमा-दान । रूप में संबद्ध या संबंधधत समझे जाने वािे ककसी व्यस्क्ट् त का साक्ष्य अलभप्राप् त करन े की दृस्ष् ट से, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट अपराध के अन्वेर्ण या जांच या ववचारण के ककसी प्रिम में, और अपराध की जांच या ववचारण करने वािा प्रथम वग ष मस्जथरेट जांच या ववचारण के ककसी प्रिम में उस व्यस्क्ट् त को इस ित ष पर िमा-दान कर सकेगा कक वह अपराध के संबंध में और उसके ककए जान े में चाहे कता ष या दष्ु प्रेरक के रूप में संबद्ध प्रत्येक अन्य व्यस्क्ट् त के संबंध में सब पररस्थथनतयों का, स्जनकी उस े जानकार हो, पूणष और सत्य प्रकटन कर दे । (2) यह धारा ननम् नलिखित को िागू होती है :— (क) अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन ननयुक्ट् त वविेर् न्यायाधीि के न्यायािय द्वारा ववचारणीय कोई अपराध ; (ि) ऐसे कारावास से, स्जसकी अवधध सात वर् ष तक की हो या अधधक कठोर दंड से दंडनीय कोई अपराध । (3) प्रत्येक मस्जथरेट, जो उपधारा (1) के अधीन िमा-दान करता है,— (क) ऐसा करन े के अपने कारणों को अलभलिखित करेगा ; (ि) यह अलभलिखित करेगा कक िमा-दान उस व्यस्क्ट् त द्वारा, स्जसको कक वह ककया गया था थवीकार कर लिया गया था या नह ं, और अलभयुक्ट् त द्वारा आवेदन ककए जान े पर उसे ऐस े अलभिेि की प्रनतलिवप नन:िुलक देगा । (4) उपधारा (1) के अधीन िमा-दान थवीकार करन े वािे— (क) प्रत्येक व्यस्क्ट् त की अपराध का संज्ञान करने वािे मस्जथरेट के न्यायािय में और पश् चात व् ती ववचारण में, यहद कोई हो, सािी के रूप में पर िा की जाएगी ; (ि) प्रत्येक व्यस्क्ट् त को, जब तक कक वह पहिे से ह जमानत पर न हो, ववचारण ित्म होने तक अलभरिा में ननरुद्ध रिा जाएगा । (5) जहां ककसी व्यस्क्ट् त ने उपधारा (1) के अधीन ककया गया िमा-दान थवीकार कर लिया है और उसकी उपधारा (4) के अधीन पर िा की जा चुकी है, वहा ं अपराध का संज्ञान करन े वािा मस्जथरेट, मामि े में कोई अनतररक्ट् त जांच ककए बबना,— (क) मामि े को—300 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (i) यहद अपराध अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय है या यहद संज्ञान करन े वािा मस्जथरेट मुख्य न्यानयक मस्जथरेट है तो, उस न्यायािय को सुपुदष कर देगा ; (ii) यहद अपराध अनन्यत: तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन ननयुक्ट् त वविेर् न्यायाधीि के न्यायािय द्वारा ववचारणीय है तो उस न्यायािय को सुपुदष कर देगा ; (ि) ककसी अन्य दिा में, मामिा मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के हवािे करेगा जो उसका ववचारण थवयं करेगा । िमा-दान का 344. मामि े की सुपुदषगी के पश् चात ् ककसी समय ककन्त ु ननणषय हदए जाने के पूव ष ननदेि देने की वह न्यायािय स्जसे मामिा सुपुदष ककया जाता है ककसी ऐसे अपराध से प्रत्यि या िस्क्ट् त । अप्रत्यि रूप में सम्बद्ध या संबंधधत समझे जाने वाि े ककसी व्यस्क्ट् त का साक्ष्य ववचारण में अलभप्राप् त करन े की दृस्ष् ट से ऐसे व्यस्क्ट् त को उसी ित ष पर िमा-दान कर सकेगा । िमा की ितों 345. (1) जहां ऐसे व्यस्क्ट् त के बारे में स्जसने धारा 343 या धारा 344 के अधीन का पािन न िमा-दान थवीकार कर लिया है, िोक अलभयोजक प्रमाखणत करता है कक उसकी राय में करन े वािे ऐसे व्यस्क्ट् त ने या तो ककसी अत्यावश्यक बात को जानबूझकर नछपा कर या लमथ्या साक्ष्य व्यस्क्ट् त का ववचारण । देकर उस ित ष का पािन नह ं ककया है स्जस पर िमा-दान ककया गया था, वहां ऐसे व्यस्क्ट् त का ववचारण उस अपराध के लिए, स्जसके बारे में ऐसे िमा-दान ककया गया था या ककसी अन्य अपराध के लिए, स्जसका वह उसी ववर्य के संबंध में दोर्ी प्रतीत होता है, और लमथ्या साक्ष्य के अपराध के लिए भी ववचारण ककया जा सकेगा : परन्तु ऐसे व्यस्क्ट् त का ववचारण अन्य अलभयुक्ट् तों में से ककसी के साथ संयुक्ट् तत: नह ं ककया जाएगा : परन्तु यह और कक लमथ्या साक्ष्य देने के अपराध के लिए ऐसे व्यस्क्ट् त का ववचारण उच् च न्यायािय की मंजूर के बबना नह ं ककया जाएगा और धारा 215 या धारा 379 की कोई बात उस अपराध को िागू नह ं होगी । (2) िमा-दान थवीकार करन े वािे ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा ककया गया और धारा 183 के अधीन ककसी मस्जथरेट द्वारा या धारा 343 की उपधारा (4) के अधीन ककसी न्यायािय द्वारा अलभलिखित कोई कथन ऐसे ववचारण में उसके ववरुद्ध साक्ष्य में हदया जा सकेगा । (3) ऐसे ववचारण में अलभयुक्ट् त यह अलभवचन करन े का हकदार होगा कक उसने उन ितों का पािन कर हदया है स्जन पर उसे िमा-दान हदया गया था ; और तब यह साबबत करना अलभयोजन का काम होगा कक ऐसी ित ष का पािन नह ं ककया गया है । (4) ऐसे ववचारण के समय न्यायािय— (क) यहद वह सेिन न्यायािय है तो आरोप अलभयुक्ट् त को प़िकर सुनाए जाने और समझाए जाने के पूव ष ; (ि) यहद वह मस्जथरेट का न्यायािय है तो अलभयोजन के साक्षियों का साक्ष्य लिए जाने के पूव,ष अलभयुक्ट् त से पूछेगा कक क्ट्या वह यह अलभवचन करता है कक उसने उन ितों का पािन ककया है स्जन पर उसे िमा-दान हदया गया था ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 301 (5) यहद अलभयुक्ट् त ऐसा अलभवचन करता है तो न्यायािय उस अलभवाक् को अलभलिखित करेगा और ववचारण के लिए अग्रसर होगा और वह मामि े में ननणषय देने के पूव ष इस ववर्य में ननष्कर् ष ननकािेगा कक अलभयुक्ट् त ने िमा की ितों का पािन ककया है या नह ं ; और यहद यह ननष्कर् ष ननकिता है कक उसने ऐसा पािन ककया है तो वह इस संहहता में ककसी बात के होत े हुए भी, दोर्मुस्क्ट् त का ननणयष देगा । 346. (1) प्रत्य ेक जांच या ववचारण में कायवष ाहहयां सभी उपस्थथत साक्षियों की कायवष ाहहयों को थथधगत या पर िा हो जाने तक हदन-प्रनतहदन जार रिी जाएंगी, जब तक कक ऐसे कारणों से, जो आथथधगत करन े की िेिबद्ध ककए जाएंगे, न्य ायािय उन्ह ें अगिे हदन से परे आथ थधगत करना आवश् यक न िस्क्ट् त । समझे : 2023 का 45 परन् तु जब जांच या ववचारण भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 के अधीन ककसी अपराध से संबंधधत है, तब जांच या ववचारण, आरोप पत्र फाइि ककए जाने की तार ि से दो मास की अवधध के भीतर पूरा ककया जाएगा । (2) यहद न्यायािय ककसी अपराध का संज्ञान करन े या ववचारण के प्रारंभ होने के पश् चात ् यह आवश्यक या उधचत समझता है कक ककसी जांच या ववचारण का प्रारंभ करना वविंबबत कर हदया जाए या उस े थथधगत कर हदया जाए तो वह, समय-समय पर, ऐस े कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, ऐसे ननबन्धनों पर, जैसे वह ठीक समझे, उतने समय के लिए स्जतना वह उधचत समझे उस े थथधगत या आथथधगत कर सकेगा और यहद अलभयुक्ट् त अलभरिा में है तो उस े वारंट द्वारा प्रनतप्रेवर्त कर सकेगा : परन्तु कोई न्यायािय ककसी अलभयुक्ट् त को इस धारा के अधीन एक समय में पन्द्रह हदन से अधधक की अवधध के लिए अलभरिा में प्रनतप्रेवर्त नह ं करेगा : परन्तु यह और कक जब सािी उपस्थथत हों तब उनकी पर िा ककए बबना थथगन या आथथगन करन े की मंजूर वविेर् कारणों के बबना, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, नह ं द जाएगी : परन्तु यह भी कक कोई थथगन केवि इस प्रयोजन के लिए नह ं मंजूर ककया जाएगा कक वह अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को उस पर अधधरोवपत ककए जाने के लिए प्रथथावपत दंडादेि के ववरुद्ध हेतुक दलितष करने में समथ ष बनाए : परंतु यह भी कक— (क) कोई भी थथगन ककसी पिकार के अनुरोध पर तभी मजं ूर ककया जाएगा, जब पररस्थथनतयां उस पिकार के ननयंत्रण से परे हों ; (ि) जहां पररस्थथनतयां पिकार के ननयंत्रण से बाहर है, न्यायािय द्वारा अन्य पिकारों के आिेपों की सुनवाई के पश्चात ् और ऐसे कारणों से जो अलभलिखित ककए जाएं, दो से अनधधक आथथगन प्रदान ककए जा सकेंगे; (ग) यह तथ्य कक पिकार का अधधवक्ट्ता ककसी अन्य न्यायािय में व्यथत है, थथगन के लिए आधार नह ं होगा ; (घ) जहां सािी न्यायािय में उपस्थथत है ककंत ु पिकार या उसका अधधवक्ट्ता उपस्थथत नह ं है या पिकार या उसका अधधवक्ट्ता न्यायािय में उपस्थथत तो है, ककंत ु सािी की पर िा या प्रनतपर िा करने के लिए तैयार नह ं है, वहां यहद302 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न्यायािय ठीक समझता है तो वह सािी का कथन अलभलिखित कर सकेगा और ऐसे आदेि पाररत कर सकेगा, जो, यथास्थथनत, सािी की मुख्य पर िा या पुनः वापस से छूट देने के लिए ठीक समझे । स्पष् टीकरण 1—यहद यह सदं ेह करन े के लिए पयाषप् त साक्ष्य प्राप् त कर लिया गया है कक हो सकता है कक अलभयुक्ट् त ने अपराध ककया है और यह संभाव्य प्रतीत होता है कक प्रनतप्रेर्ण करन े पर अनतररक्ट् त साक्ष्य प्राप् त ककया जा सकता है तो यह प्रनतप्रेर्ण के लिए एक उधचत कारण होगा । स्पष् टीकरण 2—स्जन ननबंधनों पर कोई आथथगन या थथगन करना मंजूर ककया जा सकता है, उनके अन्तगतष समुधचत मामिों में अलभयोजन या अलभयुक्ट् त द्वारा िचों का हदया जाना भी है । थथानीय 347. (1) कोई न्यायाधीि या मस्जथरेट ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह के ननर िण । ककसी प्रिम में, पिकारों को सम्यक् सूचना देने के पश् चात ् ककसी थथान में, स्जसमें अपराध का ककया जाना अलभकधथत है, या ककसी अन्य थथान में जा सकेगा और उसका ननर िण कर सकेगा, स्जसके बारे में उसकी राय है कक उसका अविोकन ऐसी जांच या ववचारण में हदए गए साक्ष्य का उधचत वववेचन करने के प्रयोजन से आवश्यक है और ऐसे ननर िण में देि े गए ककन्ह ं सुसंगत तथ्यों का ज्ञापन, अनावश्यक वविम्ब के बबना, िेिबद्ध करेगा । (2) ऐसा ज्ञापन मामि े के अलभिेि का भाग होगा और यहद अलभयोजक, पररवाद या अलभयुक्ट् त या मामि े का अन्य कोई पिकार ऐसा चाहे तो उस े ज्ञापन की प्रनतलिवप नन:िुलक द जाएगी । आवश्यक सािी 348. कोई न्यायािय इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य को समन करन े कायवष ाह के ककसी प्रिम में ककसी व्यस्क्ट् त को सािी के रूप में समन कर सकेगा या या उपस्थथत ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त की, जो उपस्थथत हो, यद्यवप वह सािी के रूप में समन नह ं ककया व्यस्क्ट् त की पर िा करने की गया हो, पर िा कर सकेगा, ककसी व्यस्क्ट् त को, स्जसकी पहिे पर िा की जा चुकी है पुन: िस्क्ट् त । बुिा सकता है और उसकी पनु : पर िा कर सकेगा ; और यहद न्यायािय को मामिे के न्यायसंगत ववननश् चय के लिए ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त का साक्ष्य आवश्यक प्रतीत होता है तो वह ऐसे व्यस्क्ट् त को समन करेगा और उसकी पर िा करेगा या उस े पुन: बुिाएगा और उसकी पुन: पर िा करेगा । नमूना हथतािर 349. यहद प्रथम वग ष मस्जथरेट का यह समाधान हो जाता है कक इस संहहता के या हथतिेि देन े अधीन ककसी अन्वेर्ण या कायवष ाह के प्रयोजनों के लिए, ककसी व्यस्क्ट् त को, स्जसके के लिए ककसी अन्तगषत अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त भी है, नमूना हथतािर या हथतिेि या आवाज का सपैं ि देने व्यस्क्ट् त को आदेि देने की के लिए ननदेि देना समीचीन है, तो वह उस आिय का आदेि कर सकेगा और उस दिा मस्जथरेट की में, वह व्यस्क्ट् त, स्जससे आदेि संबंधधत है, ऐसे आदेि में ववननहदषष् ट समय और थथान पर िस्क्ट् त । प्रथतुत ककया जाएगा या वहा ं उपस्थथत होगा और अपने नमूना हथतािर या हथतिेि या आवाज का सैपि देगा: परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेि तब तक नह ं ककया जाएगा जब तक उस व्यस्क्ट् त को ऐसे अन्वेर्ण या कायवष ाह के संबंध में ककसी समय धगरफ्तार न ककया गया हो:अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 303 परंतु यह और कक मस्जथरेट ऐसे कारणों से जो अलभलिखित ककए जाएं, ककसी अन्य व्यस्क्ट्त को धगरफ्तार ककए बबना ऐसा नमूना या सपैं ि देने के लिए आदेि कर सकेगा । 350. राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ककन्ह ं ननयमों के अधीन रहत े हुए, यहद कोई पररवाहदयों और साक्षियों के दंड न्यायािय ठीक समझता है तो वह ऐसे न्यायािय के समि इस संहहता के अधीन व्यय । ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह के प्रयोजन से उपस्थथत होने वािे ककसी पररवाद या सािी के उधचत व्ययों के राज्य सरकार द्वारा हदए जाने के लिए आदेि दे सकेगा । 351. (1) प्रत्येक जांच या ववचारण में, इस प्रयोजन से कक अलभयुक्ट् त अपने ववरुद्ध अलभयुक्ट् त की पर िा करन े की साक्ष्य में प्रकट होने वाि ककन्ह ं पररस्थथनतयों का थवयं थपष् ट करण कर सके, िस्क्ट् त । न्यायािय— (क) ककसी प्रिम में, अलभयुक्ट् त को पहिे स े चेतावनी हदए बबना, उससे ऐस े प्रश् न कर सकेगा जो न्यायािय आवश्यक समझे; (ि) अलभयोजन के साक्षियों की पर िा ककए जाने के पश् चात ् और अलभयुक्ट् त से अपनी प्रनतरिा करन े की अपेिा ककए जाने के पूव ष उस मामि े के बारे में उसस े साधारणतया प्रश् न करेगा: परन्तु ककसी समन मामि े में, जहां न्यायािय ने अलभयुक्ट् त को वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत से अलभमुस्क्ट् त दे द है, वहां वह िंड (ि) के अधीन उसकी पर िा से भी अलभमुस्क्ट् त दे सकेगा । (2) जब अलभयुक्ट् त की उपधारा (1) के अधीन पर िा की जाती है तब उसे कोई िपथ नह ं हदिाई जाएगी । (3) अलभयुक्ट् त ऐसे प्रश् नों के उत्तर देने से इंकार करने से या उसके लमथ्या उत्तर देने से दंडनीय न हो जाएगा । (4) अलभयुक्ट् त द्वारा हदए गए उत्तरों पर उस जांच या ववचारण में ववचार ककया जा सकेगा और ककसी अन्य ऐसे अपराध की, स्जसका उसके द्वारा ककया जाना दिाषने की उन उत्तरों की प्रववृत्त हो, ककसी अन्य जांच या ववचारण में ऐसे उत्तरों को उसके पि में या उसके ववरुद्ध साक्ष्य के रूप में रिा जा सकेगा । (5) न्यायािय ऐसे सुसंगत प्रश् न तैयार करने में, जो अलभयुक्ट् त से पूछे जाने हैं, अलभयोजक और प्रनतरिा काउंसेि की सहायता िे सकेगा और न्यायािय इस धारा के पयाषप् त अनुपािन के रूप में अलभयुक्ट् त द्वारा लिखित कथन फाइि ककए जाने की अनज्ञु ा दे सकेगा । 352. (1) कायवष ाह का कोई पिकार, अपने साक्ष्य की समास्प् त के पश् चात ् मौखिक बहस और बहस का यथािक्ट्य िीघ्र संक्षिप् त मौखिक बहस कर सकेगा और अपनी मौखिक बहस, यहद कोई ज्ञापन । हो, पूर करन े के पूव,ष न्यायािय को एक ज्ञापन दे सकेगा स्जसमें उसके पि के समथनष में तकष संिेप में और सुलभन्न िीर्कष ों में हदए जाएंगे, और ऐसा प्रत्येक ज्ञापन अलभिेि का भाग होगा । (2) ऐसे प्रत्येक ज्ञापन की एक प्रनतलिवप उसी समय ववरोधी पिकार को द जाएगी । (3) कायवष ाहहयों का कोई थथगन लिखित बहस फाइि करन े के प्रयोजन के लिए तब304 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तक नह ं हदया जाएगा जब तक न्यायािय ऐसे कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, ऐसा थथगन मंजूर करना आवश्यक न समझे । (4) यहद न्यायािय की यह राय है कक मौखिक बहस संक्षिप्त या सुसंगत नह ं है तो वह ऐसी बहसों को ववननयलमत कर सकेगा । अलभयुक्ट् त 353. (1) कोई व्यस्क्ट् त, जो ककसी अपराध के लिए ककसी दंड न्यायािय के समि व्यस्क्ट् त का अलभयुक्ट् त है, प्रनतरिा के लिए सिम सािी होगा और अपने ववरुद्ध या उसी ववचारण में सिम सािी उसके साथ आरोवपत ककसी व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध िगाए गए आरोपों को नासाबबत करन े के होना । लिए िपथ पर साक्ष्य दे सकेगा : परन्तु— (क) वह थवयं अपनी लिखित प्राथनष ा के बबना सािी के रूप में नह ं बुिाया जाएगा, (ि) उसका थवय ं साक्ष्य नह ं देना पिकारों में से ककसी के द्वारा या न्यायािय द्वारा ककसी ट का-हटप्पणी का ववर्य नह ं बनाया जाएगा और न ह उस े उसके, या उसी ववचारण में उसके साथ आरोवपत ककसी व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध कोई उपधारणा ह की जाएगी । (2) कोई व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध ककसी दंड न्यायािय में धारा 101 या धारा 126 या धारा 127 या धारा 128 या धारा 129 के अधीन या अध्याय 10 के अधीन या अध्याय 11 के भाग ि, भाग ग या भाग घ के अधीन कायवष ाहहयां संस्थथत की जाती हैं, ऐसी कायवष ाहहयों में अपने आपको सािी के रूप में प्रथतुत कर सकेगा : परन्तु धारा 127, धारा 128 या धारा 129 के अधीन कायवष ाहहयों में ऐस े व्यस्क्ट् त द्वारा साक्ष्य नह ं देना पिकारों में से ककसी के द्वारा या न्यायािय द्वारा ककसी ट का- हटप्पणी का ववर्य नह ं बनाया जाएगा और न उससे उसके या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध स्जसके ववरुद्ध उसी जांच में ऐसे व्यस्क्ट् त के साथ कायवष ाह की गई है, कोई उपधारणा ह की जाएगी । प्रकटन उत् प्ररेरत 354. धारा 343 और धारा 344 में जैसा उपबंधधत है उसके लसवाय, ककसी वचन या करन े के लिए धमकी द्वारा या अन्यथा कोई प्रभाव अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त पर इस उद्देश्य से नह ं डािा ककसी प्रभाव का जाएगा कक उस े अपनी जानकार की ककसी बात को प्रकट करन े या न करन े के लिए काम में नह ं िाया जाना । उत् प्रेररत ककया जाए । कुछ मामिों में 355. (1) इस संहहता के अधीन जांच या ववचारण के ककसी प्रिम में यहद अलभयुक्ट् त की न्यायाधीि या मस्जथरेट का उन कारणों से, जो अलभलिखित ककए जाएंगे, समाधान हो अनुपस्थथनत में जाता है कक न्यायािय के समि अलभयुक्ट् त की वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत न्याय के हहत में जांच और ववचारण ककए आवश्यक नह ं है या अलभयुक्ट् त न्यायािय की कायवष ाहहयों में बार-बार ववघ् न डािता है तो, जान े के लिए ऐसे अलभयुक्ट् त का प्रनतननधधत्व अधधवक्ट्ता द्वारा ककए जाने की दिा में, वह न्यायाधीि उपबंध । या मस्जथरेट उसकी उपस्थथनत से उस े अलभमुस्क्ट् त दे सकेगा और उसकी अनुपस्थथनत में ऐसी जांच या ववचारण करने के लिए अग्रसर हो सकेगा और कायवष ाहहयों के ककसी पश् चात व् ती प्रिम में ऐसे अलभयुक्ट् त की वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत का ननदेि दे सकेगा । (2) यहद ऐस े ककसी मामि े में अलभयुक्ट् त का प्रनतननधधत्व अधधवक्ट्ता द्वारा नह ं ककया जा रहा है या यहद न्यायाधीि या मस्जथरेट का यह ववचार है कक अलभयुक्ट् त कीअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 305 वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत आवश्यक है तो, यहद वह ठीक समझे तो, उन कारणों से, जो उसके द्वारा िेिबद्ध ककए जाएंगे, वह या तो ऐसी जांच या ववचारण आथथधगत कर सकेगा या आदेि दे सकेगा कक ऐस े अलभयुक्ट् त का मामिा अिग स े लिया जाए या ववचाररत ककया जाए । स्पष्टीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, अलभयुक्ट्त की वैयस्क्ट्तक उपस्थथनत में श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से उपस्थथनत भी सस्म्मलित है । 356. (1) इस संहहता या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध में अंतववष्ष ट ककसी बात उद्घोवर्त अपराधी की के होते हुए भी, जब ककसी व्यस्क्ट्त को उद्घोवर्त अपराधी घोवर्त ककया जाता है, चाहे उस अनुपस्थथनत में पर संयुक्ट्त रूप से आरोप िगाया गया हो या नह ं, ववचारण की वंचना करने के लिए फरार जांच, ववचारण है और उसे धगरफ्तार करने का कोई तात्कालिक पूवेिण नह ं है, इसे ऐसे व्यस्क्ट्त के या ननणयष । उपस्थथत होने और वैयस्क्ट्तक ववचारण के अधधकार के अलभत्याग के रूप में प्रवनततष होना समझा जाएगा और न्यायािय ऐसे कारणों से जो अलभलिखित ककए जाएं, न्याय हहत में ऐसी र नत में और ऐसे प्रभाव के साथ, मानो वह उपस्थथत था, इस संहहता के अधीन ववचारण के लिए अग्रसर होगा और ननणषय सुनाएगा: परंतु न्यायािय तब तक ववचारण प्रारंभ नह ं करेगा, जब तक कक आरोप की ववरचना की तार ि से नब्बे हदन की अवधध की समास्प्त नह ं हो जाती है । (2) न्यायािय यह सुननस्श्चत करेगा कक आगामी प्रकिया का उपधारा (1) के अधीन कायवष ाह से पहिे अनुपािन ककया गया है, अथाषत ् :— (i) कम से कम तीस हदन के अंतराि पर िगातार दो धगरफ्तार वारंटों को जार करना ; (ii) उद्घोवर्त अपराधी से ववचारण के लिए न्यायािय के समि उपस्थथत होने की अपेिा करते हुए और उसे सूचना देते हुए कक यहद वह ऐसे प्रकािन की तार ि से तीस हदन के भीतर प्रथतुत होने में असफि रहता है, तो उसकी अनुपस्थथनत में ववचारण ककया जाएगा, उसके अंनतम ज्ञात ननवास थथान पर पररचालित राष्र य या थथानीय दैननक समाचार में प्रकािन; (iii) उसके नातेदार या लमत्र, यहद कोई हो, को ववचारण के प्रारंभ होने के बारे में सूचना ; और (iv) उस गहृ या वास थथान, स्जसमें ऐसा व्यस्क्ट्त मामूि तौर पर ननवास करता है, के ककसी सहजदृश्य थथान पर ववचारण के प्रारंभ होने के बारे में सूचना धचपकाना और उसके अंनतम ज्ञात ननवास के स्जिे के पुलिस थटेिन में प्रदिनष । (3) जहां उद्घोवर्त अपराधी का ककसी अधधवक्ट्ता द्वारा प्रनतननधधत्व नह ं ककया जाता है, तो उसके लिए राज्य के व्यय पर अपनी प्रनतरिा के लिए एक अधधवक्ट्ता का प्रबंध ककया जाएगा । (4) जहां मामिे का ववचारण करने या ववचारण के लिए सुपुदषगी के लिए सिम न्यायािय ने अलभयोजन के लिए ककन्ह ं साक्षियों की पर िा की है और उनके अलभसाक्ष्यों को अलभलिखित ककया है, ऐसे अलभसाक्ष्य, ऐसे अपराध स्जसके लिए उद्घोवर्त अपराधी को आरोवपत ककया गया है, की जांच या ववचारण में उसके ववरुद्ध साक्ष्य में हदए जाएंगे: परंतु यहद उद्घोवर्त अपराधी ऐसे ववचारण के दौरान धगरफ्तार ककया जाता है और306 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न्यायािय के समि प्रथतुत ककया जाता है या उपस्थथत होता है, तो न्यायािय न्याय हहत में उसे ककसी ऐसे साक्ष्य, जो उसकी अनुपस्थथनत में लिया गया है, की पर िा करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा । (5) जहां ववचारण इस धारा के अधीन व्यस्क्ट्त से संबंधधत है, तो साक्षियों का अलभसाक्ष्य और पर िा, जहां तक व्यवहाय ष हो, श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों, अधधमानत: मोबाइि द्वारा अलभलिखित की जा सकेगी और ऐसी ररकाडडगां ऐसी र नत में रिी जाएगी, जो न्यायािय ननदेि दे । (6) इस संहहता के अधीन अपराधों के अलभयोजन में, उपधारा (1) के अधीन ववचारण प्रारंभ होने के पश्चात ् अलभयुक्ट्त की थवेच्छया अनुपस्थथनत, ववचारण, स्जसके अंतगतष ननणषय सुनाया जाना भी है, जार रहने को नह ं रोकेगी, यद्यवप वह ऐसे ववचारण की समास्प्त पर धगरफ्तार और प्रथतुत ककया जाता है या उपस्थथत होता है । (7) इस धारा के अधीन ककए गए ननणयष के ववरुद्ध तब तक अपीि नह ं होगी जब तक उद्घोवर्त अपराधी थवयं को अपीि य न्यायािय के समि उपस्थथत नह ं कर देता : परंतु दोर्लसद्धध के ववरुद्ध कोई अपीि ननणषय की तार ि से तीन वर् ष के अवसान के पश्चात ् नह ं होगी । (8) राज्य अधधसूचना द्वारा धारा 84 की उपधारा (1) में उस्लिखित ककसी फरार व्यस्क्ट्त पर इस धारा के उपबंधों का ववथतार कर सकेगी । प्रकिया जहां 357. यहद अलभयुक्ट् त ववकृतधचत्त व्यस्क्ट्त नह ं होने पर भी ऐसा है कक उस े अलभयुक्ट् त कायवष ाहहयां समझाई नह ं जा सकतीं तो न्यायािय जांच या ववचारण में अग्रसर हो कायवष ाहहयों को सकेगा; और उच् च न्यायािय से लभन्न न्यायािय की दिा में, यहद ऐसी कायवष ाह का नह ं समझता है । पररणाम दोर्लसद्धध है, तो कायवष ाह को मामि े की पररस्थथनतयों की ररपोटष के साथ उच् च न्यायािय भेज हदया जाएगा और उच् च न्यायािय उस पर ऐसा आदेि देगा जैसा वह ठीक समझे । अपराध के दोर्ी 358. (1) जहां ककसी अपराध की जांच या ववचारण के दौरान साक्ष्य से यह प्रतीत प्रतीत होन े वाि े होता है कक ककसी व्यस्क्ट् त ने, जो अलभयुक्ट् त नह ं है, कोई ऐसा अपराध ककया है स्जसके अन्य व्यस्क्ट् तयों लिए ऐसे व्यस्क्ट् त का अलभयुक्ट् त के साथ ववचारण ककया जा सकता है, वहां न्यायािय उस के ववरुद्ध व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध उस अपराध के लिए स्जसका उसके द्वारा ककया जाना प्रतीत होता है, कायवष ाह करने की िस्क्ट्त । कायवष ाह कर सकेगा । (2) जहां ऐसा व्यस्क्ट् त न्यायािय में उपस्थथत नह ं है वहां पूवोक्ट् त प्रयोजन के लिए उस े मामि े की पररस्थथनतयों की अपेिानुसार, धगरफ्तार या समन ककया जा सकेगा । (3) कोई व्यस्क्ट् त जो धगरफ्तार या समन न ककए जान े पर भी न्यायािय में उपस्थथत है, ऐसे न्यायािय द्वारा उस अपराध के लिए, स्जसका उसके द्वारा ककया जाना प्रतीत होता है, जांच या ववचारण के प्रयोजन के लिए ननरुद्ध ककया जा सकेगा । (4) जहां न्यायािय ककसी व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध उपधारा (1) के अधीन कायवष ाह करता है, वहां— (क) उस व्यस्क्ट् त के बारे में कायवष ाहहयां कफर से प्रारंभ की जाएगी ं और साक्षियों को कफर स े सुना जाएगा; (ि) िंड (क) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, मामि े में ऐसे कायवष ाह की जाअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 307 सकेगी, मानो वह व्यस्क्ट् त उस समय अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त था जब न्यायािय ने उस अपराध का संज्ञान ककया था स्जस पर जांच या ववचारण प्रारंभ ककया गया था । 359. (1) नीचे द गई सारणी के प्रथम दो थतम्भों में ववननहदषष् ट भारतीय न्याय अपराधों का िमन । 2023 का 45 संहहता, 2023 की धाराओ ं के अधीन दंडनीय अपराधों का िमन उस सारणी के ततृ ीय थतम्भ में उस्लिखित व्यस्क्ट् तयों द्वारा ककया जा सकेगा :— सारणी अपराध भारतीय न्याय वह व्यस्क्ट् त स्जसके द्वारा अपराध संहहता, 2023 की का िमन ककया जा सकेगा धारा जो िागू होती है 1 2 3 ककसी वववाहहत महहिा को आपराधधक 84 महहिा का पनत और महहिा दरु ािय से फुसिाकर िे जाना या ि े जाना या ननरुद्ध रिना । थवेच्छया उपहनत काररत करना । 115(2) वह व्यस्क्ट् त स्जसे उपहनत काररत की गई है । प्रकोपन पर थवेच्छया उपहनत काररत 122(1) वह व्यस्क्ट् त स्जसे उपहनत काररत की करना । गई है । गंभीर और अचानक प्रकोपन पर 122(2), वह व्यस्क्ट् त स्जसे उपहनत काररत की थवेच्छया घोर उपहनत काररत करना । गई है । ककसी व्यस्क्ट् त का सदोर् अवरोध या 126(2) 127(2) वह व्यस्क्ट् त जो अवरुद्ध या परररुद्ध परररोध । ककया गया है । ककसी व्यस्क्ट् त का तीन या अधधक हदनों 127(3) परररुद्ध व्यस्क्ट् त । के लिए सदोर् परररोध । ककसी व्यस्क्ट् त का दस या अधधक हदनों 127(4) परररुद्ध व्यस्क्ट् त । के लिए सदोर् परररोध । ककसी व्यस्क्ट् त का गुप् त थथान में सदोर् 127(6) परररुद्ध व्यस्क्ट् त । परररोध । हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग । 131, 133, 136 वह व्यस्क्ट् त स्जस पर हमिा या आपराधधक बि का प्रयोग ककया गया है । ककसी व्यस्क्ट् त की धालमकष भावनाओं को 302 वह व्यस्क्ट् त स्जसकी धालमकष भावनाओं ठेस पहुंचान े के ववमलितष आिय स े को ठेस पहुंचना आिनयत है । िब्द उच्च ाररत करना, आहद । चोर । 303(2) चुराई हुई संपवत्त का थवामी । संपवत्त का बेईमानी स े दवुवनषनयोग । 314 दवुवनषनयोस्जत संपवत्त का थवामी । वाहक, घाटवाि, आहद द्वारा 316(3) उस संपवत्त का थवामी, स्जसके सबं ंध आपराधधक न्यास-भंग । में न्यास-भंग ककया गया है । चुराई हुई सपं वत्त को, उसे चुराई हुई 317(2) चुराई हुई संपवत्त का थवामी । जानत े हुए बेईमानी से प्राप्त करना ।308 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— 1 2 3 चुराई हुई संपवत्त को, यह जानते हुए 317(5) चुराई हुई संपवत्त का थवामी । कक वह चुराई हुई है, नछपाने में या व्ययननत करने में सहायता करना । छि । 318(2) वह व्यस्क्ट् त स्जससे छि ककया गया है । प्रनतरूपण द्वारा छि । 319(2) वह व्यस्क्ट् त स्जससे छि ककया गया है । िेनदारों में ववतरण ननवाररत करने के 320 उससे प्रभाववत िेनदार । लिए संपवत्त आहद का कपटपूवकष अपसारण या नछपाना । अपराधी का अपने को िोध्य ऋण या 321 उससे प्रभाववत िेनदार । मांग का िेनदारों के लिए उपिब्ध ककया जाना कपटपूवकष ननवाररत करना । अंतरण के ऐसे वविेि का, स्जसमें 322 उससे प्रभाववत व्यस्क्ट् त । प्रनतफि के संबंध में लमथ्या कथन अंतववष्ष ट है, कपटपूवकष ननष्पादन । संपवत्त का कपटपूवकष अपसारण या 323 उससे प्रभाववत व्यस्क्ट् त । नछपाया जाना । ररस्ष्ट , जब काररत हानन या नकु सान 324(2), 324(4) वह व्यस्क्ट् त, स्जसे हानन या नुकसान केवि प्राइवेट व्यस्क्ट् त को हुई हानन या हुआ है । नुकसान है । जीवजन्त ु का वध करने या उस े 325 जीवजन्त ु का थवामी । ववकिांग करन े के द्वारा ररस्ष्ट । लसचं न संकम ष को िनत करने या जि 326(क) वह व्यस्क्ट् त, स्जसे हानन या नुकसान को दोर्पूवकष मोडन े के द्वारा ररस्ष्ट , हुआ है । जब उससे काररत हानन या नकु सान केवि प्राइवेट व्यस्क्ट् त को हुई हानन या नुकसान है । आपराधधक अनतचार । 329(3) वह व्यस्क्ट् त स्जसके कब्ज े में ऐसी संपवत्त है स्जस पर अनतचार ककया गया है । गहृ -अनतचार । 329(4) वह व्यस्क्ट् त स्जसके कब्ज े में ऐसी संपवत्त है स्जस पर अनतचार ककया गया है । कारावास स े दंडनीय अपराध को 332(ग) वह व्यस्क्ट् त स्जसका उस गहृ पर (चोर से लभन्न ) करन े के लिए गहृ - कब्जा है स्जस पर अनतचार ककया अनतचार । गया है । लमथ्या व्यापार या संपवत्त धचह्न का 345(3) वह व्यस्क्ट् त, स्जसे ऐसे उपयोग से उपयोग । हानन या िनत काररत हुई है । अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा उपयोग में िाए 347(1) वह व्यस्क्ट् त, स्जसे ऐसे उपयोग से गए संपवत्त धचह्न का कूटकरण । हानन या िनत काररत हुई है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 309 1 2 3 कूटकृत संपवत्त धचह्न के साथ 349 वह व्यस्क्ट् त, स्जसे ऐसे उपयोग से धचस्ह्नत माि का वविय । हानन या िनत काररत हुई है । अपराधधक अलभत्रास । 351(2), 351(3) अलभत्रथत व्यस्क्ट् त । िोक-िांनत भंग कराने को प्रकोवपत 352 अपमाननत व्यस्क्ट् त । करने के आिय स े अपमान । ककसी व्यस्क्ट् त को यह ववश्व ास करने के 354 वह व्यस्क्ट् त स्जसे उत् प्रेररत ककया लिए उत् प्रेररत करके कक वह दैवी गया । अप्रसाद का भाजन होगा, कराया गया काय ष । उपधारा (2) के अधीन सारणी के थतंभ 356(2) वह व्यस्क्ट् त स्जसकी मानहानन की (1) में भारतीय न्याय संहहता, 2023 गई है । की धारा 356(2) के सामन े यथाववननहदषष्ट ऐसे मामिों के लसवाय, मानहानन । मानहाननकारक जानी हुई बात को 356(3) वह व्यस्क्ट् त स्जसकी मानहानन की मुहद्रत या उत्कीण ष करना । गई है । मानहाननकारक ववर्य रिन े वािे मुहद्रत 356(4) वह व्यस्क्ट् त स्जसकी मानहानन की या उत्कीण ष पदाथ ष का यह जानते हुए गई है । बेचना कक उसमें ऐसा ववर्य अतं ववष्ष ट है । सेवा संववदा का आपराधधक भंग 357 वह व्यस्क्ट् त स्जसके साथ अपराधी न े संववदा की है । (2) नीचे द गई सारणी के प्रथम दो थतम्भों में ववननहदषष् ट भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धाराओं के अधीन दंडनीय अपराधों का िमन उस न्यायािय की अनुज्ञा से, स्जसके समि ऐसे अपराध के लिए कोई अलभयोजन िंबबत है, उस सारणी के ततृ ीय थतंभ में उलिेखित व्यस्क्ट् तयों द्वारा ककया जा सकेगा :— सारणी अपराध भारतीय न्याय वह व्यस्क्ट् त स्जसके द्वारा अपराध संहहता की धारा िमन ककया जा सकता है जो िागू होती है 1 2 3 िब्द, अंगवविेप या काय,ष जो ककसी 79 वह महहिा स्जसका अनादर करना महहिा की िज्जा का अनादर करने के आिनयत था या स्जसकी एकातं ता लिए आिनयत है । का अनतिमण ककया गया था । पनत या पत् नी के जीवनकाि में पुन: 82(1) ऐसे वववाह करने वािे व्यस्क्ट् त का वववाह करना । पनत या पत्न ी । गभपष ात काररत करना । 88 वह महहिा स्जसका गभपष ात ककया गया है । थवेच्छया घोर उपहनत काररत करना । 117(2) वह व्यस्क्ट् त स्जसे उपहनत काररत की गई है ।310 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— 1 2 3 उताविेपन और उपेिा स े ककसी काय ष 125(क) वह व्यस्क्ट् त स्जसे उपहनत काररत की द्वारा उपहनत काररत करना स्जसस े गई है । मानव जीवन या दसू रों का वैयस्क्ट् तक िेम संकटापन्न हो जाए । उताविेपन और उपेिा स े ककसी काय ष 125(ि) वह व्यस्क्ट् त स्जसे उपहनत काररत की द्वारा घोर उपहनत काररत करना गई है । स्जससे मानव जीवन या दसू रों का वैयस्क्ट् तक िेम सकं टापन्न हो जाए । ककसी व्यस्क्ट् त का सदोर् परररोध करन े 135 वह व्यस्क्ट् त स्जस पर हमिा ककया के प्रयत् न में हमिा या आपराधधक बि गया या स्जस पर बि का प्रयोग का प्रयोग । ककया गया था । लिवपक या सेवक द्वारा थवामी के 306 चुराई हुई संपवत्त का थवामी । कब्जे की संपवत्त की चोर । आपराधधक न्यास-भंग । 316(2) उस संपवत्त का थवामी, स्जसके सबं ंध में न्यास-भंग ककया गया है । लिवपक या सेवक द्वारा आपराधधक 316(4) उस संपवत्त का थवामी, स्जसके सबं ंध न्यास-भंग । में न्यास-भंग ककया गया है । ऐसे व्यस्क्ट् त के साथ छि करना 318(3) वह व्यस्क्ट् त, स्जसस े छि ककया गया स्जसका हहत संरक्षित रिन े के लिए है । अपराधी या तो ववधध द्वारा या वैध संववदा द्वारा आबद्ध था । छि करना या संपवत्त पररदत्त करने या 318(4) वह व्यस्क्ट् त, स्जसस े छि ककया गया मूलयवान प्रनतभूनत की रचना करने या है । उसे पररवनततष या नष्ट करने के लिए बेईमानी से उत् प्रेररत करना । राष्रपनत या उपराष्रपनत या राज्य के 356(2) वह व्यस्क्ट् त स्जसकी मानहानन की राज्यपाि अथवा संघ राज्यित्रे के गई है । प्रिासक या ककसी मंत्री के ववरुद्ध उसके िोक कृत्यों के संबधं में मानहानन, जब िोक अलभयोजक द्वारा ककए गए पररवाद पर संस्थथत की जाए । (3) जब कोई अपराध इस धारा के अधीन िमनीय है, तब ऐसे अपराध के दष्ु प्रेरण का, या ऐसे अपराध को करन े के प्रयत् न का (जब ऐसा प्रयत् न थवयं अपराध हो) या जहां अलभयुक्ट् त भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 3 की उपधारा (5) या धारा 190 के 2023 का 45 अधीन दायी हो, िमन उसी प्रकार स े ककया जा सकेगा । (4) (क) जब वह व्यस्क्ट् त, जो इस धारा के अधीन अपराध का िमन करन े के लिए अन्यथा सिम होता, बािक है या ववकृतधचत्त है, तब कोई व्यस्क्ट् त जो उसकी ओर से संववदा करन े के लिए सिम हो, न्यायािय की अनुज्ञा स,े ऐस े अपराध का िमन कर सकेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 311 (ि) जब वह व्यस्क्ट् त, जो इस धारा के अधीन अपराध का िमन करन े के लिए 1908 का 5 अन्यथा सिम होता, मर जाता है तब ऐस े व्यस्क्ट् त का, लसववि प्रकिया संहहता, 1908 में यथापररभावर्त, ववधधक प्रनतननधध, न्यायािय की सम्मनत से, ऐसे अपराध का िमन कर सकेगा । (5) जब अलभयुक्ट् त ववचारणाथष सुपुदष कर हदया जाता है या जब वह दोर्लसद्ध कर हदया जाता है और अपीि िंबबत है, तब अपराध का िमन, यथास्थथनत, उस न्यायािय की इजाजत के बबना अनुज्ञात नह ं ककया जाएगा स्जसे वह सुपुदष ककया गया है, या स्जसके समि अपीि सुनी जानी है । (6) धारा 442 के अधीन पुनर िण की अपनी िस्क्ट् तयों के प्रयोग में काय ष करते हुए उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय ककसी व्यस्क्ट् त को ककसी ऐसे अपराध का िमन करन े की अनुज्ञा दे सकेगा स्जसका िमन करन े के लिए वह व्यस्क्ट् त इस धारा के अधीन सिम है । (7) यहद अलभयुक्ट् त पूव ष दोर्लसद्धध के कारण ककसी अपराध के लिए या तो वधधषत दंड से या लभन् न ककथम के दंड से दंडनीय है तो ऐसे अपराध का िमन नह ं ककया जाएगा । (8) इस धारा के अधीन अपराध के िमन का प्रभाव उस अलभयुक्ट् त की दोर्मुस्क्ट् त होगा स्जससे अपराध का िमन ककया गया है । (9) अपराध का िमन इस धारा के उपबंधों के अनुसार ह ककया जाएगा, अन्यथा नह ं । 360. ककसी मामि े का भारसाधक कोई िोक अलभयोजक या सहायक िोक अलभयोजन वापस िेना । अलभयोजक ननणषय सुनाए जाने के पूव ष ककसी समय ककसी व्यस्क्ट् त के अलभयोजन को या तो साधारणत: या उन अपराधों में स े ककसी एक या अधधक के बारे में, स्जनके लिए उस व्यस्क्ट् त का ववचारण ककया जा रहा है, न्यायािय की सम्मनत से वापस िे सकेगा और ऐसे वापस लिए जाने पर— (क) यहद वह आरोप ववरधचत ककए जाने के पहिे ककया जाता है तो अलभयुक्ट् त ऐसे अपराध या अपराधों के बारे में उन्मोधचत कर हदया जाएगा ; (ि) यहद वह आरोप ववरधचत ककए जाने के पश् चात ् या जब इस संहहता द्वारा कोई आरोप अपेक्षित नह ं है, तब ककया जाता है तो वह ऐसे अपराध या अपराधों के बारे में दोर्मुक्ट् त कर हदया जाएगा: परन्तु जहां— (i) ऐसा अपराध ककसी ऐसी बात से संबंधधत ककसी ववधध के ववरुद्ध है स्जस पर संघ की कायपष ालिका िस्क्ट् त का ववथतार है, या (ii) ऐसे अपराध का अन्वेर्ण ककसी केन्द्र य अधधननयम के अधीन ककया गया है, या (iii) ऐसे अपराध में केन्द्र य सरकार की ककसी सम्पवत्त का दवुवनषनयोग या नाि या नुकसान अन्तग्रथष त है, या (iv) ऐसा अपराध केन्द्र य सरकार की सेवा में ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ककया गया है, जब वह अपने पद य कतव्ष यों के ननवषहन में काय ष कर रहा है या काय ष करना तात्पनयषत है,312 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— और मामि े का भारसाधक अलभयोजक केन्द्र य सरकार द्वारा ननयुक्ट् त नह ं ककया गया है, तो वह जब तक केन्द्र य सरकार द्वारा उस े ऐसा करन े की अनुज्ञा नह ं द जाती है, अलभयोजन को वापस िेने के लिए न्यायािय से उसकी सम्मनत के लिए ननवेदन नह ं करेगा तथा न्यायािय अपनी सम्मनत देने के पूव,ष अलभयोजक को यह ननदेि देगा कक वह अलभयोजन को वापस िेने के लिए केन्द्र य सरकार द्वारा द गई अनुज्ञा उसके समि प्रथतुत करे: परंतु यह और कक कोई न्यायािय उस मामिे में पीडडत को सुनवाई का अवसर हदए बबना ऐसी वापसी अनुज्ञात नह ं करेगा । स्जन मामिों का 361. (1) यहद ककसी स्जिे में ककसी मस्जथरेट के समि अपराध की ककसी जांच या ननपटारा ववचारण के दौरान उस े ऐसा साक्ष्य प्रतीत होता है कक उसके आधार पर यह उपधारणा की मस्जथरेट नह ं जा सकती है कक— कर सकता, उनमें प्रकिया । (क) उस े मामिे का ववचारण करन े या ववचारणाथ ष सुपुदष करन े की अधधकाररता नह ं है, या (ि) मामिा ऐसा है जो स्जिे के ककसी अन्य मस्जथरेट द्वारा ववचाररत या ववचारणाथ ष सुपुदष ककया जाना चाहहए, या (ग) मामि े का ववचारण मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा ककया जाना चाहहए, तो वह कायवष ाहहयों को रोक देगा और मामि े की ऐसी संक्षिप् त ररपोटष सहहत, स्जसमें मामि े का थवरूप थपष् ट ककया गया है, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को या अधधकाररता वािे अन्य ऐसे मस्जथरेट को, स्जस े मुख्य न्यानयक मस्जथरेट ननहदषष् ट करे, भेज देगा । (2) यहद वह मस्जथरेट, स्जस े मामिा भेजा गया है, ऐसा करन े के लिए सिक्ट् त है, तो वह उस मामिे का ववचारण थवयं कर सकेगा या उस े अपने अधीनथथ अधधकाररता वािे मस्जथरेट को ननदेलित कर सकेगा या अलभयुक्ट् त को ववचारणाथ ष सुपुदष कर सकेगा । प्रकिया जब 362. यहद ककसी मस्जथरेट के समि अपराध की ककसी जाचं या ववचारण में ननणयष जांच या पर हथतािर करन े के पूव ष कायवष ाह के ककसी प्रिम में उस े यह प्रतीत होता है कक मामिा ववचारण के ऐसा है, स्जसका ववचारण सेिन न्यायािय द्वारा ककया जाना चाहहए, तो वह उस े इसमें प्रारंभ के पश् चात ् मस्जथरेट को इसके पूव ष अंतववष्ष ट उपबंधों के अधीन उस न्यायािय को सुपुदष कर देगा और तब अध्याय पता चिता है 19 के उपबंध ऐसी सुपुदषगी को िागू होंगे । कक मामिा सुपुदष ककया जाना चाहहए । लसक्ट् के, थटाम्प 363. (1) जहां कोई व्यस्क्ट् त भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अध्याय 10 या 2023 का 45 ववधध या अध्याय 17 के अधीन तीन वर् ष या अधधक की अवधध के लिए कारावास स े दंडनीय सम्पवत्त के अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककए जा चुकने पर उन अध्यायों में से ककसी के अधीन तीन ववरुद्ध अपराधों के लिए पूव ष में वर् ष या अधधक की अवधध के लिए कारावास से दंडनीय ककसी अपराध के लिए पुन: दोर्लसद्ध अलभयुक्ट् त है, और उस मस्जथरेट का, स्जसके समि मामिा िंबबत है, समाधान हो जाता व्यस्क्ट् तयों का है कक यह उपधारणा करन े के लिए आधार है कक ऐसे व्यस्क्ट् त ने अपराध ककया है तो वह ववचारण । उस दिा के लसवाय ववचारण के लिए मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को भेजा जाएगा या सेिन न्यायािय के सुपुदष ककया जाएगा, जब मस्जथरेट मामि े का ववचारण करन े के लिए सिमअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 313 है और उसकी यह राय है कक यहद अलभयुक्ट् त दोर्लसद्ध ककया गया तो वह थवयं उसे पयाषप् त दंड का आदेि दे सकता है । (2) जब उपधारा (1) के अधीन कोई व्यस्क्ट् त ववचारण के लिए मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को भेजा जाता है या सेिन न्यायािय को सुपुदष ककया जाता है तब कोई अन्य व्यस्क्ट् त, जो उसी जांच या ववचारण में उसके साथ संयुक्ट् तत: अलभयुक्ट् त है, वैसे ह भेजा जाएगा या सुपुदष ककया जाएगा जब तक ऐसे अन्य व्यस्क्ट् त को मस्जथरेट, यथास्थथनत, धारा 262 या धारा 268 के अधीन उन्मोधचत न कर दे । 364. (1) जब कभी अलभयोजन और अलभयुक्ट् त का साक्ष्य सुनन े के पश् चात ् प्रकिया जब मस्जथरेट मस्जथरेट की यह राय है कक अलभयुक्ट् त दोर्ी है और उस े उस प्रकार के दंड से लभन्न पयाषप् त कठोर प्रकार का दंड या उस दंड स े अधधक कठोर दंड, जो वह मस्जथरेट देने के लिए सिक्ट् त है, दंड का आदेि हदया जाना चाहहए या द्ववतीय वग ष मस्जथरेट होते हुए उसकी यह राय है कक अलभयुक्ट् त नह ं दे सकता । से धारा 125 के अधीन बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े की अपेिा की जानी चाहहए तब वह अपनी राय अलभलिखित कर सकेगा और कायवष ाहहयों तथा अलभयुक्ट् त को मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को, स्जसके वह अधीनथथ हो, भेज सकेगा । (2) जब एक से अधधक अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट्तयों का ववचारण एक साथ ककया जा रहा है और मस्जथरेट ऐसे अलभयुक्ट् तों में से ककसी के बारे में उपधारा (1) के अधीन कायवष ाह करना आवश्यक समझता है तब वह उन सभी अलभयुक्ट् तों को, जो उसकी राय में दोर्ी हैं, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को भेज देगा । (3) यहद मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, स्जसके पास कायवष ाहहयों भेजी जाती है, ठीक समझता है तो पिकारों की पर िा कर सकेगा और ककसी सािी को, जो पहिे ह मामिे में साक्ष्य दे चुका है, पुन: बिु ा सकता है और उसकी पर िा कर सकता है और कोई अनतररक्ट् त साक्ष्य मांग सकेगा और िे सकेगा और मामि े में ऐसा ननणयष , दंडादेि या आदेि देगा, जो वह ठीक समझता है और जो ववधध के अनुसार है । 365. (1) जब कभी ककसी जांच या ववचारण में साक्ष्य को पूणतष : या भागत: सुनने भागत: एक मस्जथरेट द्वारा और अलभलिखित करने के पश् चात ् कोई न्यायाधीि या मस्जथरेट उसमें अधधकाररता का और भागत: प्रयोग नह ं कर सकता है और कोई अन्य न्यायाधीि या मस्जथरेट, स्जसे ऐसी दसू रे मस्जथरेट अधधकाररता है और जो उसका प्रयोग करता है, उसका उत्तरवती हो जाता है, तो ऐसा द्वारा उत्तरवती न्यायाधीि या मस्जथरेट अपने पूववष ती द्वारा ऐस े अलभलिखित या भागत: अपने अलभलिखित साक्ष्य पर पूववष ती द्वारा अलभलिखित और भागत: अपने द्वारा अलभलिखित साक्ष्य पर काय ष कर दोर्लसद्धध या सकता है : सुपुदषगी । परन्तु यहद उत्तरवती न्यायाधीि या मस्जथरेट की यह राय है कक साक्षियों में स े ककसी की स्जसका साक्ष्य पहिे ह अलभलिखित ककया जा चुका है, अनतररक्ट् त पर िा करना न्याय के हहत में आवश्यक है, तो वह ककसी भी ऐसे सािी को पुन: समन कर सकेगा और ऐसी अनतररक्ट् त पर िा, प्रनतपर िा और पुन:पर िा के, यहद कोई हो, जैसी वह अनुज्ञात करे, पश् चात ् वह सािी उन्मोधचत कर हदया जाएगा । (2) जब कोई मामिा एक न्यायाधीि से दसू रे न्यायाधीि को या एक मस्जथरेट से दसू रे मस्जथरेट को इस संहहता के उपबंधों के अधीन अंतररत ककया जाता है तब उपधारा (1) के अथ ष में पूवकष धथत मस्जथरेट के बारे में समझा जाएगा कक वह उसमें अधधकाररता314 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— का प्रयोग नह ं कर सकता है और पश् चात्कधथत मस्जथरेट उसका उत्तरवती हो गया है । (3) इस धारा की कोई बात संक्षिप् त ववचारणों को या उन मामिों को िागू नह ं होती हैं स्जनमें कायवष ाहहयां धारा 361 के अधीन रोक द गई हैं या स्जनमें कायवष ाहहयां वररष् ठ मस्जथरेट को धारा 364 के अधीन भेज द गई हैं । न्यायाियों का 366. (1) वह थथान, स्जसमें कोई दंड न्यायािय ककसी अपराध की जांच या िुिा होना । ववचारण के प्रयोजन से बैठता है, िुिा न्यायािय समझा जाएगा, स्जसमें जनता साधारणत: प्रवेि कर सकेगी जहां तक कक सुववधापूवकष वे उसमें समा सकें : परन्तु यहद पीठासीन न्यायाधीि या मस्जथरेट ठीक समझता है तो वह ककसी ववलिष् ट मामि े की जांच या ववचारण के ककसी प्रिम में आदेि दे सकेगा कक जनसाधारण या कोई वविेर् व्यस्क्ट् त उस कमरे में या भवन में, जो न्यायािय द्वारा उपयोग में िाया जा रहा है, न तो प्रवेि करेगा, न होगा और न रहेगा । (2) उपधारा (1) में ककसी बात के होत े हुए भी, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की 2023 का 45 धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 के अधीन बिात्संग या ककसी अपराध या िधैंगक अपराधों स े बािकों का संरिण अधधननयम, 2012 2012 का 32 की धारा 4, धारा 6, धारा 8 या धारा 10 के अधीन अपराधों की जांच या उसका ववचारण बंद कमरे में ककया जाएगा: परन्तु पीठासीन न्यायाधीि, यहद वह ठीक समझता है तो, या दोनों में से ककसी पिकार द्वारा आवेदन ककए जाने पर, ककसी ववलिष् ट व्यस्क्ट् त को, उस कमरे में या भवन में, जो न्यायािय द्वारा उपयोग में िाया जा रहा है, प्रवेि करन,े होने या रहन े की अनुज्ञा दे सकेगा : परंतु यह और कक बंद कमरे में ववचारण यथासाध्य ककसी महहिा न्यायाधीि या मस्जथरेट द्वारा ककया जाएगा । (3) जहां उपधारा (2) के अधीन कोई कायवष ाह की जाती है वहां ककसी व्यस्क्ट् त के लिए ककसी ऐसी कायवष ाह के संबंध में ककसी बात को न्यायािय की पूव ष अनुज्ञा के बबना, मुहद्रत या प्रकालित करना ववधधपूण ष नह ं होगा: परंतु बिात्संग के अपराध के संबंध में ववचारण की कायवष ाहहयों के मुद्रण या प्रकािन पर पाबंद , पिकारों के नाम और पते की गोपनीयता को बनाए रिने के अध्यधीन हटाई जा सकेगी । अध्याय 27 विकृतधचि अलभयु‍ त व्यक्‍ तयों के बारे में उपबंि अलभयुक्ट् त के 367. (1) जब जांच करन े वािे मस्जथरेट को यह ववश् वास करन े का कारण है कक वह ववकृतधचत्त व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध जांच की जा रह है ववकृतधचत्त है और पररणामत: अपनी प्रनतरिा व्यस्क्ट्त होने की दिा में करन े में असमथ ष है, तब मस्जथरेट ऐसी धचत्त-ववकृनत के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे प्रकिया । व्यस्क्ट् त की पर िा उस स्जिे के लसववि सजषन या अन्य ऐसे धचककत्सा अधधकार द्वारा कराएगा, स्जसे राज्य सरकार ननहदषष्ट करे, और कफर ऐसे लसववि सजषन या अन्य धचककत्सा अधधकार की सािी के रूप में पर िा करेगा और उस पर िा को िेिबद्ध करेगा । (2) यहद लसववि सजनष इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त ववकृतधचत्त है तो वह ऐसे व्यस्क्ट् त को देिभाि, उपचार और अवथथा के पूवाषनुमान के लिए सरकारअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 315 अथपताि या सरकार आयुववज्ञष ान महाववद्यािय के मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी को ननहदषष् ट करेगा और, यथास्थथनत, मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी मस्जथरेट को सूधचत करेगा कक अलभयुक्ट् त धचत्त-ववकृनत या बौद्धधक हदव्यांगता से ग्रथत है या नह ं: परंतु यहद अलभयुक्ट् त, यथास्थथनत, मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी द्वारा मस्जथरेट को द गई सूचना से व्यधथत है तो वह धचककत्सा बोड ष के समि अपीि कर सकेगा, जो ननम् नलिखित से लमिकर बनेगा,— (क) ननकटतम सरकार अथपताि में मनस्श् चककत्सा एकक का प्रधान; और (ि) ननकटतम सरकार आयुववज्ञष ान महाववद्यािय में मनस्श् चककत्सा संकाय का सदथय । (3) ऐसी पर िा और जांच िबंबत रहन े तक मस्जथरेट ऐसे व्यस्क्ट् त के बारे में धारा 369 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह कर सकेगा । (4) यहद मस्जथरेट को यह सूचना द जाती है कक उपधारा (2) में ननहदषष् ट व्यस्क्ट् त ववकृतधचत्त व्यस्क्ट् त है तो मस्जथरेट आगे यह अवधाररत करेगा कक क्ट्या धचत्त- ववकृनत अलभयुक्ट् त को प्रनतरिा करन े में असमथ ष बनाती है और यहद अलभयुक्ट् त इस प्रकार असमथ ष पाया जाता है तो मस्जथरेट उस आिय का ननष्कर् ष अलभलिखित करेगा और अलभयोजन द्वारा प्रथतुत ककए गए साक्ष्य के अलभिेि की पर िा करेगा तथा अलभयुक्ट् त के अधधवक्ट् ता को सुनने के पश् चात ् ककंत ु अलभयुक्ट् त से प्रश् न ककए बबना, यहद वह इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध प्रथमदृष्ट् या मामिा नह ं बनता है तो वह जांच को थथधगत करने की बजाय अलभयुक्ट् त को उन्मोधचत कर देगा और उसके संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधधत र नत में कायवष ाह करेगा: परंतु यहद मस्जथरेट इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक उस अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध प्रथम दृष्ट् या मामिा बनता है स्जसके संबंध में धचत्तववकृनत होने का ननष्कर् ष ननकािा गया है तो वह कायवष ाह को ऐसी अवधध के लिए थथधगत कर देगा जो मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी की राय में अलभयुक्ट् त के उपचार के लिए अपेक्षित है और अलभयुक्ट्त को यह आदेि देगा कक उस पर धारा 369 के अधीन यथा उपबंधधत कारषवाई की जाए । (5) यहद ऐसे मस्जथरेट को यह सूचना द जाती है कक उपधारा (2) में ननहदषष् ट व्यस्क्ट् त बौद्धधक हदव्यांगता स े ग्रथत व्यस्क्ट् त है तो मस्जथरेट आगे इस बारे में अवधाररत करेगा कक बौद्धधक हदव्यांगता के कारण अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष है और यहद अलभयुक्ट् त इस प्रकार असमथ ष पाया जाता है, तो मस्जथरेट जांच बंद करन े का आदेि देगा और अलभयुक्ट् त के संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधधत र नत में कारषवाई करेगा । 368. (1) यहद ककसी मस्जथरेट या सेिन न्यायािय के समि ककसी व्यस्क्ट् त के न्यायािय के समि ववचाररत ववचारण के समय उस मस्जथरेट या न्यायािय को वह व्यस्क्ट् त ववकृतधचत्त और व्यस्क्ट् त के पररणामथवरूप अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष प्रतीत होता है, तो वह मस्जथरेट या ववकृतधचत्त होने न्यायािय, प्रथमत: ऐसी धचत्त-ववकृनत और असमथतष ा के तथ्य का ववचारण करेगा और की दिा में यहद उस मस्जथरेट या न्यायािय का ऐस े धचककत्सीय या अन्य साक्ष्य पर, जो उसके प्रकिया । समि प्रथतुत ककया जाता है, ववचार करन े के पश् चात ् उस तथ्य के बारे में समाधान हो316 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— जाता है तो वह उस प्रभाव का ननष्कर् ष अलभलिखित करेगा और मामि े में आगे की कायवष ाह थथधगत कर देगा । (2) यहद मस्जथरेट या सेिन न्यायािय ववचारण के दौरान इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त ववकृतधचत्त है, तो वह ऐसे व्यस्क्ट् त को देिभाि और उपचार के लिए मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी को ननदेलित करेगा और, यथास्थथनत, मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी, मस्जथरेट या न्यायािय को ररपोटष करेगा कक अलभयुक्ट् त धचत्त-ववकृनत से ग्रथत है या नह ं: परंतु यहद अलभयुक्ट् त, यथास्थथनत, मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक मनोववज्ञानी द्वारा मस्जथरेट को द गई सूचना से व्यधथत है तो वह धचककत्सा बोड ष के समि अपीि कर सकेगा, जो ननम् नलिखित से लमिकर बनेगा,— (क) ननकटतम सरकार अथपताि में मनस्श् चककत्सा एकक का प्रधान; और (ि) ननकटतम सरकार आयुववज्ञष ान महाववद्यािय में मनस्श् चककत्सा संकाय का सदथय । (3) यहद ऐस े मस्जथरेट या न्यायािय को सूचना द जाती है कक उपधारा (2) में ननहदषष् ट व्यस्क्ट् त ववकृतधचत्त व्यस्क्ट् त है, तो मस्जथरेट या न्यायािय आगे अवधाररत करेगा कक धचत्त-ववकृनत के कारण अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष है और यहद अलभयुक्ट् त इस प्रकार असमथ ष पाया जाता है तो मस्जथरेट या न्यायािय उस आिय का ननष्कर् ष अलभलिखित करेगा और अलभयोजन द्वारा प्रथतुत साक्ष्य के अलभिेि की पर िा करेगा और अलभयुक्ट् त के अधधवक्ट् ता को सुनने के पश् चात ् ककंत ु अलभयुक्ट् त से प्रश् न पूछे बबना, यहद मस्जथरेट या न्यायािय इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट् या मामिा नह ं बनता है, तो वह ववचारण को थथधगत करने की बजाय अलभयुक्ट् त को उन्मोधचत कर देगा और उसके संबंध में धारा 369 के अधीन उपबंधधत र नत में कायवष ाह करेगा: परंतु यहद मस्जथरेट या न्यायािय इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक उस अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध प्रथमदृष्ट् या मामिा बनता है स्जसके संबंध में धचत्त-ववकृनत होने का ननष्कर् ष ननकािा गया है, तो वह ववचारण को ऐसी अवधध के लिए थथधगत कर देगा जो मनस्श् चककत्सक या रोग ववर्यक् मनोववज्ञानी की राय में अलभयुक्ट् त के उपचार के लिए अपेक्षित है । (4) यहद मस्जथरेट या न्यायािय इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध प्रथम दृष्ट् या मामिा बनता है और वह बौद्धधक हदव्यांगता के कारण अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष है तो मस्जथरेट या न्यायािय ववचारण नह ं करेगा और यह आदेि देगा कक अलभयुक्ट् त के संबंध में धारा 369 के अनुसार कायवष ाह की जाए । अन्वेर्ण या 369. (1) जब कभी कोई व्यस्क्ट् त धारा 367 या धारा 368 के अधीन धचत्त-ववकृनत या ववचारण के बौद्धधक हदव्यांगता के कारण अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष पाया जाता है तब, यथास्थथनत, िंबबत रहने तक ववकृतधचत्त मस्जथरेट या न्यायािय, चाहे मामिा ऐसा हो स्जसमें जमानत ि जा सकती है या नह ं ि व्यस्क्ट् त का जा सकती है, ऐस े व्यस्क्ट् त को जमानत पर छोडे जान े का आदेि देगा: छोडा जाना । परंतु अलभयुक्ट् त ऐसी धचत्त-ववकृनत या बौद्धधक हदव्यांगता से ग्रथत है जो अंतरंग रोगी उपचार के लिए समादेलित नह ं करती हो और कोई लमत्र या नातेदार ककसीअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 317 ननकटतम धचककत्सा सुववधा स े ननयलमत बाह्य रोगी मन:धचककत्सा उपचार कराने और उस े अपने आपको या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को िनत पहुंचाने से ननवाररत रिने का वचन देता है । (2) यहद मामिा ऐसा है स्जसमें, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय की राय में, जमानत नह ं द जा सकती या यहद कोई समुधचत वचनबंध नह ं हदया गया है तो मस्जथरेट या न्यायािय अलभयुक्ट् त को ऐसे थथान में रि े जाने का आदेि देगा, जहां ननयलमत मनस्श्चककत्सा उपचार कराया जा सकता है और की गई कारषवाई की ररपोटष राज्य सरकार को देगा : परंतु िोक मानलसक थवाथथ्य थथापन में अलभयुक्ट् त को ननरुद्ध ककए जाने के लिए 2017 का 10 कोई आदेि राज्य सरकार द्वारा मानलसक थवाथथ्य देि-रेि अधधननयम, 2017 के अधीन बनाए गए ननयमों के अनुसार ह ककया जाएगा, अन्यथा नह ं । (3) जब कभी कोई व्यस्क्ट् त धारा 367 या धारा 368 के अधीन धचत्त-ववकृनत या बौद्धधक हदव्यांगता के कारण अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष पाया जाता है तब, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय काररत ककए गए काय ष की प्रकृनत और धचत्त-ववकृनत या बौद्धधक हदव्यांगता की सीमा को ध्यान में रित े हुए आगे यह अवधाररत करेगा कक क्ट्या अलभयुक्ट् त को छोडने का आदेि हदया जा सकता है: परंतु यह है कक— (क) यहद धचककत्सा राय या ककसी वविेर्ज्ञ की राय के आधार पर, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय धारा 367 या धारा 368 के अधीन यथा उपबंधधत र नत में अलभयुक्ट् त के उन्मोचन का आदेि करने का ववननश् चय करता है तो ऐसे छोडे जाने का आदेि ककया जा सकेगा, यहद पयाप्ष त प्रनतभूनत द जाती है कक अलभयुक्ट् त को अपने आपको या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को िनत पहुंचाने से ननवाररत ककया जाएगा; (ि) यहद, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय की यह राय है कक अलभयुक्ट् त के उन्मोचन का आदेि नह ं हदया जा सकता है तो अलभयुक्ट् त को धचत्त-ववकृनत या बौद्धधक हदव्यांगता के व्यस्क्ट् तयों के लिए आवासीय सुववधा में अंतररत करन े का आदेि हदया जा सकेगा जहां अलभयुक्ट् त की देिभाि की जा सके और समुधचत लििा और प्रलििण हदया जा सके । 370. (1) जब कभी जांच या ववचारण को धारा 367 या धारा 368 के अधीन जांच या ववचारण को थथधगत ककया गया है, तब, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय जांच या ववचारण को पुन: चािू संबद्ध व्यस्क्ट् त के ववकृतधचत्त न रहने पर ककसी भी समय पुन: चािू कर सकेगा और ऐसे करना । मस्जथरेट या न्यायािय के समि अलभयुक्ट् त के उपस्थथत होने या िाए जाने की अपेिा कर सकेगा । (2) जब अलभयुक्ट् त धारा 369 के अधीन छोड हदया गया है और उसकी उपस्थथनत के लिए प्रनतभू उस े उस अधधकार के समि प्रथतुत करत े हैं, स्जसे मस्जथरेट या न्यायािय ने इस ननलमत्त ननयुक्ट् त ककया है, तब ऐसे अधधकार का यह प्रमाणपत्र कक अलभयुक्ट् त अपनी प्रनतरिा करने में समथ ष है साक्ष्य में लिए जाने योग्य होगा ।318 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— मस्जथरेट या 371. (1) यहद, जब अलभयुक्ट् त, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय के समि न्यायािय के उपस्थथत होता है या पुन: िाया जाता है, तब मस्जथरेट या न्यायािय का यह ववचार है समि अलभयक्ट्ु त कक वह अपनी प्रनतरिा करन े में समथ ष है तो, जांच या ववचारण आगे चिेगा । के उपस्थथत होने पर (2) यहद मस्जथरेट या न्यायािय का यह ववचार है कक अलभयुक्ट् त अभी अपनी प्रकिया । प्रनतरिा करन े में असमथ ष है तो मस्जथरेट या न्यायािय, यथास्थथनत, धारा 367 या धारा 368 के उपबंधों के अनुसार काय ष करेगा और यहद अलभयुक्ट् त ववकृतधचत्त पाया जाता है और पररणामथवरूप अपनी प्रनतरिा करन े में असमथ ष पाया जाता है तो ऐस े अलभयुक्ट् त के बारे में वह धारा 369 के उपबधं ों के अनुसार कायवष ाह करेगा । जब यह प्रतीत 372. जब अलभयुक्ट् त जांच या ववचारण के समय थवथथधचत्त का प्रतीत होता है और हो कक अलभयुक्ट् त मस्जथरेट का अपने समि हदए गए साक्ष्य से यह समाधान हो जाता है कक यह ववश् वास थवथथधचत्त रहा है । करन े का कारण है कक अलभयुक्ट् त ने ऐसा काय ष ककया है, जो यहद वह थवथथधचत्त होता तो अपराध होता और यह कक वह उस समय जब वह काय ष ककया गया था धचत्त-ववकृनत के कारण उस काय ष का थवरूप या यह जानने में असमथ ष था, कक यह दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि है, तब मस्जथरेट मामि े में आगे कायवष ाह करेगा और यहद अलभयुक्ट् त का ववचारण सेिन न्यायािय द्वारा ककया जाना चाहहए तो उस े सेिन न्यायािय के समि ववचारण के लिए सुपुदष करेगा । धचत्त-ववकृनत के 373. जब कभी कोई व्यस्क्ट् त इस आधार पर दोर्मुक्ट् त ककया जाता है कक उस समय आधार पर जब यह अलभकधथत है कक उसने अपराध ककया, वह धचत्त-ववकृनत के कारण उस काय ष का दोर्मुस्क्ट् त का ननणयष । थवरूप, स्जसका अपराध होना अलभकधथत है, या यह कक वह दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि है जानने में असमथ ष था, तब ननष्कर् ष में यह ववननहदषष् टत: कधथत होगा कक उसने वह काय ष ककया है या नह ं ककया है । धचत्त-ववकृनत के 374. (1) जब कभी ननष्कर् ष में यह कधथत है कक अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त ने अलभकधथत आधार पर काय ष ककया है तब वह मस्जथरेट या न्यायािय, स्जसके समि ववचारण ककया गया है, उस दोर्मुक्ट् त ककए गए व्यस्क्ट् त का दिा में जब ऐसा काय ष उस असमथतष ा के न होने पर, जो पाई गई, अपराध होता,— सुरक्षित अलभरिा (क) उस व्यस्क्ट् त को ऐसे थथान में और ऐसी र नत से, स्जसे ऐसा मस्जथरेट में ननरुद्ध ककया जाना । या न्यायािय ठीक समझे, सुरक्षित अलभरिा में ननरुद्ध करन े का आदेि देगा ; या (ि) उस व्यस्क्ट् त को उसके ककसी नातेदार या लमत्र को सौंपने का आदेि देगा । (2) िोक मानलसक थवाथथ्य थथापन में अलभयुक्ट् त को ननरुद्ध करन े का उपधारा (1) के िंड (क) के अधीन कोई आदेि राज्य सरकार द्वारा मानलसक थवाथथ्य देि-रेि अधधननयम, 2017 के अधीन बनाए गए, ननयमों के अनुसार ह ककया जाएगा, अन्यथा नह ं । 2017 का 10 (3) अलभयुक्ट् त को उसके ककसी नातेदार या लमत्र को सौंपने का उपधारा (1) के िंड (ि) के अधीन कोई आदेि उसके ऐसे नातेदार या लमत्र के आवेदन पर और उसके द्वारा ननम् नलिखित बातों के संबंध में मस्जथरेट या न्यायािय के समाधानप्रद रूप में प्रनतभूनत देने पर ह ककया जाएगा, अन्यथा नह ं— (क) सौंपे गए व्यस्क्ट् त की समधुचत देि-रेि की जाएगी और वह अपने आपको या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को िनत पहुंचाने से ननवाररत रिा जाएगा ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 319 (ि) सौंपा गया व्यस्क्ट् त ऐस े अधधकार के समि और ऐस े समयों और थथानों पर, जो राज्य सरकार द्वारा ननदेलित ककए जाएं, ननर िण के लिए प्रथतुत ककया जाएगा । (4) मस्जथरेट या न्यायािय, उपधारा (1) के अधीन की गई कारषवाई की ररपोटष राज्य सरकार को देगा । 375. राज्य सरकार उस जेि के भारसाधक अधधकार को, स्जसमें कोई व्यस्क्ट् त धारा भारसाधक 369 या धारा 374 के उपबंधों के अधीन परररुद्ध है, धारा 376 या धारा 377 के अधीन अधधकार को कृत्यों का ननवहष न कारागारों के महाननर िक के सभी कृत्यों का या उनमें से ककसी का ननवहष न करने के लिए करन े के लिए सिक्ट् त कर सकेगी । सिक्ट् त करन े की राज्य सरकार की िस्क्ट् त । 376. यहद कोई व्यस्क्ट् त धारा 369 की उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन ननरुद्ध ककया जहां यह ररपोटष की जाती है कक जाता है और, जेि में ननरुद्ध व्यस्क्ट् त की दिा में कारागारों का महाननर िक या िोक मानलसक ववकृतधचत्त बंद 2017 का 10 थवाथथ्य थथापन में ननरुद्ध व्यस्क्ट् त की दिा में, मानलसक थवाथथ्य देि-रेि अधधननयम, 2017 अपनी प्रनतरिा के अधीन गहठत मानलसक थवाथथ्य पुनवविष ोकन बोड,ष प्रमाखणत करें कक उसकी या उनकी राय करन े में समथ ष है, वहा ं प्रकिया । में वह व्यस्क्ट् त अपनी प्रनतरिा करन े में समथ ष है तो वह, यथास्थथनत, मस्जथरेट या न्यायािय के समि उस समय, स्जसे वह मस्जथरेट या न्यायािय ननयत करे, िाया जाएगा और वह मस्जथरेट या न्यायािय उस व्यस्क्ट् त के बारे में धारा 371 के उपबंधों के अधीन कायवष ाह करेगा, और यथा पूवोक्ट् त महाननर िक या पररदिकष ों का प्रमाणपत्र साक्ष्य के तौर पर ग्रहण ककया जा सकेगा । 377. (1) यहद कोई व्यस्क्ट् त धारा 369 की उपधारा (2) या धारा 374 के उपबंधों के जहां ननरुद्ध ववकृतधचत्त अधीन ननरुद्ध है और ऐसा महाननर िक या ऐस े पररदिकष प्रमाखणत करत े हैं कक उसके व्यस्क्ट्त छोड े या उनके ववचार में वह अपने को या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को िनत पहुंचाने के ितरे के जान े के योग्य बबना छोडा जा सकेगा, तो राज्य सरकार तब उसके छोडे जाने का या अलभरिा में ननरुद्ध घोवर्त कर हदया जाता है, रि े जाने का या, यहद वह पहिे ह िोक मानलसक थवाथथ्य थथापन नह ं भेज हदया गया वहा ं प्रकिया । है तो ऐसे थथापन को अन्तररत ककए जाने का आदेि दे सकेगी और यहद वह उस े िोक मानलसक थवाथथ्य थथापन को अन्तररत करन े का आदेि देती है तो वह एक न्यानयक और दो धचककत्सा अधधकाररयों का एक आयोग ननयुक्ट् त कर सकेगी । (2) ऐसा आयोग ऐसा साक्ष्य िेकर, जो आवश्यक हो, ऐसे व्यस्क्ट् त के धचत्त की दिा की औपचाररक जांच करेगा और राज्य सरकार को ररपोटष देगा, जो उसके छोडे जाने या ननरुद्ध रि े जाने का जैसा वह ठीक समझे, आदेि दे सकेगी । 378. (1) जब कभी धारा 369 या धारा 374 के उपबंधों के अधीन ननरुद्ध ककसी नातेदार या लमत्र की देि-रेि के व्यस्क्ट् त का कोई नातेदार या लमत्र यह चाहता है कक वह व्यस्क्ट् त उसकी देि-रेि और लिए ववकृतधचत्त अलभरिा में रि े जाने के लिए सौंप हदया जाए, तब राज्य सरकार उस नातेदार या लमत्र के व्यस्क्ट्त का सौंपा जाना । आवेदन पर और उसके द्वारा ऐसी राज्य सरकार के समाधानप्रद रुप में प्रनतभूनत इस संबंध में हदए जान े पर कक— (क) सौंपे गए व्यस्क्ट् त की समुधचत देि-रेि की जाएगी और वह अपने आपको या ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को िनत पहुंचाने से ननवाररत रिा जाएगा ; (ि) सौंपा गया व्यस्क्ट् त ऐसे अधधकार के समि और ऐसे समयों और थथानों पर, जो राज्य सरकार द्वारा ननदेलित ककए जाएं, ननर िण के लिए प्रथतुत ककया320 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— जाएगा ; (ग) सौंपा गया व्यस्क्ट् त, उस दिा में स्जसमें वह धारा 369 की उपधारा (2) के अधीन ननरुद्ध व्यस्क्ट् त है, अपेिा ककए जाने पर ऐसे मस्जथरेट या न्यायािय के समि प्रथतुत ककया जाएगा, ऐसे व्यस्क्ट् त को ऐसे नातेदार या लमत्र को सौंपने का आदेि दे सकेगी । (2) यहद ऐस े सौंपा गया व्यस्क्ट् त ककसी ऐसे अपराध के लिए अलभयुक्ट् त है, स्जसका ववचारण उसके ववकृतधचत्त होने और अपनी प्रनतरिा करने में असमथ ष होने के कारण थथधगत ककया गया है और उपधारा (1) के िंड (ि) में ननहदषष् ट ननर िण अधधकार ककसी समय मस्जथरेट या न्यायािय के समि यह प्रमाखणत करता है कक ऐसा व्यस्क्ट् त अपनी प्रनतरिा करन े में समथ ष है, तो ऐसा मस्जथरेट या न्यायािय उस नातेदार या लमत्र स,े स्जसे ऐसा अलभयुक्ट् त सौंपा गया है, अपेिा करेगा कक वह उस े उस मस्जथरेट या न्यायािय के समि प्रथतुत करे और ऐसे प्रथतुत ककए जाने पर वह मस्जथरेट या न्यायािय धारा 371 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह करेगा और ननर िण अधधकार का प्रमाणपत्र साक्ष्य के तौर पर ग्रहण ककया जा सकेगा । अध्याय 28 न्याय-प्रशासन पर प्रभाि डािने िािे अपरािों के बारे में उपबंि धारा 215 में 379. (1) जब ककसी न्यायािय की, उसस े इस ननलमत्त ककए गए आवेदन पर या वखणतष मामिों अन्यथा, यह राय है कक न्याय के हहत में यह समीचीन है कक धारा 215 की उपधारा (1) में प्रकिया । के िंड (ि) में ननहदषष् ट ककसी अपराध की, जो उस,े यथास्थथनत, उस न्यायािय की कायवष ाह में या उसके संबंध में या उस न्यायािय की कायवष ाह में साक्ष्य में प्रथतुत या हदए गए दथतावेज के बारे में ककया हुआ प्रतीत होता है, जांच की जानी चाहहए, तब ऐसा न्यायािय ऐसी प्रारंलभक जांच के पश् चात,् यहद कोई हो, जैसी वह आवश्यक समझे,— (क) उस प्रभाव का ननष्कर् ष अलभलिखित कर सकेगा ; (ि) उसका लिखित पररवाद कर सकेगा ; (ग) उसकी अधधकाररता रिन े वािे प्रथम वग ष मस्जथरेट को भेज सकेगा ; (घ) ऐसे मस्जथरेट के समि अलभयुक्ट् त के उपस्थथत होने के लिए पयाषप् त प्रनतभूनत िे सकेगा या यहद अलभकधथत अपराध अजमानतीय है और न्यायािय ऐसा करना आवश्यक समझता है तो, अलभयुक्ट् त को ऐसे मस्जथरेट के पास अलभरिा में भेज सकेगा ; और (ङ) ऐसे मस्जथरेट के समि उपस्थथत होने और साक्ष्य देने के लिए ककसी व्यस्क्ट् त को आबद्ध कर सकेगा । (2) ककसी अपराध के बारे में न्यायािय को उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् त का प्रयोग, ऐसे मामिे में स्जसमें उस न्यायािय ने उपधारा (1) के अधीन उस अपराध के बारे में न तो पररवाद ककया है और न ऐसे पररवाद के ककए जाने के लिए आवेदन को नामंजूर ककया है, उस न्यायािय द्वारा ककया जा सकेगा स्जसके अधीनथथ ऐसा पूवकष धथत न्यायािय धारा 215 की उपधारा (4) के अथ ष में है । (3) इस धारा के अधीन ककए गए पररवाद पर हथतािर,—अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 321 (क) जहां पररवाद करन े वािा न्यायािय उच् च न्यायािय है वहां उस न्यायािय के ऐसे अधधकार द्वारा ककए जाएंगे, स्जस े वह न्यायािय ननयुक्ट् त करे ; (ि) ककसी अन्य मामि े में, न्यायािय के पीठासीन अधधकार द्वारा या न्यायािय के ऐसे अधधकार द्वारा, स्जसे न्यायािय इस ननलमत्त लिखित में प्राधधकृत करे, ककए जाएंगे । (4) इस धारा में “न्यायािय” का वह अथ ष है जो धारा 215 में उसका है । 380. (1) कोई व्यस्क्ट् त, स्जसके आवेदन पर उच् च न्यायािय से लभन्न ककसी अपीि । न्यायािय ने धारा 379 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन पररवाद करन े से इंकार कर हदया है या स्जसके ववरुद्ध ऐसा पररवाद ऐसे न्यायािय द्वारा ककया गया है, उस न्यायािय में अपीि कर सकेगा, स्जसके ऐसा पूवकष धथत न्यायािय धारा 215 की उपधारा (4) के अथ ष में अधीनथथ है और तब वररष् ठ न्यायािय संबद्ध पिकारों को सूचना देने के पश् चात,् यथास्थथनत, उस पररवाद को वापस िेने का या वह पररवाद करन े का स्जसे ऐसा पूवकष धथत न्यायािय धारा 379 के अधीन कर सकता था, ननदेि दे सकेगा और यहद वह ऐसा पररवाद करता है तो उस धारा के उपबंध तद्नुसार िागू होंगे । (2) इस धारा के अधीन आदेि, और ऐसे आदेि के अधीन रहत े हुए धारा 379 के अधीन आदेि, अंनतम होगा और उसका पुनर िण नह ं ककया जाएगा । 381. धारा 379 के अधीन पररवाद फाइि करन े के लिए ककए गए ककसी आवेदन िच े का आदेि या धारा 380 के अधीन अपीि के संबंध में कायवष ाह करन े वािे ककसी भी न्यायािय को देने की िस्क्ट्त । िचे के बारे में ऐसा आदेि देने की िस्क्ट् त होगी, जो न्यायसंगत हो । 382. (1) वह मस्जथरेट, स्जसको कोई पररवाद धारा 379 या धारा 380 के अधीन ककया जहां मस्जथरेट संज्ञान करे वहां जाता है, अध्याय 16 में ककसी बात के होत े हुए भी, जहां तक हो सके, मामिे में इस प्रकार प्रकिया । कायवष ाह करन े के लिए अग्रसर होगा, मानो वह पुलिस ररपोटष पर संस्थथत की गई हो । (2) जहां ऐसे मस्जथरेट के या ककसी अन्य मस्जथरेट के, स्जसे मामिा अंतररत ककया गया है, ध्यान में यह बात िाई जाती है कक उस न्यानयक कायवष ाह में, स्जससे वह मामिा उत्पन्न हुआ है, ककए गए ववननश् चय के ववरुद्ध अपीि िंबबत है वहां वह, यहद ठीक समझता है तो, मामि े की सुनवाई को ककसी भी प्रिम पर तब तक के लिए थथधगत कर सकेगा जब तक ऐसी अपीि ववननस्श् चत न हो जाए । 383. (1) यहद ककसी न्यानयक कायवष ाह को ननपटात े हुए ननणषय या अंनतम आदेि लमथ्या साक्ष्य देने पर ववचारण देत े समय कोई सेिन न्यायािय या प्रथम वगष मस्जथरेट यह राय व्यक्ट् त करता है कक के लिए संक्षिप् त ऐसी कायवष ाह में उपस्थथत होने वािे ककसी सािी ने जानत े हुए या जानबूझकर लमथ्या प्रकिया । साक्ष्य हदया है या इस आिय से लमथ्या साक्ष्य ग़िा है कक ऐसा साक्ष्य ऐसी कायवष ाह में प्रयुक्ट् त ककया जाए तो यहद उसका समाधान हो जाता है कक न्याय के हहत में यह आवश्यक और समीचीन है कक सािी का, यथास्थथनत, लमथ्या साक्ष्य देने या ग़िने के लिए संिेपत: ववचारण ककया जाना चाहहए तो वह ऐसे अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दलितष करन े का कक क्ट्यों न उस े ऐस े अपराध के लिए दंडडत ककया जाए, उधचत अवसर देने के पश् चात,् ऐसे अपराधी का संिेपत: ववचारण कर सकेगा और उस े कारावास से स्जसकी अवधध तीन मास तक की हो सकेगी या जुमाषने स े जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से, दंडडत कर सकेगा ।322 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) ऐस े प्रत्येक मामि े में न्यायािय संक्षिप् त ववचारणों के लिए ववहहत प्रकिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा । (3) जहां न्यायािय इस धारा के अधीन कायवष ाह करन े के लिए अग्रसर नह ं होता है वहां इस धारा की कोई बात, अपराध के लिए धारा 379 के अधीन पररवाद करने की उस न्यायािय की िस्क्ट् त पर प्रभाव नह ं डािेगी । (4) जहां, उपधारा (1) के अधीन ककसी कायवष ाह के प्रारंभ ककए जाने के पश् चात,् सेिन न्यायािय या प्रथम वग ष मस्जथरेट को यह प्रतीत कराया जाता है कक उस ननणयष या आदेि के ववरुद्ध स्जसमें उस उपधारा में ननहदषष् ट राय अलभव्यक्ट् त की गई है, अपीि या पुनर िण के लिए आवेदन ककया गया है वहां वह, यथास्थथनत, अपीि या पुनर िण के आवेदन के ननपटाए जाने तक आगे ववचारण की कायवष ाहहयों को रोक देगा और तब आगे ववचारण की कायवष ाहहयां अपीि या पुनर िण के आवेदन के पररणामों के अनुसार होंगी । अवमान के कुछ 384. (1) जब कोई ऐसा अपराध, जैसा भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 2023 का 45 मामिों में 210, धारा 213, धारा 214, धारा 215 या धारा 267 में वखणतष है, ककसी लसववि, दंड या प्रकिया । राजथव न्यायािय की दृस्ष् टगोचरता या उपस्थथनत में ककया जाता है, तब न्यायािय अलभयुक्ट् त को अलभरिा में ननरुद्ध करा सकेगा और उसी हदन न्यायािय के उठने के पूव ष ककसी समय, अपराध का सज्ञं ान कर सकेगा और अपराधी को ऐसा कारण दलितष करने का, कक क्ट्यों न उसे इस धारा के अधीन दंडडत ककया जाए, उधचत अवसर देने के पश् चात ् अपराधी को एक हजार रुपए से अनधधक के जुमाषने का और जुमाषना देने में चूक होने पर एक मास तक की अवधध के लिए, जब तक कक ऐसा जुमाषना उसस े पूवतष र न दे हदया गया हो, सादा कारावास का दंडादेि दे सकेगा । (2) ऐस े प्रत्येक मामि े में न्यायािय वह तथ्य स्जससे अपराध गहठत होता है, अपराधी द्वारा ककए गए कथन के (यहद कोई हो) सहहत, तथा ननष्कर् ष और दंडादेि भी अलभलिखित करेगा । (3) यहद अपराध भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 267 के अधीन है तो 2023 का 45 अलभिेि में यह दलितष होगा कक स्जस न्यायािय के काय ष में ववघ्न डािा गया था या स्जसका अपमान ककया गया था, उसकी बैठक ककस प्रकार की न्यानयक कायवष ाह के संबंध में और उसके ककस प्रिम पर हो रह थी और ककस प्रकार का ववघ्न डािा गया या अपमान ककया गया था । जहां न्यायािय 385. (1) यहद ककसी मामि े में न्यायािय का यह ववचार है कक धारा 384 में का ववचार है कक ननहदषष् ट और उसकी दृस्ष् टगोचरता या उपस्थथनत में ककए गए अपराधों में से ककसी के लिए मामिे में धारा अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त जुमाषना देने में चूक करन े से अन्यथा कारावालसत ककया जाना चाहहए 384 के अधीन कायवष ाह नह ं या उस पर दो सौ रुपए स े अधधक जुमाषना अधधरोवपत ककया जाना चाहहए या ककसी अन्य की जानी चाहहए कारण से उस न्यायािय की यह राय है कक मामिा धारा 384 के अधीन नह ं ननपटाया वहा ं प्रकिया । जाना चाहहए तो वह न्यायािय उन तथ्यों को स्जनसे अपराध गहठत होता है और अलभयुक्ट् त के कथन को इसमें इसके पूव ष उपबंधधत प्रकार स े अलभलिखित करन े के पश् चात,् मामिा उसका ववचारण करने की अधधकाररता रिने वाि े मस्जथरेट को भेज सकेगा और ऐसे मस्जथरेट के समि ऐसे व्यस्क्ट् त की उपस्थथनत के लिए प्रनतभूनत द जाने की अपेिा कर सकेगा, या यहद पयाषप् त प्रनतभूनत न द जाए तो ऐसे व्यस्क्ट् त को अलभरिा में ऐस े मस्जथरेट के पास भेजेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 323 (2) वह मस्जथरेट, स्जसे कोई मामिा इस धारा के अधीन भेजा जाता है, जहां तक हो सके, इस प्रकार कायवष ाह करन े के लिए अग्रसर होगा मानो वह मामिा पुलिस ररपोटष पर संस्थथत है । 386. जब राज्य सरकार ऐसा ननदेि दे, तब कोई भी रस्जथरार या कोई भी उप- रस्जथरार या उप- रस्जथरार, जो रस्जथर करण अधधननयम, 1908 के अधीन ननयुक्ट् त है, धारा 384 और 385 रस्जथरार कब 1908 का 16 लसववि के अथ ष में लसववि न्यायािय समझा जाएगा । न्यायािय समझा जाएगा । 387. जब ककसी न्यायािय ने ककसी अपराधी को कोई बात, स्जसे करन े की उसस े माफी मांगन े पर अपराधी का ववधधपूवकष अपेिा की गई थी, करन े से इंकार करने या उसे न करन े के लिए या सािय उन्मोचन । कोई अपमान करने या ववघ् न डािने के लिए धारा 384 के अधीन दंडडत ककए जाने के लिए न्यायननणीत ककया है या धारा 385 के अधीन ववचारण के लिए मस्जथरेट के पास भेजा है, तब वह न्यायािय अपने आदेि या अपेिा के उसके द्वारा मान लिए जाने पर या उसके द्वारा ऐसे िमा मांगे जाने पर, स्जससे न्यायािय का यह समाधान हो जाए, थववववेकानुसार अलभयुक्ट् त को उन्मोधचत कर सकेगा या दंड का पररहार कर सकेगा । 388. यहद दंड न्यायािय के समि कोई सािी या कोई व्यस्क्ट् त, जो ककसी दथतावेज उत्तर देने या या चीज को प्रथतुत करन े के लिए बुिाया गया है, उन प्रश् नों का, जो उससे ककए जाएं, दथतावेज प्रथतुत करने स े इंकार उत्तर देने से या अपने कब्जे या िस्क्ट् त में के ककसी दथतावेज या चीज को, स्जसे प्रथतुत करने वािे करन े की न्यायािय उससे अपेिा करे, प्रथतुत करने से इंकार करता है और ऐसे इंकार के व्यस्क्ट् त को लिए कोई उधचत कारण प्रथतुत करन े के लिए युस्क्ट् तयुक्ट् त अवसर हदए जान े पर ऐसा नह ं कारावास या करता है, तो ऐसा न्यायािय उन कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएं, उसे सात हदन स े उसकी सुपुदषगी । अनधधक की ककसी अवधध के लिए सादा कारावास का दंडादेि दे सकेगा या पीठासीन मस्जथरेट या न्यायाधीि द्वारा हथतािररत वारंट द्वारा न्यायािय के ककसी अधधकार की अलभरिा के लिए सुपुदष कर सकेगा, जब तक कक उस बीच ऐसा व्यस्क्ट् त अपनी पर िा ककए जान े और उत्तर देने के लिए या दथतावेज या चीज प्रथतुत करन े के लिए सहमत नह ं हो जाता है और उसके इंकार पर डटे रहन े की दिा में उसके बारे में धारा 384 या धारा 385 के उपबंधों के अनुसार कायवष ाह की जा सकेगी । 389. (1) यहद ककसी दंड न्यायािय के समि उपस्थथत होने के लिए समन ककए समन के पािन जाने पर कोई सािी समन के पािन में ककसी ननस्श् चत थथान और समय पर उपस्थथत में सािी के उपस्थथत न होने होने के लिए ववधधमान्य रूप से आबद्ध है और न्यायसंगत कारण के बबना, उस थथान पर उसे दंडडत या समय पर उपस्थथत होने में उपेिा या उपस्थथत होने स े इंकार करता है या उस थथान करने के लिए से, जहां उस े उपस्थथत होना है, उस समय से पहिे चिा जाता है स्जस समय चिा जाना संक्षिप्त प्रकिया । उसके लिए ववधधपूण ष है और स्जस न्यायािय के समि उस सािी को उपस्थथत होना है उसका समाधान हो जाता है कक न्याय के हहत में यह समीचीन है कक ऐसे सािी का संिेपत: ववचारण ककया जाए, तो वह न्यायािय उस अपराध का संज्ञान कर सकेगा और अपराधी को इस बात का कारण दलितष करने का कक क्ट्यों न उस े इस धारा के अधीन दंडडत ककया जाए अवसर देने के पश् चात ् उस े पांच सौ रुपए से अनधधक जुमाषने का दंडादेि दे सकेगा । (2) ऐसे प्रत्येक मामिे में न्यायािय उस प्रकिया का यथासाध्य अनुसरण करेगा जो संक्षिप् त ववचारणों के लिए ववहहत है ।324 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— धारा 383, धारा 390. (1) उच् च न्यायािय से लभन्न ककसी न्यायािय द्वारा धारा 383, धारा 384, 384, धारा 388 धारा 388 या धारा 389 के अधीन दंडाहदष् ट कोई व्यस्क्ट् त, इस संहहता में ककसी बात के और धारा 389 के अधीन होत े हुए भी, उस न्यायािय में अपीि कर सकेगा स्जसमें ऐसे न्यायािय द्वारा द गई दोर्लसद्धधयों से डडकियों या आदेिों की अपीि साधारणतया होती है । अपीिें । (2) अध्याय 31 के उपबंध, जहां तक वे िागू होते हैं, इस धारा के अधीन अपीिों को िागू होंगे, और अपीि न्यायािय ननष्कर् ष को पररवनततष कर सकेगा या उिट सकेगा या उस दंड को, स्जसके ववरुद्ध अपीि की गई है, कम कर सकेगा या उिट सकेगा । (3) िघुवाद न्यायािय द्वारा की गई ऐसी दोर्लसद्धध की अपीि उस सेिन िंड के सेिन न्यायािय में होगी स्जस िंड में वह न्यायािय स्थथत है । (4) धारा 386 के अधीन जार ककए गए ननदेि के आधार पर लसववि न्यायािय समझे गए ककसी रस्जथरार या उप-रस्जथरार द्वारा की गई ऐसी दोर्लसद्धध से अपीि उस सेिन िंड के सेिन न्यायािय में होगी स्जस िंड में ऐस े रस्जथरार या उप-रस्जथरार का कायाषिय स्थथत है । कुछ न्यायाधीिों 391. धारा 383, धारा 384, धारा 388 और धारा 389 में जैसा उपबंधधत है उसके और मस्जथरेटों लसवाय, (उच् च न्यायािय के न्यायाधीि स े लभन्न ) दंड न्यायािय का कोई भी न्यायाधीि के समि ककए या मस्जथरेट धारा 215 में ननहदषष् ट ककसी अपराध के लिए ककसी व्यस्क्ट् त का ववचारण उस गए अपराधों का उनके द्वारा दिा में नह ं करेगा, जब वह अपराध उसके समि या उसके प्राधधकार का अवमान करके ववचारण न ककया गया है या ककसी न्यानयक कायवष ाह के दौरान ऐस े न्यायाधीि या मस्जथरेट की ककया जाना । हैलसयत में उसके ध्यान में िाया गया है । अध्याय 29 ननणया ननणयष । 392. (1) आरंलभक अधधकाररता के दंड न्यायािय में होने वािे प्रत्येक ववचारण में ननणषय पीठासीन अधधकार द्वारा िुिे न्यायािय में या तो ववचारण की समास्प्त के पश् चात ् तुरन्त या बाद में ऐस े ककसी पश्चातवती समय पर जो पतैं ाि स हदन के बाद का न हो, स्जसकी सूचना पिकारों या उनके अधधवक्ट्ताओं को द जाएगी,— (क) संपूण ष ननणयष देकर सुनाया जाएगा; या (ि) संपूण ष ननणषय प़िकर सुनाया जाएगा; या (ग) अलभयुक्ट् त या उसके अलभवक्ट्ता द्वारा समझी जाने वाि भार्ा में ननणयष का प्रवतनष िीि भाग प़िकर और ननणषय का सार समझाकर सुनाया जाएगा । (2) जहां उपधारा (1) के िंड (क) के अधीन ननणषय हदया जाता है, वहां पीठासीन अधधकार उस े आिुलिवप में लििवाएगा और जैसे ह अनुलिवप तैयार हो जाती है वैसे ह िुिे न्यायािय में उस पर और उसके प्रत्येक पष्ृ ठ पर हथतािर करेगा, और उस पर ननणषय हदए जाने की तार ि डािेगा । (3) जहां ननणयष या उसका प्रवतनष िीि भाग, यथास्थथनत, उपधारा (1) के िंड (ि) या िंड (ग) के अधीन प़िकर सुनाया जाता है, वहां पीठासीन अधधकार द्वारा िुि े न्यायािय में उस पर तार ि डाि जाएगी और हथतािर ककए जाएंगे और यहद वह उसकेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 325 द्वारा थवयं अपने हाथ से नह ं लििा गया है तो ननणयष के प्रत्येक पष्ृ ठ पर उसके द्वारा हथतािर ककए जाएंगे । (4) जहां ननणषय उपधारा (1) के िंड (ग) में ववननहदषष् ट र नत से सुनाया जाता है, वहां संपूण ष ननणयष या उसकी एक प्रनतलिवप पिकारों या उनके अधधवक्ट्ताओं के अविोकन के लिए तुरंत नन:िुलक उपिब्ध कराई जाएगी : परंतु यह कक न्यायािय, जहां तक संभव हो, ननणयष की तार ि से सात हदन की अवधध के भीतर अपने पोटषि पर ननणयष की प्रनत अपिोड करेगा । (5) यहद अलभयुक्ट् त अलभरिा में है तो ननणयष सुनन े के लिए या तो उसे व्यस्क्ट्तगत रूप से या श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के माध्यम से, िाया जाएगा । (6) यहद अलभयुक्ट् त अलभरिा में नह ं है तो उससे न्यायािय द्वारा सुनाए जाने वाि े ननणषय को सुनने के लिए उपस्थथत होने की अपेिा की जाएगी, ककन्त ु उस दिा में नह ं की जाएगी स्जसमें ववचारण के दौरान उसकी वैयस्क्ट् तक उपस्थथनत से उस े अलभमुस्क्ट् त दे द गई है और दंडादेि केवि जुमाषने का है या उस े दोर्मुक्ट् त ककया गया है : परन्तु जहां एक से अधधक अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट्त हैं और उनमें से एक या एक स े अधधक उस तार ि को न्यायािय में उपस्थथत नह ं हैं स्जसको ननणयष सुनाया जाने वािा है तो पीठासीन अधधकार उस मामि े को ननपटाने में अनुधचत वविंब से बचने के लिए उनकी अनुपस्थथनत में भी ननणयष सुना सकेगा । (7) ककसी भी दंड न्यायािय द्वारा सुनाया गया कोई ननणषय केवि इस कारण ववधधत: अमान्य न समझा जाएगा कक उसके सुनाए जान े के लिए सूधचत हदन को या थथान में कोई पिकार या उसका अधधवक्ट्ता अनुपस्थथत था या पिकारों पर या उनके अधधवक्ट्ताओं पर या उनमें स े ककसी पर ऐसे हदन और थथान की सूचना की तामीि करन े में कोई िोप या त्रुहट हुई थी । (8) इस धारा की ककसी बात का यह अथ ष नह ं िगाया जाएगा कक वह धारा 511 के उपबंधों के ववथतार को ककसी प्रकार से पररसीलमत करती है । 393. (1) इस संहहता द्वारा अलभव्यक्ट् त रूप से अन्यथा उपबंधधत के लसवाय, धारा ननणयष की भार्ा 392 में ननहदषष् ट प्रत्येक ननणषय— और अन्तवथष तु । (क) न्यायािय की भार्ा में लििा जाएगा ; (ि) अवधारण के लिए प्रश् न, उस प्रश् न या उन प्रश् नों पर ववननश् चय और ववननश् चय के कारण अन्तववष्ष ट करेगा ; (ग) वह अपराध (यहद कोई हो) स्जसके लिए और भारतीय न्याय संहहता, 2023 का 45 2023 या अन्य ववधध की वह धारा, स्जसके अधीन अलभयुक्ट् त दोर्लसद्ध ककया गया है, और वह दंड स्जसके लिए वह दंडाहदष् ट है, ववननहदषष् ट करेगा ; (घ) यहद ननणयष दोर्मुस्क्ट् त का है तो, उस अपराध का कथन करेगा स्जससे अलभयुक्ट् त दोर्मुक्ट् त ककया गया है और ननदेि देगा कक वह थवतंत्र कर हदया जाए । 2023 का 45 (2) जब दोर्लसद्धध भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अधीन है और यह संदेह है कक अपराध उस संहहता की दो धाराओं में से ककसके अधीन या एक ह धारा के दो भागों326 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— में स े ककसके अधीन आता है तो न्यायािय इस बात को थपष् ट रूप स े अलभव्यक्ट् त करेगा और वैकस्लपक ननणषय देगा । (3) जब दोर्लसद्धध, मत्ृ यु स े या वैकस्लपक आजीवन कारावास स े या कई वर्ों की अवधध के कारावास स े दंडनीय ककसी अपराध के लिए है, तब ननणयष में, हदए गए दंडादेि के कारणों का और मत्ृ यु के दंडादेि की दिा में ऐसे दंडादेि के लिए वविेर् कारणों का, कथन होगा । (4) जब दोर्लसद्धध एक वर् ष या उसस े अधधक की अवधध के कारावास से दंडनीय अपराध के लिए है ककन्त ु न्यायािय तीन मास से कम अवधध के कारावास का दंड अधधरोवपत करता है, तब वह ऐसा दंड देने के अपने कारणों को िेिबद्ध करेगा उस दिा के लसवाय जब वह दंडादेि न्यायािय के उठन े तक के लिए कारावास का नह ं है या वह मामिा इस संहहता के उपबंधों के अधीन संिेपत: ववचाररत नह ं ककया गया है । (5) जब ककसी व्यस्क्ट् त को मत्ृ य ु का दंडादेि हदया गया है तो वह दंडादेि यह ननदेि देगा कक उस े गदषन में फांसी िगाकर तब तक िटकाया जाए जब तक उसकी मत्ृ यु नह ं हो जाए । (6) धारा 136 के अधीन या धारा 157 की उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक आदेि में और धारा 144, धारा 164 या धारा 166 के अधीन ककए गए प्रत्येक अंनतम आदेि में, अवधारण के लिए प्रश् न, उस प्रश् न या उन प्रश् नों पर ववननश् चय और ववननश् चय के कारण अन्तववष्ष ट होंगे । पूवतष न 394. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त, स्जसे भारत में ककसी न्यायािय ने तीन वर् ष या उसस े दोर्लसद्ध अधधक की अवधध के लिए कारावास स े दंडनीय ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया है, अपराधी को ककसी अपराध के लिए, जो तीन वर् ष या उसस े अधधक की अवधध के लिए कारावास स े अपन े पत े की सूचना देन े का दंडनीय है, द्ववतीय वग ष मस्जथरेट के न्यायािय स े लभन्न ककसी न्यायािय द्वारा पनु : आदेि । दोर्लसद्ध ककया जाता है तब, यहद ऐसा न्यायािय ठीक समझे तो वह उस व्यस्क्ट् त को कारावास का दंडादेि देत े समय यह आदेि भी कर सकेगा कक छोडे जाने के पश् चात ् उसके ननवास-थथान की और ऐसे ननवास-थथान के ककसी पररवतनष की या उससे उसकी अनुपस्थथनत की इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत र नत से सूचना ऐसे दंडादेि की समास्प्त की तार ि से पांच वर् ष स े अनधधक अवधध तक द जाएगी । (2) उपधारा (1) के उपबंध, उन अपराधों को करन े के आपराधधक र्ड यंत्रों और उन अपराधों के दष्ु प्रेरण तथा उन्हें करन े के प्रयत् नों को भी िाग ू होत े हैं । (3) यहद ऐसी दोर्लसद्धध अपीि में या अन्यथा अपाथत कर द जाती है तो ऐसा आदेि िून्य हो जाएगा । (4) इस धारा के अधीन आदेि अपीि न्यायािय द्वारा, या उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय द्वारा भी जब वह अपनी पुनर िण की िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर रहा है, ककया जा सकेगा । (5) राज्य सरकार, छोडे गए लसद्धदोर्ों के ननवास-थथान की या ननवास-थथान के पररवतनष की या उससे उनकी अनुपस्थथनत की सूचना से संबंधधत इस धारा के उपबंधों को कियास्न्वत करने के लिए अधधसूचना द्वारा ननयम बना सकेगी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 327 (6) ऐसे ननयम उनके भंग ककए जाने के लिए दंड का उपबंध कर सकेंगे और स्जस व्यस्क्ट् त पर ऐसे ककसी ननयम को भंग करन े का आरोप है उसका ववचारण उस स्जिे में सिम अधधकाररता वाि े मस्जथरेट द्वारा ककया जा सकेगा स्जसमें उस व्यस्क्ट् त द्वारा अपने ननवास-थथान के रूप में अस्न्तम सूधचत थथान है । 395. (1) जब कोई न्यायािय जुमाषन े का दंडादेि देता है या कोई ऐसा दंडादेि प्रनतकर देने का आदेि । (स्जसके अन्तगषत मत्ृ यु दंडादेि भी है) देता है स्जसका भाग जुमाषना भी है, तब ननणयष देत े समय वह न्यायािय यह आदेि दे सकेगा कक वसूि ककए गए सब जुमाषन े या उसके ककसी भाग का उपयोजन— (क) अलभयोजन में उधचत रूप से उपगत व्ययों को चुकाने में ककया जाए ; (ि) ककसी व्यस्क्ट् त को उस अपराध द्वारा हुई ककसी हानन या िनत का प्रनतकर देने में ककया जाए, यहद न्यायािय की राय में ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा प्रनतकर लसववि न्यायािय में वसूि ककया जा सकता है ; (ग) उस दिा में, जब कोई व्यस्क्ट् त ककसी अन्य व्यस्क्ट् त की मत्ृ यु काररत करन े के, या ऐस े अपराध के ककए जाने का दष्ु प्रेरण करन े के लिए दोर्लसद्ध ककया जाता है, उन व्यस्क्ट् तयों को, जो ऐसी मत्ृ य ु से अपने को हुई हानन के लिए दंडाहदष् ट 1855 का 13 व्यस्क्ट् त से नुकसानी वसूि करन े के लिए घातक दघु टष ना अधधननयम, 1855 के अधीन हकदार हैं, प्रनतकर देने में ककया जाए ; (घ) जब कोई व्यस्क्ट् त, ककसी अपराध के लिए, स्जसके अन्तगतष चोर , आपराधधक दवुवनषनयोग, आपराधधक न्यास-भंग या छि भी है, या चुराई हुई संपवत्त को उस दिा में जब वह यह जानता है या उसको यह ववश् वास करन े का कारण है कक वह चुराई हुई है, बेईमानी से प्राप् त करने या रि े रिन े के लिए या उसके व्ययन में थवेच्छया सहायता करन े के लिए, दोर्लसद्ध ककया जाए, तब ऐसी संपवत्त के सद्भ ावपूण ष िेता को, ऐसी संपवत्त उसके हकदार व्यस्क्ट् त के कब्जे में िौटा द जाने की दिा में उसकी हानन के लिए, प्रनतकर देने में ककया जाए । (2) यहद जुमाषना ऐसे मामि े में ककया जाता है जो अपीिनीय है, तो ऐसा कोई संदाय, अपीि प्रथतुत करन े के लिए अनुज्ञात अवधध के बीत जाने से पहिे, या यहद अपीि प्रथतुत की जाती है तो उसके ववननश् चय के पूव,ष नह ं ककया जाएगा । (3) जब न्यायािय ऐसा दंड अधधरोवपत करता है स्जसका भाग जुमाषना नह ं है तब न्यायािय ननणषय पाररत करते समय, अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को यह आदेि दे सकेगा कक उस काय ष के कारण स्जसके लिए उस े ऐसा दंडादेि हदया गया है, स्जस व्यस्क्ट् त को कोई हानन या िनत उठानी पडी है, उस े वह प्रनतकर के रूप में इतनी रकम दे स्जतनी आदेि में ववननहदषष् ट है । (4) इस धारा के अधीन आदेि, अपीि न्यायािय द्वारा या उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय द्वारा भी ककया जा सकेगा जब वह अपनी पुनर िण की िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर रहा हो । (5) उसी मामि े से संबंधधत ककसी पश् चात व् ती लसववि वाद में प्रनतकर अधधननणीत करत े समय न्यायािय ऐसी ककसी रालि को, जो इस धारा के अधीन प्रनतकर के रूप में द गई है या वसूि की गई है, हहसाब में िेगा ।328 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पीडडत प्रनतकर 396. (1) प्रत्येक राज्य सरकार केंद्र य सरकार के सहयोग से ऐसे पीडडत या उसके थकीम । आधश्रतों को, स्जन्हें अपराध के पररणामथवरूप हानन या िनत हुई है और स्जन्हें पुनवाषस की आवश्यकता है, प्रनतकर के प्रयोजन के लिए ननधधयां उपिब्ध कराने के लिए एक थकीम तैयार करेगी । (2) जब कभी न्यायािय द्वारा प्रनतकर के लिए लसफाररि की जाती है, तब, यथास्थथनत, स्जिा ववधधक सेवा प्राधधकरण या राज्य ववधधक सेवा प्राधधकरण उपधारा (1) में ननहदषष् ट थकीम के अधीन हदए जाने वािे प्रनतकर की मात्रा का ववननश् चय करेगा । (3) यहद ववचारण न्यायािय का, ववचारण की समास्प् त पर, यह समाधान हो जाता है कक धारा 395 के अधीन अधधननणीत प्रनतकर ऐसे पुनवाषस के लिए पयाषप् त नह ं है या जहां मामि े दोर्मुस्क्ट् त या उन्मोचन में समाप् त होते हैं और पीडडत को पुनवाषलसत करना है, वहां वह प्रनतकर के लिए लसफाररि कर सकेगा । (4) जहां अपराधी का पता नह ं िग पाता है या उसकी पहचान नह ं हो पाती है ककंतु पीडडत की पहचान हो जाती है और जहां कोई ववचारण नह ं होता है, वहां पीडडत या उसके आधश्रत प्रनतकर हदए जाने के लिए राज्य या स्जिा ववधधक सेवा प्राधधकरण को आवेदन कर सकेंगे । (5) उपधारा (4) के अधीन ऐसी लसफाररिें या आवेदन प्राप् त होने पर, राज्य या स्जिा ववधधक सेवा प्राधधकरण, सम्यक् जांच करन े के पश् चात,् दो मास के भीतर जांच पूर करके पयाषप् त प्रनतकर अधधननणीत करेगा । (6) यथास्थथनत, राज्य या स्जिा ववधधक सेवा प्राधधकरण पीडडत की यातना को कम करन े के लिए, पुलिस थाने के भारसाधक स े अन्यून पंस्क्ट् त के पुलिस अधधकार या संबद्ध िेत्र के मस्जथरेट के प्रमाणपत्र पर ननःिुलक प्राथलमक धचककत्सा सुववधा या धचककत्सा प्रसुववधाएं उपिब्ध कराने या कोई अन्य अंतररम अनुतोर् हदिाने, स्जसे समुधचत प्राधधकार ठीक समझे, के लिए तुरंत आदेि कर सकेगा । (7) इस धारा के अधीन राज् य सरकार द्वारा संदेय प्रनतकर, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 65, धारा 70 या धारा 124 की उपधारा (1) के अधीन पीडडता को जुमाषन े 2023 का 45 का संदाय ककए जाने के अनतररक्ट् त होगा । पीडडतों का 397. सभी िोक या प्राइवेट अथ पताि, चाहे वे केन्द्र य सरकार, राज् य सरकार, उपचार । थ थानीय ननकायों या ककसी अन्य व् यस्क्ट् त द्वारा चिाए जा रहे हों, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 या 2023 का 45 धारा 124 की उपधारा (1) के अधीन या िधैंगक अपराधों से बािकों का संरिण अधधननयम, 2012 की धारा 4, धारा 6, धारा 8 या धारा 10 के अधीन आने वािे ककसी 2012 का 32 अपराध के पीडडतों को तुरंत नन:िुल क प्राथलमक या धचककत् सीय उपचार उपिब् ध कराएंग े और ऐसी घटना की सूचना पुलिस को तुरन् त देंगे । सािी संरिण 398. प्रत्येक राज्य सरकार, साक्षियों की सुरिा सुननस्श्चत करने को ध्यान में रित े थकीम । हुए राज्य के लिए सािी सुरिा थकीम तैयार करेगी और अधधसूधचत करेगी । ननराधार 399. (1) जब कभी कोई व्यस्क्ट् त ककसी अन्य व्यस्क्ट् त को पुलिस अधधकार स े धगरफ्तार करवाए धगरफ्तार कराता है, तब यहद उस मस्जथरेट को, स्जसके द्वारा वह मामिा सुना जाता है गए व्यस्क्ट्त यों को यह प्रतीत होता है कक ऐसी धगरफ्तार कराने के लिए कोई पयाषप् त आधार नह ं था तो, वह प्रनतकर ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 329 मस्जथरेट अधधननणषय दे सकेगा कक ऐसे धगरफ्तार ककए गए व्यस्क्ट् त को इस संबंध में उसके समय की हानन और व्यय के लिए एक हजार रुपए से अनधधक इतना प्रनतकर स्जतना मस्जथरेट ठीक समझे, धगरफ्तार कराने वािे व्यस्क्ट् त द्वारा हदया जाएगा । (2) ऐसे मामिों में यहद एक से अधधक व्यस्क्ट् त धगरफ्तार ककए जात े हैं तो मस्जथरेट उनमें से प्रत्येक के लिए उसी र नत से एक हजार रुपए से अनधधक उतना प्रनतकर अधधननणीत कर सकेगा, स्जतना ऐसा मस्जथरेट ठीक समझ े । (3) इस धारा के अधीन अधधननणीत समथत प्रनतकर ऐसे वसूि ककया जा सकेगा मानो वह जुमाषना है और यहद वह ऐसे वसूि नह ं ककया जा सकता तो उस व्यस्क्ट् त को, स्जसके द्वारा वह संदेय है, तीस हदन से अनधधक की इतनी अवधध के लिए, स्जतनी मस्जथरेट ननदेलित करे, सादा कारावास का दंडादेि हदया जाएगा जब तक कक ऐसी रालि उसस े पहिे न दे द जाए । 400. (1) जब कभी ककसी असंज्ञेय अपराध का कोई पररवाद न्यायािय में ककया असंज्ञेय मामिों में िचा ष देने के जाता है तब, यहद न्यायािय अलभयुक्ट् त को दोर्लसद्ध कर देता है तो, वह अलभयुक्ट् त पर लिए आदेि । अधधरोवपत िास्थत के अनतररक्ट् त उस े यह आदेि दे सकेगा कक वह पररवाद को अलभयोजन में उसके द्वारा ककए गए िचे पूणतष : या अंित: दे और यह अनतररक्ट् त आदेि दे सकेगा कक उस े देने में चूक करन े पर अलभयुक्ट् त तीस हदन से अनधधक की अवधध के लिए सादा कारावास भोगेगा और ऐस े िचों के अन्तगतष आदेलिका फीस, साक्षियों और अधधवक्ट्ताओं की फीस के संबंध में ककए गए कोई व्यय भी हो सकेंगे स्जन्हें न्यायािय उधचत समझे । (2) इस धारा के अधीन आदेि ककसी अपीि न्यायािय द्वारा, या उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय द्वारा भी ककया जा सकेगा जब वह अपनी पुनर िण िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर रहा हो । 401. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त जो इक्ट् कीस वर् ष स े कम आय ु का नह ं है केवि जुमानष े सदाचरण की पररवीिा पर या से या सात वर् ष या उसस े कम अवधध के कारावास स े दंडनीय अपराध के लिए दोर्लसद्ध भत्सनष ा के ककया जाता है या जब कोई व्यस्क्ट् त जो इक्ट् कीस वर् ष से कम आय ु का है या कोई महहिा पश् चात ् छोड देन े ऐसे अपराध के लिए, जो मत्ृ यु या आजीवन कारावास से दंडनीय नह ं है, दोर्लसद्ध की का आदेि । जाती है और अपराधी के ववरुद्ध कोई पूव ष दोर्लसद्धध साबबत नह ं की गई है तब, यहद उस न्यायािय को, स्जसके समि उस े दोर्लसद्ध ककया गया है, अपराधी की आयु, िीि या पूववष त्तृ को और उन पररस्थथनतयों को, स्जनमें अपराध ककया गया, ध्यान में रिते हुए यह प्रतीत होता है कक अपराधी को सदाचरण की पररवीिा पर छोड देना समीचीन है, तो न्यायािय उस े तुरन्त कोई दंडादेि देने के बजाय ननदेि दे सकेगा कक उस े उसके द्वारा यह बंधपत्र या जमानतपत्र लिि देने पर छोड हदया जाए कक वह (तीन वर् ष से अनधधक) इतनी अवधध के दौरान, स्जतनी न्यायािय ननदेलित करे, बुिाए जाने पर उपस्थथत होगा और दंडादेि पाएगा और इस बीच पररिांनत कायम रिेगा और सदाचार बना रहेगा : परन्तु जहां कोई प्रथम अपराधी ककसी द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा, जो उच् च न्यायािय द्वारा वविेर्तया सिक्ट् त नह ं ककया गया है, दोर्लसद्ध ककया जाता है और मस्जथरेट की यह राय है कक इस धारा द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् तयों का प्रयोग ककया जाना चाहहए वहां वह उस प्रभाव की अपनी राय अलभलिखित करेगा और प्रथम वग ष मस्जथरेट को वह कायवष ाह ननवेहदत करेगा और उस अलभयुक्ट् त को उस मस्जथरेट के पास भेजेगा या उसकी330 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उस मस्जथरेट के समि उपस्थथनत के लिए जमानत िेगा और वह मस्जथरेट उस मामिे का ननपटारा उपधारा (2) द्वारा उपबंधधत र नत से करेगा । (2) जहां कोई कायवष ाह प्रथम वग ष मस्जथरेट को उपधारा (1) द्वारा उपबंधधत रूप में ननवेहदत की गई है, वहां ऐसा मस्जथरेट उस पर ऐसा दंडादेि या आदेि दे सकता है जैसा यहद मामिा मिू त: उसके द्वारा सुना गया होता तो वह दे सकेगा और यहद वह ककसी प्रश् न पर अनतररक्ट् त जांच या अनतररक्ट् त साक्ष्य आवश्यक समझता है तो वह थवयं ऐसी जांच कर सकेगा या ऐसा साक्ष्य िे सकेगा या ऐसी जांच ककए जाने या ऐसा साक्ष्य लिए जाने का ननदेि दे सकेगा । (3) ककसी ऐसी दिा में, स्जसमें कोई व्यस्क्ट् त चोर , ककसी भवन में चोर , बेईमानी से दवुवनषनयोग, छि या भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अधीन दो वर् ष स े अनधधक के 2023 का 45 कारावास से दंडनीय ककसी अपराध के लिए या केवि जुमाषन े से दंडनीय ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया जाता है और उसके ववरुद्ध कोई पूव ष दोर्लसद्धध साबबत नह ं की गई है, यहद वह न्यायािय, स्जसके समि वह ऐस े दोर्लसद्ध ककया गया है, ठीक समझे, तो वह अपराधी की आयु, िीि, पूववष त्तृ या िार ररक या मानलसक दिा को और अपराध की तुच्छ प्रकृनत को, या ककन्ह ं पररिमनकार पररस्थथनतयों को, स्जनमें अपराध ककया गया था, ध्यान में रित े हुए उस े कोई दंडादेि देने के बजाय सम्यक् भत्सषना के पश् चात ् छोड सकेगा । (4) इस धारा के अधीन आदेि ककसी अपीि न्यायािय द्वारा या उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय द्वारा भी ककया जा सकेगा जब वह अपनी पुनर िण िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर रहा हो । (5) जब ककसी अपराधी के बारे में इस धारा के अधीन आदेि हदया गया है तब उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय, उस दिा में जब उस न्यायािय में अपीि करने का अधधकार है, अपीि ककए जाने पर, या अपनी पुनर िण िस्क्ट् तयों का प्रयोग करत े हुए, ऐसे आदेि को अपाथत कर सकेगा और ऐसे अपराधी को उसके बदिे में ववधध के अनुसार दंडादेि दे सकेगा : परन्तु उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय इस उपधारा के अधीन उस दंड स े अधधक दंड नह ं देगा जो उस न्यायािय द्वारा हदया जा सकता था स्जसके द्वारा अपराधी दोर्लसद्ध ककया गया था । (6) धारा 140, धारा 143 और धारा 414 के उपबंध इस धारा के उपबंधों के अनुसरण में प्रथतुत ककए गए प्रनतभुओं के बारे में, जहां तक हो सके, िागू होंगे । (7) ककसी अपराधी के उपधारा (1) के अधीन छोडे जाने का ननदेि देने के पवू ष न्यायािय अपना समाधान कर िेगा कक उस अपराधी का, या उसके प्रनतभू का (यहद कोई हो) कोई ननयत वास थथान या ननयलमत उपजीववका उस थथान में है स्जसके संबंध में वह न्यायािय काय ष करता है या स्जसमें अपराधी के उस अवधध के दौरान रहने की सम्भाव्यता है, जो ितों के पािन के लिए उस्लिखित की गई है । (8) यहद उस न्यायािय का, स्जसन े अपराधी को दोर्लसद्ध ककया है, या उस न्यायािय का, जो अपराधी के संबंध में उसके मूि अपराध के बारे में कायवष ाह कर सकताअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 331 था, समाधान हो जाता है कक अपराधी अपन े मुचिके की ितों में से ककसी का पािन करन े में असफि रहा है तो वह उसके पकडे जाने के लिए वारंट जार कर सकेगा । (9) जब कोई अपराधी ऐसे ककसी वारंट पर पकडा जाता है तब वह वारंट जार करन े वािे मस्जथरेट के समि तत्काि िाया जाएगा और वह न्यायािय या तो तब तक के लिए उस े अलभरिा में रि े जान े के लिए प्रनतप्रेवर्त कर सकेगा जब तक मामि े में सुनवाई न हो, या इस ित ष पर कक वह दंडादेि के लिए उपस्थथत होगा, पयाषप् त प्रनतभूनत िेकर जमानत मंजूर कर सकेगा और ऐसा न्यायािय मामिे की सुनवाई के पश् चात ् दंडादेि दे सकेगा । 1958 का 20 (10) इस धारा की कोई बात, अपराधी पररवीिा अधधननयम, 1958 या ककिोर 2016 का 2 न्याय (बािकों की देिरेि और संरिण) अधधननयम, 2015 या ककिोर अपराधधयों के उपचार, प्रलििण या पुनवाषस से संबंधधत तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के उपबंधों पर प्रभाव न डािेगी । 402. जहां ककसी मामि े में न्यायािय,— कुछ मामिों में वविेर् कारणों (क) ककसी अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के संबंध में कारषवाई धारा 401 के अधीन या का अलभलिखित 1958 का 20 अपराधी पररवीिा अधधननयम, 1958 के उपबंधों के अधीन कर सकता था ; या ककया जाना । (ि) ककसी ककिोर अपराधी के संबंध में कारषवाई, ककिोर न्याय (बािकों की 2016 का 2 देिरेि और संरिण) अधधननयम, 2015 के अधीन या ककिोर अपराधधयों के उपचार, प्रलििण या पुनवाषस से संबंधधत तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध के अधीन कर सकता था, ककन्तु उसने ऐसा नह ं ककया है, वहां वह ऐसा न करन े के वविेर् कारण अपने ननणयष में अलभलिखित करेगा । 403. इस संहहता या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध द्वारा जैसा उपबंधधत है न्यायािय का अपन े ननणयष में उसके लसवाय, कोई न्यायािय जब उसने ककसी मामिे को ननपटाने के लिए अपने ननणषय पररवतनष न या अंनतम आदेि पर हथतािर कर हदए हैं तब लिवपकीय या गखणतीय भूि को ठीक करन े करना । के लसवाय उसमें कोई पररवतनष नह ं करेगा या उसका पुनवविष ोकन नह ं करेगा । 404. (1) जब अलभयुक्ट् त को कारावास का दंडादेि हदया जाता है तब ननणषय के अलभयुक्ट् त और अन्य व्यस्क्ट् तयों सुनाए जाने के पश् चात ् ननणषय की एक प्रनत उस े नन:िुलक तुरन्त द जाएगी । को ननणयष की (2) अलभयुक्ट् त के आवेदन पर, ननणयष की एक प्रमाखणत प्रनत या जब वह चाहे तब, प्रनत का हदया यहद व्यवहाय ष हो तो उसकी भार्ा में या न्यायािय की भार्ा में उसका अनुवाद, अवविबं जाना । उस े हदया जाएगा और जहां ननणषय की अलभयुक्ट् त द्वारा अपीि हो सकती है वहां प्रत्येक दिा में ऐसी प्रनत नन:िुलक द जाएगी : परन्तु जहां मत्ृ यु का दंडादेि उच् च न्यायािय द्वारा पाररत या पुष् ट ककया जाता है वहां ननणयष की प्रमाखणत प्रनत अलभयुक्ट् त को तुरन्त नन:िुलक द जाएगी चाहे वह उसके लिए आवेदन करे या न करे । (3) उपधारा (2) के उपबंध धारा 136 के अधीन आदेि के संबंध में उसी प्रकार िागू होंगे जैसे वे उस ननणषय के संबंध में िागू होत े हैं स्जसकी अलभयुक्ट् त अपीि कर सकता है ।332 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (4) जब अलभयुक्ट् त को ककसी न्यायािय द्वारा मत्ृ यु दंडादेि हदया जाता है और ऐसे ननणषय से साधधकार अपीि होती है तो न्यायािय उस े उस अवधध की जानकार देगा स्जसके भीतर यहद वह चाहे तो अपीि कर सकेगा । (5) उपधारा (2) में जैसा उपबंधधत है उसके लसवाय, ककसी दांडडक न्यायािय द्वारा पाररत ननणयष या आदेि द्वारा प्रभाववत व्यस्क्ट् त को, इस ननलमत्त आवेदन करन े पर और ववहहत प्रभार देने पर ऐस े ननणयष या आदेि की या ककसी अलभसाक्ष्य की या अलभिेि के अन्य भाग की प्रनत द जाएगी : परन्तु यहद न्यायािय ककन्ह ं वविेर् कारणों स े ठीक समझता है तो उस े वह नन:िुलक भी दे सकेगा : परन्तु यह और कक न्यायािय, सरकार को, अलभयोजन अधधकार द्वारा इस ननलमत्त ककए गए आवेदन पर ऐस े ननणषय, आदेि, अलभसाक्ष्य या अलभिेि की सत्यावपत प्रनत नन:िुलक उपिब्ध कराएगा । (6) उच् च न्यायािय ननयमों द्वारा उपबंध कर सकेगा कक ककसी दांडडक न्यायािय के ककसी ननणयष या आदेि की प्रनतयां ऐसे व्यस्क्ट् त को, जो ननणयष या आदेि द्वारा प्रभाववत न हो उस व्यस्क्ट् त द्वारा ऐसी फीस हदए जाने पर और ऐसी ितों के अधीन दे द जाएं जो उच् च न्यायािय ऐसे ननयमों द्वारा उपबंधधत करे । ननणयष का 405. मूि ननणयष , कायवष ाह के अलभिेि में फाइि ककया जाएगा और जहां मूि अनुवाद कब ननणषय ऐसी भार्ा में अलभलिखित ककया गया है जो न्यायािय की भार्ा स े लभन्न है और ककया जाएगा। यहद दोनों में स े कोई एक पिकार अपेिा करता है तो न्यायािय की भार्ा में उसका अनुवाद ऐसे अलभिेि में जोड हदया जाएगा । सेिन न्यायािय 406. ऐसे मामिों में, स्जनका ववचारण सेिन न्यायािय या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा ननष्कर् ष द्वारा ककया गया है, यथास्थथनत, न्यायािय या मस्जथरेट अपने ननष्कर् ष और दंडादेि की और दंडादेि की (यहद कोई हो) एक प्रनत उस स्जिा मस्जथरेट को भेजेगा स्जसकी थथानीय अधधकाररता के प्रनत स्जिा मस्जथरेट को भीतर ववचारण ककया गया है । भेजना । अध्याय 30 मत्ृ यु िंडािेशों का पुक्ष् ट के लिए प्रस्तुत क्रकया िाना सेिन न्यायािय 407. (1) जब सेिन न्यायािय मत्ृ य ु दंडादेि देता है तब कायवष ाह उच् च न्यायािय द्वारा मत्ृ यु को तुरंत प्रथतुत की जाएगी और दंडादेि तब तक ननष्पाहदत न ककया जाएगा जब तक दंडादेि का पुस्ष् ट वह उच् च न्यायािय द्वारा पुष् ट नह ं कर हदया जाए । के लिए प्रथततु ककया जाना । (2) दंडादेि पाररत करन े वािा न्यायािय वारंट के अधीन दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त को कारागार की अलभरिा के लिए सुपुदष करेगा । अनतररक्ट् त जांच 408. (1) यहद ऐसी कायवष ाह के प्रथतुत ककए जाने पर उच् च न्यायािय यह ठीक ककए जाने के समझता है कक दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त के दोर्ी या ननदोर् होने से संबंधधत ककसी प्रश् न पर लिए या अनतररक्ट् त जांच की जाए या अनतररक्ट् त साक्ष्य लिया जाए तो वह थवयं ऐसी जांच कर अनतररक्ट् त साक्ष्य लिए जाने के सकेगा या ऐसा साक्ष्य िे सकेगा या सेिन न्यायािय द्वारा उसके ककए जाने या लिए लिए ननदेि देने जाने का ननदेि दे सकेगा । की िस्क्ट् त ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 333 (2) जब तक उच् च न्यायािय अन्यथा ननदेि न दे, दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त को, जांच ककए जान े या ऐसा साक्ष्य लिए जान े के समय उपस्थथत होन े से, अलभमुस्क्ट् त द जा सकेगी । (3) जब उच् च न्यायािय द्वारा जांच नह ं की गई है या साक्ष्य नह ं लिया गया है (यहद कोई हो) तब ऐसी जांच या साक्ष्य का पररणाम प्रमाखणत करके उस न्यायािय को भेजा जाएगा । 409. उच् च न्यायािय धारा 407 के अधीन प्रथतुत ककसी मामि े में,— दंडादेि को पुष् ट करन े या (क) दंडादेि की पुस्ष् ट कर सकेगा या ववधध द्वारा समधथतष कोई अन्य दंडादेि दोर्लसद्धध को दे सकेगा ; या अलभिून्य करन े (ि) दोर्लसद्धध को िून्य कर सकेगा और अलभयुक्ट् त को ककसी ऐसे अपराध की उच् च के लिए दोर्लसद्ध कर सकेगा स्जसके लिए सिे न न्यायािय उस े दोर्लसद्ध कर न्यायािय की िस्क्ट् त । सकता था, या उसी या सिं ोधधत आरोप पर नए ववचारण का आदेि दे सकेगा ; या (ग) अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को दोर्मुक्ट् त कर सकेगा : परन्तु पुस्ष् ट का कोई आदेि इस धारा के अधीन तब तक नह ं हदया जाएगा जब तक अपीि करन े के लिए अनुज्ञात अवधध समाप् त न हो गई हो या यहद ऐसी अवधध के अन्दर अपीि प्रथतुत कर द गई है तो जब तक उस अपीि का ननपटारा नह ं हो गया हो । 410. इस प्रकार प्रथतुत प्रत्येक मामि े में उच् च न्यायािय द्वारा दंडादेि का दंडादेि की पुस्ष्ट पुष् ट करण या उसके द्वारा पाररत कोई नया दंडादेि, या आदेि, यहद ऐसे न्यायािय में या नए दंडादेि का दो न्यायाधीिों दो या अधधक न्यायाधीि हों तो, उनमें से कम से कम दो न्यायाधीिों द्वारा ककया द्वारा हथतािररत जाएगा, पाररत और हथतािररत ककया जाएगा । ककया जाना । 411. जहां कोई ऐसा मामिा न्यायाधीिों की न्यायपीठ के समि सुना जाता है और मतभेद की दिा ऐसे न्यायाधीि राय के बारे में समान रूप से ववभास्जत हैं, वहां मामिा धारा 433 द्वारा में प्रकिया । उपबंधधत र नत से ववननस्श् चत ककया जाएगा । 412. मत्ृ यु दंडादेि की पुस्ष् ट के लिए उच् च न्यायािय को सेिन न्यायािय द्वारा उच् च न्यायािय प्रथतुत मामिों में उच् च न्यायािय द्वारा पुस्ष् ट के आदेि या अन्य आदेि के हदए जाने के की पुस्ष् ट के लिए प्रथततु पश् चात ् उच् च न्यायािय का समुधचत अधधकार वविंब के बबना, आदेि की प्रनतलिवप या मामिों में तो भौनतक रूप से या इिक्ट्ै राननक साधनों के माध्यम से उच् च न्यायािय की मुद्रा प्रकिया । िगाकर और अपने पद य हथतािरों से अनुप्रमाखणत करके सेिन न्यायािय को भेजेगा । अध्याय 31 अपीिें 413. दंड न्यायािय के ककसी ननणयष या आदेि से कोई अपीि इस संहहता द्वारा जब तक अन्यथा या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध द्वारा जैसा उपबंधधत हो उसके लसवाय नह ं होगी : उपबंधधत न हो ककसी अपीि का परंतु पीडडत को न्यायािय द्वारा ककसी अलभयुक्ट् त को दोर्मुक्ट् त करन े वािे ककसी न होना । आदेि या कम अपराध के लिए दोर्लसद्ध करन े वािे या अपयाषप् त प्रनतकर अधधरोवपत करन े वािे आदेि के ववरुद्ध अपीि करन े का अधधकार होगा और ऐसी अपीि उस334 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न्यायािय में होगी स्जसमें ऐसे न्यायािय की दोर्लसद्धध के आदेि के ववरुद्ध मामूि तौर पर अपीि होती है । पररिास्न्त कायम 414. कोई व्यस्क्ट् त,— रिने या सदाचार (i) स्जसे पररिास्न्त कायम रिन े या सदाचार के लिए प्रनतभूनत देने के लिए के लिए प्रनतभूनत अपेक्षित करने धारा 136 के अधीन आदेि हदया गया है ; या वािे या प्रनतभू (ii) जो धारा 140 के अधीन प्रनतभ ू थवीकार करन े से इंकार करने या उस े थवीकार करन े से अथवीकार करने वािे ककसी आदेि से व्यधथत है, इंकार करने वािे या अथवीकार करने सेिन न्यायािय में ऐसे आदेि के ववरुद्ध अपीि कर सकेगा : वािे आदेिों से अपीि । परन्तु इस धारा की कोई बात उन व्यस्क्ट् तयों को िागू नह ं होगी स्जनके ववरुद्ध कायवष ाह सेिन न्यायाधीि के समि धारा 141 की उपधारा (2) या उपधारा (4) के उपबंधों के अनुसार रिी गई है । दोर्लसद्धध स े 415. (1) कोई व्यस्क्ट् त जो उच् च न्यायािय द्वारा अपनी असाधारण आरंलभक अपीि। दांडडक अधधकाररता के प्रयोग में ककए गए ववचारण में दोर्लसद्ध ककया गया है, उच् चतम न्यायािय में अपीि कर सकेगा । (2) कोई व्यस्क्ट् त जो सिे न न्यायाधीि या अपर सेिन न्यायाधीि द्वारा ककए गए ववचारण में या ककसी अन्य न्यायािय द्वारा ककए गए ववचारण में दोर्लसद्ध ककया गया है, स्जसमें सात वर् ष से अधधक के कारावास का दंडादेि उसके ववरुद्ध या उसी ववचारण में दोर्लसद्ध ककए गए ककसी अन्य व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध हदया गया है उच् च न्यायािय में अपीि कर सकेगा । (3) उपधारा (2) में जैसा उपबधंधत है उसके लसवाय, कोई व्यस्क्ट् त,— (क) प्रथम वग ष मस्जथरेट या द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा ककए गए ववचारण में दोर्लसद्ध ककया गया है ; या (ि) जो धारा 364 के अधीन दंडाहदष् ट ककया गया है ; या (ग) स्जसके बारे में ककसी मस्जथरेट द्वारा धारा 401 के अधीन आदेि हदया गया है या दंडादेि पाररत ककया गया है, सेिन न्यायािय में अपीि कर सकेगा । (4) जब कोई अपीि, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 2023 का 45 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 के अधीन पाररत ककसी कारावास के ववरुद्ध फाइि की गई है, तो अपीि फाइि करने की तार ि से छह मास की अवधध के भीतर ऐसी अपीि का ननपटारा ककया जाएगा । कुछ मामिों में 416. धारा 415 में ककसी बात के होत े हुए भी, जहां अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त ने दोर्ी होने जब अलभयुक्ट्त का अलभवचन ककया है, और ऐसे अलभवचन पर वह दोर्लसद्ध ककया गया है वहां,— दोर्ी होने का अलभवचन करे, (i) यहद दोर्लसद्धध उच् च न्यायािय द्वारा की गई है, तो कोई अपीि नह ं अपीि न होना। होगी ; या (ii) यहद दोर्लसद्धध सेिन न्यायािय या प्रथम वग ष मस्जथरेट या द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा की गई है तो अपीि, दंड के पररमाण या उसकी वैधता के बारे में ह हो सकेगी, अन्यथा नह ं ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 335 417. धारा 415 में ककसी बात के होत े हुए भी, दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त द्वारा कोई छोटे मामिों में अपीि ननम् नलिखित में से ककसी मामि े में नह ं होगी, अथाषत ् :— अपीि न होना । (क) जहां उच् च न्यायािय केवि तीन मास से अनधधक की अवधध के कारावास का या एक हजार रुपए स े अनधधक जुमाषन े का या ऐस े कारावास और जुमाषने दोनों का, दंडादेि पाररत करता है ; (ि) जहां सेिन न्यायािय केवि तीन मास से अनधधक की अवधध के कारावास का या दो सौ रुपए स े अनधधक जुमाषने का या ऐसे कारावास और जुमाषन े दोनों का, दंडादेि पाररत करता है ; (ग) जहां प्रथम वग ष मस्जथरेट केवि एक सौ रुपए स े अनधधक जुमाषने का दंडादेि पाररत करता है ; या (घ) जहां संिेपत: ववचाररत ककसी मामिे में, धारा 283 के अधीन काय ष करन े के लिए सिक्ट् त मस्जथरेट केवि दो सौ रुपए स े अनधधक जुमाषन े का दंडादेि पाररत करता है : परन्तु यहद ऐसे ककसी दंडादेि के साथ कोई अन्य दंड लमिा हदया गया है तो ऐस े ककसी दंडादेि के ववरुद्ध अपीि की जा सकेगी ककन्त ु वह केवि इस आधार पर अपीिनीय न हो जाएगा कक— (i) दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त को पररिास्न्त कायम रिन े के लिए प्रनतभूनत देने का आदेि हदया गया है ; या (ii) जुमाषना देने में व्यनतिम होने पर कारावास के ननदेि को दंडादेि में सस्म्मलित ककया गया है ; या (iii) उस मामिे में जुमाषने का एक से अधधक दंडादेि पाररत ककया गया है, यहद अधधरोवपत जुमाषने की कुि रकम उस मामि े के सबं ंध में इसमें इसके पूव ष ववननहदषष् ट रकम से अधधक नह ं है । 418. (1) उपधारा (2) में जसै ा अन्यथा उपबंधधत है, उसके लसवाय, राज्य सरकार, राज्य सरकार द्वारा दंडादेि के उच् च न्यायािय से लभन्न ककसी न्यायािय द्वारा ककए गए ववचारण में दोर्लसद्धध के ववरुद्ध अपीि । ककसी मामि े में िोक अलभयोजक को दंडादेि की अपयाषप् तता के आधार पर उसके ववरुद्ध— (क) सेिन न्यायािय में, यहद दंडादेि ककसी मस्जथरेट द्वारा पाररत ककया जाता है ; और (ि) उच् च न्यायािय में, यहद दंडादेि ककसी अन्य न्यायािय द्वारा पाररत ककया जाता है, अपीि प्रथतुत करने का ननदेि दे सकेगी । (2) यहद ऐसी दोर्लसद्धध ककसी ऐसे मामि े में है स्जसमें अपराध का अन्वेर्ण इस संहहता से लभन्न ककसी केन्द्र य अधधननयम के अधीन अपराध का अन्वेर्ण करने के लिए सिक्ट् त ककसी अन्य अलभकरण द्वारा ककया गया है तो केन्द्र य सरकार भी िोक अलभयोजक को दंडादेि की अपयाषप् तता के आधार पर उसके ववरुद्ध—336 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (क) सेिन न्यायािय में, यहद दंडादेि ककसी मस्जथरेट द्वारा पाररत ककया जाता है ; और (ि) उच् च न्यायािय में, यहद दंडादेि ककसी अन्य न्यायािय द्वारा पाररत ककया जाता है, अपीि प्रथतुत करने का ननदेि दे सकेगी । (3) जब दंडादेि के ववरुद्ध अपयाषप् तता के आधार पर अपीि की गई है तब यथास्थथनत, सेिन न्यायािय या उच् च न्यायािय उस दंडादेि में वद्ृ धध तब तक नह ं करेगा जब तक कक अलभयुक्ट् त को ऐसी वद्ृ धध के ववरुद्ध कारण दलितष करने का युस्क्ट् तयुक्ट् त अवसर नह ं दे हदया गया है और कारण दलितष करत े समय अलभयुक्ट् त अपनी दोर्मुस्क्ट् त के लिए या दंडादेि में कमी करन े के लिए अलभवचन कर सकेगा । (4) जब कोई अपीि, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 2023 का 45 66, धारा 67, धारा 68, धारा 70 या धारा 71 के अधीन पाररत ककसी कारावास के ववरुद्ध फाइि की गई है, तो ऐसी अपीि फाइि करने की तार ि से छह मास की अवधध के भीतर ऐसी अपीि का ननपटारा ककया जाएगा । दोर्मुस्क्ट् त की 419. (1) उपधारा (2) में जसै ा अन्यथा उपबंधधत है, उसके लसवाय, और उपधारा दिा में अपीि । (3) और उपधारा (5) के उपबधं ों के अधीन रहत े हुए,— (क) स्जिा मस्जथरेट, ककसी मामिे में, िोक अलभयोजक को ककसी संज्ञेय और अजमानतीय अपराध के संबंध में ककसी मस्जथरेट द्वारा पाररत दोर्मुस्क्ट् त के आदेि से सेिन न्यायािय में अपीि प्रथतुत करन े का ननदेि दे सकेगा ; (ि) राज्य सरकार, ककसी मामिे में िोक अलभयोजक को उच् च न्यायािय स े लभन्न ककसी न्यायािय द्वारा पाररत दोर्मुस्क्ट् त के मूि या अपीि आदेि से जो िंड (क) के अधीन आदेि नह ं है या पुनर िण में सेिन न्यायािय द्वारा पाररत दोर्मुस्क्ट् त के आदेि से उच् च न्यायािय में, अपीि प्रथतुत करने का ननदेि दे सकेगी । (2) यहद ऐसा दोर्मुस्क्ट् त का आदेि ककसी ऐसे मामि े में पाररत ककया जाता है स्जसमें अपराध का इस संहहता से लभन्न ककसी केन्द्र य अधधननयम के अधीन अपराध का अन्वेर्ण करने के लिए सिक्ट् त ककसी अन्य अलभकरण द्वारा ककया गया है, तो केन्द्र य सरकार उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहत े हुए, िोक अलभयोजक को— (क) दोर्मुस्क्ट् त के ऐसे आदेि से, जो संज्ञेय और अजमानतीय अपराध के संबंध में ककसी मस्जथरेट द्वारा पाररत ककया गया है सेिन न्यायािय में ; (ि) दोर्मुस्क्ट् त के ऐस े मूि या अपीि आदेि से, जो ककसी उच् च न्यायािय से लभन्न ककसी न्यायािय द्वारा पाररत ककया गया है जो िंड (क) के अधीन आदेि नह ं है या दोर्मुस्क्ट् त के ऐसे आदेि से, जो पुनर िण में सेिन न्यायािय द्वारा पाररत ककया गया है, उच् च न्यायािय में, अपीि प्रथतुत करने का ननदेि दे सकेगी । (3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन उच् च न्यायािय को कोई अपीि उच् च न्यायािय की अनुमनत के बबना ग्रहण नह ं की जाएगी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 337 (4) यहद दोर्मुस्क्ट् त का ऐसा आदेि पररवाद पर संस्थथत ककसी मामि े में पाररत ककया गया है और उच् च न्यायािय, पररवाद द्वारा उसस े इस ननलमत्त आवेदन ककए जाने पर, दोर्मुस्क्ट् त के आदेि की अपीि करन े की वविेर् अनुमनत देता है तो पररवाद ऐसी अपीि उच् च न्यायािय में प्रथतुत कर सकेगा । (5) दोर्मुस्क्ट् त के आदेि से अपीि करन े की वविेर् अनमु नत हदए जाने के लिए उपधारा (4) के अधीन कोई आवेदन उच् च न्यायािय द्वारा, उस दिा में स्जसमें पररवाद िोक सेवक है उस दोर्मुस्क्ट् त के आदेि की तार ि से संगखणत, छह मास की समास्प् त के पश् चात ् और प्रत्येक अन्य दिा में ऐस े संगखणत साठ हदन की समास्प् त के पश् चात ् ग्रहण नह ं ककया जाएगा । (6) यहद ककसी मामि े में दोर्मुस्क्ट् त के आदेि से अपीि करन े की वविेर् अनुमनत हदए जाने के लिए उपधारा (4) के अधीन कोई आवेदन नामंजूर ककया जाता है, तो उस दोर्मुस्क्ट् त के आदेि से उपधारा (1) के अधीन या उपधारा (2) के अधीन कोई अपीि नह ं होगी । 420. यहद उच् च न्यायािय ने अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के दोर्मुस्क्ट् त के आदेि को अपीि कुछ मामिों में उच् च न्यायािय में उिट हदया है और उस े दोर्लसद्ध ककया है तथा उस े मत्ृ यु या आजीवन कारावास या द्वारा दोर्लसद्ध दस वर् ष या अधधक की अवधध के कारावास का दंड हदया है, तो वह उच् चतम न्यायािय में ककए जान े के ववरुद्ध अपीि । अपीि कर सकेगा । 421. इस अध्याय में ककसी बात के होत े हुए भी, जब एक से अधधक व्यस्क्ट् त एक कुछ मामिों में अपीि करन े का ह ववचारण में दोर्लसद्ध ककए जात े हैं, और ऐसे व्यस्क्ट् तयों में से ककसी के बारे में वविेर् अधधकार । अपीिनीय ननणषय या आदेि पाररत ककया गया है तब ऐस े ववचारण में दोर्लसद्ध ककए गए सब व्यस्क्ट् तयों को या उनमें से ककसी को भी अपीि का अधधकार होगा । 422. (1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहत े हुए, सेिन न्यायािय में या सेिन न्यायािय में की गई अपीिें सेिन न्यायाधीि को की गई अपीि सेिन न्यायाधीि या अपर सेिन न्यायाधीि द्वारा कैसे सुनी सुनी जाएगी : जाएंगी । परन्तु द्ववतीय वग ष मस्जथरेट द्वारा ककए गए ववचारण में दोर्लसद्धध के ववरुद्ध अपीि मुख्य न्यानयक मस्जथरेट द्वारा सुनी जा सकेगी और ननपटाई जा सकेगी । (2) अपर सेिन न्यायाधीि या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट केवि ऐसी अपीिें सुनेगा स्जन्हें िंड का सेिन न्यायाधीि, साधारण या वविेर् आदेि द्वारा, उसके हवािे करे या स्जन्हें सुनने के लिए उच् च न्यायािय, वविेर् आदेि द्वारा, उस े ननदेि दे । 423. प्रत्येक अपीि, अपीिाथी या उसके अधधवक्ट्ता द्वारा प्रथतुत की गई लिखित अपीि की अजी । अजी के रूप में की जाएगी, और प्रत्येक ऐसी अजी के साथ (जब तक वह न्यायािय स्जसमें वह प्रथतुत की जाए अन्यथा ननदेि न दे) उस ननणषय या आदेि की प्रनतलिवप होगी स्जसके ववरुद्ध अपीि की जा रह है । 424. यहद अपीिाथी जेि में है तो वह अपनी अपीि की अजी और उसके साथ जब अपीिाथी जेि में है तब वाि प्रनतलिवपयों को कारागार के भारसाधक अधधकार को दे सकेगा, जो तब ऐसी अजी प्रकिया । और प्रनतलिवपयां समुधचत अपीि न्यायािय को भेजेगा ।338 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अपीि का 425. (1) यहद धारा 423 या धारा 424 के अधीन प्राप् त अपीि की अजी और संिेपत: िाररज ननणषय की प्रनतलिवप की पर िा करन े पर अपीि न्यायािय का यह ववचार है कक हथतिेप ककया जाना । करन े का कोई पयाषप् त आधार नह ं है तो वह अपीि को संिेपत: िाररज कर सकेगा : परन्तु— (क) धारा 423 के अधीन प्रथतुत की गई कोई अपीि तब तक िाररज नह ं की जाएगी जब तक अपीिाथी या उसके अधधवक्ट्ता को उसके समथनष में सुने जान े का उधचत अवसर न लमि चुका हो ; (ि) धारा 424 के अधीन कोई अपीि उसके समथनष में अपीिाथी को सुनवाई का उधचत अवसर हदए बबना िाररज नह ं की जाएगी, जब तक अपीि न्यायािय का यह ववचार न हो कक अपीि तुच्छ है या न्यायािय के समि अलभयुक्ट् त को अलभरिा में प्रथतुत करन े स े मामि े की पररस्थथनतयों के अनुपात में कह ं अधधक असुववधा होगी ; (ग) धारा 424 के अधीन प्रथतुत की गई कोई अपीि तब तक संिेपत: िाररज न की जाएगी जब तक ऐसी अपीि करन े के लिए अनुज्ञात अवधध समाप्त नह ं हो चुकी हो । (2) ककसी अपीि को इस धारा के अधीन िाररज करन े के पूव ष न्यायािय मामिे के अलभिेि मंगा सकेगा । (3) जहां इस धारा के अधीन अपीि िाररज करन े वािा अपीि न्यायािय, सेिन न्यायािय या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट का न्यायािय है, वहां वह ऐसा करन े के अपने कारण अलभलिखित करेगा । (4) जहां धारा 424 के अधीन प्रथतुत की गई कोई अपीि इस धारा के अधीन संिेपत: िाररज कर द जाती है और अपीि न्यायािय का यह ननष्कर् ष है कक उसी अपीिाथी की ओर से धारा 423 के अधीन सम्यक् रूप से प्रथतुत की गई अपीि की अन्य अजी पर उसके द्वारा ववचार नह ं ककया गया है वहां, धारा 434 में ककसी बात के होत े हुए भी, यहद उस न्यायािय का यह समाधान हो जाता है कक ऐसा करना न्याय के हहत में आवश्यक है तो वह ऐसी अपीि ववधध के अनुसार सुन सकेगा और उसका ननपटारा कर सकेगा । संिेपत: िाररज 426. (1) यहद अपीि न्यायािय अपीि को संिेपत: िाररज नह ं करता है तो वह नह ं की गई उस समय और थथान की, जब और जहां ऐसी अपीि सुनी जाएगी, सूचना— अपीिों की सुनवाई के लिए (i) अपीिाथी या उसके अधधवक्ट्ता को ; प्रकिया । (ii) ऐसे अधधकार को, स्जसे राज्य सरकार इस ननलमत्त ननयुक्ट् त करे ; (iii) यहद पररवाद पर संस्थथत मामिे में दोर्लसद्धध के ननणषय के ववरुद्ध अपीि की गई है, तो पररवाद को ; (iv) यहद अपीि धारा 418 या धारा 419 के अधीन की गई है तो अलभयुक्ट् त को हदिवाएगा और ऐसे अधधकार , पररवाद और अलभयुक्ट् त को अपीि के आधारों की प्रनतलिवप भी देगा । (2) यहद अपीि न्यायािय में मामि े का अलभिेि, पहिे स े ह उपिब्ध नह ं है तो वह न्यायािय ऐसा अलभिेि मंगाएगा और पिकारों को सनु ेगा :अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 339 परन्तु यहद अपीि केवि दंड के पररमाण या उसकी वैधता के बारे में है तो न्यायािय अलभिेि मंगाए बबना ह अपीि का ननपटारा कर सकेगा । (3) जहां दोर्लसद्धध के ववरुद्ध अपीि का आधार केवि दंडादेि की अलभकधथत कठोरता है वहां अपीिाथी न्यायािय की अनुमनत के बबना अन्य ककसी आधार के समथनष में न तो कहेगा और न उस े उसके समथनष में सुना ह जाएगा । 427. ऐसे अलभिेि के पररिीिन और यहद अपीिाथी या उसका अधधवक्ट्ता अपीि उपस्थथत है तो उसे तथा यहद िोक अलभयोजक उपस्थथत है तो उस े और धारा 418 या न्यायािय की िस्क्ट् तया ं । धारा 419 के अधीन अपीि की दिा में यहद अलभयुक्ट् त उपस्थथत है तो उस े सुनन े के पश् चात,् अपीि न्यायािय उस दिा में स्जसमें उसका यह ववचार है कक हथतिेप करन े का पयाषप् त आधार नह ं है अपीि को िाररज कर सकेगा, या,— (क) दोर्मुस्क्ट् त के आदेि स े अपीि में ऐसे आदेि को उिट सकेगा और ननदेि दे सकेगा कक अनतररक्ट् त जांच की जाए या अलभयुक्ट् त, यथास्थथनत, पुन: ववचाररत ककया जाए या ववचाराथ ष सुपुदष ककया जाए, या उस े दोर्ी ठहरा सकेगा और उस े ववधध के अनुसार दंडादेि दे सकेगा ; (ि) दोर्लसद्धध से अपीि में,— (i) ननष्कर् ष और दंडादेि को उिट सकेगा और अलभयुक्ट् त को दोर्मुक्ट् त या उन्मोधचत कर सकेगा या ऐसे अपीि न्यायािय के अधीनथथ सिम अधधकाररता वािे न्यायािय द्वारा उसके पुन: ववचाररत ककए जाने का या ववचारणाथ ष सुपुदष ककए जाने का आदेि दे सकेगा ; या (ii) दंडादेि को बनाए रित े हुए ननष्कर् ष में पररवतनष कर सकेगा ; या (iii) ननष्कर् ष में पररवतनष करके या ककए बबना दंड के थवरूप या पररमाण में या थवरूप और पररमाण में पररवतनष कर सकेगा, ककन्तु इस प्रकार नह ं कक उसस े दंड में वद्ृ धध हो जाए ; (ग) दंडादेि की वद्ृ धध के लिए अपीि में,— (i) ननष्कर् ष और दंडादेि को उिट सकेगा और अलभयुक्ट् त को दोर्मुक्ट् त या उन्मोधचत कर सकेगा या ऐसे अपराध का ववचारण करन े के लिए सिम न्यायािय द्वारा उसका पुनववषचारण करन े का आदेि दे सकेगा; या (ii) दंडादेि को बनाए रित े हुए ननष्कर् ष में पररवतनष कर सकेगा; या (iii) ननष्कर् ष में पररवतनष करके या ककए बबना, दंड के थवरूप या पररमाण में या थवरूप और पररमाण में पररवतनष कर सकेगा स्जससे उसमें वद्ृ धध या कमी हो जाए ; (घ) ककसी अन्य आदेि से अपीि में ऐस े आदेि को पररवनततष कर सकेगा या उिट सकेगा ; (ङ) कोई सिं ोधन या कोई पाररणालमक या आनुर्ंधगक आदेि, जो न्यायसंगत या उधचत हो, कर सकेगा : परन्तु दंड में तब तक वद्ृ धध नह ं की जाएगी जब तक अलभयुक्ट् त को ऐसी वद्ृ धध के ववरुद्ध कारण दलितष करन े का अवसर न लमि चुका हो : परन्तु यह और कक अपीि न्यायािय उस अपराध के लिए, स्जसे उसकी राय में340 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अलभयुक्ट् त ने ककया है उसस े अधधक दंड नह ं देगा, जो अपीिाधीन आदेि या दंडादेि पाररत करन े वािे न्यायािय द्वारा ऐसे अपराध के लिए हदया जा सकता था । अधीनथथ अपीि 428. आरंलभक अधधकाररता वािे दंड न्यायािय के ननणयष के बारे में अध्याय 29 में न्यायािय के अन्तववष्ष ट ननयम, जहां तक साध्य हो, सेिन न्यायािय या मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के ननणयष । न्यायािय के अपीि में हदए गए ननणयष को िागू होंगे : परन्तु ननणयष हदया जाना सनु ने के लिए अलभयुक्ट् त न तो िाया जाएगा और न उसस े उपस्थथत होने की अपेिा की जाएगी जब तक कक अपीि न्यायािय अन्यथा ननदेि न दे । अपीि में उच् च 429. (1) जब कभी अपीि में कोई मामिा उच् च न्यायािय द्वारा इस अध्याय के न्यायािय के अधीन ववननस्श् चत ककया जाता है तब वह अपना ननणयष या आदेि प्रमाखणत करके उस आदेि का न्यायािय को भेजेगा स्जसके द्वारा वह ननष्कर्,ष दंडादेि या आदेि, स्जसके ववरुद्ध अपीि प्रमाखणत करके की गई थी अलभलिखित ककया गया या पाररत ककया गया था और यहद ऐसा न्यायािय ननचि े न्यायािय को मुख्य न्यानयक मस्जथरेट स े लभन्न न्यानयक मस्जथरेट का है तो उच् च न्यायािय का भेजा जाना । ननणषय या आदेि मुख्य न्यानयक मस्जथरेट के माध्यम स े भेजा जाएगा ; और यहद ऐसा न्यायािय कायपष ािक मस्जथरेट का है तो उच् च न्यायािय का ननणयष या आदेि स्जिा मस्जथरेट के माध्यम से भेजा जाएगा । (2) तब वह न्यायािय, स्जसे उच् च न्यायािय अपना ननणयष या आदेि प्रमाखणत करके भेजे ऐसे आदेि करेगा जो उच् च न्यायािय के ननणयष या आदेि के अनुरूप हों ; और यहद आवश्यक हो तो अलभिेि में तद्नुसार संिोधन कर हदया जाएगा । अपीि िंबबत 430. (1) अपीि न्यायािय, ऐसे कारणों से, जो उसके द्वारा अलभलिखित ककए रहने तक जाएं, आदेि दे सकेगा कक उस दंडादेि या आदेि का ननष्पादन, स्जसके ववरुद्ध अपीि दंडादेि का की गई है, दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त द्वारा की गई अपीि के िंबबत रहन े तक ननिंबबत ककया ननिम्बन, जाए और यहद वह व्यस्क्ट् त परररोध में है तो यह भी आदेि दे सकेगा कक उस े जमानत पर अपीिाथी का जमानत पर या उसके अपने बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोड हदया जाए : छोडा जाना । परन्तु अपीि न्यायािय ऐसे दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त को, जो मत्ृ यु या आजीवन कारावास या दस वर् ष से अन्यून अवधध के कारावास स े दंडनीय ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया गया है, उसके अपने बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोडने से पूव,ष िोक अलभयोजक को ऐसे छोडने के ववरुद्ध लिखित में कारण दिाषने का अवसर देगा : परन्तु यह और कक ऐसे मामिों में, जहां ककसी दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त को जमानत पर छोडा जाता है वहां िोक अलभयोजक जमानत रद्द ककए जान े के लिए आवेदन फाइि कर सकेगा । (2) अपीि न्यायािय को इस धारा द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् त का प्रयोग उच् च न्यायािय भी ककसी ऐसी अपीि के मामिे में कर सकेगा जो ककसी दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त द्वारा उसके अधीनथथ न्यायािय में की गई है । (3) जहां दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त ऐसे न्यायािय का स्जसके द्वारा वह दोर्लसद्ध ककया गया है यह समाधान कर देता है कक वह अपीि प्रथतुत करना चाहता है, वहां वह न्यायािय,— (i) उस दिा में जब ऐसा व्यस्क्ट् त, जमानत पर होत े हुए, तीन वर् ष से अनधधक की अवधध के लिए कारावास से दंडाहदष् ट ककया गया है, याअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 341 (ii) उस दिा में जब वह अपराध, स्जसके लिए ऐसा व्यस्क्ट् त दोर्लसद्ध ककया गया है, जमानतीय है और वह जमानत पर है, यह आदेि देगा कक दोर्लसद्ध व्यस्क्ट् त को इतनी अवधध के लिए स्जतनी से अपीि प्रथतुत करन े और उपधारा (1) के अधीन अपीि न्यायािय के आदेि प्राप् त करन े के लिए पयाषप्त समय लमि जाएगा ; जमानत पर छोड हदया जाए जब तक कक जमानत से इंकार करन े के वविेर् कारण न हों और जब तक वह ऐसे जमानत पर छूटा रहता है तब तक कारावास का दंडादेि ननिस्म्बत समझा जाएगा । (4) जब अंततोगत्वा अपीिाथी को ककसी अवधध के कारावास या आजीवन कारावास का दंडादेि हदया जाता है, तब वह समय, स्जसके दौरान उसे इस प्रकार छोडा गया है, उस अवधध की संगणना करन े में, स्जसके लिए उस े ऐसा दंडादेि हदया गया है, हहसाब में नह ं लिया जाएगा । 431. जब धारा 419 के अधीन अपीि प्रथतुत की जाती है तब उच् च न्यायािय दोर्मुस्क्ट् त स े अपीि में वारंट जार कर सकेगा स्जसमें यह ननदेि होगा कक अलभयक्ट्ु त धगरफ्तार ककया जाए और अलभयुक्ट् त की उसके या ककसी अधीनथथ न्यायािय के समि िाया जाए, और वह न्यायािय स्जसके धगरफ्तार । समि अलभयुक्ट् त िाया जाता है, अपीि का ननपटारा होने तक उस े कारागार को सुपुदष कर सकेगा या उसकी जमानत िे सकेगा । 432. (1) इस अध्याय के अधीन ककसी अपीि पर ववचार करन े में, यहद अपीि अपीि न्यायािय न्यायािय अनतररक्ट्त साक्ष्य आवश्यक समझता है तो वह अपने कारणों को अलभलिखित अनतररक्ट्त साक्ष्य करेगा और ऐसा साक्ष्य या तो थवयं िे सकेगा या मस्जथरेट द्वारा, या जब अपीि िे सकेगा या न्यायािय उच् च न्यायािय है तब सेिन न्यायािय या मस्जथरेट द्वारा, लिए जाने का उसके लिए जान े का ननदेि दे ननदेि दे सकेगा । सकेगा । (2) जब अनतररक्ट् त साक्ष्य सिे न न्यायािय या मस्जथरेट द्वारा ि े लिया जाता है तब वह ऐसा साक्ष्य प्रमाखणत करके अपीि न्यायािय को भेजेगा और तब ऐसा न्यायािय अपीि ननपटाने के लिए अग्रसर होगा । (3) अलभयुक्ट् त या उसके अधधवक्ट्ता को उस समय उपस्थथत होने का अधधकार होगा जब अनतररक्ट् त साक्ष्य लिया जाता है । (4) इस धारा के अधीन साक्ष्य का लिया जाना अध्याय 25 के उपबंधों के अधीन होगा, मानो वह कोई जांच हो । 433. जब इस अध्याय के अधीन अपीि उच् च न्यायािय द्वारा उसके न्यायाधीिों के जहां अपीि न्यायािय के न्यायपीठ के समि सुनी जाती है और वे राय में समान रूप से ववभास्जत हैं, तब अपीि न्यायाधीि राय उनकी रायों सहहत उसी न्यायािय के ककसी अन्य न्यायाधीि के समि रिी जाएगी और के बारे में ऐसा न्यायाधीि, ऐसी सुनवाई के पश् चात,् जैसी वह ठीक समझ,े अपनी राय देगा और समान रूप में ववभास्जत हों, ननणषय या आदेि ऐसी राय के अनुसार होगा : वहां प्रकिया । परन्तु यहद न्यायपीठ गहठत करन े वािे न्यायाधीिों में से कोई एक न्यायाधीि या जहां अपीि इस धारा के अधीन ककसी अन्य न्यायाधीि के समि रिी जाती है वहां वह न्यायाधीि अपेिा करे तो अपीि, न्यायाधीिों की वहृ त्तर न्यायपीठ द्वारा पुन: सुनी जाएगी और ववननस्श् चत की जाएगी ।342 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अपीि पर 434. अपीि में अपीि न्यायािय द्वारा पाररत ननणयष या आदेि, धारा 418, धारा आदेिों और 419, धारा 425 की उपधारा (4) या अध्याय 32 में उपबंधधत दिाओं के लसवाय, अंनतम ननणयष ों का होंगे : अंनतम होना । परन्तु ककसी मामि े में दोर्लसद्धध के ववरुद्ध अपीि का अंनतम ननपटारा हो जान े पर भी, अपीि न्यायािय— (क) धारा 419 के अधीन दोर्मुस्क्ट् त के ववरुद्ध उसी मामिे स े उद्भूत होन े वाि अपीि को ; या (ि) धारा 418 के अधीन दंडादेि में वद्ृ धध के लिए उसी मामि े से उद्भूत होने वाि अपीि को, सुन सकेगा और गुणागुण के आधार पर उसका ननपटारा कर सकेगा । अपीिों का 435. (1) धारा 418 या धारा 419 के अधीन प्रत्येक अपीि का अलभयुक्ट् त की मत्ृ य ु उपिमन । पर अंनतम रूप से उपिमन हो जाएगा । (2) इस अध्याय के अधीन (जुमाषने के दंडादेि की अपीि के लसवाय) प्रत्येक अन्य अपीि का अपीिाथी की मत्ृ यु पर अंनतम रूप से उपिमन हो जाएगा : परन्तु जहां अपीि, दोर्लसद्धध और मत्ृ यु के या कारावास के दंडादेि के ववरुद्ध है और अपीि के िंबबत रहन े के दौरान अपीिाथी की मत्ृ यु हो जाती है वहा ं उसका कोई भी ननकट नातेदार, अपीिाथी की मत्ृ यु के तीस हदन के भीतर अपीि जार रिन े की अनुमनत के लिए अपीि न्यायािय में आवेदन कर सकेगा ; और यहद अनुमनत दे द जाती है तो अपीि का उपिमन नह ं होगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में “ननकट नातेदार” से माता-वपता, पनत या पत्न ी, पारंपररक वंिज, भाई या बहन अलभप्रेत है । अध्याय 32 ननिेश और पुनरीक्षण उच् च न्यायािय 436. (1) जहां ककसी न्यायािय का समाधान हो जाता है कक उसके समि िंबबत को ननदेि । मामि े में ककसी अधधननयम, अध्यादेि या ववननयम की या ककसी अधधननयम, अध्यादेि या ववननयम में अन्तववष्ष ट ककसी उपबंध की ववधधमान्यता के बारे में ऐसा प्रश् न अन्तग्रथष त है, स्जसका अवधारण उस मामि े के ननपटारे के लिए आवश्यक है, और उसकी यह राय है कक ऐसा अधधननयम, अध्यादेि, ववननयम या उपबंध अववधधमान्य या अप्रवतनष िीि है, ककन्तु उस उच् च न्यायािय द्वारा, स्जसके वह न्यायािय अधीनथथ है, या उच् चतम न्यायािय द्वारा ऐसा घोवर्त नह ं ककया गया है, वहां न्यायािय अपनी राय और उसके कारणों को उस्लिखित करत े हुए मामि े का कथन तैयार करेगा और उसे उच् च न्यायािय के ववननश् चय के लिए ननदेलित करेगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में “ववननयम” से साधारण िंड अधधननयम, 1897 में या 1897 का 10 ककसी राज्य के साधारण िंड अधधननयम में यथापररभावर्त कोई ववननयम अलभप्रेत है । (2) यहद सेिन न्यायािय अपने समि िंबबत ककसी मामिे में, स्जसे उपधारा (1) के उपबंध िागू नह ं होत े हैं, ठीक समझता है तो वह, ऐसे मामि े की सुनवाई में उठने वािे ककसी ववधध-प्रश् न को उच्च न्यायािय के ववननश् चय के लिए ननदेलित कर सकेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 343 (3) कोई न्यायािय, जो उच् च न्यायािय को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन ननदेि करता है, उस पर उच् च न्यायािय का ववननश् चय होने तक, अलभयुक्ट् त को कारावास को सुपुदष कर सकेगा या अपेिा ककए जाने पर उपस्थथत होने के लिए जमानत पर छोड सकेगा । 437. (1) जब कोई प्रश् न ऐसे ननदेलित ककया जाता है तब उच् च न्यायािय उस पर उच् च न्यायािय ऐसा आदेि पाररत करेगा जैसा वह ठीक समझे और ऐसे आदेि की प्रनतलिवप उस के ववननश् चय के अनुसार मामि े न्यायािय को लभजवाएगा स्जसके द्वारा वह ननदेि ककया गया था और वह न्यायािय उस का ननपटारा । मामि े को उक्ट् त आदेि के अनुरूप ननपटाएगा । (2) उच् च न्यायािय ननदेि दे सकेगा कक ऐसे ननदेि का िचाष कौन देगा । 438. (1) उच् च न्यायािय या कोई सिे न न्यायाधीि अपनी थथानीय अधधकाररता पुनर िण की के भीतर स्थथत ककसी अवर दंड न्यायािय के समि की ककसी कायवष ाह के अलभिेि को, िस्क्ट् तयों का प्रयोग करन े के ककसी अलभलिखित या पाररत ककए गए ननष्कर्,ष दंडादेि या आदेि की िुद्धता, वैधता या लिए अलभििे औधचत्य के बारे में और ऐस े अवर न्यायािय की ककन्ह ं कायवष ाहहयों की ननयलमतता के मंगाना । बारे में अपना समाधान करन े के प्रयोजन से, मंगा सकेगा और उसकी पर िा कर सकेगा और ऐसा अलभिेि मंगात े समय ननदेि दे सकेगा कक अलभिेि की पर िा िंबबत रहने तक ककसी दंडादेि या आदेि का ननष्पादन ननिंबबत ककया जाए और यहद अलभयुक्ट् त परररोध में है तो उसे उसके बधं पत्र या जमानतपत्र पर छोड हदया जाए । स्पष् टीकरण—सभी मस्जथरेट, चाहे वे कायपष ािक हों या न्यानयक, और चाहे वे आरंलभक अधधकाररता का प्रयोग कर रहे हों, या अपीि अधधकाररता का, इस उपधारा के और धारा 439 के प्रयोजनों के लिए सेिन न्यायाधीि से अवर समझ े जाएंगे । (2) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त पुनर िण की िस्क्ट् तयों का प्रयोग ककसी अपीि, जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में पाररत ककसी अंतवतष ी आदेि के संबंध में नह ं ककया जाएगा । (3) यहद ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा इस धारा के अधीन आवेदन या तो उच् च न्यायािय को या सेिन न्यायाधीि को ककया गया है, तो उसी व्यस्क्ट् त द्वारा कोई और आवेदन उनमें से दसू रे के द्वारा ग्रहण नह ं ककया जाएगा । 439. ककसी अलभिेि की, धारा 438 के अधीन पर िा करन े पर या अन्यथा, उच् च जांच करन े का न्यायािय या सेिन न्यायाधीि, मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को ननदेि दे सकेगा कक वह, ऐसे आदेि देने की िस्क्ट् त । ककसी पररवाद की, जो धारा 226 या धारा 227 की उपधारा (4) के अधीन िाररज कर हदया गया है, या ककसी अपराध के अलभयुक्ट् त ऐसे व्यस्क्ट् त के मामिे की, जो उन्मोधचत कर हदया गया है, अनतररक्ट् त जांच थवयं करे या अपने अधीनथथ मस्जथरेटों में से ककसी के द्वारा कराए तथा मुख्य न्यानयक मस्जथरेट ऐसी अनतररक्ट् त जांच थवयं कर सकेगा या उसे करन े के लिए अपने ककसी अधीनथथ मस्जथरेट को ननदेि दे सकेगा : परन्तु कोई न्यायािय ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त के मामि े में, जो उन्मोधचत कर हदया गया है, इस धारा के अधीन जांच करन े का कोई ननदेि तभी देगा जब इस बात का कारण दलितष करन े के लिए कक ऐसा ननदेि क्ट्यों नह ं हदया जाना चाहहए, ऐसे व्यस्क्ट् त को अवसर लमि चुका हो ।344 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सेिन 440. (1) ऐसी ककसी कायवष ाह के मामि े में स्जसका अलभिेि सेिन न्यायाधीि ने न्यायाधीि की थवयं मंगवाया है, वह उन सभी या ककन्ह ं िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकेगा स्जनका प्रयोग पुनर िण की धारा 442 की उपधारा (1) के अधीन उच् च न्यायािय कर सकता है । िस्क्ट् तया ं । (2) जहां सेिन न्यायाधीि के समि पुनर िण के रूप में कोई कायवष ाह उपधारा (1) के अधीन प्रारंभ की गई है, वहां धारा 442 की उपधारा (2), उपधारा (3), उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी कायवष ाह को िागू होंगे और उक्ट् त उपधाराओं में उच् च न्यायािय के प्रनत ननदेिों का यह अथ ष िगाया जाएगा कक व े सेिन न्यायाधीि के प्रनत ननदेि हैं । (3) जहां ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा या उसकी ओर स े पुनर िण के लिए आवेदन सेिन न्यायाधीि के समि ककया जाता है, वहां ऐसे व्यस्क्ट् त के संबंध में उस पर सेिन न्यायाधीि का ववननश् चय अस्न्तम होगा और ऐसे व्यस्क्ट् त की प्रेरणा पर पुनर िण के रूप में और कायवष ाह उच् च न्यायािय या ककसी अन्य न्यायािय द्वारा ग्रहण नह ं की जाएगी । अपर सेिन 441. अपर सेिन न्यायाधीि को ककसी ऐसे मामि े के बारे में, जो सेिन न्यायाधीि न्यायाधीि की के ककसी साधारण या वविेर् आदेि के द्वारा या उसके अधीन उस े अंतररत ककया जाता िस्क्ट् त । है, सेिन न्यायाधीि की इस अध्याय के अधीन सभी िस्क्ट् तयां प्राप् त होंगी और वह उनका प्रयोग कर सकेगा । उच् च न्यायािय 442. (1) ऐसी ककसी कायवष ाह के मामिे में, स्जसका अलभिेि उच् च न्यायािय ने की पुनर िण की थवयं मंगवाया है या स्जसकी उसे अन्यथा जानकार हुई है, वह धारा 427, धारा 430, धारा िस्क्ट् तयां । 431 और धारा 432 द्वारा अपीि न्यायािय को या धारा 344 द्वारा सेिन न्यायािय को प्रदत्त िस्क्ट् तयों में से ककसी का थववववेकानुसार प्रयोग कर सकेगा, और जब उन न्यायाधीिों, जो पुनर िण न्यायािय में पीठासीन हैं, की राय समान रूप से ववभास्जत हो, तब मामिे का ननपटारा धारा 433 द्वारा उपबंधधत र नत से ककया जाएगा । (2) इस धारा के अधीन कोई आदेि, जो अलभयुक्ट् त या अन्य व्यस्क्ट् त पर प्रनतकूि प्रभाव डािता है, तब तक नह ं ककया जाएगा, जब तक उस े अपनी प्रनतरिा में या तो थवयं या अधधवक्ट्ता द्वारा सुने जाने का अवसर न लमि चुका हो । (3) इस धारा की कोई बात, उच् च न्यायािय को दोर्मुस्क्ट् त के ननष्कर् ष को दोर्लसद्धध के ननष्कर् ष में सपं ररवनततष करन े के लिए प्राधधकृत करन े वाि नह ं समझी जाएगी । (4) जहां इस संहहता के अधीन कोई अपीि होती है, ककन्त ु कोई अपीि की नह ं जाती है, वहां उस पिकार की प्रेरणा पर, जो अपीि कर सकता था, पुनर िण की कोई कायवष ाह ग्रहण नह ं की जाएगी । (5) जहा ं इस संहहता के अधीन कोई अपीि होती है, ककन्त ु उच् च न्यायािय को ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा पुनर िण के लिए आवेदन ककया गया है और उच् च न्यायािय का यह समाधान हो जाता है कक ऐसा आवेदन इस गित ववश्व ास के आधार पर ककया गया था कक उसस े कोई अपीि नह ं होती है और न्याय के हहत में ऐसा करना आवश्यक है तो उच् च न्यायािय पुनर िण के लिए आवेदन को अपीि की याधचका मान सकेगा और उस पर तद्नुसार कायवष ाह कर सकेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 345 443. (1) जब एक ह ववचारण में दोर्लसद्ध एक या अधधक व्यस्क्ट् त पुनर िण के लिए उच् च न्यायािय आवेदन उच् च न्यायािय को करत े हैं और उसी ववचारण में दोर्लसद्ध कोई अन्य व्यस्क्ट् त की पुनर िण के मामिों को पुनर िण के लिए आवदे न सेिन न्यायाधीि को करता है, तब उच् च न्यायािय, पिकारों की वापस िेन े या सामान्य सुववधा और अन्तग्रथष त प्रश् नों के महत्व को ध्यान में रित े हुए यह ववननश् चय करेगा अन्तररत करन े कक उन दोनों में स े कौन सा न्यायािय पुनर िण के लिए आवदे नों को अंनतम रूप स े की िस्क्ट् त । ननपटाएगा और जब उच् च न्यायािय यह ववननश् चय करता है कक पुनर िण के लिए सभी आवेदन उसी के द्वारा ननपटाए जान े चाहहए, तब उच् च न्यायािय यह ननदेि देगा कक सिे न न्यायाधीि के समि िंबबत पनु र िण के लिए आवदे न उस े अन्तररत कर हदए जाए ं और जहां उच् च न्यायािय यह ववननश् चय करता है कक पुनर िण के आवदे न उसके द्वारा ननपटाए जान े आवश्यक नह ं हैं, वहां वह यह ननदेि देगा कक उस े ककए गए पुनर िण के लिए आवेदन सिे न न्यायाधीि को अन्तररत ककए जाएं । (2) जब कभी पुनर िण के लिए आवेदन उच् च न्यायािय को अन्तररत ककया जाता है, तब वह न्यायािय उस े इस प्रकार ननपटाएगा, मानो वह उसके समि सम्यक् रूप से ककया गया आवेदन है । (3) जब कभी पुनर िण के लिए आवेदन सेिन न्यायाधीि को अन्तररत ककया जाता है, तब वह न्यायाधीि उस े इस प्रकार ननपटाएगा, मानो वह उसके समि सम्यक् रूप से ककया गया आवेदन है । (4) जहां पुनर िण के लिए आवेदन उच् च न्यायािय द्वारा सेिन न्यायाधीि को अन्तररत ककया जाता है, वहां उस व्यस्क्ट् त या उन व्यस्क्ट् तयों की प्रेरणा पर स्जनके पुनर िण के लिए आवेदन सेिन न्यायाधीि द्वारा ननपटाए गए हैं, पुनर िण के लिए कोई और आवेदन उच् च न्यायािय या ककसी अन्य न्यायािय में नह ं होगा । 444. इस संहहता में अलभव्यक्ट् त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधधत है उसके लसवाय, पिकारों को सुनने का जो न्यायािय अपनी पुनर िण की िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर रहा है उसके समि थवय ं या न्यायािय का अधधवक्ट्ता द्वारा सुने जाने का अधधकार ककसी भी पिकार को नह ं है ; ककन्तु यहद ववकलप । न्यायािय ठीक समझता है तो वह ऐसी िस्क्ट् तयों का प्रयोग करत े समय ककसी पिकार को थवयं या उसके अधधवक्ट्ता द्वारा सुन सकेगा । 445. जब उच् च न्यायािय या सेिन न्यायाधीि द्वारा कोई मामिा इस अध्याय के उच् च न्यायािय के आदेि को अधीन पुनर क्षित ककया जाता है, तब वह धारा 429 द्वारा उपबंधधत र नत से अपना प्रमाखणत करके ववननश् चय या आदेि प्रमाखणत करके उस न्यायािय को भेजेगा, स्जसके द्वारा पुनर क्षित ननचिे ननष्कर्,ष दंडादेि या आदेि अलभलिखित ककया गया या पाररत ककया गया था, और तब वह न्यायािय को भेजा जाना । न्यायािय, स्जसे ववननश् चय या आदेि ऐसे प्रमाखणत करके भेजा गया है ऐसे आदेि करेगा, जो ऐसे प्रमाखणत ववननश् चय के अनुरूप हैं और, यहद आवश्यक हो तो, अलभिेि में तद्नुसार संिोधन कर हदया जाएगा । अध्याय 33 आपराधिक मामिों का अन्तरण 446. (1) जब कभी उच् चतम न्यायािय को यह प्रतीत कराया जाता है कक न्याय के मामिों और उद्देश्यों के लिए यह समीचीन है कक इस धारा के अधीन कोई आदेि ककया जाए, तब वह अपीिों को अन्तररत करन े की ननदेि दे सकेगा कक कोई ववलिष् ट मामिा या अपीि एक उच् च न्यायािय से दसू रे उच् च उच् चतम न्यायािय न्यायािय को या एक उच् च न्यायािय के अधीनथथ दंड न्यायािय से दसू रे उच् च की िस्क्ट् त ।346 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न्यायािय के अधीनथथ समान या वररष् ठ अधधकाररता वािे दसू रे दंड न्यायािय को अन्तररत कर द जाए । (2) उच् चतम न्यायािय भारत के महान्यायवाद या हहतबद्ध पिकार के आवेदन पर ह इस धारा के अधीन काय ष कर सकेगा और ऐसा प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा ककया जाएगा जो उस दिा के लसवाय, जब कक आवेदक भारत का महान्यायवाद या राज्य का महाधधवक्ट् ता है, िपथपत्र या प्रनतज्ञान द्वारा समधथतष होगा । (3) जहा ं इस धारा द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् तयों का प्रयोग करन े के लिए कोई आवेदन िाररज कर हदया जाता है वहा,ं यहद उच् चतम न्यायािय की यह राय है कक आवेदन तुच्छ या तंग करने वािा था तो वह आवेदक को आदेि दे सकेगा कक वह इतनी रालि, स्जतनी वह न्यायािय उस मामि े की पररस्थथनतयों में समुधचत समझे, प्रनतकर के तौर पर उस व्यस्क्ट् त को दे, स्जसने आवेदन का ववरोध ककया था । मामिों और 447. (1) जब कभी उच् च न्यायािय को यह प्रतीत कराया जाता है कक— अपीिों को (क) उसके अधीनथथ ककसी दंड न्यायािय में ऋजु और पिपातरहहत जांच या अन्तररत करने की ववचारण नह ं हो सकेगा ; या उच् च न्यायािय की िस्क्ट्त । (ि) ककसी असाधारण कहठन ववधधप्रश् न के उठन े की संभाव्यता है ; या (ग) इस धारा के अधीन कोई आदेि इस संहहता के ककसी उपबंध द्वारा अपेक्षित है, या पिकारों या साक्षियों के लिए सामान्य सुववधाप्रद होगा, या न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है, तब वह आदेि दे सकेगा कक— (i) ककसी अपराध की जांच या ववचारण ऐसे ककसी न्यायािय द्वारा ककया जाए जो धारा 197 से धारा 205 (दोनों सहहत) के अधीन तो अहहतष नह ं है, ककन्तु ऐसे अपराध की जांच या ववचारण करन े के लिए अन्यथा सिम है ; (ii) कोई ववलिष् ट मामिा या अपीि या मामिों या अपीिों का वग ष उसके प्राधधकार के अधीनथथ ककसी दंड न्यायािय से ऐसे समान या वररष् ठ अधधकाररता वािे ककसी अन्य दंड न्यायािय को अंतररत कर हदया जाए ; (iii) कोई ववलिष् ट मामिा सिे न न्यायािय को ववचारणाथ ष सुपुदष कर हदया जाए ; या (iv) कोई ववलिष् ट मामिा या अपीि थवयं उसको अन्तररत कर द जाए, और उसका ववचारण उसके समि ककया जाए । (2) उच् च न्यायािय ननचिे न्यायािय की ररपोटष पर, या हहतबद्ध पिकार के आवेदन पर या थवप्रेरणा पर कायवष ाह कर सकेगा : परन्तु ककसी मामि े को एक ह सेिन िंड के एक दंड न्यायािय से दसू रे दंड न्यायािय को अन्तररत करने के लिए आवेदन उच् च न्यायािय से तभी ककया जाएगा जब ऐसा अन्तरण करने के लिए आवेदन सेिन न्यायाधीि को कर हदया गया है और उसके द्वारा अथवीकृत कर हदया गया है । (3) उपधारा (1) के अधीन आदेि के लिए प्रत्येक आवेदन समावेदन द्वारा ककया जाएगा, जो उस दिा के लसवाय, जब आवेदक राज्य का महाधधवक्ट् ता हो, िपथपत्र या प्रनतज्ञान द्वारा समधथतष होगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 347 (4) जब ऐसा आवेदन कोई अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त करता है, तब उच् च न्यायािय उस े ननदेि दे सकेगा कक वह ककसी प्रनतकर के संदाय के लिए, जो उच् च न्यायािय उपधारा (7) के अधीन अधधननणीत करे, बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करे । (5) ऐसा आवेदन करन े वािा प्रत्येक अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त, िोक अलभयोजक को आवेदन की लिखित सूचना, उन आधारों की प्रनतलिवप के सहहत देगा स्जन पर वह ककया गया है, और आवेदन के गुणागुण पर तब तक कोई आदेि नह ं ककया जाएगा, जब तक ऐसी सूचना के हदए जाने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घंटे न बीत गए हों । (6) जहां आवेदन ककसी अधीनथथ न्यायािय से कोई मामिा या अपीि अंतररत करन े के लिए है, वहा ं यहद उच् च न्यायािय का समाधान हो जाता है कक ऐसा करना न्याय के हहत में आवश्यक है, तो वह आदेि दे सकेगा कक जब तक आवेदन का ननपटारा नह ं हो जाए, तब तक के लिए अधीनथथ न्यायािय की कायवष ाहहयां, ऐसे ननबंधनों पर, स्जन्हें अधधरोवपत करना उच् च न्यायािय ठीक समझे, रोक द जाएंगी : परन्तु ऐसी रोक धारा 346 के अधीन प्रनतप्रेर्ण की अधीनथथ न्यायािय की िस्क्ट् त पर प्रभाव नह ं डािेगी । (7) जहां उपधारा (1) के अधीन आदेि देने के लिए आवेदन िाररज कर हदया जाता है वहां, यहद उच् च न्यायािय की यह राय है कक आवेदन तुच्छ या तंग करन े वािा था तो, वह आवेदक को आदेि दे सकेगा कक ऐसी रालि, जो उस मामि े की पररस्थथनतयों में वह समुधचत समझे, प्रनतकर के तौर पर उस व्यस्क्ट् त को दे, स्जसने आवेदन का ववरोध ककया था । (8) जब उच् च न्यायािय ककसी न्यायािय से ककसी मामिे का अन्तरण अपने समि ववचारण के लिए करने का उपधारा (1) के अधीन आदेि देता है, तब वह ऐस े ववचारण में उसी प्रकिया का अनुपािन करेगा, स्जसका मामिे का ऐसा अन्तरण नह ं ककए जाने की दिा में वह न्यायािय करता । (9) इस धारा की कोई बात धारा 218 के अधीन सरकार के ककसी आदेि पर प्रभाव डािने वाि नह ं समझी जाएगी । 448. (1) जब कभी सेिन न्यायाधीि को यह प्रतीत कराया जाता है कक न्याय के मामिों और अपीिों को उद्देश्यों के लिए यह समीचीन है कक इस उपधारा के अधीन आदेि हदया जाए, तब वह अन्तररत करन े आदेि दे सकेगा कक कोई ववलिष् ट मामिा उसके सेिन िंड में एक दंड न्यायािय से की सेिन दसू रे दंड न्यायािय को अन्तररत कर हदया जाए । न्यायाधीि की िस्क्ट् त । (2) सेिन न्यायाधीि ननचिे न्यायािय की ररपोटष पर या ककसी हहतबद्ध पिकार के आवेदन पर या थवप्रेरणा पर कारषवाई कर सकेगा । (3) धारा 447 की उपधारा (3), उपधारा (4), उपधारा (5), उपधारा (6), उपधारा (7) और उपधारा (9) के उपबंध, उपधारा (1) के अधीन ककसी आदेि के लिए सेिन न्यायाधीि को आवेदन के संबंध में वैसे ह िागू होंगे, जैसे वे धारा 447 की उपधारा (1) के अधीन आदेि के लिए उच् च न्यायािय को आवेदन के संबंध में िागू होत े हैं, लसवाय इसके कक उस धारा की उपधारा (7) इस प्रकार िाग ू होगी, मानो उसमें आन े वाि े “रालि” िब्द के थथान पर, “दस हजार रुपए से अनधधक की रालि” िब्द रि हदए गए हैं ।348 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सेिन 449. (1) सेिन न्यायाधीि अपने अधीनथथ ककसी मुख्य न्यानयक मस्जथरेट स े न्यायाधीिों कोई मामिा या अपीि वापस ि े सकेगा या कोई मामिा या अपीि, स्जस े उसन े उसके द्वारा मामिों हवािे ककया हो, वापस मंगा सकेगा । और अपीिों का वापस लिया (2) अपर सेिन न्यायाधीि के समि मामिे का ववचारण या अपीि की सुनवाई जाना । प्रारंभ होने स े पूव ष ककसी समय सेिन न्यायाधीि ककसी मामिे या अपीि को, स्जस े उसने अपर सेिन न्यायाधीि के हवािे ककया है, वापस मंगा सकेगा । (3) जहां सेिन न्यायाधीि, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन कोई मामिा या अपीि वापस मंगाता है या वापस िेता है, वहां वह, यथास्थथनत, या तो उस मामिे का अपने न्यायािय में ववचारण कर सकेगा या उस अपीि को थवयं सुन सकेगा या उस े ववचारण या सुनवाई के लिए इस संहहता के उपबंधों के अनुसार दसू रे न्यायािय के हवािे कर सकेगा । न्यानयक 450. (1) कोई मुख्य न्यानयक मस्जथरेट, अपने अधीनथथ ककसी मस्जथरेट स े ककसी मस्जथरेटों द्वारा मामि े को वापस ि े सकेगा या ककसी मामि े को, स्जसे उसने ऐसे मस्जथरेट के हवािे मामिों का ककया है, वापस मंगा सकेगा और मामि े की जांच या ववचारण थवयं कर सकेगा या उस े वापस लिया जांच या ववचारण के लिए ककसी अन्य ऐसे मस्जथरेट को ननदेलित कर सकेगा, जो उसकी जाना । जांच या ववचारण करने के लिए सिम है । (2) कोई न्यानयक मस्जथरेट ककसी मामि े को, जो उसने धारा 212 की उपधारा (2) के अधीन ककसी अन्य मस्जथरेट के हवािे ककया है, वापस मंगा सकेगा और ऐस े मामिे की जांच या ववचारण थवयं कर सकेगा । कायपष ािक 451. कोई स्जिा मस्जथरेट या उपिंड मस्जथरेट,— मस्जथरेटों द्वारा (क) ककसी ऐसी कायवष ाह को, जो उसके समि आरंभ हो चुकी है, ननपटारे के मामिों का हवाि े ककया जाना या लिए अपने अधीनथथ ककसी मस्जथरेट के हवािे कर सकेगा ; वापस लिया (ि) अपन े अधीनथथ ककसी मस्जथरेट स े ककसी मामि े को वापस ि े सकेगा या जाना। ककसी मामि े को, स्जस े उसन े ऐसे मस्जथरेट के हवािे ककया हो, वापस मंगा सकेगा और ऐसी कायवष ाह को थवयं ननपटा सकेगा या उसे ननपटारे के लिए ककसी अन्य मस्जथरेट को ननदेलित कर सकेगा । कारणों का 452. धारा 448, धारा 449, धारा 450 या धारा 451 के अधीन आदेि करन े वािा कोई सेिन अलभलिखित न्यायाधीि या मस्जथरेट, ऐसा आदेि करन े के अपन े कारणों को अलभलिखित करेगा । ककया जाना । अध्याय 34 िंडािेशों का ननष्पािन, ननिंबन, पररिार और िघकु रण क—मत्ृ यु िंडािेश धारा 409 के 453. जब मत्ृ यु दंडादेि की पस्ुष् ट के लिए उच् च न्यायािय को प्रथतुत ककसी मामि े अधीन हदए गए में, सेिन न्यायािय को उस पर उच् च न्यायािय द्वारा पुस्ष् ट का आदेि या अन्य आदेि आदेि का प्राप् त होता है, तो वह वारंट जार करके या अन्य ऐसे कदम उठाकर, जो आवश्यक हो, ननष्पादन । उस आदेि को कियास्न्वत कराएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 349 454. जब अपीि में या पुनर िण में उच् च न्यायािय द्वारा मत्ृ य ु दंडादेि हदया उच् च न्यायािय द्वारा हदए गए जाता है, तब सेिन न्यायािय, उच् च न्यायािय का आदेि प्राप् त होने पर वारंट जार मत्ृ यु दंडादेि करके दंडादेि को कियास्न्वत कराएगा । का ननष्पादन । 455. (1) जहां ककसी व्यस्क्ट् त को उच् च न्यायािय द्वारा मत्ृ यु दंडादेि हदया गया है उच् चतम न्यायािय को और उसके ननणयष के ववरुद्ध कोई अपीि संववधान के अनुच्छेद 134 के िंड (1) के अपीि की दिा उपिंड (क) या उपिंड (ि) के अधीन उच् चतम न्यायािय को होती है, वहां उच् च में मत्ृ यु दंडादेि न्यायािय दंडादेि का ननष्पादन तब तक के लिए थथधगत ककए जाने का आदेि देगा, जब के ननष्पादन का वविंबबत ककया तक ऐसी अपीि करने के लिए अनुज्ञात अवधध समाप् त नह ं हो जाती है या यहद उस जाना । अवधध के भीतर कोई अपीि की गई है, तो जब तक उस अपीि का ननपटारा नह ं हो जाता है । (2) जहा ं उच् च न्यायािय द्वारा मत्ृ यु दंडादेि हदया गया है या उसकी पुस्ष् ट की गई है, और दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त, संववधान के अनुच्छेद 132 के अधीन या अनुच्छेद 134 के िंड (1) के उपिंड (ग) के अधीन प्रमाणपत्र हदए जाने के लिए उच् च न्यायािय से आवेदन करता है, तो उच् च न्यायािय, दंडादेि का ननष्पादन तब तक के लिए थथधगत ककए जाने का आदेि देगा, जब तक उस आवेदन का उच् च न्यायािय द्वारा ननपटारा नह ं हो जाता है या यहद ऐस े आवेदन पर कोई प्रमाणपत्र हदया गया है, तो जब तक उस प्रमाणपत्र पर उच् चतम न्यायािय को अपीि करन े के लिए अनुज्ञात अवधध समाप् त नह ं हो जाती है । (3) जहा ं उच् च न्यायािय द्वारा मत्ृ यु दंडादेि हदया गया है या उसकी पुस्ष् ट की गई है और उच् च न्यायािय का यह समाधान हो जाता है कक दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त संववधान के अनुच्छेद 136 के अधीन अपीि के लिए वविेर् इजाजत हदए जाने के लिए उच् चतम न्यायािय में याधचका प्रथतुत करना चाहता है, वहां उच् च न्यायािय दंडादेि का ननष्पादन इतनी अवधध तक के लिए, स्जतनी वह ऐसी याधचका प्रथतुत करन े के लिए पयाषप् त समझे, वविंबबत ककए जाने का आदेि देगा । 456. यहद कोई महहिा, स्जसे मत्ृ य ु दंडादेि हदया गया है, गभवष ती पाई जाती है तो गभवष ती महहिा को मत्ृ यु दंड का उच् च न्यायािय दंडादेि को आजीवन कारावास के रूप में िघुकरण कर देगा । िघुकरण ककया जाना । ख—कारािास 457. (1) तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध द्वारा जैसा अन्यथा उपबंधधत है उसके कारावास का थथान ननयत लसवाय, राज्य सरकार यह ननदेि दे सकेगी कक ककसी व्यस्क्ट् त को, जो इस संहहता के करन े की अधीन कारावालसत ककए जान े या अलभरिा के लिए सुपुदष ककए जान े के लिए दायी है, िस्क्ट् त । ककस थथान में परररुद्ध ककया जाएगा । (2) यहद कोई व्यस्क्ट् त, जो इस संहहता के अधीन कारावालसत ककए जाने या अलभरिा के लिए सुपुदष ककए जाने के लिए दायी है, लसववि कारागार में परररुद्ध है तो कारागार या सुपुदषगी के लिए आदेि देने वािा न्यायािय या मस्जथरेट उस व्यस्क्ट् त को दांडडक कारागार में भेजे जाने का ननदेि दे सकेगा । (3) जब कोई व्यस्क्ट् त उपधारा (2) के अधीन दांडडक कारागार में भेजा जाता है तब, वहां से छोड हदए जान े पर उसे लसववि कारागार को िौटाया जाएगा, जब तक कक उसे या तो—350 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (क) दांडडक कारागार में उसके भेजे जाने से तीन वर् ष बीत गए हैं, उस दिा में वह लसववि प्रकिया संहहता, 1908 की धारा 58 के अधीन लसववि कारागार से छोडा 1908 का 5 गया समझा जाएगा ; या (ि) लसववि कारागार में उसके कारावास का आदेि देने वािे न्यायािय द्वारा दांडडक कारागार के भारसाधक अधधकार को यह प्रमाखणत करके भेज हदया गया है कक वह लसववि प्रकिया संहहता, 1908 की धारा 58 के अधीन छोडे जाने का हकदार 1908 का 5 है । कारावास के 458. (1) जहां धारा 453 द्वारा उपबंधधत उन मामिों से लभन्न मामिों में दंडादेि का अलभयुक्ट् त आजीवन कारावास या ककसी अवधध के कारावास के लिए दंडाहदष् ट ककया गया ननष्पादन । है, वहां दंडादेि देने वािा न्यायािय उस कारागार या अन्य थथान को, स्जसमें वह परररुद्ध है या उसे परररुद्ध ककया जाना है तत्काि वारंट भेजेगा और यहद अलभयुक्ट् त पहिे से ह उस कारागार या अन्य थथान में परररुद्ध नह ं है तो वारंट के साथ उस े ऐसी कारागार या अन्य थथान को लभजवाएगा : परन्तु जहां अलभयुक्ट् त को न्यायािय के उठने तक के लिए कारावास का दंडादेि हदया गया है, वहां वारंट तैयार करना या वारंट कारागार को भेजना आवश्यक नह ं होगा और अलभयुक्ट् त को ऐसे थथान में, जो न्यायािय ननदेलित करे, परररुद्ध ककया जा सकेगा । (2) जहां अलभयुक्ट् त न्यायािय में उस समय उपस्थथत नह ं है, जब उस े ऐस े कारावास का दंडादेि हदया गया है, जैसा उपधारा (1) में उस्लिखित है, वहां न्यायािय उस े कारागार या ऐसे अन्य थथान में, जहां उसे परररुद्ध ककया जाना है, भेजने के प्रयोजन से उसकी धगरफ्तार के लिए वारंट जार करेगा ; और ऐसे मामि े में दंडादेि उसकी धगरफ्तार की तार ि से प्रारंभ होगा । ननष्पादन के 459. कारावास के दंडादेि के ननष्पादन के लिए प्रत्येक वारंट उस कारागार या अन्य लिए वारंट का थथान के भारसाधक अधधकार को ननदेलित होगा, स्जसमें बंद परररुद्ध है या परररुद्ध ननदेिन। ककया जाना है । वारंट ककसको 460. जब कैद कारागार में परररुद्ध ककया जाना है, तब वारंट जेिर को सौंपा सौंपा जाएगा । जाएगा । ग—िुमाान े का उदग्र िण जुमाषना उद्गहृ त 461. (1) जब ककसी अपराधी को जुमाषने का संदाय करने के लिए दंडादेि हदया गया करन े के लिए है, ककन्तु ऐसा संदाय नह ं ककया गया है, तब दंडादेि देने वािा न्यायािय ननम् नलिखित में वारंट । से ककसी एक या दोनों प्रकार से जुमाषने की वसूि के लिए कारषवाई कर सकेगा, अथाषत ् वह,— (क) अपराधी की ककसी चि संपवत्त की कुकी और वविय द्वारा रकम को उद्गहृ त करने के लिए वारंट जार कर सकेगा ; (ि) व्यनतिमी की चि या अचि संपवत्त या दोनों से भू-राजथव की बकाया के रूप में रकम को उद्गहृ त करन े के लिए स्जिे के किक्ट्टर को प्राधधकृत करते हुए उस े वारंट जार कर सकेगा :अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 351 परन्तु यहद दंडादेि ननदेलित करता है कक जुमाषना देने में व्यनतिम होने पर अपराधी कारावालसत ककया जाएगा और यहद अपराधी ने व्यनतिम के बदिे में ऐसा पूरा कारावास भुगत लिया है तो कोई न्यायािय ऐसा वारंट तब तक नह ं जार करेगा जब तक वह वविेर् कारणों से जो अलभलिखित ककए जाएं, ऐसा करना आवश्यक न समझे या जब तक उसने जुमाषने में से व्यय या प्रनतकर के संदाय के लिए धारा 395 के अधीन आदेि नह ं ककया हो । (2) राज्य सरकार, उस र नत को ववननयलमत करने के लिए, स्जससे उपधारा (1) के िंड (क) के अधीन वारंट ननष्पाहदत ककए जाने हैं और ऐस े वारंट के ननष्पादन में कुकष की गई ककसी संपवत्त के बारे में अपराधी से लभन्न ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा ककए गए ककन्ह ं दावों के संक्षिप् त अवधारण के लिए, ननयम बना सकेगी । (3) जहां न्यायािय, किक्ट्टर को उपधारा (1) के िंड (ि) के अधीन वारंट जार करता है वहां किक्ट्टर उस रकम को भू-राजथव की बकाया की वसूि स े संबंधधत ववधध के अनुसार वसूि करेगा मानो ऐसा वारंट ऐसी ववधध के अधीन जार ककया गया प्रमाणपत्र हो : परन्तु ऐसा कोई वारंट अपराधी की धगरफ्तार या कारावास में ननरोध द्वारा ननष्पाहदत नह ं ककया जाएगा । 462. ककसी न्यायािय द्वारा धारा 461 की उपधारा (1) के िंड (क) के अधीन ऐस े वारंट का जार ककया गया कोई वारंट उस न्यायािय को थथानीय अधधकाररता के भीतर ननष्पाहदत प्रभाव । ककया जा सकेगा और वह ऐसी अधधकाररता के बाहर की ककसी ऐसी संपवत्त की कुकी और वविय उस दिा में प्राधधकृत करेगा जब वह उस स्जिा मस्जथरेट द्वारा स्जसकी थथानीय अधधकाररता के अन्दर ऐसी संपवत्त पाई जाए, पष्ृ ठांककत कर हदया गया है । 463. इस संहहता में या तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध में ककसी बात के होत े हुए जुमाषन े के भी, जब ककसी अपराधी को ककसी ऐसे राज्यिेत्र में, स्जस पर इस संहहता का ववथतार नह ं उद्ग्र हण के लिए ककसी ऐस े है, ककसी दंड न्यायािय द्वारा जुमाषना देने का दंडादेि हदया गया है और दंडादेि देने राज्यिेत्र के वािा न्यायािय ऐसी रकम को भू-राजथव की बकाया के तौर पर उद्गहृ त करन े के लिए, न्यायािय उन राज्यिेत्रों के, स्जन पर इस संहहता का ववथतार है, ककसी स्जिे के किक्ट्टर को द्वारा, स्जस पर प्राधधकृत करत े हुए वारंट जार करता है, तब ऐसा वारंट उन राज्यिेत्रों के, स्जन पर इस इस संहहता का ववथतार नह ं है, संहहता का ववथतार है, ककसी न्यायािय द्वारा धारा 461 की उपधारा (1) के िंड (ि) के जार ककया गया अधीन जार ककया गया वारंट समझा जाएगा और तद्नुसार ऐसे वारंट के ननष्पादन के वारंट । बारे में उक्ट् त धारा की उपधारा (3) के उपबंध िागू होंगे । 464. (1) जब अपराधी को केवि जुमाषने का और जुमाषना देने में व्यनतिम होने पर कारावास के कारावास का दंडादेि हदया गया है और जुमाषना तत्काि नह ं हदया जाता है, तब दंडादेि के ननष्पादन का न्यायािय— ननिंबन । (क) आदेि दे सकेगा कक जुमाषना या तो ऐसी तार ि को या उसस े पहिे, जो उस आदेि की तार ि से तीस हदन के पश्चात ् की नह ं होगी, पूणतष : संदेय होगा, या दो या तीन ककथतों में संदेय होगा स्जनमें से पहि ककथत ऐसी तार ि को या उसस े पहिे सदं ेय होगी, जो आदेि की तार ि से तीस हदन के पश्चात ् की नह ं होगी और, अन्य ककथत या ककथतें, यथास्थथनत, तीस हदन से अनधधक के अन्तराि या अन्तरािों पर संदेय होगी या होंगी ;352 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) कारावास के दंडादेि का ननष्पादन ननिस्म्बत कर सकेगा और अपराधी द्वारा, जैसा न्यायािय ठीक समझे, इस ित ष का बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत ककए जाने पर कक, यथास्थथनत, जुमाषना या उसकी ककथतें देने की तार ि या तार िों को वह न्यायािय के समि उपस्थथत होगा, अपराधी को छोड सकेगा ; और यहद, यथास्थथनत, जुमाषने की या ककसी ककथत की रकम उस अंनतम तार ि को या उसके पूव ष स्जसको वह आदेि के अधीन संदेय हो, प्राप् त न हो तो न्यायािय कारावास के दंडादेि के तुरंत ननष्पाहदत ककए जाने का ननदेि दे सकेगा । (2) उपधारा (1) के उपबंध ककसी ऐसे मामिे में भी िाग ू होंगे स्जसमें ऐसे धन के संदाय के लिए आदेि ककया गया है स्जसके वसूि न होने पर कारावास अधधननणीत ककया जा सकेगा और धन तुरंत नह ं हदया गया है, और यहद वह व्यस्क्ट् त स्जसके ववरुद्ध आदेि हदया गया है उस उपधारा में ननहदषष् ट बंधपत्र लििने की अपेिा ककए जाने पर ऐसा करन े में असफि रहता है तो न्यायािय कारावास का दंडादेि तुरन्त पाररत कर सकेगा । घ—ननष्पािन के बारे में सािारण उपबंि वारंट कौन जार 465. ककसी दंडादेि के ननष्पादन के लिए प्रत्येक वारंट या तो उस न्यायाधीि या मस्जथरेट कर सकेगा । द्वारा, स्जसने दंडादेि पाररत ककया है या उसके पद-उत्तरवती द्वारा जार ककया जा सकेगा । ननकि भाग े 466. (1) जब ननकि भागे लसद्धदोर् को इस संहहता के अधीन मत्ृ यु, आजीवन लसद्धदोर् पर कारावास या जुमाषने का दंडादेि हदया जाता है तब ऐसा दंडादेि इसमें इसके पूव ष दंडादेि कब अन्तववष्ष ट उपबंधों के अधीन रहत े हुए तुरन्त प्रभावी हो जाएगा । प्रभाविीि होगा । (2) जब ननकि भागे लसद्धदोर् को इस संहहता के अधीन ककसी अवधध के कारावास का दंडादेि हदया जाता है, तब,— (क) यहद ऐसा दंडादेि उस दंडादेि से कठोरतर ककथम का हो स्जसे ऐसा लसद्धदोर्, जब वह ननकि भागा था, तब भोग रहा था तो नया दंडादेि तुरन्त प्रभावी हो जाएगा ; (ि) यहद ऐसा दंडादेि उस दंडादेि से कठोरतर ककथम का न हो स्जसे ऐसा लसद्धदोर्, जब वह ननकि भागा था तब, भोग रहा था, तो नया दंडादेि, उसके द्वारा उस अनतररक्ट् त अवधध के लिए कारावास भोग लिए जान े के पश् चात ् प्रभावी होगा, जो उसके ननकि भागने के समय उसके पूववष ती दंडादेि की िेर् अवधध के बराबर है । (3) उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए, कहठन कारावास का दंडादेि सादा कारावास के दंडादेि से कठोरतर ककथम का समझा जाएगा । ऐसे अपराधी को 467. (1) जब कारावास का दंडादेि पहिे से ह भोगने वािे व्यस्क्ट् त को दंडादेि जो अन्य पश् चात व् ती-दोर्लसद्धध पर कारावास या आजीवन कारावास का दंडादेि हदया जाता है तब अपराध के लिए जब तक न्यायािय यह ननदेि न दे कक पश् चात व् ती दंडादेि ऐसे पूव ष दंडादेि के साथ-साथ पहिे स े भोगा जाएगा, ऐसा कारावास या आजीवन कारावास उस कारावास की समास्प् त पर, स्जसके दंडाहदष् ट है । लिए वह पहिे दंडादेि हुआ था, प्रारंभ होगा : परन्तु, जहां उस व्यस्क्ट् त को, स्जसे प्रनतभूनत देने में व्यनतिम करन े पर धारा 141 के अधीन आदेि द्वारा कारावास का दंडादेि हदया गया है ऐसा दंडादेि भोगने के दौरान ऐसे आदेि के हदए जाने के पूव ष ककए गए अपराध के लिए कारावास का दंडादेि हदया जाता है, वहां पश् चात क् धथत दंडादेि तुरन्त प्रारंभ हो जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 353 (2) जब ककसी व्यस्क्ट् त को, जो आजीवन कारावास का दंडादेि पहिे स े ह भोग रहा है, पश् चात व् ती दोर्लसद्धध पर ककसी अवधध के कारावास या आजीवन कारावास का दंडादेि हदया जाता है तब पश् चात व् ती दंडादेि पूव ष दंडादेि के साथ-साथ भोगा जाएगा । 468. जहां अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त दोर्लसद्धध पर ककसी अवधध के लिए कारावास स े अलभयुक्ट् त द्वारा भोगी गई दंडाहदष् ट ककया गया है, जो जुमाषने के संदाय में व्यनतिम के लिए कारावास नह ं है वहां ननरोध की उसी मामिे के अन्वेर्ण, जांच या ववचारण के दौरान और ऐसी दोर्लसद्धध की तार ि से अवधध का पहिे उसके द्वारा भोगे गए, यहद कोई हो, ननरोध की अवधध का, ऐसी दोर्लसद्धध पर कारावास के दंडादेि के उस पर अधधरोवपत कारावास की अवधध के ववरुद्ध मजु रा ककया जाएगा और ऐसी ववरुद्ध मुजरा दोर्लसद्धध पर उस व्यस्क्ट् त का कारावास में जाने का दानयत्व उस पर अधधरोवपत कारावास ककया जाना । की अवधध के िेर् भाग तक, यहद कोई हो, ननबस्षन्धत ककया जाएगा : परन्तु धारा 475 में ननहदषष् ट मामिों में ननरोध की ऐसी अवधध का उस धारा में ननहदषष् ट चौदह वर् ष की अवधध के ववरुद्ध मुजरा ककया जाएगा । 469. (1) धारा 466 या धारा 467 की कोई बात ककसी व्यस्क्ट् त को उस दंड के व्याववृत्त । ककसी भाग स े िम्य करन े वाि न समझी जाएगी स्जसका वह अपनी पूव ष या पश् चात व् ती दोर्लसद्धध पर दायी है । (2) जब जुमाषना देने में व्यनतिम होन े पर कारावास का अधधननणषय कारावास के मुख्य दंडादेि के साथ उपाबद्ध है और दंडादेि भोगने वािे व्यस्क्ट् त को उसके ननष्पादन के पश् चात ् कारावास के अनतररक्ट् त मुख्य दंडादेि या अनतररक्ट् त मुख्य दंडादेिों को भोगना है, तब जुमाषना देने में व्यनतिम होन े पर कारावास का अधधननणषय तब तक कियास्न्वत नह ं ककया जाएगा, जब तक वह व्यस्क्ट् त अनतररक्ट् त दंडादेि या दंडादेिों को भुगत नह ं चुका हो । 470. जब दंडादेि पूणतष या ननष्पाहदत ककया जा चुका है तब उसका ननष्पादन करन े दंडादेि के ननष्पादन पर वािा अधधकार वारंट को, थव-हथतािर सहहत पष्ृ ठांकन द्वारा उस र नत को प्रमाखणत वारंट का करत े हुए, स्जससे दंडादेि का ननष्पादन ककया गया था, उस न्यायािय को, स्जसने उस े िौटाया जाना । जार ककया था, िौटा देगा । 471. कोई धन (जो जुमाषने से लभन्न है), जो इस संहहता के अधीन हदए गए ककसी स्जस धन का संदाय करन े का आदेि के आधार पर संदेय है और स्जसकी वसूि का ढंग अलभव्यक्ट् त रूप से अन्यथा आदेि हदया उपबंधधत नह ं है, ऐसे वसूि ककया जाएगा, मानो वह जुमाषना है : गया है उसका जुमाषन े के रूप परन्तु इस धारा के आधार पर, धारा 400 के अधीन ककसी आदेि को िागू होने में में वसूि ककया धारा 461 का अथ ष इस प्रकार िगाया जाएगा, मानो धारा 461 की उपधारा (1) के जा सकना । परन्तुक में, “धारा 395 के अधीन आदेि”, िब्दों और अंकों के पश् चात,् “या धारा 400 के अधीन िचों के संदाय के लिए आदेि” िब्द और अंक अन्तःथथावपत कर हदए गए हैं । ङ—िंडािेशों का ननिंबन, पररिार और िघुकरण 472. (1) मत्ृ यु दंडादेि के अधीन लसद्धदोर् ठहराया गया कोई व्यस्क्ट्त या उसका मत्ृ यु दंडादेि मामिों में दया ववधधक उत्तराधधकार या कोई अन्य संबंधी, यहद उसने पहिे से दया याधचका प्रथतुत नह ं याधचका । की है, तो वह संववधान के अनुच्छेद 72 के अधीन भारत के राष्रपनत या अनुच्छेद 161 के अधीन राज्य के राज्यपाि के समि दया याधचका फाइि कर सकेगा, जो ऐसी तार ि से354 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तीस हदन की अवधध के भीतर, स्जसको कारागार अधीिक,— (i) उच्चतम न्यायािय द्वारा अपीि, पुनवविष ोकन या वविेर् इजाजत अपीि के ननरथत करने के बारे में उसे सूधचत करता है ; या (ii) उच्च न्यायािय द्वारा मत्ृ यु दंडादेि की पुस्ष्ट की तार ि के बारे में और उच्चतम न्यायािय में कोई अपीि या वविेर् इजाजत फाइि करने के लिए अनुज्ञात समय समाप्त हो गया है, सूधचत करता है । (2) उपधारा (1) के अधीन याधचका आरंभ में राज्यपाि को की जा सकेगी और राज्यपाि द्वारा उसके ननरथत करने या ननपटारा ककए जान े पर, ऐसी याधचका के ननरथत या ननपटारा ककए जाने की तार ि से साठ हदन की अवधध के भीतर राष्रपनत को की जाएगी । (3) कारागार अधीिक या कारागार प्रभार सुननस्श्चत करेगा कक प्रत्येक लसद्धदोर्, एक से अधधक लसद्धदोर् होने की दिा में साठ हदन की अवधध के भीतर दया याधचका भी फाइि करे और अन्य लसद्धदोर्ों स े ऐसी याधचका प्राप्त न होने की दिा में, कारागार अधीिक, नाम, पता, मामिे के अलभिेि की प्रनत और मामिे के सभी अन्य ब्यौरे उक्ट्त दया याधचका के साथ ववचार के लिए केंद्र य सरकार या राज्य सरकार को भेजेगा । (4) केंद्र य सरकार, दया याधचका की प्रास्प्त पर राज्य सरकार से हटप्पखणयां मांगेगी और मामिे के अलभिेि सहहत याधचका पर ववचार करेगी तथा राज्य सरकार की हटप्पखणयों और जेि अधीिक स े अलभिेिों की प्रास्प्त की तार ि से साठ हदन की अवधध के भीतर यथा संभविीघ्र इस ननलमत्त राष्रपनत को लसफाररि करेगी । (5) राष्रपनत, दया याधचका पर ववचार, ववननश्चय और उसका ननपटारा कर सकेगा तथा ककसी मामिे में यहद एक से अधधक लसद्धदोर् हैं तो, याधचकाएं न्यायहहत में एक साथ राष्रपनत द्वारा ववननस्श्चत की जाएंगी । (6) केंद्र य सरकार, दया याधचका पर राष्रपनत के आदेि की प्रास्प्त पर, राज्य सरकार के गहृ ववभाग और कारागार अधीिक या कारागार के प्रभार अधधकार को अडताि स घंटे के भीतर संसूधचत करेगी । (7) संववधान के अनुच्छेद 72 या अनुच्छेद 161 के अधीन राष्रपनत या राज्यपाि के आदेि के ववरुद्ध ककसी न्यायािय में कोई अपीि नह ं होगी और यह अंनतम होगा तथा राष्रपनत या राज्यपाि द्वारा ववननश्चय पर पहुंचने के ककसी प्रश्न पर ककसी न्यायािय में कोई जांच नह ं की जाएगी । दंडादेिों का 473. (1) जब ककसी व्यस्क्ट् त को ककसी अपराध के लिए दंडादेि हदया जाता है, तब ननिम्बन या समुधचत सरकार, ककसी समय, ितों के बबना या ऐसी ितों पर, स्जन्हें दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त पररहार करने की थवीकार करता है, उसके दंडादेि के ननष्पादन का ननिंबन कर सकेगी या जो दंडादेि उसे िस्क्ट् त । हदया गया है, उस संपूण ष दंडादेि का या उसके ककसी भाग का पररहार कर सकेगी । (2) जब कभी समुधचत सरकार से दंडादेि के ननिम्बन या पररहार के लिए आवेदन ककया जाता है, तब समुधचत सरकार उस न्यायािय के पीठासीन न्यायाधीि से, स्जसके समि या स्जसके द्वारा दोर्लसद्धध हुई थी या स्जसके द्वारा उसकी पुस्ष् ट की गई थी, अपेिा कर सकेगी कक वह, इस बारे में कक आवेदन मंजूर ककया जाए या नामंजूर ककया जाए, ऐसी राय के लिए अपने कारणों सहहत कधथत करे और अपनी राय के कथन केअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 355 साथ ववचारण के अलभिेि की या उसके ऐसे अलभिेि की, जैसा ववद्यमान हो, प्रमाखणत प्रनतलिवप भी भेजे । (3) यहद कोई ित,ष स्जस पर दंडादेि का ननिम्बन या पररहार ककया गया है, समुधचत सरकार की राय में पूर नह ं हुई है तो समुधचत सरकार ननिम्बन या पररहार को रद्द कर सकेगी और तब, यहद वह व्यस्क्ट् त, स्जसके पि में दंडादेि का ननिम्बन या पररहार ककया गया था, मुक्ट् त है तो वह ककसी पुलिस अधधकार द्वारा वारंट के बबना धगरफ्तार ककया जा सकेगा और दंडादेि के असमाप्त भाग को भोगने के लिए प्रनतप्रेवर्त ककया जा सकेगा । (4) वह ित,ष स्जस पर इस धारा के अधीन दंडादेि का ननिम्बन या पररहार ककया जाए, ऐसी हो सकेगी, जो उस व्यस्क्ट् त द्वारा, स्जसके पि में दंडादेि का ननिम्बन या पररहार ककया जाए, पूर की जाने वाि हो या ऐसी हो सकेगी, जो उसकी इच्छा पर आधश्रत न हो । (5) समुधचत सरकार, दंडादेिों के ननिम्बन के बारे में, और उन ितों के बारे में, स्जन पर याधचकाएं प्रथतुत की जानी चाहहए और ननपटाई जानी चाहहए, साधारण ननयमों या वविेर् आदेिों द्वारा ननदेि दे सकेगी : परन्तु अठारह वर् ष से अधधक की आयु के ककसी व्यस्क्ट्त के ववरुद्ध ककसी दंडादेि की दिा में (जो जुमाषने के दंडादेि से लभन्न है), दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त द्वारा या उसकी ओर से ककसी अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा द गई कोई ऐसी याधचका तब तक ग्रहण नह ं की जाएगी, जब तक दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त कारागार में न हो, और— (क) जहां ऐसी याधचका दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त द्वारा द जाती है, वहां जब तक वह कारागार के भारसाधक अधधकार के माध्यम से प्रथतुत न की जाए ; या (ि) जहां ऐसी याधचका ककसी अन्य व्यस्क्ट् त द्वारा द जाती है, वहां जब तक उसमें यह घोर्णा नह ं हो कक दंडाहदष् ट व्यस्क्ट् त कारागार में है । (6) ऊपर की उपधाराओं के उपबंध, इस संहहता की या ककसी अन्य ववधध की ककसी धारा के अधीन दंड न्यायािय द्वारा पाररत ऐसे आदेि को भी िागू होंगे, जो ककसी व्यस्क्ट् त की थवतंत्रता को ननबस्षन्धत करता है या उस पर या उसकी सम्पवत्त पर कोई दानयत्व अधधरोवपत करता है । (7) इस धारा में और धारा 474 में, “समुधचत सरकार” पद से,— (क) उन मामिों में, जहां दंडादेि ऐसे ववर्य से संबंधधत ककसी ववधध के ववरुद्ध अपराध है, या उपधारा (6) में ननहदषष् ट पाररत आदेि ककसी ववधध के अधीन है, स्जससे संबंधधत ववर्य पर संघ की कायपष ालिका िस्क्ट्त का ववथतार केन्द्र य सरकार तक है, अलभप्रेत है ; (ि) अन्य मामिों में, उस राज्य की सरकार अलभप्रेत है, स्जसके भीतर अपराधी दंडाहदष् ट ककया गया है या उक्ट् त आदेि पाररत ककया गया है । 474. समुधचत सरकार, दंडादेि प्राप्त व्यस्क्ट्त की सम्मनत के बबना,— दंडादेि िघुकरण करने की िस्क्ट्त। (क) मत्ृ यु दंडादेि के थथान पर आजीवन कारावास में ; (ि) आजीवन कारावास के दंडादेि के थथान पर सात वर् ष से अन्यून की अवधध के कारावास में ;356 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ग) सात वर्ष या अधधक के लिए कारावास के दंडादेि के थथान पर तीन वर् ष से अन्यून की अवधध कारावास की में ; (घ) सात वर् ष स े कम के कारावास के दंडादेि के थथान पर जुमाषन े में ; (ङ) कहठन कारावास के दंडादेि के थथान पर, ककसी ऐसी अवधध के साधारण कारावास में, स्जसके लिए वह व्यस्क्ट् त दंडाहदष् ट ककया जा सकता है, िघुकरण कर सकेगी । कुछ मामिों में 475. धारा 473 में ककसी बात के होत े हुए भी, जहां ककसी व्यस्क्ट् त को ऐसे अपराध छूट या िघुकरण के लिए, स्जसके लिए मत्ृ युदंड ववधध द्वारा उपबंधधत दंडों में से एक है, आजीवन कारावास की िस्क्ट् तयों पर का दंडादेि हदया गया है या धारा 474 के अधीन ककसी व्यस्क्ट् त को हदए गए मत्ृ यु दंडादेि ननबन्ष धन । का आजीवन कारावास के रूप में िघुकरण ककया गया है, वहां ऐसा व्यस्क्ट् त कारावास से तब तक नह ं छोडा जाएगा, जब तक कक उसन े कम से कम चौदह वर् ष का कारावास पूरा नह ं कर लिया हो । मत्ृ यु दंडादेिों 476. राज्य सरकार को धारा 473 और धारा 474 द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् तयां, मत्ृ यु की दिा में दंडादेिों के मामिों में, केन्द्र य सरकार द्वारा भी प्रयुक्ट् त की जा सकेंगी । केन्द्र य सरकार की समवती िस्क्ट् त । कनतपय मामिों 477. (1) ककसी दंडादेि का पररहार करन े या उसके िघुकरण करन े के बारे में धारा में राज्य सरकार 473 और धारा 474 द्वारा राज्य सरकार को प्रदत्त िस्क्ट् तयों का प्रयोग उस दिा में, जब का केन्द्र य दंडादेि ककसी ऐसे अपराध के लिए है,— सरकार से सहमनत के (क) जो इस संहहता से लभन्न ककसी केन्द्र य अधधननयम के अधीन अपराध का पश् चात ् काय ष अन्वेर्ण करने के लिए सिक्ट् त ककसी अन्य अलभकरण द्वारा ककया गया था ; या करना । (ि) स्जसमें केन्द्र य सरकार की ककसी संपवत्त का दवुवनषनयोग या नाि या नुकसान अन्तग्रथष त है ; या (ग) जो केन्द्र य सरकार की सेवा में ककसी व्यस्क्ट् त द्वारा तब ककया गया था, जब वह अपने पद य कतव्ष यों के ननवहष न में काय ष कर रहा था या उसका ऐसे काय ष करना तात्पनयषत था, केन्द्र य सरकार की सहमनत के लसवाय, राज्य सरकार द्वारा प्रयोग नह ं ककया जाएगा । (2) स्जस व्यस्क्ट् त को ऐसे अपराधों के लिए दोर्लसद्ध ककया गया है, स्जनमें से कुछ उन ववर्यों से संबंधधत हैं, स्जन पर संघ की कायपष ालिका िस्क्ट् त का ववथतार है, और स्जसे पथृ क्-पथृ क् अवधध के कारावास का, जो साथ-साथ भोगा जाना है, दंडादेि हदया गया है, उसके संबंध में दंडादेि के ननिंबन, पररहार या िघुकरण का राज्य सरकार द्वारा पाररत कोई आदेि प्रभावी तभी होगा, जब ऐसे ववर्यों के बारे में, स्जन पर संघ की कायपष ालिका िस्क्ट् त का ववथतार है, ऐसे व्यस्क्ट् त द्वारा ककए गए अपराधों के संबंध में ऐसे दंडादेिों के, यथास्थथनत, पररहार, ननिंबन या िघुकरण का आदेि, केन्द्र य सरकार द्वारा भी कर हदया गया है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 357 अध्याय 35 िमानत और बंिपत्रों के बारे में उपबंि 478. (1) जब अजमानतीय अपराध के अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त से लभन्न कोई व्यस्क्ट् त ककन मामिों में पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार द्वारा वारंट के बबना धगरफ्तार या ननरुद्ध ककया जमानत ि जाएगी । जाता है या न्यायािय के समि उपस्थथत होता है या िाया जाता है और जब वह ऐसे अधधकार की अलभरिा में है उस बीच ककसी समय, या ऐस े न्यायािय के समि कायवष ाहहयों के ककसी प्रिम में, जमानत देने के लिए तैयार है तब ऐसा व्यस्क्ट् त जमानत पर छोड हदया जाएगा : परन्तु यहद ऐसा अधधकार या न्यायािय ठीक समझता है तो वह ऐसे व्यस्क्ट् त से जमानतपत्र िेने के बजाय उसे इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत प्रकार से उसकी उपस्थथनत के लिए बंधपत्र ननष्पाहदत करन े पर उन्मोधचत कर सकेगा यहद ऐसा व्यस्क्ट् त ननधनष है और प्रनतभू देने में असमथ ष है, तो उस े ऐस े उन्मोधचत करेगा । स्पष् टीकरण—जहां कोई व्यस्क्ट् त अपनी धगरफ्तार की तार ि के एक सप् ताह के भीतर जमानतपत्र देने में असमथ ष है वहां अधधकार या न्यायािय के लिए यह उपधारणा करन े का पयाषप् त आधार होगा कक वह इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए ननधषन व्यस्क्ट् त है : परन्तु यह और कक इस धारा की कोई बात धारा 135 की उपधारा (3) या धारा 492 के उपबंधों पर प्रभाव डािने वाि नह ं समझी जाएगी । (2) उपधारा (1) में ककसी बात के होत े हुए भी, जहां कोई व्यस्क्ट् त, उपस्थथनत के समय और थथान के बारे में बंधपत्र या जमानतपत्र की ितों का अनुपािन करन े में असफि रहता है वहां न्यायािय उस,े जब वह उसी मामिे में ककसी पश् चात व् ती अवसर पर न्यायािय के समि उपस्थथत होता है या अलभरिा में िाया जाता है, जमानत पर छोडने से इंकार कर सकेगा और ऐसी ककसी इंकार का, ऐसे बंधपत्र या जमानतपत्र से आबद्ध ककसी व्यस्क्ट् त से धारा 491 के अधीन उसको िास्थत देने की अपेिा करने की न्यायािय की िस्क्ट् तयों पर कोई प्रनतकूि प्रभाव नह ं पडेगा । 479. (1) जहां कोई व्यस्क्ट् त, ककसी ववधध के अधीन ककसी अपराध के लिए इस अधधकतम अवधध, स्जसके संहहता के अधीन (जो ऐसा अपराध नह ं है स्जसके लिए उस ववधध के अधीन मत्ृ युदंड या लिए ववचाराधीन आजीवन कारावास एक दंड के रूप में ववननहदषष् ट ककया गया है) अन्वेर्ण, जांच या कैद ननरुद्ध ववचारण की अवधध के दौरान कारावास की उस अधधकतम अवधध के, जो उस ववधध के ककया जा सकता अधीन उस अपराध के लिए ववननहदषष् ट की गई है, आध े से अधधक की अवधध के लिए है । ननरोध भोग चुका है, वहां वह न्यायािय द्वारा जमानत पर छोड हदया जाएगा : परन्तु ऐसा व्यस्क्ट्त प्रथम बार का अपराधी है और स्जसे (पूव ष में ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध नह ं ककया गया हो) तो वह न्यायािय द्वारा बंधपत्र पर छोड हदया जाएगा, यहद वह उस ववधध के अधीन ऐसे अपराध के लिए ववननहदषष्ट कारावास की अधधकतम अवधध की एक-नतहाई ववथताररत अवधध तक ननरोध में रह चुका है : परन्तु यह और कक न्यायािय, िोक अलभयोजक की सुनवाई के पश् चात ् और उन कारणों से जो उस द्वारा ििे बद्ध ककए जाएंगे, ऐस े व्यस्क्ट् त के उक्ट् त आधी अवधध से द घतष र अवधध के लिए ननरोध को जार रिन े का आदेि कर सकेगा या उसके बंधपत्र के बजाय जमानतपत्र पर उस े छोड देगा :358 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— परन्तु यह भी कक कोई भी ऐसा व्यस्क्ट् त अन्वेर्ण, जांच या ववचारण की अवधध के दौरान उस ववधध के अधीन उक्ट् त अपराध के लिए उपबंधधत कारावास की अधधकतम अवधध से अधधक के लिए ककसी भी मामि े में ननरुद्ध नह ं रिा जाएगा । स्पष् टीकरण—जमानत मंजूर करन े के लिए इस धारा के अधीन ननरोध की अवधध की गणना करन े में अलभयुक्ट् त द्वारा कायवष ाह में हुए वविंब के कारण भोगी गई ननरोध की अवधध को अपवस्जतष ककया जाएगा । (2) उपधारा (1) में ककसी बात के होते हुए भी, तथा उसके तीसरे परन्तुक के अधीन रहते हुए, जहां ककसी व्यस्क्ट्त के ववरुद्ध या एक से अधधक अपराध या बहु मामिे अन्वेर्ण, जांच या ववचारण के लिए िंबबत हैं तो उस े न्यायािय द्वारा जमानत पर नह ं छोडा जाएगा । (3) जेि का अधीिक, जहां अलभयुक्ट्त व्यस्क्ट्त ननरुद्ध है, यथास्थथनत, उपधारा (1) में उस्लिखित अवधध का आधा या एक-नतहाई पूण ष होने पर, ऐसे व्यस्क्ट्त को जमानत पर छोडने के लिए उपधारा (1) के अधीन न्यायािय को कायवष ाह करने के लिए तुरन्त लिखित में आवेदन करेगा । अजमानतीय 480. (1) जब कोई व्यस्क्ट् त, स्जस पर अजमानतीय अपराध का अलभयोग है या अपराध की दिा स्जस पर यह संदेह है कक उसने अजमानतीय अपराध ककया है, पुलिस थाने के भारसाधक में कब जमानत अधधकार द्वारा वारंट के बबना धगरफ्तार या ननरुद्ध ककया जाता है या उच् च न्यायािय ि जा सकेगी । या सेिन न्यायािय से लभन् न न्यायािय के समि उपस्थथत होता है या िाया जाता है तब वह जमानत पर छोडा जा सकेगा, ककन्त— ु (i) यहद यह ववश् वास करन े के लिए उधचत आधार प्रतीत होत े हैं कक ऐसा व्यस्क्ट् त मत्ृ यु या आजीवन कारावास स े दंडनीय अपराध का दोर्ी है तो वह इस प्रकार नह ं छोडा जाएगा ; (ii) यहद ऐसा अपराध कोई संज्ञेय अपराध है और ऐसा व्यस्क्ट् त मत्ृ यु, आजीवन कारावास या सात वर् ष या उसस े अधधक के कारावास से दंडनीय ककसी अपराध के लिए पहिे दोर्लसद्ध ककया गया है, या वह तीन वर् ष या उससे अधधक के, ककन्तु सात वर् ष से अनधधक की अवधध के कारावास से दंडनीय ककसी संज्ञेय अपराध के लिए दो या अधधक अवसरों पर पहिे दोर्लसद्ध ककया गया है तो वह इस प्रकार नह ं छोडा जाएगा : परन्तु न्यायािय यह ननदेि दे सकेगा कक िंड (i) या िंड (ii) में ननहदषष् ट व्यस्क्ट् त जमानत पर छोड हदया जाए यहद ऐसा व्यस्क्ट् त, लििु है या कोई महहिा या कोई रोगी या लिधथिांग व्यस्क्ट् त है : परन्तु यह और कक न्यायािय यह भी ननदेि दे सकेगा कक िंड (ii) में ननहदषष् ट व्यस्क्ट् त जमानत पर छोड हदया जाए, यहद उसका यह समाधान हो जाता है कक ककसी अन्य वविेर् कारण से ऐसा करना न्यायोधचत तथा ठीक है : परन्तु यह और भी कक केवि यह बात कक अलभयुक्ट् त की आवश्यकता, अन्वेर्ण में साक्षियों द्वारा पहचाने जाने के लिए या प्रथम पन्द्रह हदन से अधधक की पुलिस अलभरिा के लिए हो सकती है, जमानत मंजूर करन े से इंकार करन े के लिए पयाषप् त आधार नह ं होगी, यहद वह अन्यथा जमानत पर छोड हदए जाने के लिए हकदार है और यह वचनअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 359 देता है कक वह ऐसे ननदेिों का, जो न्यायािय द्वारा हदए जाएं, अनुपािन करेगा : परन्तु यह भी कक ककसी भी व्यस्क्ट् त को, यहद उसके द्वारा ककया गया अलभकधथत अपराध मत्ृ यु, आजीवन कारावास या सात वर् ष या उसस े अधधक के कारावास स े दंडनीय है, तो िोक अलभयोजक को सुनवाई का कोई अवसर हदए बबना इस उपधारा के अधीन न्यायािय द्वारा जमानत पर नह ं छोडा जाएगा । (2) यहद ऐसे अधधकार या न्यायािय को, यथास्थथनत, अन्वेर्ण, जांच या ववचारण के ककसी प्रिम में यह प्रतीत होता है कक यह ववश् वास करने के लिए उधचत आधार नह ं हैं कक अलभयुक्ट् त ने अजमानतीय अपराध ककया है, ककन्त ु उसके दोर्ी होने के बारे में और जांच करन े के लिए पयाषप् त आधार हैं, तो अलभयुक्ट् त धारा 492 के उपबंधों के अधीन रहते हुए और ऐसी जांच िंबबत रहने तक जमानत पर, या ऐसे अधधकार या न्यायािय के थववववेकानुसार, इसमें इसके पश् चात ् उपबंधधत प्रकार से अपने उपस्थथत होने के लिए बंधपत्र ननष्पाहदत करने पर, छोड हदया जाएगा । (3) जब कोई व्यस्क्ट् त, स्जस पर ऐस े कारावास स े स्जसकी अवधध सात वर् ष तक की 2023 का 45 या उसस े अधधक की है, दंडनीय कोई अपराध या भारतीय न्याय संहहता, 2023 के अध्याय 6, अध्याय 7 या अध्याय 17 के अधीन कोई अपराध करने या ऐसे ककसी अपराध का दष्ु प्रेरण या र्डय ंत्र या प्रयत् न करन े का अलभयोग या संदेह है, उपधारा (1) के अधीन जमानत पर छोडा जाता है, तो न्यायािय यह ित ष अधधरोवपत करेगा :— (क) कक ऐसा व्यस्क्ट् त इस अध्याय के अधीन ननष्पाहदत बंधपत्र की ितों के अनुसार उपस्थथत होगा ; (ि) कक ऐसा व्यस्क्ट् त उस अपराध जैसा, स्जसको करन े का उस पर अलभयोग या संदेह है, कोई अपराध नह ं करेगा ; और (ग) कक ऐसा व्यस्क्ट् त उस मामि े के तथ्यों से अवगत ककसी व्यस्क्ट् त को न्यायािय या ककसी पुलिस अधधकार के समि ऐसे तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाने के लिए प्रत्यित: या अप्रत्यित: उस े कोई उत् प्रेरणा, धमकी या वचन नह ं देगा या साक्ष्य को नह ं बबगाडेगा, और न्याय के हहत में ऐसी अन्य ितें भी, स्जसे वह ठीक समझे, अधधरोवपत कर सकेगा । (4) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन जमानत पर ककसी व्यस्क्ट् त को छोडने वािा अधधकार या न्यायािय ऐसा करन े के अपने कारणों या वविेर् कारणों को िेिबद्ध करेगा । (5) यहद कोई न्यायािय, स्जसने ककसी व्यस्क्ट् त को उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन जमानत पर छोडा है, ऐसा करना आवश्यक समझता है तो, ऐसे व्यस्क्ट् त को धगरफ्तार करन े का ननदेि दे सकेगा और उसे अलभरिा के लिए सुपुदष कर सकेगा । (6) यहद मस्जथरेट द्वारा ववचारणीय ककसी मामि े में ऐसे व्यस्क्ट् त का ववचारण, जो ककसी अजमानतीय अपराध का अलभयुक्ट् त है, उस मामि े में साक्ष्य देने के लिए ननयत प्रथम तार ि से साठ हदन की अवधध के अन्दर पूरा नह ं हो जाता है तो, यहद ऐसा व्यस्क्ट् त उक्ट् त सम्पूण ष अवधध के दौरान अलभरिा में रहा है तो, जब तक ऐसे कारणों से जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, मस्जथरेट अन्यथा ननदेि न दे वह मस्जथरेट की समाधानप्रद जमानत पर छोड हदया जाएगा ।360 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (7) यहद अजमानतीय अपराध के अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के ववचारण के समाप् त हो जान े के पश् चात ् और ननणयष हदए जाने के पूव,ष ककसी समय न्यायािय की यह राय है कक यह ववश् वास करन े के उधचत आधार हैं कक अलभयुक्ट् त ककसी ऐस े अपराध का दोर्ी नह ं है और अलभयुक्ट् त अलभरिा में है तो वह अलभयुक्ट् त को, ननणषय सुनन े के लिए अपने उपस्थथत होने के लिए बंधपत्र उसके द्वारा ननष्पाहदत ककए जाने पर छोड देगा । अलभयुक्ट् त को 481. (1) ववचारण के समाप् त होन े से पूव ष और अपीि के ननपटान से पूव,ष अगिे अपीि यथास्थथनत, अपराध का ववचारण करन े वािा न्यायािय या अपीि न्यायािय अलभयुक्ट् त से न्यायािय के यह अपेिा कर सकेगा कक जब उच् चतर न्यायािय संबंधधत न्यायािय के ननणषय के ववरुद्ध समि उपस्थथत फाइि की गई ककसी अपीि या याधचका के संबंध में सूचना जार करे, तो वह उच् चतर होने की अपेिा के लिए न्यायािय के समि उपस्थथत होन े के लिए बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत करे और ऐसे जमानत । बंधपत्र छह मास तक प्रभावी रहेंगे । (2) यहद ऐसा अलभयुक्ट् त उपस्थथत होने में असफि रहता है तो बंधपत्र जब्त हो जाएगा और धारा 491 के अधीन प्रकिया िागू होगी । धगरफ्तार की 482. (1) जब ककसी व्यस्क्ट् त को यह ववश् वास करन े का कारण है कक हो सकता है आिंका करन े उसको ककसी अजमानतीय अपराध के ककए जाने के अलभयोग में धगरफ्तार ककया जा वािे व्यस्क्ट्त की सकता है, तो वह इस धारा के अधीन ननदेि के लिए उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय जमानत मंजूर को आवेदन कर सकेगा ; और यहद वह न्यायािय ठीक समझे तो वह ननदेि दे सकेगा करन े के लिए ननदेि । कक ऐसी धगरफ्तार की स्थथनत में उसको जमानत पर छोड हदया जाए । (2) जब उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय उपधारा (1) के अधीन ननदेि देता है तब वह उस ववलिष् ट मामिे के तथ्यों को ध्यान में रित े हुए उन ननदेिों में ऐसी ित,ें जो वह ठीक समझे, सस्म्मलित कर सकेगा, स्जनके अन्तगषत ननम् नलिखित भी हैं— (i) यह ित ष कक वह व्यस्क्ट् त पुलिस अधधकार द्वारा पूछे जाने वािे पररप्रश् नों का उत्तर देने के लिए जैसे और जब अपेक्षित हो, उपिब्ध होगा ; (ii) यह ित ष कक वह व्यस्क्ट् त उस मामि े के तथ्यों से अवगत ककसी व्यस्क्ट् त को न्यायािय या ककसी पुलिस अधधकार के समि ऐसे तथ्यों को प्रकट न करने के लिए मनाने के लिए प्रत्यित: या अप्रत्यित: उस े कोई उत् प्रेरणा, धमकी या वचन नह ं देगा ; (iii) यह ित ष कक वह व्यस्क्ट् त न्यायािय की पूव ष अनुज्ञा के बबना भारत नह ं छोडेगा ; (iv) ऐसी अन्य ित ें जो धारा 480 की उपधारा (3) के अधीन ऐसे अधधरोवपत की जा सकती हैं, मानो उस धारा के अधीन जमानत मंजूर की गई हो । (3) यहद तत्पश् चात ् ऐसे व्यस्क्ट् त को ऐसे अलभयोग पर पुलिस थाने के भारसाधक अधधकार द्वारा वारंट के बबना धगरफ्तार ककया जाता है और वह या तो धगरफ्तार के समय या जब वह ऐसे अधधकार की अलभरिा में है तब ककसी समय जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे जमानत पर छोड हदया जाएगा ; तथा यहद ऐसे अपराध का संज्ञान करन े वािा मस्जथरेट यह ववननश् चय करता है कक उस व्यस्क्ट् त के ववरुद्ध प्रथम बार ह वारंट जार ककया जाना चाहहए, तो वह उपधारा (1) के अधीन न्यायािय के ननदेि के अनुरूप जमानतीय वारंट जार करेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 361 2023 का 45 (4) इस धारा की कोई बात भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन ककसी अपराध को काररत करने के अलभयोग पर ककसी व्यस्क्ट्त की धगरफ्तार अंतवलषित करने वािे ककसी मामि े को िाग ू नह ं होगी । 483. (1) उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय यह ननदेि दे सकेगा कक,— जमानत के बारे में उच् च (क) ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को, स्जस पर ककसी अपराध का अलभयोग है और जो न्यायािय या अलभरिा में है, जमानत पर छोड हदया जाए और यहद अपराध धारा 480 की सेिन न्यायािय उपधारा (3) में ववननहदषष् ट प्रकार का है, तो वह ऐसी कोई ित ष स्जसे वह उस उपधारा की वविेर् में वखणतष प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे, अधधरोवपत कर सकेगा ; िस्क्ट् तयां। (ि) ककसी व्यस्क्ट् त को जमानत पर छोडने के समय मस्जथरेट द्वारा अधधरोवपत कोई ित ष अपाथत या उपांतररत कर द जाए : परन्तु उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त की, जो ऐस े अपराध का अलभयुक्ट् त है जो अनन्यत: सेिन न्यायािय द्वारा ववचारणीय है, या जो यद्यवप इस प्रकार ववचारणीय नह ं है, आजीवन कारावास से दंडनीय है, जमानत िेने के पूव ष जमानत के लिए आवेदन की सूचना िोक अलभयोजक को उस दिा के लसवाय देगा जब उसकी, ऐसे कारणों से, जो िेिबद्ध ककए जाएंगे, यह राय है कक ऐसी सूचना देना साध्य नह ं है: परंतु यह और कक उच्च न्यायािय या सेिन न्यायािय ककसी ऐसे व्यस्क्ट्त को जमानत देने से पूव ष जो, भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की 2023 का 45 उपधारा (2) के अधीन ववचारण योग्य ककसी अपराध का अलभयुक्ट्त है, ऐसे आवेदन की सूचना की प्रास्प्त की तार ि से पन्द्रह हदन की अवधध के भीतर िोक अलभयोजक को जमानत के लिए आवेदन की सूचना देगा । (2) सूचना देने वािे या उसके द्वारा प्राधधकृत ककसी व्यस्क्ट्त की उपस्थथनत भारतीय 2023 का 45 न्याय संहहता, 2023 की धारा 65 या धारा 70 की उपधारा (2) के अधीन ककसी व्यस्क्ट्त को जमानत के लिए आवेदन की सुनवाई करते समय बाध्यकार होगी । (3) उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय, ककसी ऐस े व्यस्क्ट् त को, स्जस े इस अध्याय के अधीन जमानत पर छोडा जा चुका है, धगरफ्तार करन े का ननदेि दे सकेगा और उस े अलभरिा के लिए सुपुदष कर सकेगा । 484. (1) इस अध्याय के अधीन ननष्पाहदत प्रत्येक बंधपत्र की रकम मामिे की बंधपत्र की रकम और उसे पररस्थथनतयों का सम्यक् ध्यान रिते हुए ननयत की जाएगी और अत्यधधक नह ं होगी । घटाना । (2) उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय यह ननदेि दे सकेगा कक पुलिस अधधकार या मस्जथरेट द्वारा अपेक्षित जमानत घटाई जाए । 485. (1) ककसी व्यस्क्ट् त को बंधपत्र पर या जमानतपत्र पर छोडे जाने के पूव,ष उस अलभयुक्ट् त और व्यस्क्ट् त द्वारा, इतनी धनरालि के लिए स्जतनी, यथास्थथनत, पुलिस अधधकार या प्रनतभुओ ं का बंधपत्र । न्यायािय पयाषप् त समझे, बंधपत्र ननष्पाहदत ककया जाएगा, और जब उसे बंधपत्र या जमानतपत्र पर छोडा जाएगा तो एक या अधधक पयाषप्त प्रनतभूओं द्वारा यह सित ष माना जाएगा कक ऐसा व्यस्क्ट् त बंधपत्र में वखणतष समय और थथान पर उपस्थथत होगा और जब तक, यथास्थथनत, पुलिस अधधकार या न्यायािय द्वारा अन्यथा ननदेि नह ं हदया जाता है इस प्रकार ननरंतर उपस्थथत होता रहेगा ।362 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) जहां ककसी व्यस्क्ट् त को जमानत पर छोडने के लिए कोई ित ष अधधरोवपत की गई है, वहां बंधपत्र या जमानतपत्र में वह ित ष भी अंतववष्ष ट होगी । (3) यहद मामिे से ऐसा अपेक्षित है, तो बंधपत्र या जमानतपत्र द्वारा, जमानत पर छोडे गए व्यस्क्ट् त को अपेिा ककए जान े पर आरोप का उत्तर देने के लिए उच् च न्यायािय, सेिन न्यायािय या अन्य न्यायािय में उपस्थथत होने के लिए भी आबद्ध ककया जाएगा । (4) यह अवधाररत करन े के प्रयोजन के लिए कक क्ट्या प्रनतभू उपयुक्ट् त या पयाषप् त है या नह ं, न्यायािय िपथपत्रों को, प्रनतभुओं के पयाषप् त या उपयुक्ट् त होने के बारे में उनमें अन्तववष्ष ट बातों के सबूत के रूप में, थवीकार कर सकेगा या यहद न्यायािय आवश्यक समझे तो वह ऐसे पयाषप् त या उपयुक्ट् त होने के बारे में या तो थवयं जांच कर सकेगा या अपने अधीनथथ ककसी मस्जथरेट से जांच करवा सकेगा । प्रनतभुओ ं द्वारा 486. ऐसा प्रत्येक व्यस्क्ट् त, जो जमानत पर अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त के छोडे जाने के लिए घोर्णा । उसका प्रनतभू है, न्यायािय के समि ऐसे व्यस्क्ट् तयों की संख्या के बारे में घोर्णा करेगा, स्जनके लिए उसने प्रनतभूनत द है स्जसके अन्तगतष अलभयुक्ट् त भी है, और उसमें सभी सुसंगत ववलिस्ष् टयां द जाएंगी । अलभरिा स े 487. (1) ज्यों ह बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत कर हदया जाता है, त्यों ह वह उन्मोचन । व्यस्क्ट् त, स्जसकी उपस्थथनत के लिए वह ननष्पाहदत ककया गया है, छोड हदया जाएगा, और जब वह कारागार में हो तब उसकी जमानत मंजूर करन े वािा न्यायािय जेि के भारसाधक अधधकार को उसके छोडे जाने के लिए आदेि जार करेगा, और वह अधधकार आदेि की प्रास्प् त पर उसे छोड देगा । (2) इस धारा की या धारा 478 या धारा 480 की कोई भी बात, ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त के छोडे जाने की अपेिा करने वाि न समझी जाएगी जो ऐसी बात के लिए ननरुद्ध ककए जाने का भागी है जो उस बात से लभन्न है स्जसके बारे में बंधपत्र या जमानतपत्र ननष्पाहदत ककया गया है । जब पहि े ि 488. यहद भूि, कपट के कारण या अन्यथा से अपयाषप् त प्रनतभू थवीकार कर लिए गई जमानत गए हैं या यहद वे बाद में अपयाषप् त हो जात े हैं तो न्यायािय यह ननदेि देत े हुए अपयाषप् त है तब धगरफ्तार का वारंट जार कर सकेगा कक जमानत पर छोडे गए व्यस्क्ट् त को उसके समि पयाषप् त जमानत के लिए आदेि िाया जाए और उस े पयाषप् त प्रनतभू देने का आदेि दे सकेगा और उसके ऐसा करन े में देने की िस्क्ट्त । असफि रहन े पर उसे कारागार को सुपुदष कर सकेगा । प्रनतभुओ ं का 489. (1) जमानत पर छोडे गए व्यस्क्ट् त की उपस्थथनत और उपसंजात के लिए उन्मोचन । प्रनतभुओं में से सब या कोई बंधपत्र के या तो पूणतष या या वहां तक, जहां तक वह आवेदकों से संबंधधत है, प्रभावोन्मुक्ट् त ककए जाने के लिए ककसी भी समय मस्जथरेट से आवेदन कर सकेंगे । (2) ऐसा आवेदन ककए जाने पर, मस्जथरेट यह ननदेि देत े हुए धगरफ्तार का वारंट जार करेगा कक ऐसे छोडे गए व्यस्क्ट् त को उसके समि िाया जाए । (3) वारंट के अनुसरण में ऐसे व्यस्क्ट् त के उपस्थथत होने पर या उसके थवेच्छया अभ्यपणष करन े पर, मस्जथरेट बंधपत्र के या तो पूणतष या या, वहा ं तक, जहां तक कक वह आवेदकों से संबंधधत है, प्रभावोन्मुक्ट् त ककए जाने का ननदेि देगा और ऐस े व्यस्क्ट् त स ेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 363 अपेिा करेगा कक वह अन्य पयाषप् त प्रनतभू दे और यहद वह ऐसा करन े में असफि रहता है तो उस े कारागार को सुपुदष कर सकेगा । 490. जब ककसी व्यस्क्ट् त से ककसी न्यायािय या अधधकार द्वारा बंधपत्र या मुचिके के जमानतपत्र ननष्पाहदत करन े की अपेिा की जाती है, तब वह न्यायािय या अधधकार , उस बजाय ननिेप । दिा में जब वह बंधपत्र सदाचार के लिए नह ं है, उस े ऐसे बंधपत्र के ननष्पादन के बदिे में इतनी धनरालि या इतनी रकम के सरकार वचन पत्र, स्जतनी वह न्यायािय या अधधकार ननयत करे, जमा करन े की अनुज्ञा दे सकेगा । 491. (1) जहां— प्रकिया, जब बंधपत्र जब्त (क) इस संहहता के अधीन कोई बंधपत्र ककसी न्यायािय के समि उपस्थथत कर लिया जाता होने या सम्पवत्त प्रथतुत करने के लिए है और उस न्यायािय या ककसी ऐसे है । न्यायािय को, स्जसे तत्पश् चात ् मामिा अंतररत ककया गया है, समाधानप्रद रूप में यह साबबत कर हदया जाता है कक बंधपत्र जब्त हो चुका है ; या (ि) इस संहहता के अधीन ककसी अन्य बंधपत्र के संबंध में उस न्यायािय को, स्जसके द्वारा बंधपत्र लिया गया था, या ऐसे ककसी न्यायािय को, स्जसे तत्पश् चात ् मामिा अंतररत ककया गया है, या प्रथम वग ष मस्जथरेट के ककसी न्यायािय को, समाधानप्रद रूप में यह साबबत कर हदया जाता है कक बंधपत्र जब्त हो चुका है, वहां न्यायािय ऐसे सबूत के आधारों को अलभलिखित करेगा और ऐस े बंधपत्र स े आबद्ध ककसी व्यस्क्ट् त से अपेिा कर सकेगा कक वह उसकी िास्थत दे या कारण दलितष करे कक वह क्ट्यों नह ं द जानी चाहहए । स्पष् टीकरण—न्यायािय के समि उपस्थथत होने या सम्पवत्त प्रथतुत करन े के लिए बंधपत्र की ककसी ित ष का यह अथ ष िगाया जाएगा कक उसके अंतगतष ऐसे न्यायािय के समि, स्जसको तत्पश् चात ् मामिा अन्तररत ककया जाता है, यथास्थथनत, उपस्थथत होने या सम्पवत्त प्रथतुत करने की ित ष भी है । (2) यहद पयाषप् त कारण दलितष नह ं ककया जाता है और िास्थत नह ं द जाती है, तो न्यायािय उसकी वसूि के लिए अग्रसर हो सकेगा मानो वह िास्थत इस संहहता के अधीन उसके द्वारा अधधरोवपत जुमाषना हो : परन्तु जहां ऐसी िास्थत नह ं द जाती है और वह पूवोक्ट् त र नत में वसूि नह ं की जा सकती है वहां, प्रनतभ ू के रूप में इस प्रकार आबद्ध व्यस्क्ट् त, उस न्यायािय के आदेि से, जो िास्थत की वसूि का आदेि करता है, लसववि कारागार में कारावास से, स्जसकी अवधध छह मास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा । (3) न्यायािय ऐसा करन े के अपने कारणों को िेिबद्ध करन े के पश् चात ् उस्लिखित िास्थत के ककसी प्रभाग का पररहार और केवि भाग के संदाय का प्रवतनष कर सकता है । (4) जहां बंधपत्र के लिए कोई प्रनतभू बंधपत्र की जब्ती होने के पूव ष मर जाता है वहां उसकी संपदा, बंधपत्र के बारे में सारे दानयत्व से उन्मोधचत हो जाएगी । (5) जहां कोई व्यस्क्ट् त, स्जसने धारा 125 या धारा 136 या धारा 401 के अधीन प्रनतभूनत द है, ककसी ऐसे अपराध के लिए दोर्लसद्ध ककया जाता है, स्जसे करना उसके बंधपत्र की या उसके बंधपत्र के बदिे में धारा 494 के अधीन ननष्पाहदत बंधपत्र की ितों का भंग होता है, वहां उस न्यायािय के ननणषय की, स्जसके द्वारा वह ऐसे अपराध के364 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— लिए दोर्लसद्ध ककया गया था, प्रमाखणत प्रनतलिवप उसके प्रनतभू या प्रनतभुओं के ववरुद्ध इस धारा के अधीन कायवष ाहहयों में साक्ष्य के रूप में उपयोग में िाई जा सकेगी और यहद ऐसी प्रमाखणत प्रनतलिवप इस प्रकार उपयोग में िाई जाती है तो, जब तक प्रनतकूि साबबत नह ं कर हदया जाता है, न्यायािय यह उपधारणा करेगा कक ऐसा अपराध उसके द्वारा ककया गया था । बंधपत्र और 492. धारा 491 के उपबंधों पर प्रनतकूि प्रभाव डािे बबना, जहां इस संहहता के जमानतपत्र का अधीन कोई बंधपत्र या जमानतपत्र ककसी मामि े में उपस्थथत होने के लिए है और उसकी रद्दकरण । ककसी ित ष के भंग होने के कारण उसकी जब्ती हो जाती है, वहां— (क) ऐस े व्यस्क्ट् त द्वारा ननष्पाहदत बंधपत्र तथा उस मामि े में उसके प्रनतभुओं द्वारा ननष्पाहदत एक या अधधक बंधपत्र भी, यहद कोई हों, रद्द हो जाएंगे ; और (ि) तत्पश् चात ् ऐसा कोई व्यस्क्ट् त, उस मामि े में केवि अपन े ह बंधपत्र पर छोडा नह ं जाएगा यहद, यथास्थथनत, पुलिस अधधकार या न्यायािय का, स्जसके समि उपस्थथत होने के लिए बंधपत्र ननष्पाहदत ककया गया था, यह समाधान हो जाता है कक बंधपत्र की ित ष का अनुपािन करने में असफि रहन े के लिए बंधपत्र स े आबद्ध व्यस्क्ट् त के पास कोई पयाषप् त कारण नह ं था : परन्तु इस संहहता के ककसी अन्य उपबंध के अधीन रहत े हुए, उसे उस मामिे में उस दिा में छोडा जा सकेगा जब वह ऐसी धनरालि के लिए कोई नया व्यस्क्ट् तगत बंधपत्र ननष्पाहदत कर दे और ऐसे एक या अधधक प्रनतभुओं से बंधपत्र ननष्पाहदत करा दे जो, यथास्थथनत, पुलिस अधधकार या न्यायािय पयाषप् त समझ े । प्रनतभ ू के 493. जब इस संहहता के अधीन जमानतपत्र का कोई प्रनतभ ू हदवालिया हो जाता है हदवालिया हो या मर जाता है, या जब ककसी बंधपत्र का धारा 491 के उपबंधों के अधीन जब्ती हो जान े या उसकी जाती है तब वह न्यायािय, स्जसके आदेि से ऐसा बंधपत्र लिया गया था या प्रथम वग ष मत्ृ यु हो जान े या बंधपत्र की मस्जथरेट, उस व्यस्क्ट् त को, स्जससे ऐसी प्रनतभूनत मांगी गई थी, यह आदेि दे सकेगा कक जब्ती हो जान े वह मूि आदेि के ननदेिों के अनुसार नई प्रनतभूनत दे और यहद ऐसी प्रनतभूनत न द जाए की दिा में तो वह न्यायािय या मस्जथरेट ऐस े कायवष ाह कर सकेगा मानो ऐस े मूि आदेि के प्रकिया। अनुपािन में व्यनतिम ककया गया है । लिि ु से अपेक्षित 494. यहद बंधपत्र ननष्पाहदत करन े के लिए ककसी न्यायािय या अधधकार द्वारा बंधपत्र । अपेक्षित व्यस्क्ट्त कोई लििु है, तो वह न्यायािय या अधधकार उसके बदिे में केवि प्रनतभ ू या प्रनतभुओं द्वारा ननष्पाहदत बंधपत्र थवीकार कर सकेगा । धारा 491 के 495. धारा 491 के अधीन ककए गए सभी आदेिों की ननम् नलिखित को अपीि अधीन आदेिों होगी, अथाषत ् :— से अपीि। (i) ककसी मस्जथरेट द्वारा ककए गए आदेि की दिा में सेिन न्यायाधीि ; (ii) सेिन न्यायािय द्वारा ककए गए आदेि की दिा में वह न्यायािय स्जसे ऐसे न्यायािय द्वारा ककए गए आदेि की अपीि होती है । कनतपय मुचिकों 496. उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय ककसी मस्जथरेट को ननदेि दे सकेगा कक पर देय रकम वह उस रकम को उद्गहृ त करे जो ऐसे उच् च न्यायािय या सेिन न्यायािय में उपस्थथत का उद्ग्र हण और उपसंजात होने के लिए ककसी बंधपत्र पर देय है । करन े का ननदेि देने की िस्क्ट्त ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 365 अध्याय 36 सम्पवि का व्ययन 497. (1) जब कोई सम्पवत्त, ककसी दंड न्यायािय या ववचारण के लिए मामिे का कनतपय मामिों में ववचारण संज्ञान या सुपुदष करने हेतु सिक्ट्त मस्जथरेट के समि ककसी अन्वेर्ण, जांच या ववचारण िंबबत रहन े तक के दौरान प्रथतुत की जाती है तब वह न्यायािय या मस्जथरेट उस अन्वेर्ण, जांच या सम्पवत्त की ववचारण के समास्प् त िंबबत होन े तक ऐसी सम्पवत्त की उधचत अलभरिा के लिए ऐसा अलभरिा और व्ययन के लिए आदेि, जैसा वह ठीक समझे, कर सकेगा और यहद वह सम्पवत्त िीघ्रतया या प्रकृत्या आदेि । ियिीि है या यहद ऐसा करना अन्यथा समीचीन है तो वह न्यायािय या मस्जथरेट ऐसा साक्ष्य अलभलिखित करन े के पश् चात,् जैसा वह आवश्यक समझ,े उसके वविय या उसका अन्यथा व्ययन ककए जाने के लिए आदेि कर सकेगा । स्पष् टीकरण—इस धारा के प्रयोजन के लिए, “सम्पवत्त” के अन्तगतष ननम् नलिखित है,— (क) ककसी भी ककथम की सम्पवत्त या दथतावेज जो न्यायािय के समि प्रथतुत की जाती है या जो उसकी अलभरिा में है ; (ि) कोई भी सम्पवत्त स्जसके बारे में कोई अपराध ककया गया प्रतीत होता है या जो ककसी अपराध के करन े में प्रयुक्ट् त की गई प्रतीत होती है । (2) न्यायािय या मस्जथरेट उपधारा (1) में ननहदषष्ट संपवत्त को उसके समि प्रथतुत करने से चौदह हदन की अवधध के भीतर ऐसी संपवत्त के ब्यौरे अंतववष्ष ट करने वािा वववरण ऐसे प्ररूप और ऐसी र नत में, जो राज्य सरकार ननयमों द्वारा उपबंधधत करे, तैयार करेगा । (3) न्यायािय या मस्जथरेट उपधारा (1) में ननहदषष्ट संपवत्त का, फोटो खिचं वाएगा, और यहद आवश्यक हो, तो मोबाइि फोन या ककसी अन्य इिैक्ट्राननक मीडडया पर वीडडयो बनवाएगा । (4) उपधारा (2) के अधीन तैयार वववरण और उपधारा (3) के अधीन लिए गए फोटो या वीडडयोग्राफी इस संहहता के अधीन ककसी जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह में साक्ष्य के रूप में उपयोग ककए जाएंगे । (5) न्यायािय या मस्जथरेट उपधारा (2) के अधीन तैयार ककए गए वववरण और उपधारा (3) के अधीन लिए गए फोटो या वीडडयोग्राफी लिए जाने के तीस हदन की अवधध के भीतर, सपं वत्त के ननपटान, नष्ट, अधधग्रहण या पररदान करने का आदेि ऐसी र नत में, जो इसमें इसके पश्चात ् ववननहदषष्ट है, करेगा । 498. (1) जब ककसी आपराधधक मामिे में अन्वेर्ण, जांच या ववचारण समाप् त हो ववचारण की समास्प् त पर जाता है तब न्यायािय या मस्जथरेट उस सम्पवत्त या दथतावेज को, जो उसके समि सम्पवत्त के प्रथतुत की गई है, या उसकी अलभरिा में है या स्जसके बारे में कोई अपराध ककया गया व्ययन के लिए प्रतीत होता है या जो ककसी अपराध के करन े में प्रयुक्ट् त की गई है, नष् ट करके, अधधग्रहण आदेि । करके या ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को पररदान करके, जो उस पर कब्जा करन े का हकदार होने का दावा करता है, या ककसी अन्य प्रकार से उसका व्ययन करन े के लिए आदेि दे सकेगा, जैसा वह ठीक समझे ।366 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) ककसी सम्पवत्त के कब्जे का हकदार होन े का दावा करन े वािे ककसी व्यस्क्ट् त को उस संपवत्त के पररदान के लिए उपधारा (1) के अधीन आदेि ककसी ित ष के बबना या इस ित ष पर हदया जा सकेगा कक वह न्यायािय या मस्जथरेट को समाधानप्रद रूप में यह वचनबंध करत े हुए प्रनतभुओ ं सहहत या रहहत बंधपत्र ननष्पाहदत करे कक यहद उपधारा (1) के अधीन ककया गया आदेि, अपीि या पुनर िण में उपांतररत या अपाथत कर हदया गया तो वह उस सम्पवत्त को ऐसे न्यायािय को वापस कर देगा । (3) उपधारा (1) के अधीन थवयं आदेि देने के बजाय सेिन न्यायािय, सम्पवत्त को मुख्य न्यानयक मस्जथरेट को पररदत्त ककए जाने का ननदेि दे सकेगा, जो तब उस सम्पवत्त के ववर्य में धारा 503, धारा 504 और धारा 505 में उपबंधधत र नत से कारषवाई करेगा । (4) उस दिा के लसवाय, जब सम्पवत्त पिुधन है या िीघ्रतया और प्रकृत्या ियिीि है या जब उपधारा (2) के अनुसरण में बंधपत्र ननष्पाहदत ककया गया है, उपधारा (1) के अधीन हदया गया आदेि दो मास तक या जहां अपीि प्रथतुत की गई है वहां जब तक उस अपीि का ननपटारा न हो जाए, कायाषस्न्वत न ककया जाएगा । (5) उस सम्पवत्त की दिा में, स्जसके बारे में अपराध ककया गया प्रतीत होता है, इस धारा में “सम्पवत्त” पद के अन्तगतष न केवि ऐसी सम्पवत्त है जो मूित: ककसी पिकार के कब्जे या ननयंत्रण में रह चुकी है, वरन ् ऐसी कोई सम्पवत्त स्जसमें या स्जसके लिए उस सम्पवत्त का संपररवतनष या ववननमय ककया गया है और ऐसे संपररवतनष या ववननमय से, चाहे तत्काि या अन्यथा, अस्जतष कोई चीज भी है । अलभयुक्ट् त के 499. जब कोई व्यस्क्ट् त ककसी अपराध के लिए, स्जसके अन्तगतष चोर या चुराई हुई पास लमिे धन सम्पवत्त को प्राप् त करना है या जो चोर या चुराई हुई सम्पवत्त प्राप् त करने की कोहट में का ननदोर् िेता को संदाय । आता है, दोर्लसद्ध ककया जाता है और यह साबबत कर हदया जाता है ककसी अन्य व्यस्क्ट् त ने चुराई हुई सम्पवत्त को, यह जाने बबना या अपने पास यह ववश् वास करन े का कारण हुए बबना कक वह चुराई हुई है, उसस े िय ककया है और लसद्धदोर् व्यस्क्ट् त की धगरफ्तार पर उसके कब्जे में स े कोई धन ननकािा गया था, तब न्यायािय ऐसे िेता के आवेदन पर और चुराई हुई सम्पवत्त पर कब्जे के हकदार व्यस्क्ट् त को उस सम्पवत्त के वापस कर हदए जाने पर आदेि छह मास की अवधध के भीतर दे सकेगा कक ऐसे िेता द्वारा हदए गए मूलय से अनधधक रालि ऐसे धन में से उस े पररदत्त की जाए । धारा 498 या 500. (1) धारा 498 या धारा 499 के अधीन ककसी न्यायािय या मस्जथरेट द्वारा धारा 499 के हदए गए आदेि स े व्यधथत कोई व्यस्क्ट् त, उसके ववरुद्ध अपीि उस न्यायािय में कर अधीन आदेिों के ववरुद्ध सकेगा स्जसमें साधारणतया पर पूवकष धथत न्यायािय द्वारा की गई दोर्लसद्धध के ववरुद्ध अपीि । अपीिें होती हैं । (2) ऐसी अपीि पर, अपीि न्यायािय यह ननदेि दे सकेगा कक अपीि का ननपटारा होन े तक आदेि रोक हदया जाए या वह ऐसे आदेि को उपांतररत, पररवनततष या रद्द कर सकता है और कोई अनतररक्ट् त आदेि, जो न्यायसंगत हो, कर सकेगा । (3) ककसी ऐसे मामिे को, स्जसमें उपधारा (1) में ननहदषष्ट आदेि हदया गया है, ननपटात े समय अपीि, पुष् ट करण या पुनर िण न्यायािय भी उपधारा (2) में ननहदषष्ट िस्क्ट् तयों का प्रयोग कर सकेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 367 2023 का 45 501. (1) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 294, धारा 295, धारा 356 की अपमानिेिीय उपधारा (3) और उपधारा (4) के अधीन दोर्लसद्धध पर, न्यायािय उस चीज की सब और अन्य सामग्री का नष् ट प्रनतयों के, स्जसके बारे में दोर्लसद्धध हुई है और जो न्यायािय की अलभरिा में है, या ककया जाना । लसद्धदोर् व्यस्क्ट् त के कब्जे या िस्क्ट् त में है, नष् ट ककए जाने के लिए आदेि दे सकेगा । 2023 का 45 (2) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 274, धारा 275, धारा 276 या धारा 277 के अधीन दोर्लसद्धध पर न्यायािय, उस िाद्य, पेय, ओर्धध या भेर्जीय ननलमनष त के, स्जसके बारे में दोर्लसद्धध हुई है, नष् ट ककए जाने का उसी प्रकार से आदेि दे सकेगा । 502. (1) जब आपराधधक बि प्रयोग या बि-प्रदिनष या आपराधधक अलभत्रास से अचि सम्पवत्त का कब्जा युक्ट् त ककसी अपराध के लिए कोई व्यस्क्ट् त दोर्लसद्ध ककया जाता है और न्यायािय को िौटान े की यह प्रतीत होता है कक ऐसे बि प्रयोग या बि-प्रदिनष या अलभत्रास स े कोई व्यस्क्ट् त ककसी िस्क्ट् त । अचि संपवत्त से बेकब्जा ककया गया है तब, यहद न्यायािय ठीक समझे तो, आदेि दे सकेगा कक ककसी ऐसे व्यस्क्ट् त को, स्जसका उस सम्पवत्त पर कब्जा है, यहद आवश्यक हो तो, बि द्वारा बेदिि करन े के पश् चात,् उस व्यस्क्ट् त को उसका कब्जा िौटा हदया जाए : परन्तु न्यायािय द्वारा ऐसा कोई आदेि दोर्लसद्धध की तार ि स े एक मास के पश् चात ् नह ं हदया जाएगा । (2) जहां अपराध का ववचारण करन े वािे न्यायािय ने उपधारा (1) के अधीन कोई आदेि नह ं हदया है, वहां अपीि, पुष् ट करण या पुनर िण न्यायािय, यहद ठीक समझ े तो, यथास्थथनत, अपीि, ननदेि या पुनर िण को ननपटाते समय ऐसा आदेि दे सकेगा । (3) जहां उपधारा (1) के अधीन आदेि हदया गया है, वहां धारा 500 के उपबंध उसके संबंध में वैस े ह िागू होंगे जैसे व े धारा 499 के अधीन हदए गए ककसी आदेि के संबंध में िागू होत े हैं । (4) इस धारा के अधीन हदया गया कोई आदेि ऐसी अचि सम्पवत्त पर ककसी ऐस े अधधकार या उसमें ककसी ऐसे हहत पर प्रनतकूि प्रभाव न डािेगा स्जसे कोई व्यस्क्ट् त लसववि वाद में लसद्ध करन े में सफि हो जाता है । 503. (1) जब कभी ककसी पुलिस अधधकार द्वारा ककसी सम्पवत्त के अलभग्रहण की सम्पवत्त के ररपोटष इस संहहता के उपबंधों के अधीन मस्जथरेट को की जाती है और जांच या ववचारण अलभग्रहण पर पुलिस द्वारा के दौरान ऐसी सम्पवत्त दंड न्यायािय के समि प्रथतुत नह ं की जाती है, तो मस्जथरेट प्रकिया । ऐसी सम्पवत्त पर कब्जा करन े के हकदार व्यस्क्ट् त को ऐसी सम्पवत्त का व्ययन या पररदान ककए जाने के बारे में या यहद ऐसा व्यस्क्ट् त अलभननस्श् चत नह ं ककया जा सकेगा तो ऐसी सम्पवत्त की अलभरिा और प्रथतुत ककए जान े के बारे में ऐसा आदेि कर सकेगा जो वह ठीक समझ े । (2) यहद ऐसा हकदार व्यस्क्ट् त ज्ञात है, तो मस्जथरेट वह सम्पवत्त उस े उन ितों पर (यहद कोई हों), जो मस्जथरेट ठीक समझे, पररदत्त ककए जाने का आदेि दे सकेगा और यहद ऐसा व्यस्क्ट् त अज्ञात है तो मस्जथरेट उस सम्पवत्त को ननरुद्ध कर सकेगा और ऐसी दिा में एक उद्घ ोर्णा जार करेगा, स्जसमें उस सम्पवत्त की अंगभूत वथतुओं का ववननदेि हो, और स्जसमें ककसी व्यस्क्ट् त से, स्जसका उसके ऊपर दावा है, यह अपेिा की गई हो कक368 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— वह उसके समि उपस्थथत हो और ऐसी उद्घ ोर्णा की तार ि से छह मास के भीतर अपने दावे को लसद्ध करे । जहां छह मास 504. (1) यहद ऐसी अवधध के भीतर कोई व्यस्क्ट् त सम्पवत्त पर अपना दावा लसद्ध के भीतर कोई नह करे और वह व्यस्क्ट् त स्जसके कब्जे में ऐसी सम्पवत्त पाई गई थी, यह दलितष करन े में दावेदार उपस्थथत असमथ ष है कक वह उसके द्वारा वैध रूप से अस्जतष की गई थी, तो मस्जथरेट आदेि द्वारा न हो वहा ं प्रकिया । ननदेि दे सकेगा कक ऐसी सम्पवत्त राज्य सरकार के व्ययन के अधीन होगी तथा उस सरकार द्वारा वविय की जा सकेगी और ऐसे वविय के आगमों के संबंध में ऐसी र नत से कायवष ाह की जा सकेगी जो राज्य सरकार, ननयमों द्वारा, उपबंधधत करे । (2) ककसी ऐस े आदेि के ववरुद्ध अपीि उस न्यायािय में होगी स्जसमें साधारणतया मस्जथरेट द्वारा की गई दोर्लसद्धध के ववरुद्ध अपीिें होती हैं । ववनश् वर सम्पवत्त 505. यहद ऐसी सम्पवत्त पर कब्जे का हकदार व्यस्क्ट् त अज्ञात या अनुपस्थथत है और को बेचने की सम्पवत्त िीघ्रतया और प्रकृत्या ियिीि है, या यहद उस मस्जथरेट की, स्जसे उसके िस्क्ट् त। अलभग्रहण की ररपोटष की गई है, यह राय है कक उसका वविय थवामी के फायदे के लिए होगा या ऐसी सम्पवत्त का मूलय दस हजार रुपए से कम है तो मस्जथरेट ककसी समय भी उसके वविय का ननदेि दे सकेगा और ऐसे वविय के िुद्ध आगमों को धारा 503 और धारा 504 के उपबंध यथासाध्य ननकटतम रूप से िागू होंगे । अध्याय 37 अननयलमत कायिा ाहियां वे अननयलमतताएं, 506. यहद कोई मस्जथरेट, जो ननम् नलिखित बातों में से ककसी को करन े के लिए जो कायवष ाहहयों ववधध द्वारा सिक्ट् त नह ं है, गिती से सद्भ ावपूवकष उस बात को करता है तो उसकी को दवूर्त नह ं कायवष ाहहयों को केवि इस आधार पर कक वह ऐसे सिक्ट् त नह ं था अपाथत नह ं ककया करतीं । जाएगा, अथाषत ् :— (क) धारा 97 के अधीन तिािी-वारंट जार करना ; (ि) ककसी अपराध का अन्वेर्ण करने के लिए पुलिस को धारा 174 के अधीन आदेि देना ; (ग) धारा 196 के अधीन मत्ृ यु-समीिा करना ; (घ) अपनी थथानीय अधधकाररता के भीतर के उस व्यस्क्ट् त को, स्जसने ऐसी अधधकाररता की सीमाओं के बाहर अपराध ककया है, पकडने के लिए धारा 207 के अधीन आदेलिका जार करना ; (ङ) ककसी अपराध का धारा 210 की उपधारा (1) के िंड (क) या िंड (ि) के अधीन संज्ञान करना ; (च) ककसी मामिे को धारा 212 की उपधारा (2) के अधीन हवािे करना ; (छ) धारा 343 के अधीन िमादान करना ; (ज) धारा 450 के अधीन मामि े को वापस मंगाना और उसका थवयं ववचारण करना ; या (झ) धारा 504 या धारा 505 के अधीन सम्पवत्त का वविय ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 369 507. यहद कोई मस्जथरेट, जो ननम् नलिखित बातों में स े कोई बात ववधध द्वारा इस वे अननयलमतताए,ं ननलमत्त सिक्ट् त न होते हुए, करता है तो उसकी कायवष ाह िन्ू य होगी, अथाषत ् :— जो कायवष ाह को दवूर्त करती ह ैं । (क) सम्पवत्त को धारा 85 के अधीन कुकष करना और उसका वविय ; (ि) ककसी डाक प्राधधकार की अलभरिा में के ककसी दथतावेज, पासिष या अन्य चीज के लिए तिािी-वारंट जार करना ; (ग) पररिास्न्त कायम रिन े के लिए प्रनतभूनत की मांग करना ; (घ) सदाचार के लिए प्रनतभूनत की मांग करना ; (ङ) सदाचार बन े रहन े के लिए ववधधपूवकष आबद्ध व्यस्क्ट् त को उन्मोधचत करना ; (च) पररिास्न्त कायम रिन े के बंधपत्र को रद्द करना ; (छ) भरणपोर्ण के लिए आदेि देना ; (ज) थथानीय न्यूसेन्स के बारे में धारा 152 के अधीन आदेि देना ; (झ) िोक न्यूसेन्स की पुनराववृत्त या उस े चाि ू रिना धारा 162 के अधीन प्रनतर्ेध करना ; (ञ) अध्याय 11 के भाग ग या भाग घ के अधीन आदेि देना ; (ट) ककसी अपराध का धारा 210 की उपधारा (1) के िंड (ग) के अधीन संज्ञान करना ; (ठ) ककसी अपराधी का ववचारण करना ; (ड) ककसी अपराधी का संिेपत: ववचारण करना ; (ढ) ककसी अन्य मस्जथरेट द्वारा अलभलिखित कायवष ाह पर धारा 364 के अधीन दंडादेि पाररत करना ; (ण) अपीि का ववननश् चय करना ; (त) कायवष ाह को धारा 438 के अधीन मंगाना ; या (थ) धारा 491 के अधीन पाररत आदेि का पुनर िण करना । 508. ककसी दंड न्यायािय का कोई ननष्कर्,ष दंडादेि या आदेि केवि इस आधार गित थथान में पर कक वह जांच, ववचारण या अन्य कायवष ाह स्जसके अनुिम में उस ननष्कर् ष पर पहुंचा कायवष ाह । गया था या वह दंडादेि या आदेि पाररत ककया गया था, गित सेिन िंड, स्जिा, उपिंड या अन्य थथानीय िेत्र में हुई थी उस दिा में ह अपाथत ककया जाएगा जब यह प्रतीत होता है कक ऐसी गिती के कारण वथतुत: न्याय नह ं हो पाया है । 509. (1) यहद कोई न्यायािय, स्जसके समि अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त की संथवीकृनत या धारा 183 या अन्य कथन, जो धारा 183 या धारा 316 के अधीन अलभलिखित है या अलभलिखित होना धारा 316 के उपबंधों का तात्पनयषत है, साक्ष्य में हदया जाता है या लिया जाता है, इस ननष्कर् ष पर पहुंचता है कक अननुपािन । कथन अलभलिखित करन े वािे मस्जथरेट द्वारा इन धाराओं में से ककसी धारा के ककसी 2023 का 47 उपबंध का अनुपािन नह ं ककया गया है तो वह, भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 की धारा 94 में ककसी बात के होत े हुए भी, ऐसे अननुपािन के बारे में साक्ष्य िे सकेगा और यहद उसका यह समाधान हो जाता है कक ऐसे अननुपािन से अलभयुक्ट् त की, गुणागुण ववर्यक बातों पर अपनी प्रनतरिा करन े में कोई हानन नह ं हुई है और उसने अलभलिखित कथन सम्यक् रूप से ककया था, तो ऐसे कथन को ग्रहण कर सकेगा ।370 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) इस धारा के उपबंध अपीि, ननदेि और पुनर िण न्यायाियों को िागू होते हैं । आरोप ववरधचत 510. (1) ककसी सिम अधधकाररता वािे न्यायािय का कोई ननष्कर्,ष दंडादेि या न करने या आदेि केवि इस आधार पर कक कोई आरोप ववरधचत नह ं ककया गया या इस आधार पर उसके अभाव या कक आरोप में कोई गिती, िोप या अननयलमतता थी, स्जसके अन्तगषत आरोपों का उसमें गिती का कुसंयोजन भी है, उस दिा में ह अववधधमान्य समझा जाएगा जब अपीि, पुष् ट करण या प्रभाव । पुनर िण न्यायािय की राय में उसके कारण वथतुत: न्याय नह ं हो पाया है । (2) यहद अपीि, पुष् ट करण या पुनर िण न्यायािय की यह राय है कक वथतुत: न्याय नह ं हो पाया है तो वह— (क) आरोप ववरधचत न ककए जाने वाि दिा में यह आदेि कर सकेगा कक आरोप ववरधचत ककया जाए और आरोप की ववरचना के ठीक पश् चात ् से ववचारण पुन: प्रारंभ ककया जाए ; (ि) आरोप में ककसी गिती, िोप या अननयलमतता वाि दिा में यह ननदेि दे सकेगा कक ककसी ऐसी र नत से, स्जसे वह ठीक समझे, ववरधचत आरोप पर नया ववचारण ककया जाए : परन्तु यहद न्यायािय की यह राय है कक मामि े के तथ्य ऐसे हैं कक साबबत तथ्यों के संबंध में अलभयुक्ट् त के ववरुद्ध कोई ववधधमान्य आरोप नह ं िगाया जा सकता, तो वह दोर्लसद्धध को अलभिंडडत कर देगा । ननष्कर् ष या 511. (1) इसमें इसके पूव ष अन्तववष्ष ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, सिम दंडादेि कब अधधकाररता वािे न्यायािय द्वारा पाररत कोई ननष्कर्,ष दंडादेि या आदेि, ववचारण के गिती, िोप या पूव ष या उसके दौरान पररवाद, समन, वारंट, उद् घोर्णा, आदेि, ननणयष या अन्य कायवष ाह अननयलमतता के में हुई या इस संहहता के अधीन ककसी जांच या अन्य कायवष ाह में हुई ककसी गिती, िोप कारण उिटन े योग्य होगा । या अननयलमतता या अलभयोजन के लिए मंजूर में हुई ककसी गिती या अननयलमतता के कारण अपीि, पुष् ट करण या पुनर िण न्यायािय द्वारा तब तक न तो उिटा जाएगा और न पररवनततष ककया जाएगा जब तक न्यायािय की यह राय नह ं है कक उसके कारण वथतुत: न्याय नह ं हो पाया है । (2) यह अवधाररत करन े में कक क्ट्या इस संहहता के अधीन ककसी कायवष ाह में ककसी गिती, िोप या अननयलमतता या अलभयोजन के लिए मंजूर में हुई ककसी गिती या अननयलमतता के कारण न्याय नह ं हो पाया है, न्यायािय इस बात को ध्यान में रिेगा कक क्ट्या वह आपवत्त कायवष ाहहयों के ककसी पूवतष र प्रिम में उठाई जा सकती थी और उठाई जानी चाहहए थी । त्रुहट या गिती 512. इस संहहता के अधीन की गई कोई कुकी ऐसी ककसी त्रुहट के कारण या प्ररूप के कारण कुकी के अभाव के कारण ववधधववरुद्ध न समझी जाएगी जो समन, दोर्लसद्धध, कुकी की ररट का अवैध नह ं या तत्संबंधी अन्य कायवष ाहहयों में हुई है और न उस े करने वािा कोई व्यस्क्ट् त अनतचार होना । समझा जाएगा । अध्याय 38 कुछ अपरािों का संज्ञान करने के लिए पररसीमा पररभार्ा । 513. इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, जब तक संदभ ष में अन्यथा अपेक्षित न हो, “पररसीमा-काि” स े ककसी अपराध का संज्ञान करने के लिए धारा 514 में ववननहदषष् ट अवधध अलभप्रेत है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 371 514. (1) इस संहहता में जैसा अन्यथा उपबंधधत है उसके लसवाय, कोई न्यायािय पररसीमा-काि उपधारा (2) में ववननहदषष् ट प्रवग ष के ककसी अपराध का संज्ञान पररसीमा-काि की समास्प् त की समास्प् त के पश् चात ् सज्ञं ान के पश् चात ् नह ं करेगा । का वजनष । (2) पररसीमा-काि,— (क) छह मास होगा, यहद अपराध केवि जुमाषने से दंडनीय है ; (ि) एक वर् ष होगा, यहद अपराध एक वर् ष से अनधधक की अवधध के लिए कारावास से दंडनीय है ; (ग) तीन वर् ष होगा, यहद अपराध एक वर् ष से अधधक ककन्त ु तीन वर् ष से अनधधक की अवधध के लिए कारावास से दंडनीय है । (3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उन अपराधों के संबंध में, स्जनका एक साथ ववचारण ककया जा सकेगा, पररसीमा-काि का अवधारण, उस अपराध के प्रनतननदेि से ककया जाएगा जो, यथास्थथनत, कठोरतर या कठोरतम दंड से दंडनीय है । स्पष्टीकरण—पररसीमा की अवधध संगखणत करने के प्रयोजन के लिए, सुसंगत तार ि धारा 223 के अधीन पररवाद प्रथतुत करने की तार ि या धारा 173 के अधीन सूचना अलभलिखित करने की तार ि होगी । 515. (1) ककसी अपराधी के संबंध में पररसीमा-काि,— पररसीमा-काि का प्रारंभ । (क) अपराध की तार ि को प्रारंभ होगा ; या (ि) जहां अपराध के ककए जाने की जानकार अपराध द्वारा व्यधथत व्यस्क्ट् त को या ककसी पुलिस अधधकार को नह ं थी, वहां उस हदन प्रारंभ होगा स्जस हदन प्रथम बार ऐसे अपराध की जानकार ऐसे व्यस्क्ट् त या ऐसे पुलिस अधधकार को होती है, इनमें से जो भी पहिे हो ; या (ग) जहां यह ज्ञात नह ं है कक अपराध ककसने ककया है, वहां उस हदन प्रारंभ होगा स्जस हदन प्रथम बार अपराधी का पता अपराध द्वारा व्यधथत व्यस्क्ट् त को या अपराध का अन्वेर्ण करने वािे पुलिस अधधकार को चिता है, इनमें से जो भी पहिे हो । (2) उक्ट् त अवधध की संगणना करने में, उस हदन को छोड हदया जाएगा स्जस हदन ऐसी अवधध की संगणना की जानी है । 516. (1) पररसीमा-काि की संगणना करने में, उस समय का अपवजनष ककया कनतपय मामिों में समय का जाएगा, स्जसके दौरान कोई व्यस्क्ट् त चाहे प्रथम बार के न्यायािय में या अपीि या अपवजनष । पुनर िण न्यायािय में अपराधी के ववरुद्ध अन्य अलभयोजन सम्यक् तत्परता से चिा रहा है : परन्तु ऐसा अपवजनष तब तक नह ं ककया जाएगा जब तक अलभयोजन उन्ह ं तथ्यों से संबंधधत न हो और ऐस े न्यायािय में सद्भ ावपूवकष न ककया गया हो जो अधधकाररता में दोर् या इसी प्रकार के अन्य कारण से उस े ग्रहण करन े में असमथ ष हो । (2) जहां ककसी अपराध के संबंध में अलभयोजन का संस्थथत ककया जाना ककसी व्यादेि या आदेि द्वारा रोक हदया गया है, वहां पररसीमा-काि की संगणना करन े में व्यादेि या आदेि के बन े रहन े की अवधध को, उस हदन को, स्जसको वह जार ककया गया372 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— था या हदया गया था और उस हदन को, स्जस हदन उस े वापस लिया गया था, अपवस्जषत ककया जाएगा । (3) जहां ककसी अपराध के अलभयोजन के लिए सूचना द गई है, या जहां तत्समय प्रवत्तृ ककसी ववधध के अधीन सरकार या ककसी अन्य प्राधधकार की पूव ष अनुमनत या मंजूर ककसी अपराध के संबंध में अलभयोजन संस्थथत करने के लिए अपेक्षित है, वहां पररसीमा- काि की संगणना करन े में, ऐसी सूचना की अवधध, या, यथास्थथनत, ऐसी अनुमनत या मंजूर प्राप् त करन े के लिए आवश्यक समय अपवस्जतष ककया जाएगा । स्पष् टीकरण—सरकार या ककसी अन्य प्राधधकार की अनुमनत या मंजूर प्राप् त करन े के लिए आवश्यक समय की संगणना करन े में उस तार ि का स्जसको अनुमनत या मंजूर प्राप् त करन े के लिए आवेदन हदया गया था और उस तार ि का स्जसको सरकार या अन्य प्राधधकार का आदेि प्राप् त हुआ, दोनों का, अपवजनष ककया जाएगा । (4) पररसीमा-काि की संगणना करन े में, वह समय अपवस्जतष ककया जाएगा स्जसके दौरान अपराधी,— (क) भारत से या भारत से बाहर ककसी राज्यिेत्र से, जो केन्द्र य सरकार के प्रिासन के अधीन है, अनुपस्थथत रहा है; या (ि) फरार होकर या अपने को नछपाकर धगरफ्तार से बचता है । स्जस तार ि को 517. यहद पररसीमा-काि उस हदन समाप् त होता है जब न्यायािय बंद है तो न्यायािय बंद न्यायािय उस हदन संज्ञान कर सकेगा स्जस हदन न्यायािय पुन: िुिता है । हो उस तार ि का अपवजनष । स्पष् टीकरण—न्यायािय उस हदन इस धारा के अथ ष के अन्तगतष बंद समझा जाएगा, स्जस हदन अपने सामान्य काम के घंटों में वह बंद रहता है । चािू रहने वािा 518. ककसी चािू रहन े वािे अपराध की दिा में, नया पररसीमा-काि उस समय के अपराध । प्रत्येक िण से प्रारंभ होगा स्जसके दौरान अपराध चािू रहता है । कनतपय मामिों 519. इस अध्याय के पूववष ती उपबंधों में अंतववष्ष ट ककसी बात के होत े हुए भी, कोई में पररसीमा-काि भी न्यायािय ककसी अपराध का संज्ञान पररसीमा-काि के अवसान के पश् चात ् कर सकेगा का ववथतारण । यहद मामि े के तथ्यों या पररस्थथनतयों से उसका समाधान हो जाता है कक वविंब का उधचत रूप से थपष् ट करण कर हदया गया है या न्याय के हहत में ऐसा करना आवश्यक है । अध्याय 39 प्रकीण ा उच् च न्यायाियों 520. जब ककसी अपराध का ववचारण उच् च न्यायािय द्वारा धारा 447 के अधीन के समि न करके अन्यथा ककया जाता है, तब वह अपराध के ववचारण में वैसी ह प्रकिया का ववचारण । अनुपािन करेगा, स्जसका सिे न न्यायािय अनुपािन करता यहद उसके द्वारा उस मामि े का ववचारण ककया जाता । सेना न्यायािय 521. (1) केन्द्र य सरकार, इस संहहता से और वायुसेना अधधननयम, 1950, सेना 1950 का 45 द्वारा ववचारणीय अधधननयम, 1950 और नौसेना अधधननयम, 1957 और संघ के सिथ त्र बिों से संबंधधत 1950 का 46 व्यस्क्ट् तयों का 1957 का 62 तत्समय प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध से संगत ननयम ऐस े मामिों के लिए बना सकेगी स्जनमें कमान अधधकाररयों को सेना, नौसेना या वायुसेना संबंधी ववधध या अन्य ऐसी ववधध के अधीन होने वािे व्यस्क्ट् तयों सौंपा जाना । का ववचारण ऐसे न्यायािय द्वारा, स्जसको यह संहहता िागू होती है, या सेना न्यायाियअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 373 द्वारा ककया जाएगा ; तथा जब कोई व्यस्क्ट् त ककसी मस्जथरेट के समि िाया जाता है और ऐसे अपराध के लिए आरोवपत ककया जाता है, स्जसके लिए उसका ववचारण या तो उस न्यायािय द्वारा स्जसको यह संहहता िागू होती है, या सेना न्यायािय द्वारा ककया जा सकता है, तब ऐसा मस्जथरेट ऐसे ननयमों को ध्यान में रिेगा और उधचत मामिों में उस े उस अपराध के कथन सहहत, स्जसका उस पर अलभयोग है, उस यूननट के स्जसका वह हो, कमान आकफसर को या, यथास्थथनत, ननकटतम सेना, नौसेना या वायसु ेना थटेिन के कमान आकफसर को सेना न्यायािय द्वारा उसका ववचारण ककए जाने के प्रयोजन से सौंप देगा । स्पष् टीकरण—इस धारा में,— (क) “यूननट” के अन्तगतष रेस्जमेंट, कोर, पोत, टुकडी, ग्रुप, बटालियन या कम्पनी भी है ; (ि) “सेना न्यायािय” के अन्तगतष ऐसा कोई अधधकरण भी है स्जसकी वैसी ह िस्क्ट् तयां हैं जैसी संघ के सिथ त्र बिों को िागू सुसंगत ववधध के अधीन गहठत ककसी सेना न्यायािय की होती हैं । (2) प्रत्येक मस्जथरेट ऐसे अपराध के लिए अलभयुक्ट् त व्यस्क्ट् त को पकडने और सुरक्षित रिन े के लिए अपनी ओर से अधधकतम प्रयास करेगा, जब उस े ककसी ऐस े थथान में तैनात या ननयोस्जत सैननकों, नाववकों या वायुसैननकों के ककसी यूननट या ननकाय के कमान आकफसर से उस प्रयोजन के लिए लिखित आवेदन प्राप् त होता है । (3) उच् च न्यायािय, यहद ठीक समझे तो, यह ननदेि दे सकेगा कक राज्य के भीतर स्थथत ककसी जेि में ननरुद्ध ककसी बंद को सेना न्यायािय के समि िंबबत ककसी मामि े के बारे में ववचारण के लिए या पर िा ककए जाने के लिए सेना न्यायािय के समि िाया जाए । 522. संववधान के अनुच्छेद 227 द्वारा प्रदत्त िस्क्ट् तयों के अधीन रहत े हुए, द्ववतीय प्ररूप । अनुसूची में हदए गए प्ररूप ऐसे पररवतनष ों सहहत, जैसे प्रत्येक मामि े की पररस्थथनतयों से अपेक्षित हों, उसमें वखणतष संबद्ध प्रयोजनों के लिए उपयोग में िाए जा सकेंगे और यहद उपयोग में िाए जाते हैं तो पयाषप् त होंगे । 523. (1) प्रत्येक उच् च न्यायािय, राज्य सरकार की पूव ष मजं ूर से, ननम् नलिखित के उच् च न्यायािय बारे में ननयम बना सकेगा :— की ननयम बनान े की (क) वे व्यस्क्ट् त जो उसके अधीनथथ दंड न्यायाियों में अजी िेिकों के रूप में िस्क्ट् त । काम करन े के लिए अनुज्ञात ककए जा सकेंगे ; (ि) ऐसे व्यस्क्ट् तयों को अनुज्ञस्प् त हदए जाने, उनके द्वारा काम काज करन े और उनके द्वारा ि जाने वाि फीसों के मापमान का ववननयमन ; (ग) इस प्रकार बनाए गए ननयमों में स े ककसी के उलिघं न के लिए िास्थत उपबंधधत करना और वह प्राधधकार , स्जसके द्वारा ऐसे उलिंघन का अन्वेर्ण ककया जा सकेगा और िास्थतयां अधधरोवपत की जा सकेंगी, अवधाररत करना ; (घ) कोई अन्य ववर्य स्जसका राज्य सरकार द्वारा बनाए गए ननयमों द्वारा उपबंधधत ककया जाना अपेक्षित है या ककया जाए ।374 भारत क ा राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी ननयम राजपत्र में प्रकालित ककए जाएंगे । कनतपय मामिों 524. यहद ककसी राज्य का ववधान-मंडि संकलप द्वारा ऐसी अनुज्ञा देता है, तो में कायपष ािक राज्य सरकार, उच् च न्यायािय से परामि ष करन े के पश् चात,् अधधसूचना द्वारा यह ननदेि मस्जथरेटों को दे सकेगी कक धारा 127, धारा 128, धारा 129, धारा 164 और धारा 166 में ककसी सौंप े गए कृत्यों को पररवनततष कायपष ािक मस्जथरेट के प्रनत ननदेि का अथ ष यह िगाया जाएगा कक वह ककसी प्रथम वग ष करन े की न्यानयक मस्जथरेट के प्रनत ननदेि है । िस्क्ट्त । वे मामि े स्जनमें 525. कोई न्यायाधीि या मस्जथरेट ककसी ऐस े मामि े का, स्जसमें वह पिकार है, न्यायाधीि या या वैयस्क्ट् तक रूप से हहतबद्ध है, उस न्यायािय की अनुज्ञा के बबना, स्जसमें उसके मस्जथरेट न्यायािय से अपीि होती है, न तो ववचारण करेगा और न उस े ववचारण के लिए सुपुदष वैयस्क्ट् तक रूप स े हहतबद्ध है । करेगा और न कोई न्यायाधीि या मस्जथरेट अपने द्वारा पाररत या ककए गए ककसी ननणषय या आदेि की अपीि ह सुनेगा । स्पष् टीकरण—कोई न्यायाधीि या मस्जथरेट ककसी मामि े में केवि इस कारण से कक वह उसस े सावजष ननक हैलसयत में संबद्ध है, या केवि इस कारण से कक उसने उस थथान का, स्जसमें अपराध का होना अलभकधथत है, या ककसी अन्य थथान का, स्जसमें मामि े के लिए महत्वपूण ष ककसी अन्य संव्यवहार का होना अलभकधथत है, अविोकन ककया है और उस मामिे के संबंध में जांच की है, पिकार या वैयस्क्ट् तक रूप से हहतबद्ध न समझा जाएगा । ववधध-व्यवसाय 526. कोई अधधवक्ट्ता, जो ककसी मस्जथरेट के न्यायािय में ववधध-व्यवसाय करता करन े वाि े है, उस न्यायािय में या उस न्यायािय की थथानीय अधधकाररता के भीतर ककसी अधधवक्ट्ता का न्यायािय में मस्जथरेट के तौर पर नह ं बैठेगा । कुछ न्यायाियों में मस्जथरेट के तौर पर न बैठना । वविय से संबद्ध 527. कोई िोक सेवक, स्जसे इस संहहता के अधीन ककसी संपवत्त के वविय के बारे िोक सेवक का में ककसी कतव्ष य का पािन करना है, उस संपवत्त का न तो िय करेगा या न उसके लिए सम्पवत्त का िय बोि िगाएगा । नह ं करना या उसके लिए बोि न िगाना । उच् च न्यायािय 528. इस संहहता की कोई बात उच् च न्यायािय की ऐसे आदेि देने की अन्तननहषहत की अन्तननहषहत िस्क्ट् तयों को सीलमत या प्रभाववत करन े वाि नह ं समझी जाएगी, जो इस संहहता के िस्क्ट् तयों की अधीन ककसी आदेि को प्रभावी करन े के लिए या ककसी न्यायािय की कायवष ाह का व्याववृत्त । दरुु पयोग ननवाररत करन े के लिए या ककसी अन्य प्रकार स े न्याय के उद्देश्यों की प्रास्प् त सुननस्श् चत करन े के लिए आवश्यक हो । न्यायाियों पर 529. प्रत्येक उच् च न्यायािय अपने अधीनथथ सेिन न्यायाियों और न्यानयक अधीिण का मस्जथरेटों के न्यायाियों पर अपने अधीिण का प्रयोग इस प्रकार करेगा स्जससे यह ननरंतर प्रयोग सुननस्श् चत हो जाए कक ऐसे न्यायाधीिों और मस्जथरेटों द्वारा मामिों का ननपटारा िीघ्र करन े का उच् च न्यायािय का और उधचत रूप से ककया जाए । कतव्ष य । इिैक्ट्राननकअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 375 530. इस संहहता के अधीन सभी ववचारण और कायवष ाहहयां, स्जसके अंतगतष — पद्धनत में ववचारण और (i) समन और वारंट को जार करना, तामीि करना और ननष्पादन करना ; कायवष ाहहयों का (ii) लिकायतकताष और साक्षियों की पर िा ; ककया जाना । (iii) जांचों और ववचारणों में साक्ष्य अलभलिखित करना ; और (iv) सभी अपीि य कायवष ाहहयां या कोई अन्य कायवष ाह , इिैक्ट्राननक संसूचना के उपयोग या श्रव्य-दृश्य इिैक्ट्राननक साधनों के उपयोग द्वारा इिैक्ट्राननक पद्धनत में की जा सकेंगी । 1974 का 2 531. (1) दंड प्रकिया संहहता, 1973 इसके द्वारा ननरलसत की जाती है । ननरसन और व्याववृत्तयां । (2) ऐसे ननरसन के होत े हुए भी,— (क) यहद उस तार ि स े स्जसको यह संहहता प्रवत्तृ होती है, ठीक पूव ष कोई अपीि, आवेदन, ववचारण, जांच या अन्वेर्ण िंबबत हो तो ऐसी अपीि, आवेदन, ववचारण, जांच या अन्वेर्ण को ऐस े प्रारंभ के ठीक पवू ष यथा प्रवत्तृ दंड प्रकिया 1974 का 2 संहहता, 1973 के (स्जसे इसमें इसके पश् चात ् उक्ट्त संहहता कहा गया है) उपबंधों के अनुसार, यथास्थथनत, ऐसे ननपटाया जाएगा, चािू रिा जाएगा या ककया जाएगा मानो यह संहहता प्रवत्तृ न हुई हो ; (ि) उक्ट्त संहहता के अधीन प्रकालित सभी अधधसूचनाएं, जार की गई सभी उद्घ ोर्णाएं, प्रदत्त सभी िस्क्ट्त यां, ननयमों द्वारा उपबंधधत प्ररूप, पररननस्श् चत सभी थथानीय अधधकाररताएं, हदए गए सभी दंडादेि, ककए गए सभी आदेि, ननयम और ऐसी ननयुस्क्ट् तयां, जो वविेर् मस्जथरेटों के रूप में ननयुस्क्ट् तयां नह ं हैं और जो इस संहहता के प्रारंभ के तुरंत पूव ष प्रवतनष में हैं, िमिः इस संहहता के तत्थथानी उपबंधों के अधीन प्रकालित अधधसूचनाए,ं जार की गई उद्घ ोर्णाएं, प्रदत्त िस्क्ट् तयां, ववहहत प्ररूप, पररननस्श् चत थथानीय अधधकाररताएं, हदए गए दंडादेि और ककए गए आदेि, ननयम और ननयुस्क्ट् तयां समझी जाएंगी ; (ग) उक्ट्त संहहता के अधीन द गई ककसी ऐसी मंजूर या सम्मनत के बारे में, स्जसके अनुसरण में उस संहहता के अधीन कोई कायवष ाह प्रारंभ नह ं की गई है, यह समझा जाएगा कक वह इस संहहता के तत्थथानी उपबंधों के अधीन द गई है और ऐसी मंजूर या सम्मनत के अनुसरण में इस संहहता के अधीन कायवष ाहहयां की जा सकेंगी । (3) जहां उक्ट्त संहहता के अधीन ककसी आवेदन या अन्य कायवष ाह के लिए ववननहदषष्ट अवधध इस संहहता के प्रारंभ पर या उसके पूवष समाप् त हो गई हो, वहां इस संहहता की ककसी बात का यह अथ ष नह ं िगाया जाएगा कक वह इस संहहता के अधीन ऐस े आवेदन के ककए जाने या कायवष ाह के प्रारंभ ककए जाने के लिए केवि इस कारण समथ ष करती है कक उसके लिए इस संहहता द्वारा द घतष र अवधध ववननहदषष्ट की गई है या इस संहहता में समय ब़िाने के लिए उपबंध ककया गया है ।37 6 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— प्रथम अनुसूची अपराधों का वर्गीकरण स्पष्‍टीकारक टटप्पण : (1) भारतीय न्याय संहिता के अधीन अपराधों के बारे में, उस धारा के सामने की, जजसका संखयांक प्रथम स्तम्भ में हिया िुआ िै, द्वितीय और ततृ ीय स्तम्भों की प्रविज‍ ियां भारतीय न्याय संहिता की अपराध की पररभाषा के और उसके लिए विहित िंड के रूप में आशययत नि ं िैं, िरन ् उस धारा का सारांश बताने के लिए ि आशययत िैं । (2) इस अनुसूची में (i) “प्रथम िग ग मजजस्रेि” और “कोई मजजस्रेि” पि के अंतगतग कायपग ािक मजजस्रेि नि ं आता िै ; (ii) “संज्ञेय” शब्ि “कोई पुलिस अधधकार िारंि के बबना धगरफ्तार कर सकेगा” के लिए िै ; और (iii) “असंज्ञेय” शब्ि “कोई पुलिस अधधकार िारंि के बबना धगरफ्तार नि ं करेगा” के लिए िै । I—भारतीय‍न्याय‍संटिता के अधीन अपराध धारा अपराध दंड संज्ञेय या असंज्ञेय जमानतीय या ककस न्यायालय अजमानतीय द्वारा ववचारणीय िै (1) (2) (3) (4) (5) (6) 49 ककसी अपराध का ि‍ु प्रेरण, यहि िि , जो ि‍ु प्ररेरत इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय ि‍ु प्ररेरत काय ग उसके पररणामस्िरूप अपराध के लिए िै । ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके ककया जाता िै और जिां उसके िंड के संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत लिए कोई अलभव्यक् त उपबंध नि ं िै । असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 50 ककसी अपराध का ि‍ु प्रेरण, यहि िि , जो ि‍ु प्ररेरत इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय ि‍ु प्ररेरत व्यजक्त ि‍ु प्रेरक के आशय स े अपराध के लिए िै । ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके लभन् न आशय स े काय ग करता िै । संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 51 ककसी अपराध का ि‍ु प्रेरण, जब एक िि , जो ि‍ु प्रेररत ककए इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय काय ग का ि‍ु प्रेरण ककया गया िै और जान े के लिए आशययत ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके उससे लभन् न काय ग ककया गया िै, परंतुक अपराध के लिए िै । संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत के अधीन रित े िुए । असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 52 ि‍ु प्ररे क कब ि‍ु प्ररेरत काय ग के लिए और िि , जो ि‍ु प्ररेरत इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय ककए गए काय ग के लिए आकलित िण्ड अपराध के लिए िै । ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके के लिए िायी िै । संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 53 ककसी अपराध का ि‍ु प्रेरण, जब ि‍ु प्रेररत िि जो ककए गए इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय काय ग से ऐसा प्रभाि पैिा िोता िै, जो अपराध के लिए िै । ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके ि‍ु प्ररे क द्िारा आशययत स े लभन् न िै । संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 54 ककसी अपराध का ि‍ु प्रेरण, ि‍ु प्रेरक िि जो ककए गए इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय अपराध ककए जाते समय उपजस्थत िै । अपराध के लिए िै । ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 377 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 55 मत्ृ यु या आजीिन कारािास से िंडनीय 7 िष ग के लिए इसके अनुसार अजमानतीय । उस न्यायािय अपराध का ि‍ु प्रेरण, यहि ि‍ु प्रेरण के कारािास और कक ि‍ु प्ररेरत द्िारा, जजसके पररणामस्िरूप अपराध काररत नि ं जुमागना । अपराध संज्ञेय िै द्िारा ि‍ु प्रेररत ककया जाता िै । या असज्ञं ेय । अपराध विचारणीय िै । यहि अपिायन करने िािा काय ग ि‍ु प्ररे ण 14 िष ग के लिए इसके अनुसार अजमानतीय । उस न्यायािय के पररणास्िरूप ककया जाता िै । कारािास और कक ि‍ु प्ररेरत द्िारा, जजसके जुमागना । अपराध संज्ञेय िै द्िारा ि‍ु प्रेररत या असज्ञं ेय । अपराध विचारणीय िै । 56 कारािास से िंडनीय अपराध का उस ि र्तग म अिधध के इसके अनुसार इसके अनुसार कक उस न्यायािय ि‍ु प्ररे ण, यहि ि‍ु प्रेरण के पररणामस्िरूप एक चौथाई भाग तक कक ि‍ु प्ररेरत ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके अपराध काररत नि ं ककया जाता िै । का कारािास, जो अपराध संज्ञेय िै जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत अपराध के लिए या असज्ञं ेय । अजमानतीय । अपराध उपबंधधत िै, या विचारणीय िै । जुमागना, या िोनों । यहि ि‍ु प्रेरक या ि‍ु प्रेररत व्यजक् त ऐसा उस ि र्तग म अिधध के इसके अनुसार इसके अनुसार कक उस न्यायािय िोक सेिक िै, जजसका कतव्ग य अपराध आध े भाग तक का कक ि‍ु प्ररेरत ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके यनिाररत करना िै । कारािास, जो उस अपराध संज्ञेय िै जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत अपराध के लिए या असज्ञं ेय । अजमानतीय । अपराध उपबंधधत िै, या विचारणीय िै । जुमागना, या िोनों । 57 िोक साधारण द्िारा या िस से अधधक कारािास, जो 7 िष ग इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय व्यजक् तयों द्िारा अपराध ककए जाने का तक का िो सकेगा और ि‍ु प्ररेरत अपराध ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके ि‍ु प्ररे ण । जुमागना । संज्ञेय िै या जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 58(क) मत्ृ यु या आजीिन कारािास से िंडनीय 7 िष ग के लिए इसके अनुसार कक अजमानतीय । उस न्यायािय अपराध करन े की पररकल्पना को कारािास और जुमागना । ि‍ु प्ररेरत अपराध द्िारा, जजसके यिपाना, यहि अपराध कर हिया जाता संज्ञेय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत िै । असंज्ञेय । अपराध विचारणीय िै । 58(ख) यहि अपराध नि ं ककया जाता िै । 3 िष ग के लिए इसके अनुसार कक जमानतीय । उस न्यायािय कारािास और जुमागना । ि‍ु प्ररेरत अपराध द्िारा, जजसके संज्ञेय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत असंज्ञेय । अपराध विचारणीय िै । 59(क) ककसी ऐसे अपराध के ककए जाने की उस ि र्तग म अिधध के इसके अनुसार इसके अनुसार उस न्यायािय पररकल्पना का िोक सेिक द्िारा आध े भाग तक का कक ि‍ु प्ररेरत कक ि‍ु प्ररेरत द्िारा, जजसके यिपाया जाना, जजसका यनिारण करना कारािास, जो उस अपराध संज्ञेय िै अपराध द्िारा ि‍ु प्रेररत उसका कतव्ग य िै, यहि अपराध कर हिया अपराध के लिए या असंज्ञेय । जमानतीय िै या अपराध जाता िै । उपबंधधत िै, या जुमागना, अजमानतीय । विचारणीय िै । या िोनों । 59(ख) यहि अपराध मत्ृ यु या आजीिन कारािास 10 िष ग के लिए इसके अनुसार अजमानतीय । उस न्यायािय से िंडनीय िै । कारािास । कक ि‍ु प्ररेरत द्िारा, जजसके अपराध संज्ञेय िै द्िारा ि‍ु प्रेररत या असंज्ञेय । अपराध विचारणीय िै ।37 8 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 59(ग) यहि अपराध नि ं ककया जाता िै । उस ि र्तग म अिधध के इसके अनुसार जमानतीय । उस न्यायािय एक चौथाई भाग तक कक ि‍ु प्ररेरत द्िारा, जजसके का कारािास, जो उस अपराध संज्ञेय िै द्िारा ि‍ु प्रेररत अपराध के लिए या असंज्ञेय । अपराध उपबंधधत िै, या जुमागना, विचारणीय िै । या िोनों । 60(क) कारािास से िंडनीय अपराध करन े की उस ि र्तग म अिधध के इसके अनुसार इसके अनुसार कक उस न्यायािय पररकल्पना को यिपाना, यहि अपराध कर एक चौथाई भाग तक कक ि‍ु प्ररेरत ि‍ु प्रेररत अपराध द्िारा, जजसके हिया जाता िै । का कारािास या जुमागना अपराध संज्ञेय िै जमानतीय िै या द्िारा ि‍ु प्रेररत या िोनों, जो उस या असंज्ञेय । अजमानतीय । अपराध अपराध के लिए विचारणीय िै । उपबंधधत िै । 60(ख) यहि अपराध नि ं ककया जाता िै । उस ि र्तग म अिधध के इसके अनुसार जमानतीय । उस न्यायािय आठिें भाग तक का कक ि‍ु प्ररेरत द्िारा, जजसके कारािास, जो अपराध के अपराध संज्ञेय िै द्िारा ि‍ु प्रेररत लिए उपबंधधत िै, या या असंज्ञेय । अपराध जुमागना, या िोनों । विचारणीय िै । 61(2)(क) मत्ृ यु, आजीिन कारािास या 2 िष ग या िि , जो उस अपराध इसके अनुसार कक इसके अनुसार कक उस न्यायािय उससे अधधक अिधध के कठोर कारािास के, जो षड यंत्र द्िारा अपराध, जो षड यंत्र िि अपराध, जो द्िारा, जजसके से िंडनीय अपराध करन े के लिए उद्हि‍ ि िै, ि‍ु प्रेरण के द्िारा उद्हि‍ ि िै, षड यंत्र द्िारा द्िारा उस अपराध आपराधधक षड यंत्र । लिए िै । संज्ञेय िै या उद्हि‍ ि िै, का ि‍ु प्रेरण, जो असंज्ञेय । जमानतीय िै या षड यंत्र द्िारा अजमानतीय । उद्हि‍ ि िै, विचारणीय िै । 61(2)(ख) कोई अन्य आपराधधक षड यंत्र । 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 62 आजीिन कारािास, या कारािास स े आजीिन कारािास के इसके अनुसार इसके अनुसार कक िि न्यायािय िण्डनीय अपराध को काररत करन े का आध,े या उस अपराध कक अपराध, िि अपराध जजसके द्िारा प्रयत् न करना और ऐसे प्रयत् न में के लिए उपबजन्धत, संज्ञेय िै या जजसका अपराधी प्रयत्न ककया गया अपराध काररत करने की िशा में कोई ि र्तग म अिधध के आध े असंज्ञेय । द्िारा प्रयत्न अपराध काय ग करनाा । से अनधधक का ककया गया विचारणीय िै । कारािास, या जुमागना, जमानतीय िै या या िोनों । अजमानतीय । 64 (1) बिात्संग । कम से कम 10 िष ग संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन के लिए कठोर कारािास, न्यायािय । ककंतु जो आजीिन कारािास तक का िो सकेगा और जुमागना । 64(2) ककसी पुलिस अधधकार या ककसी िोक कम से कम 10 िष ग संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन सेिक या सशस् त्र बिों के सिस् य या के लिए कठोर कारािास, न्यायािय । ककसी जेि, प्रयतप्रेषण-गिृ या अलभरक्षा ककंतु जो आजीिन के अन् य स् थान या जस् त्रयों या बािकों की ककसी संस् था के प्रबंधतंत्र या कारािास तक का िो कमचग ाररिंिृ में के ककसी व् यजक्त या सकेगा, जजसका अथ ग ककसी अस् पताि के प्रबंधतंत्र या उस व्यक्ति के शेष कमचग ाररिंिृ में के ककसी व् यजक् त द्िारा प्राकृि जीवनकाल से बिात् संग और उस व् यजक्त के प्रयत, होगा और जमु ागना । जजससे बिात् संग ककया गया िै, न् यास या प्राधधकार की जस् थयत में के ककसी व् यजक् त द्िारा या उस व् यजक्त के, जजससे बिात् संग ककया गया िै, ककसी यनकि नातेिार द्िारा ककया गया बिात् संग ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 379 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 65 (1) सोिि िष ग स े कम आय ु की स्त्री के ऐसी अिधध का कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन साथ बिात्संग का अपराध काररत करने कारािास, जो 20 िष ग न्यायािय । िािे व्यजक्त । से कम की नि ं िोगी, ककंतु जो आजीिन कारािास तक की िो सकेगी, जो उस व्यजक्त के शेष प्राकृत जीिनकाि के लिए कारािास अलभप्रते िोगा और जुमागना । 65 (2) बारि िष ग स े कम आयु की स्त्री के साथ कम स े कम 20 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन बिात्संग का अपराध काररत करने िािे लिए कठोर कारािास, न्यायािय । व्यजक्त । ककंतु जो आजीिन कारािास तक का िो सकेगा, जो उस व् यजक्त के शेष प्राकृत जीिन काि के लिए कारािास अलभप्रेत िोगा, और जुमागने से या मत्ृ युिंड । 66 बिात् संग का अपराध करने और ऐसी कम स े कम 20 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन क्षयत पिुंचाने िािा व् यजक् त, जजसस े लिए कठोर कारािास, न्यायािय । महििा की मत्ृ य ु काररत िो जाती िै या ककंतु जो आजीिन उसकी िगातार विकृतशीि िशा िो कारािास तक का िो जाती िै । सकेगा, जजसस े उस व् यजक् त के शेष प्राकृत जीिन काि के लिए कारािास अलभप्रेत िोगा, या मत्ृ युिंड । 67 पयत द्िारा अपनी पत् नी के साथ कम से कम 2 िष ग के संज्ञेय जमानतीय । सेशन पथृ क् ककरण के िौरान मैथुन । लिए कारािास, ककंत ु (केिि पीड़िता के न् यायािय । जो 7 िष ग तक का िो पररिाि पर) । सकेगा और जमु ागना । 68 प्राधधकार, आहि में ककसी व् यजक्त द्िारा कम से कम 5 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन मैथुन । लिए कठोर कारािास से, न् यायािय । ककन्तु जो 10 िष ग तक का िो सकेगा, और जुमागना । 69 प्रिंचनापूण ग उपायों, आहि का उपयोग कारािास, जो 10 िष ग संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन करके मैथुन करना । तक का िो सकेगा, और न् यायािय । जुमागना । 70(1) सामूहिक बिात् संग । कम स े कम 20 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कठोर कारािास, न् यायािय । ककंतु जो आजीिन कारािास तक का िो सकेगा, जजसस े उस व् यजक् त के शेष प्राकृत जीिन काि के लिए कारािास अलभप्रेत िोगा, और जुमागना ।38 0 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 70(2) अठारि िष ग स े कम आयु की स्त्री के आजीिन कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन साथ सामूहिक बिात्संग । जजससे उस व् यजक्त के न् यायािय । शेष प्राकृत जीिनकाि के लिए कारािास अलभप्रेत िोगा और जुमागने से या मत्ृ युिंड । 71 पुनरािवृिकताग अपराधी । आजीिन कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन जजससे उस व् यजक् त के न् यायािय । शेष प्राकृत जीिनकाि के लिए कारािास अलभप्रेत िोगा या मत्ृ युिंड । 72(1) कयतपय अपराधों, आहि से पीड़ित व्यजक् त 2 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । की पिचान का प्रकि करण । और जुमागना । 73 न्यायािय की पूि ग अनुमयत के बबना ककसी 2 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कायिग ाि का मुद्रण या प्रकाशन । और जुमागना । 74 महििा की िज् जा भंग करन े के आशय 1 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । से उस पर िमिा या आपराधधक बि का कारािास, जो 5 िष ग प्रयोग । तक का िो सकेगा और जुमागना । 75(2) उपधारा (1) के खंड (i) या खंड (ii) या 3 िष ग तक का कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन खंड (iii) में वियनहिग‍ ि िधैंगक उत् पी़िन कारािास या जुमागना या न् यायािय । और िधैंगक उत् पी़िन के लिए िंड । िोनों । 75(3) उपधारा (1) के खंड (iv) में वियनहिग‍ ि 1 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िधैंगक उत् पी़िन और िधैंगक उत् पी़िन के या जुमागना या िोनों । न् यायािय । लिए िंड । 76 वििस् त्र करने के आशय से महििा पर कम स े कम 3 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िमिा या आपराधधक बि का प्रयोग । लिए कारािास, ककंत ु न् यायािय । जो 7 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना । 77 दृश् यरयतकता । कम स े कम 1 िष ग के संज्ञेय । जमानतीय । सेशन लिए कारािास, ककंत ु न् यायािय । जो 3 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना । द्वितीय या पश् चात ि् ती िोषलसद्धध । कम स े कम 3 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कारािास, ककंत ु न् यायािय । जो 7 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना । 78(2) पीिा करना । 3 िष ग तक का संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । कारािास और जुमागना । द्वितीय या पश् चात ि् ती िोषलसद्धध । 5 िष ग तक का कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस् रेि । और जुमागना । 79 महििा की िज् जा का अनािर करन े के 3 िष ग का सािा संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । आशय से कोई शब्ि किना या कोई कारािास और अंग-विक्षेप करना, आहि । जुमागना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 381 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 80(2) ििेज मत्ृ यु । कम स े कम 7 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कारािास, ककंत ु न्यायािय । जो आजीिन कारािास तक का िो सकेगा । 81 पुरुष द्िारा महििा को, जो उसस े 10 िष ग के लिए असंज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग विधधपूिकग वििाहित नि ं िै, प्रिंचना स े कारािास और मजजस्रेि । विश् िास काररत करके कक िि उसस े जुमागना । विधधपूिकग वििाहित िै, उस विश् िास में उससे सििास करना । 82(1) पयत या पत् नी के जीिनकाि में पनु ः 7 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग वििाि करना । और जमु ागना । मजजस्रेि । 82(2) उस व्यजक्त से, जजसके साथ पश् चाति ् ती 10 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग वििाि ककया जाता िै, पूििग ती वििाि कारािास और मजजस्रेि । को यिपाकर िि अपराध । जुमागना । 83 ककसी व्यजक् त द्िारा यि जानते िुए कक 7 िष ग तक का असंज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग िि तद्द् िारा विधधपूिकग वििाहित नि ं क ार ा ि ास और मजजस्रेि । िुआ िै, कपिपणू ग आशय से वििाि का जुमागना । कम ग करना । 84 वििाहित महििा को आपराधधक आशय 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई से फुसिाकर ि े जाना या यनरुद्ध कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । रखना । या िोनों । 85 ककसी वििाहित महििा के प्रयत क्रूरता 3 िष ग के लिए संज्ञेय, यहि अजमानतीय । प्रथम िग ग करन े के लिए िंड । कारािास और पुलिस थान े के मजजस्रेि । जुमागना । भारसाधक अधधकार को अपराध ककए जाने से संबधंधत सूचना, अपराध से व्यधथत व्यजक् त द्िारा या रक् त, वििाि या ििक ग्रिण द्िारा उससे संबंधधत ककसी व्यजक् त द्िारा या यहि कोई ऐसा नातेिार नि ं िै तो ऐसे िग ग या प्रिग ग के ककसी िोक सेिक द्िारा, जो इस यनलमि राज्य सरकार द्िारा अधधसूधचत ककया जाए, ि गई िै । 87 ककसी महििा को वििाि, आहि करन े के 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए वििश करन े के लिए उसे व्यपहृत कारािास और जुमागना । न्यायािय । करना, अपहृत करना या उत् प्ररेरत करना ।38 2 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 88 गभपग ात काररत करना । 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास या जुमागना या मजजस्रेि । िोनों । यहि महििा स् पन् िनगभाग िो । 7 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग और जुमागना । मजजस्रेि । 89 महििा की सम्मयत के बबना गभपग ात आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन काररत करना । 10 िष ग के लिए न्यायािय । कारािास और जुमागना । 90(1) गभपग ात काररत करने के आशय स े ककए 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन गए काय ग द्िारा काररत मत्ृ यु । कारािास और न्यायािय । जुमागना । 90(2) यहि िि काय ग महििा की सम्मयत के आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन बबना ककया जाता िै । यथा उपरोक्त । न्यायािय । 91 बािक का जीवित पैिा िोना रोकन े या 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन जन्म के पश् चात ् उसकी मत्ृ यु काररत कारािास या जुमागना या न्यायािय । करन े के आशय से ककया गया काय ग । िोनों । 92 ऐसे काय ग द्िारा, जो आपराधधक 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन मानििध की कोहि में आता िै, ककसी कारािास और जुमागना । न्यायािय । सजीि अजात ् बािक की मत्ृ यु काररत करना । 93 बािक के वपता या माता या उसकी 7 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िेखरेख रखन े िाि े व् यजक्त द्िारा 12 कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । िष ग से कम आयु के बािक का उसके या िोनों । पूण ग पररत्याग के आशय से अरक्षक्षत डाि हिया जाना । 94 मतृ शर र के गुप् त व्ययन द्िारा जन्म 2 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग यिपाना । कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 95 अपराध काररत करने के लिए ककसी बच्च े कम स े कम 3 िष ग का संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग को भा़िे पर िेना, यनयोजजत करना या कारािास, ककंत ु जो 10 मजजस्रेि । यनयुक्त करना । िष ग तक का िो सकेगा, और जुमागनाा । यहि अपराध काररत ककया जाए । काररत ककए गए संज्ञेय । अजमानतीय । न्यायािय, अपराध के समान जजसके द्िारा, काररत ककया गया अपराध विचारणीय िै । 96 लशश ु का उपापन । 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास और न् यायािय । जुमागना । 97 िस िष ग स े कम आय ु के ककसी लशश ु के 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग शर र पर से चोर करने के आशय स े कारािास और मजजस्रेि । उस लशशु का व्यपिरण या अपिरण । जुमागना । 98 िेश्यािवृि, आहि के प्रयोजन के लिए 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लशश ु को बेचना । कारािास और न् यायािय । जुमागना । 99 िेश्यािवृि, आहि के प्रयोजनों के लिए कम स े कम 7 िष ग का संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लशश ु को खर िना । कारािास, ककंत ु जो 14 न् यायािय । िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 383 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 103(1) ित्या । मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास और जुमागना । न्यायािय । 103(2) पांच या अधधक व्यजक्तयों काे समूि मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन द्िारा ित्या । कारािास और जुमागना । न्यायािय । 104 आजीिन लसद्धिोष द्िारा ित् या । मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास, जजसका अथ ग न्यायािय । उस व्यजक्त के शेष प्राकृत जीिनकाि के लिए िोगा । 105 ित् या की कोहि में न आन े िािाा आजीिन कारािास से, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन आपराधधक मानि िध, यहि िि काय,ग या कारािास से, जजसकी न्यायािय । जजसके द्िारा मत्ृ यु काररत की गई िै, अिधध 5 िष ग स े कम मत्ृ यु, आहि काररत करने के आशय स े की नि ं िोगी, ककंत ु जो ककया जाए । 10 िष ग तक की िो सकेगी और जमु ागना । यहि िि काय ग इस ज्ञान के साथ कक 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन उससे मत्ृ यु काररत करना सम् भाव् य िै, कारािास और जुमागना । न्यायािय । ककन् तु मत्ृ यु, आहि काररत करन े के ककसी आशय के बबना, ककया जाए । 106(1) उपेक्षा द्िारा मत्ृ य ु काररत करना । 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग और जुमागना । मजजस्रेि । रजजस्र कृत धचककत्सा व्यिसायी द्िारा 2 िष ग का कारािास और संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग उपेक्षा द्िारा मत्ृ यु काररत करना। जुमागना मजजस्रेि । 106(2) यान के उताििेपन या उपेक्षापूण ग चािन 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग से, ककसी व्यजक्त की मत्ृ य ु काररत करना कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । और यनकिकर भागना । 107 लशश ु या विकृतधचि व्यजक्त, आहि काो मत्ृ यु, या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन आत् मित् या का ि‍ु प्रेरण । कारािास, या 10 िष ग के न्यायािय । लिए कारािास और जुमागना । 108 आत्मित्या का ि‍ु प्रेरण । 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास और जुमागना । न्यायािय । 109(1) ित्या का प्रयत् न । 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास और जुमागना । न् यायािय । यहि ऐसे काय ग द्िारा ककसी व् यजक्त को आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन उपियत काररत िो जाए । यथाउपरोक्त । न् यायािय । 109(2) आजीिन लसद्धिोष द्िारा ित्या का मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन प्रयत् न, यहि उपियत काररत िुई िो ो़। कारािास, जजसका अथ ग न् यायािय । उस व्यजक्त के शेष प्राकृत जीिनकाि स े िोगा । 110 आपराधधक मानििध करन े का प्रयत् न । 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन या जुमागना या िोनों । न् यायािय । यहि ऐस े काय ग द्िारा ककसी व्यजक्त को 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन उपियत काररत िोती िै । या जुमागना या िोनों । न् यायािय । 111(2)(क) संगहठत अपराध, जजसके मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन पररणामस्िरूप ककसी व्यजक्त की मत्ृ यु कारािास और जुमागना, न्यायािय । िो । जो 10 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा ।38 4 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 111(2)(ख) ककसी अन्य िशा में । कारािास, जो 5 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कम नि ं िोगा, ककंतु जो न्यायािय । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना, जो 5 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा । 111(3) संगहठत अपराध ककए जाने का ि‍ु प्ररे ण, कारािास, जो 5 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन प्रयत्न, षडयंत्र करना या आशयपूिकग उसे कम नि ं िोगा, ककंत ु न्यायािय । सुकर बनाना । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना, जो 5 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा । 111(4) संगहठत अपराध लसडंडकेि का सिस्य कारािास, जो 5 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िोना । कम नि ं िोगा, ककंत ु न्यायािय । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना, जो 5 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा । 111(5) आशयपूिकग ककसी व्यजक्त को, जजसने कारािास, जो 3 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन संगहठत अपराध काररत ककया िै, सश्रं य कम नि ं िोगा, ककंत ु न्यायािय । िेना या यिपाना । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना, जो 5 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा । 111(6) संगहठत अपराध स े व्यत्पुन्न या प्राप्त कारािास, जो 3 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कोई संपवि धारण करना । कम नि ं िोगा, ककंतु जो न्यायािय । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना, जो 2 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा । 111(7) संगहठत अपराध लसडंडकेि के ककसी कारािास जो 3 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन सिस्य की ओर स े संपवि धारण करना। कम नि ं िोगा ककन्त ु न्यायािय । जो 10 िष ग तक के लिए िो सकेगा और जुमागना जो 1 िाख रुपए स े कम नि ं िोगा । 112 िोिे संगहठत अपराध । कारािास, जो 1 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कम नि ं िोगा, ककंतु जो मजजस्रेि । 7 िष ग तक िो सकेगा, और जुमागना । 113(2)(क) आतंकिाि कृत्य, जजसके पररणामस्िरूप मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन ककसी व्यजक्त की मत्ृ यु िो जाती िै । कारािास और जुमागना । न्यायािय । 113(2)(ख) ककसी अन्य िशा में । कारािास, जो 5 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कम नि ं िोगा, ककंत ु न्यायािय । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना। 113(3) आतंकिाि कृत्य ककए जाने का प्रयत्न, कारािास, जो 5 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन षडयंत्र, ि‍ु प्रेरण, आहि करना या कम नि ं िोगा, ककंत ु न्यायािय । जानबूझकर उसे सुकर बनाना । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 385 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 113 (4) आंतकिाि कृत्य काररत करने के लिए कारािास जो 5 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कैम्प, प्रलशक्षण आहि आयोजजत करना कम नि ं िोगा ककन्त ु न्यायािय । जो आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना । 113(5) उस सगं ठन का सिस्य िोना, जो आजीिन कारािास और संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन आतंकिाि कृत्य में अतं िलगित िै । जुमागना । न्यायािय । 113(6) ककसी व्यजक्त को, जजसने आतंकिाि कारािास, जो 3 िष ग स े संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कृत्य काररत ककया िै, संश्रय िेना या कम नि ं िोगा, ककंत ु न्यायािय । यिपाना, आहि । आजीिन कारािास तक िो सकेगा और जुमागना। 113(7) आतंकिाि कृत्य से व्यत्पुन्न या प्राप्त आजीिन कारािास और संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कोई संपवि धारण करना । जुमागना । न्यायािय । 115(2) स्िेच्िया उपियत काररत करना । 1 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या 10 िजार रुपए का जुमागना या िोनों । 117(2) स्िेच्िया र्ोर उपियत काररत करना । 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । और जुमागना । 117(3) यहि उपियत के पररणामस्िरूप स्थायी कठोर कारािास, जो 10 संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन हिव्यांगता या सतत ् लशधथि अिस्था िष ग से कम नि ं िोगा, न्यायािय । िोती िै । ककंत ु आजीिन कारािास तक िो सकेगा, जजसका अथ ग उस व्यक्ति के शेष प्राकृि जीवनकाल स े होगा । 117(4) 5 या अधधक व्यजक्तयों के समूि द्िारा, 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन र्ोर उपियत काररत करना । और जुमागना । न्यायािय । 118(1) खतरनाक आयुधों या साधनों द्िारा 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । स्िेच्िया उपियत काररत करना । या 20 िजार रुपए का जुमागना या िोनों । 118(2) खतरनाक आयुधों या साधनों द्िारा आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग स्िेच्िया र्ोर उपियत काररत करना [धारा कारािास, जो 1 िष ग स े मजजस्रेि । 122(2) में यथा उपबंधधत के लसिाय] । कम नि ं िोगा, ककंतु जो 10 िष ग तक िो सकेगा और जुमागना । 119(1) संपवि उद्िावपत करन े के लिए या अिैध 10 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग काय ग कराने को मजबूर करने के लिए और जुमागना । मजजस्रेि । स् िच्े िया उपियत काररत करना । 119(2) उपधारा (1) में यनहिग‍ि ककसी प्रयोजन आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन के लिए स्िैच्िया र्ोर उपियत काररत 10 िष ग के लिए कारािास न्यायािय । करना । और जुमागना । 120(1) संस् िीकृयत या जानकार उद्िावपत करने 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग या वििश करके संपवि का प्रत् याितनग और जुमागना । मजजस् रेि । करान,े आहि के लिए स् िेच् िया उपियत काररत करना । 120(2) संस् िीकृयत या जानकार उद्िावपत करने 10 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन या वििश करके संपवि का प्रत् याितनग और जुमागना । न् यायािय । करान,े आहि के लिए स् िच्े िया र्ोर उपियत काररत करना ।38 6 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 121(1) िोक सेिक को अपने कतव्ग य स े 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग भयोपरत करने के लिए स् िेच् िया या जुमागना या िोनों । मजजस्रेि । उपियत काररत करना । 121(2) िोक सेिक को अपने कतव्ग य स े कम से कम 1 िष ग का संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन भयोपरत करने के लिए स् िेच् िया र्ोर कारािास या 10 िष ग के न् यायािय । उपियत काररत करना । लिए कारािास और जुमागना । 122(1) प्रकोपन िेने िािे व्यजक् त स े लभन् न ककसी 1 मास के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । व्यजक् त को उपियत करन े का आशय न या 5,000 रुपए का रखते िुए गंभीर और अचानक प्रकोपन जुमागना या िोनों । पर स्िैच्िया उपियत काररत करना । 122(2) प्रकोपन िेने िािे व्यजक् त स े लभन् न ककसी 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग व्यजक् त को उपियत करन े का आशय न या 10,000 रुपए का मजजस्रेि । रखते िुए गंभीर और अचानक प्रकोपन जुमागना या िोनों । पर र्ोर उपियत काररत करना । 123 अपराध करने के आशय से विष, आहि 10 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन द्िारा उपियत काररत करना । और जुमागना । न् यायािय । 124(1) अम् ि, आहि का प्रयोग करके स् िेच् िया कम से कम 10 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन र्ोर उपियत काररत करना । लिए कारािास, ककंतु जो न् यायािय । आजीिन कारािास तक का िो सकेगा और जुमागना । 124(2) स् िच्े िया अम्ि फेंकना या फेंकने का 5 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन प्रयत् न करना । ककंतु जो 7 िष ग तक का न् यायािय । िो सकेगा और जुमागना । 125 काय,ग जजससे मानि जीिन या िैयजक्त क 3 मास के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । सुरक्षा संकिापन्न िो । या 2,500 रुपए का जुमागना या िोनों । 125(क) जिां उपियत काररत की गई िै । 6 मास के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या 5,000 रुपए का जुमागना या िोनों । 125(ख) जिां र्ोर उपियत काररत की गई िै । 3 िष ग का कारािास, या संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । 10,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 126(2) ककसी व्यजक् त का सिोष अिरोध करना । 1 मास के लिए सािा संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 127(2) ककसी व्यजक् त का सिोष परररोध । 1 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या 5,000 रुपए का जुमागना या िोनों । 127(3) तीन या अधधक हिनों के लिए सिोष 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । परररोध । या 10,000 रुपए का जुमागना या िोनों । 127(4) 10 या अधधक हिनों के लिए सिोष 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग परररोध । और 10,000 रुपए का मजजस्रेि । जुमागना । 127(5) ककसी व्यजक् त को यि जानते िुए सिोष ककसी अन् य धारा के संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग परररोध में रखना कक उसको िो़िने के अधीन ककसी अिधध के मजजस्रेि । लिए ररि जार की गई िै । लिए कारािास के अयतररक्त , 2 िष ग के लिए कारािास और जुमागना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 387 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 127(6) गुप् त स्थान में सिोष परररोध । उस िण् ड के अयतररक्त , संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जजसके लिए िि िायी मजजस्रेि । िो, 3 िष ग का कारािास और जुमागना । 127(7) सम्पवि उद्िावपत करन े के लिए या 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । अिैध काय ग करन े के लिए मजबूर करन,े और जुमागना । आहि के प्रयोजन के लिए सिोष परररोध । 127(8) संस्िीकृयत या जानकार उद्िावपत करने 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या सम्पवि, आहि को प्रत्याियततग करने के और जुमागना । लिए वििश करन े के प्रयोजन के लिए सिोष परररोध । 131 गम् भीर प्रकोपन िोने स े अन् यथा िमिा 3 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या आपराधधक बि । कारािास, या 1,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 132 िोक सेिक को अपने कतव्ग य के यनिगिन 2 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । से भयोपरत करन े के लिए िमिा या कारािास, या जुमागना, आपराधधक बि का प्रयोग । या िोनों । 133 गंभीर और अचानक प्रकोपन िोने स े 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । अन्यथा, ककसी व्यजक् त का यनरािर करने या जुमागना, या िोनों । के आशय से उस पर िमिा या आपराधधक बि । 134 ककसी व्यजक् त द्िारा पिनी िुई या ि े 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । जाई जान े िाि सम्पवि की चोर के या जुमागना, या िोनों । प्रयत् न में िमिा या आपराधधक बि । 135 ककसी व्यजक् त का सिोष परररोध करने के 1 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । प्रयत् न में िमिा या आपराधधक बि का या 5,000 रुपए का प्रयोग । जुमागना, या िोनों । 136 गंभीर और अचानक प्रकोपन लमिने पर 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िमिा या आपराधधक बि का प्रयोग । कारािास, या 1,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 137(2) व्यपिरण । 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग और जुमागना । मजजस्रेि । 139(1) भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए लशश ु कठोर कारािास, जो 10 संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग का व्यपिरण । िष ग से कम का नि ं मजजस्रेि । िोगा, ककंतु जो आजीिन कारािास के लिए िो सकेगा और जुमागना । 139(2) भीख मांगने के प्रयोजनों के लिए लशश ु कारािास, जो 20 िष ग से संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन को विकिांग करना । कम का नि ं िोगा, जो न्यायािय । उस व्यजक्त के शेष प्राकृत जीिन तक िो सकेगा और जुमागना ।38 8 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 140(2) कफरौती, आहि के लिए व्यपिरण । मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास और जुमागना । न्यायािय । 140(3) ककसी व्यजक्त का गप्ु त र यत से और 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग सिोष परररोध करने के आशय स े और जुमागना । मजजस्रेि । व्यपिरण या अपिरण । 140(4) ककसी व्यजक्त को र्ोर उपियत, िासत्ि, 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन आहि के अधीन करने के लिए व्यपिरण कारािास और जुमागना । न्यायािय । या अपिरण । 141 वििेश स े बालिका या बािक का आयात 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन करना । कारािास और जुमागना । न्यायािय । 142 व् यपहृत या अपहृत व् यजक् त को सिोष यिपाना व्यपिरण या अपिरण संज्ञेय । अजमानतीय । िि न्यायािय, या परररोध में रखना । के लिए िंड । जजसके द्िारा व्यपिरण या अपिरण विचारणीय िै । 143(2) व् यजक् त का िव्ु यागपार । कम से कम 7 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कठोर कारािास, न्यायािय । ककंत ु जो 10 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना । 143(3) एक से अधधक व् यजक् तयों का िव्ु यागपार । कम स े कम 10 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कारािास, ककंतु जो न्यायािय । आजीिन कारािास तक का िो सकेगा और जुमागना । 143(4) ककसी लशश ु का िव्ु यागपार । कम स े कम 10 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कारािास, ककंतु जो न्यायािय । आजीिन कारािास तक का िो सकेगा और जुमागना । 143(5) एक से अधधक लशशुओ ं का िव्ु यागपार । कम स े कम 14 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लिए कारािास, ककंतु जो न्यायािय । आजीिन कारािास तक का िो सकेगा और जुमागना । 143(6) व् यजक् त को एक स े अधधक अिसरों पर आजीिन कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन लशश ु के िव्ु यागपार के अपराध के लिए जजससे उस व् यजक् त के न्यायािय । लसद्धिोष ठिराया जाना । शेष प्राकृत जीिनकाि का कारािास अलभप्रेत िोगा और जमु ागना । 143(7) िोक सेिक या ककसी पुलिस अधधकार आजीिन कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन का लशश ु के िव्ु यागपार में अतं िलगित जजससे उस व् यजक् त के न्यायािय । िोना । शेष प्राकृत जीिनकाि का कारािास अलभप्रेत िोगा और जमु ागना । 144(1) ऐसे ककसी लशशु का शोषण, जजसका कम से कम 5 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िव्ु यागपार ककया गया िै । लिए कठोर कारािास, न्यायािय । ककंत ु जो 10 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 389 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 144(2) ऐसे ककसी व् यजक् त का शोषण, जजसका कम से कम 3 िष ग के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िव्ु यागपार ककया गया िै । लिए कठोर कारािास, न्यायािय । ककंतु जो 7 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना । 145 िासों का आभ्यालसक व्यौिार करना । आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन 10 िष ग के लिए न्यायािय । कारािास, और जुमागना । 146 विधधविरुद्ध अयनिाय ग श्रम । 1 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई या जुमागना, या िोनों। मजजस्रेि । 147 भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या मत्ृ यु, या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन युद्ध करन े का प्रयत् न करना, या युद्ध कारािास, और जुमागना । न्यायािय । करन े का ि‍ु प्रेरण करना । 148 राज्य के विरुद्ध कयतपय अपराधों को आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन करन े के लिए षड यंत्र । 10 िष ग के लिए कारािास न्यायािय । और जुमागना । 149 भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करने के आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन आशय से आयुध, आहि संग्रि करना । 10 िष ग के लिए कारािास न्यायािय । और जुमागना । 150 युद्ध करन े की पररकल्पना को सुकर 10 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । बनान े के आशय से यिपाना । और जुमागना । 151 ककसी विधधपूण ग शजक् त का प्रयोग करने के 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । लिए वििश करने या उसका प्रयोग और जुमागना । अिरोधधत करन े के आशय से रा‍ रपयत, राज्यपाि, आहि पर िमिा करना । 152 भारत की संप्रभतु ा, एकता और अखडं ता आजीिन कारािास, या 7 संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन को खतरे में डािने िािा कायग । िष ग के लिए कारािास, न् यायािय । और जुमागना । 153 भारत सरकार से शांयत का संबंध रखन े आजीिन कारािास और संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िाि ककसी वििेशी राज्य की सरकार के जुमागना, या 7 िष ग के न् यायािय । विरुद्ध युद्ध करना । लिए कारािास और जुमागना, या जुमागना । 154 भारत सरकार के साथ शांयत का सबं ंध 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन रखने िािे वििेशी राज्य के राज्यक्षेत्र में और जुमागना, और न् यायािय । िूिपाि करना । कयतपय सम्पवि की जब्ती । 155 धारा 153 और धारा 154 में िर्णतग युद्ध 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन या िूिपाि द्िारा ि गई सम्पवि प्राप् त और जुमागना और न् यायािय । करना । कयतपय सम्पवि की जब्ती । 156 िोक सेिक का स्िेच्िया राजकैि या आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन युद्ध कैि को अपनी अलभरक्षा में स े 10 िष ग के लिए कारािास न् यायािय । यनकि भागन े िेना । और जुमागना । 157 उपेक्षा से िोक सेिक का राजकैि या 3 िष ग के लिए सािा संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग युद्ध कैि का अपनी अलभरक्षा में स े कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । यनकि भागना सिन करना । 158 ऐस े कैि के यनकि भागने में सिायता आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । िेना, उसे िु़िाना या संश्रय िेना । 10 िष ग के लिए कारािास और जुमागना ।39 0 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 159 विद्रोि का ि‍ु प्रेरण या ककसी अधधकार , आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । सैयनक, नौसैयनक या िायुसैयनक को 10 िष ग के लिए कारािास उसकी राजयन‍ ठा या उसके कतव्ग य स े और जुमागना । विचलित करन े का प्रयत् न करना । 160 विद्रोि का ि‍ु प्रेरण, यहि उसके मत्ृ यु या आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । पररणामस्िरूप विद्रोि ककया जाए । कारािास, या 10 िष ग के लिए कारािास और जुमागना । 161 अधधकार , सैयनक, नौसैयनक या िायुसैयनक 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग द्िारा अपने िरर‍ठ अधधकार पर, जब िि और जुमागना । मजजस्रेि । अधधकार अपने पि यन‍पािन में िो, िमि े का ि‍ु प्रेरण । 162 ऐसे िमिे का ि‍ु प्रेरण, यहि िमिा ककया 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग जाता िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 163 अधधकार , सैयनक, नौसैयनक या िायुसैयनक 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । द्िारा अलभत्यजन का ि‍ु प्रेरण । या जुमागना, या िोनों । 164 अलभत्याजक को संश्रय िेना । 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या जुमागना, या िोनों । 165 मास्िर या भारसाधक व्यजक्त की उपेक्षा स े 3,000 रुपए का जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िार्णजज्यक जियान पर यिपा िुआ अलभत्याजक । 166 अधधकार , सैयनक, नौसैयनक या िायुसैयनक 2 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । द्िारा अनधीनता के काय ग का ि‍ु प्रेरण, या जुमागना, या िोनों । यहि उसके पररणामस्िरूप िि अपराध ककया जाता िै । 168 सैयनक, नौसैयनक या िायुसैयनक द्िारा 3 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उपयोग में िाई जान े िाि पोशाक कारािास, या 2,000 पिनना या िोकन धारण करना । रुपए का जुमागना, या िोनों । 173 ररश् ित । 1 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग या जुमागना, या िोनों, या मजजस्रेि । यहि सत्कार के रूप में ि ि गई िै तो केिि जुमागना । 174 यनिागचन में असम्यक् असर डािना या 1 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग प्रयतरूपण करना । या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । 175 यनिागचन के लसिलसिे में लमथ्या कथन । जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग मजजस्रेि । 176 यनिागचन के लसिलसिे में अिैध 1 0 ,000 रुपए का असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग संिाय । जुमागना । मजजस्रेि । 177 यनिागचन िेखा रखने में असफिता । 5,000 रुपए का असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जुमागना । मजजस्रेि । 178 लसक्कों, सरकार स्िांपों, करेंसी नोिों या आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । बकैं नोिों का कूिकरण । 10 िष ग के लिए कारािास, और जुमागना । 179 कूिरधचत या कूिकृत लसक्के, सरकार स्िाम्प, आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । करेंसी नोिों या बकैं नोिों को असि के रूप में 10 िष ग के लिए उपयोग करना । कारािास, और जुमागना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 391 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 180 कूिरधचत या कूिकृत लसक्के, सरकार 7 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । स्िाम्प, करेंसी नोिों या बकैं नोिों को या जुमागना, या िोनों । कब्जे में रखना । 181 कूिरधचत या कूिकृत लसक्कों, सरकार आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । स्िांम्प, करेंसी नोिो या बकैं नोिों को 10 िष ग के लिए बनाना, क्रय करना, विक्रय करना या कारािास, और जुमागना । बनाने के लिए मशीनर , उपकरण या सामग्री को कब्ज े में रखना । 182(1) करेंसी नोिों या बकैं नोिों से सादृश्य 300 रुपए का जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । रखने िाि िस्तािेजों की रचना या उपयोग । 182(2) मुद्रक का नाम और पता बताने से इकं ार 600 रुपए का जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । पर । 183 इस आशय से कक सरकार को िायन 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग काररत िो, उस पिाथ ग पर से, जजस पर या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । सरकार स्िाम्प िगा िुआ िै, िेख लमिाना, या िस्तािेज से िि स्िाम्प ििाना, जो उसके लिए उपयोग में िाया गया िै । 184 ऐस े सरकार स्िाम्प का उपयोग, जजसके 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । बारे में ज्ञात िै कक उसका पििे उपयोग या जुमागना, या िोनों । िो चुका िै । 185 स्िाम्प के उपयोग ककए जा चुकने के 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग द्योतक धचह्न को िीिकर लमिाना । या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । 186 बनािि स्िाम्प । 200 रुपए का जुमागना । संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । 187 िकसाि में यनयोजजत व्यजक् त द्िारा 7 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग लसक् के का उस िजन या लमश्रण से और जुमागना । मजजस्रेि । लभन् न काररत ककया जाना, जो विधध द्िारा यनयत िै । 188 िकसाि से लसक् का बनान े का उपकरण 7 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग विधधविरुद्ध रूप स े िेना । और जुमागना । मजजस्रेि । 189(2) विधधविरुद्ध जमाि का सिस्य िोना । 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 189(3) ककसी विधधविरुद्ध जमाि में यि जानते 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िुए कक उसके बबखर जाने का समािेश या जुमागना, या िोनों । हिया गया िै, सजम्मलित िोना या उसमें बन े रिना । 189(4) ककसी र्ातक आयुध से सजज्जत िोकर 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । विधधविरुद्ध जमाि में सजम्मलित िोना । या जुमागना, या िोनों । 189(5) पांच या अधधक व्यजक् तयों के ककसी जमाि 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । को बबखर जाने का समािेश हिए जाने के कारािास, या जुमागना, या पश् चात,् उसमें जानते िुए सजम्मलित िोना िोनों । या बन े रिना । 189(6) विधधविरुद्ध जमाि में भाग िेन े के लिए िि , जो ऐसे जमाि के संज्ञेय । इसके अनुसार िि न्यायािय, व्यजक् तयों को भा़िे पर िेना, िचनबद्ध सिस्य के लिए और ऐसे कक अपराध जजसके द्िारा िि करना, या यनयोजजत करना । जमाि के ककसी सिस्य जमानतीय िै या अपराध विचारणीय द्िारा ककए गए ककसी अजमानतीय । िै । अपराध के लिए िै ।39 2 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 189(7) विधधविरुद्ध जमाि के लिए भा़िे पर िाए 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । गए व्यजक्तयों को संश्रय िेना । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 189(8) विधधविरुद्ध जमाि या बिि े में भाग िेन े 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । के लिए भा़िे पर जाना । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 189(9) या आयुध सहित जाना । 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या जुमागना, या िोनों । 190 विधधविरुद्ध जमाि का प्रत्येक सिस्य, िि , जो उस अपराध के इसके अनुसार इसके अनुसार िि न्यायािय, सामान्य उद्िेश्य को अग्रसर करन े के लिए िै । कक िि अपराध कक अपराध जजसके द्िारा िि लिए ककए गए अपराध का िोषी । संज्ञेय िै या जमानतीय िै या अपराध विचारणीय असंज्ञेय । अजमानतीय । िै । 191(2) बििा । 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या जुमागना, या िोनों । 191(3) र्ातक आयुध से सजज्जत िोकर बििा 5 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग करना । या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । 192 बििा कराने के आशय से स्िैररता से 1 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । प्रकोपन िेना, यहि बििा ककया जाता िै । या जुमागना, या िोनों । यहि बििा नि ं ककया जाता िै । 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 193(1) बिि,े आहि की सूचना का भूलम के स्िामी 1,000 रुपए का असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या अधधभोगी द्िारा न हिया जाना । जुमागना । 193(2) जजस व्यजक् त के फायिे के लिए या जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । जजसकी ओर से बििा िोता िै, उस व्यजक् त द्िारा उसका यनिारण करने के लिए सब विधधपूण ग साधनों का उपयोग न ककया जाना । 193(3) जजस स्िामी या अधधभोगी के फायिे के जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । लिए बििा ककया जाता िै, उसके अलभकताग द्िारा उसका यनिारण करने के लिए सब विधधपूण ग साधनों का उपयोग न ककया जाना । 194(2) िंगा करना । 1 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 1,000 रुपए का जुमागना या िोनों । 195(1) िोक सेिक जब बिि े आहि को िबा रिा 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िो, तब उस पर िमिा करना या उसे या जुमागना, जो कम से मजजस्रेि । बाधधत करना । कम 25,000 रूपए िोगा, या िोनों । 195(2) िोक सेिक, जब बिि े इत्याहि को िबा 1 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । रिा िो, तब िमि े की धमकी िेना या या जुमागना या िोनों । काम में बाधा डािने का प्रयत्न करना । 196(1) धम,ग मूििंश, जन्म-स्थान, यनिास-स्थान, 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग भाषा, इत्याहि के आधारों पर विलभन् न या जुमागना या िोनों । मजजस्रेि । समूिों के बीच शत्रुता का संप्रितनग और सौिािग बन े रिने पर प्रयतकूि प्रभाि डािने िािे काय ग करना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 393 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 196(2) पूजा के स्थान, आहि में िगों के बीच 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग शत्रुता का संप्रितनग । और जुमागना । मजजस्रेि । 197(1) रा‍र य अखंडता पर प्रयतकूि प्रभाि 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग डािने िािे िांिन, दृढ़कथन । या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । 197(2) यहि सािगजयनक पूजा स्थि आहि पर ककया 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग जाए । और जुमागना । मजजस्रेि । 198 िोक सेिक, जो ककसी व्यजक् त को क्षयत 1 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग काररत करन े के आशय से विधध के यनिेश कारािास, या जुमागना, या मजजस्रेि । की अिज्ञा करता िै । िोनों । 199 िोक सेिक, जो विधध के अधीन के यनिेश कम से कम 6 मास के संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग की अिज्ञा करता िै । लिए कठोर कारािास, जो मजजस्रेि । 2 िष ग तक का िो सकेगा और जुमागना । 200 अस् पताि द्िारा पीड़ित का उपचार न 1 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग ककया जाना । या जुमागना या िोनों । मजजस्रेि । 201 िोक सेिक, जो क्षयत काररत करने के 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग आशय से अशुद्ध िस्तािेज रचता िै । या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । 202 िोक सेिक, जो विधधविरुद्ध रूप स े 1 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग व्यापार में िगता िै । कारािास, या जुमागना, या मजजस्रेि । िोनों या सामुिाययक सेिा । 203 िोक सेिक, जो विधधविरुद्ध रूप स े 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग संपवि क्रय करता िै या उसके लिए बोि कारािास, या जुमागना, या मजजस्रेि । िगाता िै । िोनों और यहि संपवि क्रय कर ि गई िै तो उसका अधधिरण । 204 िोक सेिक का प्रयतरूपण । कारािास, जो कम से संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । कम 6 मास का िोगा, ककंतु जो 3 िष ग तक का िो सकेगा, और जुमागना । 205 कपिपूण ग आशय से िोक सेिक के उपयोग 3 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । की पोशाक पिनना या िोकन को धारण कारािास, या 5,000 करना । रुपए का जुमागना, या िोनों । 206(क) िोक सेिक से समन की तामीि या अन्य 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कायिग ाि से बचने के लिए फरार िो कारािास, या 5,000 जाना । रुपए का जुमागना, या िोनों । 206(ख) यहि िि समन या सूचना न्यायािय में 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िैयजक् तक उपजस्थयत आहि अपेक्षक्षत करती कारािास, या 10,000 िै । रुपए का जुमागना, या िोनों । 207(क) समन की तामीि का या अन्य कायिग ाि का 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या उसके प्रकाशन का यनिारण करना । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों ।39 4 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 207(ख) यहि समन, आहि न्यायािय में िैयजक् तक 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उपजस्थयत, आहि अपेक्षक्षत करते ि ैं । कारािास, या 10,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 208(क) िोक सेिक का आिेश न मानकर 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । अनुपजस्थत रिना । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना या िोनों । 208(ख) यहि आिेश न्यायािय में िैयजक् तक 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उपजस्थयत, आहि अपेक्षक्षत करता िै । कारािास, या 10,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 209 इस संहिता की धारा 84 के अधीन ककसी 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग उद्र् ोषणा के जिाब में अनपु जस्थयत । या जुमागना या िोनों या मजजस्रेि । समुिाय सेिा । ककसी ऐसे मामिे में, जिां ककसी व्यजक् त 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग को, उद् र्ोवषत अपराधी के रूप में र्ोवषत और जुमागना । मजजस्रेि । करते िुए इस संहिता की धारा 84 की उपधारा (4) के अधीन र्ोषणा की गई िै । 210(क) िस्तािेज प्रस्तुत करने या पररिि करन े के 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । अध्याय 28 के लिए विधधक रूप से आबद्ध व्यजक् त कारािास या 5,000 रुपए उपबंधों के अधीन द्िारा िोक सेिक को ऐसा िस्तािेज का जुमागना, या िोनों । रिते िुए, िि प्रस्तुत करन े का िोप । न्यायािय, जजसमें अपराध ककया गया िै ; या यहि अपराध न्यायािय में नि ं ककया गया िै तो कोई मजजस्रेि । 210(ख) यहि उस िस्तािेज का न्यायािय में 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । अध्याय 28 के प्रस्तुत ककया जाना या पररिि ककया जाना कारािास, या 10,000 उपबंधों के अधीन अपेक्षक्षत िै । रुपए का जुमागना, या रिते िुए, िि िोनों । न्यायािय, जजसमें अपराध ककया गया िै ; या यहि अपराध न्यायािय में नि ं ककया गया िै तो कोई मजजस्रेि । 211(क) सूचना या जानकार िेने के लिए विधधक 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । रूप से आबद्ध व्यजक्त द्िारा िोक सेिक कारािास, या 5,000 रुपए को ऐसी सूचना या जानकार िेने का का जुमागना, या िोनों । साशय िोप । 211(ख) यहि अपेक्षक्षत सूचना या जानकार अपराध 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । ककए जाने, आहि के विषय में िै । कारािास, या 10,000 रुपए का जुमागना, या िोनों ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 395 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 211(ग) यहि सूचना या जानकार इस संहिता की 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । धारा 394 की उपधारा (1) के अधीन हिए कारािास, या 1,000 गए आिेश द्िारा अपेक्षक्षत िै । रुपए का जुमागना, या िोनों । 212(क) िोक सेिक को जानते िुए लमथ्या सूचना 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िेना । कारािास या 5,000 रुपए का जुमागना या िोनों । 212(ख) यहि अपेक्षक्षत सूचना अपराध ककए जाने 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आहि के विषय में िो । या जुमागना, या िोनों । 213 शपथ से इंकार करना जब िोक सेिक 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । अध्याय 28 के द्िारा िि शपथ िेने के लिए सम्यक् रूप कारािास, या 5,000 रुपए उपबंधों के अधीन से अपेक्षक्षत ककया जाता िै । का जुमागना या िोनों । रिते िुए िि न्यायािय जजसमें अपराध ककया गया िै ; या यहि अपराध न्यायािय में नि ं ककया गया िै तो कोई मजजस्रेि । 214 सत्य कथन करने के लिए विधधक रूप स े 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । अध्याय 28 के बाध्य िोते िुए प्रश् न करने के लिए कारािास, या 5,000 रुपए उपबंधों के अधीन प्राधधकृत िोक सेिक को उिर िेने स े का जुमागना, या िोनों । रिते िुए िि इंकार करना । न्यायािय जजसमें अपराध ककया गया िै ; या यहि अपराध न्यायािय में नि ं ककया गया िै तो कोई मजजस्रेि । 215 िोक सेिक से ककए गए कथन पर 3 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । अध्याय 28 के िस्ताक्षर करन े से इंकार करना जब िि कारािास, या 3,000 रुपए उपबंधों के अधीन िैसा करन े के लिए विधधक रूप से का जुमागना, या िोनों । रिते िुए िि अपेक्षक्षत िै । न्यायािय जजसमें अपराध ककया गया िै; या यहि अपराध न्यायािय में नि ं ककया गया िै तो कोई मजजस्रेि । 216 िोक सेिक से शपथ पर जानते िुए सत्य 3 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग के रूप में ऐसा कथन करना जो लमथ्या और जुमागना । मजजस्रेि । िै । 217 ककसी िोक सेिक को इस आशय स े 1 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । लमथ्या सूचना िेना कक िि अपनी या 10,000 रुपए का विधधपूण ग शजक्त का उपयोग िसू रे व्यजक् त जुमागना, या िोनों । को क्षयत या क्षोभ करने के लिए करे । 218 िोक सेिक के विधधपूण ग प्राधधकार द्िारा 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । सम्पवि लिए जान े का प्रयतरोध । कारािास या 10,000 रुपए तक का जुमागना, या िोनों ।39 6 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 219 िोक सेिक के प्राधधकार द्िारा विक्रय के 1 मास के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । या 5000 रुपए का लिए प्रस्थावपत की गई सम्पवि के विक्रय जुमागना, या िोनों । में बाधा उपजस्थत करना । 220 िोक सेिक के विधधपूण ग प्राधधकार द्िारा 1 मास के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । या 200 रुपए का विक्रय के लिए आमंबत्रत संपवि के लिए जुमागना, या िोनों । अिैध क्रय या बोि िगाना । 221 िोक सेिक के िोक कृत्यों के यनििग न में 3 मास के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । या 2,500 रुपए का बाधा डािना । जुमागना, या िोनों । 222(क) िोक सेिक की सिायता करन े का िोप 1 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । कारािास, या 2,500 रुपए जब ऐसी सिायता िेने के लिए विधध का जुमागना, या िोनों । द्िारा आबद्ध िो । 222(ख) ऐसे िोक सेिक की, जो आिेलशका के 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । कारािास, या 5,000 रुपए यन‍पािन, अपराधों के यनिारण आहि के का जुमागना, या िोनों । लिए सिायता मांगता िै, सिायता िेने में जानबूझकर उपेक्षा करना । 223(क) िोक सेिक द्िारा विधधपूिकग प्रखयावपत 6 मास के लिए सािा संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । कारािास, या 2,500 रुपए आिेश की अिज्ञा, यहि ऐसी अिज्ञा का जुमागना, या िोनों । विधधपूिकग यनयोजजत व्यजक् तयों को बाधा, क्षोभ या क्षयत काररत करे । 223(ख) यहि ऐसी अिज्ञा मानि जीिन, स्िास्थ्य 1 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । या 5,000 रुपए का या सुरक्षा, आहि को संकि या बििा या जुमागना, या िोनों । िंगा काररत करे । 224 िोक सेिक को क्षयत की धमकी । 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । या जुमागना, या िोनों । 225 1 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । िोक सेिक से संरक्षा के लिए आिेिन या जुमागना, या िोनों । करने से विरत रिने के लिए क्षयत की धमकी । 226 1 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । विधधपूिकग शजक्त का प्रयोग करने के लिए या जुमागना, या िोनों या बाध्य करने या प्रयोग करने में प्रयतरोध सामुिाययक सेिा । के लिए आत्मित्या करने का प्रयत्न । 229(1) 7 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग न्याययक कायिग ाि में साशय लमथ्या साक्ष्य और 10,000 रुपए का मजजस्रेि । िेना या गढ़ना । जुमागना । 229(2) 3 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । ककसी अन्य मामिे में लमथ्या साक्ष्य िेना और 5,000 रुपए का या गढ़ना । जुमागना । 230(1) ककसी व्यजक् त को मत्ृ यु से िंडनीय आजीिन कारािास, या असंज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । अपराध के लिए िोषलसद्ध कराने के 10 िष ग के लिए आशय से लमथ्या साक्ष्य िेना या गढ़ना । कठोर कारािास और 50,000 रुपए का जुमागना । 230(2) यहि यनिोष व्यजक् त उसके द्िारा मत्ृ यु या यथा उपयुक्ग त । असंज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । िोषलसद्ध ककया जाता िै और उसे फांसी िे ि जाती िै ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 397 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 231 आजीिन कारािास या 7 िष ग या उससे िि , जो अपराध के लिए असंज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । अधधक के कारािास से िंडनीय अपराध के िै । लिए िोषलसद्ध कराने के आशय से लमथ्या साक्ष्य िेना या गढ़ना । 232(1) ककसी व्यजक् त को लमथ्या साक्ष्य िेने के 7 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । िि न्यायािय लिए धमकाना । या जुमागना, या िोनों । जजसके द्िारा लमथ्या साक्ष्य िेने का अपराध विचारणीय िै । 232(2) यहि यनिोष व्यजक् त को लमथ्या साक्ष्य के िि , जो अपराध के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । िि न्यायािय पररणामस्िरूप िोषलसद्ध ककया जाता िै िै । जजसके द्िारा और मत्ृ यु या सात िष ग स े अधधक के लमथ्या साक्ष्य िेने कारािास से िंडाहि‍ ि ककया जाता िै । का अपराध विचारणीय िै । 233 उस साक्ष्य को न्याययक कायिग ाि में काम िि , जो लमथ्या साक्ष्य असंज्ञेय । इसके अनुसार िि न्यायािय में िाना जजसका लमथ्या िोना या गढ़ा िेने या गढ़ने के लिए कक ऐसा साक्ष्य जजसके द्िारा िोना ज्ञात िै । िै । िेने का अपराध लमथ्या साक्ष्य िेने जमानतीय िै या या गढ़न े का अजमानतीय । अपराध विचारणीय िै । 234 ककसी ऐस े तथ्य से संबंधधत लमथ्या िि , जो लमथ्या साक्ष्य असंज्ञेय । जमानतीय । िि न्यायािय प्रमाणपत्र जानते िुए िेना या िस्ताक्षररत िेने के लिए िै । जजसके द्िारा करना जजसके लिए ऐसा प्रमाणपत्र विधध लमथ्या साक्ष्य िेने द्िारा साक्ष्य में ग्राह्य िै । का अपराध विचारणीय िै । 235 प्रमाणपत्र को जजसका ताजविक बात के िि , जो लमथ्या साक्ष्य असंज्ञेय । जमानतीय । िि न्यायािय संबंध में लमथ्या िोना ज्ञात िै, सत्य िेने के लिए िै । जजसके द्िारा प्रमाणपत्र के रूप में काम में िाना । लमथ्या साक्ष्य िेने का अपराध विचारणीय िै । 236 ऐसी र्ोषणा में, जो साक्ष्य के रूप में िि , जो लमथ्या साक्ष्य असंज्ञेय । जमानतीय । िि न्यायािय विधध द्िारा ि जा सके, ककया गया िेने के लिए िै । जजसके द्िारा लमथ्या कथन । लमथ्या साक्ष्य िेने का अपराध विचारणीय िै । 237 ऐसी र्ोषणा का लमथ्या िोना जानते िुए िि , जो लमथ्या साक्ष्य असंज्ञेय । जमानतीय । िि न्यायािय सत्य के रूप में काम में िाना । िेने के लिए िै । जजसके द्िारा लमथ्या साक्ष्य िेने का अपराध विचारणीय िै । 238(क) ककए गए अपराध के साक्ष्य का वििोपन 7 िष ग के लिए कारािास इसके अनुसार कक जमानतीय । सेशन काररत करना या अपराधी को प्रयतच्िाहित और जुमागना । ऐसा अपराध, न्यायािय । करन े के लिए उस अपराध के बारे में जजसकी बाबत लमथ्या सूचना िेना, यहि अपराध मत्ृ यु से साक्ष्य का िंडनीय िै । वििोपन िुआ िै, संज्ञेय िै या असंज्ञेय ।39 8 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 238(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के 3 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 238(ग) यहि 10 िष ग से कम के कारािास से उस ि र्तग म अिधध की असंज्ञेय । जमानतीय । िि न्यायािय िंडनीय िै । एक चौथाई का कारािास, जजसके द्िारा जो उस अपराध के लिए अपराध उपबंधधत िै, या जुमागना, विचारणीय िै । या िोनों । 239 सूचना िेने के लिए विधधक रूप स े 6 मास के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आबद्ध व् यजक् त द्िारा अपराध की सूचना या 5,000 रुपए का िेने का साशय िोप । जुमागना या िोनों । 240 ककए गए अपराध के विषय में लमथ्या 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । सूचना िेना । या जुमागना, या िोनों । 241 साक्ष्य के रूप में ककसी िस्तािेज का 3 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग प्रस्तुत ककया जाना यनिाररत करने की या 5,000 रुपए का मजजस्रेि । लिए उसको यिपाना या न‍ ि करना । जुमागना, या िोनों । 242 िाि या आपराधधक अलभयोजन में कोई 3 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग काय ग या कायिग ाि करन े या जमानतिार या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । या प्रयतभू बनन े के प्रयोजन के लिए लमथ्या प्रयतरूपण । 243 सम्पवि को जब्त ककए जाने के रूप में या 3 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िंडािेश के अधीन जुमागना चुकान े या डडक्री या 5,000 रुपए जुमागना, के यन‍पािन में अलभगिृ त ककए जाने से या िोनों । यनिाररत करन े के लिए उसे कपिपूिकग ििाना या यिपाना, आहि । 244 सम्पवि को जब्त ककए जाने के रूप में या 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िंडािेश के अधीन जुमागना चुकान े में या या जुमागना, या िोनों । डडक्री के यन‍पािन में लिए जाने से यनिाररत करन े के लिए उस पर अधधकार के बबना िािा करना या उस पर ककसी अधधकार के बारे में प्रिंचना करना । 245 ऐसी रालश के लिए, जो िेय नि ं िो, 2 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कपिपूिगक डडक्री िोने िेना सिन करना या या जुमागना, या िोनों । मजजस् रेि । डडक्री का तु‍ ि कर हिए जाने के पश् चात ् यन‍ पाहित ककया जाना सिन करना । 246 न्यायािय में लमथ्या िािा । 2 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग और जुमागना । मजजस् रेि । 247 ऐसी रालश के लिए, जो िेय नि ं िै 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कपिपूिगक डडक्री अलभप्राप् त करना या या जुमागना, या िोनों । मजजस् रेि । डडक्री को तु‍ ि कर हिए जान े के पश् चात ् यन‍पाहित करिाना । 248(क) क्षयत करन े के आशय स े अपराध का लमथ्या 5 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग आरोप । या 2 िाख रुपए का मजजस् रेि । जुमागना, या िोनो । 248(ख) मत्ृ यु या आजीिन कारािास या िस िष,ग 10 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । सेशन या उससे अधधक के लिए कारािास स े और जुमागना । न्यायािय । िंडनीय ककसी अपराध के लमथ्या आरोप पर संजस्थत आपराधधक कायिग ाि ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 399 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 249(क) अपराधी को संश्रय िेना, यहि अपराध 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग मत्ृ यु से िंडनीय िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 249(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 249(ग) यहि 1 िष ग और न कक 10 िष ग के लिए, उस ि र्तग म अिधध की संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास से िंडनीय िै । एक-चौथाई का, और उस मजजस्रेि । भांयत का, जो उस अपराध के लिए उपबंधधत िै, कारािास, या जुमागना, या िोनों । 250(क) अपराधी को िंड से बचाने के लिए उपिार 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग आहि िेना, यहि अपराध मत्ृ यु से िंडनीय और जुमागना । मजजस्रेि । िै । 250(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 250(ग) यहि 10 िष ग से कम के लिए कारािास स े उस ि र्तग म अिधध की संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िंडनीय िै । एक-चौथाई का कारािास, मजजस्रेि । जो उस अपराध या जुमागना, या िोनों के लिए उपबंधधत िै । 251 (क) अपराधी को बचाने के प्रयतफिस्िरूप 7 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग उपिार की प्रस्थापना या सम्पवि का और जुमागना । मजजस्रेि । प्रत्याितनग , यहि अपराध मत्ृ यु से िंडनीय िै । 251(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के 3 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 251(ग) यहि 10 िष ग से कम के लिए कारािास स े उस ि र्तग म अिधध की असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िंडनीय िै । एक-चौथाई का कारािास, मजजस्रेि । जो उस अपराध या जुमागना, या िोनों के लिए उपबंधधत िै । 252 अपराधी को पक़ििाए बबना उस चि 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग सम्पवि को िापस कराने में सिायता या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । करन े के लिए उपिार िेना, जजससे कोई व्यजक् त अपराध द्िारा िंधचत कर हिया गया िै । 253 (क) ऐसे अपराधी को संश्रय िेना, जो अलभरक्षा 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग से यनकि भागा िै या जजसको पक़िने का और जुमागना । मजजस्रेि । आिेश हिया जा चुका िै, यहि अपराध मत्ृ यु से िंडनीय िै । 253(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के जुमागना सहित या रहित, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय िै । 3 िष ग के लिए मजजस्रेि । कारािास । 253(ग) यहि 1 िष ग के लिए, और न कक 10 िष ग उस ि र्तग म अिधध की संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग के लिए, कारािास से िंडनीय िै । एक-चौथाई का कारािास, मजजस्रेि । जो उस अपराध के लिए उपबंधधत िै या जुमागना, या िोनों ।40 0 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 254 िुिेरों या डाकुओ ं को संश्रय िेना । 7 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास, और जुमागना । मजजस्रेि । 255 िोक सेिक द्िारा ककसी व्यजक् त को िंड 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । से या ककसी सम्पवि को जब्ती से बचाने या जुमागना, या िोनों । के आशय से विधध के यनिेश की अिज्ञा । 256 ककसी व्यजक् त को िंड से या ककसी 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग सम्पवि को जब्ती स े बचाने के आशय स े या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । िोक सेिक द्िारा अशुद्ध अलभिेख या िेख की रचना । 257 ककसी न्याययक कायिग ाि में िोक सेिक 7 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग द्िारा ऐसा आिेश, ररपोिग, आहि या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । भ्र‍ ितापूिकग हिया जाना और सुनाया जाना, जो विधध के प्रयतकूि िै । 258 प्राधधकार िािे व्यजक् त द्िारा, जो यि 7 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जानता िै कक िि विधध के प्रयतकूि कायग या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । कर रिा िै, विचारण के लिए या परररोध करन े के लिए सुपुिगगी । 259(क) अपराधी को पक़िने के लिए विधध द्िारा जुमागना सहित या रहित, इसके अनुसार कक जमानतीय । प्रथम िग ग आबद्ध िोक सेिक द्िारा उसे पक़िने का 7 िष ग के लिए ऐसा अपराध, मजजस्रेि । साशय िोप, यहि अपराध मत्ृ यु से िंडनीय कारािास । जजसके संबंध में िै । ऐसा िोप िुआ िै, संज्ञेय िै या असंज्ञेय । 259 (ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के जुमागना सहित या रहित 3 संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय िै । िष ग के लिए कारािास । मजजस्रेि । 259(ग) यहि 10 िष ग से कम के लिए कारािास स े जुमागना सहित या रहित, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िंडनीय िै । 2 िष ग के लिए मजजस्रेि । कारािास । 260(क) न्यायािय के िंडािेश के अधीन व्यजक् त जुमागना सहित या रहित, संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन को पक़िने के लिए विधध द्िारा आबद्ध आजीिन कारािास, या न्यायािय । िोक सेिक द्िारा उसे पक़िने का साशय 14 िष ग के लिए िोप, यहि िि व्यजक् त मत्ृ यु के िंडािेश के कारािास । अधीन िै । 260(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िष ग या जुमागना सहित या रहित, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग उससे अधधक के कारािास के िंडािेश के 7 िष ग के लिए मजजस्रेि । अधीन िै । कारािास । 260(ग) यहि 10 िष ग स े कम के लिए कारािास के 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िंडािेश के अधीन िै या अलभरक्षा में रखे या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । जान े के लिए विधधपूिगक सुपुिग ककया गया िै । 261 िोक सेिक द्िारा उपेक्षा से परररोध में स े 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । यनकि भागना सिन करना । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 262 ककसी व्यजक् त द्िारा विधध के अनुसार 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । अपने पक़िे जाने में प्रयतरोध या बाधा । या जुमागना, या िोनों । 263(क) ककसी व्यजक् त के विधध के अनुसार पक़िे 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । जान े में प्रयतरोध या बाधा या विधधपूिकग या जुमागना, या िोनों । अलभरक्षा से उसे िु़िाना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 401 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 263(ख) यहि आजीिन कारािास या 10 िषग के 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग लिए कारािास से िंडनीय अपराध स े और जुमागना । मजजस्रेि । आरोवपत िो । 263(ग) यहि मत्ृ यु िंड से िंडनीय अपराध से 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग आरोवपत िै । और जुमागना । मजजस्रेि । 263(र्) यहि िि व्यजक् त आजीिन कारािास या 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग 10 िष ग या उससे अधधक के कारािास स े और जुमागना । मजजस्रेि । िंडाहि‍ ि िै । 263(ङ) यहि मत्ृ यु िंडािेश के अधीन िै । आजीिन कारािास या 10 संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन िष ग के लिए कारािास न्यायािय । और जुमागना । 264 उन िशाओं में जजनके लिए अन्यथा उपबंध नि ं िै िोक सेिक को पक़िने का िोप या यनकि भागना सिन करना— (क) जब िोप या सिन करना साशय िै, 3 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । (ख) जब िोप या सिन करना उपेक्षापूिकग 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । िै । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 265 उन िशाओं में, जजनके लिए अन्यथा 6 मास के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उपबंध नि ं िै, विधधपूिकग पक़िने में या जुमागना, या िोनों । प्रयतरोध या बाधा या यनकि भागना या िु़िाना । 266 िंड के पररिार की शत ग का अयतक्रमण । मूि िंडािेश का िंड या संज्ञेय । अजमानतीय । िि न्यायािय यहि िंड का भाग भोग जजसके द्िारा लिया गया िै, तो मूि अपराध अिलश‍ ि भाग । विचारणीय था । 267 न्याययक कायिग ाि के ककसी प्रक्रम में बैठे 6 मास के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । अध्याय 28 के िुए िोक सेिक का साशय अपमान या कारािास, या 5,000 रुपए उपबंधों के अधीन उसके काय ग में विघ् न । का जुमागना, या िोनों । रिते िुए, िि न्यायािय, जजसमें अपराध ककया गया िै ; या यहि ककसी न्यायािय में नि ं ककया गया िै, कोई मजजस्रेि । 268 असेसर का प्रयतरूपण 2 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग या जुमागना, या िोनो । मजजस्रेि । 269 जमानत पर या बंधपत्र पर िो़िे गए 1 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । व्यजक्त द्िारा न्यायािय में उपजस्थत िोने या जुमागना, या िोनो । में असफिता । 271 उपेक्षा से कोई ऐसा काय ग करना जजसके 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । बारे में ज्ञात िै कक उससे जीिन के लिए कारािास, या जुमागना, या संकिपूण ग ककसी रोग का संक्रम फैिना िोनों । संभाव्य िै । 272 पररद्िेष से ऐसा कोई काय ग करना जजसके 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । बारे में ज्ञात िै कक उससे जीिन के लिए या जुमागना, या िोनों । संकिपूण ग ककसी रोग का संक्रम फैिना संभाव्य िै ।40 2 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 273 ककसी संगरोधन के यनयम की जानते िुए 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । अिज्ञा । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 274 विक्रय के लिए आशययत खाद्य या पेय 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । का ऐसा अपलमश्रण, जजससे िि अपायकर कारािास, या 5,000 बन जाए । रुपए का जुमागना, या िोनों । 275 खाद्य और पेय के रूप में ककसी खाद्य 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । और पेय को, यि जानते िुए कक िि कारािास, या 5,000 अपायकर िै, बेचना । रुपए का जुमागना, या िोनों । 276 विक्रय के लिए आशययत औषधीय या 1 िष ग के लिए कारािास, असंज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । भेषजीय यनलमयगत का ऐसा अपलमश्रण या 5,000 रुपए का जजससे उसकी प्रभािकाररता कम िो जाए, जुमागना, या िोनों । कक्रया बिि जाए या िि िायनकर िो जाए । 277 अपलमधश्रत ओषधधयों का विक्रय । 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 278 जानते िुए ओषधध का लभन् न औषधध या 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । यनलमयगत के तौर पर विक्रय । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 279 िोक जि-स्रोत या जिाशय का जि 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । किुवषत करना । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 280 िायुमंडि को स्िास्थ्य के लिए िायनकर 1,000 रुपए का जुमागना । असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । बनाना । 281 िोक माग ग पर उताििेपन से िािन 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । चिाना या िांकना । कारािास, या 1,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 282 जियान का उताििेपन स े चिाना । 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 10,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 283 भ्रामक प्रकाश, धचह्न या बोये का 7 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग प्रिशनग । या जुमागने से, जो मजजस्रेि । 10,000 रुपए स े कम का नि ं िोगा । 284 असुरक्षक्षत या अयतभाररत जियान में 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । भा़िे के लिए जिमाग ग स े ककसी व्यजक् त कारािास, या 5,000 को िे जाना । रुपए का जुमागना, या िोनों । 285 ककसी िोक माग ग या नौपररििन-पथ में 5,000 रुपए का स ंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । संकि या बाधा काररत करना । जुमागना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 403 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 286 विषैि े पिाथ ग के संबंध में उपेक्षापूण ग 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आचरण । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 287 अज‍ न या ज्ििनशीि पिाथ ग के सम्बन्ध 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । में उपेक्षापूण ग आचरण । कारािास, या 2,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 288 विस्फोिक पिाथ ग के बारे में उपेक्षापूण ग 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आचरण । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 289 मशीनर के सम्बन्ध में उपेक्षापूण ग 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आचरण । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 290 ककसी भिन यनमाणग को धगराने, उसकी 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । मरम्मत करने या सजन्नमागण, आहि के कारािास, या 5,000 संबंध में उपेक्षापूण ग आचरण । रुपए का जुमागना, या िोनों । 291 जीि-जन्तु के संबंध में उपेक्षापूण ग 6 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आचरण । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 292 अन्यथा अनुपबजन्धत मामिों में िोक 1,000 रुपए का असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । न्यूसेन्स के लिए िण्ड । जुमागना । 293 न्यूसेंस बंि करन े के व्यािेश के पश् चात ् 6 मास के लिए सािा संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उसका चािू रखना । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनो । 294(2) अश् ि ि पुस्तकों, आहि का विक्रय, प्रथम िोषलसद्धध पर 2 संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आहि । िष ग के लिए कारािास और 5,000 रुपए का जुमागना, और द्वितीय या पश् चाति ् ती िोषलसद्धध पर, 5 िषग के लिए कारािास और 10,000 रुपए का जुमागना । 295 लशश ु को अश् ि ि िस्तुओ ं का विक्रय, प्रथम िोषलसद्धध पर संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । आहि । 3 िष ग के लिए कारािास और 2,000 रुपए का जमु ागना, और द्वितीय या पश् चात ि् ती िोषलसद्धध पर, 7 िष ग के लिए कारािास और 5,000 रुपए का जुमागना ।40 4 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 296 अश् ि ि काय ग और गान े । 3 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 1,000 रुपए का जुमागना, या िोनो । 297(1) िािर कायागिय रखना । 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 297(2) िािर संबंधी प्रस्थापनाओं का प्रकाशन । 5,000 रुपए का असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । जुमागना । 298 ककसी िग ग के धम ग का अपमान करन े के 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । आशय स े उपासना के स् थान को या जुमागना, या िोनों । अपवित्र, आहि करना । 299 विमलशतग और विद्िेषपूण ग काय,ग जो 3 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग ककसी िग ग के धम ग या धालमकग विश् िासों या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि । का अपमान करके उसकी धालमकग भािनाओं को आित करने के आशय स े ककए गए िों । 300 धालमकग जमाि में विघ्न करना । 1 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या जुमागना, या िोनों । 301 कबिस् तानों, आहि में अयतचार करना । 1 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । या जुमागना, या िोनों । 302 धालमकग भािनाओं को ठेस पिुंचाने के 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । विमलशतग आशय से, शब् ि, आहि कारािास, या जुमागना, या उच् चाररत करना । िोनों । 303(2) चोर । कठोर कारािास, जजसकी संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । अिधध 1 िष ग स े कम नि ं िोगी, ककन्तु जो पाचं िष ग तक िो सकेगी और जुमागनाा । उन मामिों में, जिां चोर की गई चोर की गई संपवि के असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । संपवि का मूल्य 5,000 रुपए से कम िापस करने पर या िै । संपवि को प्रत्याियततग करने पर उसे समुिाय सेिा से िंडडत ककया जाएगा । 304(2) झपिमार । 3 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । और जुमागना । 305 यनिास-गिृ , या यातायात के साधन या 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । पूजा स्थि, आहि में चोर । और जुमागना । 306 लिवपक या सेिक द्िारा स्िामी के या 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । यनयोक् ता के कब्जे की सम्पवि की और जुमागना । चोर । 307 चोर करने के लिए मत्ृ यु, उपियत या 10 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग अिरोध काररत करने की तैयार के कारािास, और जुमागना । मजजस्रेि । पश् चात ्चोर । 308(2) उद्िापन । 7 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग या जुमागना, या िोनों । मजजस्रेि ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 405 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 308(3) उद्िापन करन े के लिए क्षयत के भय म ें 2 िष ग के लिए कारािास, संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । डािना या डािने का प्रयत् न करना । या जुमागना, या िोनों । 308(4) उद्िापन करन े के लिए ककसी व्यजक् त 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग को मत्ृ यु या र्ोर उपियत के भय म ें और जुमागना । मजजस्रेि । डािना या डािने का प्रयत् न करना । 308(5) उद्िापन करन े के लिए ककसी व्यजक् त 10 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग को मत्ृ यु या र्ोर उपियत के भय म ें और जुमागना । मजजस्रेि । डािना । 308(6) उद्िापन करन े के लिए मत्ृ यु, आजीिन 10 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास, या 10 िष ग के लिए कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । से िंडनीय अपराध का अलभयोग िगान े की धमकी िेकर ककसी व्यजक्त को भय में डािना । 308(7) मत्ृ यु, आजीिन कारािास, या 10 िष ग 10 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग के लिए कारािास से िंडनीय अपराध का कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । अलभयोग िगान े की धमकी िेकर उद्िापन । 309(4) िूि 10 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । यहि िूि राजमाग ग पर सूयागस्त और 14 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग सूयोिय के बीच की जाए कारािास । मजजस्रेि । 309(5) िूि करने का प्रयत्न । 7 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । 309(6) उपियत काररत करना । आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग 10 िष ग के लिए कठोर मजजस्रेि । कारािास, और जुमागना । 310(2) डकैती । आजीिन कारािास या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन 10 िष ग के लिए कठोर न् यायािय । कारािास, और जुमागना । 310(3) डकैती में ित् या । मत्ृ यु, आजीिन संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन कारािास या 10 िष ग के न् यायािय । लिए कठोर कारािास और जुमागना । 310(4) डकैती करन े के लिए तैयार करना । 10 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय कारािास और जुमागना । 310(5) डकैती करन े के प्रयोजन के लिए एकबत्रत 7 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन पांच या अधधक व्यजक् तयों में से एक कारािास और जुमागना। न् यायािय । िोना । 310(6) अभ्यासत: डकैती करन े के प्रयोजन स े आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन सियुक् त व्यजक्त यों की िोि का िोना । 10 िष ग के लिए कठोर न् यायािय । कारािास और जुमागना ।40 6 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 311 मत्ृ यु या र्ोर उपियत काररत करने के 7 िष ग से अनधधक के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । प्रयत्न के साथ िूि या डकैती । लिए कारािास । 312 र्ातक आयुध से सजज्जत िोकर िूि या 7 िष ग से अनधधक के संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन डकैती करन े का प्रयत् न । लिए कारािास । न् यायािय । 313 अभ्यासत: चोर करने के लिए सियुक् त 7 िष ग के लिए कठोर संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग व्यजक् तयों की र्ूमती-कफरती िोि का कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । िोना । 314 चि संपवि का बेईमानी से िवुियगनयोग या कारािास से, जजसकी असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उसे अपने उपयोग के लिए संपररियततग अिधध 6 मास से कम कर िेना । की नि ं िोगी, ककंतु जो 2 िष ग तक की िो सकेगी और जुमागना । 315 ऐसी सम्पवि का बेईमानी स े िवुियगनयोग, 3 िष ग के लिए कारािास असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जो मतृ व्यजक् त की मत्ृ यु के समय और जुमागना । मजजस्रेि । उसके कब्जे में थी । यहि मतृ व्यजक्त द्िारा यनयोजजत 7 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग लिवपक या व्यजक्त द्िारा । कारािास । मजजस्रेि । 316(2) आपराधधक न्यास-भंग । 5 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 316(3) िािक, र्ाििाि, आहि द्िारा आपराधधक 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग न्यास-भंग । कारािास और मजजस्रेि । जुमागना । 316(4) लिवपक या सेिक द्िारा आपराधधक 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग न्यास-भंग । कारािास और मजजस्रेि । जुमागना । 316(5) िोक सेिक द्िारा या बकैं कार, व्यापार आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग या अलभकताग, आहि द्िारा आपराधधक 10 िष ग के लिए मजजस्रेि । न्यास-भंग । कारािास और जुमागना । 317(2) चुराई िुई संपवि को उसे चुराई िुई जानते 3 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । िुए बेईमानी से प्राप् त करना । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 317(3) चुराई िुई सम्पवि को यि जानते िुए कक आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । िि डकैती द्िारा प्राप् त की गई थी, 10 िष ग के लिए कठोर बेईमानी से प्राप्त करना । कारािास और जुमागना । 317(4) चुराई िुई सम्पवि का अभ्यासत: व्यापार आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । करना । 10 िष ग के लिए कारािास और जुमागना । 317(5) चुराई िुई सम्पवि को, यि जानते िुए कक 3 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । िि चुराई िुई िै, यिपाने में या व्यययनत कारािास, या जुमागना, करन े में सिायता करना । या िोनों । 318(2) िि । 3 िष ग के लिए अंसज्ञेय । जमानतीय । कोई कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 407 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 318(3) उस व्यजक् त से िि करना जजसका हित 5 िष ग के लिए अंसज्ञेय । जमानतीय । कोई संरक्षक्षत रखन े के लिए अपराधी या तो कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । विधध द्िारा या विधधक संवििा द्िारा या िोनों । आबद्ध था । 318(4) िि और बेईमानी से संपवि के पररिान 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग के लिए उत्प्रेररत करना । कारािास, और मजजस्रेि। जुमागना । 319(2) प्रयतरूपण द्िारा िि । 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि। कारािास, या जुमागने से या िोनों से । 320 िेनिारों में वितरण यनिाररत करने के कारािास से, जजसकी असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । लिए संपवि का कपिपूिकग अपसारण या अिधध 6 मास स े कम यिपाना । की नि ं िोगी ककंतु जो 2 िष ग तक की िो सकेगी, या जुमागने, या िोनों । 321 अपराधी का िेय ऋण और मांग को 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि। उनके िेनिारों के लिए उपिब्ध िोन े स े कारािास, या जुमागना, बेईमानी स े या कपिपूिकग यनिाररत या िोनों । करना । 322 अंतरण के ऐसे िेख का, जजसमें 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि। प्रयतफि के संबंध में लमथ्या कथन कारािास, या अंतवि‍ग ि िै, बेईमानी से या कपिपिू कग जुमागना, या िोनों । यन‍पािन। 323 कपिपूिकग अपनी या ककसी अन्य 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । व्यजक् त की सम्पवि को यिपाना या कारािास, या अपसाररत करना, या उसके यिपाए जाने जुमागना, या िोनों । में या अपसाररत ककए जान े में कपिपूिकग सिायता करना, या बेईमानी से ककसी ऐसी मांग या िाि े का, जजसका िि िकिार िै, िो़ि िेना । 324(2) ररज‍ि । 6 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि। कारािास या जुमागना, या िोनों । 324(3) कोई संपवि जजसमें सरकार या स्थानीय 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । प्राधधकार की संपवि सजम्मलित िै की कारािास, या जुमागना, िायन या नुकसान काररत करने द्िारा या िोनों । ररज‍ि । 324(4) ररज‍ि जजसस े पच्चीस िजार रुपए की 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । ककंतु 2 िाख रुपए से कम की िायन या कारािास, या जुमागना, नुकसान िोता िै । या िोनों । 324(5) ररज‍ ि, जजसस े एक िाख रुपए या इसस े 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग अधधक की िायन या नुकसान िोता िै । कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 324(6) ककसी व्यजक्त की मत्ृ यु या उसे उपियत 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग या उसका सिोष अिरोध काररत करने कारािास और मजजस्रेि । की या मत्ृ यु का, या उपियत का, या जुमागना । सिोष अिरोध का भय काररत करने की तैयार करके ररज‍ि ।40 8 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 325 ककसी जीि-जन्त ु को िध करन,े विकिांग 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग करन े के द्िारा ररज‍ ि । कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 326(क) कृवषक प्रयोजनों, आहि के लिए जि 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग प्रिाय में कमी काररत करन े द्िारा कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । ररज‍ ि । या िोनों । 326(ख) िोक स़िक, पिु , नाव्य नि या नाव्य 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जि सरणी को क्षयत पिुंचान े और उसे कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । यात्रा या संपवि ि े जान े के लिए अगम्य या िोनों । या कम यनरापि बना िेने द्िारा ररज‍ ि । 326(ग) िोक जियनकास में नुकसानप्रि 5 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जिप्िािन या बाधा काररत करन े द्िारा कारािास या जुमागना मजजस्रेि । ररज‍ ि । या िोनों । 326(र्) ककसी ि पगिृ या समुद्र धचह्न को न‍ ि 7 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग करन े या ििाने या कम उपयोगी बनाने कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या ककसी लमथ्या प्रकाश को प्रिलशतग या िोनों । करन े द्िारा ररज‍ ि । 326(ङ) िोक प्राधधकार द्िारा िगाए गए भलूम 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई धचह्न को न‍ ि करन े या ििाने, आहि कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । द्िारा ररज‍ ि । या िोनों । 326(च) नुकसान काररत करने के आशय स े 7 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग अज‍ न या विस्फोिक पिाथ ग द्िारा कारािास और मजजस्रेि । ररज‍ ि । जुमागना । 326(ि) गिृ , आहि को न‍ ि करन े के आशय स े आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । अज‍ न या विस्फोिक पिाथ ग द्िारा 10 िष ग के लिए ररज‍ ि । कारािास और जुमागना । 327(1) तल्िायुक् त या 20 िन बोझ िािे 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । जियान को न‍ ि करन े या अक्षेमकर कारािास और बनान े के आशय से ररज‍ ि । जुमागना । 327(2) वपिि धारा में िर्णतग ररज‍ ि जब अज‍ न आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । या ककसी विस्फोिक पिाथ ग द्िारा की 10 िष ग के लिए गई िो । कारािास और जुमागना । 328 चोर , आहि करन े के आशय से जियान 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । को चिाना । कारािास और जुमागना । 329(3) आपराधधक अयतचार । 3 मास के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 329(4) गिृ -अयतचार । 1 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या 5,000 रुपए का जुमागना, या िोनों । 331(1) प्रच्िन् न गिृ -अयतचार या गिृ -भेिन । 2 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास और जुमागना।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 409 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 331(2) रात्रौ प्रच्िन् न गिृ -अयतचार या रात्रौ गिृ - 3 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । भेिन । कारािास और जुमागना । 331(3) कारािास से िंडनीय अपराध करने के 3 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । लिए प्रच्िन् न गिृ -अयतचार या क ार ा ि ास और गिृ -भेिन । जुमागना । यहि िि अपराध चोर िै । 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कारािास । मजजस्रेि । 331(4) कारािास से िंडनीय अपराध करने के 5 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । लिए रात्रौ प्रच्िन् न गिृ -अयतचार या रात्रौ और जुमागना । गिृ -भेिन । यहि िि अपराध चोर िै । 14 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कारािास । मजजस्रेि । 331(5) उपियत काररत करने, िमिा, आहि की 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग तैयार के पश् चात ् प्रच्िन् न गिृ -अयतचार कारािास और जुमागना । मजजस्रेि । या गिृ -भेिन । 331(6) उपियत काररत करने, आहि की तैयार के 14 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग पश् चात ् रात्रौ प्रच्िन् न गिृ -अयतचार या कारािास और जुमागना मजजस्रेि । रात्रौ गिृ -भेिन । 331(7) प्रच्िन् न गिृ -अयतचार या गिृ -भेिन करते आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । समय काररत र्ोर उपियत । 10 िष ग के लिए कारािास और जुमागना । 331(8) रात्रौ गिृ -भेिन, आहि में संयुक्त त: आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । सम्पक्ृ त समस्त व्यजक् तयों में स े एक 10 िष ग के लिए द्िारा काररत मत्ृ यु या र्ोर उपियत । कारािास और जुमागना । 332(क) मत्ृ यु से िंडनीय अपराध को करने के आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । लिए गिृ -अयतचार । 10 िष ग के लिए कठोर कारािास और जुमागना । 332(ख) आजीिन कारािास से िंडनीय अपराध को 10 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । सेशन न्यायािय । करन े के लिए गिृ -अयतचार । कारािास और जुमागना । 332(ग) कारािास से िंडनीय अपराध को करने के 2 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । लिए गिृ -अयतचार । कारािास । यहि िि अपराध चोर िै । 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास । 333 उपियत काररत करने, िमिा करन,े आहि 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । की तैयार के पश् चात ्गिृ -अयतचार । कारािास और जुमागना । 334(1) ऐस े बंि पात्र को, जजसमें सम्पवि िै या 2 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस् रेि । समझी जाती िै, बईे मानी से तो़ि कर कारािास, या जुमागना, खोिना या उद्बधंधत करना । या िोनों । 334(2) ऐस े बंि पात्र को, जजसमें सम्पवि िै या 3 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । समझी जाती िै, न्यस्त ककए जान े पर कारािास, या जुमागना, कपिपूिकग खोिना । या िोनों ।41 0 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 336(2) कूिरचना । 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 336(3) िि के प्रयोजन के लिए कूिरचना । 7 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग कारािास और मजजस्रेि । जुमागना । 336(4) ककसी व्यजक् त की खयायत को अपिायन 3 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग पिुंचाने के प्रयोजन स े या यि संभाव्य कारािास और मजजस्रेि । जानते िुए कक इस प्रयोजन से उसका जुमागना । उपयोग ककया जाएगा, की गई कूिरचना । 337 न्यायािय के अलभिेख या जन्मों के 7 िष ग के लिए असंज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग रजजस्िर, आहि की, जो िोक सिे क कारािास, या जुमागना । मजजस्रेि । द्िारा रखा जाता िै, कूिरचना । 338 मूल्यिान प्रयतभूयत, विि या ककसी आजीिन कारािास, या असंज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग मूल्यिान प्रयतभूयत की रचना या अन्तरण 10 िष ग के लिए मजजस्रेि । के प्राधधकार, या ककसी धन, आहि को कारािास और प्राप् त करन े के प्राधधकार की कूिरचना । जुमागना । जब मूल्यिान प्रयतभयूत केंद्र य सरकार आजीिन कारािास, या संज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग का िचनपत्र िै । 10 िष ग के लिए मजजस्रेि । कारािास और जुमागना । 339 ककसी िस्तािेज को, उस े कूिरधचत 7 िष ग के लिए कारािास संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जानते िुए इस आशय स े कक उसे और जुमागना । मजजस्रेि । असि के रूप में उपयोग में िाया जाए अपन े कब्ज े में रखना, यहि िि िस्तािेज धारा 337 में िर्णतग भांयत का िो । यहि िि धारा 338 में िर्णतग भांयत का आजीिन कारािास, या असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग िो । 7 िष ग के लिए कारािास मजजस्रेि । और जुमागना । 340(2) कूिरधचत िस्तािेज को यि जानते िुए ऐसे िस्तािेज की संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कक िि कूिरधचत िै असि के रूप में कूिरचना के लिए िंड । मजजस्रेि । उपयोग में िाना । 341(1) धारा 338 के अधीन िंडनीय कूिरचना आजीिन कारािास, या संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग करन े के आशय से, मुद्रा, पट्ि , आहि 7 िष ग के लिए मजजस्रेि । बनाना या उनकी कूिकृयत तैयार करना कारािास और या ककसी ऐसी मुद्रा, पट्ि , आहि को, जुमागना । उसे कूिकृत जानत े िुए, िैस े आशय स े अपन े कब्जे में रखना । 341(2) धारा 338 के अधीन अन्यथा िंडनीय 7 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कूिरचना करन े के आशय से, मद्रु ा, कारािास और मजजस्रेि । पट्ि , आहि बनाना या उनकी कूिकृयत जुमागना । करना या ककसी ऐसी मुद्रा, पट्ि , आहि को, उसे कूिकृत जानते िुए, िैस े आशय से अपन े कब्जे में रखना ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 411 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 341(3) ककसी मुद्रा, पट्ि या अन्य लिखत को 3 िष ग के लिए संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कूिकृत जानते िुए कब्जे में रखना । कारािास और मजजस्रेि । जुमागना । 341(4) ककसी मुद्रा, पट्ि या अन्य लिखत को िि उसी प्रकार िंडडत संज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जानते िुए या विश्िास करने का कारण िोगा, मानो उसन े ऐसी मजजस्रेि । रखत े िुए कक िि कूिकृत िै, कपिपिू कग मुद्रा, पट्ि या अन्य या बेईमानी से असि के रूप में लिखत को कूिकृत उपयोग में िाना । ककया िै । 342(1) धारा 338 में िर्णतग िस्तािेजों के आजीिन कारािास, या असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग अधधप्रमाणीकरण के लिए उपयोग में िाई 7 िष ग के लिए मजजस्रेि । जान े िाि अलभिक्षणा या धचह्न की कारािास और जुमागना कूिकृयत बनाना या कूिकृत धचह्न युक् त पिाथ ग को कब्जे में रखना । 342(2) धारा 338 में िर्णतग िस्तािेजों से लभन् न 7 िष ग के लिए असंज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग िस्तािेजों के अधधप्रमाणीकरण के लिए कारािास और मजजस्रेि । उपयोग में िाई जाने िाि अलभिक्षणा जुमागना । या धचह्न की कूिकृयत बनाना या कूिकृत धचह्न युक् त पिाथ ग को कब्जे म ें रखना । 343 विि, आहि को कपिपूिकग न‍ ि या आजीिन कारािास या असंज्ञेय । अजमानतीय । प्रथम िग ग विरूवपत करना या उसे न‍ ि या विरूवपत 7 िष ग के लिए मजजस्रेि । करन े का प्रयत् न करना, या यिपाना । कारािास और जुमागना । 344 िेखों का लमथ्याकरण । 7 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 345(3) लमथ्या सम्पवि धचह्न का इस आशय स े 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उपयोग करना कक ककसी व्यजक् त को कारािास, या जुमागना, प्रिंधचत करे या क्षयत करे । या िोनों । 346 क्षयत काररत करन े के आशय से ककसी 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । सम्पवि धचह्न को लमिाना, न‍ ि करना कारािास, या जुमागना, या विरूवपत करना । या िोनों । 347(1) अन्य व्यजक् त द्िारा उपयोग में िाए गए 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई सम्पवि धचह्न का इस आशय स े कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । कूिकरण कक नुकसान या क्षयत काररत या िोनों । िो । 347(2) िोक सेिक द्िारा उपयोग में िाए गए 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग सम्पवि धचह्न का या ककसी सम्पवि के कारािास और मजजस्रेि । वियनमागण, क् िालिि आहि का द्योतन जुमागना । करन े िािे ककसी धचह्न का, जो िोक सेिक द्िारा उपयोग में िाया जाता िो, कूिकरण । 348 ककसी िोक या प्राइिेि सम्पवि धचह्न के 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कूिकरण के लिए कोई डाई, पट्ि , या कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । अन्य उपकरण कपिपूिकग बनाना या या िोनों । अपने कब्जे में रखना । 349 कूिकृत सम्पवि धचह्न से धचजह्नत माि 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । का जानते िुए विक्रय । कारािास, या जुमागना, या िोनों ।41 2 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (1) (2) (3) (4) (5) (6) 350(1) ककसी पैकेज या पात्र पर, जजसमें माि 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । रखा िुआ िो, इस आशय से लमथ्या कारािास, या जुमागना, धचह्न कपिपूिकग बनाना कक यि या िोनों । विश् िास काररत िो जाए कक उसमें ऐसा माि िै, जो उसमें नि ं िै, आहि । 350(2) ककसी ऐसे लमथ्या धचह्न का उपयोग 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । करना । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 351(2) आपराधधक अलभत्रास । 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 351(3) यहि धमकी, मत्ृ यु या र्ोर उपियत 7 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग काररत करन,े आहि की िो । कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । या िोनों । 351(4) अनाम संसूचना द्िारा या िि धमकी धारा 351(1) के अधीन असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग किां स े आती िै उसके यिपान े की िंड के अयतररक्त , 2 िष ग मजजस्रेि । पूिागिधानी करके ककया गया आपराधधक के लिए कारािास । अलभत्रास । 352 िोक-शांयत भंग कराने को प्रकोवपत करने 2 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । के आशय से अपमान । कारािास, या जुमागना, या िोनों । 353(1) लमथ्या कथन, जनश्रुयत, आहि को इस 3 िष ग के लिए असंज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । आशय से पररचालित करना कक विद्रोि िो कारािास, या जुमागना, या िोक-शाजन्त के विरुद्ध अपराध िो । या िोनों । 353(2) लमथ्या कथन, जनश्रुयत, आहि इस आशय 3 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । से कक विलभन् न िगों के बीच शत्रुता, र्णृ ा कारािास, या जुमागना, या िैमनस्य पैिा िो । या िोनों । 353(3) पूजा के स्थान, आहि में ककया गया 5 िष ग के लिए संज्ञेय । अजमानतीय । कोई मजजस्रेि । लमथ्या कथन, जनश्रुयत, आहि इस कारािास और आशय स े कक शत्रतु ा, र्णृ ा या िैमनस्य जुमागना । पैिा िो । 354 व्यजक् त को यि विश् िास करन े के लिए 1 िष ग के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । उत् प्ररेरत करके कक िि िैिी अप्रसाि का कारािास, या जुमागना, भाजन िोगा, कराया गया काय ग । या िोनों । 355 मिता की िाित में िोक स्थान, आहि 24 र्ंिे के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस्रेि । में प्रिशे करना और ककसी व्यजक्त को कारािास, या 1000 क्षोभ काररत करना । रुपए का जुमागना, या िोनों या िोनों या सामुिाययक सेिा । 356(2) रा‍ रपयत या उपरा‍ रपयत या राज्य के 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । सेशन न्यायािय । राज्यपाि या संर् राज्यक्षेत्र के प्रशासक कारािास, या जुमागना, या मंत्री के विरुद्ध मानिायन जो उसके या िोनों या सामुिाययक िोककृत्यों के यनििग न में उसके आचरण सेिा । के बारे में िो, जब िोक अलभयोजक न े पररिाि संजस्थत ककया िो । ककसी अन्य मामिे में मानिायन । 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग कारािास या जुमागना मजजस्रेि । या िोनो या सामुिाययक सेिा ।अ नुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 413 (1) (2) (3) (4) (5) (6) 356(3) रा‍ रपयत या उपरा‍ रपयत या राज्य के 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । सेशन न्यायािय । राज्यपाि या संर् राज्यक्षेत्र के प्रशासक कारािास, या जुमागना, या मंत्री के विरुद्ध मानिायनकारक या िोनों । जानते िुए ऐसी बात को मुहद्रत या उत्कीण ग करना जो उसके िोककृत्यों के यनििग न में उसके आचरण के बारे में िो, जब िोक अलभयोजक न े पररिाि संजस्थत ककया िो । ककसी अन्य मामिे में मानिायनकारक 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग जानते िुए, ककसी बात को मुहद्रत या कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । उत्कीण ग करना । या िोनों । 356(4) मानिायनकारक विषय अन्तवि‍ग ि रखन े 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । सेशन न्यायािय । िािे मुहद्रत या उत्कीण ग पिाथ ग का, यि कारािास, या जुमागना, जानते िुए विक्रय कक उसमें रा‍ रपयत या िोनों । या उपरा‍ रपयत या राज्य के राज्यपाि या संर् राज्यक्षेत्र के प्रशासक या मत्रं ी के विरुद्ध उसके िोककृत्यों के यनििग न में उसके आचरण के बारे में ऐसा विषय अंतवि‍ग ि िै, जब िोक अलभयोजक न े पररिाि संजस्थत ककया िो । ककसी अन्य मामिे में मानिायनकारक 2 िष ग के लिए सािा असंज्ञेय । जमानतीय । प्रथम िग ग बात को अंतवि‍ग ि रखने िािे मुहद्रत या कारािास, या जुमागना, मजजस्रेि । उत्कीण ग पिाथ ग का यि जानते िुए विक्रय या िोनों । कक उसमें ऐसा विषय अंतवि‍ग ि िै । 357 ककशोरािस् था या धचिविकृयत या रोग के 3 मास के लिए असंज्ञेय । जमानतीय । कोई मजजस् रेि । कारण असिाय व् यजक्त की पररचयाग कारािास या 5,000 करने या उसकी आिश् यकताओ ं की पूयत ग रुपए का जुमागना या करने के लिए आबद्ध िोते िुए उस े िोनों । करने का स् िच्े िया िोप । II—अन्य ववधधयों के ववरुद्ध अपराधों का वर्गीकरण अपराध संज्ञेय या असंज्ञेय जमानतीय या अजमानतीय न्यायािय द्िारा विचारणीय िै । 1 2 3 4 यहि मत्ृ य,ु आजीिन कारािास या 7 िष ग स े अधधक के संज्ञेय अजमानतीय सेशन लिए कारािास स े िंडनीय िै । न्यायािय । यहि 3 िष ग और उसस े अधधक ककंत ु 7 िष ग स े संज्ञेय अजमानतीय प्रथम िग ग मजजस्रेि । अनधधक के लिए कारािास से िंडनीय िै । यहि 3 िष ग स े कम के लिए कारािास या केिि असंज्ञेय जमानतीय कोई मजजस्रेि । जुमागने स े िंडनीय िै ।414 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— द्वितीय अनुसूची (धारा 522 दद्वे िए) प्ररूप संखया 1 पुललस‍के‍समक्ष‍उपस्स्ित‍सूचना‍िोने‍के‍ललए‍सूचना [धारा‍35‍(3)‍देखिए] पुलिस थाना......... क्रम सं........ प्रेवषती,— .......................... (अलभयुक्् त / सूचना प्राप्तकताग का नाम) ........................... (अंयतम ज्ञात पता) ......................... [(िरू भाष स.ं/ई मेि पता (यहि कोई िो )] भारतीय नागररक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 की उपधारा (3) के अनुसरण में, म ैं आपको सूधचत करता िूूँ............... पुलिस थाने पर रजजस्र कृत धारा............... के अधीन प्रथम सूचना ररपोिग/मामिा सं. ........... तार ख ............ के अन्िेषण के िौरान, यि प्रकि िुआ िै कक ितमग ान अन्िेषण के संबंध में आपसे तथ्यों और पररजस्थयतयों को अलभयनजश्चत करने के लिए, आपस े प्रश्न पूिने के लिए युजक्तयुक्त आधार िै । अतः आपको................. पूिागह्न/अपराह्न तार ख............................................ को................................................. पर मेरे समक्ष प्रस्तुत िोने के लिए यनिेलशत ककया जाता िै । पुलिस थाना भारसाधक अधधकार का नाम और पिनाम (मोिर)अनुभा ग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 415 प्ररूप सं० 2 अलभयुक्‍त व्यस्क्‍त को समन (धारा 63 देखिए) प्रेवषती— ………………………………………….(अलभयुक् त का नाम और पता) ...…………………………………(आरोवपत अपराध संक्षेप में लिर्खए) के आरोप का उिर िेने के लिए आपका उपजस्थत िोना आिश्यक िै, इसलिए आपसे अपेक्षा की जाती िै कक आप स्ियं (या अधधिक्ता द्िारा) ……………………………………….के……………………(मजजस्रेि) के समक्ष तार ख………………….को उपजस्थत िों । इसमें चूक नि ं िोनी चाहिए । तार ख……………….. (न्यायािय की मुद्रा) (िस्ताक्षर) ________416 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— प्ररूप सं० 3 धर्गरफ्तारी का वारंट (धारा 72 देखिए) प्रेवषती— ............................. (उस व्यजक् त का या उन व्यजक् तयों के नाम और पिनाम जजसे या जजन्िें िारंि यन‍पाहित करना िै) ...........................................................(पता) के............................................... (अलभयुक् त का नाम) पर ...............................................................(अपराध लिर्खए) के अपराध का आरोप िै; इसलिए आपको इसके द्िारा यनिेश हिया जाता िै कक आप उक् त............................................... को धगरफ्तार करें और मेरे समक्ष प्रस्तुत करें । इसमें चूक नि ं िोनी चाहिए । तार ख.......................... (न्यायािय की मुद्रा) (िस्ताक्षर) (धारा 73 देखिए) यि िारंि यनम् नलिर्खत रूप से प‍ृ ठांककत ककया जा सकेगा :— यहि उक् त ....................................तार ख...................................…को मेरे समक्ष उपजस्थत िोने के लिए और जब तक मेरे द्िारा अन्यथा यनिेश न हिया जाए ऐसे उपजस्थत िोत े रिने के लिए स्ियं ………..........................रुपए की रालश की जमानत.........................रुपए की रालश के एक प्रयतभू सहित (या िो प्रयतभुओं सहित, जजनमें से प्रत्येक …….........................रुपए की रालश का िोगा) िे िे तो उसे िो़िा जा सकता िै । तार ख ......................... (न्यायािय की मुद्रा) (िस्ताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 417 प्ररूप सं० 4 वारंट के अधीन गिरफ्तारी के पश्‍चात ्बंधपत्र और जमानतपत्र (धारा 83 देखिए) म.ैं.......................................................(नाम) जो कक......................................................(पता) का ह ं, .....................................के आरोप का उत्तर देने के लिए उपस्थित होने के लिए मुझे वििश करन े के लिए जारी ककए गए िारंट के अधीन .........................................के स्जिा मस्जथरेट (या यिास्थितत) के समक्ष िाए जाने पर इसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक उक् त आरोप का उत्तर देने के लिए म ैं अगिी तारीख.........................को.........................के न्यायािय में उपस्थित होऊंगा, और जब तक कक न्यायािय द्िारा अन्यिा तनदेश न ददया जाए तब तक ऐसे उपस्थित होता रह ंगा; तिा म ैं अपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें मनैं े कोई च क की तो मेरी .........................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ......................... (हथताक्षर) ......................................................................(पता) के उक् त ...........................................(नाम) के लिए म ैंअपन ेको इसके द्िारा इस बात के लिए प्रततभ घोवित करता ह ं कक िह उस आरोप का उत्तर देने के लिए, स्जसके लिए कक िह गगरफ्तार ककया गया है, अगिी तारीख.........................को.................................................के न्यायािय में…………………................................... के समक्ष उपस्थित होगा, और जब तक न्यायािय द्िारा अन्यिा तनदेश न ददया जाए, ऐस ेउपस्थित होता रहेगा, और म ैंअपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें उसने कोई च क की तो मेरी ......................... रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ......................... (हथताक्षर) ________418 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— प्ररूप सं० 5 अभियुक्‍त व्यक्क्‍त की उपक्थितत की अपेक्षा करने वाली उद‍घोषणा (धारा 84 देखिए) मेरे समक्ष पररिाद ककया गया है कक .......................................(नाम, िणनण और पता) ने भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा ....................................................................................................... के अधीन दंडनीय,...........................................................................का अपराध ककया है (या संदेह है कक उसने ककया है), और उस पर जारी ककए गए गगरफ्तारी के िारंट को यह लिखकर िौटा ददया गया है कक उक् त .........................(नाम) लमि नहीं रहा है, और मुझे समाधानप्रद रूप में यह दलशतण कर ददया गया है कक उक् त.........................(नाम) फरार हो गया है (या उक् त िारंट की तामीि स ेबचन ेके लिए अपने आपको तिपा रहा है) ; इसलिए इसके द्िारा उद्घ ोिणा की जाती है कक……………………………………….………….के उक् त ..........................................................................स े अपेक्षा की जाती है कक िह इस न्यायािय के समक्ष (या मेरे समक्ष) उक् त पररिाद का उत्तर देने के लिए ......................... (थिान) में तारीख......................को उपस्थित हो । तारीख ......................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 419 प्ररूप सं० 6 साक्षी की उपक्थितत की अपेक्षा करने वाली उद‍घोषणा (धारा 84, धारा 90 और धारा 93 देखिए) मेरे समक्ष पररिाद ककया गया है कक ..................................................................(नाम, िणनण और पता) ने ...........................................................................(अपराध का संक्षेप में िणनण कीस्जए) का अपराध ककया है (या संदेह है कक उसने ककया है) और उक् त पररिाद के वििय के बारे में परीक्षा की जाने के लिए इस न्यायािय के समक्ष उपस्थित होने के लिए .........................(साक्षी का नाम, िणनण और पता) को वििश करन े के लिए िारंट जारी ककया जा चुका है, तिा उक् त िारंट को यह लिखकर िौटा ददया गया है कक उक् त .........................(साक्षी का नाम) पर उसकी तामीि नहीं की जा सकती, और मुझे समाधानप्रद रूप में यह दलशतण कर ददया गया है कक िह फरार हो गया है (या उक् त िारंट की तामीि से बचने के लिए अपने आपको तिपा रहा है) ; इसलिए इसके द्िारा उद्घ ोिणा की जाती है कक उक् त ......................(नाम) से अपेक्षा की जाती है कक िह .........................के उस अपराध के बारे में स्जसका पररिाद ककया गया है परीक्षा की जाने के लिए तारीख .................................................को ...................बजे ....................(थिान) में .................... के न्यायािय के समक्ष उपस्थित हो । तारीख ......................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________420 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 7 साक्षी को उपक्थित होने के भलए वववश करने के भलए कुकी का आदेश (धारा 85 देखिए) प्रेविती— .........................के पुलिस िाने का भारसाधक अगधकारी इस न्यायािय के समक्ष विचाराधीन पररिाद के बारे में अलभसाक्ष्य देने के लिए उपस्थित होने के लिए..................................................(नाम, िणनण और पता) को वििश करन े के लिए िारंट सम्यक् रूप से तनकािा जा चुका है और उक्त िारंट यह लिखकर िौटा ददया गया है कक उसकी तामीि नहीं की जा सकती ; और मुझे समाधानप्रद रूप में यह दलशतण कर ददया गया है कक िह फरार हो गया है (या‍ उक् त िारंट की तामीि स ेबचने के लिए अपने आपको तिपा रहा है), और उस पर उक् त .........................(नाम) से यह अपेक्षा करन े िािी उद्घ ोिणा सम्यक् रूप से जारी और प्रकालशत की जा चुकी है या की जा रही है कक िह उसमें उस्लिखखत समय और थिान पर उपस्थित हो और साक्ष्य दे ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक.........................स्जिे के भीतर उक् त .........................की.........................रुपए तक की कीमत की जो चि संपवत्त आपको लमिे उसे आप अलभग्रहण द्िारा कुकण कर िें और उक् त संपवत्त को इस न्यायािय का आगे और कोई आदेश होने तक कुकण रखें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ......................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 421 प्ररूप सं० 8 अभियुक्‍त व्यक्क्‍त को उपक्थित होने के भलए वववश करने के भलए कुकी का आदेश (धारा 85 देखिए) प्रेविती— .................................................(उस व्यस्क् त का या उन व्यस्क् तयों के नाम और पदनाम स्जसे या स्जन्हें िारंट तनष्पाददत करना है) मेरे समक्ष पररिाद ककया गया है कक..........................................(नाम, िणनण और पता) ने भारतीय न्याय संदहता 2023 की धारा.............................के अधीन दंडनीय .............................का अपराध ककया है (या संदेह है कक उसने ककया है), और उस पर जारी ककए गए गगरफ्तारी के िारंट को यह लिखकर िौटा ददया गया है कक उक् त.............................(नाम) लमि नहीं रहा है और मुझे समाधानप्रद रूप में यह दलशतण कर ददया गया है कक उक् त.............................(नाम) फरार हो गया है (या उक् त िारंट की तामीि से बचन ेके लिए अपने आपको तिपा रहा है) और उस पर उक् त.............................से यह अपेक्षा करन े िािी उद्घ ोिणा सम्यक् रूप से जारी और प्रकालशत की जा चुकी है या की जा रही है कक िह.........................ददन के भीतर उक् त आरोप का उत्तर देने के लिए उपस्थित हो ; तिा .............................स्जिे में.............................ग्राम (या नगर) में सरकार को राजथिदायी भ लम से लभन्न तनम् नलिखखत संपवत्त अिाणत.्..............उक् त................के कब्जे में है और उसकी कुकी के लिए आदेश ककया जा चुका है ; इसलिए आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त संपवत्त को धारा 85 की उपधारा (3) के खंड (क) या खंड (ग) या दोनों* में वितनददणष् ट रीतत से कुकण कर िें और उस ेइस न्यायािय का आगे और कोई आदेश होने तक कुकण रखें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करके इसे िौटा दें । तारीख ......................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) *संिग्न की गई संपवत्त की प्रकृतत के आधार पर, जो िाग न हों उस े काट दें । ________422 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 9 जिला मजिस्ट्रेट या कलक्टर के द्वारा कुकी ककया िाना प्राजिकृत करन ेके जलए आदशे (िारा 85 दजे िए) प्रेजिती— .........................................................जिले का जिला मजिस्ट्रेट/कलक्टर मेरे समक्ष पररवाद ककया गया ह ैकक.........................(नाम, वर्णन और पता) ने भारतीय न्याय संदहता, 2023 की िारा.......के अिीन दंडनीय.............................का अपराि ककया ह ै(या संदेह है कक उसने ककया ह)ै , और उस पर िारी ककए गए जगरफ्तारी के वारंट को यह जलिकर लौटा कदया गया ह ैकक उक्‍त.............................(नाम) जमल नहीं रहा ह;ै तथा मुझ ेसमािानप्रद रूप में यह दर्शणत कर कदया गया है कक उक्‍त .............................(नाम) फरार हो गया ह ै(या उक्‍त िारंट की तामील से बचने के जलए अपने आपको जिपा रहा ह)ै और उस पर उक्‍त............. (नाम) से यह अपेक्षा करने वाली उद‍घ ोिर्ा सम्यक रूप से िारी और प्रकाजशत की िा चुकी ह ैया की िा रही ह ैकक वह..........कदन के भीतर उक्‍त आरोप का उत्तर देने के जलए उपस्थित हो‍; तथा...............जिले में........(ग्राम या नगर) में सरकार को रािस्ट्वदायी कुि भूजम उक्‍त..............के कब्ि ेमें ह ै; इसजलए आपको प्राजिकृत ककया िाता ह ै और आपसे अनुरोि ककया िाता ह ै कक आप उक्‍त भूजम को िारा 85 की उपिारा (4) के िंड (क) या िंड (ग) या दोनों*‍में जवजनर्दणष्‍ट रीजत से कुकण करा लें और इस न्यायालय का आग े और कोई आदेश होने तक उसे कुकण रिें और इस आदेश के अनुसरर् में िो कुि आपने ककया हो उसे अजवलंब प्रमाजर्त करें । तारीख........................ (न्यायालय की मुद्रा) (हस्ट्ताक्षर) * जो िांतित नही ं है, उसे काट दें । ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 423 प्ररूप सं० 10 साक्षी को लाने के भलए प्रिम बार वारंट (धारा 90 देखिए) प्रेविती— ................................................(उस पुलिस अगधकारी का या उस अन्य व्यस्क् त का या उन अन्य व्यस्क् तयों के नाम और पदनाम स्जसे या स्जन्हें िारंट तनष्पाददत करना है) मेरे समक्ष पररिाद ककया गया है कक ..............................(पता) के....................................(अलभयुक् त का नाम) ने.............................(अपराध का संक्षेप में िणनण कीस्जए) का अपराध ककया है (या संदेह है कक उसने ककया है), और यह संभाव्य प्रतीत होता है कक ...........................................(साक्षी का नाम और िणनण ) उक् त पररिाद के बारे में साक्ष्य दे सकता है, तिा मेरे पास यह विश् िास करन ेका अच्िा और पयाणप् त कारण है कक जब तक ऐसा करन ेके लिए वििश न ककए जाएं िह उक् त पररिाद की सुनिाई में साक्षी के रूप में उपस्थित नहीं होगा ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त...................... .............................(साक्षी का नाम) को गगरफ्तार करें और उस अपराध के बारे में स्जसका पररिाद ककया गया है परीक्षा की जाने के लिए उस ेतारीख .............................को इस न्यायािय के समक्ष िाएं । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________424 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 11 ववभशष्ट‍ अपराध की सूचना के पश्‍चात ्तलाशी के भलए वारंट (धारा 96 देखिए) प्रेविती— ........................................................ (उस पुलिस अगधकारी का या उस अन्य व्यस्क् त का या उन अन्य व्यस्क् तयों के नाम और पदनाम स्जसे या स्जन्हें िारंट तनष्पाददत करना है) ..................................................(अपराध का संक्षेप में िणनण कीस्जए) के अपराध के ककए जाने (या ककए जान ेके संदेह) की मेरे समक्ष स चना दी गई है (या पररिाद ककया गया है), और मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक उक् त अपराध (या संददग्ध अपराध) की जांच के लिए, जो अब की जा रही है (या की जान े िािी है) ..............(चीज को थपष् ट रूप से वितनददणष् ट कीस्जए) का प्रथतुत ककया जाना आिश्यक है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप..........................(उस गहृ या थिान का या उसके उस भाग का िणनण कीस्जए, स्जस तक तिाशी सीलमत रहेगी) में उक् त...................(वितनददणष् ट चीज) के लिए तिाशी िें और यदद िह पाई जाए तो उस ेतुंरत इस न्यायािय के समक्ष प्रथतुत करें, और इस िारंट के अधीन जो कुि आपन ेककया है उसे पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे, इसका तनष्पादन हो जाने पर, अवििम्ब िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 425 प्ररूप सं० 12 संददग्ध तनक्षेप-थिान की तलाशी के भलए वारंट (धारा 97 देखिए) प्रेविती— ............................................... (कांथटेबि की पंस्क् त स े ऊपर की पंस्क् त के पुलिस अगधकारी का नाम और पदनाम) मेरे समक्ष यह स चना दी गई है और उस पर की गई सम्यक् जांच के पश् चात ्मुझे यह विश् िास हो गया है कक.............................(गहृ या अन्य थिान का िणनण कीस्जए) का चुराई हुई सम्पवत्त के तनक्षेप (या विक्रय) (या यदद धारा में अलभव्यक् त ककए गए अन्य प्रयोजनों में से ककसी के लिए उपयोग में िाया जाता है तो धारा के शब्दों में उस प्रयोजन को लिखखए) के लिए थिान के रूप में उपयोग ककया जाता है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त गहृ (या अन्य थिान) में ऐसी सहायता के साि प्रिेश करें, जैसी अपेक्षक्षत हो, और यदद आिश्यक है तो उस प्रयोजन के लिए उगचत बि का प्रयोग करें और उक् त गहृ (या अन्य थिान) के प्रत्येक भाग (या यदद तिाशी ककसी भाग तक ही सीलमत रहती है तो उस भाग को थपष् टतया वितनददणष् ट कीस्जए) की तिाशी िें और ककसी संपवत्त (या यिास्थितत दथतािेजों या थटाम्पों या मुद्राओ ं या लसक् कों या अश् िीि िथतुओं) को (जब मामि े में ऐसा अपेक्षक्षत हो तो जोड़िए) और ककन्हीं उपकरणों और सामगग्रयों को भी स्जनके बारे में आपको उगचत रूप से विश् िास हो सके कक ि े (यिास्थितत) क टरगचत दथतािेजों या क टकृत थटाम्पों, लमथ्या मुद्राओं या क टकृत लसक् कों या क टकृत करेंसी नोटों के वितनमाणण के लिए रखी गई हैं, अलभगहृ ीत करें और अपने कब्जे में िें और उक् त चीजों में से अपने कब्जे में िी गई चीजों को तत्काि इस न्यायािय के समक्ष िाएं और इस िारंट के अधीन जो कुि आपन े ककया उस े पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करते हुए इसे, इसका तनष्पाददत हो जाने पर, अवििम्ब िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________426 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 13 पररशांतत कायम रिने के भलए बंधपत्र (धारा 125 और धारा 126 देखिए) म.ैं............................(नाम)............................. (थिान) का तनिासी ह ं; मुझसे यह अपेक्षा की गई है कक म ैं .............................................. की अिगध के लिए या जब तक .............................के न्यायािय में........................... के मामि ेमें इस समय िंबबत जाचं समाप् त न हो जाए पररशांतत कायम रखन ेके लिए बंधपत्र लिख ं ; इसलिए म ैंइसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक उक् त अिगध के दौरान, या जब तक उक् त जांच समाप् त न हो जाए, पररशांतत भंग नहीं करूंगा अििा कोई ऐसा काय णनहीं करूंगा स्जससे पररशांतत भंग होना संभाव्य हो, और म ैंइसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें मनैं े कोई च क की तो मेरी............................................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ............................. (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 427 प्ररूप सं० 14 सदाचार के भलए बंधपत्र (धारा 127, धारा 128 और धारा 129 देखिए) म.ैं...................................(नाम)...................................(थिान) का तनिासी ह ं ; मुझसे यह अपेक्षा की गई है कक म ैं .........................................................(अिगध लिखखए) की अिगध के लिए या जब तक.............................के न्यायािय में .......................................................... के मामिे में इस समय िंबबत जांच समाप् त न हो जाए, सरकार और भारत के सब नागररकों के प्रतत सदाचार बरतने के लिए, बंधपत्र लिख ं, इसलिए म ैं इसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक उक् त अिगध के दौरान या जब तक उक् त जांच समाप् त न हो जाए सरकार और भारत के सब नागररकों के प्रतत सदाचार बरत ंगा और म ैंइसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें मनैं े कोई च क की तो मेरी....................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) ‍‍ ‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍(हथताक्षर) (जहां प्रततिुओं सदहत बंधपत्र तनष्पाददत ककया जाना है वहां यह जोड़िए) हम उक् त...........................................के लिए अपने को इसके द्िारा इस बात के लिए प्रततभ घोवित करते हैं कक िह उक् त अिगध के दौरान या जब तक उक् त जांच समाप् त न हो जाए सरकार और भारत के सब नागररकों के प्रतत सदाचार बरतेगा, और हम अपने को संयुक् तत: और पिृ क् त: आबद्ध करत ेहैं कक यदद इसमें उसने कोई च क की तो हमारी..........................................................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ............................. (हथताक्षर) ________428 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 15 पररशांतत िंि की संिावना की सूचना पर समन (धारा 132 देखिए) प्रेविती— (नाम) ..........................................(पता) ..................................... इस विश् िसनीय स चना द्िारा कक.......................................(स चना का सार लिखखए) मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक यह संभाव्य है कक आप पररशांतत भंग करेंगे (या ऐसा काय णकरेंगे स्जसस ेकक संभित: पररशांतत भंग होगी) ; इसलिए इसके द्िारा आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप थियं (अििा अपने सम्यक् रूप से प्रागधकृत अलभकताण द्िारा) तारीख.............................को .............................के मस्जथरेट के कायाणिय में पि ाणह्न दस बजे इस बात का कारण दलशतण करने के लिए उपस्थित हों कक आपसे यह अपेक्षा क्यों न की जाए कक इस बात के लिए कक आप.................अिगध के लिए पररशांतत कायम रखेंगे, आप..................रुपए के लिए एक बंधपत्र लिखें [जब प्रततभ अपेक्षक्षत हों तब यह जोड़िए, और एक प्रततभ (या, यिास्थितत, दो प्रततभुओं) के (यदद एक से अगधक प्रततभ हों तो) उनमें से प्रत्येक के.............................रुपए की रालश के लिए बंधपत्र द्िारा भी प्रततभ तत दें] । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 429 प्ररूप सं० 16 पररशांतत कायम रिने के भलए प्रततिूतत देने में असफल रहने पर सुपुददिी का वारंट (धारा 141 देखिए) प्रेविती— ..............................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी......................................(नाम और पता), उस समन के अनुपािन में, स्जससे कक उनसे अपेक्षा की गई िी कक िह इस बात का कारण दलशतण करें कक क्यों न िह एक प्रततभ सदहत (या दो प्रततभुओं सदहत, स्जनमें से प्रत्येक.............................रुपए के लिए प्रततभ हो)...................रुपए के लिए इस बाबत बंधपत्र लिखें कक िह अिाणत ्उक् त......................(नाम)............................. मास की अिगध के लिए पररशांतत कायम रखेंगे, मेरे समक्ष तारीख ..........................को थियं (या अपने प्रागधकृत, अलभकताण द्िारा) उपस्थित हुए ि े; तिा तब उक् त................................(नाम) से यह अपेक्षा करने िािा आदेश ककया गया िा कक िह ऐसी प्रततभ तत (जब आददष् ट प्रततभ तत समन में उस्लिखखत प्रततभ तत से लभन् न है, तब आदेलशत प्रततभ तत लिखखए) दें और जुटाएं और िह उक् त आदेश का अनुपािन करन ेमें असफि रहे हैं ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त.................................. (नाम) को अपनी अलभरक्षा में इस िारंट के सदहत िें और उक् त कारगार में.............................(कारािास की अिगध) की उक् त अिगध के लिए, जब तक इस बीच उनके िो़िे जाने के लिए विगधप िकण आदेश न दे ददया जाए, सुरक्षक्षत रखें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ाकं न द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________430 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 17 सदाचार के भलए प्रततिूतत देने में असफल रहने पर सुपुददिी का वारंट (धारा 141 देखिए) प्रेविती— .............................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक.................................(नाम और िणनण ).............................स्जिे के भीतर अपनी उपस्थितत तिपा रहा है और यह विश् िास करन ेका कारण है कक िह कोई संज्ञेय अपराध करने के लिए ऐसा कर रहा है ; या .............................(नाम और िणनण ) के साधारण चररत्र के बारे में मेरे समक्ष साक्ष्य ददया गया है और अलभलिखखत ककया गया है स्जससे यह प्रतीत होता है कक िह आभ्यालसक िुटेरा (या, यिास्थितत, गहृ भेदक आदद, आदद) है ; तिा ऐसा किन करने िािा और उक् त..............................(नाम) से यह अपेक्षा करने िािा आदेश अलभलिखखत ककया गया है कक एक प्रततभ सदहत (या, यिास्थितत, दो या अगधक प्रततभुओं के सदहत) िह थियं.............................रुपए के लिए, और उक् त प्रततभ (या उक् त प्रततभुओं में से प्रत्येक)............................ .............................रुपए के लिए बंधपत्र लिखकर.............................(अिगध लिखखए) अिगध के लिए अपने सदाचार के लिए प्रततभ तत दे, और उक् त .............................(नाम) उक् त आदेश का अनुपािन करने में असफि रहा है और ऐसी च क के लिए उसकी बाबत.............................(अिगध लिखखए) के लिए, जब तक उससे प ि ण ही उक् त प्रततभ तत न दे दी जाए, कारािास का न्यायतनणणयन ककया गया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त........................... ..................................(नाम) को अपनी अलभरक्षा में इस िारंट के सदहत िें और उक् त जेि में .............................(कारािास की अिगध) की उक् त अिगध के लिए, सुरक्षक्षत रखें या यदद िे पहिे ही कारागार में हैं तो उसमें तनरुद्ध रखें जब तक इस बीच उसके िो़िे जाने के लिए विगधप िकण आदेश न दे ददया जाए और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 431 प्ररूप सं० 18 प्रततिूतत देने में असफल रहने पर कारावाभसत व्यक्क्‍त को उन्मोगचत‍करने के भलए वारंट (धारा 141 और धारा 142 देखिए) प्रेविती— ........................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी (या अन्य अगधकारी स्जसकी अलभरक्षा में िह व्यस्क् त है) । .............................(बंदी का नाम और िणनण ) को तारीख.................के न्यायािय के िारंट के अधीन आपकी अलभरक्षा में सुपुदण ककया गया िा और उसने तत्पश् चात ् भारतीय नागररक सुरक्षा संदहता, 2023 की धारा.............................के अधीन प्रततभ तत सम्यक् रूप से दे दी है ; या 20................के.............मास के........... ददन के न्यायािय के िारंट के अधीन.................................. (बंदी का नाम और िणणन) को आपकी अलभरक्षा में सुपुदण ककया गया िा और मुझे इस राय के पयाणप् त आधार प्रतीत होते हैं कक उस ेसमाज को पररसंकट में डािे बबना िो़िा जा सकता है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त....................... .............................(नाम) को अपनी अलभरक्षा से, जब तक उसे ककसी अन्य कारण से तनरुद्ध करना आिश्यक न हो, तत्काि उन्मोगचत कर दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________432 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 19 िरणपोषण का‍संदाय‍करान ेमें असफल रहने पर कारावास का वारंट (धारा 144 देखिए) प्रेविती— ...........................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी ..................... (नाम, िणनण और पता) के बारे में मेरे समक्ष यह साबबत कर ददया गया है कक िह अपनी पत्न ी...................................................(नाम) [या अपने बािक................................................(नाम) या अपन ेवपता या माता...................................................... (नाम)] का, जो ......................................................(कारण लिखखए) के कारण अपना भरणपोिण करन े में असमि ण हैं, भरणपोिण करने के पयाणप् त साधन रखता है और उसने उनका भरणपोिण करन े में उपेक्षा की है (या ऐसा करन े से इंकार ककया है) और उक् त ....................................... (नाम) से यह अपेक्षा करने िािा आदेश सम्यक् रूप से ककया जा चुका है कक िह अपनी उक् त पत् नी (या बािक या वपता या माता) को भरणपोिण के लिए .............................रुपए की मालसक रालश दे, तिा यह भी साबबत कर ददया गया है कक उक् त..............................(नाम) उक् त आदेश की जानब झकर अिहेिना करके ....................रुपए, जो..................मास (या मासों) के लिए भत्ते की रकम है, देने में असफि रहा है ; और उस पर यह न्यायतनणीत करन े िािा आदेश ककया गया कक िह उक् त जेि में………… अिगध के लिए कारािास भोगे ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त ....................... .............................(नाम) को उक् त जेि में अपनी अलभरक्षा में इस िारंट के सदहत िें और िहां उक् त आदेश को विगध के अनुसार तनष्पाददत करें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करते हुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 433 प्ररूप सं० 20 कुकी और ववक्रय दवारा िरणपोषण का संदाय कराने के भलए वारंट (धारा 144 देखिए) प्रेविती— ................................................(उस पुलिस अगधकारी का या अन्य व्यस्क् त का नाम और पदनाम स्जसे िारंट का तनष्पादन करना है) । ....................................................(नाम) से यह अपेक्षा करने िािा आदेश सम्यक् रूप से ककया जा चुका है कक िह अपनी उक् त पत्न ी (या अपने बािक या वपता या माता) को भरणपोिण के लिए .........................रुपए की मालसक रालश दे, तिा उक् त .................................... (नाम) उक्त आदेश की जानब झकर अिहेिना करके .............................रुपए जो.................... मास (या मासों) के लिए भत्ते की रकम है, देने में असफि रहा है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप............................. स्जि े के भीतर उक् त ..............................................(नाम) से संबंगधत कोई चि संपवत्त लमिे उस ेकुकण कर िें और यदद ऐसी कुकी के पश् चात ्..........................................................(अनुज्ञात ददनों या घंटों की संख्या लिखखए) के भीतर उक् त रालश नहीं दी जाती है तो (या तत्काि) कुकण की गई चि संपवत्त का या उसके इतने भाग का, स्जतना उक् त रालश को चुकान े के लिए पयाणप् त हो, विक्रय कर दें और इस िारंट के अधीन जो कुि आपन े ककया हो उसे पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे, इसका तनष्पादन हो जाने पर, तुंरत िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________434 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 21 न्यूसेंसों को हटाने के भलए आदेश (धारा 152 देखिए) प्रेविती— ...................................(नाम, िणनण और पता) मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक आपने...................................... (यह लिखखए कक िह क्या है स्जससे बाधा या न्य सेंस काररत होता है) इत्यादद, द्िारा सािजण तनक स़िक माग ण (या अन्य िोक थिान)...................................(स़िक या िोक थिान का िणनण कीस्जए) इत्यादद को उपयोग में िान ेिािे व्यस्क् तयों को बाधा (या न्य ससें ) की है और िह बाधा (या न्य सेंस) अब भी विद्यमान है ; या मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक आप थिामी की, या प्रबंधक की हैलसयत से......................(विलशष् ट व्यापार या उपजीविका लिखखए) का व्यापार या उपजीविका.........................................................में (िह थिान जहा ंिह व्यापार या उपजीविका चिाई जा रही है लिखखए) चिा रहे ह ैंऔर िह........................के (स्जस रीतत स ेहातनकारक प्रभाि पैदा हुए ह ैंिहा ंसंक्षेपत: लिखखए) कारण िोक- थिाथथ्य (या सुख) के लिए हातनकारक है और उस ेबंद कर ददया जाना चादहए या दस रे थिान को हटा ददया जाना चादहए ; या मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक आप िोक माग.ण............................(आम राथते का िणनण कीस्जए) के पाश्ि थण ि ककसी तािाब (या कुएं या उत्खात) के थिामी ह ैं(या उस पर आपका कब्जा है या तनयंत्रण है) और उक् त तािाब (या कुए ंया उत्खात) पर बा़ि न होने (या असुरक्षक्षत रूप से बा़ि होने) के कारण सािजण तनक सुरक्षा को खतरा होता है ; या ........................................इत्यादद, इत्यादद (यिास्थितत) ; इसलिए म ैंआपको तनदेश देता ह ं और आपसे अपेक्षा करता ह ं कक आप.................(अनुज्ञात समय लिखखए) के भीतर .......................................(न्य सेंस के उपशमन के लिए क्या ककया जाना अपेक्षक्षत है िह लिखखए) या तारीख................... को ......................के न्यायािय में उपस्थित हों और इस बात का कारण दलशतण करें कक इस आदेश को क्यों प्रितततण न कराया जाए ; या इसलिए म ैंआपको तनदेश देता ह ं और आपसे अपेक्षा करता ह ं कक आप............................ (अनुज्ञात समय लिखखए) के भीतर उक् त व्यापार या उपजीविका को उक् त थिान में चिाना बंद कर दें और उसे कफर न चिाएं या उक् त व्यापार को उस थिान से जहां िह अब चिाया जा रहा है हटा दें, या तारीख .......................को उपस्थित हों, इत्यादद, इत्यादद ; या इसलिए म ैं आपको तनदेश देता ह ं और आपसे अपेक्षा करता ह ं कक आप ..................................(अनुज्ञात समय लिखखए) के अन्दर पयाणप्त बा़ि........................(बा़ि की ककथम और स्जस भाग में बा़ि िगाई जानी है िह लिखखए) िगाए ं या तारीख ................................को उपस्थित हों, इत्यादद ; या इसलिए म ैंआपको तनदेश देता ह ं और आपसे अपेक्षा करता ह ं कक........................ इत्यादद, इत्यादद (यिास्थितत) । तारीख ............................. (न्यायालय की मुद्रा) (हस्ट्ताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 435 प्ररूप सं० 22 मक्जथरेट दवारा सूचना और अतनवाय दआदेश (धारा 160 देखिए) प्रेविती— .................................................................. (नाम, िणनण और पता) म ैं आपको स चना देता ह ं कक यह पाया गया है कक तारीख.......................................................को जारी ककया गया और आपसे...................................(आदेश में की गई अपेक्षा का सार लिखखए) की अपेक्षा करन े िािा आदेश युस्क् तयुक् त और उगचत है । िह आदेश अब अंततम कर ददया गया है तिा म ैंआपको तनदेश देता ह ं और आपसे अपेक्षा करता ह ं कक...........................(अनुज्ञात समय लिखखए) के भीतर उक् त आदेश का अनुपािन करें, नहीं तो उसकी अिज्ञा के लिए भारतीय न्याय संदहता, 2023 द्िारा उपबंगधत शास्थत आपको भोगनी प़िेगी । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________436 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 23 जांच होने तक आसन्‍न‍ितरे के ववरुदध उपबंध करने के भलए व्यादेश (धारा 161 देखिए) प्रेविती— ..................................(नाम, िणनण और पता) तारीख...........................को मेरे द्िारा जारी ककए गए सशत ण आदेश की जांच अभी तक िंबबत है और मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक उक् त आदेश में िखणणत न्य सेंस से जनता को ऐसा खतरा या गंभीर ककथम की हातन आसन्न है कक उस खतरे या हातन का तनिारण करन ेके लिए अवििंब उपाय करना आिश्यक हो गया है ; इसलिए म ैंभारतीय नागररक सुरक्षा संदहता, 2023 की धारा 161 के उपबंधों के अधीन आपको तनदेश और व्यादेश देता ह ं कक आप जांच का पररणाम तनकिने तक के लिए तत्काि........(अथिायी सुरक्षा के रूप में क्या ककया जाना अपेक्षक्षत है या थपष् टतया लिखखए) करें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 437 प्ररूप सं०‍24 न्यसू सें की पनु रावजृ त्त आकद का प्रजतििे करन ेके जलए मजिस्ट्रेट का आदशे (िारा 162‍दजे िए) प्रेजिती— .........................................................(नाम, वर्णन और पता) मुझ े यह प्रतीत कराया गया ह ै कक................................इत्याकद, इत्याकद (यथाजस्ट्थजत, प्ररूप 21 या प्ररूप 25 के अनुसार यहां उजचत वर्णन कीजिए) ; इसजलए मैं आपको सख्त आदेश और व्यादेश देता ह ंकक आप उक्‍त न्यूसेंस की पुनरावृजत्त न करें या उसे चालू न रिें । तारीख ............................. (न्यायालय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________438 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 25 बाधा, बलवा आदद का तनवारण करने के भलए मक्जथरेट का आदेश (धारा 163 देखिए) प्रेविती— .........................................................(नाम, िणनण और पता) मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक आप....................................(संपवत्त का थपष् ट िणनण कीस्जए) का कब्जा रखत े हैं (या प्रबंध करत े हैं) और उक् त भ लम में नािी खोदने में आप खोदी हुई लमट्टी और पत्िरों के कुि भाग को पाश् ििण ती सािजण तनक स़िक पर फेंकन ेया रख देने िािे हैं, स्जससे स़िक का उपयोग करन ेिािे व्यस्क् तयों को बाधा का जोखखम पैदा होगा ; या मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक आप और कई अन्य व्यस्क् त........................................(व्यस्क्त यों के िग णका िणनण कीस्जए) समिेत होने िािे हैं और सािजण तनक स़िक पर होकर जुि स तनकािने िािे हैं, इत्यादद (यिाक्थितत) और ऐसे जुि स से बििा या दंगा हो जाना संभाव्य है ; या ................................................इत्यादद, इत्यादद (यथिास्थितत) ; इसलिए म ैंइसके द्िारा आपको आदेश देता ह ं कक आप भ लम में से खोदी हुई ककसी भी लमट्टी या पत्िर को उक् त स़िक के ककसी भी भाग पर न रखें और न रखने की अनुज्ञा दें ; या इसलिए म ैंइसके द्िारा उक् त स़िक पर होकर जुि स के जाने का प्रततिेध करता ह ं और आपको सख्त चेतािनी और व्यादेश देता ह ं कक आप ऐसे जुि स में कोई भाग न िें (या जैसा िखणतण मामि ेमें अपेक्षक्षत हो) । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 439 प्ररूप सं०‍26 जववादग्रस्ट्त भजू म आकद का कब्िा रिने के हकदार पक्षकार की घोिर्ा करने वाला मजिस्ट्रेट का आदशे (िारा 164 दजे िए) सम्यक रूप से अजभजलजित आिारों पर मुझ े यह प्रतीत होने पर कक मेरी स्ट्थानीय अजिकाररता के भीतर जस्ट्थत .......................(जववाद-वस्ट्तु संक्षेप में जलजिए) से संबद्ध जववाद, जिससे पररशांजत भंग हो िाना संभाव्य ह,ै............................. (पक्षकारों के नाम और जनवास या यकद जववाद ग्रामीर्ों के समूहों के बीच ह ै तो केवल जनवास का वर्णन कीजिए) के बीच ह,ै सब उक्‍त पक्षकारों से अपेक्षा की गई थी कक व े उक्‍त............................(जववाद-वस्ट्तु) पर वास्ट्तजवक कब्ि े के तथ्य के बारे में अपने दावों का जलजित कथन दें और तब उक्‍त पक्षकारों में से ककसी के कब्ि े के वैि अजिकार के दाव े के गुर्ागुर् के प्रजत कोई जनदेश ककए जबना सम्यक िांच करने पर मेरा समािान हो िाने पर कक उक्‍त......................................... (नाम या वर्णन) का उस पर वास्ट्तजवक कब्िे का दावा सही है ; मैं यह जवजनश्‍चय करता हं और घोजित करता ह ंकक उक्‍त.........................(जववाद-वस्ट्तु) पर उसका (या उनका) कब्िा ह ैऔर, िब तक कक जवजि के सम्यक अनुक्रम में वह (या व)े जनकाल न कदया िाए (या कदए िाएं) तब तक वह (या व)े ऐसा कब्िा रिने का हकदार ह ै (या के हकदार ह)ैं और इस बीच में उसके (या उनके) कब्‍िे में ककसी प्रकार का जवघ्‍न डालने का मैं सख्त जनिेि करता ह ं। तारीख ............................. (न्यायालय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________440 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 27 िूभम आदद के कब्ज ेके बारे में वववाद के मामले में कुकी का वारंट (धारा 165 देखिए) प्रेविती— ...................................................................(थिान) के पुलिस िान ेका भारसाधक पुलिस अगधकारी । [या...........................................................(थिान) का किक्टर] । मुझे यह प्रतीत कराया गया है कक मेरी अगधकाररता की सीमाओं के भीतर स्थित................................(वििाद- िथत ु संक्षेप में लिखखए) संबद्ध वििाद, स्जससे पररशांतत भंग हो जाना संभाव्य है,....................................(संबद्ध पक्षकारों के नाम और तनिास, या यदद वििाद ग्रामीणों के सम हों के बीच है तो केिि तनिास का िणणन कीस्जए) के बीच है और तब उक् त पक्षकारों से सम्यक् रूप से अपेक्षा की गई िी कक िे उक् त..............................................(वििाद- िथत) ु पर िाथतविक कब्जे के तथ्य के बारे में अपने दािे का लिखखत किन दें, और उक् त दािों की सम्यक् जांच करने पर मनैं े यह वितनश् चय ककया है कक उक् त..................................(वििाद-िथत) ु पर कब्जा उक् त पक्षकारों में स े ककसी का भी नहीं है (या यिाप िोक् त रूप में कब्जा ककस पक्षकार का है इस बारे में अपना समाधान करन े में म ैं असमि णह ं) ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त ..........................................(वििाद-िथतु) को उसका कब्जा िेकर और रखकर कुकण करें और जब तक पक्षकारों के अगधकारों का या कब्जे के दािे का अिधारण करन ेिािी सक्षम न्यायािय की डडक्री या आदेश प्राप् त न कर िी जाए या न कर लिया जाए तब तक उसे कुकण रख े रहें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायालय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 441 प्ररूप सं० 28 िूभम या जल पर ककसी बात के ककए जाने का प्रततषेध करने वाला मक्जथरेट का आदेश (धारा 166 देखिए) मेरी थिानीय अगधकाररता के भीतर स्थित.......................................(वििाद-िथतु को संक्षेप में लिखखए) के उपयोग के अगधकार से संबद्ध, स्जस भ लम (या जि) पर अनन्य कब्जे का दािा........................................(व्यस्क् त या व्यस्क् तयों का िणनण कीस्जए) द्िारा ककया गया है, वििाद उ‍ने पर और उसकी सम्यक् जांच से मझु े यह प्रतीत होने पर कक उक् त भ लम (या जि) का जनता (या यदद व्यस्क् त-विशेि या व्यस्क् तयों के िगण द्िारा उपयोग ककया जाता है तो उसका या उनका िणनण कीस्जए) के लिए ऐसे उपयोग का उपभोग करना खुिा रहा है और (यदद सारे िि णके उपयोग का उपभोग ककया जाता है तो) उक् त जांच के संस्थित ककए जाने के तीन मास के भीतर (या यदद उपयोग का विलशष् ट मौसमों में ही उपभोग ककया जा सकता है तो कदहए “उन मौसमों में से, स्जनमें कक उसका उपभोग ककया जा सकता है, अंततम मौसम के दौरान”) उक् त उपयोग का उपभोग ककया गया है ; म ैं यह आदेश देता ह ं कक उक् त..........................................(कब्जे का या के दािेदार) या उसके (या उनके) दहत में कोई व्यस्क् त उक् त भ लम (या जि) का कब्जा, यिाप िोक् त उपयोग के अगधकार के उपभोग का अपिजनण करके, न िेगा (या प्रततधाररत न करेगा) जब तक िह (या िे) सक्षम न्यायािय से उस े (या उन्हें) अनन्य कब्जे का (या के) हकदार न्यायतनणीत करन ेिािी डडक्री या आदेश प्राप् त न कर िे (या िें) । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________442 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— (प्ररूप सं० 29 पुभलस अगधकारी के समक्ष प्रारंभिक जांच पर बंधपत्र और जमानतपत्र (धारा 189 देखिए) म.ैं...............................(नाम) जो........................का ह ं.................................के.....................अपराध से आरोवपत होने पर और जांच के पश् चात.्...........................मस्जथरेट के समक्ष उपस्थित होने के लिए अपेक्षक्षत ककए जाने पर ; या और जांच के पश् चात ्अपना मुचिका इसलिए देने की अपेक्षा की जाने पर कक जब भी मुझसे अपक्षे ा की जाएगी, म ैं उपस्थित होऊंगा ; इसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक म.ैं.....................................(थिान) में.......................................के न्यायािय में तारीख ....................................को (या ऐस े ददन जब उपस्थित होने की मुझस ेइसके पश् चात ्अपेक्षा की जाए) उक् त आरोप का अततररक् त उत्तर देने के लिए उपस्थित होऊंगा और म ैंअपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें से कोई च क करूं तो मेरी................................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ........................ (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) म ैं इसके द्िारा अपने को (या हम संयुक् तत: और पिृ कतः अपने को और अपने में से प्रत्येक को) उपयुक्ण त........................... (नाम) के लिए इस बात के लिए प्रततभ घोवित करता ह ं (या करत े हैं) कक िह...........................(थिान) में.......................... के न्यायािय में तारीख.....................................को (या ऐसे ददन जब उपस्थित होने की उससे इसके पश् चात ्अपेक्षा की जाए) अपने विरुद्ध िंबबत आरोप का अततररक् त उत्तर देने के लिए उपस्थित होगा, और म ैंइसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं (या हम इसके द्िारा अपने को आबद्ध करत ेहैं) कक यदद इसमें िह च क करे तो मेरी (या हमारी)..........................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 443 प्ररूप सं० 30 अभियोजन चलाने के भलए या साक्ष्य देने के भलए बंधपत्र (धारा 190 देखिए) म.ैं............................................... (नाम), जो...............................(थिान) का ह ं, अपने को आबद्ध करता ह ं कक म ैं तारीख ......................को................बजे..............................के न्यायािय में उपस्थित होऊंगा और िहीं और उसी समय क, ख, के विरुद्ध ..........................................के आरोप के मामिे में अलभयोजन चिाऊंगा (या अलभयोजन चिाऊंगा और साक्ष्य दंग ा) (या साक्ष्य दंग ा), और म ैंअपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें म ैंच क करूं तो मेरी................................................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ............................. (हस्ट्ताक्षर) ________444 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 31 छोटे अपराध के अभियुक्‍त को ववशेष समन (धारा 229 देखिए) प्रेविती— .....................................................(अलभयुक् त का नाम).........................................................(पता) .................................................. के िोटे अपराध (आरोवपत अपराध का संक्षक्षप् त वििरण) के आरोप का उत्तर देने के लिए आपकी उपस्थितत आिश्यक है, अत: आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप थियं (या अगधिक्ता द्िारा).................................(मस्जथरेट) के समक्ष 20................के...............मास के.......................ददन उपस्थित हों या यदद आप मस्जथरेट के समक्ष उपस्थित हुए बबना आरोप के दोिी होने का अलभिचन करना चाहें तो आप दोिी होने का लिखखत रूप में अलभिचन और जुमाणने के रूप में ...................................रुपए की रालश उपरोक् त तारीख के प ि ण भेज दें, या यदद आप अगधिक्ता द्िारा उपस्थित होना चाहें और दोिी होने का अलभिचन ऐसे अगधिक्ता की माफणत करना चाहें तो अपनी ओर से इस प्रकार दोिी होने का अलभिचन करन ेके लिए आप ऐसे अगधिक्ता को लिखखत रूप में प्रागधकृत करें और ऐसे अगधिक्ता के द्िारा जुमाणने का संदाय करें । इसमें च क नहीं होनी चादहए । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) (दटप्पण—इस समन में वितनददणष् ट जुमाणने की रकम पांच हजार रुपए से अगधक न होगी ।) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 445 प्ररूप सं०‍32 मजिस्ट्रेट द्वारा लोक अजभयोिक को सपु दु गण ी की सचू ना (िारा 232 दजे िए) ............................................का मजिस्ट्रेट सूचना देता ह ै कक उसने...............................को अगल े सेशन में जवचारर् के जलए सुपुद ण ककया ह ै ; और मजिस्ट्रेट लोक अजभयोिक को उक्‍त मामले में अजभयोिन का संचालन करने का अनुदेश देता ह ै। अजभयुक्‍त के जवरुद्ध आरोप ह ैकक...............................................इत्याकद (आरोप में कदया गया अपराि जलजिए) तारीख ............................. (न्यायालय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________446 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 33 आरोप (धारा 234, धारा 235 और धारा 236 देखिए) I. एक शीष दआरोप (1) (क) म.ैं..................................(मस्जथरेट का नाम और पद, आदद) आप.........................(अलभयुक् त व्यस्क् त का नाम) पर तनम् नलिखखत आरोप िगाता ह ं :— (ख) धारा 147 पर—आपने तारीख............................................को, या उसके िगभग..............में भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध ककया और उसके द्िारा आपने ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 147 के अधीन दंडनीय अपराध है, और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (ग) और म ैंइसके द्िारा तनदेश देता ह ं कक आपका इस न्यायािय द्िारा उक् त आरोप पर विचारण ककया जाए । (मस्जथरेट के हथताक्षर और मुद्रा) [(ख) के थिान पर प्रततथिावपत ककया जाए] :— (2) धारा 151 पर—आपने तारीख............................को या उसके िगभग......................................भारत के राष् रपतत [या यिास्थितत.................... (राज्य का नाम) के राज्यपाि] को ऐसे राष् रपतत (या यिास्थितत, राज्यपाि) के रूप में अपनी विगधप ण णशस्क् त का प्रयोग करन े से विरत रहन े के लिए उत् प्रेररत करने के आशय से ऐस े राष् रपतत (या यिास्थितत, राज्यपाि) पर हमिा ककया, और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 151 के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत हैं । (3) धारा 198 पर—आपन े तारीख...............को या उसके िगभग.....................में ऐसा आचरण ककया (या यिास्थितत, करन े का िोप ककया) जो.................अगधतनयम की धारा.................के उपबंधों के प्रततक ि है और स्जसके बारे में आपको ज्ञात िा कक िह.......................पर प्रततक ि प्रभाि डािने िािा है, और उसके द्िारा आपने ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 198 के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है । (4) धारा 229 पर—आपने तारीख..................को या उसके िगभग.....................में................................ के समक्ष.....................के विचारण के अनुक्रम में साक्ष्य में किन ककया कक “....................................................” स्जस किन के लमथ्या होने का आपको ज्ञान या विश् िास िा, या स्जसके सत्य होने का आपको विश् िास नहीं िा ; और उसके द्िारा आपन ेऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 229 के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (5) धारा 105 पर—आपन े तारीख......................को या उसके िगभग...................में हत्या की कोदट में न आन े िािा आपरागधक मानििध ककया स्जससे........................की मत्ृ यु काररत हुई और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 105 के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (6) धारा 108 पर—आपन े तारीख .........................को या उसके िगभग...................में क, ख, द्िारा जो कक मत्त अिथिा में िा, आत्महत्या ककए जाने का दष्ु प्रेरण ककया और उसके द्िारा आपन ेऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 108 के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 447 (7) धारा 117(2) पर—आपन े तारीख.....................को या उसके िगभग ...................में...............को थिेच्िया घोर उपहतत काररत की और उसके द्िारा आपने ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 117(2) के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (8) धारा 309(2) पर—आपन े तारीख.................................को या उसके िगभग................. में............................(नाम लिखखए) को ि टा और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 309(2) के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (9) धारा 310(2) पर—आपन े तारीख ..................को या उसके िगभग.......................... में डकैती डािी जो अपराध भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 310(2) के अधीन दंडनीय है और इस न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है । II. दो या अगधक शीष दवाले आरोप (1) (क) म.ैं...............................................................................(मस्जथरेट का नाम और पद, आदद) आप....................................................(अलभयुक् त व् यस्क् त का नाम) पर तनम् नलिखखत आरोप िगाता ह ं :— (ख) धारा 179 पर—पहिा—आपन े तारीख............................को या उसके िगभग....................में एक लसक् का यह जानत े हुए कक िह क टकृत है, क, ख नाम के एक अन्य व्यस्क् त को असिी के रूप में पररदत्त ककया और उसके द्िारा आपन ेऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 धारा 179 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । दस रा—आपन े तारीख.....................को या उसके िगभग....................में एक लसक् का यह जानत े हुए कक िह क टकृत है, क, ख नाम के एक अन्य व्यस्क् त को असिी लसक् के के रूप में िेने के लिए उत्प्रेररत करने का प्रयत्न ककया और उसके द्िारा आपने ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 179 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है । (ग) और म ैंइसके द्िारा तनदेश देता ह ं कक आपका उक् त न्यायािय द्िारा उक् त आरोप पर विचारण ककया जाए । (मस्जथरेट के हथताक्षर और मुद्रा) [(ख) के थिान पर प्रततथिावपत ककया जाए ] :— (2) धारा 103 और 105 पर—पहिा—आपने तारीख.....................को या उसके िगभग..............में ....................................की मत्ृ यु काररत करके हत्या की और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 103 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है । दस रा—आपन े तारीख............................को या उसके िगभग............................में...................................की मत्ृ य ुकाररत करके हत्या की कोदट में न आने िािा मानििध ककया और उसके द्िारा आपने ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 105 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (3) धारा 303(2) और 307 पर—पहिा—आपने तारीख...........................को या उसके िगभग .................................................में चोरी की और उसके द्िारा आपन ेऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 303(2) के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । दस रा—आपन े तारीख..................................को या उसके िगभग...........................में, चोरी करन े के लिए ककसी व्यस्क् त की मत्ृ यु काररत करन े की तैयारी करके, चोरी की और उसके द्िारा आपने ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 307 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है ।448 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— तीसरा—आपन ेतारीख .............................को या उसके िगभग..........................................में, चोरी करन ेके पश् चात ्तनकि भागने के लिए ककसी व्यस्क् त का अिरोध काररत करन े की तैयारी करके, चोरी की और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 307 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । चौिा—आपन े तारीख ..............................को या उसके िगभग...........................में चोरी द्िारा िी गई संपवत्त को प्रततधाररत करन ेकी दृस्ष्ट से ककसी व्यस्क् त को उपहतत का भय काररत करन ेकी तैयारी करके चोरी की और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 307 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (4) धारा 229 पर अनुकलपी आरोप—आपने तारीख..................को या उसके िगभग .................. में....................................के समक्ष................................की जांच के अनुक्रम में साक्ष्य में किन ककया कक “.......................” और आपने तारीख .........................को या उसके िगभग....................में...........................के समक्ष....................के विचारण के अनुक्रम में साक्ष्य में किन ककया कक “.................” स्जन दो किनों में से एक के लमथ्या होने का आपको ज्ञान या विश् िास िा या उसके सत्य होने का आपको विश् िास नहीं िा और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 229 के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगतण है । (मस्जथरेटों द्िारा विचाररत ककए जाने िािे मामिों में “सेशन न्यायािय के संज्ञान के अंतगणत है” के थिान पर “मेरे संज्ञान के अंतगणत है” लिखखए । III. पूव ददोषभसदगध के पश्‍चात ्चोरी के आरोप म.ैं....................................(मस्जथरेट का नाम और पद आदद) आप................................(अलभयुक् त व्यस्क् त का नाम) पर तनम् नलिखखत आरोप िगाता ह ं :— यह कक आपन ेतारीख ......................को या उसके िगभग .......................में चोरी की और उसके द्िारा आपन े ऐसा अपराध ककया जो भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 303(2) के अधीन दंडनीय है और सेशन न्यायािय (या, यिास्थितत, मस्जथरेट) के संज्ञान के अंतगणत है । और आप, उक् त.........................(अलभयुक् त का नाम) पर यह भी आरोप है कक आप उक् त अपराध करन ेके प ि ण अिाणत ् तारीख ..................................को...........................के......................................(िह न्यायािय लिखखए स्जसके द्िारा दोिलसद्गध की गई िी) द्िारा भारतीय न्याय संदहता, 2023 के अध्याय 17 के अधीन तीन िि ण की अिगध के लिए कारािास से दंडनीय अपराध के लिए, अिाणत ्रात्री में गहृ -भेदन के अपराध.............................(उस धारा के शब्दों में अपराध का िणनण कीस्जए स्जसके अधीन अलभयुक् त दोिलसद्ध ककया गया िा) के लिए दोिलसद्ध ककए गए ि े जो दोिलसद्गध अब तक प णणतया प्रित्तृ और प्रभािशीि है और आप भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 13 के अधीन पररिगधतण दंड से दंडनीय हैं । और म ैंइसके द्िारा तनदेश देता ह ं कक आपका विचारण ककया जाए, इत्यादद । ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 449 प्ररूप सं० 34 साक्षी को समन (धारा 63 और धारा 267 देखिए) प्रेविती— .............................................................(थिान) का.....................................................नाम मेरे समक्ष पररिाद ककया गया है कक .........................(पता) के.........................(अलभयुक् त का नाम) ने .....................................(समय और थिान सदहत अपराध संक्षेप में लिखखए) का अपराध ककया है (या संदेह है कक उसने ककया है) और मुझे यह प्रतीत होता है कक संभाव्य है कक आप अलभयोजन के लिए तास्विक साक्ष्य दें या कोई दथतािेज या अन्य चीज प्रथतुत करें ; इसलिए आपको समन ककया जाता है कक ऐसा दथतािेज या चीज प्रथतुत करन े या उक् त पररिाद के वििय स े संबद्ध आप जो कुि जानते हों उसका अलभसाक्ष्य देने के लिए इस न्यायािय के समक्ष तारीख..................को ददन में दस बजे उपस्थित हों और न्यायािय की इजाजत के बबना िहां से न जाएं और आपको इसके द्िारा चेतािनी दी जाती है कक यदद न्यायसंगत कारण के बबना आपन े उस तारीख पर उपस्थित होने में उपेक्षा की या उससे इंकार ककया तो आपको उपस्थित होने को वििश करन ेके लिए िारंट जारी ककया जाएगा । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________450 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 35 यदद कारावास या जुमादन ेका दंडादेश न्यायालय दवारा ददया िया है तो उस पर सुपुददिी का वारंट (धारा 258, धारा 271 और‍ धारा 278 देखिए) प्रेविती— ......................................................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी 20.............के किेण्डर के मामिे संख्यांक......................में कैदी (या यथिास्थितत पहिे, दस रे, तीसरे कैदी)...................(कैदी का नाम)...................................को मरे े द्िारा ............................(नाम और शासकीय पदालभधान) भारतीय न्याय संदहता की (या...........................................अगधतनयम की) धारा (या धाराओं)...........................के अधीन.............................(अपराधों का संक्षेप में िणनण कीस्जए) के अपराध के लिए दोिलसद्ध ककया गया और...............................(दंड प णतण या और थपष् टतया लिखखए) के लिए तारीख.............को दंडाददष् ट ककया गया । इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त.....................(कैदी का नाम) को उक् त कारागार में अपनी अलभरक्षा में इस िारंट के सदहत िेकर प िोक् त दंड को विगध के अनुसार तनष्पाददत करें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 451 प्ररूप सं० 36 प्रततकर का संदाय करने में असफल रहने पर कारावास का वारंट (धारा 273 देखिए) प्रेविती— ..........................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी ......................(नाम और िणनण ) ने ....................................(अलभयुक् त का नाम और िणनण ) के विरुद्ध यह पररिाद ककया है कक..................................(इसका संक्षेप में िणनण कीस्जए) और िह इस आधार पर खाररज कर ददया गया है कक उक् त (नाम)..................................के विरुद्ध अलभयोग िगाने के लिए उगचत आधार नहीं है और खाररज करन े का आदेश यह अगधतनणीत करता है कक उक् त......................................(पररिादी का नाम) द्िारा प्रततकर के रूप में...............................रुपए की रालश का संदाय ककया जाए ; और उक् त रालश अभी तक दी नहीं गई है और यह आदेश कर ददया गया है कक उस.े....................ददन की अिगध के लिए, यदद प िोक् त रालश उसस ेप ि णनहीं दे दी जाती है तो जेि में सादा कारािास में रखा जाए । इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त......................(नाम) को अपनी अलभरक्षा में इस िारंट के सदहत िें और भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा 8(6)(ख) के उपबंधों के अधीन रहत े हुए उसस े उक् त कारागार में उक् त अिगध .....................(कारािास की अिगध) के लिए, यदद उक् त रालश उसस े प ि ण नहीं दे दी जाती है तो सुरक्षक्षत रखें और उक् त रालश के प्राप् त होने पर उस े तत्काि थितंत्र कर दें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ाकं न द्िारा प्रमाखणत करते हुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________452 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 37 कारािार में बंद व्यक्क्‍त को ककसी अपराध के आरोप का उत्तर देने के भलए न्यायालय में प्रथतुत करने की अपेक्षा करने वाला आदेश (धारा 302 देखिए) प्रेविती— ............................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी उक् त कारागार में इस समय परररुद्ध/तनरुद्ध .........................................(बदं ी का नाम) की इस न्यायािय में उपस्थितत .................................................(आरोवपत अपराध संक्षेप में लिखखए) के आरोप का उत्तर देने के लिए या........................................ (कायिण ाही की संक्षक्षप् त विलशस्ष् टयां दीस्जए) कायिण ाही के प्रयोजनािण अपेक्षक्षत है ; इसलिए आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त...............................को सुरक्षक्षत और सुतनस्श् चत रूप से िाकर उक् त आरोप का उत्तर देने के लिए या उक् त कायिण ाही के प्रयोजनाि ण तारीख........................को ददन में...........................बजे इस न्यायािय के समक्ष प्रथतुत करें और इस न्यायािय द्िारा उस ेआगे उपस्थित करन े से ि ट ददए जाने पर उस ेउक् त कारागार को सुरक्षक्षत और सुतनस्श् चत रूप से िापस िे जाएं । और आपसे यह और अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त...........................को इस आदेश की अंतिथण त ुकी स चना दें और उसकी संिग् न प्रतत उसे पररदत्त करें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) प्रततहथताक्षररत (मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 453 प्ररूप सं० 38 कारािार में तनरुदध व्यक्क्‍त को साक्ष्य देने के भलए न्यायालय में प्रथतुत करने की अपेक्षा करने वाला आदेश (धारा 302 देखिए) प्रेविती— .....................................................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी इस न्यायािय के समक्ष पररिाद ककया गया है कक ........................(थिान) के.......................(अलभयुक् त का नाम) ने......................................(समय और थिान सदहत अपराध संक्षेप में लिखखए) का अपराध ककया है और यह प्रतीत होता है कक उक् त कारागार में इस समय परररुद्ध/तनरुद्ध .........................(बंदी का नाम) अलभयोजन/प्रततरक्षा के लिए तास्विक साक्ष्य दे सकता है ; इसलिए आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त.............................को सुरक्षक्षत और सुतनस्श् चत रूप से िाकर इस न्यायािय के समक्ष िंबबत मामि े में साक्ष्य देने के लिए तारीख...........................................को ददन में.....................बजे इस न्यायािय के समक्ष प्रथतुत करें और इस न्यायािय द्िारा उस े आगे उपस्थित करने से ि ट ददए जाने पर उस ेउक् त कारागार को सुरक्षक्षत और सुतनस्श् चत रूप से िापस िे जाएं ; और आपसे यह और अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त......................को इस आदेश की अंतिथण तु की स चना दें और उसकी संिग् न प्रतत उसे पररदत्त करें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) प्रततहथताक्षररत (मुद्रा) (हथताक्षर) ________454 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 39 अवमान के ऐस ेमामलों में सुपुददिी का वारंट क्जसमें जुमादना अगधरोवपत ककया िया है (धारा 384 देखिए) प्रेविती— ...........................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी आज मेरे समक्ष हुए न्यायािय में.............................................(अपराधी का नाम और िणणन) ने न्यायािय की उपस्थितत में (या दृस्ष्टगोचरता में) जानब झकर अिमान ककया है ; और ऐसे अिमान के लिए उक् त...............................................(अपराधी का नाम) को............रुपए का जुमाणना देने के लिए या उसमें च क करने पर ..................................... (मास या ददनों की संख्या लिखखए) अिगध के लिए सादा कारािास भुगतने के लिए न्यायािय द्िारा न्यायतनणीत ककया गया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त....................(अपराधी का नाम) को अपनी अलभरक्षा में इस िारंट सदहत िें और, उक् त कारागार में......................(कारािास की अिगध) की उक् त अिगध के लिए, जब तक उक् त जुमाणना उसस ेप ि णन दे ददया जाए, सुरक्षक्षत रखें और उक् त जुमाणने के प्राप् त होने पर उस ेतत्काि थितंत्र कर दें और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 455 प्ररूप सं० 40 उत्तर देने से या दथतावेज प्रथतुत करने से इंकार करने वाले साक्षी की सुपुददिी‍के भलए मक्जथरेट या न्यायाधीश का वारंट (धारा 388 देखिए) प्रेविती— ....................................................(न्यायािय के अगधकारी का नाम और पदालभधान) ....................................(नाम और िणनण ) ने साक्षी के रूप में समन ककए जान े पर (या इस न्यायािय के समक्ष िाए जान ेपर) और अलभकगित अपराध की जांच में साक्ष्य देने की आज अपेक्षा की जान ेपर उक् त अलभकगित अपराध के बारे में उससे प िे गए और सम्यक् रूप से अलभलिखखत प्रश् न (या प्रश् नों) का उत्तर देने से या दथतािेज प्रथतुत करन ेकी अपेक्षा ककए जान े पर ऐसे दथतािेज को प्रथतुत करन े से इंकार ककया है और इंकार करन े के लिए ककसी न्यायसंगत प्रततहेतु का अलभकिन नहीं ककया है और इस इंकार के लिए उसको ....................................(न्यायतनणीत तनरोध की अिगध) के लिए अलभरक्षा में तनरुद्ध ककए जान ेके लिए आदेलशत ककया गया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त..................... ..........................(नाम) को अपनी अलभरक्षा में िें और उस ेअपनी अलभरक्षा में ..................ददनों की अिगध के लिए, जब तक कक इस बीच में ही िह अपनी ऐसी परीक्षा ककए जाने और उसस ेप िे गए प्रश् नों का उत्तर देने के लिए या उसस े अपेक्षक्षत दथतािेज को प्रथतुत करन ेके लिए सहमत न हो जाए, सुरक्षक्षत रखें और उस ेइन ददनों में से अंततम ददन, या ऐसी सहमतत के ज्ञात होने पर तत्काि, विगध के अनुसार कारणिाई की जाने के लिए इस न्यायािय के समक्ष िाएं और इस िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करते हुए इसे िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________456 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं०‍41 मत्ृ यु दडं ादशे के अिीन सपु दु गण ी का वारंट (िारा 407 दजे िए) प्रेजिती— ......................................................(स्ट्थान) की कारागार का भारसािक अजिकारी तारीि...................को मेरे समक्ष हुए सेशन म ें............................................(कैदी का नाम), िो कक उक्‍त सेशन म ें 20....................................................के कलेण्डर के मामला संख्यांक............................में कैदी (या यथाजस्ट्थजत, पहला, दसू रा, तीसरा कैदी) ह,ै भारतीय न्याय संजहता, 2023 की िारा ..........................................के अिीन हत्या की कोरट म ें आन े वाले आपराजिक मानववि के अपराि के जलए सम्यक रूप से दोिजसद्ध ककया गया था और ..........................के..............................न्यायालय द्वारा उक्‍त दंडादेश की पुजि ककए िाने के अध्यिीन रहते हुए, मृत्यु के जलए दंडाकदष्‍ट हुआ ; इसजलए आपको प्राजिकृत ककया िाता ह ै और आपस े अपेक्षा की िाती ह ै कक आप उक्‍त...................... .........................................................(कैदी का नाम) को उक्‍त कारागार में इस िारंट के सजहत अपनी अजभरक्षा में लें और उसे‍वहां‍तब तक सुरजक्षत रिें िब तक कक उक्‍त....................................................................न्यायालय के आदेश को प्रभावशील करने के जलए इस न्यायालय का अततररक्त िारंट या आदशे आपको न जमले । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 457 प्ररूप सं० 42 दंडादेश के लघूकरण के पश्‍चात ्वारंट (धारा 427,‍ धारा 453 और धारा 456 देखिए) प्रेविती— ....................................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी तारीख..................को हुए सेशन में ...................................................(बंदी का नाम), जो उक् त सेशन में 20.................के किेण्डर के मामिा संख्यांक........................... में बंदी (या, यिास्थितत, पहिा, दस रा, तीसरा बंदी) है, भारतीय न्याय संदहता, 2023 की धारा.................के अधीन दंडनीय................के अपराध के लिए दोिलसद्ध ककया गया िा और............................के लिए दंडाददष् ट ककया गया िा और तब आपकी अलभरक्षा में सुपुदण ककया गया िा तिा.....................के...............न्यायािय के आदेश द्िारा (स्जसकी दस री प्रतत इसके साि संिग् न है) उक् त दंडादेश द्िारा न्यायतनणीत दंड का आजीिन कारािास के दंड के रूप में िघ करण ककया गया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त................................................ (बदं ी का नाम) को उक् त कारागार में अपनी अलभरक्षा में, विगध द्िारा यिा अपेक्षक्षत, तब तक सुरक्षक्षत रखें जब तक िह उक् त आदेश के अधीन आजीिन कारािास का दंड भगु तने के प्रयोजन के लिए आपके द्िारा समुगचत प्रागधकारी को और अलभरक्षा में पररदत्त न कर ददया जाए, या यदद कम ककया गया दंडादेश कारािास का है तो “उक् त कारागार में अपनी अलभरक्षा में” शब्दों के पश् चात ् लिखखए “सुरक्षक्षत रखें और िहां उक् त आदेश के अधीन कारािास के दंड को विगध के अनुसार तनष्पाददत करें” । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________458 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 43 मत्ृ यु दंडादेश के तनष्पादन का वारंट (धारा 453 और धारा 454 देखिए) प्रेविती— ...........................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी तारीख.................. को मेरे समक्ष हुए सेशन में 20.......................के किेण्डर के मामिा संख्यांक.............में कैदी...........................(या, यिास्थितत, पहिा, दस रा, तीसरा कैदी) .............................(कैदी का नाम) इस न्यायािय के तारीख....................के िारंट द्िारा मत्ृ यु का दंडादेश देकर आपकी अलभरक्षा में सपु ुदण ककया गया िा ; तिा उक् त दंडादेश की पुस्ष् ट करन ेिािा उच् च न्यायािय का आदेश इस न्यायािय को प्राप् त हो गया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त.................................को .....................................(तनष्पादन का समय और थिान) में जब तक िह मर न जाए तब तक गदणन से िटकिाकर उक् त दंडादेश का तनष्पादन करें और यह िारंट इस न्यायािय को पष्ृ ‍ांकन द्िारा यह प्रमाखणत करते हुए िौटा दें कक दंडादेश का तनष्पादन कर ददया गया है । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 459 प्ररूप सं० 44 कुकी और ववक्रय दवारा जुमादन ेका उद‍ग्रहण करने के भलए वारंट (धारा 461 देखिए) प्रेविती— .............................................(उस पुलिस अगधकारी का या उस अन्य व्यस्क् त का या उन अन्य व्यस्क् तयों के नाम और पदालभधान स्जसे या स्जन्हें िारंट तनष्पाददत करना है) । .....................................................(अपराधी का नाम और िणनण ) तारीख..............................को ..............................................(अपराध का संक्षेप में िणनण कीस्जए) के अपराध के लिए मेरे समक्ष दोिलसद्ध ककया गया िा और...............................................रुपए का जुमाणना देने के लिए दंडाददष् ट ककया गया िा तिा उक् त............................................(नाम) ने उक् त जुमाणना देने की अपेक्षा की जाने पर भी िह जुमाणना या उसका कोई भाग नहीं ददया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप........................................स्जिे के भीतर पाई जाने िािी उक् त..................................(नाम) की ककसी भी चि संपवत्त को कुकण करें ; और यदद ऐसी कुकी के ‍ीक पश् चात.्.............................................(अनुज्ञात ददनों या घंटों की संख्या) के भीतर (या तत्काि) उक् त रालश न दी जाए तो कुकण की गई चि संपवत्त का या उसके इतने भाग का स्जतना उक् त जुमाणने की प तत णके लिए पयाणप् त हो, विक्रय कर दें और इस िारंट के अधीन जो कुि आपन ेककया हो उस ेप्रमाखणत करत ेहुए इसे, इसका तनष्पादन हो जाने पर, पष्ृ ‍ांकन करके तुंरत िौटा दें । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________460 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 45 जुमादने की वसूली के भलए वारंट (धारा 461 देखिए) प्रेविती— .........................................................स्जिे का किेक्टर । .............................................(अपराधी का नाम, पता और िणणन) को 20...............के..........................मास के ......................................ददन................................................(अपराध का संक्षक्षप् त िणणन कीस्जए) के अपराध के लिए मेरे समक्ष लसद्धदोि ककया गया िा और.............................................रुपए का जुमाणना देन े के लिए दंडाददष् ट ककया गया िा ; और उक् त ................................................. (नाम) से यद्यवप उक् त जुमाणना देने की अपेक्षा की गई िी ककंत ु उसने िह जुमाणना या उसका कोई भाग नहीं ददया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अनुरोध ककया जाता है कक आप उक् त............................................ (नाम) की चि या अचि संपवत्त या दोनों से उक् त जुमाणने की रकम भ -राजथि की बकाया के रूप में िस ि कीस्जए और अवििंब यह प्रमाखणत कीस्जए कक आपने इस आदेश के अनुसरण में क्या ककया है । तारीख ............................. (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 461 प्ररूप सं० 46 जुमादने के वसूल होने तक छो़िे िए अपराधी के उपक्थित होने के भलए बंधपत्र [धारा 464(1)(ि) देखिए] म.ैं...............................................................(नाम) ..........................................................(थिान) का तनिासी ह ं । मुझे..........................................रुपए का जुमाणना देने के लिए दंडाददष् ट ककया गया िा और जुमाणना देने में व्यततक्रम होने पर......................................(अिगध) के लिए कारािास का दंडादेश ददया गया है । न्यायािय ने इस शत ण पर मेरे िो़िे जाने का आदेश ककया है कक म ैं तनम् नलिखखत तारीख (या तारीखों) को उपस्थित होने के लिए एक बंधपत्र तनष्पाददत करूं, अिाणत ्:— म ैं इसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं कक म.ैं....................................न्यायािय के समक्ष तनम् नलिखखत तारीख (या तारीखों) को, अिाणत.्..................को...................बजे उपस्थित होऊंगा और म ैं अपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद म ैंइसमें व्यततक्रम करूं तो मेरी ..................................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ............................................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) जहां बंधपत्र प्रततिुओं के साि तनष्पाददत ककया जाना है वहां यह जो़िें हम इसके द्िारा अपने को उपयुक्ण त.....................................(नाम) के लिए इस बात के लिए प्रततभ घोवित करत े हैं कक िह .......................................न्यायािय के समक्ष तनम् नलिखखत तारीख (या तारीखों) अिाणत.्.........................................को उपस्थित होगा और हम इसके द्िारा अपने को संयुक् तत: और पिृ क् त: आबद्ध करत े हैं कक इसमें उसके द्िारा व्यततक्रम ककए जाने पर हमारी.................................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । (हथताक्षर) ________462 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 47 िाने या न्यायालय के िारसाधक अगधकारी के समक्ष उपक्थित होने के भलए बंधपत्र और जमानतपत्र [धारा 478, धारा 479, धारा 480, धारा 481, धारा 482(3) और धारा 485 देखिए] म.ैं.................................(नाम)....................................(थिान) का तनिासी ह ूँ .....................................िान े के भारसाधक अगधकारी द्िारा बबना िारंट गगरफ्तार या तनरुद्ध कर लिए जाने पर (या.................न्यायािय के समक्ष िाए जाने पर) अपराध से आरोवपत ककया गया ह ं तिा मुझसे ऐसे अगधकारी या न्यायािय के समक्ष उपस्थितत के लिए प्रततभ तत देने की अपेक्षा की गई है ; मैं अपने को इस बात के लिए आबद्ध करता ह ं कक मैं ऐसे अगधकारी या न्यायािय के समक्ष ऐसे प्रत्येक ददन, उपस्थित होऊंगा, स्जसमें ऐसे आरोप की बाबत कोई अन्िेिण या विचारण ककया जाए, तिा म ैं अपने को आबद्ध करता ह ं कक यदद इसमें म ैं च क करूं तो मेरी ............................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ..................... (हथताक्षर) म ैं इसके द्िारा अपने को (या हम संयुकतः और पिृ कतः अपने को और अपने में से प्रत्येक को) उपरोक् त……………..................(नाम) के लिए इस बात के लिए प्रततभ घोवित करता ह ं (या करत े हैं) कक िह.....................................िान े के भारसाधक अगधकारी या................................ न्यायािय के समक्ष ऐसे प्रत्येक ददन, स्जसको आरोप का अन्िेिण ककया जाएगा या ऐसे आरोप का विचारण ककया जाएगा, उपस्थित होगा, कक िह ऐसे अगधकारी या न्यायािय के समक्ष (यिास्थितत) ऐसे अन्िेिण के प्रयोजन के लिए या उसके विरुद्ध आरोप का उत्तर देने के लिए उपस्थित होगा और म ैंइसके द्िारा अपने को आबद्ध करता ह ं (या हम अपने को आबद्ध करत ेहैं) कक इसमें उसके द्िारा च क ककए जाने की दशा में मेरी/हमारी..............रुपए की रालश सरकार को जब्त हो जाएगी । तारीख ...................... (हस्ट्ताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 463 प्ररूप सं० 48 प्रततिूतत देने में असफल रहने पर कारावाभसत व्यक्क्‍त के उन्मोचन के भलए वारंट (धारा 487 देखिए) प्रेविती— .....................................(थिान) की कारागार का भारसाधक अगधकारी (या िह अन्य अगधकारी स्जसकी अलभरक्षा में उक् त व्यस्क् त है) (बन्दी का नाम और िणनण ) तारीख..............................के इस न्यायािय के िारंट के अधीन आपकी अलभरक्षा में सुपुदण ककया गया िा और उसने तत्पश् चात ्अपने प्रततभ (या प्रततभुओं) के सदहत भारतीय नागररक सुरक्षा संदहता, 2023 की धारा 485 के अधीन बन्धपत्र सम्यक् रूप से तनष्पाददत कर ददया है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त…………. (नाम) को अपनी अलभरक्षा से, जब तक कक ककसी दस री बात के लिए उसका तनरुद्ध ककया जाना आिश्यक न हो, तत्काि उन्मोगचत कर दें । तारीख................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________464 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 49 बन्धपत्र प्रवतततद कराने के भलए कुकी का वारंट (धारा 491 देखिए) प्रेविती— ........................................(थिान) के पुलिस िाने का भारसाधक पुलिस अगधकारी । (व्यस्क् त का नाम, िणणन और पता) अपने मुचिके के अनुसरण में…………………. (अिसर का उलिेख करें) पर उपस्थित होन ेमें असफि रहा है और इस व्यततक्रम के कारण उसकी……………………… (बंधपत्र में िखणतण शास्थत) रुपए की रालश सरकार को जब्त हो गई है और उक् त………………… (व्यस्क् त का नाम), को सम्यक् स चना ददए जान े पर, उक् त रालश देने में या इस बात का कक उक् त रालश की िस िी उससे क्यों न की जाए, पयाणप् त कारण बतान ेमें असफि रहा है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है कक और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त……………………. (नाम) की......................स्जिे के भीतर पाई जाने िािी चि सम्पवत्त को, उसका अलभग्रहण और तनरोध करके कुकण कर िें और यदद उक् त रालश............................ ददन के भीतर नहीं दे दी जाती है तो इस प्रकार कुकण की गई सम्पवत्त को या उसके उतने भाग को, जो उपयुक्ण त रालश की िस िी के लिए पयाणप् त हो, बेच दें और इस िारंट का तनष्पादन करन ेपर तुंरत यह वििरण दें कक आपने इस िारंट के अधीन क्या ककया है । तारीख ......................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 465 प्ररूप सं०‍50 बिं पत्र के भगं होन ेपर प्रजतभू को सचू ना (िारा 491 दजे िए) प्रेजिती— .....................................................(नाम और पता) आप तारीि.............................को......................................(नाम)..................(स्ट्थान) के प्रजतभू बने थे कक वह इस न्यायालय के समक्ष.................................(तारीि) को उपस्थित होगा और आपने अपने को आबद्ध ककया था कक यकद इसमें व्यजतक्रम होता ह ै तो आपकी....................रुपए की राजश सरकार को जब्त हो िाएगी ; और उक्‍त........................(नाम) इस न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने में असफल रहा ह ै और इस व्यजतक्रम के कारर् आपकी...........................रुपए की उपयुणक्‍त राजश जब्त हो गई ह ै। इसजलए आपसे अपेक्षा की िाती ह ै कक आप आि की तारीि से...........................कदन के भीतर उक्‍त शाजस्ट्त का संदाय कर दें या यह कारर् बताएं कक आपसे उक्‍त राजश वसूल क्यों न की िाए । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________466 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं०‍51 सदाचार के जलए बिं पत्र की की प्रजतभ ूको सचू ना जब्ती (िारा 491 दजे िए) प्रेजिती— .........................................................(नाम और पता) आप तारीि ...........................को.........................................(नाम).............................................(स्ट्थान) के जलए इस बंिपत्र द्वारा प्रजतभू बने थे कक वह.......................अवजि के जलए सदाचारी रहेगा और आपने अपने को आबद्ध ककया था कक इसमें व्यजतक्रम होने पर आपकी...................................रुपए की राजश सरकार को जब्त हो िाएगी ; और आपके ऐसे प्रजतभ ूबनने के बाद से उक्‍त...........................(नाम) को..................................(यहां पर संक्षेप में अपराि का उल्लेि करें) के अपराि के जलए दोिजसद्ध ककया गया ह,ै इस कारर् आपका प्रजतभूजत बंिपत्र जब्त हो गया ह ै; इसजलए आपसे अपेक्षा की िाती ह ै कक आप...............................कदन के भीतर उक्‍त.............................रुपए की शाजस्ट्त दे दें या यह कारर् बताएं कक उसका संदाय क्यों नहीं ककया िाना चाजहए । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ‍ ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 467 प्ररूप सं०‍52 प्रजतभ ूके जवरुद्ध कुकी का वारंट (िारा 491 दजे िए) प्रेजिती— ..................................................(नाम और पता) ......................................(नाम, वर्णन और पता) न े अपन े को.......................................की उपस्थितत के जलए प्रजतभ ू के रूप में आबद्ध ककया है कक (बंिपत्र की शतण का उल्लेि कीजिए) और उक्‍त…………………… (नाम) न े व्यजतक्रम ककया ह ै और इस कारर् उसकी...................................................(बंिपत्र में वर्र्णत शाजस्ट्त) रुपए की राजश सरकार को जब्त हो गई ह ै; इसजलए आपको प्राजिकृत ककया िाता ह ै और आपस े अपेक्षा की िाती ह ै कक आप उक्‍त………………….. (नाम) की..............................जिले के भीतर पाई िाने वाली चि सम्पजत्त को, उसका अजभग्रहर् और जनरोि करके कुकण कर लें ; और यकद उक्‍त राजश...........................कदन के भीतर नहीं दे दी िाती ह ै तो इस प्रकार कुकण की गई सम्पजत्त को या उसके उतने भाग को िो उपयुणक्‍त राजश की वसूली के जलए पयाणप्त‍ हो, बेच दें और इस िारंट का जनष्पादन करने पर तुंरत यह जववरर् दें कक आपने इस िारंट के, अिीन क्या ककया ह ै। तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________468 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 53 जमानत पर छो़िे िए अभियुक्‍त व्यक्क्त‍ के प्रततिू की सुपुददिी का वारंट (धारा 491 देखिए) प्रेविती— ......................................................(थिान) की लसविि कारागार का अधीक्षक (या पािक) । ............................................................(प्रततभ का नाम और िणनण ) ने अपने को.................की उपस्थितत के लिए प्रततभ के रूप में आबद्ध ककया है कक………………… (बंधपत्र की शत ण का उलिखे कीस्जए) और उक् त………………….. (नाम) ने इसमें व्यततक्रम ककया है इसलिए उक् त बंधपत्र में िखणतण शास्थत सरकार को जब्त हो गई है ; और उक् त……………………… (प्रततभ का नाम), को सम्यक् स चना ददए जाने पर भी उक् त रालश का संदाय करन ेमें या ऐसा पयाणप् त कारण बताने में असफि रहा है कक उसस ेउक् त रालश िस ि क्यों न की जाए तिा िह रालश उसकी चि सम्पवत्त की कुकी और उस े बेचकर िसि नहीं की जा सकती है, और लसविि कारागार में......................................(अिगध का उलिेख कीस्जए) के लिए उसके कारािास का आदेश ककया गया है ; इसलिए आप अिाणत ्उक् त अधीक्षक (या पािक) को प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त ..........................................(नाम) को इस िारंट सदहत अपनी अलभरक्षा में िें और उसे उक् त कारागार में उक् त………………… (कारािास की अिगध) के लिए सुरक्षक्षत रखें और िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 469 प्ररूप सं० 54 पररशाक्न्त कायम रिने के भलए बंधपत्र की‍जब्तीकताद को सूचना (धारा 491 देखिए) प्रेविती— ............................................(नाम, िणनण और पता) आपने तारीख ..........................................को यह बंधपत्र तनष्पाददत ककया िा कक आप.............(जैसा बंधपत्र में हो) नहीं करेंगे और उस बंधपत्र की जब्ती का सब त मेरे समक्ष ददया गया है और िह सम्यक् रूप से अलभलिखखत कर लिया गया है ; इसलिए आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप मेरे समक्ष...................ददन के भीतर..............................रुपए की उक् त शास्थत का संदाय कर दें या यह कारण बताएं कक आपसे उक् त रालश िस ि क्यों न की जाए । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________470 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं० 55 पररशांतत कायम रिने के भलए बंधपत्र के िंि होने पर कताद की सम्पवत्त की कुकी का वारंट (धारा 491 देखिए) प्रेविती— ............................(थिान) के पुलिस िाने का................................(पुलिस अगधकारी का नाम और पदनाम) । .................................................(नाम और िणणन) ने तारीख........................को.............................. रुपए की रालश के लिए एक बंधपत्र तनष्पाददत ककया िा स्जसमें उसने अपने को आबद्ध ककया िा कक िह पररशांतत का भंग आदद (जैसा बंधपत्र में हो) नहीं करेगा और उक् त बंधपत्र की जब्ती का सब त मेरे समक्ष ददया गया है और िह सम्यक् रूप स ेअलभलिखखत कर लिया गया है ; और उक् त (नाम)......................................... को स चना देकर उसस ेअपेक्षा की गई है कक िह कारण बताए कक उक् त रालश का संदाय क्यों नहीं ककया जाना चादहए तिा िह ऐसा करन े में या उक् त रालश का संदाय करन ेमें असफि रहा है ; इसलिए आपको प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त (नाम) की......................स्जिे में पाई जाने िािी...........................रुपए के म लय की चि सम्पवत्त को, उसका अलभग्रहण करके कुकण कर िें और यदद उक् त रालश ...............................के भीतर नहीं दे दी जाती है तो इस प्रकार कुकण की गई सम्पवत्त या उसके उतने भाग का जो उस रालश की िस िी के लिए पयाणप् त हो, विक्रय कर दें और िारंट का तनष्पादन करन ेपर तुरंत यह वििरण दें कक आपन ेइस िारंट के अधीन क्या ककया है । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 471 प्ररूप सं० 56 पररशांतत बनाए रिने के भलए बंधपत्र के िंि होने पर कारावास का वारंट (धारा 491 देखिए) प्रेविती— ........................................(थिान) की लसविि कारागार का अधीक्षक (या पािक) । मेरे समक्ष इस बात का सब त ददया गया है और िह सम्यक् रूप से अलभलिखखत ककया गया है कक ...........................................................(नाम और िणनण ) ने उस बंधपत्र का भंग ककया है जो उसने पररशांतत बनाए रखन ेके लिए तनष्पाददत ककया िा और इसलिए उसकी........................रुपए की रालश सरकार को जब्त हो गई है, और उक् त………………… (नाम) ऊपर बताई गई रालश का संदाय करन े में या यह कारण बतान े में कक उक् त रालश का संदाय क्यों नहीं ककया जाना चादहए, असफि रहा है, यद्यवप उसस े ऐसा करन े की सम्यक् रूप से अपेक्षा की गई िी तिा उक् त रालश की िस िी उसकी चि सम्पवत्त की कुकी करके नहीं की जा सकती है और………………………. (कारािास की अिगध) की अिगध के लिए लसविि कारागार में उक् त…………………… (नाम) के कारािास के लिए आदेश ककया गया है ; इसलिए आपको अिाणत ्उक् त लसविि कारागार के अधीक्षक (या पािक) को प्रागधकृत ककया जाता है और आपस े अपेक्षा की जाती है कक आप…………………….. (नाम) को इस िारंट सदहत अपनी अलभरक्षा में िें और उस े उक् त अिगध………………. (कारािास की अिगध) के लिए उक् त जेि में सुरक्षक्षत रखें और िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ाकं न द्िारा प्रमाखणत करते हुए इसे िौटा दें । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________472 भारत का राजपत्र असाधारण [भाग 2— प्ररूप सं०‍57 सदाचार के बिं पत्र की‍जब्ती पर कुकी और जवक्रय का वारंट (िारा 491 दजे िए) प्रेजिती— ...................................................(स्ट्थान) के पुजलस थान ेका भारसािक पुजलस अजिकारी ................................................(नाम, वर्णन और पता) ने तारीि.......................को..............................(कता ण का नाम आकद) के सदाचार के जलए......................रुपए की राजश के बंिपत्र द्वारा प्रजतभूजत दी थी और मेरे समक्ष यह सबूत कदया गया ह ै और वह सम्यक रूप से अजभजलजित ककया गया ह ै कक उक्‍त………………….. (नाम) ने...............................का अपराि ककया ह ैऔर इसजलए उक्‍त बंिपत्र जब्त हो गया ह,ै और उक्‍त……………….. (नाम) को यह अपेक्षा करते हुए सूचना दी गई थी कक वह कारर् बताए कक उक्‍त रकम का संदाय क्यों नहीं ककया िाना चाजहए तथा वह ऐसा करने में या उक्‍त राजश का संदाय करने में असफल रहा ह ै; इसजलए आपको प्राजिकृत ककया िाता ह ैऔर आपसे अपेक्षा की िाती ह ैकक आप उक्‍त…………………… (नाम) की.............जिले में पाई िाने वाली..................................रुपए के मूल्य की चि सम्पजत्त को, उसका अजभग्रहर् करके कुकण कर लें और यकद उक्‍त राजश ....................................के भीतर नहीं दे दी िाती ह ै तो इस प्रकार कुकण की गई सम्पजत्त या उसके उतने भाग काा िो उस राजश की वसूली के जलए पयाणप्त‍ हो, विक्रय कर दें और इस िारंट का जनष्पादन करने पर तुरंत यह जववरर् दें कक आपने इस िारंट के अिीन क्या ‍ककया ह ै। तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) ________अनुभ ाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 473 प्ररूप सं० 58 सदाचार के भलए बंधपत्र की‍जब्ती पर कारावास का वारंट (धारा 491 देखिए) प्रेविती— .....................................................(थिान) की लसविि कारागार का अधीक्षक (या पािक) ............................................................(नाम, िणनण और पता) ने तारीख..................................................को ...............................................(कताण का नाम आदद) के सदाचार के लिए.................................रुपए की रालश के बंधपत्र द्िारा प्रततभ तत दी िी और उक् त बंधपत्र के भंग ककए जाने का सब त मेरे समक्ष ददया गया है और िह सम्यक् रूप से अलभलिखखत कर लिया गया है और इसलिए उक् त…………………… (नाम) की...................................की रुपए की रालश सरकार को जब्त हो गई है ; और िह उक् त रालश का संदाय करन ेमें या यह कारण बताने में कक उक् त रालश का संदाय क्यों नहीं ककया जाना चादहए, असफि रहा है, यद्यवप उसस े ऐसा करन े की अपेक्षा सम्यक् रूप से की गई िी और उक् त रालश की िसि ी उसकी चि सम्पवत्त की कुकी द्िारा नहीं की जा सकती है, और लसविि कारागार में...........................................(कारािास की अिगध) अिगध के लिए उक् त…………………….. (नाम) के कारािास के लिए आदेश कर ददया गया है ; इसलिए आप अिाणत ्अधीक्षक (या पािक) को प्रागधकृत ककया जाता है और आपसे अपेक्षा की जाती है कक आप उक् त………………….. (नाम) को इस िारंट सदहत अपनी अलभरक्षा में िें और उस े उक् त कारागार में उक् त अिगध…………………….. (कारािास की अिगध) के लिए सरु क्षक्षत रखें और िारंट के तनष्पादन की रीतत को पष्ृ ‍ांकन द्िारा प्रमाखणत करत ेहुए इसे िौटा दें । तारीख ..................... (न्यायािय की मुद्रा) (हथताक्षर) __________अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 475 भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (2023 का अधिनियम संखयांक 47) [25 दिसम्बर, 2023] निष्पक्ष विचारण के लिए साक्ष्य के सािारण नियमों और लसदिांतों को समेककत करिे तथा उिका उपबंि करि े के लिए अधिनियम भारत गणराज्य के चौहत्तरवें वर् ष में संसद् द्वारा ननम्नलिखित रूप में यह अधधननयलमत हो :— भाग 1 अध् याय 1 प्रारंलभक 1. (1) इस अधधननयम का संक्षिप्त नाम भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 2023 है । संक्षिप्त नाम, िागू होना और (2) यह ककसी न्यायािय में या उसके समि सभी न्यानयक कायवष ाहहयों को िागू प्रारंभ । होता है, जजसके अंतगतष सेना न्यायािय भी सजम्मलित है, ककंतु न तो ककसी न्यायािय या अधधकारी के समि प्रस्ततु ककए गए शपथ-पत्रों को, न ही ककसी मध्यस्थ के समि की कायवष ाहहयों को िागू होता है । (3) यह उस तारीि को प्रवत्तृ होगा, जजसे केन्रीय सरकार, राजपत्र में अधधसूचना द्वारा, ननयत करे ।476 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पररभार्ाएं । 2. (1) इस अधधननयम में, जब तक कक संदभ ष से अन्यथा अपेक्षित न हो,— (क) “न्य ायािय” के अन्त गषत सभी न्य ायाधीश और मजजस् रेट, तथा मध् यस् थों के लसवाय, साक्ष् य िेने के लिए ववधध द्वारा प्राधधकृत सभी व्य ज‍ त आते हैं ; (ि) “ननश् चायक सबूत” से अलभप्रेत है कक जब इस अधधननयम द्वारा एक तथ् य को ककसी अन्य तथ् य का ननश् चायक सबूत घोवर्त ककया जाता है, वहां न्य ायािय उस एक तथ् य के साबबत हो जाने पर उस अन्य को साबबत हुआ मानेगा, और उसे नासाबबत करन े के प्रयोजन के लिए साक्ष् य हदए जाने की अनुमनत नहीं देगा ; (ग) तथ्य के संबंध में, “नासाबबत” से अलभप्रेत है कक जब न्य ायािय अपने समि ववर्यों पर ववचार करन े के पश् चात ् या तो यह ववश् वास करता है कक उसका अजस् तत् व नहीं है, या उसके अनजस् तत् व को इतना अधधसम् भाव् य समझे कक उस ववलशष् ट मामिे की पररजस् थनतयों में ककसी प्रज्ञावान व् यज‍ त को इस अनुमान पर काय ष करना चाहहए कक उस तथ् य का अजस् तत् व नहीं है ; (घ) “दस् तावेज” से ऐसा कोई ववर्य अलभप्रेत है जजसको ककसी पदाथ ष पर अिरों, अंकों या धचह्नों के साधन द्वारा या उनमें से एक से अधधक साधनों द्वारा अलभव् य‍ त या वखणतष या अन्यथा अलभिेिबद्ध ककया गया है जो उस ववर्य के अलभिेिन के प्रयोजन से उपयोग ककए जाने को आशनयत हो या जजसका उपयोग ककया जा सके और इसके अंतगतष इिै‍राननक और डिजजटि अलभिेि भी सजम्मलित हैं । दृष् ‍ांत (i) िेि दस् तावेज है । (ii) मुहरत, लशिामुहरत या फोटोधचबत्रत शब् द दस् तावेज हैं । (iii) मानधचत्र या रेिांक दस् तावेज है । (iv) धातुपट्ट या लशिा पर उत् कीण ष िेि दस् तावेज है । (v) व्यंगधचत्र दस् तावेज है । (vi) ई-मेि, सवरष िॉग, इिै‍राननक अलभिेि, कंप्यूटर, िैपटॉप या स्माटष फोन में दस्तावेज, मैसेज, वेबसाइट, स्थानीय साक्ष्य और डिजजटि ड़िवाइस में संग्रहहत वॉयस मेि मैसेज दस्तावेज हैं ; (ङ) “साक्ष् य” स े अलभप्रेत है और उसके अन्त गतष आते हैं— (i) सभी कथन, जजसके अंतगतष इिै‍राननक रूप से हदए गए कथन सजम्मलित हैं, जजसे न्यायािय जांच के अधीन तथ् य के ववर्यों के संबंध में अपने समि साक्षियों द्वारा ककए जाने की अनुमनत देता है या अपेिा करता है और ऐसे कथन मौखिक साक्ष् य कहिाते हैं ; (ii) न्य ायािय के ननरीिण के लिए प्रस्तुत ककए गए सभी दस् तावेज, जजनके अंतगषत इिै‍ राननक या डिजजटि अलभिेि भी हैं और ऐसे दस् तावेज दस् तावेजी साक्ष् य कहिाते हैं ; (च) “तथ् य” से अलभप्रेत है और उसके अन्त गतष आते हैं— (i) ऐसी कोई वस् त,ु वस् तुओं की अवस् था या वस् तुओं का संबंध, जो इजन्र यों द्वारा बोधगम् य हो ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 477 (ii) कोई मानलसक दशा, जजसका बोध ककसी व् यज‍ त को हो । दृष् ‍ांत (i) यह कक अमुक स् थान में अमुक क्रम से अमुक पदाथ ष व् यवजस् थत हैं, एक तथ् य है । (ii) यह कक ककसी व्यज‍त ने कुछ सुना या देिा, एक तथ् य है । (iii) यह कक ककसी व्यज‍त ने अमुक शब् द कहा, एक तथ् य है । (iv) यह कक कोई मनुष् य अमुक राय रिता है, अमुक आशय रिता है, सद्भ ावपूवकष या कपटपूवकष काय ष करता है, या ककसी ववलशष् ट शब् द को ववलशष् ट भाव में प्रयोग करता है, या उसे ककसी ववलशष् ट संवेदना का बोध ककसी ववननहदषष् ट समय में है या था, एक तथ् य है ; (छ) “वववाद्यक तथ् य” से अलभप्रेत है और उसके अन्त गतष ऐसा कोई भी तथ् य आता है, जो स्वयं से, या अन् य तथ् यों के संबंध में ककसी ऐसे अधधकार, दानयत् व या ननयोग् यता के, जजसका ककसी वाद या कायवष ाही में दृढ़कथन ककया गया है या उससे इंकार ककया गया है, अजस् तत् व, अनजस् तत् व, प्रकृनत या ववस् तार की उत्पवत्त अवश् यमेव होती है । स् पष् ‍ीकरण—जब कभी, कोई न्य ायािय वववाद्यक तथ् य को लसववि प्रकक्रया से संबंधधत ककसी तत् समय प्रवत्तृ ववधध के उपबन् धों के अधीन अलभलिखित करता है, तब ऐसे वववाद्यक के उत्तर में जजस तथ् य का दृढ़कथन ककया जाना है या उससे इंकार ककया जाना है, वह वववाद्यक तथ् य है । दृष् ‍ांत ख की हत् या का क अलभयु‍ त है । उसके ववचारण में ननम् नलिखित तथ् य वववाद्य हो सकते हैं— (i) यह कक क ने ख की मत्ृ यु काररत की । (ii) यह कक क का आशय ख की मत्ृ य ु काररत करन े का था । (iii) यह कक क को ख से गम्भ ीर और अचानक प्रकोपन लमिा था । (iv) यह कक ख की मत्ृ यु काररत करते समय क धचत्त-ववकृनत के कारण उस काय ष की प्रकृनत जानने में असमथ ष था ; (ज) “उपधारणा कर सकेगा”—जहां कहीं इस अधधननयम द्वारा यह उपबजन्ध त है कक न्य ायािय ककसी तथ् य की उपधारणा कर सकेगा, वहां न्य ायािय या तो ऐसे तथ् य को साबबत हुआ मान सकेगा, जब तक कक वह नासाबबत नहीं ककया जाता है, या उसके सबूत की मांग कर सकेगा ; (झ) “साबबत नहीं हुआ”—कोई तथ् य साबबत नहीं हुआ कहा जाता है, जब वह न तो साबबत ककया गया है और न तो नासाबबत ; (ञ) “साबबत”—कोई तथ् य साबबत हुआ कहा जाता है, जब न्य ायािय अपने समि के ववर्यों पर ववचार करन े के पश् चात ् या तो यह ववश् वास करे कक उस तथ् य का अजस् तत् व है या उसके अजस् तत् व को इतना अधधसम् भाव् य समझे कक उस ववलशष् ट मामिे की पररजस् थनतयों में ककसी प्रज्ञावान व् यज‍ त को इस अनुमान पर काय ष करना चाहहए कक उस तथ् य का अजस् तत् व है ; (ट) “सुसंगत”—एक तथ् य दसू रे तथ् य से सुसंगत कहा जाता है जब तथ् यों की478 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— सुसंगनत से संबंधधत इस अधधननयम के उपबन्ध ों में ननहदषष् ट प्रकारों में स े ककसी भी प्रकार से वह तथ् य उस दसू रे तथ् य से संबद्ध हो ; (ठ) “उपधारणा करेगा”—जहां कहीं इस अधधननयम द्वारा यह ननहदषष् ट है कक न्य ायािय ककसी तथ् य की उपधारणा करेगा, वहां न्य ायािय ऐसे तथ् य को साबबत मानेगा जब तक कक वह नासाबबत नहीं ककया जाता है । (2) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयु‍त हैं और पररभावर्त नहीं हैं ककंतु सूचना प्रौद्योधगकी अधधननयम, 2000, भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 और भारतीय 2000 का 21 2023 का 46 न्याय संहहता, 2023 में पररभावर्त हैं, वही अथ ष होंग,े जो उनका उ‍त अधधननयम और 2023 का 45 संहहता में है । भाग 2 अध् याय 2 तथ् यों की सुसंगनत वववाद्यक तथ् यों 3. ककसी वाद या कायवष ाही में प्रत्येक वववाद्यक तथ् य के और ऐसे अन्य तथ् यों के, और सुसंगत जजन्ह ें इसमें इसके पश् चात ् सुसंगत घोवर्त ककया गया है, अजस् तत् व या अनजस् तत् व का तथ् यों का साक्ष्य साक्ष् य हदया जा सकेगा, ककसी अन्य का नहीं । हदया जा सकेगा । स् पष् ‍ीकरण—यह धारा ककसी व् यज‍ त को ऐसे तथ् य का साक्ष् य देने हेतु समथ ष नहीं बनाएगी, जजससे लसववि प्रकक्रया से संबंधधत ककसी तत् समय प्रवत्तृ ववधध के ककसी उपबन् ध द्वारा वह साबबत करन े के हक से वंधचत कर हदया गया है । दृष् ‍ांत (क) ख की मत्ृ यु काररत करन े के आशय से उसे िाठी से मारकर उसकी हत् या काररत करन े के लिए क का ववचारण ककया जाता है । क के ववचारण में ननम् नलिखित तथ् य वववाद्य हैं :— क द्वारा ख को िाठी स े मारना; क का ऐसी मार द्वारा ख की मत्ृ यु काररत करना; ख की मत्ृ यु काररत करन े का क का आशय । (ि) एक वादकताष अपने साथ वह बन् धपत्र, जजस पर वह ननभरष करता है, मामिे की पहिी सुनवाई पर अपने साथ नहीं िाता है और प्रस्तुत करन े के लिए तैयार नही ं रिता है । यह धारा उसे समथ ष नहीं बनाती कक लसववि प्रकक्रया संहहता, 1908 द्वारा 1908 का 5 ववहहत शतों के अनुसार से अन्यथा, वह उस कायवष ाही के उत्तरवती प्रक्रम में उस बन्ध पत्र को प्रस्तुत कर सके या उसकी अन्त वस्ष तु को साबबत कर सके । निक‍ता से संबदि तथ्य एक ही 4. जो तथ् य वववाद्य न होते हुए भी ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ्य स े संव् यवहार के इस प्रकार संबद्ध है कक वे एक ही संव् यवहार के भाग हैं, वे तथ् य सुसंगत हैं, चाहे वे उसी भाग होने वाि े समय और स् थान पर या ववलभन्न समयों और स् थानों पर घहटत हुए हों । तथ् यों की सुसंगनत । दृष् ‍ांत (क) ख को पीटकर उसकी हत् या करन े का क अलभयु‍ त है । क या ख या पास ि़िे िोगों द्वारा जो कुछ भी वपटाई के समय या उससे इतने अल् पकाि पूव ष या पश् चात ् कहा गया था या ककया गया था कक वह उसी संव् यवहार का भाग बन गया है, वह सुसंगत तथ् य है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 479 (ि) क एक सशस् त्र ववरोह में भाग िेकर, जजसमें संपवत्त नष् ट की जाती है, फौज पर आक्रमण ककया जाता है और जेिें तो़ि कर िोिी जाती हैं, भारत सरकार के ववरुद्ध युद्ध करने का अलभयु‍ त है । इन तथ् यों का घहटत होना साधारण संव् यवहार का भाग होने के नाते सुसंगत है, चाहे क उन सभी में उपजस् थत न रहा हो । (ग) क एक पत्र में, जो ककसी पत्राचार का भाग है, अन्त ववष्ष ट अपमान-िेि के लिए ख पर वाद िाता है । जजस ववर्य में अपमान-िेि उद्भूत हुआ है, उससे संबंधधत पिकारों के बीच जजतने पत्र उस पत्राचार के भाग हैं जजसमें वह अन्त ववष्ष ट है, व े सुसंगत तथ् य हैं, चाहे उनमें वह अपमान-िेि स् वयं अन्त ववष्ष ट न हो । (घ) प्रश् न यह है कक ‍ या ख से आदेलशत अमुक माि क को हदया गया था । वह माि, अनुक्रमश: कई मध् यवती व् यज‍ तयों को हदया गया था । प्रत्येक पररदान सुसंगत तथ् य है । 5. वे तथ् य सुसंगत हैं, जो सुसंगत तथ् यों के या वववाद्यक तथ् यों के आसन्न या वे तथ् य, जो वववाद्यक तथ् यों अन्य था प्रसंग, हेतुक या पररणाम हैं, या जो उस वस् तुजस् थनत को गहठत करते हैं, जजसके या सुसंगत अन्त गषत वे घहटत हुए या जजसने उनके घहटत होने या संव् यवहार का अवसर हदया । तथ्यों के प्रसंग, दृष् ‍ांत हेतुक या पररणाम ह ैं । (क) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने ख को िूटा । ये तथ् य सुसंगत हैं कक िूट के थो़िी देर पहिे ख अपने कब् जे में धन िेकर ककसी मेिे में गया, और उसने दसू रे व् यज‍ तयों को उसे हदिाया या उनसे इस तथ् य का कक उसके पास धन है, उल् िेि ककया । (ि) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने ख की हत् या की । उस स् थान पर जहां हत् या की गई थी या उसके समीप भूलम पर गुत् थम-गुत्था होने से बने हुए धचह्न सुसंगत तथ् य हैं । (ग) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने ख को ववर् हदया । ववर् स े उत् पन्न कहे जाने वाि े ििणों के पूव ष ख के स् वास् थ् य की दशा और क को ज्ञात ख की वे आदतें, जजनसे ववर् देने का अवसर लमिा, सुसंगत तथ् य हैं । 6. (1) कोई भी तथ् य, जो ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य का हेतु या हेतु, तैयारी और पूव ष का या तैयारी दलशतष या गहठत करता है, सुसंगत है । पश् चात ् का (2) ककसी वाद या कायवष ाही के ककसी पिकार या ककसी पिकार के अलभकताष का आचरण । ऐसे वाद या कायवष ाही के बारे में या उसमें वववाद्यक तथ् य या उससे सुसंगत ककसी तथ् य के बारे में आचरण और ककसी ऐस े व् यज‍ त का आचरण, जजसके ववरुद्ध कोई अपराध ककसी कायवष ाही का ववर्य है, सुसंगत है, यहद ऐसा आचरण ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य को प्रभाववत करता है या उससे प्रभाववत होता है, चाहे वह उससे पूव ष का हो या पश् चात ् का । स् पष् ‍ीकरण 1—इस धारा में “आचरण” शब् द के अन्त गषत कथन नहीं आते, जब तक कक वे कथन उन कथनों से लभन्न कायों के साथ-साथ और उन्ह ें स् पष् ट करने वािे न हों, ककन् तु इस अधधननयम की ककसी अन्य धारा के अधीन उन कथनों की सुसंगनत पर इस स् पष् टीकरण का प्रभाव नहीं प़िेगा । स् पष् ‍ीकरण 2—जब ककसी व्य ज‍ त का आचरण सुसंगत है, तब उसस,े या उसकी उपजस् थनत और श्रवणगोचरता में ककया गया कोई भी कथन, जो उस आचरण पर प्रभाव िािता है, सुसंगत है । दृष् ‍ांत (क) ख की हत् या के लिए क का ववचारण ककया जाता है । ये तथ् य कक क ने ग की हत् या की, जजसको ख जानता था कक क ने ग की हत् या की है और कक ख ने अपनी480 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— इस जानकारी को सावजष ननक करन े की धमकी देकर क से धन उद्यावपत करने का प्रयत् न ककया था, सुसंगत हैं । (ि) क बन् धपत्र के आधार पर धन के संदाय के लिए ख पर वाद िाता है । ख इस बात से इंकार करता है कक उसने बन्ध पत्र लििा । यह तथ् य कक उस समय, जब बन्ध पत्र का लििा जाना अलभकधथत है, ख को ककसी ववलशष् ट प्रयोजन के लिए धन की आवश्यकता थी, सुसंगत है । (ग) ववर् द्वारा ख की हत् या करन े के लिए क का ववचारण ककया जाता है । यह तथ् य सुसंगत है कक ख की मत्ृ यु के पूव ष क ने ख को हदए गए ववर् के जैसा ववर् उपाप् त ककया था । (घ) प्रश् न यह है कक ‍ या अमुक दस् तावेज क की वसीयत है । ये तथ् य कक अलभकधथत वसीयत की तारीि से थो़िे हदन पहिे क ने उन ववर्यों की जांच की थी, जजनसे अलभकधथत वसीयत के उपबन्ध ों का संबंध है, कक उसने वह वसीयत करने के बारे में अधधव‍ताओं से परामश ष ककया और उसने अन् य वसीयतों के प्रारूप बनवाए जजन् हें उसने अनुमोहदत नहीं ककया, सुसंगत है । (ङ) क ककसी अपराध का अलभयु‍ त है । ये तथ् य कक अलभकधथत अपराध से पूव ष या अपराध करन े के समय या उसके पश् चात ् क ने ऐसे साक्ष् य का प्रबंध ककया जजसकी प्रववृत्त ऐसी थी कक मामि े के तथ् य उसके अनुकूि प्रतीत हों या उसने साक्ष् य को नष् ट ककया या नछपाया या कक उन व् यज‍ तयों की, जो सािी हो सकते थे, उपजस् थनत ननवाररत की या अनुपजस् थनत उपाप् त की या िोगों को उसके संबंध में लमथ् या साक्ष् य देने के लिए तैयार ककया, सुसंगत है । (च) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने ख को िूटा । ये तथ् य कक ख के िूटे जाने के पश् चात ् ग ने क की उपजस् थनत में कहा कक “ख को िूटने वािे व्यज‍त को िोजने के लिए पुलिस आ रही है,” और यह कक उसके तुरन् त पश् चात ् क भाग गया, सुसंगत है । (छ) प्रश् न यह है कक ‍ या ख के प्रनत क दस हजार रुपए का देनदार है । यह तथ् य कक क ने ग से धन उधार मांगा और कक घ ने ग से क की उपजस् थनत और श्रवणगोचरता में कहा कक “म ैं तुम् हें सिाह देता हूं कक तुम क पर भरोसा मत करो ‍ योंकक वह ख के प्रनत दस हजार रुपए का देनदार है,” और कक क कोई उत्तर हदए बबना चिा गया, सुसंगत है । (ज) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने अपराध ककया । यह तथ् य कक क एक पत्र पाने के पश्चात,् जजसमें क को चेतावनी दी गई थी कक अपराधी के लिए जांच की जा रही है, फरार हो गया और उस पत्र की अन्त वस्ष तु, सुसंगत है । (झ) क ककसी अपराध का अलभयु‍ त है । ये तथ् य कक अलभकधथत अपराध के ककए जाने के पश् चात ् क फरार हो गया या कक उस अपराध से अजजतष संपवत्त या संपवत्त के आगम उसके कब् जे में थे या कक उसने उन वस् तुओ ं को, जजनसे वह अपराध ककया गया था, या ककया जा सकता था, नछपाने का प्रयत् न ककया, सुसंगत हैं । (ञ) प्रश् न यह है कक ‍ या क के साथ बिात् संग ककया गया । यह तथ् य कक अलभकधथत बिात् संग के अल् पकाि पश् चात ् क ने अपराध के बारे में पररवाद ककया, व े पररजस् थनतयां जजनके अधीन और वे शब् द जजनमें वह पररवाद ककया गया, सुसंगत हैं । यह तथ् य कक क ने पररवाद ककए बबना कहा कक मेरे साथ बिात् संग ककया गया है, इस धारा के अधीन आचरण के रूप में सुसंगत नहीं है । यद्यवप वह धारा 26 के िण् ि (क) के अधीन मत्ृ युकालिक कथन या धारा 160 के अधीन सम् पोर्क साक्ष् य के रूप में सुसंगत हो सकता है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 481 (ट) प्रश् न यह है कक ‍ या क को िूटा गया । यह तथ् य कक अलभकधथत िूट के तुरन् त पश् चात ् क ने अपराध के संबंध में पररवाद ककया, वे पररजस् थनतयां जजनके अधीन और वे शब् द, जजनमें वह पररवाद ककया गया, सुसंगत हैं । यह तथ् य कक क ने कोई पररवाद ककए बबना कहा कक मुझे िूटा गया है इस धारा के अधीन आचरण के रूप में सुसंगत नहीं है, यद्यवप वह धारा 26 के िण् ि (क) के अधीन मत्ृ यकु ालिक कथन या धारा 160 के अधीन सम् पोर्क साक्ष् य के रूप में सुसंगत हो सकता है । 7. वे तथ् य, जो वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य के स् पष् टीकरण या पुर:स् थापन के वववाद्यक तथ्य या सुसगं त लिए आवश् यक हैं या जो ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य द्वारा सुझाए गए तथ् यों के अनुमान का समथषन या िण् िन करते हैं, या जो ककसी वस् तु या व् यज‍ त की, जजसकी स् पष् टीकरण या पहचान सुसंगत है, पहचान स् थावपत करते हैं, या वह समय या स् थान ननयत करते हैं जब पुर:स् थापन के या जहां कोई वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य घहटत हुआ, या जो उन पिकारों का लिए आवश् यक तथ् य । संबंध दलशतष करते हैं जजनके द्वारा ऐसे ककसी तथ् य का संव् यवहार ककया गया था, वहा ं तक सुसंगत हैं जहां तक वे उस प्रयोजन के लिए आवश् यक है । दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍ या कोई ववलशष् ट दस् तावेज क की वसीयत है । अलभकधथत ववि की तारीि पर क की संपवत्त की अवस्था और उसके कुटुम् ब की अवस् था सुसंगत तथ् य हो सकेगी । (ि) क पर ननकृष् ट आचरण का िांछन िगाने वािे अपमान-िेि के लिए ख पर क वाद िाता है । ख अलभपुष्ट करता है कक वह बात सच है, जजसका अपमान-िेि होना अलभकधथत है । पिकारों की उस समय की जस् थनत और संबंध, जब अपमान-िेि प्रकालशत हुआ था, वववाद्यक तथ् यों की पुर:स् थापना के रूप में सुसंगत तथ् य हो सकेगा । क और ख के बीच ककसी ऐसी बात के ववर्य में वववाद की ववलशजष् टयां, जो अलभकधथत अपमान-िेि से असंबद्ध हैं, ववसंगत है, यद्यवप यह तथ् य कक कोई वववाद हुआ था, यहद उससे क और ख के बीच सम्ब न्ध ों पर प्रभाव प़िा है, सुसंगत हो सकेगा । (ग) क ककसी अपराध का अलभयु‍ त है । यह तथ् य कक, उस अपराध के ककए जान े के तुरन् त पश् चात ् क अपने घर से फरार हो गया, धारा 6 के अधीन वववाद्यक तथ् यों के पश् चात व् ती और उनसे प्रभाववत आचरण के रूप में सुसंगत है । यह तथ् य कक उस समय, जब वह घर से चिा था, क का उस स् थान में, जहां वह गया था, अचानक और अनत- आवश्यक काय ष था, उसके अचानक घर से चिे जाने के तथ् य के स् पष् टीकरण की प्रववृत्त रिने के कारण सुसंगत है । जजस काम के लिए वह चिा उसका ब् यौरा सुसंगत नहीं है, लसवाय इसके कक जहां तक वह यह दलशतष करने के लिए आवश् यक है कक वह काम अचानक और अनत-आवश्यक था । (घ) क के साथ की गई सेवा की संववदा को भंग करन े के लिए ग को उत् प्रेररत करन े के कारण ख पर क वाद िाता है । क की सवे ा को छो़िते समय क से ग कहता है कक “म ैं तुम् हें छो़ि रहा हूं ‍ योंकक ख ने मुझे तुमसे अधधक अच् छी प्रस् थापना की है ।” यह कथन ग के आचरण को, जो वववाद्यक तथ् य के रूप में सुसंगत है, स् पष् ट करन े वािा होने के कारण सुसंगत है । (ङ) चोरी का अलभयु‍ त क चुराई हुई संपवत्त ख को देते हुए देिा जाता है, जो उस े क की पत्न ी को देते हुए देिा जाता है । ख उस े पररदान करते हुए कहता है कक “क ने कहा है कक तुम इसे नछपा दो” । ख का कथन उस संव् यवहार का भाग होने वािे तथ् य को स् पष् ट करन े वािा होने के कारण सुसंगत है ।482 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (च) बिवा करने के लिए क का ववचारण ककया जा रहा है और भी़ि का नेतत्ृ व करते हुए उसका चिना साबबत हो चुका है । भी़ि की आवाजें, इस संव् यवहार की प्रकृनत को स् पष् ट करन े वािी होने के कारण सुसंगत हैं । सामान् य 8. जहां यह ववश् वास करन े का युज‍ तयु‍ त आधार है कक दो या अधधक व् यज‍ तयों ने पररकल् पना के कोई अपराध या वादयोग्य दोर् करन े के लिए लमिकर र्ड्यंत्र ककया है, वहां उनके बारे में सामान्य आशय के बारे में उनमें से ककसी एक व् यज‍ त द्वारा उस समय के पश् चात,् जब र्ड्यंत्रकारी द्वारा कही गई या की ऐसा आशय उनमें से ककसी एक ने प्रथम बार मन में धारण ककया, कही गई, की गई, या गई बातें। लििी गई कोई बात उन व् यज‍ तयों में से प्रत्येक व् यज‍ त के ववरुद्ध, जजनके बारे में ववश् वास ककया जाता है कक उन् होंने इस प्रकार र्ड्यंत्र ककया है, र्ड्यंत्र का अजस्त त् व साबबत करन े के प्रयोजन के लिए उसी प्रकार सुसंगत तथ् य है जजस प्रकार यह दलशतष करन े के प्रयोजन के लिए कक ऐसा कोई व् यज‍ त उसका पिकार था । दृष् ‍ांत यह ववश् वास करन े का युज‍ तयु‍ त आधार है कक क राज्य के ववरुद्ध युद्ध करन े के र्ड्यंत्र में सजम् मलित हुआ है । ख ने उस र्ड्यंत्र के प्रयोजन के लिए यूरोप में आयुध उपाप् त ककए, ग ने वैस े ही उद्देश् य से कोिकाता में धन संग्रह ककया, घ ने मुम् बई में िोगों को उस र्ड्यंत्र में सजम् मलित होने के लिए प्रेररत ककया, ङ ने आगरा में उस उद्देश् य के पिपोर्ण में ििे प्रकालशत ककए और ग द्वारा कोिकाता में संग्रहहत धन को च ने हदल् िी से छ के पास लसगं ापुर भेजा । इन तथ् यों और उस र्ड्यंत्र का वत्तृ ान् त देने वािे ज द्वारा लिखित पत्र की अन्त वस्ष तु में से प्रत्येक र्ड्यंत्र का अजस् तत् व साबबत करने के लिए और उसमें क की सह-अपराधधता साबबत करने के लिए भी सुसंगत है, चाहे वह उन सभी के बारे में अनलभज्ञ रहा हो, तथा चाहे उन्ह ें करन े वािे व् यज‍ त उसके लिए अपररधचत रहे हों, तथा चाहे वे उसके र्ड्यंत्र में सजम्म लित होने से पूव ष या उसके र्ड्यंत्र स े अिग हो जाने के पश् चात ् घहटत हुए हों । वे तथ् य जो 9. वे तथ् य, जो अन्य था सुसंगत नहीं हैं, सुसंगत हैं :— अन् यथा सुसंगत (1) यहद वे ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य से असंगत हैं ; नहीं ह ैं कब सुसंगत ह।ैं (2) यहद वे स्व यंमेव या अन् य तथ् यों के संसग ष में ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य का अजस् तत् व या अनजस् तत् व अत् यन् त अधधसम् भाव् य या अनधधसम् भाव् य बनाते हैं । दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने ककसी अमुक हदन चेन्नई में अपराध ककया । यह तथ् य कक क उस हदन िद्दाि में था, सुसंगत है । यह तथ् य कक जब अपराध ककया गया था उस समय के िगभग क उस स् थान से, जहां कक वह अपराध ककया गया था, इतनी दरू ी पर था कक क द्वारा उस अपराध का ककया जाना यहद असम् भव नहीं, तो अत् यन्त अनधधसम् भाव् य था, सुसंगत है । (ि) प्रश् न यह है कक ‍ या क ने अपराध ककया है । पररजस् थनतयां ऐसी हैं कक वह अपराध क, ख, ग या घ में से ककसी एक के द्वारा अवश् य ककया गया होगा । वह प्रत्येक तथ् य, जजससे यह दलशतष होता है कक वह अपराध ककसी अन्य के द्वारा नहीं ककया जा सकता था, और वह ख, ग या घ में से ककसी के द्वारा नहीं ककया गया था, सुसंगत है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 483 10. उन वादों में, जजनमें नुकसानी का दावा ककया गया है, कोई भी तथ्य सुसंगत है रकम अवधाररत करने के लिए जजससे न्य ायािय नुकसानी की वह रकम अवधाररत करने के लिए समथष हो जाए, जो न् यायािय को अधधननणीत की जानी चाहहए । समथ ष करने की प्रववृत्त रिने वाि े तथ् य नुकसानी के लिए वादों में सुसंगत ह ैं । 11. जहां ककसी अधधकार या रूहढ़ के अजस् तत् व के बारे में प्रश् न है, वहां जब अधधकार ननम् नलिखित तथ् य सुसंगत हैं— या रूहढ़ प्रश् नगत है, तब (क) कोई संव् यवहार, जजसके द्वारा प्रश् नगत अधधकार या रूहढ़ सजृजत, सुसंगत तथ् य । दावाकृत, उपांतररत, मान्य कृत, दृढ़कधथत की गई या इंकार की गई थी या जो उसके अजस् तत् व से असंगत था ; (ि) व े ववलशष् ट उदाहरण, जजनमें वह अधधकार या रूहढ़ दावाकृत, मान्य या प्रयोग की गई थी, या जजनमें उसका प्रयोग वववादग्रस् त था दृढ़कथन ककया गया था या उसका अनुसरण नहीं ककया गया था । दृष् ‍ांत प्रश् न यह है कक ‍ या क का एक मत्स्य िेत्र पर अधधकार है । क के पूवजष ों को मत्स्य िेत्र प्रदान करने वािा वविेि, क के वपता द्वारा उस मत्स्य िेत्र का बन् धक, क के वपता द्वारा उस बन्ध क स े अनमेि मत्स्य िेत्र का पश्चातवती अनुदान, ववलशष्ट उदाहरण जजनमें क के वपता ने अधधकार का प्रयोग ककया, या जजनमें अधधकार का प्रयोग क के प़िोलसयों द्वारा रोका गया था, सुसंगत तथ् य हैं । 12. मन की कोई भी दशा जैसे आशय, ज्ञान, सद्भ ाव, उपेिा, उताविापन ककसी मन या शरीर की दशा या ववलशष् ट व् यज‍ त के प्रनत वमै नस् य या सहदच् छा दलशतष करन े वािे या शरीर की या शारीररक शारीररक संवेदना की ककसी दशा का अजस् तत् व दलशतष करने वािे तथ् य तब सुसंगत हैं, जब संवदे ना का ऐसे मन की या शरीर की या शारीररक संवेदना की ककसी ऐसी दशा का अजस् तत् व वववाद्य अजस् तत् व दलशतष या सुसंगत है । करन े वािे तथ् य । स् पष् ‍ीकरण 1—जो तथ्य इस नाते सुसंगत ह ैं कक वह मन की सुसंगत दशा के अजस् तत् व को दलशतष करता है उससे यह दलशतष होना ही चाहहए कक मन की वह दशा साधारणत: नहीं, अवपतु प्रश् नगत ववलशष् ट ववर्य के बारे में, अजस् तत् व में है । स् पष् ‍ीकरण 2—ककन् त ु जहां ककसी अपराध के अलभयु‍ त व् यज‍ त के ववचारण में इस धारा के अथ ष के अन् तगतष उस अलभयु‍ त द्वारा ककसी अपराध का कभी पहिे ककया जाना सुसंगत हो, तब ऐसे व् यज‍ त की पूव ष दोर्लसद्धध भी सुसंगत तथ् य होगी । दृष् ‍ांत (क) क चुराया हुआ माि यह जानते हुए कक वह चुराया हुआ है, प्राप् त करन े का अलभयु‍ त है । यह साबबत कर हदया जाता है कक उसके कब् जे में कोई ववलशष् ट चुराई हुई वस्तु थी । यह तथ् य कक उसी समय उसके कब् जे में कई अन्य चुराई हुई वस्तुएं थीं यह दलशतष करन े की प्रववृत्त रिने वािा होने के नाते सुसंगत है कक जो वस्तुए ं उसके कब् जे में थीं उनमें से प्रत्येक और सबके बारे में वह जानता था कक वह चुराई हुई हैं । (ि) क पर ककसी अन्य व् यज‍ त को कूटकृत मुरा के कपटपूवकष पररदान करन े का अलभयोग है, जजसे वह पररदान करते समय जानता था कक वह कूटकृत है । यह तथ् य कक उसके पररदान के समय क के कब् जे में वैस े ही दसू री कूटकृत मुरा थी, सुसंगत है । यह तथ् य कक क एक कूटकृत मुरा को, यह जानते हुए कक वह मुरा कूटकृत है, उस े असिी के484 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— रूप में ककसी अन् य व् यज‍ त को पररदान करने के लिए पहिे भी दोर्लसद्ध हुआ था, सुसंगत है । (ग) ख के कुत्ते द्वारा, जजसका उग्र होना ख जानता था, ककए गए नुकसान के लिए ख पर क वाद िाता है । ये तथ् य कक कुत्ते ने पहिे भी भ, म और य को काटा था और यह कक उन् होंने ख से लशकायतें की थीं, सुसंगत हैं । (घ) प्रश् न यह है कक ‍ या ववननमयपत्र का प्रनतग्रहीता क यह जानता था कक उसके पाने वाि े का नाम काल् पननक है । यह तथ् य कक क ने उसी प्रकार स े लिखित अन्य ववननमयपत्रों को इसके पहि े कक वे पाने वाि े द्वारा, यहद पाने वािा वास् तववक व् यज‍ त होता तो, उसको पारेवर्त ककए जा सकते, स्वीकृत ककया था, यह दलशतष करने के नाते सुसंगत है कक क यह जानता था कक पाने वािा व् यज‍ त काल् पननक है । (ङ) क पर ख की ख् यानत की अपहानन करन े के आशय से एक िांछन प्रकालशत करके ख की मानहानन करने का अलभयोग है । यह तथ् य कक ख के बारे में क ने पूव ष प्रकाशन ककए, जजनसे ख के प्रनत क का वैमनस् य दलशतष होता है, इस कारण सुसंगत है कक उससे प्रश् नगत ववलशष् ट प्रकाशन द्वारा ख की ख् यानत की अपहानन करने का क का आशय साबबत होता है । ये तथ् य कक क और ख के बीच पहिे कोई झग़िा नहीं हुआ और कक क ने पररवादगत बात को जैसा सुना था वैसा ही दहु रा हदया था, यह दलशतष करन े के नाते कक क का आशय ख की ख् यानत की अपहानन करना नहीं था, सुसंगत हैं । (च) क पर ख द्वारा यह वाद िाया जाता है कक ग के बारे में क ने ख स े यह कपटपूवकष ननरूपण ककया कक ग ऋण चुकाने में समथ ष है जजससे उत् प्रेररत होकर ख ने ग का, जो हदवालिया था, भरोसा ककया और हानन उठाई । यह तथ् य कक जब क ने ग को ऋण चुकाने में समथ ष ननरूवपत ककया था, तब ग को उसके प़िोसी और उससे व् यौहार करन े वािे व् यज‍ त ऋण चुकाने में समथ ष समझते थे, यह दलशतष करन े के नाते कक क ने ऐसा ननरूपण सद् भापूवकष ककया था, सुसंगत है । (छ) क पर ख द्वारा उस काम की कीमत के लिए वाद िाया जाता है जो ठेकेदार ग के आदेश स े ककसी घर पर, जजसका क स् वामी है, ख ने काम ककया था । क का प्रनतवाद है कक ख का ठेका ग के साथ था । यह तथ् य कक क ने प्रश् नगत काम के लिए ग को कीमत दे दी इसलिए सुसंगत है कक उससे यह साबबत होता है कक क ने सद्भ ावपूवकष ग को प्रश् नगत काम का प्रबन्ध दे हदया था, जजससे कक ख के साथ ग अपने ही ननलमत्त, न कक क के अलभकताष के रूप में, संववदा करन े की जस् थनत में था । (ज) क ऐसी संपवत्त का, जो उसने प़िी पाई थी, बेईमानी से दवुवनषनयोग करन े का अलभयु‍ त है और प्रश् न यह है कक ‍ या जब उसने उसका ववननयोग ककया उस े सद्भ ावपूवकष ववश् वास था कक वास् तववक स् वामी लमि नहीं सकता । यह तथ् य कक संपवत्त के िो जाने की सावजष ननक सूचना उस स् थान में, जहां क था, दी जा चुकी थी, यह दलशषत करन े के नाते सुसंगत है कक क को सद्भ ावपूवकष यह ववश् वास नहीं था कक उस संपवत्त का वास् तववक स् वामी लमि नहीं सकता । यह तथ् य कक क यह जानता था या उसके पास यह ववश् वास करन े का कारण था कक सूचना कपटपूवकष ग द्वारा दी गई थी जजसन े संपवत्त की हानन के बारे में सुन रिा था और जो उस पर लमथ् या दावा करन े का इच् छुक था यह दलशतष करन े के नाते सुसंगत है कक क का सूचना के बारे में ज्ञान क के सद् भाव को नासाबबत नहीं करता । (झ) क पर ख को मार िािने के आशय स े उस पर गोिी मारने करन े का अलभयोग है । क का आशय दलशतष करन े के लिए यह तथ् य साबबत ककया जा सकेगा कक क ने पहिे भी ख को गोिी मारी थी ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 485 (ञ) क पर ख को धमकी भरे पत्र भेजने का आरोप है । इन पत्रों का आशय दलशतष करन े के नाते क द्वारा ख को पहिे भेजे गए धमकी भरे पत्र साबबत ककए जा सकेंग े । (ट) प्रश् न यह है कक ‍ या क अपनी पत् नी ख के प्रनत क्रूरता का दोर्ी रहा है । अलभकधथत क्रूरता के थो़िी देर पहिे या पीछे उनके एक दसू रे के प्रनत भावना की अलभव् यज‍ तयां सुसंगत तथ् य हैं । (ठ) प्रश् न यह है कक ‍ या क की मत्ृ यु ववर् स े काररत की गई थी । अपनी बीमारी के दौरान क द्वारा अपने ििणों के बारे में ककए हुए कथन सुसंगत तथ् य हैं । (ि) प्रश् न यह है कक क के स् वास् थ् य की दशा उस समय कैसी थी जजस समय उसके जीवन का बीमा कराया गया था । प्रश् नगत समय पर या उसके िगभग अपने स् वास् थ् य की दशा के बारे में क द्वारा ककए गए कथन सुसंगत तथ् य हैं । (ढ) क ऐसी उपेिा के लिए ख पर वाद िाता है जजसने उसे ऐसी कार भा़िे पर दी, जो युज‍ तयु‍ त रूप से उपयोग के लिए ठीक नहीं थी, जजससे क को िनत हुई । यह तथ् य कक उस ववलशष् ट कार की त्रुहट की ओर अन् य अवसरों पर भी ख का ध् यान आकृष् ट ककया गया था, सुसंगत है । यह तथ् य कक ख उन कारों के बारे में, जजन्ह ें वह भा़िे पर देता था, अभ् यासत: उपेिावान था, ववसगं त है । (ण) क साशय गोिी मार कर ख की मत्ृ यु करन े के कारण हत् या के लिए ववचाररत है । यह तथ् य कक क ने अन् य अवसरों पर ख को गोिी मारी थी, क का ख को गोिी मारन े का आशय दलशतष करने के नाते सुसंगत है । यह तथ् य कक क िोगों पर उनकी हत् या करन े के आशय से गोिी मारने का अभ् यासी था, ववसगं त है । (त) क का ककसी अपराध के लिए ववचारण ककया जाता है । यह तथ् य कक उसने कोई बात कही जजसस े उस ववलशष् ट अपराध के करन े का आशय उपदलशतष होता है, सुसंगत है । यह तथ् य कक उसने कोई बात कही जजसस े उस प्रकार के अपराध करन े की उसकी साधारण प्रववृत्त उपदलशतष होती है, ववसंगत है । 13. जब प्रश् न यह है कक काय ष आकजस् मक या साशय था, या ककसी ववलशष् ट ज्ञान काय ष आकजस् मक या या आशय से ककया गया था, तब यह तथ् य कक ऐसा काय ष समरूप घटनाओं की आविी साशय था इस का भाग था जजनमें से प्रत्येक घटना के साथ वह काय ष करन े वािा व् यज‍ त संबद्ध था, प्रश् न पर प्रकाश सुसंगत है । िािने वाि े तथ् य। दृष् ‍ांत (क) क पर यह अलभयोग है कक अपने घर के बीम े का धन अलभप्राप् त करने के लिए उसने उसे जिा हदया । ये तथ् य कक क कई घरों में एक के पश् चात ् दसू रे में रहा, जजनमें से प्रत्येक का उसने बीमा कराया, जजनमें से प्रत्येक में आग िगी और जजन अजग् नकांिों में से प्रत्येक के उपरान्त क को ककसी लभन्न बीमा कंपनी से बीमा धन लमिा, इस नाते सुसंगत है कक उनसे यह दलशतष होता है कक वे अजग् नकांि आकजस् मक नहीं थे । (ि) ख के ऋखणयों से धन प्राप् त करने के लिए क ननयोजजत है । क का यह कतव्ष य है कक बही में अपने द्वारा प्राप् त रकमों को दलशतष करन े वािी प्रववजष् टयां करे । वह एक प्रववजष् ट करता है जजससे यह दलशतष होता है कक ककसी ववलशष् ट अवसर पर उस े वास् तव में प्राप् त रालश से कम रकम प्राप् त हुई । प्रश् न यह है कक ‍ या यह लमथ् या प्रववजष् ट आकजस् मक थी या साशय । ये तथ् य कक उसी बही में क द्वारा की हुई अन् य प्रववजष् टयां लमथ् या हैं और कक प्रत्येक अवस् था में लमथ् या प्रववजष् ट क के पि में है, सुसंगत है । (ग) ख को कपटपूवकष कूटकृत करेंसी का पररदान करन े का क अलभयु‍ त है । प्रश्न यह है कक ‍ या करेंसी का पररदान आकजस् मक था । यह तथ् य कक ख को पररदान के486 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— तुरन् त पहिे या तुरन्त पश्चात ् क ने ग, घ और ङ को कूटकृत करेंसी का पररदान ककया था इस नाते सुसंगत हैं कक उनसे यह दलशतष होता है कक ख को ककया गया पररदान आकजस् मक नहीं था । कारबार के 14. जब प्रश् न यह है कक ‍ या कोई ववलशष् ट काय ष ककया गया था, तब कारबार के अनुक्रम का ऐसे ककसी भी अनुक्रम का अजस् तत् व, जजसके अनुसार वह काय ष स् वभावत: ककया जाता, अजस् तत् व कब सुसंगत तथ् य है । सुसंगत है। दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍ या एक ववलशष् ट पत्र प्रेवर्त ककया गया था । ये तथ् य कक कारबार का यह साधारण अनुक्रम था कक वे सभी पत्र, जो ककसी अमुक स् थान में रि हदए जाते थे, िाक में िािे जाने के लिए ि े जाए जाते थे और कक वह पत्र उस स् थान में रि हदया गया था, सुसंगत हैं । (ि) प्रश् न यह है कक ‍ या कोई ववलशष् ट पत्र क को लमिा । ये तथ् य कक वह सम् यक् अनुक्रम में िाक में िािा गया था, और कक वह पुन: प्रेर्ण केन् र द्वारा िौटाया नहीं गया था, सुसंगत है । स् िीकृनतयां स् वीकृनत की 15. स् वीकृनत वह मौखिक या दस् तावेजी या इिै‍ राननक प्ररूप में अंतववष्ष ट कथन है, पररभार्ा । जो ककसी वववाद्यक तथ् य या सुसंगत तथ् य के बारे में कोई अनुमान इंधगत करता है और जो ऐसे व् यज‍ तयों में से ककसी के द्वारा और ऐसी पररजस् थनतयों में ककया गया है जो इसमें इसके पश्चात ् वखणतष है । कायवष ाही के 16. (1) व े कथन स् वीकृनतयां हैं, जजन्ह ें कायवष ाही के ककसी पिकार ने ककया है, या पिकार या ऐसे ककसी पिकार के ऐसे ककसी अलभकताष द्वारा ककया गया है, जजसे न्य ायािय मामिे उसके अलभकता ष की पररजस् थनतयों में उन कथनों को करन े के लिए उस पिकार द्वारा अलभव् य‍ त या द्वारा स् वीकृनत । वववक्षित रूप से प्राधधकृत ककया हुआ मानता है । (2) वे कथन स् वीकृनतयां हैं, जो— (i) वाद के ऐस े पिकारों द्वारा, जो प्रनतननधध की हैलसयत में वाद िा रहे हैं या जजन पर प्रनतननधध की हैलसयत में वाद िाया जा रहा है, तब तक स् वीकृनतया ं नहीं हैं, जब तक कक वे उस समय न ककए गए हों जबकक उनको करन े वािा पिकार वैसी हैलसयत धारण करता था ; या (ii) (क) ऐसे व् यज‍ तयों द्वारा ककए गए हैं, जजनका कायवष ाही की ववर्य-वस् त ु में कोई साम् पवत्तक या धन संबंधी हहत है और जो इस प्रकार हहतबद्ध व् यज‍ तयों की हैलसयत में वह कथन करते हैं ; या (ि) ऐसे व् यज‍ तयों द्वारा ककए गए हैं, जजनसे वाद के पिकारों का वाद की ववर्य-वस् तु में अपना हहत व् युत् पन् न हुआ है, यहद वे कथन उन् हें करने वािे व् यज‍ तयों के हहत के बने रहने के दौरान ककए गए हैं । उन व् यज‍ तयों 17. वे कथन, जो उन व् यज‍ तयों द्वारा ककए गए हैं जजनकी जस् थनत या दानयत् व, वाद द्वारा स् वीकृनतयां के ककसी पिकार के ववरुद्ध साबबत करना आवश् यक है, स् वीकृनतयां हैं, यहद ऐसे कथन ऐस े जजनकी जस् थनत वाद व् यज‍ तयों द्वारा, या उन पर िाए गए वाद में ऐसी जस् थनत या दानयत् व के संबंध में ऐसे के पिकारों के ववरुद्ध साबबत की व् यज‍ तयों के ववरुद्ध सुसंगत होते और यहद वे उस समय ककए गए हैं जबकक उन् हें करने जानी चाहहए । वािा व् यज‍ त ऐसी जस् थनत ग्रहण ककए हुए हैं या ऐसे दानयत् व के अधीन हैं ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 487 दृष् ‍ांत ख के लिए ककराया संग्रह करन े का दानयत् व क िेता है । ग द्वारा ख को देय ककराया संग्रह न करन े के लिए क पर ख वाद िाता है । क इस बात से इंकार करता है कक ग से ख को ककराया देय था । ग द्वारा यह कथन कक उस पर ख को ककराया देय है स् वीकृनत है, और यहद क इस बात से इंकार करता है कक ग द्वारा ख को ककराया देय था तो वह क के ववरुद्ध सुसंगत तथ् य है । 18. वे कथन, जो उन व् यज‍ तयों द्वारा ककए गए हैं जजनको वाद के ककसी पिकार वाद के पिकार द्वारा अलभव् य‍ त ने ककसी वववादग्रस् त ववर्य के बारे में जानकारी के लिए अलभव् य‍ त रूप से ननहदषष् ट ककया रूप से ननहदषष् ट है, स् वीकृनतयां हैं । व् यज‍ तयों द्वारा स् वीकृनतयां। दृष् ‍ांत यह प्रश् न है कक ‍ या क द्वारा ख को बेचा गया घो़िा अच् छा है । ख से क कहता है कक “जा कर ग से पूछ िो, ग इस बारे में सब कुछ जानता है”। ग का कथन स् वीकृनत है । 19. स् वीकृनतयां, उन्ह ें करन े वािे व् यज‍ त के या उसके हहत प्रनतननधध के ववरुद्ध स् वीकृनतयों का उन् हें करन े वाि े सुसंगत हैं और साबबत की जा सकेंगी, ककन् त ु उन्ह ें करन े वािे व् यज‍ त द्वारा या उसकी व् यज‍ तयों के ओर से या उसके हहत प्रनतननधध द्वारा, ननम् नलिखित अवस् थाओं में के लसवाय, वे साबबत ववरुद्ध और नहीं की जा सकेंगी, अथाषत ् :— उनके द्वारा या उनकी ओर स े (1) कोई स् वीकृनत उस े करने वािे व् यज‍ त द्वारा या उसकी ओर से तब साबबत की साबबत ककया जा सकेगी, जब वह इस प्रकृनत की है कक यहद उसे करने वािा व् यज‍ त मर गया होता, तो जाना। वह अन्य व् यज‍ तयों के बीच धारा 26 के अधीन सुसंगत होती । (2) कोई स् वीकृनत उसे करने वािे व् यज‍ त द्वारा या उसकी ओर से तब साबबत की जा सकेगी, जब वह मन या शरीर की सुसंगत या वववाद्य ककसी दशा के अजस् तत् व का ऐसा कथन है जो उस समय या उसके िगभग ककया गया था जब मन या शरीर की ऐसी दशा ववद्यमान थी और ऐसे आचरण के साथ है जो उसकी असत्यता को अनधधसम् भाव् य कर देता है । (3) कोई स् वीकृनत उस े करन े वािे व् यज‍ त द्वारा या उसकी ओर स े साबबत की जा सकेगी, यहद वह स्व ीकृनत के रूप में नहीं ककन् तु अन् यथा सुसंगत है । दृष् ‍ांत (क) क और ख के बीच प्रश् न यह है कक अमुक वविेि कूटरधचत है या नहीं । क अलभपुष्ट करता है कक वह असिी है, ख अलभपुष्ट करता है कक वह कूटरधचत है । ख का कोई कथन कक वविेि असिी है, क साबबत कर सकेगा तथा क का कोई कथन कक वविेि कूटरधचत है, ख साबबत कर सकेगा, ककन् तु क अपना यह कथन कक वविेि असिी है, साबबत नहीं कर सकेगा और न ख ही अपना यह कथन कक वविेि कूटरधचत है, साबबत कर सकेगा । (ि) ककसी पोत के कप् तान क का ववचारण, उस पोत को संत् य‍ त करने के लिए ककया जाता है । यह दलशतष करन े के लिए साक्ष् य हदया जाता है कक पोत अपने उधचत माग ष से बाहर िे जाया गया था । क अपने कारबार के साधारण अनुक्रम में अपने द्वारा रिी जाने वािी वह पुस् तक प्रस्तुत करता है जजसमें वे हटप्पखणयां दलशतष हैं, जजनके बारे में यह अलभकधथत है कक वे हदन-प्रनतहदन ककए गए थे और जजनसे यह उपदलशतष है कक488 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पोत अपने उधचत माग ष स े बाहर नहीं िे जाया गया था । क इन कथनों को साबबत कर सकेगा ‍ योंकक, यहद उसकी मत्ृ यु हो गई होती तो व े कथन अन्य व् यज‍ तयों के बीच धारा 26 के िंि (ि) के अधीन ग्राह्य होते । (ग) क कोिकाता में ककए गए अपराध का अलभयु‍ त है । वह अपने द्वारा लिखित और उसी हदन चेन्नई में हदनांककत और उसी हदन का चेन्नई का िाक धचह्न धारण करन े वािा एक पत्र प्रस्तुत करता है । पत्र की तारीि में, का कथन ग्राह्य है ‍ योंकक, यहद क की मत्ृ यु हो गई होती, तो वह धारा 26 के िंि (ि) के अधीन ग्राह्य होता । (घ) क चुराए हुए माि को यह जानते हुए कक वह चुराया हुआ है प्राप् त करने का अलभयु‍ त है । वह यह साबबत करन े की प्रस् थापना करता है कक उसने उसे उसके मूल् य स े कम दाम में बेचने से इंकार ककया था । क इन कथनों को साबबत कर सकेगा, यद्यवप ये स् वीकृनतयां हैं ‍ योंकक ये वववाद्यक तथ् यों से प्रभाववत उसके आचरण के स् पष् टीकारक हैं । (ङ) क अपने कब्ज े में कूटकृत मुरा, कपटपूवकष रिने का अलभयु‍ त है, जजसका कूटकृत होना वह जानता था । वह यह साबबत करने की प्रस् थापना करता है कक उसन े एक कुशि व् यज‍ त से उस मरु ा की जांच करने को कहा था, ‍ योंकक उसे इस बात का संदेह था कक वह कूटकृत है या नहीं और उस व् यज‍ त ने उसकी जांच की तथा उससे कहा कक वह असिी है । क इन तथ् यों को साबबत कर सकेगा । दस् तावेजों की 20. ककसी दस् तावेज की अन्त वस्ष तु के बारे में मौखिक स् वीकृनतयां तब तक सुसंगत अन् तवस्ष त ु के नहीं होती, जब तक कक उन्ह ें साबबत करन े की प्रस् थापना करन े वािा पिकार यह दलशतष बारे में मौखिक न कर दे कक ऐसे दस् तावेज की अन्त वस्ष तुओं का द्ववतीयक साक्ष् य देने का वह इसमें स् वीकृनतयां कब सुसंगत होती ह।ैं इसके पश्चात ् अन्तववष्ष ट ननयमों के अधीन हकदार है या जब तक प्रस्तुत ककए गए दस् तावेज का असिी होना प्रश्न गत न हो । लसववि मामिों 21. लसववि मामिों में कोई भी स्व ीकृनत सुसंगत नहीं है, यहद वह या तो इस में स् वीकृनतयां अलभव् य‍ त शत ष पर की गई है कक उसका साक्ष् य नहीं हदया जाएगा, या ऐसी पररजस् थनतयों कब सुसंगत के अधीन दी गई है जजनसे न्य ायािय यह अनुमान कर सके कक पिकार इस बात पर होती ह।ैं परस् पर सहमत हो गए थे कक उसका साक्ष् य नहीं हदया जाना चाहहए । स् पष् ‍ीकरण—इस धारा की कोई भी बात, ककसी अधधव‍ता को ककसी ऐसी बात का साक्ष् य देने स े छूट देने वािी नहीं मानी जाएगी जजसका साक्ष् य देने के लिए धारा 132 की उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन उसे वववश ककया जा सकेगा । उत् प्ररे णा, धमकी, 22. अलभयु‍ त व् यज‍ त द्वारा की गई संस् वीकृनत दाजण् िक कायवष ाही में ववसंगत होती प्रपी़िन या वचन है, यहद उसके ककए जाने के बारे में न्य ायािय को प्रतीत होता है कक अलभयु‍ त व् यज‍ त द्वारा कराई गई के ववरुद्ध आरोप के बारे में वह ऐसी उत् प्रेरणा, धमकी, प्रपी़िन या वचन द्वारा कराई गई संस् वीकृनत, दाजण् िक कायवष ाही है जो प्राधधकारवान ् व् यज‍ त की ओर से हदया गया है और जो न्य ायािय की राय में इसके में कब ववसंगत लिए पयाषप् त है कक वह अलभयु‍ त व् यज‍ त को यह अनुमान करन े के लिए उसे युज‍ तयु‍ त होती है। प्रतीत होने वािे आधार देती है कक उसके करने से वह अपने ववरुद्ध कायवष ाहहयों के बारे में िौककक रूप का कोई फायदा उठाएगा या ककसी बुराई का पररवजनष कर िेगा : परंतु यहद संस्वीकृनत ऐसी ककसी उत् प्रेरणा, धमकी, प्रपी़िन या वचन से काररत प्रभाव के पूणतष ः दरू हो जाने के पश्चात ् की गई है, तो वह सुसंगत है : परंतु यह और कक यहद ऐसी संस्वीकृनत अन्यथा सुसंगत है, तो वह केवि इसलिएअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 489 ववसंगत नहीं हो जाती कक वह गुप्त रिने के वचन के अधीन या उस े अलभप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए अलभयु‍त व्यज‍त से की गई प्रवंचना के पररणामस्वरूप, या उस समय जब कक वह मदोन्मत्त था, की गई थी या इसलिए कक वह ऐसे प्रश्नों के, चाहे उनका रूप कैसा ही ‍यों न रहा हो, उत्तर में की गई थी जजनका उत्तर देना उसके लिए आवश्यक नही ं था, या केवि इसलिए कक उसे यह चेतावनी नहीं दी गई थी कक वह ऐसी संस्वीकृनत करने के लिए आबद्ध नहीं था और उसके ववरुद्ध उसका साक्ष्य हदया जा सकेगा । 23. (1) ककसी पुलिस अधधकारी स े की गई कोई भी संस् वीकृनत, ककसी अपराध के पुलिस अधधकारी से की गई अलभयु‍ त व् यज‍ त के ववरुद्ध साबबत नहीं की जाएगी । संस् वीकृनत । (2) कोई भी संस् वीकृनत, जो ककसी व् यज‍ त ने उस समय की हो जब वह पुलिस अधधकारी की अलभरिा में है, उसके ववरुद्ध तब तक साबबत नहीं की जाएगी, जब तक कक वह मजजस्र ेट की सािात ् उपजस् थनत में न की गई हो : परन् तु जब ककसी तथ्य के बारे में यह अलभसाक्ष् य हदया जाता है कक ककसी अपराध के अलभयु‍ त व् यज‍ त से, जो पुलिस अधधकारी की अलभरिा में है, प्राप् त जानकारी के पररणामस् वरूप उसका पता चिा है, तब ऐसी जानकारी में से, उतनी चाहे वह संस्व ीकृनत की कोहट में आती हो या नहीं, जजतनी पता चिे हुए तथ् य से स् पष् टतया संबंधधत है, साबबत की जा सकेगी । 24. जब एक से अधधक व् यज‍ त एक ही अपराध के लिए संयु‍ त रूप से ववचाररत हैं साबबत संस् वीकृनत को, और ऐसे व् यज‍ तयों में से ककसी एक के द्वारा, अपने को और ऐसे व् यज‍ तयों में से ककसी जो उसे करने अन्य को प्रभाववत करन े वािी की गई संस् वीकृनत को साबबत ककया जाता है, तब वािे व् यज‍ त न्य ायािय ऐसी संस् वीकृनत को ऐसे अन्य व् यज‍ त के ववरुद्ध तथा ऐसे संस् वीकृनत करन े और एक ही वािे व् यज‍ त के ववरुद्ध ववचार में िे सकेगा । अपराध के लिए संयु‍ त रूप स े स् पष् ‍ीकरण 1—इस धारा में प्रयु‍ त “अपराध” शब् द के अन्त गतष , उस अपराध का ववचाररत अन् य दष्ु प्ररे ण या उसे करन े का प्रयत् न आता है । को प्रभाववत करती है, ववचार स् पष् ‍ीकरण 2—एक से अधधक व्यज‍तयों का ववचारण ककसी ऐसे अलभयु‍त की में िेना । अनुपजस्थनत में ककया जाता है, जो भगौ़िा है या जो भारतीय नागररक सुरिा संहहता, 2023 का 46 2023 की धारा 84 के अधीन जारी उद्घोर्णा का अनुपािन करने में असफि रहता है, इस धारा के प्रयोजन के लिए संयु‍त ववचारण समझा जाएगा । दृष् ‍ांत (क) क और ख को ग की हत् या के लिए संयु‍ तत: ववचारण ककया जाता है । यह साबबत ककया जाता है कक क ने कहा कक “ख और मनैं े ग की हत् या की है ।” ख के ववरुद्ध इस संस्व ीकृनत के प्रभाव पर न् यायािय ववचार कर सकेगा । (ि) ग की हत् या करन े के लिए क का ववचारण हो रहा है । यह दलशतष करन े के लिए साक्ष् य है कक ग की हत् या क और ख द्वारा की गई थी और यह कक ख न े कहा था कक “क और मनैं े ग की हत् या की है” । न्य ायािय इस कथन को क के ववरुद्ध ववचार में नहीं िे सकेगा, ‍ योंकक ख का संयु‍ तत: ववचारण नहीं हो रहा है । 25. स् वीकृनतयां, स् वीकृत ववर्यों का ननश् चायक सबूत नहीं हैं, ककन् त ु वे इसमें इसके स्व ीकृनतयां ननश् चायक सबूत पश्चात ् अन् तववष्ष ट उपबन्ध ों के अधीन ववबंध के रूप में प्रवनततष हो सकेंगी । नहीं हैं, ककंत ु ववबंध कर सकेगी ।490 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— उि व्यक्‍ तयों के कथि, क्जन्हें साक्षी के रूप में बिु ाया िहीं जा सकता वे दशाएं जजनमें 26. सुसंगत तथ्यों के लिखित या मौखिक कथन, जो ऐसे व्यज‍ त द्वारा ककए गए उस व्यज‍ त द्वारा थ,े जो मर गया है या लमि नहीं सकता है या जो साक्ष्य देने के लिए असमथष हो गया है सुसंगत तथ्य का या जजसकी उपजस्थनत इतने वविम्ब या व्यय के बबना उपाप् त नहीं की जा सकती, जजतना ककया गया कथन सुसंगत है, जो मामिे की पररजस्थनतयों में न्यायािय को अयुज‍ तयु‍ त प्रतीत होता है, ननम् नलिखित मर गया है या दशाओं में स्वयंमेव सुसंगत तथ्य हैं, अथाषत ् :— लमि नहीं सकता, (क) जब वह कथन ककसी व्यज‍ त द्वारा अपनी मत्ृ यु के कारण के बारे में या उस आहद । संव्यवहार की ककसी पररजस्थनत के बारे में ककया गया है जजसके फिस्वरूप उसकी मत्ृ यु हुई, तब उन मामिों में, जजनमें उस व्यज‍ त की मत्ृ यु का कारण प्रश् नगत है । ऐस े कथन सुसंगत हैं चाहे उस व्यज‍ त को, जजसने उन्हें ककया है, उस समय जब व े ककए गए थ े मत्ृ यु की प्रत्याशंका थी या नहीं और चाहे उस कायवष ाही की, जजसमें उस व्यज‍ त की मत्ृ यु का कारण प्रश् नगत होता है, प्रकृनत कैसी ही ‍यों न हो ; (ि) जब वह कथन ऐसे व्यज‍ त द्वारा कारबार के साधारण अनुक्रम में ककया गया था और ववशेर्तः जब वह, उसके द्वारा कारबार के साधारण अनुक्रम में या ववृत्तक कतव्ष य के ननवहष न में रिी जाने वािी पस्ु तकों में उसके द्वारा की गई ककसी प्रववजष् ट या ककए गए ज्ञापन के रूप में है; या उसके द्वारा धन, माि, प्रनतभूनत या ककसी भी ककस्म की सम्पवत्त की प्राजप् त की लिखित या हस्तािररत अलभस्वीकृनत है; या वाखणज्य में उपयोग में आने वािे उसके द्वारा लिखित या हस्तािररत ककसी दस्तावेज के रूप में है; या ककसी पत्र या अन्य दस्तावेज की तारीि के रूप में है, जो उसके द्वारा प्रायः हदनांककत, लिखित या हस्तािररत की जाती थी ; (ग) जब वह कथन उसे करने वािे व्यज‍ त के धन सम्बन्धी या साम्पवत्तक हहत के ववरुद्ध है या जब, यहद वह सत्य है, तो उसके कारण उस पर दाजण्िक अलभयोजन या नुकसानी का वाद िाया जा सकता है या िाया जा सकता था ; (घ) जब उस कथन में ऐसे ककसी व्यज‍ त की राय ककसी ऐसे िोक अधधकार या रूहढ़ या िोक या साधारण हहत के ववर्यों के अजस्तत्व के बारे में है, जजसके अजस्तत्व से, यहद वह अजस्तत्व में होता तो, उसस े उस व्यज‍ त का अवगत होना सम्भाव्य होता और जब ऐसा कथन ऐसे ककसी अधधकार, रूहढ़ या बात के बारे में ककसी वववाद के उत्पन्न होने से पहिे ककया गया था ; (ङ) जब वह कथन ककन्हीं ऐसे व्यज‍ तयों के बीच र‍ त, वववाह या दत्तकग्रहण पर आधाररत ककसी नातेदारी के अजस्तत्व के सम्बन्ध में है, जजन व्यज‍ तयों की र‍ त, वववाह या दत्तकग्रहण पर आधाररत नातेदारी के बारे में उस व्यज‍ त के पास, जजसने वह कथन ककया है, ज्ञान के ववशेर् साधन थे और जब वह कथन वववादग्रस्त प्रश् न के उठाए जाने से पूव ष ककया गया था । (च) जब वह कथन मतृ व्यज‍ तयों के बीच र‍ त, वववाह या दत्तकग्रहण पर आधाररत ककसी नातेदारी के अजस्तत्व के सम्बन्ध में है और उस कुटुम्ब की बातों से, जजसका ऐसा मतृ व्यज‍ त संबंधधत था, संबंधधत ककसी वसीयत या वविेि में या ककसी कुटुम्ब-वंशाविी में या ककसी समाधध-पत्थर, कुटुम्ब-धचत्र या अन्य चीजों पर जजन पर ऐसे कथन प्रायः ककए जाते हैं, ककया गया है, तथा जब ऐसा कथन वववादग्रस्त प्रश् न के उठाए जाने से पूव ष ककया गया था । (छ) जब वह कथन ककसी ऐसे वविेि, वसीयत या अन्य दस्तावेज में अन्तववष्ष ट है, जो ककसी ऐसे संव्यवहार से संबंधधत है जैसा धारा 11 के िण्ि (क)अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 491 में ववननहदषष्ट है । (ज) जब वह कथन कई व्यज‍ तयों द्वारा ककया गया था और प्रश् नगत बात से सुसंगत उनकी भावनाओं या धारणाओं को अलभव्य‍ त करता है । दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍या क की हत्या ख द्वारा की गई थी ; या क की मत्ृ यु ककसी संव्यवहार में हुई िनतयों से हो जाती है, जजसके अनुक्रम में उसस े बिात्संग ककया गया था । प्रश् न यह है कक ‍या उससे ख द्वारा बिात्संग ककया गया था, या प्रश् न यह है कक ‍या क, ख द्वारा ऐसी पररजस्थनतयों में मारा गया था कक क की ववधवा द्वारा ख के ववरुद्ध वाद िाया जा सकता है । अपनी मत्ृ यु के कारण के बारे में क द्वारा ककए गए वे कथन, जो उसने क्रमशः ववचाराधीन हत्या, बिात्संग और वादयोग्य दोर् को ननदेलशत करते हुए ककए हैं, सुसंगत तथ्य हैं । (ि) प्रश् न क के जन्म की तारीि के बारे में है । एक मतृ शल्य धचककत्सक की अपने कारबार के साधारण अनुक्रम में ननयलमत रूप से रिी जाने वािी िायरी में इस कथन की प्रववजष् ट, कक अमुक हदन उसने क की माता की पररचयाष की और उसे पुत्र का प्रसव कराया, सुसंगत तथ्य है । (ग) प्रश् न यह है कक ‍या क अमुक हदन नागपुर में था । कारबार के साधारण अनुक्रम में ननयलमत रूप से रिी गई एक मतृ सालिलसटर की िायरी में यह कथन, कक अमुक हदन वह सालिलसटर नागपुर में एक वखणतष स्थान पर ववननहदषष् ट कारबार के बारे में ववचार-ववमश ष करने के प्रयोजन के लिए क के पास रहा, सुसगं त तथ्य है । (घ) प्रश् न यह है कक ‍या कोई पोत मुम्बई बन्दरगाह से अमुक हदन रवाना हुआ । ककसी वाखणजज्यक फम ष के, जजसके द्वारा वह पोत भा़िे पर लिया गया था, मतृ सदस्य द्वारा चेन्नई जस्थत अपने सम्पककषयों को, जजन्हें वह स्थोरा परेवर्त ककया गया था, यह कथन करने वािा पत्र कक पोत मुम्बई पत्तन से अमुक हदन चि हदया, सुसंगत तथ्य है । (ङ) प्रश् न यह कक ‍या क को अमुक भूलम का ककराया हदया गया था । क के मतृ अलभकताष का क के नाम पत्र जजसमें यह कथन है कक उसने क के ननलमत्त ककराया प्राप् त ककया है और वह उसे क के आदेश के अधीन रिे हुए है, सुसंगत तथ्य है । (च) प्रश् न यह है कक ‍या क और ख का वववाह वैध रूप से हुआ था । एक मतृ पादरी का यह कथन कक उसने उनका वववाह ऐसी पररजस्थनतयों में कराया था, जजनमें उसका कराया जाना अपराध होता, सुसंगत है । (छ) प्रश् न यह है कक ‍या एक व्यज‍ त क ने, जो लमि नहीं सकता अमुक हदन एक पत्र लििा था । यह तथ्य कक उसके द्वारा लिखित एक पत्र पर उस हदन की तारीि हदनांककत है, सुसंगत है । (ज) प्रश् न यह है कक ककसी पोत के ध्वंस का कारण ‍या है । कप् तान द्वारा, जजसकी उपजस्थनत उपाप् त नहीं की जा सकती, ककया गया ऐसा प्रनतवाद, सुसंगत तथ्य है । (झ) प्रश् न यह है कक ‍या अमकु स़िक िोक-माग ष है । ग्राम के मतृ प्रधान क द्वारा ककया गया कथन कक वह स़िक िोक-माग ष है, सुसंगत तथ्य है । (ञ) प्रश् न यह है कक ववलशष् ट बाजार में अमुक हदन अनाज की ‍या कीमत थी । एक मतृ व्यवसायी द्वारा अपने कारबार के साधारण अनुक्रम में ककया गया कीमत का कथन सुसंगत तथ्य है । (ट) प्रश् न यह है कक ‍या क, जो मर चुका है, ख का वपता था । क द्वारा ककया492 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— गया यह कथन कक ख उसका पुत्र है, सुसंगत तथ्य है । (ठ) प्रश् न यह है कक क के जन्म की तारीि ‍या है । क के मतृ वपता द्वारा ककसी लमत्र को लििा हुआ पत्र, जजसमें यह बताया गया है कक क का जन्म अमुक हदन हुआ, सुसंगत तथ्य है । (ि) प्रश् न यह है कक ‍या और कब क और ख का वववाह हुआ था । ख के मतृ वपता ग द्वारा ककसी याददाश्त-पुजस्तका में अपनी पुत्री का क के साथ अमुक तारीि को वववाह होने की प्रववजष् ट सुसंगत तथ्य है । (ढ) दकु ान की खि़िकी में अलभदलशतष रंधगत व्यंगधचत्र में अलभव्य‍ त अपमान-िेि के लिए ख पर क वाद िाता है । प्रश् न व्यंगधचत्र की समरूपता और उसके अपमान-िेिीय प्रकृनत के बारे में है । इन बातों पर दशकष ों की भी़ि की हटप्पखणयां साबबत की जा सकेंगी । ककसी साक्ष्य में 27. वह साक्ष्य, जो ककसी सािी न े ककसी न्यानयक कायवष ाही में, या ववधध द्वारा कधथत तथ्यों की उसे िेने के लिए प्राधधकृत ककसी व्यज‍ त के समि हदया है, उन तथ्यों की सत्यता को, सत्यता को जो उस साक्ष्य में कधथत है, ककसी पश् चातवती न्यानयक कायवष ाही में या उसी न्यानयक पश् चातवती कायवष ाही में कायवष ाही के आगामी प्रक्रम में साबबत करन े के प्रयोजन के लिए तब सुसंगत है, जब वह साबबत करन े के सािी मर गया है या लमि नहीं सकता है या वह साक्ष्य देने के लिए असमथ ष है या लिए उस साक्ष्य प्रनतपिी द्वारा उसे पहुंच के बाहर कर हदया गया है या यहद उसकी उपजस्थनत इतने की सुसंगनत । वविम्ब या व्यय के बबना, अलभप्राप् त नहीं की जा सकती, जजतना कक मामिे की पररजस्थनतयों में न्यायािय अयुज‍ तयु‍ त समझता है : परन्तु वह तब जब कक वह कायवष ाही उन्हीं पिकारों या उनके हहत प्रनतननधधयों के बीच में थी, प्रथम कायवष ाही में प्रनतपिी को प्रनतपरीिा का अधधकार और अवसर था, तथा वववाद्य प्रश् न प्रथम कायवष ाही में सारतः वही थे, जो द्ववतीय कायवष ाही में हैं । स्पष् ‍ीकरण—दाजण्िक ववचारण या जांच, इस धारा के अथ ष के अन्तगतष अलभयोजक और अलभयु‍ त के बीच की कायवष ाही समझी जाएगी । विशेष पररक्स्थनतयों में ककए गए कथि िेिा-पुस्तकों की 28. कारबार के अनुक्रम में ननयलमत रूप से रिी गई िेिा-पुस्तकों की प्रववजष् टयां, प्रववजष् टयां कब जजनके अन्तगषत वे भी हैं जो इिै‍राननक प्ररूप में रिी गई हैं, जब कभी वे ऐसे ववर्य सुसंगत ह ैं । का ननदेश करती हैं जजसमें न्यायािय को जांच करनी है, सुसंगत हैं, ककन्तु अकेिे ऐसे कथन ही ककसी व्यज‍ त को दानयत्व से भाररत करने के लिए पयाषप् त साक्ष्य नहीं होंगे । दृष् ‍ांत ख पर क एक हजार रुपए के लिए वाद िाता है और अपनी िेिा बहहयों की वे प्रववजष्टयां दलशतष करता है, जजनमें ख को इस रकम के लिए उसका ऋणी दलशतष ककया गया है । ये प्रववजष् टया ं सुसंगत हैं ककन्तु ऋण साबबत करन े के लिए अन्य साक्ष्य के बबना पयाषप् त नहीं हैं । कतव्ष य-पािन में 29. ककसी िोक या अन्य राजकीय पुस्तक, रजजस्टर या अलभिेि या इिै‍राननक की गई िोक अलभिेि में की गई प्रववजष् ट, जो ककसी वववाद्यक या सुसंगत तथ्य का कथन करती है अलभिेि या और ककसी िोक सेवक द्वारा अपने पदीय कतव्ष य के ननवहष न में या उस देश की, जजसमें इिै‍राननक अलभिेि की ऐसी पुस्तक, रजजस्टर या अलभिेि या इिै‍राननक अलभिेि रिा जाता है, ववधध द्वारा प्रववजष् ट की ववशेर् रूप से व्यादेलशत कतव्ष य के पािन में ककसी अन्य व्यज‍ त द्वारा की गई है, स्वय ं सुसंगनत । सुसंगत तथ्य है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 493 30. वववाद्यक तथ्यों या सुसंगत तथ्यों के वे कथन, जो प्रकालशत मानधचत्रों या मानधचत्रों, चाटों और रेिांकों के चाटों में, जो िोक ववक्रय के लिए साधारणतः प्रस्थावपत ककए जाते हैं या केन्रीय सरकार कथनों की या ककसी राज्य सरकार के प्राधधकार के अधीन बनाए गए मानधचत्रों या रेिांकों में ककए सुसंगनत। गए हैं, उन ववर्यों के बारे में जो ऐसे मानधचत्रों, चाटों या रेिांकों में प्रायः ननरूवपत या कधथत होते हैं, स्वयं सुसंगत तथ्य हैं । 31. जब न्यायािय को ककसी िोक प्रकृनत के ककसी तथ्य के अजस्तत्व के बारे में कनतपय अधधननयमों या राय बनानी है तब ककसी केन्रीय अधधननयम या राज्य अधधननयम में या संबंधधत राजपत्र अधधसूचनाओं में में वखणतष केंरीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा की गई अधधसूचना में तात्पनयतष होने अन्तववष्ष ट िोक वािे ककसी मुहरत पत्र या इिै‍राननक या डिजजटि प्ररूप में अन्तववष्ष ट वत्तृ ांत में ककया प्रकृनत के तथ्य गया, उसका कोई कथन सुसंगत तथ्य है । के बारे में कथन की सुसंगनत । 32. जब न्यायािय को ककसी देश की ववधध के बारे में राय बनानी है, तब ऐसी ववधध की पुस्तकों में अन्तववष्ष ट ववधध का कोई भी कथन, जो ऐसी ककसी पुस्तक में अन्तववष्ष ट है जो ऐस े देश की सरकार ककसी ववधध के के प्राधधकार के अधीन मुहरत या प्रकालशत है, जजसके अंतगतष इिै‍राननक या डिजजटि कथनों की प्ररूप भी है और ऐसी ककसी ववधध को अन्तववष्ष ट करन े वािी तात्पनयतष है, तथा ऐसे देश सुसंगनत, जजसके के न्यायाियों के ककसी ववननणषय की कोई ररपोटष, जो ऐसे ववननणयष ों की ररपोटष स े अंतगतष इिै‍राननक या तात्पनयषत होने वािी ककसी पस्ु तक, जजसके अंतगतष इिै‍राननक या डिजजटि प्ररूप भी है, डिजजटि प्ररूप भी में अन्तववष्ष ट है, सुसंगत है । है । ककसी कथि में से ककतिा साबबत ककया जाए 33. जब कोई कथन, जजसका साक्ष्य हदया जाता है, ककसी वहृ त्तर कथन का या जब कथन ककसी बातचीत, ककसी बातचीत का भाग है या ककसी एकि दस्तावेज का भाग है या ककसी ऐसे दस्तावेज दस्तावेज, में अन्तववष्ष ट है जो ककसी पुस्तक का या पत्रों या कागज-पत्रों की संस‍ त आविी का भाग इिै‍राननक है या इिै‍राननक अलभिेि के भाग में अंतववषष् ट है तब उस कथन, बातचीत, दस्तावेज, अलभिेि, पुस्तक इिै‍राननक अलभिेि, पुस्तक या पत्रों या कागज-पत्रों की आविी के उतने का ही, न कक या पत्रों या कागज--पत्रों की उतने से अधधक का साक्ष्य हदया जाएगा, जजतना न्यायािय उस कथन की प्रकृनत और आविी का भाग प्रभाव को तथा उन पररजस्थनतयों को, जजनके अधीन वह ककया गया था, पूणतष ः समझन े है, तब ‍या के लिए उस ववलशष्ट मामिे में आवश्यक ववचार करता है । साक्ष्य हदया जाए। न्यायाियों के निणयण कब सुसंगत हैं 34. ककसी ऐस े ननणयष , आदेश या डिक्री का अजस्तत्व, जो ककसी न्यायािय को द्ववतीय वाद या ववचारण के ककसी वाद के संज्ञान से या कोई ववचारण करने से ववधध द्वारा ननवाररत करता है, वजनष के लिए सुसंगत तथ्य है जब प्रश् न यह हो कक ‍या ऐस े न्यायािय को ऐस े वाद का संज्ञान या पूव ष ननणयष ऐसा ववचारण करना चाहहए । सुसंगत ह ैं । 35. (1) ककसी सिम न्यायािय या अधधकरण के संप्रमाण-ववर्यक, वववाह-ववर्यक, संप्रमाण, आहद ववर्यक नावधधकरण-ववर्यक या हदवािा-ववर्यक अधधकाररता के प्रयोग में हदया हुआ अजन्तम अधधकाररता के ननणषय, आदेश या डिक्री, जो ककसी व्यज‍ त को, कोई ववधधक हैलसयत प्रदान करती है या कनतपय ननणयष ों उसस े िे िेती है या जो पूण ष रूप से न कक ककसी ववननहदषष् ट व्यज‍ त के ववरुद्ध ककसी की सुसंगनत । व्यज‍ त को ऐसी ककसी हैलसयत का हकदार या ककसी ववननहदषष् ट चीज का हकदार घोवर्त करती है, तब सुसंगत है जब ककसी ऐसी ववधधक हैलसयत, या ककसी ऐसी चीज पर ककसी ऐसे व्यज‍ त के हक का अजस्तत्व सुसंगत है । (2) ऐसा ननणयष , आदेश या डिक्री इस बात का ननश् चायक सबूत है कक— (i) कोई ववधधक हैलसयत, जो वह प्रदत्त करती है, उस समय प्रोद्भूत हुई जब494 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ऐसा ननणयष , आदेश या डिक्री प्रवतनष में आई ; (ii) कोई ववधधक हैलसयत, जजसके लिए वह ककसी व्यज‍ त को हकदार घोवर्त करती है, उस व्यज‍ त को उस समय प्रोद्भूत हुई जब ऐसे ननणषय, आदेश या डिक्री द्वारा घोवर्त है कक उस समय यह उस व्यज‍ त को प्रोद्भूत हुई ; (iii) कोई ववधधक हैलसयत, जजसे वह ककसी ऐस े व्यज‍ त से िे िेती है उस समय ित्म हुई जजस समय ऐसे ननणयष , आदेश या डिक्री द्वारा घोवर्त है कक उस समय से वह हैलसयत ित्म हो गई थी या ित्म हो जानी चाहहए थी ; और (iv) कोई चीज जजसके लिए वह ककसी व्यज‍ त को ऐसा हकदार घोवर्त करती है उस व्यज‍ त की उस समय सम्पवत्त थी जो उस समय ऐसे ननणयष , आदेश या डिक्री द्वारा घोवर्त है कक उस समय से वह चीज उसकी सम्पवत्त थी या होनी चाहहए थी । धारा 35 में वखणतष 36. वे ननणयष , आदेश या डिकक्रयां, जो धारा 35 में वखणतष से लभन्न हैं, यहद वे से लभन्न ननणयष ों, जांच में सुसंगत िोक प्रकृनत की बातों से संबंधधत हैं, तो वे ससु ंगत हैं, ककन्तु ऐस े आदेशों या डिकक्रयों ननणषय, आदेश या डिकक्रयां उन बातों का ननश् चायक सबूत नहीं हैं जजनका वे कथन करती की सुसंगनत और उसका प्रभाव । हैं । दृष् ‍ांत क अपनी भूलम पर अनतचार के लिए ख पर वाद िाता है । ख उस भूलम पर माग ष के िोक अधधकार का अजस्तत्व अलभकधथत करता है जजसे क इंकार करता है । क द्वारा ग के ववरुद्ध उसी भूलम पर अनतचार के लिए ककसी वाद में, जजसमें ग ने उसी माग ष के अधधकार का अजस्तत्व अलभकधथत ककया था, प्रनतवादी के पि में डिक्री का अजस्तत्व सुसंगत है, ककन्तु वह इस बात का ननश् चायक सबूत नहीं है कक वह माग ष का अधधकार अजस्तत्व में है । धारा 34, धारा 35 37. धारा 34, धारा 35 और धारा 36 में वखणतष से लभन्न ननणयष , आदेश या और धारा 36 में डिकक्रयां ववसंगत हैं जब तक कक ऐसे ननणयष , आदेश या डिक्री का अजस्तत्व वववाद्यक वखणतष से लभन्न तथ्य न हो या वह इस अधधननयम के ककसी अन्य उपबन्ध के अन्तगतष सुसंगत न हो । ननणयष , आहद कब सुसंगत ह ैं । दृष् ‍ांत (क) क और ख ककसी अपमान-िेि के लिए, जो उनमें से प्रत्येक पर िांछन िगाता है, ग पर पथृ क्-पथृ क् वाद िाते हैं । प्रत्येक मामिे में ग कहता है कक वह बात, जजसका अपमान-िेिीय होना अलभकधथत है, सत्य है और पररजस्थनतयां ऐसी हैं कक वह अधधसम्भाव्यतः या तो प्रत्येक मामि े में सत्य है या ककसी में नहीं । ग के ववरुद्ध क इस आधार पर नुकसानी की डिक्री अलभप्राप् त करता है कक ग अपना न्यायोधचत्य साबबत करन े में असफि रहा है । यह तथ्य ख और ग के बीच ववसंगत है । (ि) ख का अलभयोजन क इसलिए करता है कक उसने क की गाय चुराई है । ख दोर्लसद्ध ककया जाता है । तत् पश् चात ् क उस गाय के लिए, ग पर वाद िाता है जजसे ख ने दोर्लसद्धध होने से पूव ष ग को बेच हदया था । ख के ववरुद्ध वह ननणषय क और ग के बीच ववसंगत है । (ग) क ने ख के ववरुद्ध भूलम के कब्जे की डिक्री अलभप्राप् त की है । ख का पुत्र ग पररणामस्वरूप क की हत्या करता है । उस ननणयष का अजस्तत्व अपराध का हेतु दलशतष करन े के नाते सुसंगत है । (घ) क पर चोरी और चोरी के लिए पहिे से ही दोर्लसद्धध का आरोप है । पवू ष दोर्लसद्धध वववाद्यक तथ्य होने के नात े सुसंगत है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 495 (ङ) ख की हत्या के लिए क ववचाररत ककया जाता है । यह तथ्य कक ख ने क पर अपमान-िेि के लिए अलभयोजन चिाया था और क दोर्लसद्ध और दजण्ित ककया गया था, धारा 6 के अधीन वववाद्यक तथ्य का हेतु दलशतष करन े के नाते सुसंगत है । 38. वाद या अन्य कायवष ाही का कोई भी पिकार यह दलशतष कर सकेगा कक कोई ननणयष अलभप्राप् त करने में कपट या ननणषय, आदेश या डिक्री, जो धारा 34, धारा 35 या धारा 36 के अधीन सुसंगत है और सांठ-गांठ या जो प्रनतपिी द्वारा साबबत की जा चुकी है, ऐस े न्यायािय द्वारा दी गई थी जो उस े देन े न्यायािय की के लिए अिम था या जजसे कपट या साठं -गांठ द्वारा अलभप्राप् त की गई थी । अिमता साबबत की जा सकेगी । अन्य व्यक्‍ तयों की रायें कब सुसंगत होती हैं 39. (1) जब न्यायािय को, ववदेशी ववधध की या ववज्ञान की या किा या ककसी ववशेर्ज्ञों की राय ें । अन्य िेत्र की ककसी बात पर या हस्तिेि या अंगुिी-धचह्नों की पहचान के बारे में राय बनानी है तब उस बात पर ऐसी ववदेशी ववधध, ववज्ञान या किा या ककसी अन्य िेत्र में या हस्तिेि या अंगुिी-धचह्नों की पहचान ववर्यक प्रश्नों में, ववशेर् कुशि व्यज‍ तयों की रायें सुसंगत तथ्य हैं और ऐसे व्यज‍ तयों को ववशेर्ज्ञ कहा जाता हैं । दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍या क की मत्ृ यु ववर् द्वारा काररत हुई । जजस ववर् के बारे में यह अनुमान है कक उससे क की मत्ृ यु हुई है, उस ववर् से पैदा हुए ििणों के बारे में ववशेर्ज्ञों की रायें सुसंगत हैं । (ि) प्रश् न यह है कक ‍या क अमुक काय ष करन े के समय धचत्त-ववकृनत के कारण उस काय ष की प्रकृनत, या यह कक जो कुछ वह कर रहा है वह या तो दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि है, जानने में असमथष था । इस प्रश् न पर ववशेर्ज्ञों की रायें सुसंगत हैं कक ‍या क द्वारा प्रदलशतष ििणों से धचत्त-ववकृनत सामान्यतः दलशतष होती है और ‍या ऐसी धचत्त- ववकृनत व्यज‍तयों को उन कायों की प्रकृनत, जजन्हें वे करते हैं, या वह कक जो कुछ व े करते हैं वह या तो दोर्पूण ष या ववधध के प्रनतकूि हैं, जानने में प्रायः असमथ ष बना देती है । (ग) प्रश् न यह है कक ‍या अमुक दस्तावेज क द्वारा लििा गया था । एक अन्य दस्तावेज प्रस्तुत ककया जाता है जजसका क द्वारा लििा जाना साबबत या स्वीकृत है । इस प्रश् न पर ववशेर्ज्ञों की रायें सुसंगत हैं कक ‍या दोनों दस्तावेज एक ही व्यज‍ त द्वारा या ववलभन्न व्यज‍ तयों द्वारा लिि े गए थे । (2) जब न्यायािय को ककसी कायवष ाही में ककसी कंप्यूटर संसाधन या ककसी अन्य इिै‍राननक या डिजजटि रूप में पारेवर्त या संग्रहीत ककसी सूचना के संबंध में कोई राय 2000 का 21 बनानी हो तब सूचना प्रौद्योधगकी अधधननयम, 2000 की धारा 79क में ननहदषष्ट इिै‍राननक साक्ष्य के परीिक की राय एक सुसंगत तथ्य है । स्पष्‍ीकरण—इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, इिै‍राननक साक्ष्य का परीिक एक ववशेर्ज्ञ होगा । 40. वे तथ् य, जो अन् यथा सुसंगत नहीं हैं, सुंसगत होते हैं यहद वे ववशेर्ज्ञों की रायों ववशेर्ज्ञों की रायों स े संबंधधत का तब समथनष करते हों या उनसे असंगत हों जब उनकी ऐसी रायें सुसंगत हैं । तथ्य । दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍या क को अमुक ववर् हदया गया था । यह तथ्य सुसंगत है कक अन्य व्यज‍ तयों में भी, जजन्हें वह ववर् हदया गया था, अमुक ििण प्रकट हुए थे, जजनका उस ववर् के ििण होने के बारे में ववशेर्ज्ञ अलभपुजष्ट करते हैं या उससे इंकार करते हैं ।496 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) प्रश् न यह है कक ‍या ककसी बन्दरगाह में कोई बाधा अमुक समुर-लभवत्त से काररत हुई है । यह तथ्य कक अन्य बन्दरगाह, जो अन्य दृजष् टयों से वैसे ही जस्थत थे, ककन्तु जहां ऐसी समुर-लभवत्तयां नहीं थीं, िगभग उसी समय बाधधत होने िगे थे, सुसंगत है । हस्तििे और 41. (1) जब न्यायािय को ककसी ऐसे व्यज‍त के बारे में राय बनानी हो जजसके हस्तािर के बारे द्वारा कोई दस्तावेज लििा या हस्तािररत ककया गया था, तब उस व्यज‍ त के हस्तिेि में राय कब से, जजसके द्वारा वह लििा या हस्तािररत ककया गया अनुमाननत ककया जाता है, ककसी सुसंगत है। पररधचत व्यज‍ त की यह राय कक वह उस व्यज‍ त द्वारा लििा या हस्तािररत ककया गया था अथवा लििा या हस्तािररत नहीं ककया गया था, सुसंगत तथ्य है । स्पष् ‍ीकरण—कोई व्यज‍ त ककसी अन्य व्यज‍ त के हस्तिेि से पररधचत हुआ तब कहा जाता है, जब उसने उस व्यज‍ त को लििते देिा है या जब उसने स्वयं अपने द्वारा या अपने प्राधधकार के अधीन लिखित और उस व्यज‍ त को संबोधधत दस्तावेजों के उत्तर में उस व्यज‍ त द्वारा लिि े जान े के लिए तात्पनयतष होने वािे दस्तावेज प्राप् त ककए हैं, या जब कारबार के साधारण अनुक्रम में उस व्यज‍ त द्वारा लििे जाने के लिए तात्पनयषत होने वािे दस्तावेज उसके समि प्रायः रिे जाते हैं । दृष् ‍ांत प्रश् न यह है कक ‍या अमुक पत्र ईटानगर के एक व्यापारी क द्वारा लििा गया है । ख बंगिूरु में एक व्यापारी है, जजसने क को सबं ोधधत पत्र लिि े हैं और उसके द्वारा लिि े जाने के लिए तात्पनयतष होने वािे पत्र प्राप् त ककए हैं । ग, ख का लिवपक है, जजसका कतव्ष य ख के पत्र-व्यवहार को देिना और फाइि करना था । ख का दिाि घ है जजसके समि क द्वारा लििे जाने के लिए तात्पनयतष होने वािे पत्रों को उनके बारे में उसस े सिाह देने के प्रयोजन के लिए ख प्रायः प्रस्तुत करता था । ख, ग और घ की इस प्रश् न पर ये रायें कक ‍या वह पत्र क के हस्तिेि में है, सुसंगत हैं, यद्यवप न तो ख ने, न ग ने, न घ ने इसे क को लििते हुए कभी देिा था । (2) जब न्यायािय को ककसी व्यज‍त के इिै‍राननक हस्तािर के बारे में राय बनानी हो तो प्रमाणकताष प्राधधकारी की राय में, जजसने इिै‍राननक हस्तािर प्रमाणपत्र जारी ककया है, सुसंगत तथ्य है । साधारण रूहढ़ या 42. जब न्यायािय को ककसी साधारण रूहढ़ या अधधकार के अजस्तत्व के बारे में अधधकार के राय बनानी हो, तब ऐसी रूहढ़ या अधधकार के अजस्तत्व के बारे में उन व्यज‍ तयों की रायें अजस्तत्व के बारे सुसंगत हैं, जो यहद उसका अजस्तत्व होता तो संभाव्यतः उसे जानते होते । में राय कब सुसंगत है । स्पष् ‍ीकरण—“साधारण रूहढ़ या अधधकार” पद के अन्तगतष ऐसी रूहढ़यां या अधधकार आते हैं जो व्यज‍ तयों के ककसी काफी ब़िे वग ष के लिए सामान्य हैं । दृष् ‍ांत ककसी ववलशष् ट ग्राम के ग्रामीणों का ववलशष्ट कूप के पानी का उपयोग करन े का अधधकार इस धारा के अथ ष के अन्तगतष साधारण अधधकार है । प्रथाओं, 43. जब न्यायािय को— लसद्धान्तों, आहद (i) मनुष्यों के ककसी ननकाय या कुटुम्ब की प्रथाओं और लसद्धांतों के ; के बारे में राय कब सुसगं त है । (ii) ककसी धालमकष या पूत ष प्रनतष्ठान के गठन और शासन के ; (iii) ववलशष् ट जजिों या ववलशष्ट वगों के िोगों द्वारा प्रयु‍त शब्दों या पदों के अथ ष के बारे में राय बनानी हो, तब उनके संबंध में, ज्ञान के ववशेर् साधन रिने वािे व्यज‍ तयों की रायें, सुसंगत तथ्य हैं ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 497 44. जब न्यायािय को एक व्यज‍ त की ककसी अन्य के साथ नातेदारी के बारे में नातेदारी के बारे में राय कब राय बनानी हो, तब ऐसी नातेदारी के अजस्तत्व के बारे में ऐसे ककसी व्यज‍ त के आचरण सुसंगत है। द्वारा अलभव्य‍ त राय, जजसके पास कुटुम्ब के सदस्य के रूप में या अन्यथा उस ववर्य के संबंध में ज्ञान के ववशेर् साधन हैं, सुसंगत तथ्य है : परन्तु भारतीय वववाह-ववच्छेद अधधननयम, 1869 के अधीन कायवष ाहहयों में या 1869 का 4 2023 का 45 भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 82 और धारा 84 के अधीन अलभयोजन में ऐसी राय वववाह साबबत करन े के लिए पयाषप् त नहीं होगी । दृष् ‍ांत (क) प्रश् न यह है कक ‍या क और ख वववाहहत थे । यह तथ्य कक उनको अपने लमत्रों द्वारा पनत और पत्न ी के रूप में प्रायः स्वीकार ककया जाता था और उन्हें उसी रूप में माना जाता था, सुसंगत है । (ि) प्रश् न यह है कक ‍या क, ख का धमजष पुत्र है। यह तथ्य कक कुटुम्ब के सदस्यों द्वारा क को सदैव उस रूप में माना जाता था, सुसंगत है । 45. जब कभी ककसी जीववत व् यज‍ त की राय सुसंगत है, तब वे आधार, जजन पर राय के आधार कब सुसगं त वह आधाररत है, भी सुसंगत हैं । ह ैं । दृष् ‍ांत कोई ववशेर्ज्ञ अपनी राय बनाने के प्रयोजन के लिए उसके द्वारा ककए हुए प्रयोगों का वववरण दे सकता है । शीि कब सुसंगत है 46. लसववि मामिों में यह तथ् य कक ककसी संबंधधत व् यज‍ त का शीि ऐसा है जो लसववि मामिों में िांनछत आचरण उस पर िांनछत ककसी आचरण को अधधसंभाव् य या अनधधसंभाव् य बना देता है, वहां तक साबबत करने के लसवाय ववसंगत है, जहां तक कक ऐसा शीि अन्य था सुसंगत तथ् यों से प्रकट होता है । वािा शीि ववसंगत है । 47. दाजण्ि क कायवष ाहहयों में यह तथ् य कक अलभयु‍ त व् यज‍ त अच् छे शीि का है, दाजण् िक मामिों में पूवतष न सुसंगत है । अच् छा शीि सुसंगत है । 2023 का 45 48. भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, कनतपय मामिों में शीि या पूव ष धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77 या िधैंगक अनुभव धारा 78 के अधीन ककसी अपराध के लिए या ककसी ऐस े अपराध के ककए जान े का प्रयत् न के साक्ष्य का करन े के लिए, ककसी अलभयोजन में जहां सम् मनत का प्रश्न वववाद्य है, वहां पीड़ित के सुसंगत न शीि या ऐस े व् यज‍ त का ककसी व् यज‍ त के साथ पूव ष िधैंगक अनुभव का साक्ष् य ऐसी होना । सम् मनत या सम्म नत की गुणवत्ता के मुद्दे पर सुसंगत नहीं होगा । 49. दाजण्ि क कायवष ाहहयों में, यह तथ् य कक अलभयु‍ त व्यज‍त बुरे शीि का है, तब उत्तर में होने के लसवाय पूवतष न तक ववसंगत है, जब तक कक इस बात का साक्ष् य न हदया गया हो कक वह अच् छे शीि बुरा शीि का है, जजस मामिे में वह ससु ंगत हो जाता है । सुसंगत नहीं स् पष् ‍ीकरण 1—यह धारा उन मामिों के संबंध में िागू नहीं होती है जजनमें ककसी है । व् यज‍ त का बुरा शीि स् वयं वववाद्यक तथ् य है । स् पष् ‍ीकरण 2—पूव ष दोर्लसद्ध बुरे शीि के साक्ष् य के रूप में सुसंगत है । 50. लसववि मामिों में, यह तथ् य कक ककसी व् यज‍ त का शीि ऐसा है जजसस े नुकसानी पर प्रभाव िािने नुकसानी की रकम पर, जो उसे लमिनी चाहहए, प्रभाव प़िता है, सुसंगत है । वािा शीि ।498 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— स् पष् ‍ीकरण—इस धारा में और धारा 46, धारा 47 तथा धारा 49 में “शीि” शब् द के अन्त गषत ख् यानत और स् वभाव दोनों आते हैं, ककन् तु धारा 49 में यथा उपबंधधत के लसवाय केवि साधारण ख् यानत और साधारण स् वभाव का ही साक्ष्य हदया जा सकेगा न कक ऐस े ववलशष् ट कायों का, जजनके द्वारा, ख् यानत या स्व भाव को दशाषया गया है । भाग 3 सबूत के विषय अध् याय 3 तथ् य, क्जिका साबबत ककया जािा आिश् यक िहीं ह ै न् यानयक रूप स े 51. जजस तथ् य का न्य ायािय न्य ानयक अविोकन करेगा, उसे साबबत करना अविोकनीय तथ् य आवश् यक नहीं है । साबबत करना आवश् यक नहीं है । वे तथ् य, जजनका 52. (1) न्य ायािय ननम् नलिखित तथ् यों का न्य ानयक अविोकन करेगा, अथाषत:्— न् यायािय (क) भारत के राज् यिेत्र में प्रवत्तृ समस् त ववधधयां, जजनके अंतगतष वे ववधधया ं न् यानयक अविोकन सजम्मलित हैं जजनका राज्यिेत्रातीत प्रवतनष है ; करेगा । (ि) भारत द्वारा ककसी देश या देशों के साथ अंतराषष्रीय संधध, करार या अलभसमय या अंतराषष्रीय संगमों या अन्य ननकायों में भारत द्वारा ककए गए ववननश्चय ; (ग) भारत की संववधान सभा, भारत की संसद् और राज्य ववधानमंििों की कायवष ाही का अनुक्रम ; (घ) सभी न्यायाियों और अधधकरणों की मुराएं ; (ङ) नावधधकरण और समुरीय अधधकाररता वािे न् यायाियों की, नोटेरी पजब् िक की मुराएं और व े सब मुराएं, जजनका कोई व् यज‍ त संववधान या संसद् या राज्य ववधान-मंििों के ककसी अधधननयम या भारत में ववधध का बि रिने वाि े ववननयम द्वारा उपयोग करन े के लिए प्राधधकृत है ; (च) ककसी राज् य में ककसी िोक पद को तत् समय भरने वािे व् यज‍ तयों का पदारोहण, उनके नाम, उपाधधयां, कृत् य और हस् तािर, यहद ऐसे पद पर उनकी ननयुज‍ त का तथ् य ककसी राजपत्र में अधधसूधचत ककया गया हो ; (छ) भारत सरकार द्वारा मान्य ताप्राप् त प्रत्येक देश या संप्रभु का अजस् तत् व, उपाधध और राष् रीय ध् वज ; (ज) समय का अन्तराि, ववश्व का भौगोलिक ववभाजन और राजपत्र में अधधसूधचत िोक उत् सव, उपवास और अवकाश हदन ; (झ) भारत का राज् यिेत्र ; (ञ) भारत सरकार और ककसी अन्य देश या व् यज‍ तयों के ननकाय के बीच संघर् ष का प्रारम् भ, चािू रहना और पयवष सान ; (ट) न्य ायािय के सदस् यों और अधधकाररयों के तथा उनके उप-पहदयों और अधीनस् थ अधधकाररयों और सहायकों के और अपनी आदेलशका का ननष् पादन करत े हुए काय ष करन े वाि े सब अधधकाररयों के भी, तथा सभी अधधव‍ ताओं और उनके समि उपजस्थत होने या काय ष करन े के लिए ककसी ववधध द्वारा प्राधधकृत अन् य व् यज‍ तयों के नाम ;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 499 (ठ) भूलम पर या समुर में माग ष का ननयम । (2) उपधारा (1) में ननहदषष्ट मामिों में, और िोक इनतहास, साहहत् य, ववज्ञान या किा के सब ववर्यों में भी, न्य ायािय समुधचत ननदेश पुस् तकों या दस् तावेजों की सहायता िे सकेगा और यहद न्य ायािय से ककसी तथ् य का न्य ानयक अविोकन करने की ककसी व् यज‍ त द्वारा अपेिा की जाती है, तो यहद और जब तक वह व् यज‍ त कोई ऐसी पुस् तक या दस् तावेज प्रस्तुत न कर दे, जजसे ऐसा न्य ायािय अपने को ऐसा करने को समथ ष बनाने के लिए आवश् यक समझता है, न्य ायािय ऐसा करन े से इंकार कर सकेगा । 53. ककसी ऐस े तथ् य को ककसी कायवष ाही में साबबत करना आवश् यक नहीं है, जजसे स् वीकृत तथ् यों को साबबत उस कायवष ाही के पिकार या उनके अलभकताष सुनवाई पर स् वीकार करन े के लिए सहमत करना आवश् यक हो जाते हैं, या जजसे वे सुनवाई के पूव ष ककसी स् वहस् तािररत िेि द्वारा स् वीकार करन े के नहीं है । लिए सहमत हो जाते हैं या जजसके बारे में अलभवचन संबधं ी ककसी तत् समय प्रवत्तृ ननयम के अधीन यह समझ लिया जाता है कक उन्ह ोंने उस े अपने अलभवचनों द्वारा स् वीकार कर लिया है : परन् तु न् यायािय अपने वववेकानुसार स् वीकृत तथ् यों का ऐसी स् वीकृनतयों द्वारा साबबत ककए जाने से अन्य था साबबत ककए जाने की अपेिा कर सकेगा । अध् याय 4 मौखखक साक्ष् य के विषय में 54. दस् तावेजों की अन्त वस्ष तु के लसवाय, सभी तथ् य मौखिक साक्ष् य द्वारा साबबत मौखिक साक्ष्य द्वारा तथ् यों का ककए जा सकेंगे । साबबत ककया जाना। 55. मौखिक साक्ष् य, सभी मामिों में चाहे वह कैसा भी हो, प्रत् यि ही होगा, यहद वह— मौखिक साक्ष्य का प्रत् यि (i) ककसी देिे जा सकने वाि े तथ् य के बारे में है, तो वह ऐसे सािी का ही होना । साक्ष् य होगा जो कहता है कक उसने उसे देिा; (ii) ककसी सुने जा सकने वािे तथ् य के बारे में है, तो वह ऐसे सािी का ही साक्ष् य होगा जो कहता है कक उसने उसे सुना; (iii) ककसी ऐस े तथ् य के बारे में है जजसका ककसी अन्य इंहरय द्वारा या ककसी अन्य रीनत से बोध हो सकता था, तो वह ऐसे सािी का ही साक्ष् य होगा जो कहता है कक उसने उसका बोध उस इंहरय द्वारा या उस रीनत स े ककया; (iv) ककसी राय के, या उन आधारों के, बारे में है, जजन पर वह राय धाररत है, तो वह उस व् यज‍ त का ही साक्ष् य होगा जो वह उन आधारों पर राय धारण करता है : परन् तु ववशेर्ज्ञों की रायें, जो सामान्य त: ववक्रय के लिए प्रस्ताववत की जाने वािी ककसी पुस् तक में अलभव् य‍ त हैं, और वे आधार, जजन पर ऐसी रायें धाररत हैं, यहद िेिक मर गया है, या वह लमि नहीं सकता है या वह साक्ष् य देने के लिए असमथ ष हो गया है, या उस े इतने वविम् ब या व्य य के बबना जजतना न्य ायािय अयुज‍ तयु‍ त समझता है, सािी के रूप में बुिाया नहीं जा सकता है, ऐसी पुस् तकों को प्रस्तुत करके साबबत ककए जा सकेंगे : परन् तु यह और कक यहद मौखिक साक्ष् य, दस् तावेज से लभन्न ककसी भौनतक चीज के अजस् तत् व या दशा के बारे में है, तो न् यायािय, यहद वह ठीक समझे तो ऐसी भौनतक चीज का अपने ननरीिण के लिए प्रस्तुत ककए जाने की अपेिा कर सकेगा ।500 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अध् याय 5 िस् तािेजी साक्ष्य के विषय में दस् तावेजों की 56. दस् तावेजों की अन्त वस्ष त ु या तो प्राथलमक या द्ववतीयक साक्ष् य द्वारा साबबत अन् तवस्ष त ु का की जा सकेगी । सबूत। प्राथलमक 57. प्राथलमक साक्ष् य स े न्य ायािय के ननरीिण के लिए प्रस्तुत ककया गया दस् तावेज साक्ष्य । स् वयं अलभप्रेत है । स् पष् ‍ीकरण 1—जहां कोई दस् तावेज कई मूि प्रनतयों में ननष् पाहदत है वहां प्रत्येक मूि प्रनत उस दस् तावेज का प्राथलमक साक्ष् य है । स् पष् ‍ीकरण 2—जहां कोई दस् तावेज प्रनतिेि में ननष् पाहदत है और प्रत्येक प्रनतिेि पिकारों में से केवि एक पिकार या कुछ पिकारों द्वारा ननष् पाहदत ककया गया है, वहां प्रत्येक प्रनतिेि उन पिकारों के ववरुद्ध, जजन्ह ोंने उसका ननष् पादन ककया है, प्राथलमक साक्ष् य है । स् पष् ‍ीकरण 3—जहां अनेक दस् तावेज एकरूपात् मक प्रकक्रया द्वारा बनाए गए हैं जैसा कक मुरण, लशिा मुरण या फोटो धचत्रण में होता है, वहां उनमें से प्रत्येक शेर् सबकी अन्त वस्ष तु का प्राथलमक साक्ष् य है, ककन् त ु जहां वे सब ककसी एक ही मूि की प्रनतयां हैं वहां वे मूि की अन् तवस्ष तु का प्राथलमक साक्ष् य नहीं हैं । स् पष् ‍ीकरण 4—जहां कोई इिै‍राननक या डिजजटि अलभिेि सजृजत या संग्रहहत ककया जाता है और ऐसा संग्रह एक साथ या पश्चातवती रूप से अनेक फाइिों में ककया जाता है, उनमें से प्रत्येक फाइि प्राथलमक साक्ष्य है । स् पष् ‍ीकरण 5—जहां कोई इिै‍राननक या डिजजटि अलभिेि समुधचत अलभरिा में प्रस्तुत ककया जाता है, ऐसा इिै‍राननक और डिजजटि अलभिेि प्राथलमक साक्ष्य है, जब तक कक वह वववादग्रस्त नहीं है । स् पष् ‍ीकरण 6—जहां ककसी वीडियो ररकाडिगिं को इिै‍राननक प्ररूप में एक साथ संग्रहहत ककया जाता है और ककसी अन्य व्यज‍त को पारेवर्त या प्रसाररत या अंतररत ककया जाता है तो प्रत्येक संग्रहहत ररकाडिगिं प्राथलमक साक्ष्य है । स् पष् ‍ीकरण 7—जहां ककसी इिै‍राननक या डिजजटि अलभिेि को ककसी कंप्यूटर संसाधन में एक स े अधधक संग्रहण स्थान में संग्रहहत ककया जाता है, ऐसा प्रत्येक स्वचालित संग्रहण, जजसके अंतगतष अस्थायी फाइिें भी हैं, प्राथलमक साक्ष्य हैं । दृष् ‍ांत यह दलशतष ककया जाता है कक एक ही समय एक ही मूि से मुहरत अनेक प् िेकाि ष ककसी व् यज‍ त के कब् जे में रिे हैं । इन प् िेकािों में से कोई भी एक अन्य ककसी की भी अन्त वस्ष तु का प्राथलमक साक्ष् य है ककन् त ु उनमें से कोई भी मूि की अन् तवस्ष त ु का प्राथलमक साक्ष् य नहीं है । द्ववतीयक साक्ष्य । 58. द्ववतीयक साक्ष् य के अन्त गतष ननम्नलिखित आते हैं— (i) इसमें इसके पश्चात ् अन् तववष्ष ट उपबन्ध ों के अधीन दी हुई प्रमाखणत प्रनतयां; (ii) मूि से ऐसी याजन् त्रक प्रकक्रयाओं द्वारा, जो प्रकक्रयाएं स्व यं ही प्रनत की शुद्धता सुननजश् चत करती हैं, बनाई गई प्रनतयां और ऐसी प्रनतयों से तुिना की हुई प्रनतलिवपयां;अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 501 (iii) मूि से बनाई गई या तुिना की गई प्रनतयां; (iv) उन पिकारों के ववरुद्ध, जजन् होंने उन् हें ननष् पाहदत नहीं ककया है, दस् तावेजों के प्रनतिेि; (v) ककसी दस् तावेज की अन्त वस्ष तु का उस व् यज‍ त द्वारा, जजसने स् वयं उसे देिा है, हदया हुआ मौखिक वत्तृ ांत ; (vi) मौखिक स्वीकृनतयां ; (vii) लिखित स्वीकृनतयां ; (viii) ककसी ऐसे व्यज‍त का साक्ष्य, जजसने ककसी दस्तावजे की जांच की है, जजसके मूि में अनेक िेिें या अन्य दस्तावेज अंतववष्ष ट हैं, जजनकी सुववधाजनक रूप से न्यायािय में जांच नहीं की जा सकती है और जो ऐस े दस्तावेजों की जांच करने में कुशि है । दृष् ‍ांत (क) ककसी मूि का फोटोधचत्र, यद्यवप दोनों की तुिना न की गई हो तथावप यहद यह साबबत ककया जाता है कक फोटोधचबत्रत वस् तु मूि थी, उस मूि की अन् तवस्ष त ु का द्ववतीयक साक्ष् य है । (ि) ककसी पत्र की वह प्रनत, जजसकी तुिना उस पत्र की, उस प्रनत से कर िी गई है जो प्रनतिवप यंत्र द्वारा तैयार की गई है, उस पत्र की अन्त वस्ष तु का द्ववतीयक साक्ष् य है, यहद यह दलशतष कर हदया जाता है कक प्रनतलिवप यंत्र द्वारा तैयार की गई प्रनत मूि स े बनाई गई थी । (ग) ककसी प्रनत की नकि करके तैयार की गई ककन् तु तत् पश् चात ् मूि से तुिना की हुई प्रनतलिवप द्ववतीयक साक्ष् य है ; ककन् त ु इस प्रकार तुिना नहीं की हुई प्रनत मूि का द्ववतीयक साक्ष् य नहीं है, यद्यवप उस प्रनत की, जजससे वह नकि की गई है, मिू स े तुिना की गई थी । (घ) न तो मूि स े तुिना की हुई प्रनत का मौखिक वत्तृ ान् त और न मूि के ककसी फोटोधचत्र या यंत्रकृत प्रनत का मौखिक वत्तृ ान् त मूि का द्ववतीयक साक्ष् य है । 59. इसमें इसके पश्चात ् वखणतष दशाओं के लसवाय, दस् तावेजों को प्राथलमक साक्ष् य प्राथलमक साक्ष्य द्वारा दस् तावेजों द्वारा साबबत करना होगा । का साबबत ककया जाना । 60. ककसी दस् तावेज के अजस् तत् व, पररजस्थनत या अन्त वस्ष तु का द्ववतीयक साक्ष् य वे दशाए,ं ननम् नलिखित दशाओं में हदया जा सकेगा, अथाषत ् :— जजनमें दस् तावेजों के (क) जब यह दलशतष कर हदया जाता है या प्रतीत होता है कक मूि ऐसे व् यज‍ त संबंध में के कब् जे में है या उसके अधधकार में है— द्ववतीयक साक्ष्य हदया जा (i) जजसके ववरुद्ध उस दस् तावेज का साबबत ककया जाना वांछनीय है ; सकेगा । या (ii) जो न्य ायािय की आदेलशका की पहुंच से बाहर है, या ऐसी आदेलशका के अधीन नहीं है ; या (iii) जो उसे प्रस्तुत करन े के लिए ववधध द्वारा आबद्ध है, और जब ऐसा व् यज‍ त धारा 64 में वखणतष सूचना के पश् चात,् उसे प्रस्तुत नही ं करता है ; (ि) जब मूि के अजस् तत् व, पररजस्थनत या अन् तवस्ष तु को उस व् यज‍ त द्वारा,502 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— जजसके ववरुद्ध उस े साबबत ककया जाना है या उसके हहत प्रनतननधध द्वारा लिखित रूप में स् वीकृत ककया जाना साबबत कर हदया गया है ; (ग) जब मूि नष् ट हो गया है, या िो गया है, या जबकक उसकी अन्त वस्ष तु का साक्ष् य देने की प्रस् थापना करन े वािा पिकार अपने स् वयं के व् यनतक्रम या उपेिा स े उद्भूत न होने वािे अन्य ककसी कारण से उसे युज‍ तयु‍ त समय में प्रस्तुत नहीं कर सकता है ; (घ) जब मूि इस प्रकृनत का है कक उसे आसानी से स् थानान्त ररत नहीं ककया जा सकता है ; (ङ) जब मूि धारा 74 के अथ ष के अन्त गतष एक िोक दस् तावेज है ; (च) जब मूि ऐसा दस् तावेज है जजसकी प्रमाखणत प्रनत का साक्ष् य में हदया जाना इस अधधननयम द्वारा या भारत में प्रवत्तृ ककसी अन्य ववधध द्वारा अनुज्ञात है ; (छ) जब मूि ऐसे अनेक ििे ाओं या अन्य दस् तावेजों से गहठत है जजनकी न्य ायािय में सुववधापूवकष परीिा नहीं की जा सकती और वह तथ् य जजसे साबबत ककया जाना है, सम् पूण ष संग्रह का साधारण पररणाम है । स्पष्‍ीकरण—(i) िंि (क), िंि (ग) और िंि (घ) के प्रयोजनों के लिए, दस् तावेज की अन्त वस्ष तु का कोई भी द्ववतीयक साक्ष् य ग्राह्य है ; (ii) िंि (ि) के प्रयोजनों के लिए लिखित स् वीकृनत ग्राह्य है ; (iii) िंि (ङ) या िंि (च) के प्रयोजनों के लिए, दस् तावेज की प्रमाखणत प्रनत ग्राह्य है, ककन् तु अन् य ककसी भी प्रकार का द्ववतीयक साक्ष्य ग्राह्य नहीं है ; (iv) िंि (छ) के प्रयोजनों के लिए, दस् तावेजों के साधारण पररणाम का साक्ष् य ऐसे ककसी व् यज‍ त द्वारा हदया जा सकेगा जजसने उनकी परीिा की है और जो ऐसे दस् तावेज की परीिा करन े में कुशि है । इिै‍राननक या 61. इस अधधननयम की कोई बात इस आधार पर साक्ष्य में ककसी इिै‍राननक या डिजजटि डिजजटि साक्ष्य की ग्राह्यता से इंकार नहीं करेगी कक यह कोई इिै‍राननक या डिजजटि अलभिेि । अलभिेि है और धारा 63 के अधीन रहते हुए ऐसे अलभिेि का वही ववधधक प्रभाव, ववधधमान्यता और प्रवतनष शीिता होगी, जो ककसी अन्य अलभिेि की होती है । इिै‍ राननक 62. इिै‍ राननक अलभिेि की अंतवस्ष त ु धारा 63 के उपबंधों के अनुसार साबबत की अलभिेि स े जा सकेगी । संबंधधत साक्ष्य के बारे में ववशेर् उपबंध । इिै‍ राननक 63. (1) इस अधधननयम में ककसी बात के होते हुए भी, ककसी इिै‍ राननक अलभिेि अलभिेिों की में अंतववष्ष ट ककसी सूचना को भी, जो कंप् यूटर या ककसी संसूचना डिवाइस या अन्यथा ग्राह्यता । द्वारा संग्रहहत, अलभलिखित या ककसी इिै‍राननक प्ररूप द्वारा उत् पाहदत और ककसी कागज पर मुहरत, प्रकाशीय या चुंबकीय मीडिया या अध-ष चािक मेमोरी में संग्रहहत, अलभलिखित या नकि की गई है (जजसे इसमें इसके पश् चात ् कंप् यूटर आउटपुट कहा गया है), तब कोई दस् तावेज समझा जाएगा, यहद प्रश् नगत सूचना और कंप् यूटर के संबंध में, इस धारा में उजल् िखित शतें पूरी कर दी जाती हैं और वह मूि की ककसी अंतवस्ष तु या उसमें कधथत ककसी तथ् य के साक्ष् य के रूप में, जजसका प्रत्य ि साक्ष् य ग्राह्य होता, अनतरर‍ त सबूत या मूि को प्रस्तुत ककए बबना ही ककन् हीं कायवष ाहहयों में ग्राह्य होगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 503 (2) कंप् यूटर आउटपुट के संबंध में, उपधारा (1) में ननहदषष्ट शतें ननम् नलिखित होंगी, अथाषत ् :— (क) सूचना से यु‍ त कंप् यूटर आउटपुट, कंप् यूटर या संसूचना डिवाइस द्वारा उस अवधध के दौरान उत् पाहदत ककया गया था जजसमें उस व् यज‍ त द्वारा, जजसका कंप् यूटर के उपयोग पर ववधधपूण ष ननयंत्रण था, उस अवधध में ननयलमत रूप से ककए गए ककसी कक्रयाकिाप के प्रयोजन के लिए सजृ न, सूचना संग्रह करने या प्रोसेस करन े के लिए ननयलमत रूप से कंप् यूटर या संसूचना डिवाइस का उपयोग ककया गया था ; (ि) उ‍ त अवधध के दौरान, इिै‍ राननक अलभिेि में अन्त ववष्ष ट ककस् म की सूचना या उस ककस् म की, जजससे इस प्रकार अन्त ववष्ष ट सूचना व् युत् पन्न की जाती है, उ‍ त कक्रयाकिापों के साधारण अनुक्रम में कंप् यूटर या संसूचना डिवाइस में ननयलमत रूप से भरी गई थी ; (ग) उ‍ त अवधध के महत् वपूण ष भाग में सवत्रष , कंप् यूटर या संसूचना डिवाइस समुधचत रूप से काय ष कर रही थी या नहीं तो, उस अवधध के संबंध में, जजसमें कंप् यूटर समुधचत रूप से काय ष नहीं कर रहा था या वह उस अवधध के भाग के दौरान प्रचािन में नहीं था, ऐसी अवधध नहीं थी जजसस े इिै‍ राननक अलभिेि या उसकी अंतवस्ष तु की शुद्धता प्रभाववत होती हो ; और (घ) इिै‍ राननक अलभिेि में अन्त ववष्ष ट सूचना ऐसी सूचना स े पुन: उत् पाहदत या व् युत् पन्न की जाती है, जजसे उ‍ त कक्रयाकिापों के साधारण अनुक्रम में कंप् यूटर या संसूचना डिवाइस में भरा गया था । (3) जहां ककसी अवधध में, उपधारा (2) के िंि (क) में यथा उजल् िखित, उस अवधध के दौरान ननयलमत रूप से ककए गए ककन्ह ीं कक्रयाकिापों के प्रयोजनों के लिए सूचना के सजृ न, संग्रह या प्रोसेस का काय ष एक या अधधक कंप् यूटरों या संसूचना डिवाइस द्वारा ननयलमत रूप से ककया गया था, चाहे वह— (क) एकि ढंग में ; या (ि) ककसी कंप्यूटर प्रणािी पर ; या (ग) ककसी कंप्यूटर नेटवकष पर ; या (घ) सूचना को समथ ष बनाने, सूचना का सजृ न या उपिब्ध कराने वािे, प्रोसेस और संग्रह करने वािे ककसी कंप्यूटर साधन पर ; और (ङ) ककसी मध्यवती के माध्यम से, उस अवधध के दौरान उस प्रयोजन के लिए उपयोग ककए गए सभी कंप्यूटरों या संसूचना डिवाइस को इस धारा के प्रयोजनों के लिए एकि कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस समझा जाएगा ; और इस धारा में ककसी कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस के प्रनत ननदेशों का अथ ष तद्नुसार ककया जाएगा । (4) ककसी कायवष ाही में, जहां इस धारा के आधार पर साक्ष् य में वववरण हदया जाना वांनछत है, ननम् नलिखित बातों में से ककसी बात को पूरा करते हुए प्रमाणपत्र को प्रत्येक बार इिै‍राननकी अलभिेि के साथ वहां प्रस्तुत ककया जाएगा जहां इसे स्वीकृनत के लिए प्रस्तुत ककया गया है, अथाषत ् :— (क) वववरण स े यु‍ त इिै‍ राननक अलभिेि की पहचान करना और उस रीनत का वणनष करना जजससे इसका उत् पादन ककया गया था ;504 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) उस इिै‍ राननक अलभिेि के उत् पादन में अन्त वलषित ककसी डिवाइस को ऐसी ववलशजष् टयां देना, जो यह दलशतष करने के प्रयोजन के लिए समुधचत हों कक इिै‍ राननक अलभिेि का कंप् यूटर या उपधारा (3) के िंि (क) से िंि (ङ) में ननहदषष्ट ककसी संसूचना डिवाइस द्वारा उत्प ादन ककया गया था ; (ग) ऐसे ववर्यों में से ककसी पर कारषवाई करना, जजससे उपधारा (2) में उजल् िखित शतें संबंधधत हैं, और ककसी ऐस े व् यज‍ त द्वारा हस् तािर ककए जान े के लिए तात् पनयतष होना, जो कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस या सुसंगत कक्रयाकिाप के प्रबंध (जो भी समुधचत हो) का भारसाधक है तथा कोई ववशेर्ज्ञ है, अनुसूची में ववननहदषष्ट प्रमाणपत्र में कधथत ककसी ववर्य का साक्ष् य होगा ; और इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए ककसी ऐसे ववर्य के बारे में यह कथन पयाषप् त होगा कक कथन करन े वािे व् यज‍ त के सवोत्तम ज्ञान और ववश् वास के आधार पर कहा गया है । (5) इस धारा के प्रयोजनों के लिए,— (क) सूचना ककसी कंप् यटू र या संसूचना डिवाइस को प्रदाय की गई समझी जाएगी यहद यह ककसी समुधचत रूप में प्रदाय की गई है, चाहे इस प्रकार ककया गया प्रदाय सीधे (मानव मध् यिेप सहहत या रहहत) या ककसी समुधचत उपस् कर के माध् यम द्वारा ककया गया हो ; (ि) कंप् यूटर उत् पाद को कंप् यूटर या संसूचना डिवाइस द्वारा उत् पाहदत समझा जाएगा, चाहे यह इसके द्वारा सीधे उत् पाहदत हो (मानव मध् यिेप सहहत या रहहत) या उपधारा (3) के िंि (क) से िंि (ङ) में यथाननहदषष्ट ककसी समुधचत उपस् कर या अन्य इिै‍राननक साधनों के माध् यम से हो । प्रस्तुत करने की 64. धारा 60 के िंि (क) में ननहदषष् ट दस् तावेजों की अन्तवषस्त ु का द्ववतीयक साक्ष्य सूचना के बारे में तब तक न हदया जा सकेगा, जब तक ऐसे द्ववतीयक साक्ष् य देने की प्रस् थापना करने ननयम । वािे पिकार ने उस पिकार को, जजसके कब् जे में या अधधकार में वह दस् तावेज है या उसके अधधव‍ता या प्रनतननधध को, उस े प्रस्तुत करने के लिए ऐसी सूचना, जैसा ववधध द्वारा ववहहत है, और यहद ववधध द्वारा कोई सूचना ववहहत नहीं हो तो ऐसी सूचना, जैसा न्य ायािय मामिे की पररजस् थनतयों के अधीन युज‍ तयु‍ त समझता है, न दे हदया हो : परन् तु ऐसी सूचना ननम् नलिखित दशाओं में स े ककसी में या ककसी भी अन्य दशा में, जजसमें न्य ायािय उसके हदए जाने स े अलभमुज‍ त प्रदान करना उधचत समझता है, द्ववतीयक साक्ष् य को ग्राह्य बनाने के लिए अपेक्षित नहीं ककया जाएगा,— (क) जब साबबत ककया जाने वािा दस् तावेज स् वयं एक सूचना है ; (ि) जब प्रनतपिी को मामिे की प्रकृनत स े यह जानना ही होगा कक उस े प्रस्तुत करने की उससे अपेिा की जाएगी ; (ग) जब यह प्रतीत होता है या साबबत ककया जाता है कक प्रनतपिी ने मूि पर कब् जा कपट या बि द्वारा अलभप्राप् त कर लिया है ; (घ) जब मूि, प्रनतपिी या उसके अलभकताष के पास न्य ायािय में है ; (ङ) जब प्रनतपिी या उसके अलभकताष ने दस्तावेज का िो जाना स् वीकार कर लिया है ; (च) जब दस् तावेज पर कब् जा रिने वािा व् यज‍ त न् यायािय की आदेलशका कीअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 505 पहुंच के बाहर है या ऐसी आदेलशका के अध् यधीन नहीं है । 65. यहद कोई दस् तावेज, ककसी व् यज‍ त द्वारा हस् तािररत या पूणतष : या भागत: उस व् यज‍ त के हस् तािर या लििा गया अलभकधथत है, तो यह साबबत करना होगा कक वह हस् तािर या उस दस् तावजे हस् तिेि का के उतने का हस् तिेि, जजतने के बारे में यह अलभकधथत है कक वह उस व् यज‍ त के साबबत ककया हस् तिेि में है, उसके हस् तिेि में है । जाना जजसके बारे में अलभकधथत है कक उसने प्रस्तुत ककए गए दस् तावेज को हस् तािररत ककया था या लििा था । 66. सुरक्षित इिै‍ राननक हस्तािर के मामि े के लसवाय, यहद यह अलभकधथत है कक इिै‍ राननक हस्तािर के ककसी हस् तािरकताष का इिै‍ राननक हस्तािर इिै‍ राननक अलभिेि में ननयत ककया गया बारे में सबतू । है तो यह तथ् य साबबत ककया जाना चाहहए कक ऐसा इिै‍ राननक हस्तािर, हस् तािरकता ष का इिै‍ राननक हस्तािर है । 67. यहद ककसी दस् तावेज का अनुप्रमाखणत होना ववधध द्वारा अपेक्षित है, तो उस े ऐस े दस् तावेज के ननष् पादन का साक्ष् य के रूप में उपयोग में नहीं िाया जाएगा, जब तक कम से कम एक अनुप्रमाणक साबबत ककया सािी, यहद कोई अनुप्रमाणक सािी जीववत हो और न् यायािय की आदेलशका के अध् यधीन जाना, जजसका हो तथा साक्ष् य देने में समथ ष हो, उसका ननष् पादन साबबत करने के प्रयोजन से न बुिाया अनुप्रमाखणत गया हो : होना ववधध द्वारा अपेक्षित परन् तु ऐसे ककसी दस् तावेज के ननष् पादन को साबबत करने के लिए, जो वसीयत नही ं है । 1908 का 16 है, और जो भारतीय रजजस् रीकरण अधधननयम, 1908 के उपबन्ध ों के अनुसार रजजस् रीकृत है, ककसी अनुप्रमाणक सािी को बुिाना आवश् यक नहीं होगा, जब तक उसका ननष् पादन, उस व् यज‍ त द्वारा जजसके द्वारा उसका ननष् पाहदत होना तात् पनयषत है ववननहदषष्ट रूप स े इंकार न ककया गया हो । 68. यहद ऐसे ककसी अनुप्रमाणक सािी का पता न चि सके तो यह साबबत करना जब ककसी भी अनुप्रमाणक होगा कक कम स े कम एक अनुप्रमाणक सािी का अनुप्रमाण उसी के हस् तिेि में है, और सािी का पता न यह कक दस्त ावेज का ननष् पादन करने वािे व् यज‍ त का हस्त ािर उसी व् यज‍ त के हस् तिेि चिे, तब सबूत । में है । 69. अनुप्रमाखणत दस् तावेज के ककसी पिकार की अपने द्वारा उसका ननष् पादन अनुप्रमाखणत दस् तावेज के करने की स् वीकृनत उस दस् तावेज के ननष् पादन का उसके ववरुद्ध पयाषप् त सबूत होगा, पिकार द्वारा यद्यवप वह ऐसा दस् तावेज हो जजसका अनुप्रमाखणत होना ववधध द्वारा अपेक्षित है । ननष् पादन की स् वीकृनत । 70. यहद अनुप्रमाणक सािी दस् तावेज के ननष् पादन स े इंकार करे या उसे उसके जब अनुप्रमाणक ननष् पादन का स् मरण न हो, तो उसका ननष् पादन अन्य साक्ष् य द्वारा साबबत ककया जा सािी ननष् पादन सकेगा । से इंकार करता है, तब सबूत । 71. कोई अनुप्रमाखणत दस् तावेज, जजसका अनुप्रमाखणत होना ववधध द्वारा अपेक्षित उस दस् तावेज का साबबत ककया नहीं है, ऐसे साबबत ककया जा सकेगा, मानो वह अनुप्रमाखणत नहीं है । जाना जजसका अनुप्रमाखणत होना ववधध द्वारा अपेक्षित नहीं है ।506 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— हस् तािर, िेि 72. (1) यह अलभननजश् चत करने के लिए कक ‍ या कोई हस् तािर, िेि या मुरा उस या मुरा की व् यज‍ त की है, जजसके द्वारा उसका लििा जाना या ककया जाना तात् पनयतष है ककसी तुिना अन् य स े हस् तािर, िेि या मुरा की, जजसके बारे में यह स् वीकृत है या न् यायािय को समाधानप्रद करना जो स् वीकृत या रूप में साबबत कर हदया गया है कक वह उस व् यज‍ त द्वारा लििा गया या ककया गया साबबत ह ैं । था, उससे तुिना की जा सकेगी, जजसे साबबत ककया जाना है, यद्यवप वह हस् तािर, ििे या मुरा ककसी अन् य प्रयोजन के लिए प्रस्तुत या साबबत नहीं की गई हो । (2) न्य ायािय में उपजस् थत ककसी व् यज‍ त को ककन्ह ीं शब् दों या अंकों के लििने का ननदेश न्य ायािय इस प्रयोजन स े दे सकेगा कक ऐस े लििे गए शब् दों या अंकों की ककन्ह ी ं ऐसे शब् दों या अंकों से तुिना करने के लिए न् यायािय समथ ष हो सके जजनके बारे में अलभकधथत है कक वे उस व् यज‍ त द्वारा लििे गए थे । (3) यह धारा ककन्ह ीं आवश् यक पररवतनष ों के साथ अंगुिी छापों को भी िागू होती है । डिजजटि 73. यह अलभननजश् चत करने के लिए कक ‍ या कोई डिजजटि हस्तािर उस व् यज‍ त का है हस्तािर के जजसके द्वारा उसका ककया जाना तात् पनयतष है, न्य ायािय यह ननदेश दे सकेगा कक,— सत् यापन के बारे में सबतू । (क) वह व् यज‍ त या ननयंत्रक या प्रमाणकताष प्राधधकारी, डिजजटि हस्तािर प्रमाणपत्र प्रस्तुत करे ; (ि) कोई अन्य व् यज‍ त डिजजटि हस्तािर प्रमाणपत्र में सचू ीबद्ध िोक कंुजी के लिए आवेदन करे और उस डिजजटि हस्तािर को, जजसका उस व् यज‍ त द्वारा ककया जाना तात् पनयषत है, सत् यावपत करे । िोक िस् तािेज िोक और प्राइवेट 74. (1) ननम् नलिखित दस् तावेज, िोक दस् तावेज हैं— दस् तावेज। (क) वे दस् तावेज, जो— (i) प्रभुतासम्प न्न प्राधधकारी के ; (ii) शासकीय ननकायों और अधधकरणों के ; और (iii) भारत के या ककसी ववदेश के ववधायी, न्य ानयक और कायपष ािक िोक अधधकाररयों के, कायों के रूप में या कायों के अलभिेि के रूप में हैं; (ि) ककसी राज् य या संघ राज्यिेत्र में रिे गए प्राइवेट दस् तावेजों के िोक अलभिेि । (2) उपधारा (1) में ननहदषष्ट दस्तावेजों के लसवाय, अन्य सभी दस् तावेज प्राइवेट हैं । िोक दस् तावेजों 75. प्रत्येक िोक अधधकारी, जजसकी अलभरिा में कोई ऐसा िोक दस् तावेज है, की प्रमाखणत जजसका ननरीिण करने का ककसी भी व् यज‍ त को अधधकार है, मांग ककए जाने पर उस प्रनतयां । व् यज‍ त को उसकी प्रनत उसके लिए ववधधक फीस के संदाय पर ऐसी प्रनत के नीचे इस लिखित प्रमाणपत्र के सहहत देगा कक वह, यथाजस् थनत, ऐसे दस् तावेज की या उसके भाग की शुद्ध प्रनत है तथा ऐसा प्रमाणपत्र ऐसे अधधकारी द्वारा हदनांककत ककया जाएगा और उसके नाम और पदालभधान से हस् तािररत ककया जाएगा तथा जब कभी ऐसा अधधकारी ववधध द्वारा ककसी मुरा का उपयोग करने के लिए प्राधधकृत है तब मुरायु‍ त ककया जाएगा, तथा इस प्रकार प्रमाखणत ऐसी प्रनतयां प्रमाखणत प्रनतयां कहिाएंगी । स् पष् ‍ीकरण—कोई अधधकारी, जो पदीय कतव्ष य के साधारण अनुक्रम में ऐसी प्रनतयां पररदान करने के लिए प्राधधकृत है, वह इस धारा के अथष के अन्त गतष ऐसे दस् तावेजों की अलभरिा रिता है, यह समझा जाएगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 507 76. ऐसी प्रमाखणत प्रनतयां, उन िोक दस् तावेजों की या उन िोक दस् तावेजों के भागों प्रमाखणत प्रनतयों को प्रस्तुत करने की अन्त वस्ष तु के सबूत में प्रस्तुत की जा सकेंगी जजनकी वे प्रनतयां होना तात् पनयतष हैं । के द्वारा दस् तावेजों का सबूत । 77. ननम् नलिखित िोक दस्तावेज, ननम् नलिखित रूप से साबबत ककए जा सकेंगे,— अन् य शासकीय दस् तावेजों का (क) केन्र ीय सरकार के ककसी मंत्रािय और ववभाग के, या ककसी राज् य सबूत । सरकार के, या ककसी राज् य सरकार या संघ राज्यिेत्र प्रशासन के ककसी ववभाग के अधधननयम, आदेश या अधधसूचनाएं,— (i) उन ववभागों के अलभिेिों द्वारा, जो क्रमश: उन ववभागों के प्रमुि द्वारा प्रमाखणत हैं ; या (ii) ककसी दस् तावेज द्वारा, जजसका ऐसी ककसी सरकार के आदेश द्वारा मुहरत होना तात् पनयषत है ; (ि) संसद् या ककसी राज्य ववधान मंिि की कायवष ाहहयां, क्रमश: इन ननकायों के जनिष ों द्वारा या प्रकालशत अधधननयमों या सारांशों द्वारा, या संबद्ध सरकार के आदेश द्वारा मुहरत होना तात् पनयतष होने वािी प्रनतयों द्वारा ; (ग) भारत के राष्रपनत या ककसी राज्य के राज्यपाि या संघ राज्यिेत्र के प्रशासक या उपराज्यपाि द्वारा ननकािी गई उद् घोर्णाएं, आदेश या ववननयम, राजपत्र में अंतववष्ष ट प्रनतयों या उद्धरणों द्वारा ; (घ) ककसी ववदेश की कायपष ालिका के काय ष या ववधान-मंिि की कायवष ाहहयां, उनके प्राधधकार से प्रकालशत, या उस देश में सामान्य त: इस रूप में सामान्यतः प्राप्त, जनिष ों द्वारा, या उस देश या प्रभत्ु वसंपन्न की मुरा के अधीन प्रमाखणत प्रनत द्वारा, या ककसी केन्र ीय अधधननयम में उनकी मान्य ता द्वारा ; (ङ) ककसी राज् य के नगरपालिका या स्थानीय ननकाय की कायवष ाहहयां, ऐसी कायवष ाहहयों की ऐसी प्रनत द्वारा, जो उनके ववधधक पािक द्वारा प्रमाखणत है, या ऐसे ननकाय के प्राधधकार से प्रकालशत हुई तात् पनयषत होने वािी ककसी मुहरत पुस् तक द्वारा ; (च) ककसी ववदेश का ककसी अन्य प्रकार का िोक दस्तावजे , जो मिू द्वारा या उसके ववधधक पािक द्वारा प्रमाखणत ककसी प्रनत द्वारा, जजस प्रनत के साथ ककसी नोटरी पजब् िक की, या भारतीय कौंसि या राजननयक अलभकताष की मुरा के अधीन यह प्रमाणपत्र है कक वह प्रनत मूि की ववधधक अलभरिा रिन े वािे अधधकारी द्वारा सम्य क् रूप से प्रमाखणत है, तथा उस दस् तावेज की प्रकृनत उस ववदेश की ववधध के अनुसार साबबत ककए जाने के द्वारा । िस् तािेजों के बारे में उपिारणाएं 78. (1) न्य ायािय प्रत्येक ऐसा दस् तावेज का असिी होना उपधाररत करेगा, जो प्रमाखणत प्रनतयों के असिी होने ऐसा प्रमाणपत्र, प्रमाखणत प्रनत या अन्य दस् तावेज होना तात् पनयतष है, जजसका ककसी के बारे में ववलशष् ट तथ् य के साक्ष् य के रूप में ग्राह्य होना ववधध द्वारा घोवर्त है और जजसका उपधारणा । केन्र ीय सरकार या ककसी राज् य सरकार के ककसी अधधकारी द्वारा सम् यक् रूप स े प्रमाखणत होना तात् पनयतष है : परन् तु यह तब जबकक ऐसा दस् तावेज सारत: उस प्ररूप में हो और ऐसी रीनत स े ननष् पाहदत हुआ तात् पनयषत हो जो ववधध द्वारा उस ननलमत्त ननदेलशत है ।508 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (2) न् यायािय यह भी उपधाररत करेगा कक कोई अधधकारी, जजसके द्वारा ऐसे दस् तावेज का हस् तािररत या प्रमाखणत होना तात् पनयषत है, वह पदीय हैलसयत, जजसका वह ऐसे कागज में दावा करता है, उस समय रिता था, जब उसने उसे हस् तािररत ककया था । साक्ष्य , आहद के 79. जब कभी ककसी न्य ायािय के समि कोई ऐसा दस् तावेज प्रस्तुत ककया जाता अलभिेि के रूप है, जजसका ककसी न् यानयक कायवष ाही में, या ववधध द्वारा ऐसा साक्ष् य िेने के लिए में प्रस्ततु प्राधधकृत ककसी अधधकारी के समि, ककसी सािी द्वारा हदए गए साक्ष् य या साक्ष् य के दस् तावेजों के बारे में उपधारणा । ककसी भाग का अलभिेि या ज्ञापन होना या ककसी बंदी या अलभयु‍ त का ववधध के अनुसार लिया गया कथन या संस् वीकृनत होना तात् पनयतष है और जजसका ककसी न्य ायाधीश या मजजस् रेट द्वारा या पूवो‍त प्रकार के ऐसे ककसी अधधकारी द्वारा हस् तािररत होना तात् पनयषत है, तब न् यायािय यह उपधाररत करेगा कक,— (i) वह दस् तावेज असिी है ; (ii) उन पररजस् थनतयों के बारे में, जजनके अधीन वह लिया गया था, कोई भी कथन, जजनका उसको हस् तािररत करने वािे व् यज‍ त द्वारा ककया जाना तात् पनयतष है, सत् य है ; और (iii) ऐसा साक्ष् य, कथन या संस् वीकृनत सम् यक् रूप से िी गई थी । राजपत्रों, 80. न्य ायािय प्रत्येक ऐसे दस् तावेज का असिी होना उपधाररत करेगा, जजसका समाचारपत्रों और राजपत्र होना, या समाचारपत्र या जनिष होना तात् पनयतष है और प्रत्येक ऐसे दस् तावेज का, अन् य दस् तावेजों जजसका ऐसा दस् तावेज होना तात् पनयषत है, जजसका ककसी व् यज‍ त द्वारा रिा जाना ककसी के बारे में उपधारणा । ववधध द्वारा ननदेलशत है, यहद ऐसा दस् तावेज सारत: उस प्ररूप में रिा गया है, जो ववधध द्वारा अपेक्षित है, और उधचत अलभरिा में स े प्रस्तुत ककया गया है । स्पष्‍ीकरण—इस धारा और धारा 92 के प्रयोजनों के लिए, कोई दस्तावेज उधचत अलभरिा में रिा गया कहा जाता है, यहद वह उस स्थान में रिा गया है, जजसमें उस व्यज‍त द्वारा उसका ध्यान रिा जाता है, जजसके पास ऐसा दस्तावेज रिा जाना अपेक्षित है ; ककंतु कोई अलभरिा अनुधचत नहीं है, यहद इसका वैध उत्पन्न होना साबबत होता है, या ककसी ववशेर् मामिे की पररजस्थनतयां ऐसी है, जो उस उत्पवत्त को प्रानयक बनाती हैं । इिै‍ राननक या 81. न्य ायािय, ऐसे प्रत्य ेक इिै‍ राननक या डिजजटि अलभिेि का असिी होना डिजजटि अलभिेि उपधाररत करेगा, जजसका राजपत्र होना तात् पनयषत है, या जजसका ऐसा इिै‍ राननक या में राजपत्रों के बारे डिजजटि अलभिेि होना तात् पनयतष है, जजसका ककसी व् यज‍ त द्वारा रिा जाना ककसी ववधध में उपधारणा । द्वारा ननहदषष् ट है, यहद ऐसा इिै‍ राननक या डिजजटि अलभिेि सारत: उस रूप में रिा गया है, जो ववधध द्वारा अपेक्षित है और उधचत अलभरिा से प्रस्तुत ककया गया हो । स्पष्‍ीकरण—इस धारा और धारा 93 के प्रयोजनों के लिए, कोई इिै‍ राननक अलभिेि उधचत अलभरिा में रिा गया कहा जाता है, यहद वह उस स्थान में रिा है, जजसमें उस व्यज‍त द्वारा उसका ध्यान रिा जाता है, जजसके पास ऐसा दस्तावेज रिा जाना अपेक्षित है ; ककंतु कोई अलभरिा अनुधचत नहीं है, यहद इसका वैध उत्पन्न होना साबबत होता हो, या ककसी ववशेर् मामिे की पररजस्थनतयां ऐसी हैं, जो ऐसी उत्पवत्त को प्रानयक बनाती हैं । सरकार के प्राधधकार 82. न्य ायािय यह उपधाररत करेगा कक वे मानधचत्र या रेिांक, जो केन्र ीय सरकार द्वारा बनाए गए या ककसी राज् य सरकार के प्राधधकार द्वारा बनाए गए तात् पनयतष हैं, वैसे ही बनाए गए थे मानधचत्रों या और वे शुद्ध हैं, ककन् त ु ककसी मामिे के प्रयोजनों के लिए बनाए गए मानधचत्रों या रेिांकों रेिांकों के बारे में उपधारणा । के बारे में यह साबबत करना होगा कक वे सही हैं ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 509 83. न्य ायािय, प्रत्येक ऐसी पुस् तक का, जजसका ककसी देश की सरकार के प्राधधकार ववधधयों के के अधीन मुहरत या प्रकालशत होना और जजसमें उस देश की कोई ववधध अन् तववष्ष ट होना संग्रह और ववननश् चयों की तात् पनयषत है, तथा प्रत्येक ऐसी पुस् तक का, जजसमें ऐसे देश के न्य ायाियों के ववननश् चयों ररपोटों के बारे की ररपोटें अन्त ववष्ष ट होना तात् पनयतष है, असिी होना उपधाररत करेगा । में उपधारणा । 84. न्य ायािय यह उपधाररत करेगा कक प्रत्येक ऐसा दस् तावेज, जजसका मुख् तारनामा मुख् तारनामों के होना और नोटरी पजब् िक या ककसी न्य ायािय, न्य ायाधीश, मजजस् रेट, भारतीय कौंसि या बारे में उपधारणा । उप-कौंसि या केन्र ीय सरकार के प्रनतननधध के समि ननष् पाहदत होना और उसके द्वारा अधधप्रमाणीकृत होना तात् पनयतष है, ऐसे ननष् पाहदत और अधधप्रमाणीकृत ककया गया था । 85. न्य ायािय यह उपधारणा करेगा कक प्रत्येक इिै‍ राननक अलभिेि, जो पिकारों इिै‍ राननक के इिै‍राननक या डिजजटि हस्तािर को अन्तववष्ष ट करने वािा ऐसा करार होना करारों के बारे में उपधारणा । तात् पनयषत है, इस प्रकार पिकारों के इिै‍ राननक या डिजजटि हस्तािर के साथ हदया गया था । 86. (1) ककन्ह ीं ऐसी कायषवाहहयों में, जजनमें सुरक्षित इिै‍ राननक अलभिेि इिै‍ राननक अंतवलषित है, जब तक इसके प्रनतकूि साबबत नहीं कर हदया जाता, न्य ायािय यह अलभिेिों और इिै‍ राननक उपधाररत करेगा कक सुरक्षित इिै‍ राननक अलभिेि को, ककसी ऐसे ववननहदषष् ट समय स,े हस्तािरों के बारे जजससे सुरक्षित प्राजस् थनत संबंधधत है, पररवनततष नहीं ककया गया है । में उपधारणा । (2) ककसी ऐसी कायवष ाही में, जजसमें सुरक्षित इिै‍ राननक हस्तािर अन् तवलषित है, जब तक इसके प्रनतकूि साबबत नहीं कर हदया जाता, न्य ायािय यह उपधाररत करेगा कक,— (क) उपयोगकताष द्वारा सुरक्षित इिै‍ राननक हस्तािर, इिै‍ राननक अलभिेि को धचजह्नत या अनुमोहदत करने के आशय से ककया गया है; (ि) सुरक्षित इिै‍ राननक अलभिेि या सुरक्षित इिै‍ राननक हस्तािर की दशा में के लसवाय, इस धारा की कोई बात इिै‍ राननक अलभिेि या इिै‍ राननक हस्तािर की अधधप्रमाखणकता और समग्रता से संबंधधत ककसी उपधारणा का सजृ न नहीं करेगी । 87. जब तक कक इसके प्रनतकूि साबबत नहीं कर हदया जाता है, न्य ायािय, यह इिै‍ राननक उपधाररत करेगा कक यहद उपयोगकताष द्वारा प्रमाणपत्र को स् वीकार ककया गया था तो हस्तािर प्रमाणपत्रों के बारे इिै‍ राननक हस्तािर प्रमाणपत्र में सूचीबद्ध सूचना सही है, लसवाय उस सूचना के जो में उपधारणा । उपयोगकताष की सूचना के रूप में ववननहदषष् ट है जजसे सत् यावपत नहीं ककया गया है । 88. (1) न्य ायािय यह उपधाररत कर सकेगा कक भारत के बाहर ऐसे ककसी देश के ववदेशी न् यानयक न्य ानयक अलभिेि की प्रमाखणत प्रनत तात्प नयतष होने वािा कोई दस् तावेज असिी और अलभिेिों की प्रमाखणत प्रनतयों शुद्ध है, यहद वह दस्त ावेज ककसी ऐसी रीनत से प्रमाखणत होना तात् पनयतष हो जजसका के बारे में न्य ानयक अलभिेिों की प्रनतयों के प्रमाणन के लिए उस देश में साधारणत: काम में िाई उपधारणा । जाने वािी रीनत होना ऐसे देश में या उसके लिए केन्र ीय सरकार के ककसी प्रनतननधध द्वारा प्रमाखणत है । (2) ऐसा अधधकारी, जो भारत के बाहर ऐसे ककसी राज् यिेत्र या स्थ ान के लिए, 1897 का 10 साधारण िण्ि अधधननयम, 1897 की धारा 3 के िण् ि (43) में यथा पररभावर्त राजनैनतक अलभकताष है, वह इस धारा के प्रयोजनों के लिए केन्र ीय सरकार का उस देश में, और उस देश के लिए प्रनतननधध समझा जाएगा, जजसमें वह राज् यिेत्र या स्थ ान समाववष् ट है ।510 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— पुस् तकों, 89. न्य ायािय यह उपधाररत कर सकेगा कक कोई पुस् तक, जजसे वह िोक या मानधचत्रों और साधारण हहत सम् बन् धी ववर्यों की जानकारी के लिए देिे और कोई प्रकालशत मानधचत्र या चाटों के बारे में चाटष का कथन सुसंगत तथ् य है, और जो उसके ननरीिणाथ ष प्रस्तुत ककया गया है, उस उपधारणा । व् यज‍ त द्वारा तथा उस समय और उस स् थान पर लििा गया था और प्रकालशत ककया गया था जजसके द्वारा या जजस समय या स् थान पर उसका लििा जाना या प्रकालशत होना तात्प नयतष है । इिै‍ राननक 90. न्य ायािय यह उपधाररत कर सकेगा कक आरंभकताष द्वारा ऐसे प्रेवर्ती को ककसी संदेशों के बारे में इिै‍ राननक मेि सवरष के माध् यम से अग्रेवर्त कोई इिै‍ राननक संदेश, जजस े ऐसे संदेश उपधारणा । का संबोधधत ककया जाना तात् पनयतष है, उस संदेश के समरूप है, जो पारेर्ण के लिए उसके कंप् यूटर में भरा गया था; ककंतु न् यायािय, उस व् यज‍ त के बारे में, जजसके द्वारा ऐसा संदेश भेजा गया था, कोई उपधारणा नहीं करेगा । प्रस्ततु नही ं ककए 91. न्य ायािय यह उपधाररत करेगा कक प्रत्येक ऐसा दस् तावेज, जजसे प्रस्तुत करने गए दस् तावेजों के की अपेिा की गई थी और जो प्रस्तुत करने की सूचना के पश् चात ् प्रस्तुत नहीं ककया गया सम् यक् ननष् पादन, है, ववधध द्वारा अपेक्षित रीनत में अनुप्रमाखणत, स् टाजम् पत और ननष् पाहदत ककया गया था । आहद के बारे में उपधारणा । तीस वर् ष पुराने 92. जहां कोई दस् तावेज, जजसका तीस वर् ष पुराना होना तात् पनयषत है या साबबत दस् तावेजों के बारे ककया गया है, ऐसी ककसी अलभरिा में से, जजसे न्य ायािय उस ववलशष् ट मामिे में उधचत में उपधारणा । समझता है, प्रस्तुत ककया गया है, वहां न् यायािय यह उपधाररत कर सकेगा कक ऐसे दस् तावेज पर हस् तािर और उसका प्रत्येक अन् य भाग, जजसका ककसी ववलशष् ट व् यज‍ त के हस् तिेि में होना तात् पनयषत है, उस व् यज‍ त के हस् तिेि में है, और ननष् पाहदत या अनुप्रमाखणत दस् तावेज होने की दशा में यह उपधाररत कर सकेगा कक वह उन व् यज‍ तयों द्वारा सम् यक् रूप में ननष् पाहदत और अनुप्रमाखणत ककया गया था, जजनके द्वारा उसका ननष् पाहदत और अनुप्रमाखणत होना तात् पनयतष है । स्पष्‍ीकरण—धारा 80 का स् पष् टीकरण इस धारा को भी िागू होगा । दृष् ‍ांत (क) क भू-संपवत्त पर दीघकष ाि स े कब् जा रिता आया है । यह उस भूलम सम् बन्ध ी वविेि, जजनसे उस भूलम पर उसका हक दलशतष है, अपनी अलभरिा में स े प्रस्तुत करता है । यह अलभरिा उधचत होगी । (ि) क उस भू-संपवत्त से सम्ब द्ध वविेि, जजनका वह बन् धकदार है, प्रस्तुत करता है । बंधककताष संपवत्त पर कब् जा रिता है । यह अलभरिा उधचत होगी । (ग) ख का सबं ंधी क, ख के कब् जे वािी भूलम स े संबंधधत वविेि प्रस्तुत करता है, जजन्ह ें ख ने उसके पास सुरक्षित अलभरिा के लिए जमा ककया था । यह अलभरिा उधचत होगी । पांच वर् ष पुराने 93. जहां कोई इिै‍ राननक अलभिेि, जजसका पांच वर् ष पुराना होना तात् पनयतष है या इिै‍ राननक साबबत ककया गया है, ऐसी ककसी अलभरिा से जजसे न्य ायािय उस ववलशष् ट मामि े में अलभिेिों के बारे उधचत समझता है, प्रस्तुत ककया गया है, वहां न्य ायािय, यह उपधाररत कर सकेगा कक में उपधारणा । ऐसा इिै‍ राननक हस्तािर, जजसका ककसी ववलशष् ट व् यज‍ त का इिै‍ राननक हस्तािर होना तात् पनयषत है, उसके द्वारा या उसकी ओर से इस ननलमत्त प्राधधकृत ककसी व् यज‍ त द्वारा ककया गया था । स् पष् ‍ीकरण—धारा 81 का स् पष् टीकरण इस धारा को भी िागू होगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 511 अध् याय 6 िस् तािेजी साक्ष्य दिारा मौखखक साक्ष् य के अपिजिण के विषय में 94. जब ककसी संववदा के या अनुदान के या संपवत्त के ककसी अन्य व् ययन के दस् तावेज के रूप में ननबन् धन ककसी दस् तावेज के रूप में िेिबद्ध कर लिए गए हों, और उन सब दशाओं में, िेिबद्ध जजनमें ववधध द्वारा अपेक्षित है कक कोई बात दस् तावेज के रूप में िेिबद्ध की जाए, ऐसी संववदाओ,ं संववदा, अनुदान या संपवत्त के अन्य व् ययन के ननबन् धनों के या ऐसी बात के साबबत ककए अनुदानों और जाने के लिए स् वयं उस दस्त ावेज के या उन दशाओं में, जजसमें इसके पूव ष अन् तववष्ष ट संपवत्त के अन् य व् ययनों के उपबन्ध ों के अधीन द्ववतीयक साक्ष् य ग्राह्य है, उसकी अन्त वस्ष तु के द्ववतीयक साक्ष् य के ननबन्ध नों का लसवाय, कोई भी साक्ष् य नहीं हदया जाएगा । साक्ष्य । अपिाि 1—जब ववधध द्वारा ककसी िोक अधधकारी की ननयुज‍ त लिखित रूप में अपेक्षित है और जब यह दलशतष ककया जाता है कक ककसी ववलशष् ट व् यज‍ त ने ऐसे अधधकारी के नाते काय ष ककया है, तब उस िेि का, जजसके द्वारा वह ननयु‍ त ककया गया था, साबबत ककया जाना आवश् यक नहीं है । अपिाि 2—जजन वसीयतों का संप्रमाण लमिा है, वे संप्रमाण द्वारा साबबत की जा सकेंगी । स् पष् ‍ीकरण 1—यह धारा उन दशाओं में, जजनमें ननहदषष्ट संववदाएं, अनुदान या संपवत्त के व् ययन एक ही दस्त ावेज में अन्त ववष्ष ट हैं और उन दशाओं में, जजनमें व े एक स े अधधक दस्त ावेजों में अन्त ववष्ष ट हैं, समान रूप से िाग ू हैं । स् पष् ‍ीकरण 2—जहां एक से अधधक मूि हैं, वहां केवि एक मूि साबबत करना आवश् यक है । स् पष् ‍ीकरण 3—इस धारा में ननहदषष् ट तथ् यों से लभन्न ककसी तथ् य का ककसी भी दस् तावेज में कथन, उसी तथ् य के बारे में मौखिक साक्ष् य की ग्राह्यता को ननवाररत नही ं करेगा । दृष् ‍ांत (क) यहद कोई संववदा कई पत्रों में अन्त ववष्ष ट है, तो वे सभी पत्र, जजनमें वह अन्त ववष्ष ट है, साबबत करने होंगे । (ि) यहद कोई संववदा ककसी ववननमयपत्र में अन् तववष्ष ट है, तो वह ववननमयपत्र साबबत करना होगा । (ग) यहद ववननमयपत्र तीन सेट में लिखित है, तो केवि एक को साबबत करना आवश् यक है । (घ) ख से कनतपय ननबन् धनों पर क नीि के पररदान के लिए लिखित संववदा करता है । संववदा इस तथ् य का वणनष करती है कक ख ने क को ककसी अन्य अवसर पर मौखिक रूप से संववदाकृत अन् य नीि का मूल् य चुकाया था । मौखिक साक्ष् य प्रस्तुत ककया जाता है कक अन्य नीि के लिए कोई संदाय नहीं ककया गया । यह साक्ष् य ग्राह्य है । (ङ) ख द्वारा हदए गए धन की रसीद ख को क देता है । संदाय करने का मौखिक साक्ष् य प्रस्तुत ककया जाता है । यह साक्ष् य ग्राह्य है । 95. जब ककसी ऐसी संववदा, अनुदान या संपवत्त के अन्य व्य यन के ननबन् धनों को, मौखिक करार के साक्ष्य का या ककसी बात को, जजसके बारे में ववधध द्वारा अपेक्षित है कक वह दस् तावेज के रूप में अपवजनष । िेिबद्ध की जाए, धारा 94 के अनुसार साबबत ककया जा चुका है, तब ककसी ऐसी लिित के पिकारों या उनके हहत प्रनतननधधयों के बीच के ककसी मौखिक करार या कथन का512 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कोई भी साक्ष् य उसके ननबन्ध नों का िण् िन करने या उनमें फेरफार करने या जो़िने या उनमें से घटाने के प्रयोजन के लिए ग्रहण नहीं ककया जाएगा : परन् तु ऐसा कोई तथ् य साबबत ककया जा सकेगा, जो ककसी दस् तावेज को अववधधमान्य बना दे या जो ककसी व् यज‍ त को तत् सम् बन् धी ककसी डिक्री या आदेश का हकदार बना दे, यथा कपट, अलभत्रास, अवैधता, सम् यक् ननष् पादन का अभाव, ककसी संववदाकारी पिकार में सामथ् यष का अभाव, प्रनतफि का अभाव या ननष् फिता या ववधध की या तथ् य की भूि : परन् तु यह और कक ककसी ववर्य के बारे में, जजसके बारे में दस् तावेज मौन है और जो उसके ननबन्ध नों से असंगत नहीं है, ककसी पथृ क् मौखिक करार का अजस् तत् व साबबत ककया जा सकेगा । इस पर ववचार करते समय यह परन् तुक िागू होता है या नहीं, न्य ायािय दस्त ावेज की औपचाररकता की मात्रा को ध् यान में रिेगा : परन् तु यह भी कक ऐसी ककसी संववदा, अनुदान या संपवत्त के व् ययन के अधीन कोई बाध् यता संिग् न होने की पुरोभाव् य शत ष गहठत करने वाि े ककसी पथृ क् मौखिक करार का अजस् तत् व साबबत ककया जा सकेगा : परन् तु यह भी कक ऐसी ककसी संववदा, अनुदान या संपवत्त के व् ययन को वविंडित या उपांतररत करने के लिए ककसी सुलभन् न पश्चातवती मौखिक करार का अजस् तत् व उन दशाओं के लसवाय साबबत ककया जा सकेगा, जजनमें ववधध द्वारा अपेक्षित है कक ऐसी संववदा, अनुदान या संपवत्त का व् ययन लिखित हो या जजनमें दस्त ावेजों के रजजस् रीकरण के बारे में तत् समय प्रवत्तृ ववधध के अनुसार उसका रजजस् रीकरण ककया जा चुका है : परन् तु यह भी कक कोई प्रथा या रूहढ़, जजसके द्वारा ककसी संववदा में अलभव् य‍ त रूप से वखणतष न होने वािी घटनाएं उस प्रकार की संववदाओं से प्राय: उपाबद्ध रहती हैं, साबबत की जा सकेगी : परन् तु यह भी कक ऐसी घटना को उपाबद्ध करना संववदा के अलभव् य‍ त ननबन्ध नों के ववरुद्ध या उनसे असंगत नहीं होगा : परन् तु यह भी कक कोई तथ्य , जो यह दलशतष करता है कक ककसी दस् तावेज की भार्ा ववद्यमान तथ् यों से ककस रीनत में संबंधधत है, साबबत ककया जा सकेगा । दृष् ‍ांत (क) बीमा की एक पालिसी उस माि के लिए जो “कोिकाता से ववशािापट्टनम जाने वािे पोतों में” की गई है । माि ककसी ववलशष्ट पोत से भेजा जाता है, जो पोत नष् ट हो जाता है । यह तथ् य कक वह ववलशष् ट पोत उस पालिसी स े मौखिक रूप स े अपवाहदत था, साबबत नहीं ककया जा सकता । (ि) ख को 1 माच,ष 2023 को एक हजार रुपए देन े का प‍ का लिखित करार क करता है । यह तथ् य कक उसी समय एक मौखिक करार हुआ था कक यह धन 31 माच,ष 2023 तक नहीं हदया जाएगा, साबबत नहीं ककया जा सकता । (ग) “रामपुर चाय सम् पदा” नामक एक सम् पदा ककसी ववििे द्वारा बेची जाती है, जजसमें ववक्रीत संपवत्त का मानधचत्र अन्त ववष्ष ट है । यह तथ् य कक मानधचत्र में न हदिाई गई भूलम सदैव सम् पदा का भागरूप मानी जाती रही थी और उस वविेि द्वारा उसका अन्त ररत होना अलभप्रेत था, साबबत नहीं ककया जा सकता । (घ) क कनतपय िानों को, जो ख की संपवत्त हैं, कनतपय ननबन्ध नों पर काम में िाने का ख से लिखित करार करता है । उनके मूल् य के बारे में ख के लमथ्या ननरूपणअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 513 द्वारा क ऐसा करने के लिए उत् प्रेररत हुआ था । यह तथ् य साबबत ककया जा सकेगा । (ङ) ख पर क ककसी संववदा के ववननहदषष् ट पािन के लिए वाद संजस् थत करता है और यह प्राथषना भी करता है कक संववदा का सुधार उसके एक उपबन् ध के बारे में ककया जाए ‍ योंकक वह उपबन्ध उसमें भूि स े अन् त:स् थावपत ककया गया था । क साबबत कर सकेगा कक ऐसी भूि की गई थी जजससे संववदा के सुधार करने का हक उसे ववधध द्वारा लमिता है । (च) क पत्र द्वारा ख का माि आदेलशत करता है जजसमें संदाय करने के समय के बारे में कुछ भी नहीं कहा गया है और पररदान पर माि को स्वीकार करता है । ख मूल् य के लिए क पर वाद िाता है । क दलशतष कर सकेगा कक माि ऐसी अवधध के लिए उधार पर हदया गया था जजसका अभी तक अवसान नहीं हुआ है । (छ) ख को क एक घो़िा बेचता है और मौखिक वारण्ट ी देता है कक वह अच् छा है । ख को क इन शब् दों को लििकर एक कागज देता है--“क से तीस हजार रुपए में एक घो़िा िरीदा” । ख मौखिक वारंटी साबबत कर सकेगा । (ज) ख का िॉज क भा़िे पर िेता है और एक काि ष देता है जजसमें लििा है, “कमरे, दस हजार रुपए प्रनतमास” । क यह मौखिक करार साबबत कर सकेगा कक इन ननबन् धनों के अन्त गतष भागत: भोजन भी था । ख का िॉज क एक वर् ष के लिए भा़िे पर िेता है और उनके बीच अधधव‍ता द्वारा तैयार ककया हुआ एक स्ट ाजम् पत करार ककया जाता है । वह करार भोजन देने के ववर्य में मौन है । क साबबत नहीं कर सकेगा कक मौखिक तौर पर उस ननबन्ध न के अन् तगतष भोजन देना भी था । (झ) ख से देय ऋण के लिए धन की रसीद भेज कर ऋण चुकाने का क आवेदन करता है । ख रसीद रि िेता है और धन नहीं भेजता । उस रकम के लिए वाद में क इसे साबबत कर सकेगा । (ञ) क और ख लिखित में संववदा करते हैं जो कनतपय अननजश् चत घटना के घहटत होने पर प्रभावशीि होनी है । वह िेि ख के पास छो़ि हदया जाता है जो उसके आधार पर क पर वाद िाता है । क उन पररजस् थनतयों को दलशतष कर सकेगा जजनके अधीन वह पररदत्त ककया गया था । 96. जब ककसी दस्त ावेज में प्रयु‍ त भार्ा देिते ही संहदग् ध या त्रुहटपूण ष है, तब उन संहदग्ध दस् तावेज को तथ् यों का साक्ष् य नहीं हदया जा सकेगा, जो उनका अथ ष दलशषत कर दे या उसकी त्रुहटयों की स् पष् ट करने या पूनत ष कर दे । उसका संशोधन दृष् ‍ांत करने के साक्ष्य का अपवजनष । (क) ख को क “एक िाि रुपए या एक िाि पचास हजार रुपए” में एक घो़िा बेचन े का लिखित करार करता है । यह दलशतष करने के लिए कक कौन सा मूल् य हदया जाना था साक्ष् य नहीं हदया जा सकता । (ि) ककसी वविेि में रर‍ त स्थ ान है । उन तथ् यों का साक्ष्य नहीं हदया जा सकता जो यह दलशतष करते हों कक उनकी ककस प्रकार पूनत ष अलभप्रेत थी । 97. जब दस् तावेज में प्रयु‍ त भार्ा स् वयं स् पष् ट हो और जब वह ववद्यमान तथ् यों ववद्यमान तथ् यों को दस् तावेज के को ठीक-ठीक िागू होती हो, तब यह दलशतष करने के लिए साक्ष् य नहीं हदया जा सकेगा िागू होने के कक वह ऐसे तथ् यों को िागू होने के लिए अलभप्रेत नहीं थी । ववरुद्ध साक्ष् य दृष् ‍ांत का अपवजनष । ख को क “रामपुर में एक सौ बीघे वािी मेरी सम् पदा” वविेि द्वारा बेचता है । क514 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— के पास रामपुर में एक सौ बीघे वािी एक सम् पदा है । इस तथ् य का साक्ष् य नहीं हदया जा सकेगा कक ववक्रय ककए जाने के लिए अलभप्रेत सम्प दा ककसी लभन्न स् थान पर जस् थत थी और लभन्न माप की थी । ववद्यमान तथ् यों 98. जब दस् तावेज में प्रयु‍ त भार्ा स् वयं स् पष्ट हो, ककंतु ववद्यमान तथ् यों के संदभ ष के संदभ ष में में अथहष ीन हो, तो यह दलशतष करने के लिए साक्ष् य हदया जा सकेगा कक वह एक ववलशष्ट अथहष ीन भाव में प्रयु‍ त की गई थी । दस् तावेज के बारे में साक्ष्य । दृष् ‍ांत क, वविेि द्वारा ख को “मेरा कोिकाता का घर” बेचता है । क का कोिकाता में कोई घर नहीं था ककन् तु यह प्रतीत होता है कक हाव़िा में उसका एक घर था जो वविेि के ननष् पादन के समय से ख के कब् जे में था । इन तथ् यों को यह दलशतष करने के लिए साबबत ककया जा सकेगा कक वविेि का संबंध हाव़िा के घर से था । उस भार्ा के िागू 99. जब तथ् य ऐसे हैं कक प्रयु‍ त भार्ा कई व् यज‍ तयों या चीजों में से ककसी एक होने के बारे में को िाग ू होने के लिए अलभप्रते हो सकती थी, और एक स े अधधक को िागू होने के लिए साक्ष्य , जो कई अलभप्रेत नहीं हो सकती थी, तब उन तथ् यों का साक्ष् य हदया जा सकेगा, जो यह दलशतष व् यज‍ तयों में स े केवि एक को िागू करते हैं कक उन व् यज‍ तयों या चीजों में से ककस को िागू होने के लिए वह आशनयत थी। हो सकती है । दृष् ‍ांत (क) क एक हजार रुपए में “मेरा सफेद घो़िा” ख को बेचने का करार करता है । क के पास दो सफेद घो़िे हैं । उन तथ् यों का साक्ष् य हदया जा सकेगा जो यह दलशतष करते हों कक उनमें से कौन सा घो़िा अलभप्रेत था । (ि) ख के साथ क रामगढ़ जाने के लिए करार करता है । यह दलशतष करने वाि े तथ् यों का साक्ष् य हदया जा सकेगा कक राजस्थान का रामगढ़ अलभप्रेत था या उत्तरािंि का रामगढ़ । तथ् यों के दो 100. जब प्रयु‍ त भार्ा भागत: ववद्यमान तथ् यों के एक संवग ष को और भागत: संवगों में स े ववद्यमान तथ् यों के अन्य संवग ष को िागू होती है, ककन् त ु वह पूरी की पूरी दोनों में से जजनमें से ककसी ककसी एक को भी ठीक-ठीक िागू नहीं होती, तब यह दलशतष करने के लिए साक्ष् य हदया एक को भी वह भार्ा पूरी की जा सकेगा कक वह दोनों में स े ककस को िाग ू होने के लिए अलभप्रेत थी । पूरी ठीक-ठीक दृष् ‍ांत िागू नहीं होती, उसमें स े एक को ख को “भ में जस् थत म के अधधभोग में मेरी भूलम” बेचने का क करार करता है । भार्ा के िाग ू क के पास भ में जस् थत भूलम है, ककन् त ु वह म के कब् ज े में नहीं है और उसके पास म के होने के बारे में कब् जे वािी भूलम है, ककन् तु वह भ में जस् थत नहीं है । यह दलशतष करने वािे तथ् यों का साक्ष्य । साक्ष् य हदया जा सकेगा कक उसका अलभप्राय कौन सी भूलम बेचने का था । अपठनीय लिवप, 101. ऐसी लिवप, जो अपठनीय या सामान्य त: बोधगम्य न हो, ववदेशी, अप्रचलित, आहद के अथ ष के तकनीकी, स् थाननक और िेत्रीय शब् द प्रयोगों का, संिेपािरों का और ववलशष् ट भाव में बारे में साक्ष्य । प्रयु‍ त शब् दों का अथ ष दलशतष करने के लिए साक्ष् य हदया जा सकेगा । दृष् ‍ांत एक मूनतकष ार, क “अपनी सभी प्रनतमाएं” ख को बेचने का करार करता है । क के पास मॉिि और प्रनतमा बनाने के औजार भी हैं । यह दलशतष कराने के लिए कक वह ककस े बेचने का अलभप्राय रिता था, साक्ष् य हदया जा सकेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 515 102. वे व् यज‍ त, जो ककसी दस् तावेज के पिकार या उनके हहत प्रनतननधध नहीं हैं, दस् तावेज के ननबन्ध नों में ऐसे ककन्ह ीं भी तथ् यों का साक्ष् य दे सकेंगे, जो दस् तावेज के ननबन् धनों में फेर-फार करने फेर-फार करने वािे ककसी समकािीन करार को दलशतष करने की प्रववृत्त रिते हैं । वािे करार का दृष् ‍ांत साक्ष्य कौन दे सकेगा । क और ख लिखित संववदा करते हैं कक क को कुछ कपास ख बेचेगा जजसके लिए कपास के पररदान ककए जाने पर संदाय ककया जाएगा । उसी समय वे एक मौखिक करार करते हैं कक क को तीन मास का प्रत्य य हदया जाएगा । क और ख के बीच यह तथ् य दलशतष नहीं ककया जा सकता था ककन् तु यहद यह ग के हहत पर प्रभाव िािता है, तो यह ग द्वारा दलशतष ककया जा सकेगा । 103. इस अध् याय की कोई भी बात, वसीयत का अथ ष िगाने के बारे में भारतीय भारतीय उत्तराधधकार 1925 का 39 उत्तराधधकार अधधननयम, 1925 के ककन्ह ीं भी उपबन्ध ों पर प्रभाव िािने वािी नहीं समझी अधधननयम के जाएगी । वसीयत सम् बन् धी उपबन् धों की व् याववृत्त । भाग 4 साक्ष्य का प्रस्तुत ककया जािा और उसका प्रभाि अध् याय 7 सबूत के भार के विषय में 104. जो कोई, न्य ायािय स े यह चाहता है कक वह ऐसे ककसी ववधधक अधधकार या सबूत का भार । दानयत् व के बारे में ननणयष दे, जो उन तथ्य ों के अजस् तत् व पर ननभरष है, जजन्ह ें वह दृढ़कथन करता है, तो उस े साबबत करना होगा कक उन तथ् यों का अजस् तत् व है और जब कोई व् यज‍ त ककसी तथ् य का अजस् तत् व साबबत करने के लिए आबद्ध है, तब यह कहा जाता है कक उस व् यज‍ त पर सबूत का भार है । दृष् ‍ांत (क) क न्य ायािय से चाहता है कक वह ख को उस अपराध के लिए दजण्ि त करन े का ननणषय दे जजसके बारे में क कहता है कक वह ख ने ककया है । क को यह साबबत करना होगा कक ख ने वह अपराध ककया है । (ि) क न्य ायािय स े चाहता है कक न्य ायािय उन तथ् यों के कारण जजनके सत् य होने का वह दृढ़कथन करता है और ख इंकार करता है, यह ननणषय दे कक वह ख के कब् जे में की अमुक भूलम का हकदार है । क को उन तथ् यों का अजस् तत्व साबबत करना होगा । 105. ककसी वाद या कायवष ाही में सबूत का भार उस व् यज‍ त पर होता है जो सबूत का भार ककस पर होता असफि हो जाएगा, यहद दोनों में से ककसी भी ओर स े कोई भी साक्ष् य न हदया जाए । है । दृष् ‍ांत (क) ख पर उस भूलम के लिए क वाद िाता है जो ख के कब् जे में है और जजसके बारे में क दृढ़कथन करता है कक वह ख के वपता ग को वसीयत द्वारा क के लिए दी गई थी । यहद ककसी भी ओर से कोई साक्ष् य नहीं हदया जाए, तो ख इसका हकदार होगा कक वह अपना कब् जा रिे रहे । अत: सबूत का भार क पर है । (ि) ख पर एक बन्ध पत्र पर देय धन के लिए क वाद िाता है । उस बन्ध पत्र का ननष् पादन स् वीकृत है ककन् तु ख कहता है कक वह कपट द्वारा अलभप्राप् त ककया गया था, जजस बात का क इंकार करता है । यहद दोनों में स े ककसी भी ओर से कोई साक्ष् य नही ं516 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— हदया जाए, तो क सफि होगा ‍ योंकक बन्ध पत्र वववादग्रस् त नहीं है और कपट साबबत नहीं ककया गया । अत: सबूत का भार ख पर है । ववलशष् ट तथ् य के 106. ककसी ववलशष् ट तथ् य के सबूत का भार उस व् यज‍ त पर होता है जो न्य ायािय बारे में सबतू का से यह कहता है कक उसके अजस् तत् व में ववश् वास करे, जब तक कक ककसी ववधध द्वारा यह भार । उपबजन्ध त न हो कक उस तथ् य के सबूत का भार ककसी ववलशष् ट व् यज‍ त पर होगा । दृष् ‍ांत ख को क चोरी के लिए अलभयोजन करता है और न्य ायािय से चाहता है कक न्य ायािय यह ववश् वास करे कक ख ने चोरी की स्व ीकृनत ग से की । क को यह स् वीकृनत साबबत करनी होगी । ख न्य ायािय से चाहता है कक वह यह ववश् वास करे कक प्रश् नगत समय पर वह अन्य त्र था । उसे यह बात साबबत करनी होगी । साक्ष्य को ग्राह्य 107. ऐस े तथ् य को साबबत करने का भार जजसका साबबत ककया जाना ककसी बनाने के लिए व् यज‍ त को ककसी अन्य तथ् य का साक्ष् य देने को समथ ष करने के लिए आवश् यक है, उस साबबत ककए व् यज‍ त पर है जो ऐसा साक्ष् य देना चाहता है । जाने वािे तथ्य को साबबत करने दृष् ‍ांत का भार । (क) ख द्वारा ककए गए मत्ृ युकालिक कथन को क साबबत करना चाहता है । क को ख की मत्ृ यु साबबत करनी होगी । (ि) क ककसी िोए हुए दस् तावेज की अन्त वस्ष तु को द्ववतीयक साक्ष् य द्वारा साबबत करना चाहता है । क को यह साबबत करना होगा कक दस् तावेज िो गया है । यह साबबत करने 108. जब कोई व् यज‍ त ककसी अपराध का अलभयु‍ त है, तब उन पररजस् थनतयों के का भार कक अजस् तत् व को साबबत करने का भार, जो उस मामिे को भारतीय न्याय संहहता, 2023 के 2023 का 45 अलभयु‍ त का साधारण अपवादों में से ककसी के अन्त गतष या उ‍त संहहता के ककसी अन्य भाग में, या मामिा अपवादों के अन् तगतष उस अपराध की पररभार्ा करने वािी ककसी ववधध में, अन्त ववष्ष ट ककसी ववशेर् अपवाद या आता है। परन् तुक के अन् तगतष कर देती है, उस व् यज‍ त पर है और न् यायािय ऐसी पररजस् थनतयों के अभाव की उपधारणा करेगा । दृष् ‍ांत (क) हत् या का अलभयु‍ त क, यह अलभकथन करता है कक वह धचत्त-ववकृनत के कारण उस काय ष की प्रकृनत को नहीं जानता था । सबूत का भार क पर है । (ि) हत् या का अलभयु‍ त क, यह अलभकथन करता है कक वह गम् भीर और अचानक प्रकोपन के कारण आत् मननयंत्रण की शज‍ त से वंधचत हो गया था । सबूत का भार क पर है । (ग) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 117 उपबन्ध करती है कक जो कोई, 2023 का 45 उस दशा के लसवाय, जजसके लिए धारा 122 की उपधारा (2) में उपबंध है, स् वेच् छया घोर उपहनत करेगा, वह अमुक दण् िों से दण्ि नीय होगा । धारा 117 के अधीन क पर स् वेच् छया घोर उपहनत काररत करने का आरोप है । इस मामिे को धारा 122 की उपधारा (2) के अधीन िाने वािी पररजस् थनतयों को साबबत करने का भार क पर है । ववशेर्त: ज्ञात 109. जब कोई तथ् य ववशेर्त: ककसी व् यज‍ त को ज्ञात है, तब उस तथ् य को साबबत तथ् य को साबबत करने का भार उस पर है । करने का भार । दृष् ‍ांत (क) जब कोई व् यज‍ त ककसी काय ष को उस आशय से लभन्न ककसी आशय से करताअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 517 है, जजसे उस काय ष का स् वरूप और पररजस् थनतयां इंधगत करती हैं, तब उस आशय को साबबत करने का भार उस पर है । (ि) ख पर रेि से बबना हटकट यात्रा करने का आरोप है । यह साबबत करने का भार कक उसके पास हटकट था उस पर है । 110. जब प्रश् न यह है कक कोई मनुष् य जीववत है या मर गया है, और यह दलशतष उस व् यज‍त की मत्ृ यु साबबत ककया गया है कक वह तीस वर् ष के भीतर जीववत था, तब यह साबबत करने का भार कक करने का भार वह मर गया है उस व् यज‍ त पर है, जो उसे अलभपुष्ट करता है । जजसका तीस वर् ष के भीतर जीववत होना ज्ञात है । 111. जब प्रश् न यह है कक कोई मनुष् य जीववत है या मर गया है, और यह साबबत यह साबबत करने का भार ककया गया है कक उसके बारे में सात वर् ष से उन्ह ोंने कुछ नहीं सुना है, जजन्ह ोंने उसके बारे कक वह व् यज‍ त, में यहद वह जीववत होता तो स्वभावतः सुना होता, तब यह साबबत करने का भार कक वह जजसके बारे में जीववत है उस व् यज‍ त पर चिा जाता है, जो उस े अलभपुष्ट करता है । सात वर् ष स े कुछ सुना नहीं गया है, जीववत है । 112. जब प्रश् न यह है कक ‍ या कोई व् यज‍ त भागीदार, भू-स् वामी और ककराएदार या भागीदारों, भू- स् वामी और मालिक और अलभकता ष है, तथा यह दलशतष कर हदया गया है कक व े इस रूप में काय ष करत े ककराएदार, रहे हैं, तब यह साबबत करने का भार कक क्रमश: इन सम्ब न्ध ों में व े परस् पर अवजस्थत मालिक और नहीं हैं या अवजस्थत नहीं रह गए हैं, उस व् यज‍ त पर है, जो उसे अलभपुष्ट करता है । अलभकताष के मामिों में सबतू का भार । 113. जब प्रश् न यह है कक ‍ या कोई व् यज‍ त ऐसी ककसी चीज का स् वामी है जजस स् वालमत् व के बारे में सबूत पर उसका कब् जा होना दलशतष ककया गया है, तब यह साबबत करने का भार कक वह का भार । स् वामी नहीं है, उस व् यज‍ त पर है, जो अलभपुष्ट करता है कक वह स् वामी नहीं है । 114. जहां उन पिकारों के बीच के संव् यवहार के सद्भ ाव के बारे में प्रश् न है, उन संव् यवहारों में सद् भाव का जजनमें वे एक-दसू रे के प्रनत सकक्रय ववश् वास की जस् थनत में हैं, वहा ं उस संव् यवहार के साबबत ककया सद्भ ाव को साबबत करने का भार उस पिकार पर है जो सकक्रय ववश् वास की जस् थनत में जाना जहां एक है । पिकार का संबंध सकक्रय दृष् ‍ांत ववश् वास का (क) मुवज‍कि द्वारा अधधव‍ता के पि में ककए गए ववक्रय का सद् भाव मुवज‍कि है । द्वारा िाए गए वाद में प्रश्न गत है । संव् यवहार का सद् भाव साबबत करने का भार अधधव‍ता पर है । (ि) पुत्र द्वारा, जो कक हाि ही में वयस्क हुआ है, वपता को ककए गए ककसी ववक्रय का सद् भाव पुत्र द्वारा िाए गए वाद में प्रश् नगत है । संव्य वहार के सद् भाव को साबबत करने का भार वपता पर है । 115. (1) जहां कोई व् यज‍ त, उपधारा (2) में ववननहदषष् ट ऐस े ककसी अपराध के ककए कनतपय जाने का अलभयु‍ त है,— अपराधों के बारे में उपधारणा । (क) ऐसे ककसी िेत्र में, जजस े उपरव को दबाने के लिए और िोक व् यवस् था की बहािी और उस े बनाए रिने के लिए उपबंध करने वािी तत् समय प्रवत्तृ ककसी अधधननयलमनत के अधीन वविुब् ध िेत्र घोवर्त ककया गया है; या518 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (ि) ऐस े ककसी िेत्र में, जजसमें एक मास स े अधधक की अवधध के लिए िोक शांनत में व् यापक ववघ् न रहा है, और यह दलशतष ककया जाता है कक ऐसा व् यज‍ त ऐस े िेत्र में ककसी स् थान पर ऐस े समय पर था जब ऐसे ककसी सशस् त्र बि या बिों के, जजन्ह ें िोक व् यवस् था बनाए रिने का भार सौंपा गया है, ऐसे सदस्य ों पर जो अपने कतव्ष यों का ननवहष न कर रहे हैं, आक्रमण करने के लिए या उनका प्रनतरोध करने के लिए उस स् थान पर या उस स् थान से अग् न्य ायुधों या ववस् फोटकों का प्रयोग ककया गया था, वहां जब तक प्रनतकूि दलशतष नहीं ककया जाता है यह उपधारणा की जाएगी कक ऐसे व् यज‍ त ने ऐसा अपराध ककया है । (2) उपधारा (1) में ननहदषष् ट अपराध ननम् नलिखित हैं, अथाषत ् :— (क) भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 147, धारा 148, धारा 149 या 2023 का 45 धारा 150 के अधीन कोई अपराध ; (ि) आपराधधक र्ड्यंत्र या भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 149 या 2023 का 45 धारा 150 के अधीन कोई अपराध करने का प्रयत् न या उसका दष्ु प्ररे ण । वववाहहत जस् थनत 116. यह तथ् य कक ककसी व् यज‍ त का जन्म उसकी माता और ककसी पुरुर् के बीच के दौरान जन् म ववधधमान्य वववाह के कायम रहते हुए, या उसका ववघटन होने के पश्चात ् माता के होना धमजष त् व अवववाहहत रहते हुए दो सौ अस् सी हदन के भीतर हुआ था, इस बात का ननश् चायक सबूत का ननश् चायक सबूत है । होगा कक वह उस पुरुर् का धमजष लशशु है, जब तक यह दलशतष न ककया जा सके कक वववाह के पिकारों की परस् पर पहुंच ऐसे ककसी समय नहीं थी कक जब उसका गभाषधान ककया जा सकता था । ककसी वववाहहत 117. जब प्रश् न यह है कक ककसी महहिा द्वारा आत् महत् या करना उसके पनत या महहिा द्वारा उसके पनत के ककसी नातेदार द्वारा दष्ु प्रेररत ककया गया है और यह दलशतष ककया गया है आत् महत् या के कक उसने अपने वववाह की तारीि स े सात वर् ष की अवधध के भीतर आत् महत् या की थी दष्ु प्रेरण के बारे में उपधारणा । और यह कक उसके पनत या उसके पनत के ऐसे नातेदार ने उसके प्रनत क्रूरता की थी, तो न्य ायािय मामिे की सभी अन्य पररजस् थनतयों को ध् यान में रिते हुए यह उपधारणा कर सकेगा कक ऐसी आत् महत् या उसके पनत या उसके पनत के ऐसे नातेदार द्वारा दष्ु प्रेररत की गई थी । स् पष् ‍ीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “क्रूरता” का वही अथ ष है, जो भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 86 में उसका है । 2023 का 45 दहेज मत्ृ य ु के 118. जब प्रश् न यह है कक ‍या ककसी व् यज‍ त ने ककसी महहिा की दहेज मत्ृ यु बारे में काररत की है और यह दलशतष ककया जाता है कक मत्ृ यु के तुरन्त पहि े ऐसे व् यज‍ त ने उपधारणा । दहेज की ककसी मांग के लिए, या उसके संबंध में उस महहिा के साथ क्रूरता की थी या उसको तंग ककया था तो न्य ायािय यह उपधारणा करेगा कक ऐसे व् यज‍ त ने दहेज मत्ृ यु काररत की थी । स् पष् ‍ीकरण—इस धारा के प्रयोजनों के लिए, “दहेज मत्ृ य”ु का वही अथ ष है जो भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 80 में उसका है । 2023 का 45 न् यायािय 119. (1) न्य ायािय ऐसे ककसी तथ् य का अजस् तत् व उपधाररत कर सकेगा जजसका कनतपय तथ् यों घहटत होना उस ववलशष् ट मामिे के तथ् यों के संबंध में प्राकृनतक घटनाओं, मानवीय का अजस् तत् व आचरण तथा िोक और प्राइवेट कारबार के साधारण अनुक्रम को ध् यान में रिते हुए वह उपधाररत कर सकेगा । सम् भाव् य समझता है ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 519 दृष् ‍ांत न्य ायािय उपधाररत कर सकेगा कक— (क) चुराए हुए माि पर, जजस मनुष् य का चोरी के शीघ्र उपरान्त कब् जा है, जब तक कक वह अपने कब् जे का कारण न बता सके, या तो वह चोर है या उसने माि को चुराया हुआ जानते हुए प्राप् त ककया है ; (ि) सह-अपराधी ववश् वसनीयता के अयोग् य है, जब तक ताजववक ववलशजष् टयों में उसकी सम्प ुजष् ट नहीं होती ; (ग) कोई स्वीकृत या पष्ृ ठांककत ववननमयपत्र समुधचत प्रनतफि के लिए स्वीकृत या पष्ृ ठांककत ककया गया था ; (घ) ऐसी कोई चीज या चीजों की दशा अब भी अजस् तत् व में है, जजसका उतनी कािावधध से जजतनी में ऐसी चीजें या चीजों की दशाएं प्राय: ववद्यमान नहीं रह जाती हैं, िघुतर कािावधध में अजस् तत् व में होना दलशतष ककया गया है ; (ङ) न्य ानयक और पदीय काय ष ननयलमत रूप से संपाहदत ककए गए हैं ; (च) ववलशष् ट मामिों में कारबार के साधारण अनुक्रम का अनुसरण ककया गया है ; (छ) यहद वह साक्ष् य जो प्रस्तुत ककया जा सकता था और प्रस्तुत नहीं ककया गया है, प्रस्तुत ककया जाता, तो उस व् यज‍ त के प्रनतकूि होता, जजसने उस े रोक रिा है ; (ज) यहद कोई मनुष् य ऐस े ककसी प्रश् न का उत्तर देने स े इंकार करता है, जजसका उत्तर देने के लिए वह ववधध द्वारा वववश नहीं है, तो उत्तर, यहद वह हदया जाता, उसके प्रनतकूि होता ; (झ) जब ककसी बाध् यता का सजृ न करने वािा दस् तावेज बाध् यताधारी के हाथ में है, तब उस बाध् यता का उन्म ोचन हो चुका है । (2) न्य ायािय यह ववचार करने में कक ‍या ऐस े सूत्र उसके समि के ववलशष्ट मामिे को िागू होते हैं या नहीं, ननम् नलिखित प्रकार के तथ् यों का भी ध् यान रिेगा,— (i) दृष् ‍ांत (क) के बारे में — ककसी दकु ानदार के पास उसके गल् ि े में कोई धचजह्नत रुपया उसके चुराए जाने के शीघ्र पश् चात ् है, और वह उसके कब् ज े का कारण ववननहदषष् टत: नहीं बता सकता, ककन् तु अपने कारबार के अनुक्रम में वह रुपया िगातार प्राप् त कर रहा है; (ii) दृष् ‍ांत (ि) के बारे में — एक अत् यन् त ऊंचे शीि का व् यज‍ त, क ककसी मशीनरी को ठीक-ठीक िगान े में ककसी उपेिापूवकष काय ष द्वारा ककसी व् यज‍ त की मत्ृ यु काररत करने के लिए ववचाररत है । वैसा ही अच् छे शीि का व् यज‍ त ख, जजसने मशीनरी िगाने के उस काम में भाग लिया था, ब् यौरेवार वणनष करता है कक ‍ या-‍ या ककया गया था, और क की और स् वयं अपनी असावधानी स् वीकृत और स् पष् ट करता है; (iii) दृष् ‍ांत (ि) के बारे में — कोई अपराध कई व् यज‍ तयों द्वारा ककया जाता है । अपराधधयों में से तीन क, ख और ग घटनास् थि पर पक़िे जाते हैं और एक- दसू रे से अिग रिे जाते हैं । अपराध का वववरण उनमें स े प्रत्येक ऐसा देता है जो घ को फंसाता है और ये वववरण एक-दसू रे को ककसी ऐसी रीनत में सम् पुष्ट करते हैं, जजससे उनमें यह अनत अनधधसम् भाव् य हो जाता है कक उन्ह ोंने इसके पूव ष लमिकर520 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— कोई योजना बनाई थी ; (iv) दृष् ‍ांत (ग) के बारे में — ककसी ववननमयपत्र का ििे ीवाि, क व् यापारी था । प्रनतग्रहीता ख पूणतष : क के असर के अधीन एक युवक और नासमझ व् यज‍ त था; (v) दृष् ‍ांत (घ) के बारे में — यह साबबत ककया गया है कक कोई नदी अमुक माग ष में पांच वर् ष पूव ष बहती थी, ककन् त ु यह ज्ञात है कक उस समय से ऐसी बाढ़ें आई हैं जो उसके माग ष को पररवनततष कर सकती थीं; (vi) दृष् ‍ांत (ङ) के बारे में — कोई न् यानयक काय,ष जजसकी ननयलमतता प्रश् नगत है, असाधारण पररजस् थनतयों में ककया गया था; (vii) दृष् ‍ांत (च) के बारे में — प्रश् न यह है कक ‍ या कोई पत्र प्राप् त हुआ था । उसका िाक में िािा जाना दलशतष ककया गया है, ककन् त ु िाक के सामान्य अनुक्रम में उपरवों के कारण ववघ् न प़िा था; (viii) दृष् ‍ांत (छ) के बारे में — कोई मनुष् य ककसी ऐस े दस् तावेज को प्रस्तुत करने से इंकार करता है जजसका असर ककसी अल् प महत् व की ऐसी संववदा पर प़िता है, जजसके आधार पर उसके ववरुद्ध वाद िाया गया है, ककन् तु जो उसके कुटुम् ब की भावनाओं और ख् यानत को भी िनत पहुंचा सकती है; (ix) दृष् ‍ांत (ज) के बारे में — कोई मनुष् य ककसी प्रश् न का उत्तर देने से इंकार करता है जजसका उत्तर देने के लिए वह ववधध द्वारा वववश नहीं है, ककन् तु उसका उत्तर उसे उस ववर्य स े असंबंधधत ववर्यों में हानन पहुंचा सकता है, जजसके संबंध में वह पूछा गया है; (x) दृष् ‍ांत (झ) के बारे में - कोई बन्ध पत्र बाध् यताधारी के कब् जे में है, ककन् त ु मामिे की पररजस् थनतयां ऐसी हैं कक हो सकता है कक उसने उसे चुराया हो । बिात् संग के लिए 120. भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64 की उपधारा (2) के अधीन 2023 का 45 कनतपय बिात् संग के लिए ककसी अलभयोजन में, जहां अलभयु‍ त द्वारा मैथुन ककया जाना साबबत अलभयोजन में हो जाता है और प्रश् न यह है कक ‍ या वह उस महहिा की, जजसके बारे में यह अलभकथन सम् मनत के न होने की ककया गया है कक उससे बिात्स ंग ककया गया है, सम् मनत के बबना ककया गया था और उपधारणा । ऐसी महहिा न्य ायािय के समि अपने साक्ष् य में यह कथन करती है कक उसने सम् मनत नहीं दी थी, वहां न्य ायािय यह उपधारणा करेगा कक उसने सम् मनत नहीं दी थी । स् पष् ‍ीकरण—इस धारा में, “मैथुन” से भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 63 2023 का 45 में वखणतष कोई काय ष अलभप्रेत होगा । अध् याय 8 विबन्ि ववबंध । 121. जब एक व् यज‍ त ने अपनी घोर्णा, काय ष या िोप द्वारा अन्य व् यज‍ त को ववश् वास साशय कराया है या कर िेने हदया है कक कोई बात सत् य है और ऐसे ववश् वास पर काय ष कराया या करने हदया है, तब न तो उसे और न उसके प्रनतननधध को अपने और ऐसे व् यज‍ त के, या उसके प्रनतननधध के बीच ककसी वाद या कायवष ाही में उस वाद की सत् यता को इंकार करने हदया जाएगा । दृष् ‍ांत क साशय और लमथ् या रूप से ख को यह ववश् वास करने के लिए प्रेररत करता है कक अमुक भूलम क की है, और उसके द्वारा ख को उसे क्रय करने और उसका मूल् य चुकानेअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 521 के लिए उत् प्रेररत करता है । तत् पश् चात ् भूलम क की संपवत्त हो जाती है, और क इस आधार पर कक ववक्रय के समय उसका उसमें हक नहीं था ववक्रय अपास् त करने की वांछा करता है । उसे अपने हक का अभाव साबबत नहीं करने हदया जाएगा । 122. अचि संपवत्त के ककसी भी ककराएदार को या ऐस े ककराएदार स े व् युत् पन्न ककराएदार का और कब् जाधारी अधधकार से दावा करने वािे व् यज‍ त को, ऐसी ककराएदारी के चािू रहते हुए या उसके व् यज‍ त के पश्चात ् ककसी भी समय, इसका इंकार नहीं करने हदया जाएगा कक ऐसे ककराएदार के भ-ू अनुज्ञजप्त धारी का स् वामी का ऐसी अचि संपवत्त पर, उस ककराएदारी के आरम् भ पर हक था तथा ककसी भी ववबन् ध । व् यज‍ त को, जो ककसी अचि संपवत्त पर उस पर कब् जाधारी व् यज‍ त की अनुज्ञजप् त द्वारा आया है, इसका इंकार नहीं करने हदया जाएगा कक ऐसे व् यज‍ त को उस समय, जब ऐसी अनुज्ञजप् त दी गई थी, ऐसे कब् जे का हक था । 123. ककसी ववननमय-पत्र के प्रनतग्रहीता को इसका इंकार करने की अनुमनत नहीं दी ववननमय-पत्र के प्रनतग्रहीता, जाएगी कक िेिीवाि को ऐसा ववननमयपत्र लििने या उस े पष्ृ ठांककत करने का प्राधधकार उपननहहती या था, और न ककसी उपननहहती या अनुज्ञजप् तधारी को इसका इंकार करने हदया जाएगा कक अनुज्ञजप्त धारी का उपननधाता या अनुज्ञापक को उस समय, जब ऐसा उपननधान या अनुज्ञजप् त आरम् भ हुई, ववबन् ध । ऐसे उपननधान करने या अनुज्ञजप् त अनुदान करने का प्राधधकार था । स् पष् ‍ीकरण 1—ककसी ववननमयपत्र का प्रनतग्रहीता इसका इंकार कर सकेगा कक ववननमयपत्र वास् तव में उस व्य ज‍ त द्वारा लििा गया था जजसके द्वारा लििा गया वह तात् पनयषत है । स् पष् ‍ीकरण 2—यहद कोई उपननहहती, उपननहहत माि, उपननधाता से अन् य ककसी व् यज‍ त को पररदत्त करता है, तो वह साबबत कर सकेगा कक ऐसे व् यज‍ त का उस पर उपननधाता के ववरुद्ध अधधकार था । अध् याय 9 साक्षक्षयों के विषय में 124. सभी व् यज‍ त साक्ष् य देने के लिए सिम होंगे, जब तक कक न्य ायािय का यह कौन साक्ष्य दे सकेगा । ववचार न हो कक अल्पवयस्क, अत्यधधक वद्ृ धावस्था, शरीर के या मन के रोग या इसी प्रकार के ककसी अन्य कारण से वे उनसे ककए गए प्रश् नों को समझने से या उन प्रश् नों के युज‍ तसंगत उत्तर देने से ननवाररत हैं । स् पष् ‍ीकरण—कोई ववकृतधचत्त व् यज‍ त साक्ष् य देने के लिए अिम नहीं है, जब तक वह अपनी धचत्त-ववकृनत के कारण उससे ककए गए प्रश् नों को समझने स े या उनके युज‍ तसंगत उत्तर देने से ननवाररत न हो । 125. ऐसा कोई सािी, जो बोिने में असमथ ष है, ऐसी ककसी अन्य रीनत में, जजसमें सािी का मौखिक रूप स े वह उसे बोधगम् य बना सकता है जैस े कक लििकर या संकेत धचह्नों द्वारा, अपना साक्ष्य संसूधचत करने दे सकेगा; ककंतु ऐसा िेिन और संकेत धचह्न िुिे न् यायािय में लििे और ककए जान े में असमथ ष चाहहए तथा इस प्रकार हदया गया साक्ष् य मौखिक साक्ष् य माना जाएगा : होना । परंतु यहद सािी मौखिक रूप से संसूधचत करने में असमथ ष है तो न् यायािय कथन अलभलिखित करने में ककसी द्ववभावर्ए या ववशेर् लशिक की सहायता िेगा, और ऐस े कथन की वीडियो कफल् म तैयार की जाएगी । 126. (1) सभी लसववि कायवष ाहहयों में वाद के पिकार और वाद के ककसी पिकार कनतपय मामिों में पनत और का पनत या पत्नी सिम सािी होंगे । पत्नी की सािी (2) ककसी व्यज‍त के ववरुद्ध दांडिक कायवष ाहहयों में, ऐस े व्यज‍त का क्रमश: पनत के रूप में या पत्नी सिम सािी होगा । सिमता ।522 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— न् यायाधीश और 127. कोई भी न्य ायाधीश या मजजस् रेट, न्य ायािय में ऐस े न्य ायाधीश या मजजस् रेट मजजस् रेट । के नाते अपने स् वयं के आचरण के बारे में, या ऐसी ककसी बात के बारे में, जजसका ज्ञान उसे ऐसे न्य ायाधीश या मजजस् रेट के नाते न्य ायािय में हुआ, ककन् हीं प्रश् नों का उत्तर देने के लिए ऐसे ककसी भी न्य ायािय के ववशेर् आदेश के लसवाय, जजसके वह अधीनस् थ है, वववश नहीं ककया जाएगा, ककन् तु अन् य बातों के बारे में, जो उसकी उपजस् थनत में उस समय घहटत हुई थीं, जब वह ऐसे काय ष कर रहा था उसकी परीिा की जा सकेगी । दृष् ‍ांत (क) सेशन न्य ायािय के समि अपने ववचारण में क कहता है कक मजजस् रेट ख द्वारा अलभसाक्ष् य अनुधचत रूप से लिया गया था । इसके बारे में प्रश् नों का उत्तर देने के लिए क को ककसी वररष् ठ न्य ायािय के ववशेर् आदेश के लसवाय, वववश नहीं ककया जा सकता । (ि) मजजस्र ेट ख के समि लमथ् या साक्ष् य देने का क सशे न न्य ायािय के समि अलभयु‍ त है । वररष् ठ न्य ायािय के ववशेर् आदेश के लसवाय, ख से यह नहीं पूछा जा सकता कक क ने ‍ या कहा था । (ग) क सेशन न्य ायािय के समि इसलिए अलभयु‍ त है कक उसने सेशन न् यायाधीश ख के समि ववचाररत होते समय ककसी पुलिस अधधकारी की हत् या करने का प्रयत् न ककया । ख की यह परीिा की जा सकेगी कक ‍ या घहटत हुआ था । वववाहहत जस् थनत 128. कोई भी व् यज‍ त, जो वववाहहत है या जो वववाहहत रह चुका है, ककसी संसूचना के दौरान की गई को, जो ककसी व् यज‍ त द्वारा, जजससे वह वववाहहत है या रह चुका है, वववाहहत जस् थनत के संसूचनाएं । दौरान में उस े दी गई थी, प्रकट करने के लिए वववश नहीं ककया जाएगा, और न ही उस े ककसी ऐसी संसूचना को प्रकट करने की अनुमनत दी जाएगी, जब तक वह व् यज‍ त, जजसने वह संसूचना दी है या उसका हहतप्रनतननधध सम् मत न हो, लसवाय उन वादों में, जो वववाहहत व् यज‍ तयों के बीच हों, या उन कायवष ाहहयों में, जजनमें एक वववाहहत व् यज‍ त दसू रे के ववरुद्ध ककए गए ककसी अपराध के लिए अलभयोजजत है । राज् य के 129. कोई भी व् यज‍ त राज् य के ककन्हीं भी कायकष िापों से संबंधधत अप्रकालशत कायकष िापों के शासकीय अलभिेिों से व् युत् पन् न कोई भी साक्ष् य देने के लिए अनुज्ञात नहीं ककया जाएगा, बारे में साक्ष्य । लसवाय संबद्ध ववभाग के प्रमिु अधधकारी की अनुमनत के, जो ऐसी अनुमनत देगा या उस े ववधाररत करेगा, जैसा करना वह ठीक समझे । शासकीय 130. कोई भी िोक अधधकारी उस े शासकीय ववश् वास में दी हुई संसूचनाओं को संसूचनाएं । प्रकट करने के लिए वववश नहीं ककया जाएगा, जब वह समझता है कक उस प्रकटन स े िोक हहत की हानन होगी । अपराधों के करने 131. कोई भी मजजस्र ेट या पुलिस अधधकारी यह कहने के लिए वववश नहीं ककया के बारे में जाएगा कक ककसी अपराध के ककए जाने के बारे में उसे कोई सूचना कब लमिी और ककसी सूचना । भी राजस् व अधधकारी को यह कहने के लिए वववश नहीं ककया जाएगा कक उस े िोक राजस् व के ववरुद्ध ककसी अपराध के ककए जाने के बारे में कोई सूचना कब लमिी । स् पष् ‍ीकरण—इस धारा में “राजस् व अधधकारी” से िोक राजस् व की ककसी शािा के कारबार में या उसके बारे में ननयोजजत अधधकारी अलभप्रेत है । ववृत्तक संसूचनाएं । 132. (1) कोई भी अधधव‍ता अपने मुवज‍कि की अलभव् य‍ त सम् मनत के लसवाय, ऐसी ककसी संसूचना को प्रकट करने के लिए, जो उसके ऐसे अधधव‍ता की हैलसयत में सेवा के अनुक्रम में और उसके प्रयोजन के लिए उसके मुवज‍कि द्वारा, या उसकी ओर से उसे दी गई है या ककसी दस् तावेज की, जजससे वह अपनी ववृत्तक सेवा के अनुक्रम मेंअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 523 और उसके प्रयोजन के लिए पररधचत हो गया है, अन्तवस्ष तु या दशा कधथत करने को या ककसी सिाह को, जो ऐसी सेवा के अनुक्रम में और उसके प्रयोजन के लिए उसने अपने मुवज‍कि को दी है, प्रकट करने के लिए ककसी भी समय अनुज्ञात नहीं ककया जाएगा : परन् तु इस धारा की कोई भी बात ननम् नलिखित बात को प्रकटीकरण से संरिण नहीं देगी— (क) ककसी भी अवैध प्रयोजन को अग्रसर करने में दी गई कोई भी ऐसी संसूचना ; (ि) ऐसा कोई भी तथ् य जो ककसी अधधव‍ता ने अपनी ऐसी हैलसयत में सेवा के अनुक्रम में अविोकन ककया हो, और जजससे दलशतष हो कक उसकी सेवा के प्रारम् भ के पश् चात ् कोई अपराध या कपट ककया गया है । (2) यह तववहीन है कक उपधारा (1) के परंतुक में ननहदषष्ट ऐसे अधधव‍ता का ध् यान ऐसे तथ् य के प्रनत उसके मुवज‍कि के द्वारा या उसकी ओर से आकवर्तष ककया गया था या नहीं । स् पष् ‍ीकरण—इस धारा में कधथत बाध् यता ववृत्तक सेवा के समाप्त हो जाने के पश्चात ् भी बनी रहती है । दृष् ‍ांत (क) मुवज‍कि क, अधधव‍ता ख से कहता है, “मनैं े कूटरचना की है और म ैं चाहता हूं कक आप मेरी प्रनतरिा करें” । यह संसूचना प्रकटन से संरक्षित है, ‍ योंकक ऐसे व् यज‍ त की प्रनतरिा करना आपराधधक प्रयोजन नहीं है, जजसका दोर्ी होना ज्ञात हो । (ि) मुवज‍कि क, अधधव‍ता ख से कहता है, “म ैं संपवत्त पर कब् जा कूटरधचत वविेि के उपयोग द्वारा अलभप्राप् त करना चाहता हूं और इस आधार पर वाद िाने की म ैं आपसे प्राथनष ा करता हूं” । यह संसूचना आपराधधक प्रयोजन को अग्रसर करने में की गई होने से प्रकटन से संरक्षित नहीं है । (ग) क पर गबन का आरोप िगाए जाने पर वह अपनी प्रनतरिा करने के लिए अधधव‍ता ख को रिता है । कायवष ाहहयों के अनुक्रम में ख देिता है कक क की िेिाबही में यह प्रववजष् ट की गई है कक क द्वारा उतनी रकम देनी है, जजतनी के बारे में अलभकधथत है कक उसका गबन ककया गया है, जो प्रववजष् ट उसकी ववृत्तक सेवा के आरम्भ के समय उस बही में नहीं थी । यह ख द्वारा अपनी सेवा के अनुक्रम में अविोककत ऐसा तथ् य होने के कारण, जजससे दलशतष होता है कक कपट उस कायवष ाही के प्रारम् भ होने के पश् चात ् ककया गया है, प्रकटन से संरक्षित नहीं है । (3) इस धारा के उपबंध अधधव‍ताओं के ननवषचनकताषओं और लिवपकों या कमचष ाररयों को िागू होंगे । 133. यहद ककसी वाद का कोई पिकार स् वप्रेरणा से ही या अन्य था उसमें साक्ष् य स्वेच्छया साक्ष्य देने से देता है तो यह नहीं समझा जाएगा कक उसने ऐसे प्रकटन के लिए, जैसा धारा 132 में ववशेर्ाधधकार वखणतष है, सम् मनत दे दी है, और यहद ककसी वाद या कायवष ाही का कोई पिकार ऐस े का अलभत् य‍ त ककसी अधधव‍ता को सािी के रूप में बुिाता है, तो यह कक उसने ऐस े प्रकटन के लिए नहीं होना । अपनी सम्म नत दे दी है, केवि तभी समझा जाएगा, जब वह ऐसे अधधव‍ता से उन बातों के बारे में प्रश् न करे, जजनके प्रकटन के लिए वह ऐसे प्रश् नों के अभाव में स्वतंत्र नही ं होता ।524 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— ववधध सिाहकारों 134. कोई भी व् यज‍ त ककसी गोपनीय संसूचना को, जो उसके और उसके ववधध से गोपनीय सिाहकार के बीच हुई है, न्य ायािय को प्रकट करने के लिए वववश नहीं ककया जाएगा, संसूचना । जब तक कक वह अपने को सािी के तौर पर प्रस्तुत न कर दे; ऐस े प्रस्तुत करने की दशा में ककन्ह ीं भी ऐसी संसूचनाओं को जो उसने दी हैं, जजन्ह ें उस ककसी साक्ष् य को स् पष्ट करने के लिए जानना, न्य ायािय को आवश् यक प्रतीत हो, प्रकट करने के लिए वववश ककया जा सकेगा ककन् तु ककन्ह ीं भी अन्य संसूचनाओं को नहीं । जो सािी 135. कोई भी सािी, जो वाद का पिकार नहीं है, ककसी सपं वत्त सम् बन्ध ी अपने हक पिकार नहीं है वविेिों को, या ककसी ऐसी दस् तावेज को, जजसके बि पर वह धगरवीदार या बन् धकदार के उसके हक रूप में कोई संपवत्त धारण करता है, या ककसी दस् तावेज को, जजसका प्रस्तुतीकरण उसे वविेिों को प्रस्तुत ककया अपराध में फंसाने की प्रववृत्त रिता है, प्रस्तुत करने के लिए वववश नहीं ककया जाएगा, जाना । जब तक कक उसने ऐस े ववििे ों के प्रस्तुतीकरण की वांछा रिने वािे व् यज‍ त के साथ, या ऐसे ककसी व् यज‍ त के साथ जजससे व् यत्ु पन् न अधधकार से वह व् यज‍ त दावा करता है, उन्ह ें प्रस्तुत करने का लिखित करार न कर लिया हो । ऐसे दस् तावेजों या 136. कोई भी व् यज‍ त, अपने कब् जे में के ऐस े दस् तावेजों या अपने ननयंत्रण वाि े इिै‍ राननक इिै‍ राननक अलभिेिों को प्रस्तुत करने के लिए जजनको प्रस्तुत करने के लिए कोई अन् य अलभिेिों का व् यज‍ त, यहद वे उसके कब् जे या ननयंत्रण में होते, प्रस्तुत करने से इंकार करने का हकदार प्रस्तुत ककया जाना, जजन् हें कोई होता, वववश नहीं ककया जाएगा, जब तक कक ऐसा अजन्त म वखणतष व् यज‍ त उन्ह ें प्रस्तुत दसू रा व् यज‍ त, करने के लिए सहमनत नहीं देता । जजसका उन पर कब् जा है, प्रस्तुत करने से इंकार कर सकता था । इस आधार पर 137. कोई सािी ककसी वाद या ककसी लसववि या दाजण्ि क कायवष ाही में वववाद्यक कक उत्तर उस े ववर्य से सुसंगत ककसी ववर्य के बारे में ककए गए ककसी प्रश् न का उत्तर देने स े इस अपराध में आधार पर िम् य नहीं होगा कक ऐसे प्रश् न का उत्तर ऐस े सािी को अपराध में फंसाएगा या फंसाएगा, सािी उत्तर देने स े उसकी प्रववृत्त प्रत् यित: या अप्रत्यितः अपराध में फंसाने की होगी या वह ऐसे सािी को िम् य नहीं ककसी प्रकार की शाजस् त या जब्ती के लिए अनावतृ करेगा या इसकी प्रववृत्त प्रत् यित: या होगा । अप्रत्यितः अनावतृ करने की होगी : परन् तु ऐसा कोई भी उत्तर, जजसे देने के लिए कोई सािी वववश ककया जाएगा, वह धगरफ्तारी या अलभयोजन के अध् यधीन नहीं होगा और न ऐसे उत्तर द्वारा लमथ् या साक्ष्य देने के लिए अलभयोजन के लसवाय वह उसके ववरुद्ध ककसी दाजण्ि क कायवष ाही में साबबत ककया जाएगा । सह-अपराधी । 138. सह-अपराधी, ककसी अलभयु‍ त व् यज‍ त के ववरुद्ध सिम सािी होगा, और कोई दोर्लसद्धध इसलिए अवैध नहीं है यहद वह ककसी सह-अपराधी के सम् पुष् ट पररसाक्ष्य के आधार पर की गई है । साक्षियों की 139. ककसी मामिे में ककसी तथ् य को साबबत करने के लिए साक्षियों की कोई संख् या । ववलशष् ट संख् या अपेक्षित नहीं होगी । अध् याय 10 साक्षक्षयों की परीक्षा के विषय में साक्षियों को 140. साक्षियों को प्रस्तुत करन े और उनकी परीिा का क्रम, क्रमश: लसववि और प्रस्तुत करने दण्ि प्रकक्रया से तत् समय संबंधधत ववधध और पद्धनत द्वारा, तथा ऐसी ककसी ववधध के और उनकी अभाव में न्य ायािय के वववेक द्वारा ववननयलमत होगा । परीिा का क्रम ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 525 141. (1) जब दोनों में स े कोई पिकार ककसी तथ् य का साक्ष् य देने की प्रस् थापना न् यायाधीश साक्ष्य की ग्राह्यता के करता है, तब न्य ायाधीश साक्ष्य देने की प्रस् थापना करने वािे पिकार स े पूछ सकेगा कक बारे में ननश् चय अलभकधथत तथ् य, यहद वह साबबत हो जाए, ककस प्रकार सुसंगत होगा और यहद करेगा । न्य ायाधीश यह समझता है कक वह तथ् य यहद साबबत हो गया तो सुसंगत होगा, तो वह उस साक्ष् य को ग्रहण करेगा, अन्य था नहीं । (2) यहद वह तथ् य, जजसका साबबत करना प्रस् थावपत है, ऐसा है जजसका साक्ष् य ककसी अन्य तथ् य के साबबत होने पर ही ग्राह्य होता है, तो ऐसा अजन्त म वखणषत तथ् य प्रथम वखणषत तथ् य का साक्ष् य हदए जाने के पूव ष साबबत करना होगा, जब तक कक पिकार ऐसे तथ् य को साबबत करने का वचन न दे और न्य ायािय ऐसे वचन से संतुष् ट न हो जाए । (3) यहद एक अलभकधथत तथ् य की सुसंगनत अन् य अलभकधथत तथ् य के प्रथम साबबत होने पर ननभरष हो, तो न्य ायाधीश अपने वववेकानुसार या तो दसू रे तथ् य के साबबत होने के पूव ष प्रथम तथ् य का साक्ष् य हदया जाना अनुज्ञात कर सकेगा, या प्रथम तथ् य का साक्ष् य हदए जाने के पूव ष द्ववतीय तथ् य का साक्ष् य हदए जाने की अपेिा कर सकेगा । दृष् ‍ांत (क) यह प्रस् थापना की गई है कक ककसी व् यज‍ त के, जजसका मतृ होना अलभकधथत है, सुसंगत तथ् य के बारे में कथन को, जो कक धारा 26 के अधीन सुसंगत है, साबबत ककया जाए । इससे पूव ष कक उस कथन का साक्ष् य हदया जाए उस कथन को साबबत करन े की प्रस् थापना करने वािे व् यज‍ त को यह तथ् य साबबत करना होगा कक वह व् यज‍ त मर गया है । (ि) यह प्रस् थापना की गई है कक ककसी ऐसे दस् तावेज की अन्त वस्ष तु को, जजसका िो गया होना कधथत है, प्रनतलिवप द्वारा साबबत ककया जाए । यह तथ् य कक मूि िो गया है प्रनतलिवप प्रस्तुत करने की प्रस् थापना करने वािे व्य ज‍ त को वह प्रनतलिवप प्रस्तुत करने से पूव ष साबबत करना होगा । (ग) क चुराई हुई संपवत्त को यह जानते हुए कक वह चुराई हुई है, प्राप् त करने का अलभयु‍ त है । यह साबबत करने की प्रस् थापना की गई है कक उसने उस संपवत्त के कब् जे का इंकार ककया । इस इंकार की सुसंगनत संपवत्त की पहचान पर ननभरष है । न्य ायािय अपने वववेकानुसार या तो कब् जे के इंकार के साबबत होने से पूव ष संपवत्त की पहचान की जानी अपेक्षित कर सकेगा, या संपवत्त की पहचान ककए जाने के पूव ष कब् जे के इंकार को साबबत ककए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा । (घ) ककसी तथ् य क के, जजसका ककसी वववाद्यक तथ् य का हेतुक या पररणाम होना कधथत है, साबबत करने की प्रस् थापना की गई है । कई मध् यान्त ररक तथ् य ख, ग और घ हैं, जजनका, इससे पूवष कक तथ् य क उस वववाद्यक तथ् य का हेतुक या पररणाम माना जा सके, अजस् तत् व में होना दलशषत ककया जाना आवश् यक है । न्य ायािय या तो ख, ग या घ के साबबत ककए जाने के पूव ष क के साबबत ककए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा, या क का साबबत ककया जाना अनुज्ञात करने के पूव ष ख, ग और घ का साबबत ककया जाना अपेक्षित कर सकेगा । 142. (1) ककसी सािी की उस पिकार द्वारा परीिा, जो उसे बुिाता है, उसकी साक्षियों की परीिा । मुख् य परीिा कहिाएगी । (2) ककसी सािी की प्रनतपिी द्वारा की गई परीिा उसकी प्रनतपरीिा कहिाएगी । (3) ककसी सािी की प्रनतपरीिा के पश् चात ् उसकी उस पिकार द्वारा परीिा, जजसन े उसे बुिाया था, उसकी पुन:परीिा कहिाएगी ।526 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— परीिाओं का 143. (1) साक्षियों से प्रथमत: मुख् यपरीिा होगी, तत् पश् चात ् (यहद प्रनतपिी ऐसा क्रम । चाहे तो) प्रनतपरीिा होगी, तत् पश् चात ् (यहद उस े बुिान े वािा पिकार ऐसा चाहे तो) पुन:परीिा होगी । (2) मुख्यपरीिा और प्रनतपरीिा, सुसंगत तथ् यों से संबंधधत होनी चाहहए, ककन् त ु प्रनतपरीिा का उन तथ् यों तक सीलमत रहना आवश् यक नहीं है, जजनका सािी ने अपनी मुख् यपरीिा में पररसाक्ष् य हदया है । (3) पुन:परीिा उन बातों के स् पष् टीकरण के प्रनत ननदेलशत होगी, जो प्रनतपरीिा में ननहदषष् ट हुए हों, और यहद पुन:परीिा में न् यायािय की अनुमनत से कोई नई बात प्रववष् ट की गई है, तो प्रनतपिी उस बात के बारे में अनतरर‍ त प्रनतपरीिा कर सकेगा । ककसी दस् तावेज 144. ककसी दस्त ावेज को प्रस्तुत करने के लिए समननत व् यज‍ त केवि इस तथ् य के को प्रस्तुत करने कारण कक वह उस े प्रस्तुत करता है सािी नहीं हो जाता जब तक कक वह सािी के तौर के लिए बुिाए पर बुिाया नहीं जाता, उसकी प्रनतपरीिा नहीं की जा सकती । गए व् यज‍त की प्रनतपरीिा । शीि का साक्ष्य 145. शीि का साक्ष् य देने वािे साक्षियों की प्रनतपरीिा और पुन:परीिा की जा देने वािे सािी । सकेगी । सूचक प्रश् न । 146. (1) कोई प्रश् न, जो उस उत्तर को सुझाता है, जजस े पछू ने वािा व् यज‍ त पाना चाहता है या पाने की आशा करता है, सूचक प्रश् न कहा जाता है । (2) सूचक प्रश् न, मुख् यपरीिा में या पुन:परीिा में, यहद ववरोधी पिकार द्वारा आिेप ककया जाता है, न्य ायािय की अनुमनत के बबना, नहीं पूछे जाने चाहहए । (3) न्य ायािय उन बातों के बारे में, जो पुन:स् थापना के रूप में या ननवववष ाद हैं या जो उसकी राय में पहिे से ही पयाषप् त रूप से साबबत हो चुकी हैं, सूचक प्रश् नों के लिए अनुमनत देगा । (4) सूचक प्रश् न प्रनतपरीिा में पूछे जा सकेंगे । िेिबद्ध ववर्यों 147. ककसी सािी से, जब वह परीिाधीन है, यह पूछा जा सकेगा कक ‍ या कोई के बारे में संववदा, अनुदान या संपवत्त का अन्य व् ययन, जजसके बारे में वह साक्ष् य दे रहा है, ककसी साक्ष्य । दस् तावेज में अन्त ववष्ष ट नहीं था, और यहद वह कहता है कक वह था, या यहद वह ककसी ऐसे दस् तावेज की अन्त वस्ष तु के बारे में कोई कथन करने ही वािा है, जजस े न्य ायािय की राय में, प्रस्तुत ककया जाना चाहहए, तो प्रनतपिी आिेप कर सकेगा कक ऐसा साक्ष् य तब तक नहीं हदया जाए जब तक ऐसा दस् तावेज प्रस्तुत नहीं कर हदया जाता, या जब तक वे तथ् य साबबत नहीं कर हदए जाते, जो उस पिकार को, जजसने सािी को बुिाया है, उसका द्ववतीयक साक्ष् य देने का हक देते हैं । स् पष् ‍ीकरण—कोई सािी उन कथनों का, जो दस् तावेजों की अन्त वस्ष तु के बारे में अन्य व् यज‍ तयों द्वारा ककए गए थे, मौखिक साक्ष् य दे सकेगा, यहद ऐसे कथन स् वयमेव सुसंगत तथ् य हैं । दृष् ‍ांत प्रश् न यह है कक ‍ या क ने ख पर हमिा ककया । ग अलभसाक्ष् य देता है कक उसने क को घ स े यह कहते सुना है कक “ख ने मुझे एक पत्र लििा था जजसमें मुझ पर चोरी का अलभयोग िगाया था और म ैं उसस े बदिा िूंगा” । यह कथन हमिे के लिए क का आशय दलशतष करने वािा होने के नाते सुसंगत है और उसका साक्ष् य हदया जा सकेगा, चाहे पत्र के बारे में कोई अन्य साक्ष् य न भी हदया गया हो ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 527 148. ककसी सािी की, उन पवू ष कथनों के बारे में, जो उसने लिखित रूप में ककए हैं पूव ष ििे बद्ध कथनों के बारे या जो िेिबद्ध ककए गए हैं और जो प्रश् नगत बातों स े ससु ंगत हैं, ऐसे िेि उस े हदिाए में प्रनतपरीिा । बबना, या ऐस े िेि साबबत हुए बबना, प्रनतपरीिा की जा सकेगी ; ककन् त,ु यहद उस ििे द्वारा उसका िण् िन करने का आशय है तो उस िेि को साबबत ककए जा सकने के पूव ष उसका ध् यान उस िेि के उन भागों की ओर आकवर्तष करना होगा जजनका उपयोग उसका िण् िन करने के प्रयोजन से ककया जाना है । 149. जब ककसी सािी स े प्रनतपरीिा की जाती है, तब उससे इसमें इसके पूव ष प्रनतपरीिा में ननहदषष् ट प्रश् नों के अनतरर‍ त ऐसे कोई भी प्रश् न पूछे जा सकेंगे, जजनकी प्रववृत्त— ववधधपूण ष प्रश् न। (क) उसकी सत् यवाहदता परिने की है ; या (ि) यह पता चिाने की है कक वह कौन है और जीवन में उसकी जस् थनत ‍ या है ; या (ग) उसके शीि को दोर् िगाकर उसकी ववश् वसनीयता को ध‍ का पहुंचाने की है, चाहे ऐसे प्रश् नों का उत्तर उसे प्रत्य ित: या अप्रत्यितः अपराध में फंसाने की प्रववृत्त रिता हो, या उसे ककसी शाजस् त या जब्ती के लिए अनावत्तृ करता हो या प्रत्य ित: या अप्रत्यितः अनावत्तृ करने की प्रववृत्त रिता हो : 2023 का 45 परन् तु भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 67, धारा 68, धारा 69, धारा 70 या धारा 71 के अधीन ककसी अपराध के लिए या ऐसे ककसी अपराध के ककए जाने का प्रयत् न करने के लिए ककसी अलभयोजन में, जहां सम् मनत का प्रश् न वववाद्य है वहां पीड़िता की प्रनतपरीिा में उसके साधारण व् यलभचार या ऐसी पीड़िता के ककसी व् यज‍ त के साथ पूव ष िधैंगक अनुभव के बारे में ऐसी सम् मनत या सम्म नत के स्वरूप के लिए साक्ष् य देना या प्रश् नों को पूछने की अनुमनत नहीं होगी । 150. यहद ऐसा कोई प्रश् न उस वाद या कायवष ाही से ससु ंगत ककसी बात से सबं ंधधत सािी को उत्तर देने के लिए है, तो धारा 137 के उपबन्ध उसको िागू होंगे । कब वववश ककया जाए । 151. (1) यहद ऐसा कोई प्रश्न ऐसी बात से संबंधधत है, जो उस बात या कायवष ाही न् यायािय ववननजश् चत करेगा से वहां तक के लसवाय, जहां तक कक वह सािी के शीि को दोर् िगाकर उसकी कक कब प्रश् न ववश् वसनीयता पर प्रभाव िािती है, सुसंगत नहीं है, तो न्य ायािय ववननजश् चत करेगा कक पूछा जाएगा और सािी को उत्तर देने के लिए वववश ककया जाए या नहीं और यहद वह ठीक समझे, तो सािी को उत्तर सािी को सचेत कर सकेगा कक वह उसका उत्तर देने के लिए आबद्ध नहीं है । देने के लिए कब वववश ककया (2) अपने वववेक का प्रयोग करने में, न् यायािय ननम्न लिखित ववचारों को ध् यान में जाएगा । रिेगा, अथाषत ् :— (क) ऐसे प्रश् न उधचत हैं, यहद वे ऐसी प्रकृनत के हैं कक उनके द्वारा व्य‍त ककए गए िांछन की सत् यता उस ववर्य में, जजसका वह सािी पररसाक्ष् य देता है, सािी की ववश् वसनीयता के बारे में न्य ायािय की राय पर गम् भीर प्रभाव िािेगी; (ि) ऐसे प्रश् न अनुधचत हैं, यहद उनके द्वारा व्य‍त ककया गया िांछन ऐसी बातों के संबंध में है जो समय में उतनी अतीत हैं या जो इस प्रकार की है कक िांछन की सत् यता उस ववर्य में, जजसका वह सािी पररसाक्ष् य देता है, सािी की ववश् वसनीयता के बारे में न्य ायािय की राय पर प्रभाव नहीं िािेगी या बहुत थो़िी मात्रा में प्रभाव िािेगी; (ग) ऐसे प्रश् न अनुधचत हैं, यहद सािी के शीि के ववरुद्ध ककए गए िांछन के महत् व और उसके साक्ष् य के महत् व के बीच भारी ववर्मता है;528 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— (घ) न्य ायािय, यहद वह ठीक समझे, सािी के उत्तर देने से इंकार करने पर यह अनुमान िगा सकेगा कक उत्तर यहद हदया जाता, तो प्रनतकूि होता । युज‍ तयु‍त 152. कोई भी ऐसा प्रश् न, जैसा धारा 151 में ननहदषष् ट है, नहीं पूछा जाना चाहहए, आधारों के बबना जब तक कक पूछने वाि े व् यज‍ त के पास यह सोचने के लिए युज‍ तयु‍ त आधार न हों कक प्रश् न नहीं पूछा ऐसा िांछन, जो वह व्य‍त करता है, सुआधाररत है । जाएगा। दृष् ‍ांत (क) ककसी अधधव‍ता को ककसी दसू रे अधधव‍ता द्वारा अनुदेश हदया गया है कक एक महत् वपूण ष सािी िकैत है । उस सािी से यह पूछने के लिए कक ‍ या वह िकैत है, यह युज‍ तयु‍ त आधार है । (ि) ककसी अधधव‍ता को न्य ायािय में ककसी व् यज‍ त द्वारा जानकारी दी जाती है कक एक महत् वपूण ष सािी िकैत है । अधधव‍ता द्वारा प्रश्न ककए जाने पर जानकारी देने वािा अपन े कथन के लिए समाधानप्रद कारण बताता है । उस सािी स े यह पूछने के लिए कक ‍ या वह िकैत है, यह युज‍ तयु‍ त आधार है । (ग) ककसी सािी से, जजसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है, यादृजच्छक यह पूछा जाता है कक ‍ या वह िकैत है । यहां इस प्रश् न के लिए कोई युज‍तयु‍त आधार नहीं है । (घ) कोई सािी, जजसके बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है, अपने जीवन के ढंग और जीववका के साधनों के बारे में पूछे जान े पर असमाधानप्रद उत्तर देता है । उसस े यह पूछने का कक ‍ या वह िकैत है यह युज‍ तयु‍ त आधार हो सकता है । युज‍ तयु‍त 153. यहद न्य ायािय की यह राय हो कक ऐसा कोई प्रश् न युज‍ तयु‍ त आधारों के आधारों के बबना बबना पूछा गया था, तो यहद वह ककसी अधधव‍ता द्वारा पूछा गया था, तो वह मामि े प्रश् न पूछे जाने की की पररजस् थनतयों की उच् च न्य ायािय को या अन्य प्राधधकारी को, जजसके अधीन दशा में न् यायािय की प्रकक्रया । अधधव‍ता अपनी ववृत्त के पािन में है, ररपोटष कर सकेगा । अलशष् ट और 154. न्य ायािय ककन्ह ीं प्रश् नों का या पूछताछों का, जजन्ह ें वह अलशष् ट या किंकात् मक किंकात् मक समझता है, चाहे ऐस े प्रश् न या पूछताछ न्य ायािय के समि प्रश् नों को कुछ प्रश् न । प्रभाववत करने की प्रववृत्त रिते हों, ननर्ेध कर सकेगा, जब तक कक वे वववाद्यक तथ् यों के या उन ववर्यों के संबंध में न हों, जजनका ज्ञात होना यह अवधाररत करने के लिए आवश् यक है कक वववाद्यक तथ् य ववद्यमान थे या नहीं । अपमाननत या 155. न्य ायािय ऐसे प्रश् न का ननर्ेध करेगा, जो उसे ऐसा प्रतीत होता है कक वह िुब् ध करने के अपमाननत या िुब् ध करने के लिए आशनयत है, या जो यद्यवप स् वयं में उधचत है, तथावप लिए आशनयत न्य ायािय को ऐसा प्रतीत होता है कक वह अनावश् यक रूप से आपवत्तजनक है । प्रश् न । सत् यवाहदता 156. ककसी सािी से ऐसा कोई प्रश् न पूछा गया है, जो जांच से केवि वहीं तक परिने के प्रश् नों सुसंगत है जहां तक कक वह उसके शीि को िनत पहुंचा कर उसकी ववश् वसनीयता को के उत्तरों का ध‍ का पहुंचाने की प्रववृत्त रिता है, और उसने उसका उत्तर दे हदया हो, तब उसका िण् िन िण् िन करने के करने के लिए कोई साक्ष् य नहीं हदया जाएगा; ककन् त ु यहद वह लमथ् या उत्तर देता है, तो लिए साक्ष्य का अपवजनष । तत् पश् चात ् उस पर लमथ् या साक्ष् य देने का आरोप िगाया जा सकेगा । अपिाि 1—यहद ककसी सािी से पूछा जाए कक ‍ या वह पूव ष में ककसी अपराध के लिए दोर्लसद्ध हुआ था और वह उसे इंकार करे, तो उसकी पूव ष दोर्लसद्धध का साक्ष् य हदया जा सकेगा । अपिाि 2—यहद ककसी सािी से उसकी ननष् पिता पर दोर्ारोपण करने की प्रववृत्त रिने वािा कोई प्रश् न पूछा जाए और वह सुझाए हुए तथ् यों को इंकार करते हुए उसका उत्तर देता है, तो उसका िण्ि न ककया जा सकेगा ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 529 दृष् ‍ांत (क) ककसी अंिरराइटर के ववरुद्ध एक दावे का प्रनतरोध कपट के आधार पर ककया जाता है । दावेदार से पूछा जाता है कक ‍ या उसने वपछिे ककसी संव् यवहार में कपटपूण ष दावा नहीं ककया था । वह इससे इंकार करता है । यह दलशतष करने के लिए साक्ष् य प्रस् थावपत ककया जाता है कक उसने ऐसा दावा सचमुच ककया था । यह साक्ष् य अग्राह्य है । (ि) ककसी सािी स े पूछा जाता है कक ‍ या वह ककसी ओहदे से बेईमानी के लिए पदच् युत नहीं ककया गया था । वह इससे इंकार करता है । यह दलशतष करने के लिए कक वह बेईमानी के लिए पदच् युत ककया गया था साक्ष् य प्रस् थावपत ककया जाता है । यह साक्ष् य ग्राह्य नहीं है । (ग) क अलभपुष्ट करता है कक उसने अमुक हदन ख को गोवा में देिा । क से पूछा जाता है कक ‍ या वह स् वयं उस हदन वाराणसी में नहीं था । वह इससे इंकार करता है । यह दलशतष करने के लिए कक क उस हदन वाराणसी में था साक्ष् य प्रस् थावपत ककया जाता है । यह साक्ष् य ग्राह्य है, इस नाते नहीं कक वह क का एक तथ् य के बारे में िण्ि न करता है जो उसकी ववश् वसनीयता पर प्रभाव िािता है, बजल्क इस नाते कक वह इस अलभकधथत तथ् य का िण् िन करता है कक ख प्रश् नगत हदन गोवा में देिा गया था । इनमें से प्रत्येक मामिे में सािी पर, यहद उसका इंकार करना लमथ् या था, लमथ् या साक्ष् य देने का आरोप िगाया जा सकेगा । (घ) क से पूछा जाता है कक ‍ या उसके कुटुम् ब और ख के, जजसके ववरुद्ध वह साक्ष् य देता है, कुटुम् ब में कुि बैर नहीं रहा था । वह इसे इंकार करता है । उसका िण् िन इस आधार पर ककया जा सकेगा कक यह प्रश् न उसकी ननष् पिता पर दोर्ारोपण करने की प्रववृत्त रिता है । 157. (1) न्य ायािय उस व् यज‍ त को, जो सािी को बुिाता है, उस सािी से कोई पिकार द्वारा अपने ही सािी ऐसे प्रश् न करने की अपने वववेकानुसार अनुमनत दे सकेगा, जो प्रनतपिी द्वारा प्रनतपरीिा से प्रश् न । में ककए जा सकते हैं । (2) इस धारा की कोई बात, उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार अनुमनत हदए गए व् यज‍ त को ऐसे साक्ष्य के ककसी भाग का अविंब िेने के हक से वंधचत नहीं करेगी । 158. ककसी सािी की ववश् वसनीयता पर प्रनतपिी द्वारा, या न्य ायािय की सम् मनत सािी की ववश् वसनीयता से उस पिकार द्वारा, जजसने उसे बुिाया है, ननम् नलिखित प्रकारों से अधधिेप ककया जा पर अधधिेप । सकेगा— (क) उन व् यज‍ तयों के साक्ष् य द्वारा, जो यह पररसाक्ष् य देत े हैं कक सािी के बारे में अपने ज्ञान के आधार पर, वे उसे ववश्व सनीयता का अपात्र समझते हैं ; (ि) इस सबूत द्वारा कक सािी को ररश् वत दी गई है या उसने ररश् वत की प्रस् थापना स्वीकार कर िी है या उसे अपना साक्ष् य देने के लिए कोई अन्य भ्रष् ट उत् प्रेरणा लमिी है ; (ग) उसके साक्ष् य के ककसी ऐसे भाग से असंगत वपछिे कथनों के सबूत द्वारा, जजसका िण् िन ककया जा सकता है । स् पष् ‍ीकरण—कोई सािी जो ककसी अन्य सािी को ववश् वसनीयता के लिए अपात्र घोवर्त करता है, उससे की गई मुख् य परीिा में उसके ववश् वास के कारणों को चाहे न बताए, ककन् तु प्रनतपरीिा में उससे उनके कारणों को पूछा जा सकेगा, और उन उत्तरों का, जजन्ह ें वह देता है, िण् िन नहीं ककया जा सकता, तथावप यहद वे लमथ् या है, तो तत् पश् चात ् उस पर लमथ् या साक्ष् य देने का आरोप िगाया जा सकेगा ।530 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दृष् ‍ांत (क) ख को बेचे गए और पररदान ककए गए माि के मूल् य के लिए ख पर क वाद िाता है । ग कहता है कक उसने ख को माि का पररदान ककया । यह दलशतष करने के लिए साक्ष् य प्रस् थावपत ककया जाता है कक ककसी पूव ष अवसर पर उसने कहा था कक उसन े उस माि का पररदान ख को नहीं ककया था । यह साक्ष् य ग्राह्य है । (ि) क, ख की हत् या का अलभयु‍त है । ग कहता है कक ख ने मरते समय यह घोवर्त ककया था कक क ने ख को यह घाव हदया था, जजससे वह मर गया । यह दलशतष करने के लिए साक्ष् य प्रस् थावपत ककया जाता है कक ककसी पूव ष अवसर पर ग ने कहा था कक ख ने मत्ृ यु के समय यह घोवर्त नहीं ककया कक क ने ख को वह घाव हदया था, जजससे उसकी मत्ृ यु हुई । यह साक्ष् य ग्राह्य है । सुसंगत तथ् य के 159. जब कोई सािी, जजसकी सम् पुजष् ट करना आशनयत हो, ककसी सुसंगत तथ् य साक्ष्य की का साक्ष् य देता है, तब उसस े ऐसी अन्य ककन्ह ीं भी पररजस्थ नतयों के बारे में प्रश् न ककया सम् पुजष् ट करने जा सकेगा, जजन्ह ें उसने उस समय या स् थान पर, या उसके ननकट अविोककत ककया, की प्रववृत्त रिन े वािे प्रश् न ग्राह्य जजस पर ऐसा सुसंगत तथ् य घहटत हुआ, यहद न्य ायािय की यह राय हो कक ऐसी होंगे। पररजस् थनतयां, यहद वे साबबत हो जाएं, सािी के उस सुसंगत तथ् य के बारे में, जजसका वह साक्ष् य देता है, पररसाक्ष् य को सम् पुष् ट करेंगी । दृष् ‍ांत क ककसी सह-अपराधी को ककसी िूट का वत्तृ ान् त देता है, जजसमें उसने भाग लिया था, वह िूट से असंबद्ध ववलभन्न घटनाओं का वणषन करता है जो उस स् थान को और जहां कक वह िूट की गई थी, जाते हुए और वहां से आते हुए माग ष में घहटत हुई थी । इन तथ् यों का स् वतंत्र साक्ष् य स् वयं उस िूट के बारे में उसके साक्ष् य को सम् पष्ु ट करन े के लिए हदया जा सकेगा । उसी तथ् य के बारे 160. ककसी सािी के पररसाक्ष्य की सम्पुजष् ट करने के लिए ऐसे सािी द्वारा उसी में पश् चात व्ती तथ् य से संबंधधत, उस समय पर या उसके िगभग जब वह तथ् य घहटत हुआ था, ककया अलभसाक्ष्य की हुआ, या उस तथ् य का अन्व ेर्ण करने के लिए ववधध द्वारा सिम ककसी प्राधधकारी के संपुजष् ट करने के लिए सािी के समि ककया हुआ कोई पूवतष न कथन साबबत ककया जा सकेगा । पूवतष न कथन साबबत ककए जा सकेंगे । साबबत कथन के 161. जब कभी कोई कथन, जो धारा 26 या धारा 27 के अधीन सुसंगत है, साबबत बारे में, जो कर हदया जाए, तब चाहे उसके िण् िन के लिए या संपुजष् ट के लिए या जजसके द्वारा वह कथन धारा 26 ककया गया था उस व् यज‍ त की ववश् वसनीयता को दोर्ारोपण या अलभपुष् ट करने के लिए व े या धारा 27 के सभी बातें साबबत की जा सकेंगी, जो यहद वह व् यज‍ त सािी के रूप में बुिाया गया होता अधीन सुसंगत और उसने प्रनतपरीिा में सुझाई हुई बात की सत् यता से इंकार ककया होता, तो साबबत की है, कौन सी बातें जा सकेगी । साबबत की जा सकेंगी । स् मनृत ताजी 162. (1) कोई सािी, जब वह परीिा के अधीन है, ककसी ऐसे िेि को देि करके, करना । जो कक स् वयं उसने उस संव् यवहार के समय जजसके संबंध में उससे प्रश् न ककया जा रहा है, या इतने शीघ्र पश् चात ् हो कक न् यायािय इसे संभाव् य समझता हो कक वह संव् यवहार उस समय उसकी स् मनृत में ताजा था, अपनी स् मनृत को ताजा कर सकेगा : परंतु सािी ककसी ऐस े िेि को भी देि सकेगा जो ककसी अन्य व् यज‍ त द्वारा तैयार ककया गया है और उस सािी द्वारा उपयु‍ष त समय के भीतर पढ़ा गया है, यहद वह उस िेि का, उस समय जबकक उसने उसे पढ़ा था, सही होना जानता था ।अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 531 (2) जब कभी कोई सािी अपनी स् मनृत ककसी दस्त ावेज को देिने से ताजी कर सकता है, तब वह न्य ायािय की अनुज्ञा से, ऐसे दस् तावेज की प्रनतलिवप को देि सकेगा : परन् तु यह तब जबकक न्य ायािय का समाधान हो गया है कक मूि को प्रस्तुत नहीं करने का पयाषप् त कारण है : परंतु यह और कक ववशेर्ज्ञ अपनी स् मनृत ववृत्तक पुस् तकों को देि कर ताजी कर सकेगा । 163. कोई सािी ककसी ऐसे दस् तावेज में वखणतष तथ् यों का भी, जैसा धारा 162 में धारा 162 में वखणतष है, चाहे उसे स् वयं उन तथ् यों का ववननहदषष् ट स् मरण न हो, पररसाक्ष् य दे सकेगा, वखणतष दस् तावेज में कधथत तथ् यों यहद वह आश्वस्त है कक वे तथ् य उस दस् तावेज में ठीक-ठीक अलभलिखित थे । के लिए दृष् ‍ांत पररसाक्ष्य । कोई िेिाकार कारबार के अनुक्रम में ननयलमत रूप से रिी जाने वािी बहहयों में उसके द्वारा अलभलिखित तथ् यों का पररसाक्ष् य दे सकेगा, यहद वह जानता है कक बहहयां ठीक-ठीक रिी गई थीं, यद्यवप वह प्रववष् ट ककए गए ववलशष् ट संव् यवहारों को भूि गया हो । 164. पूववष ती अजन् तम दो धाराओं के उपबन्ध ों के अधीन ननहदषष्ट ककए गए ककसी स् मनृत ताजी िेि को प्रस्तुत ककया जाएगा और प्रनतपिी को हदिाया जाएगा, यहद वह उसकी अपेिा करने के लिए प्रयु‍ त िेि के करे ; ऐसा पिकार, यहद वह चाहे तो उस सािी स े उसके बारे में प्रनतपरीिा कर सकेगा । बारे में प्रनतपिी का अधधकार । 165. (1) ककसी दस् तावेज को प्रस्तुत करने के लिए समन ककए गए सािी, यहद वह दस् तावेजों का उसके कब् जे में या अधधकार के अधीन हो, ऐसे ककसी आिेप के होने पर भी, जो उस े प्रस्तुत ककया जाना । प्रस्तुत करने या उसकी ग्राह्यता के बारे में हो, उसे न्य ायािय में िाएगा : परंतु ऐसे ककसी आिेप की ववधधमान्य ता न्य ायािय द्वारा ववननजश् चत की जाएगी । (2) न्य ायािय, यहद यह ठीक समझे, तो उस दस् तावेज का ननरीिण कर सकेगा, यहद वह राज् य की बातों स े सबं ंधधत नहीं है, या स्वयं को उसकी ग्राह्यता अवधाररत करने में समथ ष बनाने के लिए अन्य साक्ष् य िे सकेगा । (3) यहद ऐस े प्रयोजन के लिए ककसी दस् तावेज का अनुवाद कराना आवश् यक हो तो न्य ायािय, यहद यह ठीक समझे, तो अनुवादक को ननदेश दे सकेगा कक वह उसकी अन्तवस्ष तु को गुप् त रि,े लसवाय जबकक दस् तावेज को साक्ष् य में हदया जाना हो ; और यहद अनुवादक ऐसे ननदेश की अवज्ञा करे, तो यह धाररत ककया जाएगा कक उसने भारतीय न्याय संहहता, 2023 की धारा 198 के अधीन अपराध ककया है : 2023 का 45 परंतु कोई न्यायािय, मंबत्रयों और भारत के राष्रपनत के बीच हुई ककसी संसूचना को इसके समि प्रस्तुत करने की अपेिा नहीं करेगा । 166. जब कोई पिकार, ककसी दस्तावेज को जजस े प्रस्ततु करने का उसने दसू रे मंगाए गए और पिकार को सूचना दी है, मगं ाता है और ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत ककया जाता है और उस सूचना पर प्रस्तुत ककए पिकार द्वारा, जजसने उसके प्रस्तुत करने की मांग की थी, ननरीक्षित हो जाता है, तब गए दस्तावेज यहद उसे प्रस्तुत करने वािा पिकार उससे ऐसा करने की अपेिा करता है, तो वह उस े का साक्ष्य के साक्ष्य के रूप में देने के लिए आबद्ध होगा । रूप में हदया जाना । 167. जब कोई पिकार ऐस े ककसी दस्तावेज को प्रस्तुत करने से इन्कार कर देता सूचना पाने पर है, जजसे प्रस्तुत करने की उसे सूचना लमि चुकी है, तब वह तत्पश् चात ् उस दस्तावेज को जजस दस्तावेज के प्रस्तुत करने दसू रे पिकार की सम्मनत के या न्यायािय के आदेश के बबना साक्ष्य के रूप में उपयोग से इंकार कर में नहीं िा सकेगा । हदया गया है उसको साक्ष्य के रूप में उपयोग में िाना।532 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— दृष् ‍ांत ख पर ककसी करार के आधार पर क वाद िाता है और वह ख को उसे प्रस्तुत करने की सूचना देता है । ववचारण में क उस दस्तावेज की मांग करता है और ख उसे प्रस्तुत करने से इंकार करता है । क उसकी अन्तवस्ष तु का द्ववतीयक साक्ष्य देता है । क द्वारा हदए हुए द्ववतीयक साक्ष्य का िण्िन करने के लिए या यह दलशषत करने के लिए कक वह करार स्टाजम्पत नहीं है, ख दस्तावेज को ही प्रस्तुत करना चाहता है । वह ऐसा नहीं कर सकता । प्रश् न करने या 168. न्यायाधीश सुसंगत तथ्यों का पता चिाने के लिए या उनका सबूत अलभप्राप् त प्रस्तुत करने का करने के लिए, ककसी भी रूप में ककसी भी समय ककसी भी सािी या पिकारों से ककसी आदेश देन े की भी तथ्य के बारे में कोई भी प्रश् न, जो वह आवश्यक समझे, पूछ सकेगा, तथा ककसी भी न्यायाधीश की शज‍ त। दस्तावेज या चीज को प्रस्तुत करने का आदेश दे सकेगा ; और न तो पिकार और न उनके प्रनतननधध हकदार होंगे कक वह ककसी भी ऐसे प्रश् न या आदेश के प्रनत कोई भी आिेप करें, न ऐसे ककसी भी प्रश् न के प्रत्युत्तर में हदए गए ककसी भी उत्तर पर ककसी भी सािी की न्यायािय की अनुमनत के बबना प्रनतपरीिा करने के हकदार होंगे : परन्तु ननणयष , उन तथ्यों पर आधाररत होना चाहहए, जो इस अधधननयम द्वारा सुसंगत घोवर्त ककए गए हैं और जो सम्यक् रूप से साबबत ककए गए है : परन्तु यह और कक न तो यह धारा न्यायाधीश को, ककसी सािी को ककसी ऐसे प्रश् न का उत्तर देने के लिए या ककसी ऐसे दस्तावेज को प्रस्तुत करने को वववश करने के लिए प्राधधकृत करेगी, जजसका उत्तर देने से या जजस े प्रस्तुत करने से, यहद प्रनतपिी द्वारा वह प्रश् न पूछा गया होता या वह दस्तावेज मंगाया गया होता, तो ऐसा सािी धारा 127 से धारा 136, दोनों सहहत, के अधीन उत्तर देने या प्रस्तुत करने से इंकार करने का हकदार होता; और न न्यायाधीश कोई ऐसा प्रश् न पूछेगा जजसका पूछना ककसी अन्य व्यज‍ त के लिए धारा 151 या धारा 152 के अधीन अनुधचत होता; और न वह इसमें इसके पूव ष अपवाहदत दशाओं के लसवाय, ककसी भी दस्तावेज के प्राथलमक साक्ष्य का हदया जाना अलभमु‍ त करेगा । अध्याय 11 साक्ष्य की अिुधचत स्िीकृनत और अस्िीकृनत के विषय में साक्ष्य की 169. साक्ष्य की अनुधचत स्वीकृनत या अस्वीकृनत स्वयमेव ककसी भी मामिे में नए अनुधचत स्वीकृनत ववचारण के लिए या ककसी ववननश् चय के उिट जाने के लिए आधार नहीं होगा, यहद उस या अस्वीकृनत के न्यायािय को, जजसके समि ऐसा आिेप उठाया गया है, यह प्रतीत हो कक आिेवपत और लिए नया ववचारण नही ं स्वीकृत उस साक्ष्य के बबना भी ववननश् चय को न्यायोधचत ठहराने के लिए पयाषप्त साक्ष्य होगा । था या यह कक यहद अस्वीकृत साक्ष्य लिया भी गया होता तो उससे ववननश् चय में फेरफार नहीं होना चाहहए था । अध्याय 12 निरसि और व्यािवृ ि ननरसन और 170. (1) भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 1872 का ननरसन ककया जाता है । 1872 का 1 व्याववृत्त । (2) ऐसे ननरसन के होत े हुए भी, यहद उस तारीि से तत्काि पूव,ष जजसको यहअनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 533 अधधननयम प्रवत्तृ होता है, कोई आवेदन, ववचारण, जांच, अन्वेर्ण, कायवष ाही या अपीि िंबबत है, तो ऐसा आवेदन, ववचारण, जांच, अन्वेर्ण, कायषवाही या अपीि, ऐस े प्रारंभ के 1872 का 1 ठीक पूव ष यथा प्रवत्तृ भारतीय साक्ष्य अधधननयम, 1872 के उपबंधों के अधीन व्यौहार ककया जाएगा, मानो यह अधधननयम प्रवत्तृ नहीं हुआ है ।534 भारत का राजपत्र असाधारण [ भाग 2— अनुसूची [िारा 63(4)(ग) िेखखए] प्रमाणपत्र भाग क (पक्षकार दिारा भरा जािा है) म,ैं............................................ (नाम), पुत्र/पत्रु ी/पनत/पत्नी........................, जो ................................. का ननवासी .................................. में ननयोजजत हूं, सत्यननष्ठापूवकष प्रनतज्ञान और शुद्ध अन्तःकरण से कथन करता/करती हूं और ननम्नानुसार प्रस्तुत करता/करती हूं कक :-- मनैं े ननम्नलिखित डिवाइस/डिजजटि अलभिेि स्रोत से लिए गए डिजजटि अलभिेि का इिै‍राननक अलभिेि/आउटपुट प्रस्तुत ककया है (धचहृन िगाएं) : कम्प्यूटर/संग्रहण मीडिया िीवीआर मोबाइि फ्िैश ड्राइव सीिी/िीवीिी सवरष ‍िाऊि अन्य अन्य : ............................................................................................ बनावट और मॉिि : ................................................ रंग : ........................... क्रम संख्या : .......................................................................... आईएमईआई/यूआईएन/यूआईिी/एमएसी/‍िाऊि आईिी ............................................. (जैसा िागू हो) और डिवाइस/डिजजटि अलभिेि................... (ववननहदषष्ट करें) के ववर्य में कोई अन्य सुसंगत सूचना, यहद कोई हो । डिजजटि डिवाइस या डिजजटि अलभिेि स्रोत ननयलमत कक्रयाकिाप करने के प्रयोजनों के लिए ननयलमत रूप से सूचना का सजृ न करन,े संग्रह करने या प्रोसेस करने के लिए ववधधपूण ष ननयंत्रण के अधीन था और इस अवधध के दौरान कंप्यूटर या संसूचना डिवाइस उधचत रूप से काय ष कर रही थी तथा कारबार के साधारण अनक्रु म के दौरान सुसंगत सूचना को कंप्यूटर में ननयलमत रूप से फीि ककया गया था । यहद ककसी भी समय कंप्यूटर/डिजजटि डिवाइस उधचत रूप से काय ष नहीं कर रही थी या प्रचािन में नहीं थी, तब इससे इिै‍राननक/डिजजटि अलभिेि या उसकी शुद्धता प्रभाववत नहीं हुई है । डिजजटि डिवाइस या डिजजटि अलभिेि का स्रोत मेरे द्वारा :— स्वालमत्वाधीन अनुरक्षित प्रबंधधत प्रचालित (जो िागू हो उसका चयन करें) है । म,ैं कथन करता/करती हूं कक इिै‍राननक/डिजजटि अलभिेि/अलभिेि का ननम्नलिखित एल्गोररथ्म के माध्यम से अलभप्राप्त हैश मान ..................................... है । एसएचए1 : एसएचए256 : एमिी5 : अन्य .................... (ववधधक रूप से स्वीकाय ष मानक) (प्रमाणपत्र के साथ हैश ररपोटष संिग्न करें) (नाम और हस्तािर) तारीि (हदन/मास/वर्)ष : .................. समय (आईएसटी) : .................. (24 घंटे के प्ररूप में) स्थान : ..................अनुभाग 1क] भारत का राजपत्र असाधारण 535 भाग ख (विशेषज्ञ दिारा भरा जािा है) म,ैं.................................... (नाम), पुत्र/पुत्री/पनत/पत्नी.............................., जो..................................... का ननवासी ................................... में ननयोजजत हूं, सत्यननष्ठापूवकष प्रनतज्ञान और शुद्ध अन्तःकरण से कथन करता/करती हूं और ननम्नानुसार प्रस्तुत करता/करती हूं कक :— प्रस्तुत ककए गए डिजजटि अलभिेि के इिै‍राननकी अलभििे /आउटपुट, ननम्नलिखित डिवाइस/डिजजटि अलभिेि स्रोत से अलभप्राप्त ककए गए हैं (धचहृन िगाएं) : कम्प्यूटर/संग्रहण मीडिया िीवीआर मोबाइि फ्िशै ड्राइव सीिी/िीवीिी सवरष ‍िाऊि अन्य अन्य : ...................................................................................... बनावट और मॉिि : ................................................ रंग : ........................... क्रम संख्या : .......................................................................... आईएमईआई/यूआईएन/यूआईिी/एमएसी/‍िाऊि आईिी ............................................. (जैसा िागू हो) और डिवाइस/डिजजटि अलभिेि................... (ववननहदषष्ट करें) के ववर्य में कोई अन्य सुसंगत सूचना, यहद कोई हो । म,ैं कथन करता/करती हूं कक इिै‍राननक/डिजजटि अलभिेि का ननम्नलिखित एल्गोररथ्म के माध्यम से अलभप्राप्त हैश मान ..................................................................... है :— एसएचए1 : एसएचए256 : एमिी5 : अन्य .................... (ववधधक रूप से स्वीकाय ष मानक) (प्रमाणपत्र के साथ हैश ररपोटष संिग्न करें) (नाम, पदनाम और हस्तािर) तारीि (हदन/मास/वर्)ष : .................. समय (आईएसटी) : .................. (24 घंटे के प्ररूप में) स्थान : .................. —————— डॉ राजीि मखण, सधचि, भारत सरकार। UPLOADED BY THE MANAGER, GOVERNMENT OF INDIA PRESS, MINTO ROAD, NEW DELHI–110002 AND PUBLISHED BY THE CONTROLLER OF PUBLICATIONS, DELHI–110054. MGIPMRND—793GI(S3)—27-03-2024.

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